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सूर्य संवेदना पुष्पे, दीप्ति कारुण्यगंधने ।
लब्ध्वा शुभं नववर्षेऽस्मिन कुर्यात्सर्वस्य मंगलम् ॥
भावार्थ : जिस तरह सूर्य प्रकाश देता है, संवेदना करुणा को जन्म देती है, पुष्प सदैव महकता रहता है, उसी तरह आने वाला यह नया साल आपके लिए हर दिन, हर पल के लिए मंगलमय हो ।
नववर्ष : चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (22 March 2023)
@Hindu
लब्ध्वा शुभं नववर्षेऽस्मिन कुर्यात्सर्वस्य मंगलम् ॥
नववर्ष : चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (22 March 2023)
@Hindu
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शिव शम्भो शम्भो
t.me/Geet_Ganga
ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ… നരനായിങ്ങനെ ജനിച്ചു ഭൂമിയില് നരകവാരിധി നടുവില് ഞാന് നരകത്തില് നിന്നും കരകേറ്റീടേണം തിരുവൈക്കം വാഴും ശിവശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ… മരണകാലത്തെ ഭയത്തെ ചിന്തിച്ചാല് മതിമറന്നുപോം മനമെല്ലാം മനതാരില് വന്നു വിളയാടീടേണം തിരുവൈക്കം വാഴും ശിവശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ… ശിവശിവാ ഒന്നും പറയാവതല്ല മഹമായ തന്റെ വികൃതികള് മഹമായ നീക്കീട്ടരുളേണം നാഥാ തിരുവൈക്കം വാഴും ശിവശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ… വലിയൊരു കാട്ടിലകപ്പെട്ടു ഞാനും വഴിയും കാണാതെ ഉഴലുമ്പോള് വഴിയില് നേര്വഴി അരുളേണം നാഥാ തിരുവൈക്കം വാഴും ശിവശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ… യെളുപ്പമായുള്ള വഴിയെ ചെല്ലുമ്പോള് ഇടയ്ക്കിടെയാറു പടിയുണ്ട് പടിയാറും കടന്നവിടെചെല്ലുമ്പോള് ശിവനെ കാണാകും ശിവ ശംഭോ! ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ ശംഭോ ശിവശംഭോ
#malayalam #mahadev
@Geet_Ganga
#malayalam #mahadev
@Geet_Ganga
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Forwarded from Hindu X (Prince)
🕉 शीतला अष्टमी, शीतला माता
शीतला अष्टमी / बसौडा
शीतला अष्टमी पर्व देवी शीतला के सम्मान में मनाया जाता हैं। यह होली पर्व के आठ दिन पश्चात चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता हैं, किंतु कुछ स्थानों पर जनता इस पर्व को होली के पश्चात आने वाले पहले सोमवार या गुरूवार को मनाते हैं। शास्त्रों के अनुसार शनिवार, रविवार को आकरा वार (उग्र दिन) माना जाता हैं इसलिए शीतला माता की पूजा शनिवार, रविवार को नहीं की जाती हैं।
शीतला माता को शीतल आहार, खाद्य पदार्थ रुचिकर हैं। शीतला अष्टमी के दिन घर में आहार नहीं बनता है, एक दिन पहले सप्तमी रात को ही आहार बना लिया जाता हैं। अगले दिन यही ठंडा या बासी आहार (बसौड़ा) शीतला माता को नैवेद्य के रूप में समर्पित किया जाता हैं और सभी जन प्रसाद रूप में ठंडे आहार का सेवन करते हैं। शीतला अष्टमी पर माता शीतला को दही, राबड़ी, दाल, चावल, पूड़ी, मोहनभोग (हलवा), मीठे पुए आदि का भोग लगाया जाता है।
शीतला अष्टमी तक वातावरण में ठंडक बनी हुई होती हैं इसलिए कुछ घंटे पहले निर्मित आहार सेवनीय होता है। शीतला अष्टमी के पश्चात वातावरण में उष्णता (गर्मी) बढ़ने लगती है तथा ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता हैं, ग्रीष्म ऋतु में आहार तुरंत बासी हो जाता हैं इसलिए अब तुरंत पकाया हुआ आहार ही सेवनीय हैं।
शीतला माता
शीतला संस्कृत भाषा का शब्द हैं, इसका अर्थ हैं जो शीतलता या ठंडक दे। शीतला माता शिव पत्नी देवी पार्वती का अवतार या रूप हैं। यह स्वच्छता की देवी हैं। प्राचीनकाल से ही शीतला माता का बहुत अधिक माहात्म्य रहा है। स्कंद पुराण में शीतला देवी वाहन गर्दभ बताया है। ये हाथों में कलश, सूप, मार्जनी (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। इनका प्रतीकात्मक महत्व है। चेचक का रोगी व्यग्रता में वस्त्र उतार देता है। सूप से रोगी को वायु दी जाती है, झाडू से चेचक के फोड़े फट जाते हैं। नीम के पत्ते फोडों को सड़ने नहीं देते। रोगी को ठंडा जल प्रिय होता है अत: कलश का महत्व है। गर्दभ की लीद के लेपन से चेचक के चिन्ह मिट जाते हैं।
स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना का स्तोत्र शीतलाष्टक के रूप में प्राप्त होता है। इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने लोकहित में की थी। शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा गान करता है, साथ ही उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित भी करता है। शास्त्रों में भगवती शीतला की वंदना के लिए यह मंत्र बताया गया है:
वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।।
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।
हिंदी अर्थ - गर्दभ पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाडू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तकवाली भगवती शीतला की मैं वंदना करता हूं। शीतला माता के इस वंदना मंत्र से यह पूर्णत: स्पष्ट हो जाता है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में मार्जनी (झाडू) होने का अर्थ है कि हम जनसमूह को भी स्वच्छता के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश से तात्पर्य है कि स्वच्छता रहने पर ही स्वास्थ्य रूपी समृद्धि आती है।
शीतला माता ग्रीष्म ऋतु से उत्पन्न रोगों की रक्षक देवी है। प्रमुख रूप से चेचक रोग के साथ इनका नाम जोड़ा जाता हैं। देवी महात्यम के अनुसार ज्वारासुर नाम के असुर ने अवयस्कों (बच्चों) में ज्वर (बुखार) के रोगाणु फैला दिए, शीतला माता ने अवयस्कों (बच्चों) के रक्त को शुद्ध करके ज्वर रोगाणुओ को नष्ट किया। इस घटना से माँ शीतला ज्वर देवी के रूप में प्रसिद्ध हुई। कथा के अनुसार शीतला माता और ज्वारासुर में युद्ध होता है, युद्ध हारने के पश्चात ज्वारासुर माता की शरण में जाता है और शीतला माता ज्वारासुर को क्षमा करके ज्वर असुर से ज्वर देवता की उपाधि देती हैं। कई मंदिरों में माँ शीतला की मूर्ति के साथ सेवक रूप में ज्वर देवता की मूर्ति भी पाई जाती हैं। उत्तर भारत में शीतला माता लोकप्रिय हैं तथा दक्षिण भारत में देवी का अवतार मरियममन की पूजा होती है।
@HinduX
शीतला अष्टमी / बसौडा
शीतला अष्टमी पर्व देवी शीतला के सम्मान में मनाया जाता हैं। यह होली पर्व के आठ दिन पश्चात चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता हैं, किंतु कुछ स्थानों पर जनता इस पर्व को होली के पश्चात आने वाले पहले सोमवार या गुरूवार को मनाते हैं। शास्त्रों के अनुसार शनिवार, रविवार को आकरा वार (उग्र दिन) माना जाता हैं इसलिए शीतला माता की पूजा शनिवार, रविवार को नहीं की जाती हैं।
शीतला माता को शीतल आहार, खाद्य पदार्थ रुचिकर हैं। शीतला अष्टमी के दिन घर में आहार नहीं बनता है, एक दिन पहले सप्तमी रात को ही आहार बना लिया जाता हैं। अगले दिन यही ठंडा या बासी आहार (बसौड़ा) शीतला माता को नैवेद्य के रूप में समर्पित किया जाता हैं और सभी जन प्रसाद रूप में ठंडे आहार का सेवन करते हैं। शीतला अष्टमी पर माता शीतला को दही, राबड़ी, दाल, चावल, पूड़ी, मोहनभोग (हलवा), मीठे पुए आदि का भोग लगाया जाता है।
शीतला अष्टमी तक वातावरण में ठंडक बनी हुई होती हैं इसलिए कुछ घंटे पहले निर्मित आहार सेवनीय होता है। शीतला अष्टमी के पश्चात वातावरण में उष्णता (गर्मी) बढ़ने लगती है तथा ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता हैं, ग्रीष्म ऋतु में आहार तुरंत बासी हो जाता हैं इसलिए अब तुरंत पकाया हुआ आहार ही सेवनीय हैं।
शीतला माता
शीतला संस्कृत भाषा का शब्द हैं, इसका अर्थ हैं जो शीतलता या ठंडक दे। शीतला माता शिव पत्नी देवी पार्वती का अवतार या रूप हैं। यह स्वच्छता की देवी हैं। प्राचीनकाल से ही शीतला माता का बहुत अधिक माहात्म्य रहा है। स्कंद पुराण में शीतला देवी वाहन गर्दभ बताया है। ये हाथों में कलश, सूप, मार्जनी (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। इनका प्रतीकात्मक महत्व है। चेचक का रोगी व्यग्रता में वस्त्र उतार देता है। सूप से रोगी को वायु दी जाती है, झाडू से चेचक के फोड़े फट जाते हैं। नीम के पत्ते फोडों को सड़ने नहीं देते। रोगी को ठंडा जल प्रिय होता है अत: कलश का महत्व है। गर्दभ की लीद के लेपन से चेचक के चिन्ह मिट जाते हैं।
स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना का स्तोत्र शीतलाष्टक के रूप में प्राप्त होता है। इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने लोकहित में की थी। शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा गान करता है, साथ ही उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित भी करता है। शास्त्रों में भगवती शीतला की वंदना के लिए यह मंत्र बताया गया है:
वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।।
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।
हिंदी अर्थ - गर्दभ पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाडू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तकवाली भगवती शीतला की मैं वंदना करता हूं। शीतला माता के इस वंदना मंत्र से यह पूर्णत: स्पष्ट हो जाता है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में मार्जनी (झाडू) होने का अर्थ है कि हम जनसमूह को भी स्वच्छता के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश से तात्पर्य है कि स्वच्छता रहने पर ही स्वास्थ्य रूपी समृद्धि आती है।
शीतला माता ग्रीष्म ऋतु से उत्पन्न रोगों की रक्षक देवी है। प्रमुख रूप से चेचक रोग के साथ इनका नाम जोड़ा जाता हैं। देवी महात्यम के अनुसार ज्वारासुर नाम के असुर ने अवयस्कों (बच्चों) में ज्वर (बुखार) के रोगाणु फैला दिए, शीतला माता ने अवयस्कों (बच्चों) के रक्त को शुद्ध करके ज्वर रोगाणुओ को नष्ट किया। इस घटना से माँ शीतला ज्वर देवी के रूप में प्रसिद्ध हुई। कथा के अनुसार शीतला माता और ज्वारासुर में युद्ध होता है, युद्ध हारने के पश्चात ज्वारासुर माता की शरण में जाता है और शीतला माता ज्वारासुर को क्षमा करके ज्वर असुर से ज्वर देवता की उपाधि देती हैं। कई मंदिरों में माँ शीतला की मूर्ति के साथ सेवक रूप में ज्वर देवता की मूर्ति भी पाई जाती हैं। उत्तर भारत में शीतला माता लोकप्रिय हैं तथा दक्षिण भारत में देवी का अवतार मरियममन की पूजा होती है।
@HinduX
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#मुक्त_हिन्दू
एक हिन्दू है जिसने सारे वेद पुराण पढ़ रखे हैं... पढ़ रखे माने मान लीजिए कि एकदम कंठस्थ हैं. (Scriptural Hindu)
दूसरा एक हिन्दू है जो योग और ध्यान का अभ्यास करता है और उसको अनेक सिद्धियां प्राप्त हैं. सिद्धियाँ मतलब समझ लीजिए कि जमीन से तीन हाथ ऊपर ही समाधि लगाते हैं. (Spiritual Hindu)
तीसरे एक हिन्दू हैं जो बिल्कुल भक्ति में लीन हैं. मान लीजिए कि उनका स्वयं ईश्वर से साक्षात्कार होता हो.. सीधा हॉटलाइन पर ले रखा हो. (Devout Hindu)
चौथा एक हिन्दू हैं जो खूब पूजा पाठ, कर्मकाण्ड, दान पुण्य करते हैं... उन्होंने देश के सबसे भव्य मंदिर के शीर्ष पर ढाई मन सोने का कलश बैठा दिया हो और सत्तर धर्मशालाएं चलाते हों. (Ritualistic Hindu )
और उनके सामने एक मामूली सा गृहस्थ हिन्दू हो जो जीवन के विशिष्ट अवसरों पर ही ईश्वर को याद करता हो, जैसे विवाह, जन्म, मृत्यु, और पर्व त्योहारों पर और शेष समय अपना भौतिक जीवन सत्यनिष्ठा और नैतिकता से जीता हो. (Everyday Hindu)
इन पांचों में कौन सा एक हिन्दू दूसरे से श्रेष्ठ है जिसे दूसरे के मार्ग निर्धारण का अधिकार मिलना चाहिए? या सभी अपने अपने मार्ग पर अपनी स्वप्रेरणा से चलने के लिए स्वतंत्र होने चाहिए?
और इन सबके अलावा एक अन्य अकिंचन पथभ्रष्ट हिन्दू है धर्म के इन स्वरूपों के प्रति कोई विशेष श्रद्धा नहीं रखता. वेदों पुराणों में क्या लिखा है पर सर नहीं खपाता, ध्यान- ज्ञान के फेरे में नहीं पड़ा, पूजा-पाठ और भक्ति-भाव के प्रति निरपेक्ष हो, कर्मकांडों से कोई मतलब नहीं रखता और मंदिर जाकर कभी सर नहीं नवाता लेकिन अपनी हिन्दू आइडेंटिटी के प्रति सजग हो. वह सामाजिक रूप से सबसे प्रेमभाव और सहयोग करता हो, राजनीतिक रूप से हिन्दू समाज के हितों के प्रति सजग और सक्रिय हो, और अन्य सभी पांच कोटि के हिन्दुओं की हिन्दू जीवन पद्धति की रक्षा के लिए भौतिक और शारीरिक रूप से प्रतिबद्ध हो... यानि शुद्ध पॉलिटिकल सोशल हिन्दू.... क्या वह इन अन्य हिन्दुओं के मुकाबले एक निकृष्ट हिन्दू है?
आप इन छह कोटियों के किस कोटि के हिन्दू हैं, किसकी उपयोगिता सबसे अधिक देखते हैं और किसकी संख्या में वृद्धि को वर्तमान में सर्वाधिक वांछित मानते हैं?
@Hindu
एक हिन्दू है जिसने सारे वेद पुराण पढ़ रखे हैं... पढ़ रखे माने मान लीजिए कि एकदम कंठस्थ हैं. (Scriptural Hindu)
दूसरा एक हिन्दू है जो योग और ध्यान का अभ्यास करता है और उसको अनेक सिद्धियां प्राप्त हैं. सिद्धियाँ मतलब समझ लीजिए कि जमीन से तीन हाथ ऊपर ही समाधि लगाते हैं. (Spiritual Hindu)
तीसरे एक हिन्दू हैं जो बिल्कुल भक्ति में लीन हैं. मान लीजिए कि उनका स्वयं ईश्वर से साक्षात्कार होता हो.. सीधा हॉटलाइन पर ले रखा हो. (Devout Hindu)
चौथा एक हिन्दू हैं जो खूब पूजा पाठ, कर्मकाण्ड, दान पुण्य करते हैं... उन्होंने देश के सबसे भव्य मंदिर के शीर्ष पर ढाई मन सोने का कलश बैठा दिया हो और सत्तर धर्मशालाएं चलाते हों. (Ritualistic Hindu )
और उनके सामने एक मामूली सा गृहस्थ हिन्दू हो जो जीवन के विशिष्ट अवसरों पर ही ईश्वर को याद करता हो, जैसे विवाह, जन्म, मृत्यु, और पर्व त्योहारों पर और शेष समय अपना भौतिक जीवन सत्यनिष्ठा और नैतिकता से जीता हो. (Everyday Hindu)
इन पांचों में कौन सा एक हिन्दू दूसरे से श्रेष्ठ है जिसे दूसरे के मार्ग निर्धारण का अधिकार मिलना चाहिए? या सभी अपने अपने मार्ग पर अपनी स्वप्रेरणा से चलने के लिए स्वतंत्र होने चाहिए?
और इन सबके अलावा एक अन्य अकिंचन पथभ्रष्ट हिन्दू है धर्म के इन स्वरूपों के प्रति कोई विशेष श्रद्धा नहीं रखता. वेदों पुराणों में क्या लिखा है पर सर नहीं खपाता, ध्यान- ज्ञान के फेरे में नहीं पड़ा, पूजा-पाठ और भक्ति-भाव के प्रति निरपेक्ष हो, कर्मकांडों से कोई मतलब नहीं रखता और मंदिर जाकर कभी सर नहीं नवाता लेकिन अपनी हिन्दू आइडेंटिटी के प्रति सजग हो. वह सामाजिक रूप से सबसे प्रेमभाव और सहयोग करता हो, राजनीतिक रूप से हिन्दू समाज के हितों के प्रति सजग और सक्रिय हो, और अन्य सभी पांच कोटि के हिन्दुओं की हिन्दू जीवन पद्धति की रक्षा के लिए भौतिक और शारीरिक रूप से प्रतिबद्ध हो... यानि शुद्ध पॉलिटिकल सोशल हिन्दू.... क्या वह इन अन्य हिन्दुओं के मुकाबले एक निकृष्ट हिन्दू है?
आप इन छह कोटियों के किस कोटि के हिन्दू हैं, किसकी उपयोगिता सबसे अधिक देखते हैं और किसकी संख्या में वृद्धि को वर्तमान में सर्वाधिक वांछित मानते हैं?
@Hindu
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आपका आधार नम्बर क्या है?
आपसे जब आपकी पहचान पूछी जाती है तो आधार कार्ड नम्बर बताते हो, पर आपको अपने आधार का वास्तव में ज्ञान है? किसी शुभ संकल्प के दौरान पंडित जी जो मंत्र बोलते हैं उसके कुछ शब्दों का उल्लेख कर रहा हूँ। उल्लेख का प्रयोजन इतना बताना है कि आपका वास्तविक आधार कार्ड क्या है?
"जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे, आर्यवर्ते, श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे, अमुक पुण्य क्षेत्रे, अमुक संवत्सरे, उत्तरायणे अमुक ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे अमुक मासे अमुक पक्षे प्रतिपदायां तिथौ अमुक वासरे अमुक गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा, ..पूजन करिष्ये।"
इसमें कुछ शब्द इधर उधर हैं पर मूल भाव और कथ्य यही है।
यह केवल संकल्प मंत्र नहीं, यह हमारी आइडेंटिटी है। हमारी पहचान है। हमारा वास्तविक आधार कार्ड है। इस संकल्प मंत्र में इतिहास भूगोल समाजशास्त्र और मानवमात्र के प्रति मंगल कामना सब कुछ सम्मिलित है।
थोड़ा भौगोलिक स्थिति को जान लेते हैं। जम्बू द्वीप यूरोप और एशिया का मिला जुला खण्ड है, सनातन सभ्यता का विस्तार है। जम्बूद्वीप के साथ प्लाक्ष द्वीप और अन्य महाद्वीपों की बात कोरी गप नही है। महाभारत के भीष्म पर्व को पढ़ते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उस समय सम्पूर्ण पृथ्वी के आकार को ऋषियों ने जान लिया था, संजय, धृतराष्ट्र से कहते हैं (भीष्म पर्व, महाभारत 6/5/17) सुदर्शन नामक यह द्वीप अर्थात् पृथ्वी एक चक्र की भांति गोलाकार स्थित है और जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखाई देता है। इसके दो अंशों (भागों) में पिप्पल और दो अंशों में विशाल शश (खरगोश) दिखाई देता है। महाद्वीप के बाद भारत वर्ष, फिर आर्यावर्त फिर प्रान्त, जनपद, क्षेत्र, गांव इत्यादि का ज्ञान, समय देशांतर संवत्सर का उल्लेख यह बताता है कि संकल्प बीज का महावृक्ष कितना अद्भुत है।
सवाल यह उठता है कि वह सब ज्ञान, स्वाभिमान, समृद्धि का क्या हुआ? इसका उत्तर है कि हमने अपनी कद्र ही नही की, अपने ज्ञान को कर्मकांड मात्र तक सीमित कर लिया, ज्ञान के केंद्र मंदिरों को डेढ़ हाथ का बनाकर घर मे स्थापित कर लिया, आचार्य गणों को लालची, दरिद्र, कहकर उपहास किया, ब्रह्म ज्ञान को झूठे व्यापारिक ज्ञान में तथाकथित पुरोहितों ने बदल दिया। हमने अपनी व्यस्वथा छोड़ दी, अपनी शिक्षा पद्धति, चिकित्सा पद्धति, उपासना पद्धति सब छोड़ रहे तो ऐसे में आपका अपना क्या रहा?
अपनी पहचान के प्रति सचेत होइए, अपने ज्ञान के प्रति सचेत होइए, जम्बू द्वीप चला गया, भारत वर्ष विभाजित हो गया, आर्यावर्त की कोई पहचान बची नही। इतने के बावजूद यदि आप चेते नही तो आपको अपनी नष्ट होती संस्कृति पर रोने कलपने का कोई अधिकार नही। इस बात को पहले भी मैंने आपके समक्ष रखा था, पुनः रख रहा हूँ क्योंकि आपका ज्ञान न केवल आपके लिए कल्याणकारी है वरन सम्पूर्ण मानवता इससे पुष्ट होगी। यही वह भाव है, वह पाथेय है हब हम कहते हैं विश्व का कल्याण हो प्राणियों में सद्भावना हो।
अस्तु
@Hindu
आपसे जब आपकी पहचान पूछी जाती है तो आधार कार्ड नम्बर बताते हो, पर आपको अपने आधार का वास्तव में ज्ञान है? किसी शुभ संकल्प के दौरान पंडित जी जो मंत्र बोलते हैं उसके कुछ शब्दों का उल्लेख कर रहा हूँ। उल्लेख का प्रयोजन इतना बताना है कि आपका वास्तविक आधार कार्ड क्या है?
"जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे, आर्यवर्ते, श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे, अमुक पुण्य क्षेत्रे, अमुक संवत्सरे, उत्तरायणे अमुक ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे अमुक मासे अमुक पक्षे प्रतिपदायां तिथौ अमुक वासरे अमुक गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा, ..पूजन करिष्ये।"
इसमें कुछ शब्द इधर उधर हैं पर मूल भाव और कथ्य यही है।
यह केवल संकल्प मंत्र नहीं, यह हमारी आइडेंटिटी है। हमारी पहचान है। हमारा वास्तविक आधार कार्ड है। इस संकल्प मंत्र में इतिहास भूगोल समाजशास्त्र और मानवमात्र के प्रति मंगल कामना सब कुछ सम्मिलित है।
थोड़ा भौगोलिक स्थिति को जान लेते हैं। जम्बू द्वीप यूरोप और एशिया का मिला जुला खण्ड है, सनातन सभ्यता का विस्तार है। जम्बूद्वीप के साथ प्लाक्ष द्वीप और अन्य महाद्वीपों की बात कोरी गप नही है। महाभारत के भीष्म पर्व को पढ़ते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उस समय सम्पूर्ण पृथ्वी के आकार को ऋषियों ने जान लिया था, संजय, धृतराष्ट्र से कहते हैं (भीष्म पर्व, महाभारत 6/5/17) सुदर्शन नामक यह द्वीप अर्थात् पृथ्वी एक चक्र की भांति गोलाकार स्थित है और जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखाई देता है। इसके दो अंशों (भागों) में पिप्पल और दो अंशों में विशाल शश (खरगोश) दिखाई देता है। महाद्वीप के बाद भारत वर्ष, फिर आर्यावर्त फिर प्रान्त, जनपद, क्षेत्र, गांव इत्यादि का ज्ञान, समय देशांतर संवत्सर का उल्लेख यह बताता है कि संकल्प बीज का महावृक्ष कितना अद्भुत है।
सवाल यह उठता है कि वह सब ज्ञान, स्वाभिमान, समृद्धि का क्या हुआ? इसका उत्तर है कि हमने अपनी कद्र ही नही की, अपने ज्ञान को कर्मकांड मात्र तक सीमित कर लिया, ज्ञान के केंद्र मंदिरों को डेढ़ हाथ का बनाकर घर मे स्थापित कर लिया, आचार्य गणों को लालची, दरिद्र, कहकर उपहास किया, ब्रह्म ज्ञान को झूठे व्यापारिक ज्ञान में तथाकथित पुरोहितों ने बदल दिया। हमने अपनी व्यस्वथा छोड़ दी, अपनी शिक्षा पद्धति, चिकित्सा पद्धति, उपासना पद्धति सब छोड़ रहे तो ऐसे में आपका अपना क्या रहा?
अपनी पहचान के प्रति सचेत होइए, अपने ज्ञान के प्रति सचेत होइए, जम्बू द्वीप चला गया, भारत वर्ष विभाजित हो गया, आर्यावर्त की कोई पहचान बची नही। इतने के बावजूद यदि आप चेते नही तो आपको अपनी नष्ट होती संस्कृति पर रोने कलपने का कोई अधिकार नही। इस बात को पहले भी मैंने आपके समक्ष रखा था, पुनः रख रहा हूँ क्योंकि आपका ज्ञान न केवल आपके लिए कल्याणकारी है वरन सम्पूर्ण मानवता इससे पुष्ट होगी। यही वह भाव है, वह पाथेय है हब हम कहते हैं विश्व का कल्याण हो प्राणियों में सद्भावना हो।
अस्तु
@Hindu
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वार्षिक हिंदू कैलेंडर.pdf
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अवनी से अंबर तक छाया नववर्ष।
सिन्दूरी भोर लिए आया नववर्ष।।
तैरते हवाओं में पंछी रंगीन।
ले आए प्राची से उजियारे दिन।।
झरनों ने भैरवी में गाया नववर्ष।
सिन्दूरी भोर लिए आया नववर्ष।।
मधु किरणें पूरब से आई छुम-छुम।
घोल गई रेवा के जल में कुमकुम।।
सुखद रात सुप्रभात लाया नववर्ष।
सिन्दूरी भोर लिए आया नववर्ष।।
शाखों पर फूल नए चमकीली पातें।
बांट रहा स्नेहिल सूरज सौगातें।।
अलसायी धूप खिली भाया नववर्ष।
सिन्दूरी भोर लिए आया नववर्ष।।
आपको और आपके परिवार को नवसंवत्सर की बहुत बहुत हार्दिक शुभेच्छा।।
@Hindu
सिन्दूरी भोर लिए आया नववर्ष।।
तैरते हवाओं में पंछी रंगीन।
ले आए प्राची से उजियारे दिन।।
झरनों ने भैरवी में गाया नववर्ष।
सिन्दूरी भोर लिए आया नववर्ष।।
मधु किरणें पूरब से आई छुम-छुम।
घोल गई रेवा के जल में कुमकुम।।
सुखद रात सुप्रभात लाया नववर्ष।
सिन्दूरी भोर लिए आया नववर्ष।।
शाखों पर फूल नए चमकीली पातें।
बांट रहा स्नेहिल सूरज सौगातें।।
अलसायी धूप खिली भाया नववर्ष।
सिन्दूरी भोर लिए आया नववर्ष।।
आपको और आपके परिवार को नवसंवत्सर की बहुत बहुत हार्दिक शुभेच्छा।।
@Hindu
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श्री सदाशिव ध्यानम्
ॐ डिं डिं डिंकत डिम्ब डिम्ब डमरु, पाणी सदा यस्य वै फुं फुं फुंकत सर्पजाल हृदयं, धं धं च घण्टा रवम् ॥ वं वं वंकत वम्ब वम्ब वहनं, कारुण्य पुण्यात् परम् ॥ भं भं भकत भम्ब भम्ब नयनं, ध्यायेत् शिवं शंकरम् ॥ यावत् तोय धरा धरा धर धरा, धारा धरा भूधरा ।। यावत् चारू सुचारू चारू चमरं, चामीकरं चामरं । यावत् रावण राम राम रमणं, रामायणे श्रूयताम् । तावत् भोग विभोग भोगमतुलम् यो गायते नित्यसः ॥ यस्याग्रे द्वाट द्वाट गुट गुट ममलं टंट टंट टटटम् । तैलं तैलं तु तैलं खुखु खुखु खुखुमं, खंख खंख सखखम् ॥ डंस डंस डुडंस डुहि चकितं, भूपकं भूय नालम् ।। ध्यायस्ते विप्रगाहे सवसति सवलः पातु वः चंद्रचूडः ॥ गात्रं भस्मसितं सितं च हसितं हस्ते कपालं सितम् ।। खट्वांग च सितं सितश्च भृषभः, कर्णेसिते कुण्डले ।। गंगाफनेसिता जटापशुपतेश्चनद्रः सितो मुर्धनी ॥ सोऽयं सर्वसितो ददातु विभवं, पापक्षयं सर्वदा ॥
@HinduX
@Hindu
ॐ डिं डिं डिंकत डिम्ब डिम्ब डमरु, पाणी सदा यस्य वै फुं फुं फुंकत सर्पजाल हृदयं, धं धं च घण्टा रवम् ॥ वं वं वंकत वम्ब वम्ब वहनं, कारुण्य पुण्यात् परम् ॥ भं भं भकत भम्ब भम्ब नयनं, ध्यायेत् शिवं शंकरम् ॥ यावत् तोय धरा धरा धर धरा, धारा धरा भूधरा ।। यावत् चारू सुचारू चारू चमरं, चामीकरं चामरं । यावत् रावण राम राम रमणं, रामायणे श्रूयताम् । तावत् भोग विभोग भोगमतुलम् यो गायते नित्यसः ॥ यस्याग्रे द्वाट द्वाट गुट गुट ममलं टंट टंट टटटम् । तैलं तैलं तु तैलं खुखु खुखु खुखुमं, खंख खंख सखखम् ॥ डंस डंस डुडंस डुहि चकितं, भूपकं भूय नालम् ।। ध्यायस्ते विप्रगाहे सवसति सवलः पातु वः चंद्रचूडः ॥ गात्रं भस्मसितं सितं च हसितं हस्ते कपालं सितम् ।। खट्वांग च सितं सितश्च भृषभः, कर्णेसिते कुण्डले ।। गंगाफनेसिता जटापशुपतेश्चनद्रः सितो मुर्धनी ॥ सोऽयं सर्वसितो ददातु विभवं, पापक्षयं सर्वदा ॥
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Remember your roots, start with remembering your daily mantras.
अन्नं ब्रह्मा रसं विष्णु भोक्ता देवो जनार्दनम् ।एवं ध्यात्वा तथा ज्ञात्वा अन्न दोषो न लिप्यते।
---
(The above mantra is for speaking for yourself, the mantra you will google is for understanding (that is for 3rd person in Sanskrit grammar). So, 2 mantras, don't recite wrong mantra.)
@Hindu
अन्नं ब्रह्मा रसं विष्णु भोक्ता देवो जनार्दनम् ।एवं ध्यात्वा तथा ज्ञात्वा अन्न दोषो न लिप्यते।
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(The above mantra is for speaking for yourself, the mantra you will google is for understanding (that is for 3rd person in Sanskrit grammar). So, 2 mantras, don't recite wrong mantra.)
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