UPSC NOTES
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माषक एवं काकाणी - तांबे का सिक्का

निष्क - स्वर्ण सिक्का
संकिसा स्तम्भ पर गज की मूर्ति स्थापित है
अफगानिस्तान को दुनिया में साम्राज्यों का कब्रिस्तान कहा जाता है प्रथम आंग्ल अफगान युद्ध (1839-42) लार्ड ऑकलैंड के समय लड़ा गया था लेकिन उसमें ब्रिटेन को सफलता नहीं मिली... लार्ड लिटन के समय अग्रगामी नीति अपनाते हुए अंग्रेजों ने दोबारा अफगानिस्तान पर आक्रमण किया लेकिन सफलता नहीं मिली...1920 के दशक में अमानुल्लाह खां ने अफगानिस्तान में सुधार का प्रयास किया जिसमें महिलाओं को बुर्का पहनने की प्रथा से भी आजादी भी शामिल थी... शीत युद्ध के दौर में 1979 में मिखाइल गोर्बोचाव ने अफगानिस्तान में कम्युनिस्ट सरकार को बनाए रखना के लिए आक्रमण किया लेकिन इस युद्ध में लगभग 15 लाख लोग मारे गए तो 1988 में सोवियत सेना वापस लौट गई... लादेन के हमले के प्रसाद अमेरिका ने 2001 में डेरा डाला लेकिन बाइडेन ने बाद में इसे भी वापस यह कहते हुए बुला लिया कि जब अफगानी लोक स्वयं लड़ना नहीं चाहते तो हम क्यों मरे... हालांकि अब शीतयुद्ध का दौर वापस आना नहीं है तो अब धीरे धीरे अफगानिस्तान की प्रासंगिकता खत्म होती जाएगी और अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था कमजोर होती जाएगी...
अमरावती स्तूप की खोज 1797 ईस्वी में कर्नल मेकेंजी ने की थी

इस स्तूप का निर्माण मूल रूप से अशोक के द्वारा करवाया गया था बाद में सातवाहन शासको ने यह स्तूप बनवाया था

इस स्तूप के निर्माण में जनता का सहयोग प्रमुख था
राजस्थान में मराठों का आगमन - 1734 में सर्वप्रथम बुंदी रियासत में मराठों का आगमन हुआ था... सवाई जयसिंह ने करवड़ के जागीरदार सलीम सिंह के पुत्र दलेल सिंह को शासक बना दिया था लेकिन सवाई जयसिंह की बहन और बुद्धसिंह की पत्नी अपने पुत्र उम्मेद सिंह को शासक बनना चाहती थी और इसी कारण इन्होंने मल्हार राव होल्कर को बुंदी पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया तो मल्हार राव होल्कर ने उम्मेद सिंह को बूंदी का शासक बना दिया और यहीं से मराठों का राजस्थान में आगमन हुआ...
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दुल्हे राय ने 1137 ईस्वी में ढूंढाड़ में कच्छवाहा राजवंश की स्थापना की थी और दौसा को अपनी राजधानी बनाया ।

कोकिलदेव ने 1207 में आमेर को राजस्थानी बनाया था
मानसिंह को 1594 में बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया गया था

मानसिंह ने यहां पर टांडा के स्थान पर राजमहल को बंगाल की राजधानी बनाया
जयपुर के शासक सवाई जयसिंह ने बदन सिंह को डीग की जागीर प्रदान की तथा ब्रजराज की उपाधि प्रदान की ।

जाट विद्रोह का दमन करने के कारण मुहम्मद शाह ने सवाई जयसिंह को राज राजेश्वरी श्री राजाधिराज सवाई की उपाधि प्रदान की।
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हुरडा़ सम्मेलन- यह सम्मेलन 17 जुलाई 1734 को आयोजित हुआ था मराठों को राजस्थान से बाहर निकालने के उद्देश्य से जयपुर के शासक सवाई जयसिंह द्वारा 17 जुलाई 1734 को हुरड़ा(भीलवाड़ा) में सम्मेलन आयोजित किया गया जिसकी अध्यक्षता महाराणा जगतसिंह द्वितीय द्वारा की गई। इस सम्मेलन की योजना मूलतः संग्रामसिंह द्वितीय ने बनाई थी लेकिन यह सम्मेलन सफल नहीं हो पाया था क्योंकि तत्कालीन शासको को आपस में किसी पर भी विश्वास नहीं था
हुरड़ा सम्मेलन में भाग लेने वाले शासक‌- मेवाड़ महाराणा के जगत सिंह द्वितीय , जयपुर के सवाई जयसिंह ,मारवाड़ के अभय सिंह , नागौर के बख्त सिंह , बीकानेर के जोरावर सिंह , बूंदी के दलेल सिंह ,कोटा के दुर्जन शाल, किशनगढ़ के राज सिंह , करौली के गोपालपाल थे ।
15 मार्च 1917 को तत्कालीन जार निकोलस द्वितीय ने अपने भाई ग्रेण्ड ड्यूक माइकेल के पक्ष में राजसिंहासन त्याग दिया और इसी के साथ रोमनोव वंश का खात्मा हो गया।

इसके पश्चात प्रिस गल्वोल के नेतृत्व में सरकार का गठन किया गया ।

केरेंसकी - न्यायमंत्री

गुश्काव - युद्ध मंत्री

मिल्युकाव - विदेश मंत्री

टेरेन्वको - वित मंत्री
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लोकार्नो संधि 1925 में जर्मनी और फ्रांस के मध्य हुई थी।

1926 में जर्मनी को राष्ट्र संघ का सदस्य बनाया गया

1933 में हिटलर ने राष्ट्र संघ का परित्याग कर दिया।
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जर्मनी के जेना विश्वविद्यालय के विधार्थियों ने 1815 ईस्वी में बर्शेनशेफ्ट नामक संगठन की स्थापना की थी ।

जर्मनी में बढ़ रही राष्ट्रवादी भावनाओं को कुचलने के लिए मेटरनिख ने 1819 में कार्लसबाद के आदेश जारी किए थे ।

1819 में जालवरीन या सीमा शुल्क संगठन की शुरुआत हुई थी जिसके अंतर्गत संघ की सदस्य वस्तुओं के स्वतंत्र व्यापार करेंगे तथा एक दूसरे के समान पर चुंगी नहीं लेने का प्रावधान किया गया ।
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तुर्की सुल्ताना की कोठी फतेहपुर सीकरी में है जिसे पर्सी ब्राउन ने स्थापत्य कला का मोती कहा है
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