अमित आर्यावर्त (भारत योगी)
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वैदिक धर्म का प्रचार ही हमारा मकसद होना चाहिए वैदिक धर्म बचेगा तभी देश बचेगा

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वेद हो या उपनिषद या योगदर्शन सभी स्थानों पर ओ३म् महिमा ही बताई गई है, फिर इस ईश्वर के मुख्य नाम को क्यों त्यागा हुआ है

ईश्वर, आत्मा, प्रकृति
ईश्वर चेतन आत्मा चेतन किंतु प्रकृति जड़

तभी उपनिषदों में या योगियों के वचनों में यही बताया गया है कि यम नियम का पालन करते हुए धारणा ह्रदय प्रदेश (दोनों फेफड़ों के नीचे की तरफ बीच में जो गड्ढा है) में लगाकर ओ३म् का जाप करना चाहिए

जब धारणा सही बन जाती है तो सांस भिन प्रकार से चलती है , यानी खुद ही प्राणायाम होने लगता है, तभी तो 1 घंटा ध्यान करने के बाद शरीर ऊर्जावान लगता है,

अनिद्रा, तनाव, अतिक्रोध, आदि आदि समस्याएं दूर होती जाती हैं

ओर ध्यान करने वाला अपने पूर्वजों को अपमानित करने से भी बचता है जानते हो कैसे?

मैंने सड़क किनारे कई भगवानों के चित्र पड़े देखें है, उनके साथ क्या क्या होता है मैं क्या ही लिखूं

आप कभी अपने दादा अपने बाप के चित्र को कूडे में नहीं फेंकते किंतु जिन्हें आप ईश्वर मानकर पूजते हो बादमें उन्हें कूड़े में फेंक देते ही या नदियों में डाल कर नदियों को प्रदूषित करते हो

केवल ईश्वर का ध्यान ही उन्नति का मार्ग है बाकी सब पतन का मार्ग है

जो भाई भूत प्रेत को मानते हैं , जब आप ध्यान करेंगे तो भूत प्रेत की समस्या आपको नहीं होगी क्योंकि दिमाग आपका ठीक रहेगा और साथ ही सांसों का महत्व भी समझ आने लगेगा (सांसों का महत्व यानी स्वर विज्ञान)

आप कभी भी देखलेना जो लोग वास्तव में ध्यान करने वाले होते हैं वो कभी डिप्रेशन तनाव जो भी आप बोलते हो इन सब का शिकार नहीं होता ध्यानी व्यक्ति जबकि इसकी तुलना में जड़ को पूजने वाला डिप्रेशन की दवाएं खाता है

इस लेख का मकसद घृणा नहीं है केवल थोड़ा सा जगाना मात्र है, बाकी तो जिसका जैसा विवेक होगा करेगा ही
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आधुनिक काल के माहान क्रन्तिकारी श्री राजीव दीक्षित भाई के व्याख्यान में से
राजीव दीक्षित जी ने नेहरु चिंदम्बरम मनमोहन आदि सबको अच्छे से एक्सपोज किया था

मनमोहन सिंह जब पहली बार प्रधानमन्त्री बने तो ऑक्सफ़ोर्ड गए वहां पर एक सम्मान समारोह हुआ मनमोहन सिंह का
समारोह में मनमोहन ने 40 मिनट का भाषण दिया

उसमे उन्होंने बोला की भारत हजारों साल से गरीब देश है ये तो अंग्रेज थे जो भारत आए और भारत को सभ्य बनाया हम अंग्रेजो के बहुत आभारी हैं
जिन्होंने आकर भारत को तकनिकी सिखाई हम अंग्रेजो के बहोत आभारी हैं जिन्होंने भारत मे विज्ञानं लाया , हम अंग्रेजो के बहुत आभारी हैं जिन्होंने भारत में उद्योग लाए , 40 मिनट तक वो यही सब बोलते रहे

अगले दिन ये भाषण इंग्लेंड के अखबारों में छपा तो कई अखबारों ने हेडिंग लगाया

"लगता है भारत अभी भी अंग्रेजो की गुलामी में ही है क्योकि भारत का प्रधानमन्त्री जो गान गा रहा है यहाँ आकर वो एक सवतंत्र देश के स्वाभिमानी प्रधानमन्त्री का गान नहीं हो सकता ये तो गुलाम देश के
गुलाम प्रधानमन्त्री का गाना है "

ये व्याख्यान राजिव भाई की वीडयो में मिल जाएगा , और मनमोहन के उस भाषण की वीडयो सालो पहले मेने देखि थी शायद इंटरनेट पर खोजने से अब भी मिल जाए

अब एक जानकारी और

जब मनमोहन प्रधानमन्त्री बने तो इन्होने भारतीयों के टैक्स के पैसे से पकिस्तान के अपने गाँव में सड़क बनवाई लाईट लगवाई और भी बहुत कुछ किया एक पकिसतनी चेनल पर ये सब बताया जारहा था मेने इसकी वीडयो देखि है

🚩जय हो निर्भीक क्रांतिकारी श्री राजीव दीक्षित जी की🚩
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महत्वपूर्ण जानकारी एक नई आईडी बनाई जा रही है apaar id , ध्यान दें ये स्वैच्छिक है यदि आप नहीं बनवाना चाहते तो कोई स्कूल आप पर दबाव नहीं डाल सकता

ये नम्बर सरकार की वेबसाइट से यहां दे रहा हूं आप खुद बात कर सकते हो, कोई स्कूल आप पर दबाव बनाए तो यहां फोन करके स्कूल वालो की बात करवा सकते हो,

apaar हेल्पलाइन फोन नंबर ये है
👉 18008893511

ओर नीचे rti का चित्र भी है तो डरने का नहीं किसी से
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बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना? नहीं बेगानी शादी में हिंदू दीवाना ? वास्तव में कहावत तो अधिकतर हिंदुओ पर सही बैठती है

1 जनवरी खतना दिवस पर पागल होने वालो
ईसा के जन्म की हमे क्यों खुशी मनानी चाहिए? ईसाईकरण कितनी बड़ी समस्या है क्या तुम नहीं जानते?

अंग्रेजो ने अप्रैल में नया साल मनाने वालो को मूर्ख घोषित करने के लिए 1 अप्रैल को मूर्खता दिवस घोषित किया, जबकि मार्च अप्रैल में प्रकृति में सब नया होने लगता है पतझड़ से हरियाली छाने लगती है

जबकि 1 जनवरी पर पतझड़ का मौसम बना रहता है ठंड बनी रहती है प्रकृति में कोई बदलाव यानी नयापन देखने को नहीं मिलता, वास्तव में 1 जनवरी ही मूर्खता दिवस है

क्या ईसाई बहुल देश भगवान राम कृष्ण के जनम की खुशियां मनाते हैं? जो भारत के अधिकतर हिंदू 25 दिसम्बर हो या 1 जनवरी खुशी के मारे बावला हुआ जाता है?

सोशल मीडिया पर देश भक्ति की बाते करने वाले भी 1 जनवरी खतना दिवस को पागल हुए जाते हैं
बाते करते हैं ये सनातन धर्म की किंतु अपने बालकों के जन्मदिवस पर सनातन का मुख्य कर्तव्य हवन नहीं करते, अपने त्योहारों पर हवन नहीं करते , अपनी प्राचीन परम्पराओं का त्यागने वाला अधिकतर हिंदू समाज क्या हिंदू राष्ट्र बना पाएगा ?

भारत का ईसाईकरण सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है, ईसाई मिशनरियां हिंदुओ को ईसाई बनाकर भारत के नए गद्दारों को जनम दे रही हैं,

हिंदुओ ने अपने विनाश से भी कुछ नहीं सिखा देखो मणिपुर में दो मुख्य विचार धाराएं हैं एक जो सनातन धर्म को मानते हैं दूसरे जो पहले हिंदू थे अब ईसाई मत को मानते हैं , जब सनातन धर्म से विपरीत दूसरी विचारधाराएं ज्यादा होगी तो आपको लूटपाट हत्याएं देश के टुकड़े मारकाट विनाश होते नजर आएंगे

वास्तविकता यही है कि ये बाते ज्यादातर हिंदू सोचता नहीं है , कथनी और करनी में अंतर है , घमंड तो पूरा है किंतु स्वाभिमान जरा सा भी नहीं बचा
अमित आर्य
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*सनसनीखेज खुलासा!!*

*टी वी पर चर्चारत इन दोनों का न तो कांग्रेस* से ना ही *BJP* से कुछ लेना देना है। *इस वीडियो में आप को बेहद डरावनी जानकारी मिलेगी। बोले गए एक-एक शब्द को सुन कर सभी भारतीयों को यह एहसास होगा कि हमारा देश कितने बड़े संकट से बाहर आ गया है।*
कृपया इसे एक बार सुनें और समझने का प्रयास करें...!! 15 मिनट का वीडियो है, जरूर देखें जिस सच्चाई से अभी तक आप और हम अनभिज्ञ थे, निवेदन है एक बार जरूर देखे
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समाज सुधार का कार्य बड़ा ही कठिन कार्य है

ऋषि दयानंद जी की जीवनी पढ़ रहा हूं तो मालूम चल रहा है कि कितना कठिन जीवन था ऋषि का कितनी करुणा थी ऋषि में,

ऋषि दयानंद हमेशा धर्म के मार्ग पर ही चले समाज की सभी कुरीतियों का विरोध किया कन्याओं को भी समान अधिकार दिलवाए जातपात को खत्म करने का प्रयास किया

ऋषि पर कोई पत्थर फेंकता कोई विष देता कोई तलवार लेकर मारने आता कोई अपशब्द बोलता , किंतु इन अखंड ब्रह्मचारी के सामने आते ही सभी परास्त हो जाते

यदि पौराणिक समाज ने ऋषि दयानंद जी की मानी होती तो आज जातिवाद भारत से समाप्त हुए 100 वर्ष से भी ज्यादा का समय हो जाता , ना तो भारत के टुकड़े होते ओर ना ही नेहरू प्रधानमंत्री होता , ओर ना ही आंबेडकर अपना मत बदल कर राष्ट्र को कमजोर करते ओर ना ही गांधी किसी को ब्लैकमेल कर पाता

क्योंकि जब देश का बहुसंख्यक समाज कमजोर होगा पाखंड में डूबा होगा अनेकता में एकता जैसे झूठी बातों को मानेगा, अपने बच्चों को गर्भ काल से ही धर्म की शिक्षा नहीं देगा, तब तक देश विरोधी ताकते हावी होंगी ही

मुझे तो केवल एक ही मार्ग दिखता है सभी आर्यसमाजी विद्वान एक मत होकर अपनी एक राजनीतिक पार्टी बनाएं तो हम भारत को बचा सकते हैं

किंतु ऐसा होगा ये केवल कल्पना मात्र ही है, पता नहीं मैं सही हूं या गलत किंतु मुझे लगता है कि आजका आर्यसमाज ऋषि वाला आर्यसमाज नहीं रहा

🙏ओ३म्🙏
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स्वामी जी के लिए धर्म प्रचार का कार्य करना कितना कठिन था, किंतु एक समाधिस्थ योगी ईश्वर से बल साहस प्राप्त करता है और अपने कार्यों को पूरा करता ही है

शाहबाजपुर में स्वामी जी की हत्या करने की विफल चेष्टा-

वहां हमने यह भी सुना था कि गंगा नदी के पार से दो वैरागी स्वामी जी को मारने के लिए आये थे और शाहबाजपुर के एक ठाकुर को एक वैरागी ने अपना मित्र समझ कर कहा कि तुम अपनी तलवार हमें दो,
हम इस गप्पाष्टक को मार देंगे।

उस ठाकुर ने कहा कि उनकी तो मैंने कई दिन वार्ता यहीं सुनी है, वह बड़े महात्मा हैं। दुष्टो ! यदि फिर यह बात मुख से निकाली तो तुमको मार डालूंगा, जाओ मेरे सामने से दूर हो जाओ !

फिर वह ठाकुर दो-चार सशस्त्र मनुष्यों के साथ स्वामी जी के पास आया और कहा कि महाराज ! आपके मारने की यह दुष्ट लोग सम्मति कर रहे थे, मैं उनको धमका कर यहां आया हूं। स्वामी जी ने कहा कि उनकी क्या सामर्थ्य है कि हमको मारें ! परन्तु वह ठाकुर न माना और रात भर पहरा देता रहा जिस पर वह दुष्ट किसी प्रकार का कोई आक्रमण न कर सके ।

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कौन-सा अन्न भ्रष्ट होता है? -

एकबार सुखवासीलाल साध कढ़ी और भात स्वामी जी के लिए ले आया।

स्वामी जी ने उसे खाया। यहां के ब्राह्मणों ने कहा कि तुम भ्रष्ट हो गये, साध की खा ली। स्वामी जी ने कहा कि रोटी दो प्रकार से भ्रष्ट होती है, एक तो दुःख देकर प्राप्त किया हुआ धन उससे जो अन्न लावे वह भ्रष्ट है दूसरे कोई मलिन वस्तु उस पर या उसमें पड़ी हो तब भी भ्रष्ट है। जिस पर सब मौन हो गये ।

इस घटना से ओर एसी ही ओर भी घटनाएं हैं जिनसे हमें ज्ञात होता है कि स्वामी जी ने कभी भी मनुष्य मनुष्य में भेद नहीं किया वे जात पात को नहीं मानते थे, ओर सभी को मिल जुलकर प्रेम से रहने का संदेश देते थे
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जैसा कि मैने आप सभी को बताया थी मैं एक एनीमेटिड चैनल बना रहा हूं, आज वो चैनल बना दिया है और पहली वीडियो आज डाली है , आप सभी इस वीडियो को देखें और सभी के साथ साझा करें और इस चेनल को सब्सक्राइब करें और करवाएं

यह कहानी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल जी से जुड़ी है। इसमें बिस्मिल जी के बलिदान, और उनके परिवार की पीड़ा को उजागर किया गया है। विशेष रूप से बिस्मिल की मां के संघर्ष और कष्टों का विवरण दिया गया है, जिन्होंने अपने बेटे के बलिदान और परिवार की दुरावस्था के बावजूद साहस और धैर्य दिखाया।

मां के पास किसी प्रकार की सहायता नहीं थी, और उनके ऊपर समाज ने तमाम आरोप लगाए। बिस्मिल की मां, जो अपने बेटे के बलिदान के बाद अकेली और गरीब हो गईं, मां ने अपनी ज़िंदगी की दुखभरी यादों और संघर्षों को साझा किया। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि स्वतंत्रता संग्राम के नायक केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार और समाज के लिए भी बलिदान देते हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=LfvN2-ECkNM

🙏नमस्ते जी🙏
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चर्चा अपने क़त्ल का अब दुश्मनों के दिल में है देखना है ये तमाशा कौन सी मंजिल में है

ब्रह्मचारी रामप्रसाद बिस्मिल जी
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आर्य पुत्र महाराज हेमू जिन्हें हेमचंद्र विक्रमादित्य के नाम से भी जाना जाता है, इन्हें आखिरी हिंदू सम्राट भी कहा जाता है,

ये जन्म से क्षत्रिय नहीं थे , किंतु जब भारत भूमि पर इस्लामिक अत्याचार देखे तो इन्होंने क्षत्रिय वर्ण धारण किया और एक समय ऐसा आया जब अत्याचारी इस्लामिक आक्रांत इनके नाम से भी कांपने लगे और महाराज हेमू ने आर्य पुत्र सम्राट महाराज विक्रमादित्य की उपाधि धारण की, इसी से हम समझ सकते हैं कि ये कितने गजब के इंसान रहे होंगे

समय समय पर मां भारती की भूमि पर विशेष आत्माएं जन्म लेती रहती हैं

यदि आखिरी युद्ध में वो तीर आंख पर ना लगता तो भारत का इतिहास ओर आज का वर्तमान कुछ ओर ही होता

आपको इनके बारे में जरूर पढ़ना चाहिए बाकी मैं अपने नए चेनल पर इनके विषय में विस्तार से वीडियो डालूंगा ही
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*नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और आर्यसमाज लाहौर*

आज विश्व में भारतीयों के द्वारा अंग्रेजी कलैंडर के अनुसार सुभाष चंद्र बोस जी की जयंती मनाई जा रही है, चलिए आज आपको एक इतिहास की अमर घटना सुनाता हूं

''सुना है आप देश से बाहर जाकर सेना बना रहे हैं?''

लाहौर आर्य समाज के एक सम्मेलन में महाशय कृष्ण जी ने सुभाष बाबू से पूछा, जो प्रताप अखबार के संस्थापक थे।

''जी।'' नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उत्तर दिया।

''आर्य समाज इसके लिए आपको दस हजार रुपए की थैली तत्काल भेंट करता है।''

''धन्यवाद।''

''धन्यवाद किस बात का नेताजी,'' महाशय कृष्ण जी जो उस समय गुरुकुल कांगड़ी के कुलपति के पद पर भी आसीन थे उन्होंने आगे कहा, ''जब भी आप आह्वान करेंगे, गुरुकुल कांगडी के सभी ब्रह्मचारी आपकी सेना में भर्ती होने के लिए पहुंचे जाएंगे।''

''आर्य समाज तो मेरी मां है, जिसने मुझे पैदा किया,'' सुभाष आगे बोले, ''और आजादी की जंग में जो भी भाग ले रहा है उसका किसी न किसी रूप में आर्य समाज से संबंध अवश्य है, भले ही वह किसी भी मत पंथ से संबंध रखता हो, परंतु दयानंद जी के स्वदेशी के आह्वान का उस पर प्रभाव है ही। क्योंकि स्वामी जी ने ही सबसे पहले कहा था कि स्वेदशी राज्य ही सर्वोपरि उत्तर होता है।''
..........
घटना एवं चित्र के लिए देखें
पुस्तक : जीवन संघर्ष, प्रकाशक राजपाल एंड संस, लाहौर
*चित्र : आर्य समाज के सम्मेलन के दौरान नेताजी सुभाष, महाशय कृश्न एवं अन्य आर्य नेता।*

🚩जय हो सभी क्रांतिकारियों की🚩
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दिल्ली में इंग्लैंड के अंग्रेजो ने किया था नरसंहार हिंदू और मुसलमानों को चुन चुन कर क्रूरता से मारा था साल 1857

सिक्खों और गोरों ने अपनी संगीनों से मनुष्यों के चेहरों को बार-बार बिंधा और अधमरे करके अग्नि में जला कर सता-सता कर मारा। कुछ मुसलमानों को तांबे की शलाकों से नंगे शरीर को सिर से पांव तक जलाकर तड़फा-तड़फा कर समाप्त किया।

रसल लिखता है, "मुसलमानों को मारने से पहले उन्हें सूअर की खाल में सी दिया जाता था. उन पर सूअर की चर्बी मल दी जाती थी और फिर उनके शरीर जला दिए जाते थे। हिन्दुओं को गोमांस खिलाकर धर्मभ्रष्ट किया जाता था। इस प्रकार सारी दिल्ली मनुष्यों का बूचड़खाना बन गई। सारा नगर उजड़ गया। जो कोई फांसी और कत्ल से बचा उसे बल पूर्वक नगर से निकाल दिया गया।

होम्स लिखता है- "दिल्लो के निवासियों को विप्लव के बदले वड़ा भारी प्रायश्चित करना पड़ा। दस सहस्र स्त्री पुरुष और बालक विना घर के इधर उधर के प्रान्त में घूम रहे थे, जिन्होंने कोई अपराध नहीं किया था अपना जो धन वैभव था उसे वे नगर में अपने घरों में छोड़ गये थे। उससे वे सदा के लिए हाथ धो चुके थे, क्योंकि सैनिकों ने गली-गली और घर-घर जाकर प्रत्येक मूल्यवान् वस्तु को खोजकर निकाल लिया था और जो सामान वे उठाकर नहीं ले जा सके उसे उन्होंने नष्ट कर डाला।"

अंग्रेजों ने दिल्ली पर जो अत्याचार किये उनके विषय में लार्ड एल्फिन्सटन ने सर जॉन लारेन्स को लिखा- "मोहासरों के समाप्त होने के पश्चात् हमारी सेना ने जो अत्याचार किए हैं उन्हें सुनकर हृदय फटने लगता है।

बिना मित्र व शत्रु में भेद किए ये लोग सबसे एक समान बदला ले रहे हैं। लुट में तो वास्तव में हम नादिरशाह से भी बढ़ गए।" मोहासरे के दिनों में किले के छत्ते में रोगी और घायल सैनिकों का एक हस्पताल था। जिस समय कम्पनी की सेना किले में घुसी तब हस्पताल में जितने घायल रोगी थे सब गोली से मारकर समाप्त कर दिये गये।

अन्यत्र भी जो रोगी और घायल मिले कत्ल कर दिए गए। मटगुमरी माटिन लिखता है- "जिस समय हमारी सेना ने दिल्ली प्रवेश किया तो जितने नगर निवासी नगर की दीवारों के अन्दर पाये गये उन्हें उसी स्थान पर संगीनों से मार डाला गया। आप समझ सकते हैं उनकी संख्या कितनी अधिक रही होगी। जब में आपको यह बताऊँ कि एक मकान में चालीस और पचास-पचास तक आदमी छिपे हुए थे। ये लोग विद्रोही न थे किन्तु नगर के निवासी थे, जिन्हें हमारी दयालुता और क्षमाशीलता पर विश्वास था। मुझे हर्ष है कि उनका भ्रम दूर हो गया।"

स्रोत– पुस्तक बलिदान (लेखक स्वतंत्रता-संग्राम-सेनानी स्वामी ओमानंद सरस्वती जी)

मित्रो हमारा दुर्भाग्य देखिए आज भी हमारे देश को उन नीच इंग्लैंड वासियों के दिए नाम इंडिया से ही जाना जाता है, हमारा अपना नाम भारत और आर्यावर्त विलुप्त हो चुका है,

हमारे पूर्वजों ने बहुत कष्ट सहे कम से कम उनके सम्मान में हम इतना तो कर ही सकते हैं ये इंडिया नाम की गाली अपनी जन्मभूमि का ना दें 🙏⚔️
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प्रतिदिन समाधि लगाते थे

प्रातःकालीन दिनचर्या तथा समाधि-स्वामी जी रात्रि को प्रतिदिन दो बजे उठते और सी० बोल्ड नामक एक अंग्रेज के कार्यालय के आगे से होकर नीचे गंगा के कच्चे घाट पर सोइया तालाब के सामने जाया करते और वहां से शौच और स्नान कर मिट्टी लगाकर चले आते।

तीन बजे के लगभग आकर समाधि लगा, ईश्वर के ध्यान में बैठ जाते। फिर, उस समय, किसी के (वहां) आने-जाने का ध्यान तक नहीं था। एक दिन हम बहुत सवेरे गये परन्तु वह उस समय भी समाधि में थे। हम मौन हो कर बैठ गये। जब सूर्य निकला तब उठकर टहलने लगे और हमको देखकर पूछा कि तुम कब आये थे। हमने सब वृत्तांत कहा।

इस प्रकार एक दिन की बात है कि स्वामी जी रात के दो बजे के लगभग गंगा की ओर जा रहे थे। सी० बोल्ड साहब के सिपाही ने देखा और चकित हो गया कि ऐसे लम्बे शरीर वाले कौन हैं; भयभीत हो गया। साहब को जाकर सूचना दी, साहब लालटेन लेकर आये और देखा कि स्वामी जी हैं। तब सन्तरी से कह दिया कि यह जिस समय आवें आने दिया करो ताकि गंगा को चले जाया करें, कोई रोक-टोक न करे ।'

स्त्रोत– पंडित लेखराम कृत महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवन चरित्र
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