अमित आर्यावर्त (भारत योगी)
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वैदिक धर्म का प्रचार ही हमारा मकसद होना चाहिए वैदिक धर्म बचेगा तभी देश बचेगा

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इस पृथ्वी पर 2 चिकित्सा पद्धति एसी हैं जिनकी शक्ति अत्यंत सूक्ष्मता में है यानी अत्यंत बलवान है राम बाण जैसी
1, हवन चिकित्सा
2, एक्यूप्रेशर चिकित्सा

दोनों ही चिकित्सा पद्धति का लोग विश्वास नहीं करते सोचते हैं भले ऐसा कैसे हो सकता है

इसमें जो हवन चिकित्सा पद्धति है ये तो प्रकृति को भी संतुलित रखने की ताकत रखती है ये सबसे ऊपर है हवन सबसे श्रेष्ठ है चाहे ये शरीर हो या ये सारी जड़ प्रकृति सबको संतुलित जो जरा है उसे वैसा रखने की ताकत हवन में है आज तो बहुत ही ज्यादा प्रमाणिक खोजे भी हुई है

ओर इस शरीर की सीमा में एक्यूप्रेशर बहुत अच्छा लाभ करता है

यदि अत्यंत गंभीर रोगी को एक्यूप्रेशर ओर हवन चिकित्सा एक साथ मिले तो मुझे लगता है कि इस संसार का कोई रोग या भविष्य का कोई रोग, कोई भी महामारी, शरीर नहीं छुड़वा पाएगा

ईश्वर की दया से ये दोनों ही विद्या सीखने की मेरी हमेशा इच्छा रही जब मैने पहली बार इनके बारे में सुना तो मैने कभी भी इन्हें झूठ काल्पनिक नहीं माना क्योंकि मैं जानता हूं कि मैं एक साधारण सा कीड़ा हु अपने महान महान आर्य पूर्वजों के सामने तो उनके ज्ञान पर सवाल उठाने की या शंका करने की मेरी कोई औकात नहीं है

सबसे पहले आपको श्रद्धा होनी चाहिए तभी सफलता मिलेगी जब हम दिल से पवित्र होंगे तो वो ऊर्जा भी हमारा सहयोग करेगी जो हमें दिखती नहीं है , दिल से पवित्र सरल रहने का एक ही तरीका है भावुकता को त्याग कर धर्म से सारे कार्य करना फिर हम किसी के विषय में ओवर थिंकिंग नहीं करेंगे और हमारे नाश का द्वार खुल ही नहीं पाएगा
आर्यपुत्र
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अमित आर्यावर्त (भारत योगी) pinned «सूर्य नमस्कार बदलेगा आपका जीवन https://youtu.be/jIE_pyhwAO8?si=0737YT1UgxJFrJVm»
📢 आर्यसमाज का विज्ञानसम्मत आह्वान!

“अगर यज्ञ से बारिश होती है तो रेगिस्तान में जाकर यज्ञ करो!”
— यही तो कहा करते थे बकवास करनेवाले!

अब सुनो 👇

🌧️ आज से आर्यसमाज के आचार्य द्वारा वृष्टियज्ञ का आयोजन हो रहा है।
📍 स्थान: कच्छ का रेगिस्तान (गुजरात)
📅 तिथि: आज से प्रारंभ

यह सुवर्ण अवसर है उन सभी के लिए जो यज्ञ और वेद पर सवाल उठाते हैं।
आर्यसमाज सिर्फ कहता नहीं, करके दिखाता है।
अब विज्ञान चिल्लाने वालों को आमंत्रण है – आइए, देखिए, समझिए।

🔔 आर्य हैं – कर्मप्रधान हैं।
धर्म, वेद और विज्ञान – सबका मेल यहीं मिलेगा। https://www.youtube.com/live/1DWGynmAW4M?si=YogNcUsKTQttpWR3
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आसन तो दुनिया भरके हैं किंतु हमें कुछ मुख्य आसन चुन लेने चाहिए और उनमें कम से कम 1 से 2 मिनट ओर अधिक से अधिक 5 मिनट लगातार रुकना चाहिए तो असली लाभ मिलता है आसनों का वास्तव में इस प्रकार किए गए आसन ही ब्रह्मचर्य आसन होते हैं इसी विधि से विशेष लाभ मिलता है

कुछ आसन जो मुझे बहुत ही ज्यादा अच्छे लगते हैं , पश्चिमोत्तासन, चक्रासन , उत्तानपादासन, सर्वांगआसन, हलासन,  धनुरासन, मयूर आसन, कुक्कुट मुर्गा पक्षी आसन, ओर सबसे मुख्य आसनों का राजा शीर्षासन

बाकी सूर्य नमस्कार में भी कई आसन हो जाते हैं

अंत में लेट कर किए जाने वाले कमर के व्यायाम जरूर करने चाहिए और फिर कुछ देर शव आसन में योग निंद्रा

यदि मुझे 2 ही आसन चुनने हो तो मैं पश्चिमोत्तानासन और चक्रासन को चुनूंगा

https://youtube.com/shorts/op5mCWZ5icA?feature=share

🚩जय आर्य जय आर्यवर्त🚩
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भगवान राम कैसे ध्यान करते थे ?

आइए वाल्मीकि रामायण से जाने भगवान श्री राम ईश्वर का ध्यान कैसे करते थे, यदि आपके पास वाल्मीकि रामायण है तो आप ये जानकारी बालकांड 11वें सर्ग में पढ़ सकते हैं, महाभारत में भी ऐसी बहुत सी जानकारियां भरी पड़ी हैं फिर कभी साझा करूंगा

प्रभातायां तु शर्वर्या विश्वामित्रो महामुनिः । अभ्यभाषत काकुत्स्थौ शयानौ पर्णसंस्तरे ॥ १॥ कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते । उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमान्हिकम् ॥ २ ॥

अर्थ-प्रभात होने पर विश्वामित्र महामुनि पत्तों के विस्तर पर सोये हुए राम लक्ष्मण से बोले कि हे कौसल्या के सुपुत्र राम ! इस समय तुमको सोना अनुचित है, क्योंकि यह समय प्रातःसन्ध्या करने का है, हे नरशार्दूल ! दैवकर्म-सन्ध्या अग्निहोत्र करो ।।

तस्यर्षेः परमोदारं वचः श्रुत्वा नरोत्तमौ । स्नात्वा कृतोदकौ वीरौ जपेतुःपरमं जपम् ।। ३ ॥ कृताह्निको महावीर्यो विश्वामित्रं तपोधनम् । अभिवाद्यातिसंहृष्टा गमनायाभितस्थतुः ।। ४ ।।

अर्थ-ऋषि के परम उदार बचन सुन दोनों श्रेष्ठ भाइयों ने स्नानकर आचमन किया और परमजप-गायत्री का जप करके पूर्वाह्निक के कर्म सन्ध्या अग्निहोत्रादि से निवृत्त हो महावीर्य्य तपोधन विश्वामित्र को अभिवादन करके प्रसन्न मन दोनों भाई चलने के लिये सन्मुख खड़े होगये ।।

मेरे मन में एक ही सवाल उठता है आखिर हमने आर्य श्रेष्ठ भगवान राम का वो श्रेष्ठ मार्ग क्यों त्याग दिया और आज के वेद विरोधियों के मन के घमंड काल्पनिक राधा को क्यों जपने लगे? वेद ने हमे जो आज्ञा दी उसके विपरीत हम क्यों चलने लगे

वाल्मीकि रामायण और महाभारत पढ़ कर तो देखिए आप पाएंगे कि भगवान राम और भगवान श्री कृष्ण ने जन्म से मृत्यु तक अनजाने में भी कभी वेद विरुद्ध धर्म विरुद्ध कोई कार्य नहीं किया
https://youtu.be/jIE_pyhwAO8

नमस्ते जी 🚩🙏ओ३म्🚩🙏
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*🌷ओ३म् का जाप सर्वश्रेष्ठ🌷*

ओ३म् का जाप स्मरण शक्ति को तीव्र करता है,इसलिए वेदाध्ययन में मन्त्रों के आदि तथा अन्त में ओ३म् शब्द का प्रयोग किया जाता है।
मनुस्मृति में आया है कि ब्रह्मचारी को मन्त्रों के आदि तथा अन्त में ओ३म् शब्द का उच्चारण करना चाहिए।

क्योंकि आदि में ओ३म् शब्द का उच्चारण न करने से अध्ययन धीरे धीरे नष्ट हो जाता है तथा अन्त में ओ३म् शब्द न कहने से वह स्थिर नहीं रहता है। २/७४ ।।

कठोपनिषद में नचिकेता की कथा आती है।नचिकेता ने यम ऋषि से पूछा- हे ऋषि,मुझे यह बताइये कि संसार में सार वस्तु क्या है?
इस पर ऋषि ने उत्तर दिया,सब वेद जिस नाम के संबंध में वर्णन करते हैं,सभी तपस्वी जिसके विषय में कहते हैं,जिसकी प्राप्ति की इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं,उस नाम के संबंध में मैं तुझे संक्षेप में बताता हूं-वह ओ३म् नाम(शब्द) ही परमात्मा का श्रेष्ठतम नाम है।
यजुर्वेद में आया है कि मृत्यु को जीतने और मोक्ष को प्राप्त करने के लिए ओ३म् के अतिरिक्त और कोई भी मार्ग नहीं है। यमाचार्य ने तो नचिकेता को ओ३म् का महत्व बताते हुए यहां तक कह दिया है कि यह ओ३म् अक्षर निश्चय ब्रह्म है।यह ही अक्षर ब्रह्म के सब नामों में श्रेष्ठतम है।
इस अक्षर को जान लेने के बाद जापक जो इच्छा करता है उसकी वह इच्छा निश्चयपूर्ण हो जाती है।। कठोपनिषद २/१६ ।।

ऋग्वेद ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा है-हे वीर प्रभो,आपकी मित्रता कठिनाई से नष्ट होने वाली है।अर्थात आपकी मित्रता स्थाई तथा विश्वसनीय है।
आप गाय चाहने वाले के लिए गाय हैं(देने वाले हैं) तथा घोडा चाहने वाले के लिए घोडा है ।।६/४५/२६ ।।

इस प्रकार ओ३म् के जापक को सभी उचित वस्तुएँ सुलभ हो जाती हैं।
प्रश्नोपनिषद् में तो पिप्पलाद ऋषि ने यहां तक कह दिया है कि जो निरन्तर इस तीन मात्राओं वाले ओ३म् अक्षर के द्वारा परब्रह्म का ध्यान करता है वह तेज में सूर्य के समान सम्पन्न हो जाता है ।।५/५ ।।

छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार देवता भी इस अविनाशी ,अमर तथा अभय ओ३म् अक्षर का सहारा लेकर अमर तथा अभय हो गये ।।२/४/४ ।।

गीता में श्रीकृष्ण इस ओ३म् अक्षर का महत्व बताते हुए अर्जुन से कहते हैं- इस एकाक्षर ब्रह्म स्वरुप ओ३म् का स्मरण करता हुआ जो मनुष्य इस शरीर का परित्याग करता है वह परमगति(मोक्ष) को प्राप्त होता है ।।८/१३ ।।

मुण्डकोपनिषद् ओ३म् की महिमा के वर्णन में कहता है-ओ३म् का जाप करने से ह्रदयग्रन्थि (सूक्ष्म शरीर) टूट जाती है।सब प्रकार के संशय नष्ट हो जाते हैं।उसके सब कर्म क्षीण हो जाते हैं।उस इन्द्रियातीत ओ३म् के दर्शन करने मात्र से ही ।। २/२८ ।।

कठोपनिषद में आगे कहा है-ओ३म् अनित्यों में एक नित्य है।अनेकों में वही एक है।श्रेष्ठ कामनाओं का वही एक पूरक है।जो धीर पुरुष इस ओ३म् को अपनी आत्मा में देखते हैं केवल उन्हें ही परम शान्ति प्राप्त होती है,अन्यों को नहीं ।।५/१३ ।।

आत्मा में विराजमान इस परमात्मा को धीर पुरुष परा विद्या से साक्षात्कार किया करते हैं;क्योंकि यह ओ३म् इन्द्रियातीत है।
वह नित्य,विभु,सर्वव्यापक,सूक्ष्म,अव्यय तथा सब प्राणियों का कारण है।
वह गोत्र,वंश,आंख,कान,हाथ,पांव से रहित है।
वह संसार की बीज शक्ति है।वह अशरीर है।वह नाडी आदि बन्धनों से जकडा नहीं है।वह मलरहित है।
पाप उसको बांध नहीं सकते।कोई स्थान उससे रिक्त नहीं।
उसका कोई उत्पादक नहीं है।
वह सवयं अपना स्वामी है।उसने अपनी सनातन प्रजाओं के लिए पदार्थों का ठीक ठीक रीति से विधान बनाया है। यजु: ४०/८ ।

आज देखिए क्या हो रहा है खुद को साधु कहने वाले लोगों ने काल्पनिक राधा को प्रचारित किया ताकि हिंदू सनातन मार्ग को त्याग दे, क्योंकि वे पहले ही विरोध किया करते थे कि उनके अलावा ओर कोई गायत्री का जाप ना करे और महिलाएं तो बिल्कुल गायत्री ना जपे इसी लिए उल्टे सीधे नाम जाप के लिए प्रचारित किए जाने लगे ताकि ये हिंदू भटका ही रहे

वेद , उपनिषद, मनुस्मृति, महाभारत, रामायण, सभी बोल रहे हैं ओम का जाप कर गायत्री का जाप कर किंतु आजके पापियों ने हिंदुओ को इतना भ्रमित कर दिया है कि वे जाप के नाम पर कुछ भी जपते है क्यों?

क्योंकि महाराज की वाणी बड़ी प्यारी है देखो हमारे फलाने गुरु कितना प्रेम से बात करते हैं देखो हमारे गुरु के चेहरा लाल है देखो हमारे गुरु के लाखों भक्त है देखो दिखता है कितने बड़े भक्त है, देखो हमारे गुरु कितना दान देते हैं देखो देखो और देखो

हिंदू आज लुल्ली कटे सियारों से डरा सहमा रहता है क्यों? क्योंकि पाखंडियों ने हिंदुओ से उनका मूल छुड़वा दिया फिर एकता कहां से आएगी?

हिंदू जीवन भर अपना मत बदलता रहता है कभी इस बाबा के पास कभी उस बाबा के पास कभी इस मजार कभी उस मजार आदि आदि लेकिन कभी अपनी प्राचीन पुस्तके नहीं खोलता कि उस समय के ऋषि क्या बोल रहे हैं ?

आर्यपुत्र

🚩ओ३म्🚩
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डॉ प्रकाश खेतान भारत देश के जाने-माने न्यूरो सर्जन हैं. उन्होंने न्यूरो सर्जरी के क्षेत्र में ऐसा कारनामा किया है कि उनके नाम कई वर्ल्ड रिकॉर्ड दर्ज हैं.
इतने बडे डॉक्टर एक्यूप्रेशर के बारे में क्या सोचते हैं आइये देखते हैं https://youtu.be/v7KcFsmnDe0?si=eucpdFrikXlSY62d
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हम अब लुच्चे समाज में प्रवेश कर रहे हैं

भारतीय पारिवारिक प्राचीन व्यवस्था जो की विदेशियों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं थी वास्तव में संस्कृति केवल भारत में ही पाई जाती थी

आज देखें तो 70% संस्कृति खत्म हो चुकी है जो दिख रहा है वो केवल खोखला तना भर बचा है

शायद आने वाले 30 सालों में 100% भारतीय पारिवारिक प्राचीन व्यवस्था समाप्त हो जाएगी कोई गिनती भर के ही श्रेष्ठ परिवार बचेंगे इस तबाही से

शादी विवाह तो धीरे धीरे खत्म ही होते जा रहे हैं क्योंकि सबको स्त्री हो या पुरुष नाजायज संबंध जो बनाने की उत्सुकता बनी रहती है

वैसे तुम शादी करते ही क्यों हो जब तुम्हे किसी दूसरे स्त्री पुरुष से संबंध रखने होते हैं?

आज समाज में चरित्रहीन बच्चे, बूढ़े, जवान स्त्री और पुरुष सबकी बाढ सी आ चुकी है

इंडिया के कानून , सास बहु के नाटक, मोबाइल, इंटरनेट, सभी ने मिलकर बड़ा योगदान दिया है भारतीय परिवारों को नष्ट करने में

वास्तव में कुछ सालों में ये कहना गलत नहीं होगा कि इंडिया में लुच्चों का समाज पाया जाता है क्योंकि भारत तो तभी तक था जब तक यहां संस्कृति थी

शायद हम लोग अंतिम पीढ़ी हैं जिन्होंने भारतीय पारिवारिक प्राचीन व्यवस्था को अपनी आंखों से देखा होगा जिया होगा
आर्यपुत्र
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महाभारत के बाद यदि कोई सबसे लोकप्रिय राजा हुए हैं तो वे केवल सम्राट विक्रमादित्य ही थे जिनके राज्य को राम राज्य बोल सकते हैं , जो कुछ इन्होंने प्राप्त किया इनके बाद अभी तक कोई नहीं कर पाया

नकली इतिहासकारों ने इनके इतिहास को दबाने का प्रयास किया फिर भी भारत का बच्चा बच्चा इन्हें आज भी जानता है, जरा सोचिए इनके काल में क्या प्रभाव इनका समाज पर रहा होगा सम्राट का चलाया विक्रम संवत आज भी चल रहा है और हमारे सभी त्यौहार इसी के अनुसार मनाय जाते है

अपने नाम से हर कोई संवत नहीं चला सकता ऐसा केवल वही सम्राट कर सकता है जिसका राज्य राम राज्य हो, कभी रामायण में पढ़ना भगवान की अयोध्या में वहां के नागरिकों में क्या क्या योग्यता थी

सम्राट विक्रम चक्रवर्ती सम्राट थे इन्होंने भारत को शकों से मुक्त करवाया था, सम्राट विक्रमादित्य के राज में विज्ञान ने भी काफी उन्नति की, 9 रत्नों की परम्परा इन्होंने ही शुरू की बाद के राजाओं ने इनके नाम की उपाधि ली , अंतिम उपाधि दिल्लीपति महाराज हेमू ने ली उन्हें हेमचंद्र विक्रमादित्य कहा जाने लगा, यदि महाराज हेमू को आंख में तीर ना लगता तो आज भारत का इतिहास और वर्तमान कुछ ओर ही होता

यदि आप सम्राट विक्रमादित्य की जीवनी को ठीक से जानना चाहते हैं तो आप इस एनीमेटिड सीरीज में जुड़िए आशा है आपको ये वीडियो पसंद आएगी 

आप सभी ये वीडियो पूरी देखें और लाइक कमेंट आदि भी करें , ओर सभी के साथ साझा भी करें, ताकि चैनल आगे बढ़ सके


https://youtu.be/5Y4L94r38FU


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अमित आर्यावर्त (भारत योगी) pinned «महाभारत के बाद यदि कोई सबसे लोकप्रिय राजा हुए हैं तो वे केवल सम्राट विक्रमादित्य ही थे जिनके राज्य को राम राज्य बोल सकते हैं , जो कुछ इन्होंने प्राप्त किया इनके बाद अभी तक कोई नहीं कर पाया नकली इतिहासकारों ने इनके इतिहास को दबाने का प्रयास किया फिर भी भारत…»
छिछोरे और चरित्रहीन स्त्री पुरुष प्रेमानंद महाराज पर भड़के हुए हैं , क्योंकि सत्य कड़वा होता है, प्रेमानंद महाराज ने उन्हें आईना दिखाया है , वे जाग जाएंगे तो इसमें उनका ही जन्म सुधरेगा वरना नाश तो हो ही रहा है

🚩ओ३म्🚩
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अमित आर्यावर्त (भारत योगी)
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क्या महाराज विक्रमादित्य काल्पनिक हैं? जैसा कि वामपंथी कम्युनिस्ट सेक्युलर या मूर्ख लोग ये बोलते हैं कि वे काल्पनिक थे

महाभारत के बाद सम्राट विक्रम ही ऐसे हुए हैं जिनमें इतने सारे गुण थे कि वे संपूर्ण पृथ्वी के सबसे शक्तिशाली चक्रवर्ती सम्राट बने, यही बात सनातन धर्म के विरोधियों को हजम नहीं होती क्योंकि उनका मानना है कि कोई भारतवासी इतना महान कैसे हो सकता है कि वो अत्याचारी भी नहीं था धर्म का पालन करने वाला था धनुर्वेद का सम्पूर्ण विद्वान था बुद्धि में ज्ञान में किसी विद्वान जैसा था , जो न्याय करने में सबसे न्यायप्रिय था

राज महाराज तो बहुत हुए किंतु उनका आभामंडल इतना विशाल नहीं था कि वे आम लोगों में किसी कहानियों के रूप में याद किए जाएं किंतु सम्राट विक्रम बिल्कुल अलग ही व्यक्ति थे, इनके इतिहास को दबाए जाने के बाद भी भारत नेपाल के सनातनियों में हमेशा याद किए जाते रहे इनकी कहानियां सुनाई जाती रही , लोक कवियों ने इन पर किस्से लिखे

सबसे बड़ा प्रमाण तो खुद विक्रम संवत ही है किसी काल्पनिक मनुष्य के नाम पर संवत नहीं चलता खैर विरोधियों को समझ नहीं आएगा इन प्रमाणों से भी समझ नहीं आएगा

किंतु ये प्रमाण उन सभी के लिए उपयोगी है जो पक्के सनातनी हैं अपनी वैदिक परम्पराओं पर विश्वाश रखते हैं क्यों इकलौते हम भारतवासी सनातनी ही हैं जो करोड़ो साल से अपनी संस्कृति को अपने सीने से लगाए हैं इसे विलुप्त नहीं होने देंगे

ये प्रमाण 4 है अभी आगे 10 से ज्यादा प्रमाण आएंगे फिर आपको आखिर में एक विशेष जानकारी दूंगा

यह मृण्मयी मुद्रांक अण्डाकार आकार का तथा धूसर काले रंग का है 2.00 से.मी. आकार वाले इस मुद्रांक पर ब्राह्मी लिपि में 'मूलदेवस' लेख अंकित है। मूलदेव विक्रमादित्य के सभासद रहे हैं। कसरावद उत्खनन में मिले पात्र खण्डों तथा अयोध्या से प्राप्त जनपद सिक्कों पर भी 'मूलदेव' का उल्लेख मिलता हैं। इस मुद्रांक पर ईसा पूर्व प्रथम शती की ब्राह्मी लिपि हैं।

https://youtu.be/5Y4L94r38FU?si=oKsOJxhrb9xfgtSB
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