Bhagwat Geeta
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1. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

कर्मण्य-एवाधिकार ते मा फलेषु कदाचन |

मा कर्म-फल-हेतुर भूर मा ते सङ्गोऽस्तवकर्मणि || (2.47)
अर्थ:

आपको अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करने का अधिकार है, लेकिन आपको अपने कार्यों के परिणामों का कोई अधिकार नहीं है। अपने काम के फल से आसक्त न हों, और न ही निष्क्रियता की ओर प्रवृत्त हों।

यह क्यों मायने रखती है:

यह श्लोक कर्म योग के सार को समाहित करता है —निस्वार्थ कर्म। यह हमें परिणाम की अपेक्षा प्रयास पर ध्यान केंद्रित करना सिखाता है। आधुनिक जीवन में, हम अक्सर परिणामों को लेकर चिंतित रहते हैं—चाहे वह परीक्षा हो, करियर हो या रिश्ते। कृष्ण की सलाह है कि परिणामों की चिंता किए बिना ईमानदारी से काम करें, जिससे तनाव कम होता है और आंतरिक शांति प्राप्त होती है।
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥
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🙏🏻 *नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं* 🙏🏻

माता रानी हम सबको सद्बुद्धि दे, सत्कर्म के लिए प्रेरित करे, सदेव धर्म पथ पर चले, स्वस्थ रहे...

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

नव दुर्गा देवी के मंत्र-

1. शैलपुत्री- ह्रीं शिवायै नम:।

2. ब्रह्मचारिणी- ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:।

3. चन्द्रघण्टा- ऐं श्रीं शक्तयै नम:।

4. कूष्मांडा- ऐं ह्री देव्यै नम:।

5. स्कंदमाता- ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम:।

6. कात्यायनी- क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नम:।

7. कालरात्रि - क्लीं ऐं श्री कालिकायै नम:।

8. महागौरी- श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:।

9. सिद्धिदात्री - ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम:।