UPSC NOTES
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चरखा संघ की शुरुआत 1925 से अजमेर से हुई थी , 1927 में जमनालाल बजाज ने इसे जयपुर स्थानांतरित कर दिया
1925 से 1938 तक चरखा संघ के अध्यक्ष जमनालाल बजाज रहे थे ।
मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना 24 अप्रैल 1938 को माणिक्य लाल वर्मा के द्वारा की गई थी तब बलवंत सिंह मेहता को इसका अध्यक्ष बनाया गया था लेकिन मेवाड़ के तत्कालीन
प्रधानमंत्री धर्म नारायण काक ने माणिक्य लाल वर्मा को मेवाड़ से निष्कासित कर दिया
तब माणिक्य लाल वर्मा ने अजमेर को अपना कार्य स्थल बनाया तथा यहीं रहकर मेवाड़ का वर्तमान शासन नामक पुस्तक भी लिखी थी
मेवाड़ प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन 1941 में हुआ था जिसकी अध्यक्षता माणिक्य लाल वर्मा के द्वारा की गई इस अधिवेशन में जेबी कृपलानी तथा विजय लक्ष्मी पंडित भी शामिल हुए थे
अलवर प्रजामंडल की स्थापना हरि नारायण शर्मा तथा कुंज बिहारी मोदी के द्वारा 1938 में की गई थी

अलवर प्रजामंडल का पहला अधिवेशन 1944 में भवानी शंकर शर्मा की अध्यक्षता में हुआ
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आजाद मोर्चा- 1942 में अगस्त क्रांति के दौरान जयपुर प्रजामंडल के नेता हीरालाल शास्त्री ने तत्कालीन जयपुर के प्रधानमंत्री मिर्ज़ा इस्माइल से समझौता करके जयपुर राज्य के विरुद्ध भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने का विचार छोड़ दिया तब इसके विरोध में बाबा हरिश्चंद्र के नेतृत्व में आजाद मोर्चा का गठन किया गया जिसमें प्रमुख रूप से दौलतमल भंडारी ,गुलाबचंद कासलीवाल, रामकरण जोशी तथा हंस डी राय इसके सदस्य थे
झालावाड़ रियासत में राजस्थान में सबसे अंत में प्रजामंडल की स्थापना हुई थी यहां पर 1946 में मांगीलाल भव्य, कन्हैयालाल मितल, मकबूल आलम और रतन लाल के नेतृत्व में प्रजामंडल की स्थापना हुई थी
भीलों में शिक्षा का प्रचार प्रसार करने के लिए 1934 में डूंगरपुर में माणिक्य लाल वर्मा ने खांडलाई आश्रम की स्थापना की
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15 दिसंबर 1917 को रुस और जर्मनी के बीच ब्रेस्टलिटोवस्क युद्ध विराम हो गया था

बोल्शेविको ने 3 मार्च 1918 को विदेशमंत्री ट्राटस्की के नेतृत्व में जर्मनी के साथ ब्रेस्टलिटोवस्क की सन्धि कर ली और अपने आपको प्रथम विश्व युद्ध से अलग कर लिया।
SEATO

इस संगठन की स्थापना 1954 में हुई थी

इस संगठन में कुल आठ सदस्य थे

इस संगठन का मुख्यालय बैंकाक को बनाया गया था
1960 के दशक में क्यूबा की दुनिया में धूम थी जितना भारत और श्रीलंका में फासला है वैसा ही मियामी और क्यूबा का फासला है, उस समय क्युबा को सोवियत संघ का जबरदस्त समर्थन प्राप्त था जैसे अभी अमेरिका इजरायल के लिए किसी हद तक गुजरने के लिए तैयार हो जाता है सोवियत संघ का कोई सैन्य अड्डा अमेरिका की मुख्य भूमि के आसपास नहीं था इस कारण अक्टूबर 1962 में सोवियत संघ ने ऑपरेशन अनादीर के माध्यम से बेहद गोपनीयता के साथ क्यूबा में मिसाइल तैनात कर दिए थेआनन-फानन में निकिता ख्रुश्चेव और कैनेडी के बीच हॉटलाइन स्थापित हुआ, उसी दरमियान भारत भ्रमण करने के लिए क्यूबा के विदेश मंत्री के हैसियत से चेगुएरा आया। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए फिदेल कास्त्रो को मारना चाहता था और सोवियत संघ के खुफिया एजेंसी केजीबी उसको बचा रहा था, 1962 में दुनिया स्तब्ध हो गया पता चला एक सिरफिरे युवक ने अमेरिकी राष्ट्रपति John F kanedy को गोली मार दिया और इस हत्या की गुत्थी आज तक नहीं सुलझी...
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1960 के दशक में क्यूबा की दुनिया में धूम थी जितना भारत और श्रीलंका में फासला है वैसा ही मियामी और क्यूबा का फासला है, उस समय क्युबा को सोवियत संघ का जबरदस्त समर्थन प्राप्त था जैसे अभी अमेरिका इजरायल के लिए किसी हद तक गुजरने के लिए तैयार हो जाता है सोवियत संघ का कोई सैन्य अड्डा अमेरिका की मुख्य भूमि के आसपास नहीं था इस कारण अक्टूबर 1962 में सोवियत संघ ने ऑपरेशन अनादीर के माध्यम से बेहद गोपनीयता के साथ क्यूबा में मिसाइल तैनात कर दिए थेआनन-फानन में निकिता ख्रुश्चेव और कैनेडी के बीच हॉटलाइन स्थापित हुआ, उसी दरमियान भारत भ्रमण करने के लिए क्यूबा के विदेश मंत्री के हैसियत से चेगुएरा आया। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए फिदेल कास्त्रो को मारना चाहता था और सोवियत संघ के खुफिया एजेंसी केजीबी उसको बचा रहा था, 1962 में दुनिया स्तब्ध हो गया पता चला एक सिरफिरे युवक ने अमेरिकी राष्ट्रपति John F kanedy को गोली मार दिया और इस हत्या की गुत्थी आज तक नहीं सुलझी...
वाकाटक वंश ने तीसरी शताब्दी से पांचवीं शताब्दी तक दक्षिण भारत में शासन किया था

इसका संस्थापक विध्यंशक्ति था

प्रवरसेन प्रथम ने सर्वप्रथम महाराज की उपाधि धारण की थी तथा चार अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन करवाया था

वाकाटक वंश के शासन रुद्रसे द्वितीय ने ने चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्ता से विवाह किया था


प्रवरसेन द्वितीय ने सेतुबंध नामक कृति की रचना की ।
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कभी कभी विपरित मिलन बड़ी क्रांति करवा देता है

जब 1789 में फ्रांस में क्रांति हुई थी उस समय फ्रांस का शासक लुई सोलहवां था लुई सोलहवां एक सुस्त, आलसी, निद्रा प्रिय और आत्म संतुष्ट जीव था प्रसिद्ध लेखक रॉबर्टसन का मत है कि " लुई 16 वे में अब तक मुकुट धारण करने वाले लोगों की तुलना में राजत्व के गुना का नितांत अभाव था " उसने मुकुट धारण करते हुए कहा था कि यह मुकुट मुझे चुभता है और वास्तव में वह मुकुट जीवन भर चुभता ही रहा । वह कहा करता था कि यह चीज इसलिए कानूनी है कि मैं यह चाहता हूं । मेलिशबर्स का त्यागपत्र स्वीकार करते समय उसने कहा कि तुम बड़े भाग्यशाली हो ,काश! मैं भी त्यागपत्र दे सकता ।
लुई सोलहवां कहा करता था कि ऐसे लगता है कि दुनिया मेरे ऊपर गिर रही है

इसके विपरित इसकी पत्नी मेरी मारी आंत्वानेत जो लुई सोलहवे की पत्नी थी कि बात करते हैं तो यह फ्रांसीसी क्रांति से पहले फ्रांस की आखिरी रानी थी वह ऑस्ट्रिया की राजकुमारी के रूप में पैदा हुई थी और महारानी मारिया थेरेसा और पवित्र रोमन सम्राट फ्रांसिस प्रथम की सबसे छोटी संतान थी उनका मई 1770 में 14 वर्ष की उम्र में फ्रांस की राजगद्दी के उत्तराधिकारी लुई-अगस्टे से विवाह हुआ 10 मई 1774 को, उनके पति सोलहवें लुई के रूप में सिंहासन पर बैठें और वह रानी बन गईं

लुई सोलहवा जब छोटा था तब किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि यह व्यक्ति फ्रांस का शासक बन जाएगा हालांकि वह नेक इरादों वाला सहृदय व्यक्ति था लेकिन उसमें राज कार्य के लिए अपेक्षित समझ तथा संकल्प का अभाव था इसके विपरीत आत्वानेत सोलहवें की युवा सुंदर पत्नी उसके गले में चक्की के पाट की तरह लटकी हुई थी हेजन के अनुसार "आत्वानेत चुलबुली, लावण्यमय तथा बेहद खुबसूरत थी, उसमें ऐसी बहुत सी विशेषताएं थी जो राजा में नहीं थी लेकिन वह फ्रांसीसी जनता की मन :स्थिति को समझ नहीं पाई और यही कारण था की क्रांति के समय जब जनता ने उनसे रोटी की मांग की तो उनका जवाब था कि आप लोग केक क्यों नहीं खा लेते और यही से क्रांति के ज्वाला भड़क उठी...
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