“Arjuna, everything comes and goes in life. Happiness and unhappiness are temporary experiences that rise from sense perception. Heat and cold, pleasure and pain will come and go. They never last forever. So, do not get attached to them.”
(Bhagavad Gita Chapter 2:14)
(Bhagavad Gita Chapter 2:14)
Arjuna, no doubt the mind is very difficult to control. However, it can be controlled by constant practice and detachment.”
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ (क्योंकि यह अलौकिक त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है, परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरंतर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं।)
मैं (कुछ) नहीं हूं ! क्योंकि मैं सब कुछ हूं ! जो सब कुछ होता है वह (कुछ) नहीं होता ! और जो (कुछ) होता है वह सब कुछ नहीं होता ! सब कुछ होने वाला केवल कुछ हो ही नहीं सकता ! अगर कोई केवल कुछ है वह सब कुछ हो नहीं सकता ! जो (कुछ) है वह कभी सुखी हो ही नहीं सकता ! हां सुखी होने का केवल भ्रम हो सकता है ! जो सब कुछ है वह कभी दुखी हो नहीं सकता ! हां दुखी होने का केवल भ्रम हो सकता है ! यो वे भुमा तत सुखम ! न अल्पम सुखम अस्ति !! अपने को भुमा जानना ही सुख (आनन्द) है ! अर्थात अपने को मैं सब कुछ (ब्रह्म) हूं जानना चाहिए ! जो कि हम हैं ! हम हैं तो सब कुछ (ब्रह्म) ! परन्तु हम अपने को जानते कुछ (मनुष्य) हैं ! जो हम हैं वही हम हैं यह हम नहीं जानते ! इस लिए हम दुखी हैं ! अगर हमें अपने जीवन में अपने को दुखी नहीं होना तो हमें हम जो हैं वह जानना चाहिए ! अर्थात हमें अपने को मैं ब्रह्म (सब कुछ) हूं जानना चाहिए !
कार्पण्य दोषोऽपहत स्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढ चेतः
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे ,
शिष्यस्तेऽहं साधि मां त्वां प्रपन्नम्’।
( गीता २/७)
अर्थ - ‘'हे भगवन! मेरा मन इस समय विकट धार्मिक कायरतादोष से आच्छादित हो चुका है। मेरी चेतना में किंकर्त्तव्यमूढ़ता छा गई है, मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरणाँगत हूँ, मुझे आप शीघ्र ही उचित सलाह दीजिए कि मैं इस बड़े धर्म संकट की विषम परिस्थिति में क्या करूं ?....😊🌹🙏
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढ चेतः
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे ,
शिष्यस्तेऽहं साधि मां त्वां प्रपन्नम्’।
( गीता २/७)
अर्थ - ‘'हे भगवन! मेरा मन इस समय विकट धार्मिक कायरतादोष से आच्छादित हो चुका है। मेरी चेतना में किंकर्त्तव्यमूढ़ता छा गई है, मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरणाँगत हूँ, मुझे आप शीघ्र ही उचित सलाह दीजिए कि मैं इस बड़े धर्म संकट की विषम परिस्थिति में क्या करूं ?....😊🌹🙏
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागा:।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये॥ ११॥
वेदवेत्तालोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं (और) (साधक) जिसकी (प्राप्तिकी) इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, वह पद (मैं) तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगा।
I shall tell you briefly about that Supreme goal (viz., God, who is an embodiment of Truth, Knowledge and Bliss), which the knowers of theVeda term as the Indestructible, which striving
recluses, free from passion, merge into, and desiringwhich the celibates practise Brahmacarya. (8:11)
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये॥ ११॥
वेदवेत्तालोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं (और) (साधक) जिसकी (प्राप्तिकी) इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, वह पद (मैं) तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगा।
I shall tell you briefly about that Supreme goal (viz., God, who is an embodiment of Truth, Knowledge and Bliss), which the knowers of theVeda term as the Indestructible, which striving
recluses, free from passion, merge into, and desiringwhich the celibates practise Brahmacarya. (8:11)
सर्वद्वारेषु देहेअस्मिन प्रकाश उपजायते ।
.
गीता के श्लोक पर टीका लिखते हुए ज्ञानेश्वर महाराज ने कहा है
कि सतोगुण का उदय होने पर वसंत ऋतु में कमल खिलने पर
उसकी सुगंध जैसे सर्वत्र फैल जाती है ,
.
वैसे ही बुद्धि तेज अंदर भर कर भी ना समा सपने के कारण
बाहर निकलने लगता है ।
.
अथवा वर्षा काल में महानदी जैसे जल से पूर्ण भर कर
दोनों किनारे चलने लगती है ।
.
उसी प्रकार बुद्धि जिस-जिस शास्त्र को स्पर्श करती है ।
उस उस पर अधिकार जमाती है ।
.
अथवा पूर्णिमा की रात को चंद्र प्रभा जिस प्रकार
आकाश में सर्वत्र फैल जाती है ।
.
उसी प्रकार सत्य गुणी पुरुष की बुद्धि संपूर्ण ज्ञान आत्मसात कर लेती है ।
.
गीता के श्लोक पर टीका लिखते हुए ज्ञानेश्वर महाराज ने कहा है
कि सतोगुण का उदय होने पर वसंत ऋतु में कमल खिलने पर
उसकी सुगंध जैसे सर्वत्र फैल जाती है ,
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वैसे ही बुद्धि तेज अंदर भर कर भी ना समा सपने के कारण
बाहर निकलने लगता है ।
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अथवा वर्षा काल में महानदी जैसे जल से पूर्ण भर कर
दोनों किनारे चलने लगती है ।
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उसी प्रकार बुद्धि जिस-जिस शास्त्र को स्पर्श करती है ।
उस उस पर अधिकार जमाती है ।
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अथवा पूर्णिमा की रात को चंद्र प्रभा जिस प्रकार
आकाश में सर्वत्र फैल जाती है ।
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उसी प्रकार सत्य गुणी पुरुष की बुद्धि संपूर्ण ज्ञान आत्मसात कर लेती है ।
यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पंडितान् उपाश्रयति।
तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनी दलं इव विस्तारिता बुद्धिः॥
जो पढ़ता है, लिखता है, देखता है, प्रश्न पूछता है, बुद्धिमानों का आश्रय लेता है, उसकी बुद्धि उसी प्रकार बढ़ती है जैसे कि सूर्य किरणों से कमल की पंखुड़ियाँ ..😊🌹🙏
तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनी दलं इव विस्तारिता बुद्धिः॥
जो पढ़ता है, लिखता है, देखता है, प्रश्न पूछता है, बुद्धिमानों का आश्रय लेता है, उसकी बुद्धि उसी प्रकार बढ़ती है जैसे कि सूर्य किरणों से कमल की पंखुड़ियाँ ..😊🌹🙏
सोपानत्कश्चाशनासनशयनाभिवादननमस्कारान् वर्जयेत् ।
बैठना, भोजन करना, सोना, गुरुजनोंका अभिवादन करना और ( अन्य श्रेष्ठ पुरुषोंको ) प्रणाम करना - ये सब कार्य जूते पहने हुए न करे ।
सप्तसागरपर्यन्तं तीर्थस्नानफलं तु यत् |
गुरुपादपयोबिन्दोः सहस्रांशेन तत्फलम् ||
सात समुद्र पर्यन्त के सर्व तीर्थों में स्नान
करने से जितना फल मिलता है वह फल
श्री गुरुदेव के चरणामृत के एक बिन्दु के फल का हजारवाँ हिस्सा हैं ..😊🌹🙏
बैठना, भोजन करना, सोना, गुरुजनोंका अभिवादन करना और ( अन्य श्रेष्ठ पुरुषोंको ) प्रणाम करना - ये सब कार्य जूते पहने हुए न करे ।
सप्तसागरपर्यन्तं तीर्थस्नानफलं तु यत् |
गुरुपादपयोबिन्दोः सहस्रांशेन तत्फलम् ||
सात समुद्र पर्यन्त के सर्व तीर्थों में स्नान
करने से जितना फल मिलता है वह फल
श्री गुरुदेव के चरणामृत के एक बिन्दु के फल का हजारवाँ हिस्सा हैं ..😊🌹🙏
अन्तःशक्ता वहिः शैवाः सभायां वैष्णवा मताः
नाना वेशधराः कौला विचरंति महीतले ।
अन्दर से शाक्त, बाहर से शैव,
सभा मध्य में वैष्णव इसी प्रकार नाना वेशधारी
"कौल" समस्त पृथ्वी में विचरण करता है
Shakta from inside, Shaiva from outside,
(By appearance or attire)
He is Vaishnav likewise in the assembly
Or in public behaviour,
Kaula roams the whole earth
in all Diffrent forms and appearance
नाना वेशधराः कौला विचरंति महीतले ।
अन्दर से शाक्त, बाहर से शैव,
सभा मध्य में वैष्णव इसी प्रकार नाना वेशधारी
"कौल" समस्त पृथ्वी में विचरण करता है
Shakta from inside, Shaiva from outside,
(By appearance or attire)
He is Vaishnav likewise in the assembly
Or in public behaviour,
Kaula roams the whole earth
in all Diffrent forms and appearance
Nobody is superior, nobody is inferior, but nobody is equal either. People are simply unique, incomparable. You're you, I am I. I've to contribute my potential to life; you've to contribute your potential to life. I've to discover my own being; you've to discover your own being...:)
जैसे पुरुष और पुरुष की शक्ति में अभेद सम्बन्ध है वैसे ही पुरुष और प्रकृतिका भी अभेद सम्बन्ध समझ लेना चाहिये।
इसीलिये ही भगवान् श्रीकृष्णजी भी प्रकृति और पुरुष को अनादि ही कहते है
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्।
प्रकृति और पुरुष - इन दोनोंको ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारोंको तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थोंको भी प्रकृतिसे उत्पन्न जान।
इसीलिये ही
सर्वं खल्वमिदं ब्रह्म
कहा जाता है।
वैसे भी एक परमात्मा के सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है।
भगवान् तत्त्वज्ञान आदि और अन्तमें कहते हैं कि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो अर्थात् मैं सम्पूर्ण जगत् को अपनी योगशक्तिके एक अंशमात्रसे धारण करके स्थित हू
इससे भी अद्वैत ही सिद्ध होता है,
लेकिन प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु।
प्रकृतिमें स्थित ही पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थोंको भोगता है और इन गुणोंका संग ही इस जीवात्माके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है
क्योंकि यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है; परन्तु जो पुरुष केवल मुझको निरन्तर भजते हैं,
सत्त्वगुणके संगसे देवयोनिमें एवं रजोगुणके संगसे मनुष्य योनिमें और तमोगुणके संगसे पशु, पक्षी आदि नीच योनियोंमें जन्म होता है
इसीलिये ही भगवान् श्रीकृष्णजी भी प्रकृति और पुरुष को अनादि ही कहते है
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्।
प्रकृति और पुरुष - इन दोनोंको ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारोंको तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थोंको भी प्रकृतिसे उत्पन्न जान।
इसीलिये ही
सर्वं खल्वमिदं ब्रह्म
कहा जाता है।
वैसे भी एक परमात्मा के सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है।
भगवान् तत्त्वज्ञान आदि और अन्तमें कहते हैं कि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो अर्थात् मैं सम्पूर्ण जगत् को अपनी योगशक्तिके एक अंशमात्रसे धारण करके स्थित हू
इससे भी अद्वैत ही सिद्ध होता है,
लेकिन प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु।
प्रकृतिमें स्थित ही पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थोंको भोगता है और इन गुणोंका संग ही इस जीवात्माके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है
क्योंकि यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है; परन्तु जो पुरुष केवल मुझको निरन्तर भजते हैं,
सत्त्वगुणके संगसे देवयोनिमें एवं रजोगुणके संगसे मनुष्य योनिमें और तमोगुणके संगसे पशु, पक्षी आदि नीच योनियोंमें जन्म होता है
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं, उन नित्य-निरन्तर मेरा चिन्तन करने वाले पुरुष का योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ।'
कोई-कोई इस श्लोक का सर्वथा सकाम और निवृत्तिपरक अर्थ करते हैं और संसार यात्रा की कुछ भी चिन्ता न कर केवल भगवान् पर निर्भर रहते हुए भजन करना ही उचित मानते हैं।
एक ईश्वर भक्त गीताभ्यासी निवृत्ति प्रिय ब्राह्मण थे। वे अर्थ को समझते हुए समस्त गीता का बार-बार पाठ करने एवं भगवान् के नामका जप तथा उनके स्वरूप का ध्यान करने में ही अपना सारा समय व्यतीत करते थे। वे एकमात्र भगवान् पर ही निर्भर थे।
जीविका की कौन कहे, वे अपने खाने-पीने की भी परवाह नहीं करते थे।
उनके माता-पिता परलोक सिधार चुके थे। वे तीन भाई थे।
तीनों ही विवाहित थे। वे सबसे बड़े थे और दो भाई छोटे थे। दोनों छोटे भाई ही पुरोहित वृत्ति के द्वारा गृहस्थी का सारा काम चलाया करते थे।
एक दिन की बात है, दोनों छोटे भाइयों ने बड़े भाई से कहा-'आप कुछ समय जीविका के लिये भी निकाला करें तो अच्छा रहे।
बड़े भाई बोले-'जब सबका भरण-पोषण करने वाले विश्वम्भर भगवान् सर्वत्र सब समय मौजूद हैं तब अपनी जीविका की चिन्ता करना तो निरा बालकपन है।
भगवान् ने गीता के नवम श्लोक में स्वयं योगक्षेम के वहन का जिम्मा लिया है..:)
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं, उन नित्य-निरन्तर मेरा चिन्तन करने वाले पुरुष का योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ।'
कोई-कोई इस श्लोक का सर्वथा सकाम और निवृत्तिपरक अर्थ करते हैं और संसार यात्रा की कुछ भी चिन्ता न कर केवल भगवान् पर निर्भर रहते हुए भजन करना ही उचित मानते हैं।
एक ईश्वर भक्त गीताभ्यासी निवृत्ति प्रिय ब्राह्मण थे। वे अर्थ को समझते हुए समस्त गीता का बार-बार पाठ करने एवं भगवान् के नामका जप तथा उनके स्वरूप का ध्यान करने में ही अपना सारा समय व्यतीत करते थे। वे एकमात्र भगवान् पर ही निर्भर थे।
जीविका की कौन कहे, वे अपने खाने-पीने की भी परवाह नहीं करते थे।
उनके माता-पिता परलोक सिधार चुके थे। वे तीन भाई थे।
तीनों ही विवाहित थे। वे सबसे बड़े थे और दो भाई छोटे थे। दोनों छोटे भाई ही पुरोहित वृत्ति के द्वारा गृहस्थी का सारा काम चलाया करते थे।
एक दिन की बात है, दोनों छोटे भाइयों ने बड़े भाई से कहा-'आप कुछ समय जीविका के लिये भी निकाला करें तो अच्छा रहे।
बड़े भाई बोले-'जब सबका भरण-पोषण करने वाले विश्वम्भर भगवान् सर्वत्र सब समय मौजूद हैं तब अपनी जीविका की चिन्ता करना तो निरा बालकपन है।
भगवान् ने गीता के नवम श्लोक में स्वयं योगक्षेम के वहन का जिम्मा लिया है..:)
यज्ञे तपसि दाने च स्थिति: सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥
यज्ञ तथा तप और दानरूप क्रिया में जो स्थिति (निष्ठा) है, वह भी ‘सत्’— ऐसे कही जाती है और उस परमात्मा के निमित्त किया जाने वाला कर्म भी ‘सत्’— ऐसा कहा जाता है..
Steadfastness in sacrifice, austerity and gift, is also called Sat, and also action in connection with these (or for the sake of the Supreme) is called Sat...😊🌹🙏
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥
यज्ञ तथा तप और दानरूप क्रिया में जो स्थिति (निष्ठा) है, वह भी ‘सत्’— ऐसे कही जाती है और उस परमात्मा के निमित्त किया जाने वाला कर्म भी ‘सत्’— ऐसा कहा जाता है..
Steadfastness in sacrifice, austerity and gift, is also called Sat, and also action in connection with these (or for the sake of the Supreme) is called Sat...😊🌹🙏
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूध्न्र्याधायात्मन: प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥ १२॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥ १३॥
(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो साधक ‘ॐ’ इस एक अक्षर ब्रह्मका (मानसिक) उच्चारण (और) मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोडक़र जाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है।
Having controlled all the senses, and firmly holding the mind in the heart, and then drawing the life-breath to the head, and thus remaining steadfast in Yogic concentration on God, he who
leaves the body and departs uttering the one Indestructible Brahma, OM, and dwelling on Me in My absolute aspect, reaches the supreme goal. (8:12-13)
मूध्न्र्याधायात्मन: प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥ १२॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥ १३॥
(इन्द्रियोंके) सम्पूर्ण द्वारोंको रोककर मनका हृदयमें निरोध करके और अपने प्राणोंको मस्तकमें स्थापित करके योगधारणामें सम्यक् प्रकारसे स्थित हुआ जो साधक ‘ॐ’ इस एक अक्षर ब्रह्मका (मानसिक) उच्चारण (और) मेरा स्मरण करता हुआ शरीरको छोडक़र जाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है।
Having controlled all the senses, and firmly holding the mind in the heart, and then drawing the life-breath to the head, and thus remaining steadfast in Yogic concentration on God, he who
leaves the body and departs uttering the one Indestructible Brahma, OM, and dwelling on Me in My absolute aspect, reaches the supreme goal. (8:12-13)
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥ १४॥
हे पृथानन्दन! अनन्य चित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य- निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें लगे हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उसको सुलभतासे प्राप्त हो जाता हूँ।
Arjuna, whosoever always and constantly thinks of Me with undivided mind, to that Yogi ever
absorbed in Me I am easily attainable. (8:14)
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥ १४॥
हे पृथानन्दन! अनन्य चित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य- निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें लगे हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उसको सुलभतासे प्राप्त हो जाता हूँ।
Arjuna, whosoever always and constantly thinks of Me with undivided mind, to that Yogi ever
absorbed in Me I am easily attainable. (8:14)
मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मान: संसिद्धिं परमां गता:॥ १५॥
महात्मालोग मुझे प्राप्त करके दु:खालय अर्थात् दु:खोंके घर (और) अशाश्वत अर्थात् निरन्तर बदलने-वाले पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होते; (क्योंकि वे) परम सिद्धिको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्रेमकी प्राप्ति हो गयी है।
Great souls, who have attained the highest perfection, having come to Me, are no more subject to rebirth, which is the abode of sorrow, and transient by nature. (8:15)
नाप्नुवन्ति महात्मान: संसिद्धिं परमां गता:॥ १५॥
महात्मालोग मुझे प्राप्त करके दु:खालय अर्थात् दु:खोंके घर (और) अशाश्वत अर्थात् निरन्तर बदलने-वाले पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होते; (क्योंकि वे) परम सिद्धिको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्रेमकी प्राप्ति हो गयी है।
Great souls, who have attained the highest perfection, having come to Me, are no more subject to rebirth, which is the abode of sorrow, and transient by nature. (8:15)
आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥ १६॥
हे अर्जुन! ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्तीवाले हैं अर्थात् वहाँ जानेपर पुन: लौटकर संसारमें आना पड़ता है; परन्तु हे कौन्तेय! मुझे प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता।
Arjuna, all the worlds from Brahmaloka (the heavenly realm of the Creator, Brahma) downwards are liable to birth and rebirth. But, O son of Kunti, on attaining Me there is no rebirth (For, while I am beyond Time, regions like Brahmaloka, being conditioned by time, are transitory). (8:16)
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥ १६॥
हे अर्जुन! ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्तीवाले हैं अर्थात् वहाँ जानेपर पुन: लौटकर संसारमें आना पड़ता है; परन्तु हे कौन्तेय! मुझे प्राप्त होनेपर पुनर्जन्म नहीं होता।
Arjuna, all the worlds from Brahmaloka (the heavenly realm of the Creator, Brahma) downwards are liable to birth and rebirth. But, O son of Kunti, on attaining Me there is no rebirth (For, while I am beyond Time, regions like Brahmaloka, being conditioned by time, are transitory). (8:16)
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदु:।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जना:॥ १७॥
जो मनुष्य ब्रह्माके एक हजार चतुर्युगीवाले एक दिनको (और) एक हजार चतुर्युगीवाली एक रात्रिको जानते हैं, वे मनुष्य ब्रह्माके दिन और रातको जानने-वाले हैं।
Those Yogis who know from realization Brahma's day as covering a thousand Mahayugas, and so his night as extending to another thousand Mahayugas know the reality about Time. (8:17)
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जना:॥ १७॥
जो मनुष्य ब्रह्माके एक हजार चतुर्युगीवाले एक दिनको (और) एक हजार चतुर्युगीवाली एक रात्रिको जानते हैं, वे मनुष्य ब्रह्माके दिन और रातको जानने-वाले हैं।
Those Yogis who know from realization Brahma's day as covering a thousand Mahayugas, and so his night as extending to another thousand Mahayugas know the reality about Time. (8:17)