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🍁मुगल तोपखाना🍁
मुगल तोपखाना जिंसी एवं दस्ती में
विभाजित था।
जिंसी (भारी तोप):—
गाजी खां, शेर दहाड़, फतेह लश्कर, जहांकुशा
दस्ती (हल्की तोप):—
गजनाल :— हाथी पर रखकर प्रयोग
नरनाल :— मनुष्य की पीठ पर प्रयोग
शूतरनाल :— ऊंट पर रखकर प्रयोग
अर्राब :— पहिए पर चलने वाली
मुगल तोपखाना जिंसी एवं दस्ती में
विभाजित था।
जिंसी (भारी तोप):—
गाजी खां, शेर दहाड़, फतेह लश्कर, जहांकुशा
दस्ती (हल्की तोप):—
गजनाल :— हाथी पर रखकर प्रयोग
नरनाल :— मनुष्य की पीठ पर प्रयोग
शूतरनाल :— ऊंट पर रखकर प्रयोग
अर्राब :— पहिए पर चलने वाली
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नस्क प्रणाली
औरंगजेब ने अपने शासनकाल में भू राजस्व की नस्क प्रणाली को अपनाया, जिसमें भू-राजस्व की राशि को उपज का आधा कर दिया गया, नस्क प्रणाली भू- लगान निर्धारित करने की एक विधि थी।
औरंगजेब ने अपने शासनकाल में भू राजस्व की नस्क प्रणाली को अपनाया, जिसमें भू-राजस्व की राशि को उपज का आधा कर दिया गया, नस्क प्रणाली भू- लगान निर्धारित करने की एक विधि थी।
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गुप्त काल
⚜सेना का सर्वोच्च अधिकारी महाबल अधिकृत कहलाता था।
⚜ गज सेना का प्रधान महापीलुपति तथा अश्वसेना का प्रधान भट्टा पशुपति कहलाता था।
⚜ पैदल सेना की टुकड़ी को जमुय तथा साधारण सैनिक को चाट का जाता था।
⚜ सेना के साजो सामान की देख रेख करने वाला अधिकारी रण भंडारगारिक कहलाता था।
⚜ रथों का महत्व समाप्त हो गया व घोड़ों का महत्व बढ़ा।
⚜सेना का सर्वोच्च अधिकारी महाबल अधिकृत कहलाता था।
⚜ गज सेना का प्रधान महापीलुपति तथा अश्वसेना का प्रधान भट्टा पशुपति कहलाता था।
⚜ पैदल सेना की टुकड़ी को जमुय तथा साधारण सैनिक को चाट का जाता था।
⚜ सेना के साजो सामान की देख रेख करने वाला अधिकारी रण भंडारगारिक कहलाता था।
⚜ रथों का महत्व समाप्त हो गया व घोड़ों का महत्व बढ़ा।
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गुप्तकालीन प्रसिद्ध मंत्री –
☀ वीरसेन – चंद्रगुप्त द्वितीय का संधिविग्रहक
☀ पृथ्वीसेन – कुमारगुप्त का प्रथम का मंत्री
☀ हरिषेण – समुद्रगुप्त का संधिविग्रहक
☀ शिखर स्वामि – चंद्रगुप्त द्वितीय मंत्री
☀ आम्रकाद्दर्व – चन्द्र गुप्त द्वितीय का सेनापति।
☀ वीरसेन – चंद्रगुप्त द्वितीय का संधिविग्रहक
☀ पृथ्वीसेन – कुमारगुप्त का प्रथम का मंत्री
☀ हरिषेण – समुद्रगुप्त का संधिविग्रहक
☀ शिखर स्वामि – चंद्रगुप्त द्वितीय मंत्री
☀ आम्रकाद्दर्व – चन्द्र गुप्त द्वितीय का सेनापति।
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हर तरफ से प्रशंसा की बौछार होने लगी। रॉबर्ट क्लाइव की कहानी मशहूर होने लगी।
अरकोट की रक्षा ने दक्षिण भारत के मूल निवासियों के मन पर गहरा प्रभाव डाला। वे अब तक अंग्रेजों के प्रति बहुत कम सम्मान रखते थे और सैन्य क्षमता में फ्रांसीसियों को अपने से कहीं अधिक श्रेष्ठ मानते थे; लेकिन इस घटना के बाद, मूल निवासियों की राय पूरी तरह बदल गई, और अरकोट की रक्षा को अंग्रेजों के पूर्वी क्षेत्र में एक निर्णायक मोड़ माना जा सकता है, मैलिसन लिखते हैं।
जेम्स मिल लिखते हैं:
किले की परिधि एक मील से अधिक थी, दीवारें कई जगहों पर जर्जर थीं, मीनारें असुविधाजनक और जीर्ण-शीर्ण थीं, और रक्षा के लिए हर संभव साधन का उपयोग करते हुए, येर केव ने प्रभावी प्रतिरोध करने का तरीका खोज निकाला। जब दुश्मन ने पचास और नब्बे फीट की दो दरारों पर मोर्चा बनाने का प्रयास किया, तो उसने अपने अस्सी यूरोपीय सैनिकों और डेढ़ सौ सैनिकों के साथ उन्हें खदेड़ दिया। उसने अपने संसाधनों का इतना प्रभावी ढंग से उपयोग किया और अपने अधीन सैनिकों का मनोबल इतना ऊंचा कर दिया था।
इसके बाद क्लाइव का करियर पूरी तरह बदल गया। मुरारिराव ने शायद यह भी उम्मीद की होगी कि उन्हें रॉबर्ट क्लाइव जैसे तेज दिमाग वाले प्रतिभाशाली योद्धा के साथ आगे लड़ने का मौका मिलेगा। यह समझना मुश्किल है कि रणनीतिक, आत्मनिर्भर और एक साथ लड़ने में माहिर मुरारिराव घोरपड़े और रॉबर्ट क्लाइव जैसे अवसरवादी योद्धा इस बड़ी जीत के बाद आगे सहयोग करने के लिए क्यों सहमत नहीं हुए।
आइए रॉबर्ट क्लाइव की उस समय की उम्र पर विचार करें। वह छब्बीस वर्ष के थे। और मुरारिराव उस समय सैंतालीस वर्ष के रहे होंगे। क्या यह उम्र का अंतर हो सकता है?
उनके स्वभाव के बारे में क्या? 'क्ले ड्रीम बिफोर प्लासी' नामक एक आधुनिक कविता में, क्लाइव को इस प्रकार संबोधित किया गया है:
हिंसक और दुष्ट होते हुए भी, तुम यहोवा के सेवक हो, और तुम्हारे लिए स्वप्न भी उसकी इच्छा का दूत हो सकता है।
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अरकोट की रक्षा ने दक्षिण भारत के मूल निवासियों के मन पर गहरा प्रभाव डाला। वे अब तक अंग्रेजों के प्रति बहुत कम सम्मान रखते थे और सैन्य क्षमता में फ्रांसीसियों को अपने से कहीं अधिक श्रेष्ठ मानते थे; लेकिन इस घटना के बाद, मूल निवासियों की राय पूरी तरह बदल गई, और अरकोट की रक्षा को अंग्रेजों के पूर्वी क्षेत्र में एक निर्णायक मोड़ माना जा सकता है, मैलिसन लिखते हैं।
जेम्स मिल लिखते हैं:
किले की परिधि एक मील से अधिक थी, दीवारें कई जगहों पर जर्जर थीं, मीनारें असुविधाजनक और जीर्ण-शीर्ण थीं, और रक्षा के लिए हर संभव साधन का उपयोग करते हुए, येर केव ने प्रभावी प्रतिरोध करने का तरीका खोज निकाला। जब दुश्मन ने पचास और नब्बे फीट की दो दरारों पर मोर्चा बनाने का प्रयास किया, तो उसने अपने अस्सी यूरोपीय सैनिकों और डेढ़ सौ सैनिकों के साथ उन्हें खदेड़ दिया। उसने अपने संसाधनों का इतना प्रभावी ढंग से उपयोग किया और अपने अधीन सैनिकों का मनोबल इतना ऊंचा कर दिया था।
इसके बाद क्लाइव का करियर पूरी तरह बदल गया। मुरारिराव ने शायद यह भी उम्मीद की होगी कि उन्हें रॉबर्ट क्लाइव जैसे तेज दिमाग वाले प्रतिभाशाली योद्धा के साथ आगे लड़ने का मौका मिलेगा। यह समझना मुश्किल है कि रणनीतिक, आत्मनिर्भर और एक साथ लड़ने में माहिर मुरारिराव घोरपड़े और रॉबर्ट क्लाइव जैसे अवसरवादी योद्धा इस बड़ी जीत के बाद आगे सहयोग करने के लिए क्यों सहमत नहीं हुए।
आइए रॉबर्ट क्लाइव की उस समय की उम्र पर विचार करें। वह छब्बीस वर्ष के थे। और मुरारिराव उस समय सैंतालीस वर्ष के रहे होंगे। क्या यह उम्र का अंतर हो सकता है?
उनके स्वभाव के बारे में क्या? 'क्ले ड्रीम बिफोर प्लासी' नामक एक आधुनिक कविता में, क्लाइव को इस प्रकार संबोधित किया गया है:
हिंसक और दुष्ट होते हुए भी, तुम यहोवा के सेवक हो, और तुम्हारे लिए स्वप्न भी उसकी इच्छा का दूत हो सकता है।
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गुप्तकालीन अधिकारी –
☀ प्रतिहार – अंतपुर का रक्षक
☀महाप्रतिहार – राजमहल का प्रधान सुरक्षा अधिकारी
☀ महाबला अधिकृत – सेना का सर्वोच्च अधिकारी
☀ महा दंडनायक – मुख्य न्यायाधीश
☀महासंधिविग्रहिक – युद्ध व शांति का अधिकारी ,विदेशमंत्री
☀ पुस्तकाल – भूमि का लेखा जोखा रखने वाला अधिकारी
☀ दंडपाशिक – एक पुलिस अधिकारी
☀ विनयस्थितिस्थापक – धार्मिक मामलों का अधिकारी
☀ महाअक्षपटलिक – आय-व्यय का लेखा जोखा रखने वाला अधिकारी
☀ शौल्किक – सीमा शुल्क विभाग का प्रधान
☀ गोल्मिक – वन अधिकारी
☀ ध्रुवाधिकरणिक – राजस्व एकत्रित करने वाला अधिकारी
☀ अमात्य – नौकरशाह
☀ कुमार अमात्य – सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी
☀ पुरपाल – नगर का मुख्य अधिकारी
☀ महाभंडाराधिकृत – राजकीय कोष का प्रधान
☀अग्रहारिक – दान विभाग का प्रधान
☀ रणभंडागारिक – सेना के सम्मान की व्यवस्था कर रखने वाला पदाधिकारी
☀ करणिक – लिपिक
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☀ महा दंडनायक – मुख्य न्यायाधीश
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☀ पुस्तकाल – भूमि का लेखा जोखा रखने वाला अधिकारी
☀ दंडपाशिक – एक पुलिस अधिकारी
☀ विनयस्थितिस्थापक – धार्मिक मामलों का अधिकारी
☀ महाअक्षपटलिक – आय-व्यय का लेखा जोखा रखने वाला अधिकारी
☀ शौल्किक – सीमा शुल्क विभाग का प्रधान
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राजेन्द्र प्रथम
राजेन्द्र प्रथम अपने पिता राजराज प्रथम के मृत्यु के बाद शासक बना।
चोल सम्राज्य (chola empire) का सर्वाधिक विस्तार राजेन्द्र प्रथम के शासनकाल में हुआ है।
राजेन्द्र प्रथम ने श्रीलंका के शासक महेंद्र पंचम को युद्ध में पराजित करके बंदी बना लिया तथा संपूर्ण श्रीलंको अपने राज्य में मिला लिया।
बंगाल के पाल शासक महिपाल को पराजित करने के बाद राजेन्द्र प्रथम ने गंगैकोण्डचोल की उपाधि धारण की।
और नवीन राजधानी गंगैकोण्ड चोलपुरम के निकट चोलगंगम नामक विशाल तालाब का निर्माण करवाया।
गजनी का सुल्तान महमूद राजेन्द्र प्रथम का समकालीन था।
शैव संत इसानशिव पंडित राजेन्द्र प्रथम के गुरु थे।
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राजेन्द्र प्रथम अपने पिता राजराज प्रथम के मृत्यु के बाद शासक बना।
चोल सम्राज्य (chola empire) का सर्वाधिक विस्तार राजेन्द्र प्रथम के शासनकाल में हुआ है।
राजेन्द्र प्रथम ने श्रीलंका के शासक महेंद्र पंचम को युद्ध में पराजित करके बंदी बना लिया तथा संपूर्ण श्रीलंको अपने राज्य में मिला लिया।
बंगाल के पाल शासक महिपाल को पराजित करने के बाद राजेन्द्र प्रथम ने गंगैकोण्डचोल की उपाधि धारण की।
और नवीन राजधानी गंगैकोण्ड चोलपुरम के निकट चोलगंगम नामक विशाल तालाब का निर्माण करवाया।
गजनी का सुल्तान महमूद राजेन्द्र प्रथम का समकालीन था।
शैव संत इसानशिव पंडित राजेन्द्र प्रथम के गुरु थे।
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विजयालय –
चोल वंश के संस्थापक विजयालय थे।
इसकी राजधानी तांजाय (तंजौर या तंजावूर) था।
तंजावूर का वास्तुकार कुंजरमल्लन राजराज पेरुथच्चन था।
विजयालय ने नरकेसरी की उपाधि धारण की।
विजयालय ने निशुम्भसूदिनी देवी का मंदिर बनवाया।
चोलेश्वर नामक एक भव्य मंदिर का निर्माण भी विजयालय ने ही करवाया था।
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चोल वंश के संस्थापक विजयालय थे।
इसकी राजधानी तांजाय (तंजौर या तंजावूर) था।
तंजावूर का वास्तुकार कुंजरमल्लन राजराज पेरुथच्चन था।
विजयालय ने नरकेसरी की उपाधि धारण की।
विजयालय ने निशुम्भसूदिनी देवी का मंदिर बनवाया।
चोलेश्वर नामक एक भव्य मंदिर का निर्माण भी विजयालय ने ही करवाया था।
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आधुनिक भारत में अकाल आयोग/समितियां –
स्मिथ समिति — 1860- 61
कैंपबेल आयोग —1866- 67
स्ट्रैची आयोग — 1878- 80
लॉयल आयोग — 1897
मैकडॉनल्ड आयोग -1900
वुड्हेड आयोग— 1945
#Facts 👆
#PYQ
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स्मिथ समिति — 1860- 61
कैंपबेल आयोग —1866- 67
स्ट्रैची आयोग — 1878- 80
लॉयल आयोग — 1897
मैकडॉनल्ड आयोग -1900
वुड्हेड आयोग— 1945
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1947 की प्रमुख टाइमलाइन –
•• 20 Feb,1947 को एटली की घोषणा–
•• जून,1948 तक अंग्रेज भारत छोड़ देंगे।
•• 3 जून,1947 को माउंटबेटन योजना प्रस्तुत की गई।
•• 4 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद में "भारतीय स्वतंत्रता अधि०" प्रस्तुत किया गया।
•• 18 जुलाई को इस अधि० को राजकीय स्वीकृति मिली।
•• अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतन्त्रता मिली।
Note...
०बाल्कन प्लान का संबंध "लॉर्ड माउंटबेटन" से था।
०लॉर्ड माउंटबेटन" भारत के अंतिम वायसराय तथा स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल थे।
०सी राजगोपालाचारी" स्वतंत्र भारत के अंतिम तथा भारत के पहले व अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल थे।
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•• 20 Feb,1947 को एटली की घोषणा–
•• जून,1948 तक अंग्रेज भारत छोड़ देंगे।
•• 3 जून,1947 को माउंटबेटन योजना प्रस्तुत की गई।
•• 4 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद में "भारतीय स्वतंत्रता अधि०" प्रस्तुत किया गया।
•• 18 जुलाई को इस अधि० को राजकीय स्वीकृति मिली।
•• अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतन्त्रता मिली।
Note...
०बाल्कन प्लान का संबंध "लॉर्ड माउंटबेटन" से था।
०लॉर्ड माउंटबेटन" भारत के अंतिम वायसराय तथा स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल थे।
०सी राजगोपालाचारी" स्वतंत्र भारत के अंतिम तथा भारत के पहले व अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल थे।
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7 Saal ka sangharsh, mehnat, failures…
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⬜️ बादामी के चालुक्य (प्रारंभिक पश्चिमी चालुक्य)
यह मूल शाखा थी जिसने 6ठी से 8वीं शताब्दी तक शासन किया।
पुलकेशिन प्रथम (543–566 ई.): वास्तविक संस्थापक जिसने वातापी (बादामी) को अपनी राजधानी बनाया।
कीर्तिवर्मन प्रथम (566–597 ई.): इसने साम्राज्य का विस्तार कोंकण और तटीय क्षेत्रों तक किया।
मंगलेश (597–609 ई.): कीर्तिवर्मन का भाई, जिसने कार्यवाहक शासक के रूप में शासन किया।
पुलकेशिन द्वितीय (609–642 ई.): इस वंश का सबसे प्रतापी राजा। इसने उत्तर भारतीय सम्राट हर्षवर्द्धन को नर्मदा के तट पर हराया था।
विक्रमादित्य प्रथम (655–680 ई.): पल्लवों के कब्जे से बादामी को वापस छुड़ाया।
विनयादित्य (680–696 ई.)
विजयादित्य (696–733 ई.): सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला राजा।
विक्रमादित्य द्वितीय (733–744 ई.): इसने पल्लवों की राजधानी कांची पर अधिकार किया था।
कीर्तिवर्मन द्वितीय (744–753 ई.): बादामी शाखा का अंतिम शासक। इसे राष्ट्रकूट शासक दंतिदुर्ग ने पराजित किया था।
⬜️. कल्याणी के चालुक्य (परवर्ती पश्चिमी चालुक्य)
इस वंश ने 10वीं शताब्दी में राष्ट्रकूटों के पतन के बाद खुद को स्थापित किया।
तैलप द्वितीय (973–997 ई.): राष्ट्रकूटों को हराकर कल्याणी के चालुक्य वंश की स्थापना की।
सत्याश्रय (997–1008 ई.)
जयसिंह द्वितीय (1015–1044 ई.)
सोमेश्वर प्रथम (1042–1068 ई.): इसने राजधानी मान्यखेत से कल्याणी स्थानांतरित की।
विक्रमादित्य षष्ठ (1076–1126 ई.): इस शाखा का सबसे शक्तिशाली शासक। इसके दरबार में विल्हण (विक्रमांकदेवचरित के लेखक) और विज्ञानेश्वर (मिताक्षरा के लेखक) रहते थे।
सोमेश्वर तृतीय (1126–1138 ई.): एक विद्वान राजा जिसने 'मानसोल्लास' ग्रंथ की रचना की।
सोमेश्वर चतुर्थ (1184–1200 ई.): इस वंश का अंतिम महत्वपूर्ण शासक।
3. वेंगी के चालुक्य (पूर्वी चालुक्य)
पुलकेशिन द्वितीय के भाई कुब्ज विष्णुवर्द्धन ने इस शाखा की स्थापना आंध्र प्रदेश में की थी।
कुब्ज विष्णुवर्द्धन (624–641 ई.): संस्थापक।
जयसिंह प्रथम (641–673 ई.)
विजयादित्य तृतीय (849–892 ई.): इस शाखा का सबसे प्रतापी राजा।
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यह मूल शाखा थी जिसने 6ठी से 8वीं शताब्दी तक शासन किया।
पुलकेशिन प्रथम (543–566 ई.): वास्तविक संस्थापक जिसने वातापी (बादामी) को अपनी राजधानी बनाया।
कीर्तिवर्मन प्रथम (566–597 ई.): इसने साम्राज्य का विस्तार कोंकण और तटीय क्षेत्रों तक किया।
मंगलेश (597–609 ई.): कीर्तिवर्मन का भाई, जिसने कार्यवाहक शासक के रूप में शासन किया।
पुलकेशिन द्वितीय (609–642 ई.): इस वंश का सबसे प्रतापी राजा। इसने उत्तर भारतीय सम्राट हर्षवर्द्धन को नर्मदा के तट पर हराया था।
विक्रमादित्य प्रथम (655–680 ई.): पल्लवों के कब्जे से बादामी को वापस छुड़ाया।
विनयादित्य (680–696 ई.)
विजयादित्य (696–733 ई.): सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला राजा।
विक्रमादित्य द्वितीय (733–744 ई.): इसने पल्लवों की राजधानी कांची पर अधिकार किया था।
कीर्तिवर्मन द्वितीय (744–753 ई.): बादामी शाखा का अंतिम शासक। इसे राष्ट्रकूट शासक दंतिदुर्ग ने पराजित किया था।
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इस वंश ने 10वीं शताब्दी में राष्ट्रकूटों के पतन के बाद खुद को स्थापित किया।
तैलप द्वितीय (973–997 ई.): राष्ट्रकूटों को हराकर कल्याणी के चालुक्य वंश की स्थापना की।
सत्याश्रय (997–1008 ई.)
जयसिंह द्वितीय (1015–1044 ई.)
सोमेश्वर प्रथम (1042–1068 ई.): इसने राजधानी मान्यखेत से कल्याणी स्थानांतरित की।
विक्रमादित्य षष्ठ (1076–1126 ई.): इस शाखा का सबसे शक्तिशाली शासक। इसके दरबार में विल्हण (विक्रमांकदेवचरित के लेखक) और विज्ञानेश्वर (मिताक्षरा के लेखक) रहते थे।
सोमेश्वर तृतीय (1126–1138 ई.): एक विद्वान राजा जिसने 'मानसोल्लास' ग्रंथ की रचना की।
सोमेश्वर चतुर्थ (1184–1200 ई.): इस वंश का अंतिम महत्वपूर्ण शासक।
3. वेंगी के चालुक्य (पूर्वी चालुक्य)
पुलकेशिन द्वितीय के भाई कुब्ज विष्णुवर्द्धन ने इस शाखा की स्थापना आंध्र प्रदेश में की थी।
कुब्ज विष्णुवर्द्धन (624–641 ई.): संस्थापक।
जयसिंह प्रथम (641–673 ई.)
विजयादित्य तृतीय (849–892 ई.): इस शाखा का सबसे प्रतापी राजा।
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