क्या आप 15 घंटे पढ़ते हैं?
या फिर काम का बोझ अधिक है?
तो निश्चित ही आप तनाव में भी रहते होंगे।
जिस पल आप भूत या भविष्य में भटकते हैं, तो चिंतन बिगड़कर चिंता का रूप ले लेता है।
और जब बिंदी हट जाती है तो चिंता → चिता बन जाती है।
आज लगभग हर व्यक्ति तनाव में जी रहा है, जिसके कारण –
पेट खराब होना
नींद न आना
दिल की धड़कन तेज या धीमी होना
माइग्रेन होना
बीपी बढ़ना
आत्महत्या के विचार आना
आदि-आदि हज़ारों प्रकार की समस्याएँ देखने को मिलती हैं।
👉 इससे बचने के 3 उपाय हैं:
व्यायाम
ध्यान
एक्यूप्रेशर
एक्यूप्रेशर के 3 पॉइंट बताए गए हैं, जिन्हें हज़ारों सालों से प्रयोग किया जा रहा है।
आज इंसानों को इनकी बहुत ज़रूरत है।
तो देखिए यह वीडियो और बचाइए अपना और अपनों का जीवन।
यह चिकित्सा आपको फ्री में बताई गई है।
वरना किसी चिकित्सक के पास जाने पर इसी उपचार के आपको 500 से 3000 रुपए तक खर्च करने पड़ सकते थे।
🔗 वीडियो लिंक: https://youtu.be/cYMtN4I1WTE?si=Nwaej8frvcMJ0II5
🚩 ओ३म् 🚩
या फिर काम का बोझ अधिक है?
तो निश्चित ही आप तनाव में भी रहते होंगे।
जिस पल आप भूत या भविष्य में भटकते हैं, तो चिंतन बिगड़कर चिंता का रूप ले लेता है।
और जब बिंदी हट जाती है तो चिंता → चिता बन जाती है।
आज लगभग हर व्यक्ति तनाव में जी रहा है, जिसके कारण –
पेट खराब होना
नींद न आना
दिल की धड़कन तेज या धीमी होना
माइग्रेन होना
बीपी बढ़ना
आत्महत्या के विचार आना
आदि-आदि हज़ारों प्रकार की समस्याएँ देखने को मिलती हैं।
👉 इससे बचने के 3 उपाय हैं:
व्यायाम
ध्यान
एक्यूप्रेशर
एक्यूप्रेशर के 3 पॉइंट बताए गए हैं, जिन्हें हज़ारों सालों से प्रयोग किया जा रहा है।
आज इंसानों को इनकी बहुत ज़रूरत है।
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यह चिकित्सा आपको फ्री में बताई गई है।
वरना किसी चिकित्सक के पास जाने पर इसी उपचार के आपको 500 से 3000 रुपए तक खर्च करने पड़ सकते थे।
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🚩 ओ३म् 🚩
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4 साल पुराना रोग 4 दिन में 80% ठीक हो सकता है?
मुझे पहले कई व्यक्ति मिले जिन्हें लगता था कि मर्म-दाब चिकित्सा पद्धति में कोई दम नहीं है।
वास्तव में मर्म-दाब चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद की देन है जिसे आज एक्यूप्रेशर के नाम से जाना जाता है। आयुर्वेद में शरीर के अनेक महत्वपूर्ण बिंदुओं (मर्म) का उल्लेख मिलता है।
मेरे पिताजी को पिछले 4 साल से गर्दन हिलने की समस्या थी। मैंने उन्हें कई उपाय बताए, लेकिन उन्होंने कोई नहीं अपनाया। 2023 के मध्य में, जब समस्या बहुत जटिल नहीं थी, मैंने उन्हें मर्म-दाब से चिकित्सा करने की सलाह दी। यह चिकित्सा भी मुझे ही करनी थी, कहीं बाहर नहीं जाना था। किंतु उन्होंने कहा कि “इससे ठीक नहीं होगा।”
अब 2025 में जब समस्या बहुत बढ़ गई — गर्दन स्थिर ही नहीं रहती थी। सीधी करते तो आगे को झुक जाती, हाथ से सहारा देना पड़ता। साथ ही सांस फूलने लगी, खून भी कम हो गया, और सीढ़ियाँ चढ़ते ही सांस तेज हो जाती थी।
इस बार उन्होंने मेरी बात मान ली। जुलाई के मध्य से मैंने मर्म-दाब से उनकी चिकित्सा प्रारंभ की।
सबसे पहले मैंने खून की कमी और फेफड़ों की चिकित्सा की। केवल 7 दिन में ही असर दिखने लगा। सांस फूलना कम हो गया, खून भी बढ़ने लगा। अब तो वे तीसरी मंजिल तक बिना रुके चले जाते हैं और सांस नहीं फूलता।
इसके बाद मैंने गर्दन की चिकित्सा शुरू की। केवल 4 दिन में ही गर्दन की समस्या में 80% आराम हो गया। मुझे भी आश्चर्य हुआ कि 4 साल पुरानी समस्या 4 दिन में इतनी जल्दी ठीक हो सकती है।
अब गर्दन की समस्या भी कुछ ही दिनों में पूरी तरह ठीक हो जाएगी। केवल मोतियाबिंद की समस्या बाकी है, जिसकी चिकित्सा चल रही है।
वास्तव में मर्म-दाब चिकित्सा बहुत ही उपयोगी है। बिना किसी दवा के, केवल शरीर की ऊर्जा का संतुलन बना देने मात्र से, शरीर के अंग सही ढंग से कार्य करने लगते हैं।
आयुर्वेद में कुल 107 मर्म बिंदुओं का उल्लेख है।
ये बिंदु पूरे शरीर में फैले हुए हैं और हर एक का संबंध किसी न किसी अंग और उसके कार्य से होता है।
इन्हें चोट या आघात लगने पर गंभीर रोग, विकलांगता या मृत्यु तक हो सकती है, इसलिए इन्हें “जीवन के द्वार” भी कहा गया है।
इन्हीं बिंदुओं पर हल्का, नियंत्रित दबाव देने से शरीर की ऊर्जा संतुलित होती है और उपचारात्मक प्रभाव मिलता है।
👉 सरल भाषा में कहें तो,
मर्म बिंदु शरीर के “पावर स्विच” जैसे हैं —
वर्तमान में मैं एक नई पुस्तक लिखने पर कार्य शुरू कर रहा हूं विषय है मर्म दाब एक्यूप्रेशर से स्वप्नदोष की स्थाई चिकित्सा
✍️ आर्यपुत्र
🚩ओ३म् नमस्ते जी🚩
मुझे पहले कई व्यक्ति मिले जिन्हें लगता था कि मर्म-दाब चिकित्सा पद्धति में कोई दम नहीं है।
वास्तव में मर्म-दाब चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद की देन है जिसे आज एक्यूप्रेशर के नाम से जाना जाता है। आयुर्वेद में शरीर के अनेक महत्वपूर्ण बिंदुओं (मर्म) का उल्लेख मिलता है।
मेरे पिताजी को पिछले 4 साल से गर्दन हिलने की समस्या थी। मैंने उन्हें कई उपाय बताए, लेकिन उन्होंने कोई नहीं अपनाया। 2023 के मध्य में, जब समस्या बहुत जटिल नहीं थी, मैंने उन्हें मर्म-दाब से चिकित्सा करने की सलाह दी। यह चिकित्सा भी मुझे ही करनी थी, कहीं बाहर नहीं जाना था। किंतु उन्होंने कहा कि “इससे ठीक नहीं होगा।”
अब 2025 में जब समस्या बहुत बढ़ गई — गर्दन स्थिर ही नहीं रहती थी। सीधी करते तो आगे को झुक जाती, हाथ से सहारा देना पड़ता। साथ ही सांस फूलने लगी, खून भी कम हो गया, और सीढ़ियाँ चढ़ते ही सांस तेज हो जाती थी।
इस बार उन्होंने मेरी बात मान ली। जुलाई के मध्य से मैंने मर्म-दाब से उनकी चिकित्सा प्रारंभ की।
सबसे पहले मैंने खून की कमी और फेफड़ों की चिकित्सा की। केवल 7 दिन में ही असर दिखने लगा। सांस फूलना कम हो गया, खून भी बढ़ने लगा। अब तो वे तीसरी मंजिल तक बिना रुके चले जाते हैं और सांस नहीं फूलता।
इसके बाद मैंने गर्दन की चिकित्सा शुरू की। केवल 4 दिन में ही गर्दन की समस्या में 80% आराम हो गया। मुझे भी आश्चर्य हुआ कि 4 साल पुरानी समस्या 4 दिन में इतनी जल्दी ठीक हो सकती है।
अब गर्दन की समस्या भी कुछ ही दिनों में पूरी तरह ठीक हो जाएगी। केवल मोतियाबिंद की समस्या बाकी है, जिसकी चिकित्सा चल रही है।
वास्तव में मर्म-दाब चिकित्सा बहुत ही उपयोगी है। बिना किसी दवा के, केवल शरीर की ऊर्जा का संतुलन बना देने मात्र से, शरीर के अंग सही ढंग से कार्य करने लगते हैं।
आयुर्वेद में कुल 107 मर्म बिंदुओं का उल्लेख है।
ये बिंदु पूरे शरीर में फैले हुए हैं और हर एक का संबंध किसी न किसी अंग और उसके कार्य से होता है।
इन्हें चोट या आघात लगने पर गंभीर रोग, विकलांगता या मृत्यु तक हो सकती है, इसलिए इन्हें “जीवन के द्वार” भी कहा गया है।
इन्हीं बिंदुओं पर हल्का, नियंत्रित दबाव देने से शरीर की ऊर्जा संतुलित होती है और उपचारात्मक प्रभाव मिलता है।
👉 सरल भाषा में कहें तो,
मर्म बिंदु शरीर के “पावर स्विच” जैसे हैं —
वर्तमान में मैं एक नई पुस्तक लिखने पर कार्य शुरू कर रहा हूं विषय है मर्म दाब एक्यूप्रेशर से स्वप्नदोष की स्थाई चिकित्सा
✍️ आर्यपुत्र
🚩ओ३म् नमस्ते जी🚩
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तलाक और भारतीय संस्कृति
तलाक भारतीय संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं रहा। हमारी वैदिक परंपरा में विवाह को केवल एक अनुबंध (Contract) नहीं, बल्कि एक संस्कार माना गया है — ऐसा पवित्र बंधन जिसमें पुरुष महिला ये मानते हैं कि उनका साथ जन्मों-जन्मों तक चलेगा।
इसी कारण तलाक का कोई मूल हिंदी या संस्कृत शब्द आज तक सुनने या देखने को नहीं मिलता।
हाँ, आधुनिक काल में लोग अलग-अलग शब्दों को जोड़कर "विवाह विच्छेद" या "दाम्पत्य विच्छेद" जैसे शब्द बना लेते हैं, लेकिन ये परंपरागत नहीं हैं, बल्कि आधुनिक कानूनी व्यवस्था के अनुसार गढ़े गए शब्द हैं।
एक प्रेरणादायक घटना
मुझे किसी से एक वकील के बारे में जानकारी मिली, जिनका काम लोगों के तलाक के केस देखना था।
लेकिन बाद में उन्होंने एक्यूप्रेशर सीखा, और उनकी सोच पूरी तरह बदल गई।
अब जब कोई पति-पत्नी तलाक के लिए उनके पास आता है, तो वह उन्हें सबसे पहले कुछ विशेष एक्यूप्रेशर पॉइंट्स लगाने की सलाह देते हैं और खुद भी सिखा देते हैं।
फिर उन्हें कहते हैं –
"पहले ये पॉइंट्स कुछ दिन नियमित लगाइए, फिर तलाक की प्रक्रिया पर बात करेंगे।"
परिणाम यह हुआ कि ज्यादातर मामलों में कुछ ही दिनों में पति-पत्नी के बीच आपसी तनाव कम हो जाता है, समझदारी बढ़ती है, और वे तलाक का विचार ही छोड़ देते हैं।
वे चमत्कारी पॉइंट्स
बुद्ध का त्रिकोण (Buddha’s Triangle)
– इस पर मैंने एक पूरा वीडियो भी बनाया है।
https://youtu.be/cYMtN4I1WTE?si=Izjcsj-qLBjLx0bu
LIV-3 (Liver 3 Point)
इन पॉइंट्स को लगाने से:
मानसिक तनाव और चिंता कम होती है।
गुस्सा शांत होता है।
धैर्य और सकारात्मक सोच बढ़ती है।
नींद अच्छी आती है।
शरीर से विषाक्त पदार्थ (Toxins) बाहर निकलते हैं।
और सैकड़ों छोटी-बड़ी शारीरिक व मानसिक समस्याएँ स्वतः ठीक होने लगती हैं।
खुद अनुभव करें
अगर आपको विश्वास न हो तो किसी तनावग्रस्त व्यक्ति या महिला पर ये पॉइंट्स लगाकर देखिए,
या खुद पर कुछ दिन आजमाइए।
आप स्वयं अनुभव करेंगे कि मन, शरीर और रिश्तों में अद्भुत परिवर्तन होता है।
✍️आर्यपुत्र
तलाक भारतीय संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं रहा। हमारी वैदिक परंपरा में विवाह को केवल एक अनुबंध (Contract) नहीं, बल्कि एक संस्कार माना गया है — ऐसा पवित्र बंधन जिसमें पुरुष महिला ये मानते हैं कि उनका साथ जन्मों-जन्मों तक चलेगा।
इसी कारण तलाक का कोई मूल हिंदी या संस्कृत शब्द आज तक सुनने या देखने को नहीं मिलता।
हाँ, आधुनिक काल में लोग अलग-अलग शब्दों को जोड़कर "विवाह विच्छेद" या "दाम्पत्य विच्छेद" जैसे शब्द बना लेते हैं, लेकिन ये परंपरागत नहीं हैं, बल्कि आधुनिक कानूनी व्यवस्था के अनुसार गढ़े गए शब्द हैं।
एक प्रेरणादायक घटना
मुझे किसी से एक वकील के बारे में जानकारी मिली, जिनका काम लोगों के तलाक के केस देखना था।
लेकिन बाद में उन्होंने एक्यूप्रेशर सीखा, और उनकी सोच पूरी तरह बदल गई।
अब जब कोई पति-पत्नी तलाक के लिए उनके पास आता है, तो वह उन्हें सबसे पहले कुछ विशेष एक्यूप्रेशर पॉइंट्स लगाने की सलाह देते हैं और खुद भी सिखा देते हैं।
फिर उन्हें कहते हैं –
"पहले ये पॉइंट्स कुछ दिन नियमित लगाइए, फिर तलाक की प्रक्रिया पर बात करेंगे।"
परिणाम यह हुआ कि ज्यादातर मामलों में कुछ ही दिनों में पति-पत्नी के बीच आपसी तनाव कम हो जाता है, समझदारी बढ़ती है, और वे तलाक का विचार ही छोड़ देते हैं।
वे चमत्कारी पॉइंट्स
बुद्ध का त्रिकोण (Buddha’s Triangle)
– इस पर मैंने एक पूरा वीडियो भी बनाया है।
https://youtu.be/cYMtN4I1WTE?si=Izjcsj-qLBjLx0bu
LIV-3 (Liver 3 Point)
इन पॉइंट्स को लगाने से:
मानसिक तनाव और चिंता कम होती है।
गुस्सा शांत होता है।
धैर्य और सकारात्मक सोच बढ़ती है।
नींद अच्छी आती है।
शरीर से विषाक्त पदार्थ (Toxins) बाहर निकलते हैं।
और सैकड़ों छोटी-बड़ी शारीरिक व मानसिक समस्याएँ स्वतः ठीक होने लगती हैं।
खुद अनुभव करें
अगर आपको विश्वास न हो तो किसी तनावग्रस्त व्यक्ति या महिला पर ये पॉइंट्स लगाकर देखिए,
या खुद पर कुछ दिन आजमाइए।
आप स्वयं अनुभव करेंगे कि मन, शरीर और रिश्तों में अद्भुत परिवर्तन होता है।
✍️आर्यपुत्र
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5 मिनट में दिमाग हल्का करने की विधि | Mind Detox Step by Step | 3 एक्यूप्रेशर प्वाइंट lu9 , h7, p6
डिप्रेशन दूर करने का अद्भुत रहस्य | Budh ka Trikon Acupressure Points buddha triangle
क्या आप जानते हैं कि सिर्फ 3 खास एक्यूप्रेशर पॉइंट्स दबाकर आप अपने मन को शांत और ऊर्जा से भर सकते हैं? इस वीडियो में हम बताएंगे Budh ka Trikon (LU9, H7, P6) पॉइंट्स के…
क्या आप जानते हैं कि सिर्फ 3 खास एक्यूप्रेशर पॉइंट्स दबाकर आप अपने मन को शांत और ऊर्जा से भर सकते हैं? इस वीडियो में हम बताएंगे Budh ka Trikon (LU9, H7, P6) पॉइंट्स के…
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भूत-प्रेत, जादू-टोना और अंधविश्वास से मुक्ति का मार्ग
ऋषि दयानंद सरस्वती जी ने बोला कि वेदों की ओर वापस लौटो वेद विद्या के कारण आज मैं और मेरा पूरा परिवार प्रेत, जादू-टोना, फलित ज्योतिष जैसी काल्पनिक और डरावनी बातों से कोसों दूर हैं।
मैं हमेशा ईश्वर, आत्मा और प्रकृति को समझने का प्रयास करता हूं।
गायत्री मंत्र का नियमित जाप करने से मन में केवल परमात्मा के प्रति श्रद्धा रहती है, और किसी अलौकिक अनदेखी शक्ति का भय नहीं रहता।
नीचे तीन वास्तविक घटनाएं साझा कर रहा हूँ, जो इस बात का प्रमाण हैं कि भय और अंधविश्वास केवल अज्ञान का परिणाम है:
घटना 1 – हल्दी और चावल का डर नहीं
करीब एक साल पहले मेरे घर के आगे सीढ़ियों पर किसी ने हल्दी और चावल रख दिए।
किंतु मेरे परिवार के किसी भी सदस्य के मन में भय, शंका या असुरक्षा की भावना नहीं आई।
हमारे लिए यह केवल चावल और हल्दी थे – न कि कोई जादुई वस्तु।
घटना 2 – दरवाजे पर नई कील
हाल ही में किसी ने हमारे घर के दरवाजे के ठीक आगे नई कील रख दी।
बहुत से लोग इसे टोना-टोटका मानकर डर जाते, लेकिन हमारे परिवार में किसी को कोई भय नहीं हुआ।
हम जानते हैं कि केवल ईश्वर ही सबका रक्षक है, न कि कोई कील या वस्तु किसी का भाग्य बदल सकती है।
घटना 3 – अनाज और पानी को लांघना
हर सुबह जब मैं व्यायाम के लिए खेतों की ओर जाता हूँ, तो रास्ते में अक्सर चौक पर अनाज के दाने और पानी चढ़ा हुआ मिलता है।
मैं कई बार इन चीजों को लांघकर आगे बढ़ा हूँ।
आज तक मेरा कोई नुकसान नहीं हुआ, और न ही कभी होगा।
हाँ, जिस दिन मृत्यु का दिन आएगा, उसे कोई भी वस्तु या शक्ति टाल नहीं सकती, क्योंकि जन्म और मृत्यु केवल ईश्वर के हाथ में हैं।
तर्क – यदि टोना-टोटका सच होता...
यदि हल्दी, चावल, कील, नींबू, लाल कपड़ा या किसी के बाल जैसी चीजों से किसी का विनाश हो सकता,
तो भारत को सीमा पर सैनिक रखने की आवश्यकता ही नहीं होती।
हम केवल कील और चावल से पाकिस्तान और चीन का विनाश कर देते।
यदि भूत-प्रेत और अदृश्य शक्तियों में इतनी ताकत होती कि वे मनुष्य के जीवन को प्रभावित कर सकें,
तो आज दुनिया भर की सरकारें सुरक्षा के लिए करोड़ों-अरबों रुपए खर्च क्यों करतीं?
आज पूरी दुनिया पर उन्हीं काल्पनिक शक्तियों का राज होता, न कि मनुष्य का।
वास्तविकता:
ये सभी बातें भय, अज्ञान और दुर्बल मन की उपज हैं।
भय का असली कारण – ब्रह्मचर्य का अभाव
जो मनुष्य वीर्यहीन है,
वेदों के अनुसार ईश्वर का ध्यान नहीं करता,
यम और नियमों का पालन नहीं करता,
तो उसका मन अस्थिर रहता है और वह काल्पनिक शक्तियों से भयभीत होने लगता है।
ऐसा मनुष्य हमेशा डर और शंका में जीता है।
वीर्यवान व्यक्ति का मन स्थिर और निडर होता है।
वही व्यक्ति सत्य को पहचान पाता है और किसी काल्पनिक शक्ति के प्रभाव में नहीं आता।
जीवन का सत्य – सुख-दुख का चक्र
क्या कोई मनुष्य ऐसा है जो कभी बीमार न पड़ा हो?
क्या कोई घर ऐसा है जहाँ कभी मृत्यु न हुई हो?
क्या कोई परिवार ऐसा है जिसमें सुख-दुख साथ-साथ न आए हों?
यदि ये सब प्राकृतिक और सार्वभौमिक घटनाएं हैं,
तो फिर भूत-प्रेत और टोने-टोटके के आगे घुटने टेकने का क्या औचित्य है?
संसार का एकमात्र मुखिया – परमात्मा
जैसे किसी घर में यदि कई मुखिया हों, तो झगड़ा और अव्यवस्था बढ़ती है।
वैसे ही इस संसार का भी एक ही मुखिया है –
जिसे वेद और उपनिषद निराकार, सर्वव्यापक, न्यायकारी और अनंत बुद्धिमान कहते हैं।
योगीजन समाधि में जाकर जिस ईश्वर का अनुभव करते हैं,
वही इस संसार का एकमात्र शासक और रक्षक है।
निष्कर्ष – केवल न्याय, अन्याय नहीं
ईश्वर की व्यवस्था मनुष्य की व्यवस्था जैसी नहीं है।
वह सर्वज्ञ और अनंत बुद्धिमान है।
इसलिए उसकी सृष्टि में किसी के साथ अन्याय नहीं होता,
केवल पूर्ण न्याय होता है।
अंतिम संदेश
भूत-प्रेत, जादू-टोना और फलित ज्योतिष जैसे अंधविश्वास मनुष्य के अज्ञान और भय की उपज हैं।
सच्चे ज्ञान, ब्रह्मचर्य, और वेद- ईश्वर भक्ति से यह भय स्वतः समाप्त हो जाता है।
"जिस दिन मनुष्य का मन केवल ईश्वर में स्थिर हो जाता है,
उस दिन उसके लिए संसार की कोई काल्पनिक शक्ति अस्तित्व ही नहीं रखती।"
ऋषि दयानंद के ये उपकार अनेकों जन्मों में नहीं उतार पाऊंगा मैं तो 🙏
✍️🚩आर्यपुत्र
ऋषि दयानंद सरस्वती जी ने बोला कि वेदों की ओर वापस लौटो वेद विद्या के कारण आज मैं और मेरा पूरा परिवार प्रेत, जादू-टोना, फलित ज्योतिष जैसी काल्पनिक और डरावनी बातों से कोसों दूर हैं।
मैं हमेशा ईश्वर, आत्मा और प्रकृति को समझने का प्रयास करता हूं।
गायत्री मंत्र का नियमित जाप करने से मन में केवल परमात्मा के प्रति श्रद्धा रहती है, और किसी अलौकिक अनदेखी शक्ति का भय नहीं रहता।
नीचे तीन वास्तविक घटनाएं साझा कर रहा हूँ, जो इस बात का प्रमाण हैं कि भय और अंधविश्वास केवल अज्ञान का परिणाम है:
घटना 1 – हल्दी और चावल का डर नहीं
करीब एक साल पहले मेरे घर के आगे सीढ़ियों पर किसी ने हल्दी और चावल रख दिए।
किंतु मेरे परिवार के किसी भी सदस्य के मन में भय, शंका या असुरक्षा की भावना नहीं आई।
हमारे लिए यह केवल चावल और हल्दी थे – न कि कोई जादुई वस्तु।
घटना 2 – दरवाजे पर नई कील
हाल ही में किसी ने हमारे घर के दरवाजे के ठीक आगे नई कील रख दी।
बहुत से लोग इसे टोना-टोटका मानकर डर जाते, लेकिन हमारे परिवार में किसी को कोई भय नहीं हुआ।
हम जानते हैं कि केवल ईश्वर ही सबका रक्षक है, न कि कोई कील या वस्तु किसी का भाग्य बदल सकती है।
घटना 3 – अनाज और पानी को लांघना
हर सुबह जब मैं व्यायाम के लिए खेतों की ओर जाता हूँ, तो रास्ते में अक्सर चौक पर अनाज के दाने और पानी चढ़ा हुआ मिलता है।
मैं कई बार इन चीजों को लांघकर आगे बढ़ा हूँ।
आज तक मेरा कोई नुकसान नहीं हुआ, और न ही कभी होगा।
हाँ, जिस दिन मृत्यु का दिन आएगा, उसे कोई भी वस्तु या शक्ति टाल नहीं सकती, क्योंकि जन्म और मृत्यु केवल ईश्वर के हाथ में हैं।
तर्क – यदि टोना-टोटका सच होता...
यदि हल्दी, चावल, कील, नींबू, लाल कपड़ा या किसी के बाल जैसी चीजों से किसी का विनाश हो सकता,
तो भारत को सीमा पर सैनिक रखने की आवश्यकता ही नहीं होती।
हम केवल कील और चावल से पाकिस्तान और चीन का विनाश कर देते।
यदि भूत-प्रेत और अदृश्य शक्तियों में इतनी ताकत होती कि वे मनुष्य के जीवन को प्रभावित कर सकें,
तो आज दुनिया भर की सरकारें सुरक्षा के लिए करोड़ों-अरबों रुपए खर्च क्यों करतीं?
आज पूरी दुनिया पर उन्हीं काल्पनिक शक्तियों का राज होता, न कि मनुष्य का।
वास्तविकता:
ये सभी बातें भय, अज्ञान और दुर्बल मन की उपज हैं।
भय का असली कारण – ब्रह्मचर्य का अभाव
जो मनुष्य वीर्यहीन है,
वेदों के अनुसार ईश्वर का ध्यान नहीं करता,
यम और नियमों का पालन नहीं करता,
तो उसका मन अस्थिर रहता है और वह काल्पनिक शक्तियों से भयभीत होने लगता है।
ऐसा मनुष्य हमेशा डर और शंका में जीता है।
वीर्यवान व्यक्ति का मन स्थिर और निडर होता है।
वही व्यक्ति सत्य को पहचान पाता है और किसी काल्पनिक शक्ति के प्रभाव में नहीं आता।
जीवन का सत्य – सुख-दुख का चक्र
क्या कोई मनुष्य ऐसा है जो कभी बीमार न पड़ा हो?
क्या कोई घर ऐसा है जहाँ कभी मृत्यु न हुई हो?
क्या कोई परिवार ऐसा है जिसमें सुख-दुख साथ-साथ न आए हों?
यदि ये सब प्राकृतिक और सार्वभौमिक घटनाएं हैं,
तो फिर भूत-प्रेत और टोने-टोटके के आगे घुटने टेकने का क्या औचित्य है?
संसार का एकमात्र मुखिया – परमात्मा
जैसे किसी घर में यदि कई मुखिया हों, तो झगड़ा और अव्यवस्था बढ़ती है।
वैसे ही इस संसार का भी एक ही मुखिया है –
जिसे वेद और उपनिषद निराकार, सर्वव्यापक, न्यायकारी और अनंत बुद्धिमान कहते हैं।
योगीजन समाधि में जाकर जिस ईश्वर का अनुभव करते हैं,
वही इस संसार का एकमात्र शासक और रक्षक है।
निष्कर्ष – केवल न्याय, अन्याय नहीं
ईश्वर की व्यवस्था मनुष्य की व्यवस्था जैसी नहीं है।
वह सर्वज्ञ और अनंत बुद्धिमान है।
इसलिए उसकी सृष्टि में किसी के साथ अन्याय नहीं होता,
केवल पूर्ण न्याय होता है।
अंतिम संदेश
भूत-प्रेत, जादू-टोना और फलित ज्योतिष जैसे अंधविश्वास मनुष्य के अज्ञान और भय की उपज हैं।
सच्चे ज्ञान, ब्रह्मचर्य, और वेद- ईश्वर भक्ति से यह भय स्वतः समाप्त हो जाता है।
"जिस दिन मनुष्य का मन केवल ईश्वर में स्थिर हो जाता है,
उस दिन उसके लिए संसार की कोई काल्पनिक शक्ति अस्तित्व ही नहीं रखती।"
ऋषि दयानंद के ये उपकार अनेकों जन्मों में नहीं उतार पाऊंगा मैं तो 🙏
✍️🚩आर्यपुत्र
👏17🔥5❤4👍4
यदि कुछ करना है तो अपने जीवित दादा दादी माता पिता की सेवा करो , यदि नाना नानी को भी जरूरत है तो उनकी भी पूरी सेवा करनी चाहिए
ये तो तर्क की बात है , जीवित माता पिता की आज्ञा मानते नहीं उनकी सेवा करते नहीं, मरने के बाद कौए को अपना बाप दादा मान कर खिलाते हो उनके नामसे अनेकों कर्म करते हो इसका लाभ कुछ नहीं, जो जीव आत्मा अपने कर्म संस्कारों के साथ जा चुकी वही उसका मार्ग निर्धारित करेंगे
जब आखरी संस्कार का नाम ही अंतिम संस्कार है तो इसके बाद क्या रह गया? इसके बाद यदि शेष कुछ है तो वो है ईश्वर की न्याय व्यस्था जिसने जैसे कर्म किए होंगे ईश्वर उसे वैसी योनि में भेज देगा और होगी नई यात्रा शुरू जब तक मोक्ष ना प्राप्त कर ले
यदि अपने पूर्वजों को याद करना है तो उनके बताए अच्छे संस्कारों को जीवनभर पालन करो
मेरे बड़े दादा जी ने अपने मित्र को बचाने के लिए अपनी जान देदी वो चाहते तो अपना जीवन बचा सकते थे , जब मैने बचपन में ये बात सुनी थी तो उसी दिन समझ आ गया था कि अपने मित्र के साथ कभी भी दगा नहीं करना, किसी के साथ कभी भी दगा नहीं करनी चाहिए , मैने उनके इस अच्छे संस्कार को जीवन में धारण किया और किसी के साथ कभी आज तक छल कपट नहीं किया क्या इस संस्कार से मेरे दादा हमेशा मेरे मन मस्तिष्क में नहीं रहेंगे जब तक मैं जीवित रहूंगा
सनातन धर्म में अंतिम संस्कार के बाद ओर कोई संस्कार शेष नहीं रहता बाकी जो कुछ धर्म के नाम पर किया जाता है वो अपने अपने मन की लीला है
✍️आर्यपुत्र
ये तो तर्क की बात है , जीवित माता पिता की आज्ञा मानते नहीं उनकी सेवा करते नहीं, मरने के बाद कौए को अपना बाप दादा मान कर खिलाते हो उनके नामसे अनेकों कर्म करते हो इसका लाभ कुछ नहीं, जो जीव आत्मा अपने कर्म संस्कारों के साथ जा चुकी वही उसका मार्ग निर्धारित करेंगे
जब आखरी संस्कार का नाम ही अंतिम संस्कार है तो इसके बाद क्या रह गया? इसके बाद यदि शेष कुछ है तो वो है ईश्वर की न्याय व्यस्था जिसने जैसे कर्म किए होंगे ईश्वर उसे वैसी योनि में भेज देगा और होगी नई यात्रा शुरू जब तक मोक्ष ना प्राप्त कर ले
यदि अपने पूर्वजों को याद करना है तो उनके बताए अच्छे संस्कारों को जीवनभर पालन करो
मेरे बड़े दादा जी ने अपने मित्र को बचाने के लिए अपनी जान देदी वो चाहते तो अपना जीवन बचा सकते थे , जब मैने बचपन में ये बात सुनी थी तो उसी दिन समझ आ गया था कि अपने मित्र के साथ कभी भी दगा नहीं करना, किसी के साथ कभी भी दगा नहीं करनी चाहिए , मैने उनके इस अच्छे संस्कार को जीवन में धारण किया और किसी के साथ कभी आज तक छल कपट नहीं किया क्या इस संस्कार से मेरे दादा हमेशा मेरे मन मस्तिष्क में नहीं रहेंगे जब तक मैं जीवित रहूंगा
सनातन धर्म में अंतिम संस्कार के बाद ओर कोई संस्कार शेष नहीं रहता बाकी जो कुछ धर्म के नाम पर किया जाता है वो अपने अपने मन की लीला है
✍️आर्यपुत्र
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जहरीले कीड़े के काटने पर क्या करें?
मधुमक्खी
भौंरा
ततैया
बिच्छू
जहरीले मकड़ी
कनखजूरा
खटमल https://youtu.be/x8z9jPOcIDo
मधुमक्खी
भौंरा
ततैया
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जहरीले मकड़ी
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जहरीले कीड़े के काटने पर तुरंत करो ये प्राथमिक उपचार । दुर्लभ जानकारी
🐝 ज़हरीले कीड़े के काटने पर तुरंत करें ये काम!
ज़हरीले कीड़े जैसे मधुमक्खी, ततैया, बिच्छू, जहरीली मकड़ी या कनखजूरा के काटने पर अक्सर लोग घबरा जाते हैं। 😨
लेकिन घबराने की बजाय अगर आपको शरीर का एक गुप्त पॉइंट पता हो, तो सिर्फ 15 मिनट में ज़हर का असर कम किया…
ज़हरीले कीड़े जैसे मधुमक्खी, ततैया, बिच्छू, जहरीली मकड़ी या कनखजूरा के काटने पर अक्सर लोग घबरा जाते हैं। 😨
लेकिन घबराने की बजाय अगर आपको शरीर का एक गुप्त पॉइंट पता हो, तो सिर्फ 15 मिनट में ज़हर का असर कम किया…
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अमित आर्यावर्त (भारत योगी) pinned «जहरीले कीड़े के काटने पर क्या करें? मधुमक्खी भौंरा ततैया बिच्छू जहरीले मकड़ी कनखजूरा खटमल https://youtu.be/x8z9jPOcIDo»
मेरे जीवन का सबसे खुशी का पल वो था जब मुझे एक जीवित क्रांतिकारी से मिलने का मौका मिला था भारत स्वाभिमान जब बना था तब, और वो थे आदरणीय श्री राजीव दीक्षित जी
किंतु अच्छे ओर क्रांतिकारी इंसान के दुश्मन बहुत अधिक होते हैं, ये वो महामानव थे जिनकी आत्म बहुत ही अधिक पवित्र है
भाई राजीव दीक्षित जी के विचारों को यदि आप लोगों के साथ साझा करें तो ये हमेशा जीवित रहेंगे दूसरे क्रांतिकारियों की तरह हमारे दिलों में आने वाली पीढ़ियों में अपने बच्चों को इन महापुरुषों के बारे में जरूर बताएं,
जैसे, ऋषि दयानंद, ब्रह्मचारी राममूर्ति, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह, दुर्गाभाभी, राजीव दीक्षित जी, कोलकाता के गोपाल पाठा आदि आदि जितनों के बारे में आप जानते हों
✍️ आर्यपुत्र 🚩🧘♀️⚔️
किंतु अच्छे ओर क्रांतिकारी इंसान के दुश्मन बहुत अधिक होते हैं, ये वो महामानव थे जिनकी आत्म बहुत ही अधिक पवित्र है
भाई राजीव दीक्षित जी के विचारों को यदि आप लोगों के साथ साझा करें तो ये हमेशा जीवित रहेंगे दूसरे क्रांतिकारियों की तरह हमारे दिलों में आने वाली पीढ़ियों में अपने बच्चों को इन महापुरुषों के बारे में जरूर बताएं,
जैसे, ऋषि दयानंद, ब्रह्मचारी राममूर्ति, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह, दुर्गाभाभी, राजीव दीक्षित जी, कोलकाता के गोपाल पाठा आदि आदि जितनों के बारे में आप जानते हों
✍️ आर्यपुत्र 🚩🧘♀️⚔️
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है किसी में इतना साहस कि सच बोल सके? अकेले राजीव भाई में ही ये साहस था
सच तो यह है कि “जन गण मन” सबसे पहले 1911 में जॉर्ज पंचम के भारत आगमन पर उसकी चापलूसी के लिए गाया गया था। और दुर्भाग्यवश, बाद में नेहरू की जिद के कारण इसे ही भारत का राष्ट्रगान बना दिया गया।
जबकि उस समय भारत के सभी क्रांतिकारी “वन्दे मातरम्” गाया करते थे। सवाल यह उठता है कि नेहरू को वन्देमातरम् से इतनी चिढ़ क्यों थी?
महान क्रांतिकारी श्री राजीव दीक्षित जी ने इस सत्य को उजागर किया था।
सोचिए मित्रो, क्या आज भी हम “जन गण मन” गाकर उसी अंग्रेज शासक की परोक्ष भक्ति नहीं कर रहे, जिसने हमारे पूर्वजों पर अनगिनत अत्याचार किए?
इतिहास गवाह है—
1911 में जब जॉर्ज पंचम भारत आया और उसे “भारत का सम्राट” घोषित किया गया, तब कलकत्ता में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। उसी अवसर पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यह गीत प्रस्तुत किया, जिसे अंग्रेजी हुकूमत ने राजा के सम्मान का गीत मानकर स्वीकार किया।
तो बताइए—
उस समय क्रांतिकारियों के प्रिय गीत “वन्दे मातरम्” को क्यों नहीं गाया गया?
क्योंकि कांग्रेसियों को उससे चिढ़ थी। कारण साफ़ था— उसमें अंग्रेजों की चापलूसी नहीं थी। ओर जन गण मन को तो लोगों को ये कहकर भी बहकाया जा सकता था कि ये गीत तो ईश्वर की प्रार्थना है
और यही चापलूसी आज भी हम दोहरा रहे हैं।
मेरे लिए तो “वन्दे मातरम्” ही सब कुछ है। पिछले 17 साल से
आप सभी को अपने बच्चों को भी ये सच्चाई बतानी चाहिए जो कि मैं जानता हूं अधिकतर हिंदू नहीं बताएंगे
जब लोग चर्चा करेंगे तो वर्तमान की सरकार भी कुछ सोचेगी इस विषय पर
✍️ आर्यपुत्र
सच तो यह है कि “जन गण मन” सबसे पहले 1911 में जॉर्ज पंचम के भारत आगमन पर उसकी चापलूसी के लिए गाया गया था। और दुर्भाग्यवश, बाद में नेहरू की जिद के कारण इसे ही भारत का राष्ट्रगान बना दिया गया।
जबकि उस समय भारत के सभी क्रांतिकारी “वन्दे मातरम्” गाया करते थे। सवाल यह उठता है कि नेहरू को वन्देमातरम् से इतनी चिढ़ क्यों थी?
महान क्रांतिकारी श्री राजीव दीक्षित जी ने इस सत्य को उजागर किया था।
सोचिए मित्रो, क्या आज भी हम “जन गण मन” गाकर उसी अंग्रेज शासक की परोक्ष भक्ति नहीं कर रहे, जिसने हमारे पूर्वजों पर अनगिनत अत्याचार किए?
इतिहास गवाह है—
1911 में जब जॉर्ज पंचम भारत आया और उसे “भारत का सम्राट” घोषित किया गया, तब कलकत्ता में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। उसी अवसर पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यह गीत प्रस्तुत किया, जिसे अंग्रेजी हुकूमत ने राजा के सम्मान का गीत मानकर स्वीकार किया।
तो बताइए—
उस समय क्रांतिकारियों के प्रिय गीत “वन्दे मातरम्” को क्यों नहीं गाया गया?
क्योंकि कांग्रेसियों को उससे चिढ़ थी। कारण साफ़ था— उसमें अंग्रेजों की चापलूसी नहीं थी। ओर जन गण मन को तो लोगों को ये कहकर भी बहकाया जा सकता था कि ये गीत तो ईश्वर की प्रार्थना है
और यही चापलूसी आज भी हम दोहरा रहे हैं।
मेरे लिए तो “वन्दे मातरम्” ही सब कुछ है। पिछले 17 साल से
आप सभी को अपने बच्चों को भी ये सच्चाई बतानी चाहिए जो कि मैं जानता हूं अधिकतर हिंदू नहीं बताएंगे
जब लोग चर्चा करेंगे तो वर्तमान की सरकार भी कुछ सोचेगी इस विषय पर
✍️ आर्यपुत्र
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बम-पटाखे ज़रूर फोड़ने चाहिए — इससे कई लोगों की सालभर की रोज़ी रोटी जुड़ी है। पटाखों से होने वाला प्रदूषण इतना भयंकर नहीं कि धरती का नाश हो जाएगा।
जिस व्यक्ति से आप पटाखों के बारे में आलोचना सुनते हैं, उसे सख्ती से परखें: क्या उसके पास बाइक है? बात बात पर बाइक गाड़ी चलाता है? क्या वो प्लास्टिक पन्नी आदि का अधिक प्रयोग करता है? क्या वो ऐसी का प्रयोग करता है भयंकर सत्र वाला प्रदूषण फैलाता है?
क्या वो ज्ञानीचंद वायु शुद्धि के लिए हवन करता है? देखिए पूरा साल क्या कर्म करता है वही असल तस्वीर दिखाता है किसी भी दोगले की।
वही लोग जो बात बात पर सालभर बाइक गाड़ी चलाकर हवा में जहरीला धुआं उठाते हैं, सभी प्रकार का सामान पन्नियों में लाते हैं — वे तो पूरे साल भयानक स्तर का प्रदूषण फैला रहे होते हैं।
दीपावली पर बच्चे बम फोड़कर खुश होते हैं उनकी खुशियाँ छीनकर आपको क्या मिलेगा?
यह बकवास बंद कीजिए कि पटाखे नहीं फोड़ने चाहिए। अगर करना है, तो पूरे साल के कामों की जिम्मेदारी लें और अपनी ज़िम्मेदारी के साथ त्योहार भी मनाएं।
हमारे मुख्य त्यौहार — होली, दीपावली — खेती और किसानों से जुड़े हैं; ये परम्पराएँ हवन के बिना अधूरी हैं। हवन जरूर होता था पहले अब तुमने छोड़ दिया
अगर आप बम-पटाखों पर ₹10,000 खर्च कर सकते हैं, तो हवन पर ₹1,000 क्यों नहीं दे सकते?
हवन में कोई घटिया पदार्थ ना डाले जिसे आप खुद नहीं खा सकते ऐसा घटिया पदार्थ ना डालें
सोचिए।
✍️ आर्यपुत्र
जिस व्यक्ति से आप पटाखों के बारे में आलोचना सुनते हैं, उसे सख्ती से परखें: क्या उसके पास बाइक है? बात बात पर बाइक गाड़ी चलाता है? क्या वो प्लास्टिक पन्नी आदि का अधिक प्रयोग करता है? क्या वो ऐसी का प्रयोग करता है भयंकर सत्र वाला प्रदूषण फैलाता है?
क्या वो ज्ञानीचंद वायु शुद्धि के लिए हवन करता है? देखिए पूरा साल क्या कर्म करता है वही असल तस्वीर दिखाता है किसी भी दोगले की।
वही लोग जो बात बात पर सालभर बाइक गाड़ी चलाकर हवा में जहरीला धुआं उठाते हैं, सभी प्रकार का सामान पन्नियों में लाते हैं — वे तो पूरे साल भयानक स्तर का प्रदूषण फैला रहे होते हैं।
दीपावली पर बच्चे बम फोड़कर खुश होते हैं उनकी खुशियाँ छीनकर आपको क्या मिलेगा?
यह बकवास बंद कीजिए कि पटाखे नहीं फोड़ने चाहिए। अगर करना है, तो पूरे साल के कामों की जिम्मेदारी लें और अपनी ज़िम्मेदारी के साथ त्योहार भी मनाएं।
हमारे मुख्य त्यौहार — होली, दीपावली — खेती और किसानों से जुड़े हैं; ये परम्पराएँ हवन के बिना अधूरी हैं। हवन जरूर होता था पहले अब तुमने छोड़ दिया
अगर आप बम-पटाखों पर ₹10,000 खर्च कर सकते हैं, तो हवन पर ₹1,000 क्यों नहीं दे सकते?
हवन में कोई घटिया पदार्थ ना डाले जिसे आप खुद नहीं खा सकते ऐसा घटिया पदार्थ ना डालें
सोचिए।
✍️ आर्यपुत्र
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अपनी तो हवन की तैयारी पूरी है और आपकी? हां मैं बम भी फोडूंगा कुछ मात्रा में किंतु हवन से आधी मात्रा में
आप बताओ आपका क्या हाल है हवन करोगे या म्लेच्छ बन कर जीओगे जैसे अभी तक जीते आए हो?
हवन में बस यही तो चाहिए शुद्ध घी देसी गाय का, शुद्ध जड़ीबूटियों की सामग्री, समिधा अच्छे से सुखी हुई, देसी कपूर, कुछ मीठा जैसे गुड या शक्कर, ओर नई फसल , हवन के मंत्र नहीं आते तो ओ३म् महामंत्र से करो
ओर एक बात पूरे साल की जिम्मेदारी भी लो जितना हो पन्नी का प्रयोग नहीं करो मैं 90% पन्नी का प्रयोग नहीं करता हूं
गाड़ी बाइक का जरूरी हो तो ही प्रयोग करोगे व्यर्थ में नहीं
Ac में नहीं सोएंगे, मेरे घर भी ऐसी है किंतु मैं नहीं सोता उसमें
व्यर्थ में अधिक कपड़े नहीं खरीदोगे मुझे लगता है 3 जोड़ी में कुछ साल निकल जाएंगे मेरे तो निकल जाते हैं, आने जाने का 1 जोड़ी अलग रख लो, आप जानते ही होंगे कि ये कपड़े बनाने वाले कैसे नदियों को प्रदूषित करते हैं किस किस सत्र का प्रदूषण फैलाते हैं , विशेषकर महिलाओं को इस विषय में सोचना चाहिए
आदि आदि ओर भी बहुत कुछ जो आप कर सको अच्छा वो करो
अच्छा ये सब करने से आपका स्वास्थ्य और आयु ओर बल भी बढ़ेगा
आप बताओ आपका क्या हाल है हवन करोगे या म्लेच्छ बन कर जीओगे जैसे अभी तक जीते आए हो?
हवन में बस यही तो चाहिए शुद्ध घी देसी गाय का, शुद्ध जड़ीबूटियों की सामग्री, समिधा अच्छे से सुखी हुई, देसी कपूर, कुछ मीठा जैसे गुड या शक्कर, ओर नई फसल , हवन के मंत्र नहीं आते तो ओ३म् महामंत्र से करो
ओर एक बात पूरे साल की जिम्मेदारी भी लो जितना हो पन्नी का प्रयोग नहीं करो मैं 90% पन्नी का प्रयोग नहीं करता हूं
गाड़ी बाइक का जरूरी हो तो ही प्रयोग करोगे व्यर्थ में नहीं
Ac में नहीं सोएंगे, मेरे घर भी ऐसी है किंतु मैं नहीं सोता उसमें
व्यर्थ में अधिक कपड़े नहीं खरीदोगे मुझे लगता है 3 जोड़ी में कुछ साल निकल जाएंगे मेरे तो निकल जाते हैं, आने जाने का 1 जोड़ी अलग रख लो, आप जानते ही होंगे कि ये कपड़े बनाने वाले कैसे नदियों को प्रदूषित करते हैं किस किस सत्र का प्रदूषण फैलाते हैं , विशेषकर महिलाओं को इस विषय में सोचना चाहिए
आदि आदि ओर भी बहुत कुछ जो आप कर सको अच्छा वो करो
अच्छा ये सब करने से आपका स्वास्थ्य और आयु ओर बल भी बढ़ेगा
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🌏 क्या दीपावली के पटाखे ही प्रदूषण का कारण हैं? — एक तथ्यपूर्ण तुलना
हर साल दीपावली आते ही “पटाखे मत फोड़ो, हवा ज़हरीली हो जाएगी” जैसी बातें चलने लगती हैं।
लेकिन क्या सच में केवल एक दिन के पटाखे हमारी हवा को बिगाड़ देते हैं?
या फिर हमारे दैनिक कर्म ही सालभर धरती को दूषित करते हैं?
आइए, साक्ष्यों के साथ जानते हैं।
🚗 1. वाहन प्रदूषण (सबसे बड़ा कारण)
भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार,
दिल्ली जैसे शहरों में हवा के कुल प्रदूषण का लगभग 40% हिस्सा वाहनों से आता है।
(स्रोत: CPCB – Central Pollution Control Board Report, 2023)
एक पेट्रोल कार सालभर में औसतन 4,000 किलोग्राम CO₂ (कार्बन डाइऑक्साइड) छोड़ती है।
(स्रोत: U.S. Environmental Protection Agency)
केवल दिल्ली में रोज़ 1 करोड़ से ज़्यादा वाहन चलते हैं।
इससे निकलने वाला धुआँ पूरे वर्ष वातावरण में घुला रहता है।
👉 तुलना करें — एक व्यक्ति अगर दीपावली पर 1 घंटे पटाखे जलाता है,
तो वह कार्बन उत्सर्जन एक कार के 15 मिनट के चलने जितना होता है।
यानी वाहन प्रदूषण सालभर पटाखों से हजारों गुना अधिक है।
🏠 2. घरों का कचरा और प्लास्टिक प्रदूषण
भारत में रोज़ लगभग 1.6 लाख टन ठोस कचरा उत्पन्न होता है।
(स्रोत: NITI Aayog, Swachh Bharat Mission Data 2023)
इनमें से करीब 60% जैव-अविघटनीय (non-biodegradable) होता है —
यानी प्लास्टिक, पॉलीथीन, थर्मोकोल, डिस्पोज़ेबल कप, बोतलें आदि।
यही प्लास्टिक जलाने या फेंकने से डायऑक्सिन और फ्यूरान जैसी विषैली गैसें निकलती हैं
जो मानव स्वास्थ्य और ओज़ोन परत दोनों के लिए खतरनाक हैं।
(स्रोत: WHO Report on Open Burning, 2022)
👉 पटाखे एक बार फूटकर खत्म हो जाते हैं,
पर प्लास्टिक सालों तक धरती और नदियों में ज़हर घोलता रहता है।
⚡️ 3. बिजली उत्पादन और ऊर्जा का दुरुपयोग
भारत में बिजली उत्पादन का लगभग 70% हिस्सा कोयले से होता है।
(स्रोत: Ministry of Power, 2024)
1 यूनिट (kWh) बिजली बनाने से लगभग 0.8 किलोग्राम CO₂ वायुमंडल में जाती है।
एक औसत भारतीय परिवार महीने में 200 यूनिट बिजली खर्च करता है,
यानी सालभर में लगभग 1.9 टन CO₂ उत्सर्जन।
👉 यह उत्सर्जन 100 पटाखों से निकलने वाले धुएँ के बराबर हर महीने होता है।
🏭 4. औद्योगिक प्रदूषण
CPCB की रिपोर्ट (2023) के अनुसार भारत के कुल वायु प्रदूषण का
लगभग 30% हिस्सा उद्योगों से आता है।
स्टील, सीमेंट, और टेक्सटाइल उद्योगों से निकलने वाली गैसों में
सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, और पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) शामिल हैं,
जो मानव फेफड़ों और पर्यावरण दोनों के लिए सबसे खतरनाक हैं।
👉 दीपावली पर कुछ घंटे में जितना PM2.5 बढ़ता है,
उससे कहीं अधिक मात्रा रोज़ाना फैक्ट्रियों से निकलती रहती है।
🚬 5. तंबाकू और धूम्रपान से प्रदूषण
भारत में हर साल करीब 26 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं।
(स्रोत: Global Adult Tobacco Survey, 2022)
एक सिगरेट से निकलने वाला धुआँ PM2.5 स्तर को 200 µg/m³ तक बढ़ा देता है —
जो WHO मानक (25 µg/m³) से 8 गुना अधिक है।
👉 यानी अगर एक व्यक्ति दिनभर धूम्रपान करता है,
तो वह अकेले में 10 से अधिक पटाखों जितना धुआँ रोज़ हवा में छोड़ता है।
🎇 तो पटाखों का वास्तविक योगदान कितना है?
CPCB और IIT Kanpur की संयुक्त रिपोर्ट (2022) के अनुसार,
दीपावली के बाद हवा की गुणवत्ता 1-2 दिन के लिए खराब होती है,
पर 72 घंटे के अंदर स्तर सामान्य हो जाता है।
प्रदूषण का 90% हिस्सा पूरे वर्ष के स्रोतों से आता है,
और दीपावली का योगदान केवल 5-7% तक ही होता है,
वह भी अस्थायी रूप से।
👉 यानी वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो
एक दिन के पटाखे पूरे साल के प्रदूषण की तुलना में नगण्य हैं।
📊 निष्कर्ष — तथ्य जो खुद बोलते हैं
स्रोत प्रदूषण योगदान अवधि
वाहन 40% 365 दिन
उद्योग 30% 365 दिन
घरेलू कचरा 15% 365 दिन
बिजली/ऊर्जा 10% 365 दिन
पटाखे (दीपावली) 5% से कम 1–2 दिन
🔅 संदेश
👉 प्रदूषण का असली कारण हमारे रोज़मर्रा के कर्म हैं,
ना कि एक दिन पटाखे ।
अगर हम पूरे साल जागरूक रहें —
साइकिल चलाएँ, पैदल चले , प्लास्टिक त्यागें, और बिजली की बचत करें —
तो हमारी जीवनशैली ही धरती को प्रदूषण मुक्त बना सकती है।
निचोड़ - बम फोड़ने की इच्छा हो तो फोड़ें किन्तु कम मात्रा में , पटाखे फोड़ने से ख़ुशी जरुर मिलती है किन्तु ये धर्म नहीं है और ना ही हमेशा हमारे त्योहारों का स्थाई हिस्सा रहा है , हवन ही हमारे त्योहारों का स्थाई हिस्सा है यदि आप और दुनियाभर के कर्म करेंगे किन्तु हवन नहीं करेंगे तो एसा करने से आपका पक्का नाश होगा इसमें कोई संदेह नहीं है
✍️ आर्यपुत्र
हर साल दीपावली आते ही “पटाखे मत फोड़ो, हवा ज़हरीली हो जाएगी” जैसी बातें चलने लगती हैं।
लेकिन क्या सच में केवल एक दिन के पटाखे हमारी हवा को बिगाड़ देते हैं?
या फिर हमारे दैनिक कर्म ही सालभर धरती को दूषित करते हैं?
आइए, साक्ष्यों के साथ जानते हैं।
🚗 1. वाहन प्रदूषण (सबसे बड़ा कारण)
भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार,
दिल्ली जैसे शहरों में हवा के कुल प्रदूषण का लगभग 40% हिस्सा वाहनों से आता है।
(स्रोत: CPCB – Central Pollution Control Board Report, 2023)
एक पेट्रोल कार सालभर में औसतन 4,000 किलोग्राम CO₂ (कार्बन डाइऑक्साइड) छोड़ती है।
(स्रोत: U.S. Environmental Protection Agency)
केवल दिल्ली में रोज़ 1 करोड़ से ज़्यादा वाहन चलते हैं।
इससे निकलने वाला धुआँ पूरे वर्ष वातावरण में घुला रहता है।
👉 तुलना करें — एक व्यक्ति अगर दीपावली पर 1 घंटे पटाखे जलाता है,
तो वह कार्बन उत्सर्जन एक कार के 15 मिनट के चलने जितना होता है।
यानी वाहन प्रदूषण सालभर पटाखों से हजारों गुना अधिक है।
🏠 2. घरों का कचरा और प्लास्टिक प्रदूषण
भारत में रोज़ लगभग 1.6 लाख टन ठोस कचरा उत्पन्न होता है।
(स्रोत: NITI Aayog, Swachh Bharat Mission Data 2023)
इनमें से करीब 60% जैव-अविघटनीय (non-biodegradable) होता है —
यानी प्लास्टिक, पॉलीथीन, थर्मोकोल, डिस्पोज़ेबल कप, बोतलें आदि।
यही प्लास्टिक जलाने या फेंकने से डायऑक्सिन और फ्यूरान जैसी विषैली गैसें निकलती हैं
जो मानव स्वास्थ्य और ओज़ोन परत दोनों के लिए खतरनाक हैं।
(स्रोत: WHO Report on Open Burning, 2022)
👉 पटाखे एक बार फूटकर खत्म हो जाते हैं,
पर प्लास्टिक सालों तक धरती और नदियों में ज़हर घोलता रहता है।
⚡️ 3. बिजली उत्पादन और ऊर्जा का दुरुपयोग
भारत में बिजली उत्पादन का लगभग 70% हिस्सा कोयले से होता है।
(स्रोत: Ministry of Power, 2024)
1 यूनिट (kWh) बिजली बनाने से लगभग 0.8 किलोग्राम CO₂ वायुमंडल में जाती है।
एक औसत भारतीय परिवार महीने में 200 यूनिट बिजली खर्च करता है,
यानी सालभर में लगभग 1.9 टन CO₂ उत्सर्जन।
👉 यह उत्सर्जन 100 पटाखों से निकलने वाले धुएँ के बराबर हर महीने होता है।
🏭 4. औद्योगिक प्रदूषण
CPCB की रिपोर्ट (2023) के अनुसार भारत के कुल वायु प्रदूषण का
लगभग 30% हिस्सा उद्योगों से आता है।
स्टील, सीमेंट, और टेक्सटाइल उद्योगों से निकलने वाली गैसों में
सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, और पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) शामिल हैं,
जो मानव फेफड़ों और पर्यावरण दोनों के लिए सबसे खतरनाक हैं।
👉 दीपावली पर कुछ घंटे में जितना PM2.5 बढ़ता है,
उससे कहीं अधिक मात्रा रोज़ाना फैक्ट्रियों से निकलती रहती है।
🚬 5. तंबाकू और धूम्रपान से प्रदूषण
भारत में हर साल करीब 26 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं।
(स्रोत: Global Adult Tobacco Survey, 2022)
एक सिगरेट से निकलने वाला धुआँ PM2.5 स्तर को 200 µg/m³ तक बढ़ा देता है —
जो WHO मानक (25 µg/m³) से 8 गुना अधिक है।
👉 यानी अगर एक व्यक्ति दिनभर धूम्रपान करता है,
तो वह अकेले में 10 से अधिक पटाखों जितना धुआँ रोज़ हवा में छोड़ता है।
🎇 तो पटाखों का वास्तविक योगदान कितना है?
CPCB और IIT Kanpur की संयुक्त रिपोर्ट (2022) के अनुसार,
दीपावली के बाद हवा की गुणवत्ता 1-2 दिन के लिए खराब होती है,
पर 72 घंटे के अंदर स्तर सामान्य हो जाता है।
प्रदूषण का 90% हिस्सा पूरे वर्ष के स्रोतों से आता है,
और दीपावली का योगदान केवल 5-7% तक ही होता है,
वह भी अस्थायी रूप से।
👉 यानी वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो
एक दिन के पटाखे पूरे साल के प्रदूषण की तुलना में नगण्य हैं।
📊 निष्कर्ष — तथ्य जो खुद बोलते हैं
स्रोत प्रदूषण योगदान अवधि
वाहन 40% 365 दिन
उद्योग 30% 365 दिन
घरेलू कचरा 15% 365 दिन
बिजली/ऊर्जा 10% 365 दिन
पटाखे (दीपावली) 5% से कम 1–2 दिन
🔅 संदेश
👉 प्रदूषण का असली कारण हमारे रोज़मर्रा के कर्म हैं,
ना कि एक दिन पटाखे ।
अगर हम पूरे साल जागरूक रहें —
साइकिल चलाएँ, पैदल चले , प्लास्टिक त्यागें, और बिजली की बचत करें —
तो हमारी जीवनशैली ही धरती को प्रदूषण मुक्त बना सकती है।
निचोड़ - बम फोड़ने की इच्छा हो तो फोड़ें किन्तु कम मात्रा में , पटाखे फोड़ने से ख़ुशी जरुर मिलती है किन्तु ये धर्म नहीं है और ना ही हमेशा हमारे त्योहारों का स्थाई हिस्सा रहा है , हवन ही हमारे त्योहारों का स्थाई हिस्सा है यदि आप और दुनियाभर के कर्म करेंगे किन्तु हवन नहीं करेंगे तो एसा करने से आपका पक्का नाश होगा इसमें कोई संदेह नहीं है
✍️ आर्यपुत्र
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🌼 शुभ दीपावली एवं ऋषि दयानंद बलिदान दिवस 🙏🚩🌼
दीपों का यह पावन पर्व हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की और अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने का संदेश देता है।
ये हमे संदेश देता है कि मौसम बदलने लगा है फसल पक चुकी है नई फसल बोने की तैयारी है , प्राचीन काल से ही हमारे त्यौहार खेती से जुड़े हैं दीपावली का संदेश है हवन करो नए अन की आहुति सर्वप्रथम अग्नि को दो , मौसम बदलने से होने वाले रोगों को अग्नि से मार भगाओ
आज ही के दिन हम महान ऋषि दयानंद सरस्वती जी के अद्वितीय बलिदान को भी स्मरण करते हैं — जिन्होंने अपने जीवन से सत्य, स्वाधीनता और वेदज्ञान की ज्योति पूरे भारत में प्रज्वलित की।
जिस प्रकार दीपक का प्रकाश अंधकार को मिटा देता है, उसी प्रकार आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद जी ने अंधविश्वास, मूर्खता और पराधीनता के अंधकार को मिटाकर समाज को जागरूक किया।
वो ऋषि दयानंद ही थे जिनकी सत्यार्थ प्रकाश पढ़ कर अनेकों युवा क्रांतिकारी बने ओर अनेकों धर्म रक्षक बने आर्यसमाज को ही ये गौरव प्राप्त है कि देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले अधिकतर क्रांतिकारी आर्यसमाजी थे और आर्यसमाज से संबंध रखते थे जेलो में बंद अधिकतर क्रांतिकारी आर्यसमाजी ही थे क्रांतिकारियों का संबंध आर्यसमाज से किसी ना किसी रूप में रहा ही है
उस काल के आर्यसमाज मंदिर ओर आर्यसमाजियों में ही वो साहस था जो क्रांतिकारियों को अपने घरों में छिपा लिया करते थे ये जानते हुए भी कि अंग्रेजो को पता चला तो उन्हें भी मार दिया जाएगा किंतु जिनके हृदय में वेद ज्योति जल रही हो उनका लहू पानी नहीं होता
इस दीपावली पर संकल्प लें —
कि हम कम से कम महीने में 1 बार हवन किया करेंगे , अपने भीतर ज्ञान का दीप जलाएँगे,
, ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे बल बढ़ाने वाले व्यायाम करेंगे और भारतभूमि को पुनः वैदिक तेज से आलोकित करेंगे।
🪔 "जय आर्यावर्त! जय वेदज्ञान!"
शुभ दीपावली एवं ऋषि दयानंद बलिदान दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌺
✍️आर्यपुत्र
दीपों का यह पावन पर्व हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की और अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने का संदेश देता है।
ये हमे संदेश देता है कि मौसम बदलने लगा है फसल पक चुकी है नई फसल बोने की तैयारी है , प्राचीन काल से ही हमारे त्यौहार खेती से जुड़े हैं दीपावली का संदेश है हवन करो नए अन की आहुति सर्वप्रथम अग्नि को दो , मौसम बदलने से होने वाले रोगों को अग्नि से मार भगाओ
आज ही के दिन हम महान ऋषि दयानंद सरस्वती जी के अद्वितीय बलिदान को भी स्मरण करते हैं — जिन्होंने अपने जीवन से सत्य, स्वाधीनता और वेदज्ञान की ज्योति पूरे भारत में प्रज्वलित की।
जिस प्रकार दीपक का प्रकाश अंधकार को मिटा देता है, उसी प्रकार आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद जी ने अंधविश्वास, मूर्खता और पराधीनता के अंधकार को मिटाकर समाज को जागरूक किया।
वो ऋषि दयानंद ही थे जिनकी सत्यार्थ प्रकाश पढ़ कर अनेकों युवा क्रांतिकारी बने ओर अनेकों धर्म रक्षक बने आर्यसमाज को ही ये गौरव प्राप्त है कि देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले अधिकतर क्रांतिकारी आर्यसमाजी थे और आर्यसमाज से संबंध रखते थे जेलो में बंद अधिकतर क्रांतिकारी आर्यसमाजी ही थे क्रांतिकारियों का संबंध आर्यसमाज से किसी ना किसी रूप में रहा ही है
उस काल के आर्यसमाज मंदिर ओर आर्यसमाजियों में ही वो साहस था जो क्रांतिकारियों को अपने घरों में छिपा लिया करते थे ये जानते हुए भी कि अंग्रेजो को पता चला तो उन्हें भी मार दिया जाएगा किंतु जिनके हृदय में वेद ज्योति जल रही हो उनका लहू पानी नहीं होता
इस दीपावली पर संकल्प लें —
कि हम कम से कम महीने में 1 बार हवन किया करेंगे , अपने भीतर ज्ञान का दीप जलाएँगे,
, ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे बल बढ़ाने वाले व्यायाम करेंगे और भारतभूमि को पुनः वैदिक तेज से आलोकित करेंगे।
🪔 "जय आर्यावर्त! जय वेदज्ञान!"
शुभ दीपावली एवं ऋषि दयानंद बलिदान दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌺
✍️आर्यपुत्र
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राजीव भाई ने 18 साल पहले ही बता दिया था कि अर्जुन की छाल हाई बीपी ठीक करती है हृदय रोग ठीक करती है फिर भी ये भारतवासी जीवन भर दवाओं के भरोसे दूसरे रोगों को शरीर में बढ़ाते रहते हैं
एक सत्य घटना का जिक्र करता हूं ध्यान से पढ़ना
एक बार एक भाई मिला उसने बताया कि वो जिस हॉस्पिटल में काम करता है उसका मालिक मुख्य डाक्टर अपना हाई बीपी ठीक रखने के लिए अर्जुन की छाल का प्रयोग करता है
इसी प्रकार एक होमियोपैथी वाले डॉक्टर ने बताया था कि उसके पास एलोपैथी वाले डॉक्टर अपने बच्चों की खांसी जुखाम ठीक करवाने आते हैं (आज खांसी ने एक अलग ही रूप ले लिया है)
इसे पढ़ कर कुछ सोचेंगे कि मैं एलोपैथी का विरोधी हूं तो बता दूं ऐसा बिल्कुल नहीं है मैं हमेशा संतुलन बनाकर रखने में विश्वास करता हूं
जब अचानक से किसी के जीवन को बचाने की बात आएगी तो उस काल के लिए मैं एलोपैथी चुनूंगा ,
जब लम्बी चलने वाली बीमारी जैसे शुगर, बीपी, ह्रदय रोग, कैंसर, लकवा, मिर्गी के दौरे, पोलियो, कुबड़ा पन, सोराइसिस या कोई भी भयंकर चरम रोग, पागलपन, भूत प्रेत बाधा (वास्तविकता कारण ऊर्जा का असंतुलन) , पथरी, सर्वाइकल, स्लिपडिस्क, पैर छोटा बड़ा, मोतियाबिंद, जन्म से गूंगा बेहरा, पीलिया, बवासीर, कोमा , रेबीज के बाद उत्पन हुए लक्षण जिसमें मृत्यु निश्चित मानी जाती है
आदि आदि समस्याओं को जड़ से दूर करने के लिए मैं सबसे पहले एक्यूप्रेशर साथ में कुछ औषधियों का चुनाव करूंगा ओर सबसे मुख्य बात मैं किसी मूर्ख की नकारात्मक बात पर चिंतन नहीं करूंगा क्योंकि मेरा मानना है कुछ असंभव नहीं बस अपना प्राण बल बढ़ाओ
✍️आर्य पुत्र
एक सत्य घटना का जिक्र करता हूं ध्यान से पढ़ना
एक बार एक भाई मिला उसने बताया कि वो जिस हॉस्पिटल में काम करता है उसका मालिक मुख्य डाक्टर अपना हाई बीपी ठीक रखने के लिए अर्जुन की छाल का प्रयोग करता है
इसी प्रकार एक होमियोपैथी वाले डॉक्टर ने बताया था कि उसके पास एलोपैथी वाले डॉक्टर अपने बच्चों की खांसी जुखाम ठीक करवाने आते हैं (आज खांसी ने एक अलग ही रूप ले लिया है)
इसे पढ़ कर कुछ सोचेंगे कि मैं एलोपैथी का विरोधी हूं तो बता दूं ऐसा बिल्कुल नहीं है मैं हमेशा संतुलन बनाकर रखने में विश्वास करता हूं
जब अचानक से किसी के जीवन को बचाने की बात आएगी तो उस काल के लिए मैं एलोपैथी चुनूंगा ,
जब लम्बी चलने वाली बीमारी जैसे शुगर, बीपी, ह्रदय रोग, कैंसर, लकवा, मिर्गी के दौरे, पोलियो, कुबड़ा पन, सोराइसिस या कोई भी भयंकर चरम रोग, पागलपन, भूत प्रेत बाधा (वास्तविकता कारण ऊर्जा का असंतुलन) , पथरी, सर्वाइकल, स्लिपडिस्क, पैर छोटा बड़ा, मोतियाबिंद, जन्म से गूंगा बेहरा, पीलिया, बवासीर, कोमा , रेबीज के बाद उत्पन हुए लक्षण जिसमें मृत्यु निश्चित मानी जाती है
आदि आदि समस्याओं को जड़ से दूर करने के लिए मैं सबसे पहले एक्यूप्रेशर साथ में कुछ औषधियों का चुनाव करूंगा ओर सबसे मुख्य बात मैं किसी मूर्ख की नकारात्मक बात पर चिंतन नहीं करूंगा क्योंकि मेरा मानना है कुछ असंभव नहीं बस अपना प्राण बल बढ़ाओ
✍️आर्य पुत्र
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भारत में हिंदुओं के कई संगठन हैं जैसे मुख्य, सबसे बड़े संगठन आर्य समाज और संघ (RSS)।
ओर आज तो सत्ता में पार्टी भी हिंदू वादी है
किंतु फिर भी यदि कोई हिंदू किसी जिहादी आतंकी का वध कर दे या फिर आतंकियों के खेमे में खलबली मचा दे तो उसका केस लड़ने वाले नहीं मिलते; या कोई गौ रक्षक अपनी जान दे दे तो सोशल मीडिया से उसके परिवार के लिए चंदा इकट्ठा करना पड़ता है। प्रत्यक्ष छोड़िए कोई संगठन अप्रत्यक्ष रूप से मदद करता नहीं दिखता।
वही दूसरी तरफ सभी संगठन दिखावे के लिए बड़े-बड़े कार्यक्रम करते हैं, करोड़ों करोड़ों रूपये खर्च कर देते हैं—यानी धन का धर्म युद्ध के लिए प्रयोग नहीं हुआ, केवल दिखावे के लिए हुआ है।
पता नहीं इतना दोगलापन लेकर कैसे जीते हैं लोग? क्या उन्होंने अपनी आत्मा की हत्या कर दी है?
खुद को ऋषि दयानंद का शिष्य बोलने वाले भी नहीं बच सके इस बीमारी से।
बड़े-बड़े कार्यक्रम तब सही लगेंगे जब हिंदू योद्धाओं के लिए केस लड़ने वाले और आर्थिक सहयोग करने वाले संगठन होंगे, वरना सब कुछ केवल और केवल बकवास है।
वही दूसरी तरफ जिहादियों के लिए देश के बड़े से बड़े वकील किए जाते हैं; उन्हें मालूम है — तुम कांड करो, तुम्हारे पीछे तुम्हारे लोगों का धन संगठन मजबूती से खड़ा है।
वही दूसरी ओर धर्म के लिए बलिदान होने वालों के लिए या इच्छा रखने वालों के पीछे कोई नहीं। इतिहास में देखिए — अपना घर जला कर बलिदानियों ने क्रांति जलाए रखी थी; हालत बहुत बुरे हैं।
2050 तक सब बदल चूका होगा उस समय अपने इसी धन को छोड़ छोड़ कर भागोगे धन पद के लोभीयों
इस छोटे से लेख को केवल ऋषि के सच्चे शिष्य ही समझ पाएंगे
✍️आर्य पुत्र
ओर आज तो सत्ता में पार्टी भी हिंदू वादी है
किंतु फिर भी यदि कोई हिंदू किसी जिहादी आतंकी का वध कर दे या फिर आतंकियों के खेमे में खलबली मचा दे तो उसका केस लड़ने वाले नहीं मिलते; या कोई गौ रक्षक अपनी जान दे दे तो सोशल मीडिया से उसके परिवार के लिए चंदा इकट्ठा करना पड़ता है। प्रत्यक्ष छोड़िए कोई संगठन अप्रत्यक्ष रूप से मदद करता नहीं दिखता।
वही दूसरी तरफ सभी संगठन दिखावे के लिए बड़े-बड़े कार्यक्रम करते हैं, करोड़ों करोड़ों रूपये खर्च कर देते हैं—यानी धन का धर्म युद्ध के लिए प्रयोग नहीं हुआ, केवल दिखावे के लिए हुआ है।
पता नहीं इतना दोगलापन लेकर कैसे जीते हैं लोग? क्या उन्होंने अपनी आत्मा की हत्या कर दी है?
खुद को ऋषि दयानंद का शिष्य बोलने वाले भी नहीं बच सके इस बीमारी से।
बड़े-बड़े कार्यक्रम तब सही लगेंगे जब हिंदू योद्धाओं के लिए केस लड़ने वाले और आर्थिक सहयोग करने वाले संगठन होंगे, वरना सब कुछ केवल और केवल बकवास है।
वही दूसरी तरफ जिहादियों के लिए देश के बड़े से बड़े वकील किए जाते हैं; उन्हें मालूम है — तुम कांड करो, तुम्हारे पीछे तुम्हारे लोगों का धन संगठन मजबूती से खड़ा है।
वही दूसरी ओर धर्म के लिए बलिदान होने वालों के लिए या इच्छा रखने वालों के पीछे कोई नहीं। इतिहास में देखिए — अपना घर जला कर बलिदानियों ने क्रांति जलाए रखी थी; हालत बहुत बुरे हैं।
2050 तक सब बदल चूका होगा उस समय अपने इसी धन को छोड़ छोड़ कर भागोगे धन पद के लोभीयों
इस छोटे से लेख को केवल ऋषि के सच्चे शिष्य ही समझ पाएंगे
✍️आर्य पुत्र
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क्या आपने कभी सुना है — किसी एक बीमारी की चिकित्सा करो और दूसरी बीमारियाँ भी ठीक होने लगें?
एक्यूप्रेशर में ऐसा होता है।
मेरे पास एक माताजी कमर दर्द की चिकित्सा करवाने आईं थी। उन्हें भयंकर दर्द था — न बैठा जाए, न खड़ा रहा जाए; केवल लेटने पर ही थोड़ी राहत मिलती थी।
मैंने उनकी समस्या के अनुसार एक्यूप्रेशर पॉइंट लगाए। लगभग एक घंटे बाद उन्हें आराम मिला और रात को वे आराम से सोईं।
अगले दिन जब उन्हें फिर से पॉइंट लगाए, तो उन्होंने बताया कि उन्हें कई सालों से दमा है। सोते समय खांसी उठती है और सांस लेने में तकलीफ रहती है — हालांकि सांस छोड़ने में कोई दिक्कत नहीं होती।
उन्होंने बताया कि कल प्वाइंट लगाने के बाद रात को सांस लेने में बिल्कुल तकलीफ नहीं हुई और खांसी भी नहीं उठी। यानी मैंने जो कमर दर्द की चिकित्सा की थी, उससे उन्हें खांसी और सांस लेने में भी राहत मिली दमे में।
तब मैंने उन्हें बताया कि कमर दर्द के लिए मैंने किडनी के प्वाइंट भी लगाए थे — जो न केवल कमर दर्द को ठीक करते हैं, बल्कि सांस लेने की समस्या में भी आराम पहुंचाते हैं।
लगातार चार दिन तक उपचार के बाद वे पूरी तरह ठीक हो गईं। फिर मैंने उन्हें कुछ पॉइंट बताए कि अब इन्हें रोज़ लगाते रहना।
क्या यह अद्भुत नहीं है?
एक्यूप्रेशर — न कोई साइड इफेक्ट, न दवा, न चीरा — केवल लाभ ही लाभ!
सबसे मुख्य बात तो यही है कि इसका कोई भी साइड इफेक्ट नहीं होता
✍️आर्यपुत्र
एक्यूप्रेशर में ऐसा होता है।
मेरे पास एक माताजी कमर दर्द की चिकित्सा करवाने आईं थी। उन्हें भयंकर दर्द था — न बैठा जाए, न खड़ा रहा जाए; केवल लेटने पर ही थोड़ी राहत मिलती थी।
मैंने उनकी समस्या के अनुसार एक्यूप्रेशर पॉइंट लगाए। लगभग एक घंटे बाद उन्हें आराम मिला और रात को वे आराम से सोईं।
अगले दिन जब उन्हें फिर से पॉइंट लगाए, तो उन्होंने बताया कि उन्हें कई सालों से दमा है। सोते समय खांसी उठती है और सांस लेने में तकलीफ रहती है — हालांकि सांस छोड़ने में कोई दिक्कत नहीं होती।
उन्होंने बताया कि कल प्वाइंट लगाने के बाद रात को सांस लेने में बिल्कुल तकलीफ नहीं हुई और खांसी भी नहीं उठी। यानी मैंने जो कमर दर्द की चिकित्सा की थी, उससे उन्हें खांसी और सांस लेने में भी राहत मिली दमे में।
तब मैंने उन्हें बताया कि कमर दर्द के लिए मैंने किडनी के प्वाइंट भी लगाए थे — जो न केवल कमर दर्द को ठीक करते हैं, बल्कि सांस लेने की समस्या में भी आराम पहुंचाते हैं।
लगातार चार दिन तक उपचार के बाद वे पूरी तरह ठीक हो गईं। फिर मैंने उन्हें कुछ पॉइंट बताए कि अब इन्हें रोज़ लगाते रहना।
क्या यह अद्भुत नहीं है?
एक्यूप्रेशर — न कोई साइड इफेक्ट, न दवा, न चीरा — केवल लाभ ही लाभ!
सबसे मुख्य बात तो यही है कि इसका कोई भी साइड इफेक्ट नहीं होता
✍️आर्यपुत्र
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🙏😔आजाद🙏😔 उनके सपनों का भारत हम कब बना पाएंगे
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