UPSC NOTES
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उच्च शिक्षाः लड़कियाँ



कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास विश्वविद्यालयों में 1875 तक लड़कियों को प्रवेश की अनुमति नहीं थी। 1882 के बाद लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए जाने की अनुमति दी गई।
ब्रिटिश काल :भारत का सबसे पहला बजट



ब्रिटिश काल (आधिकारिक तौर पर पहली बार): भारत का सबसे पहला बजट 7 अप्रैल 1860 को स्कॉटिश अर्थशास्त्री और राजनीतिज्ञ जेम्स विल्सन (James Wilson) ने पेश किया था। उन्हें 'भारतीय बजट का जनक' भी माना जाता है। विल्सन को 1857 के विद्रोह के बाद भारत की चरमराई आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए भेजा गया था।
ब्रह्म समाज के विभाजन



पहला विभाजन (1866 ई.)


किसके बीच:

आद‍ि ब्रह्म समाज (देवेन्द्रनाथ टैगोर)

ब्रह्म समाज ऑफ इंडिया (केशव चंद्र सेन)


कारण: विचारधारात्मक मतभेद, विशेषकर ईसाई प्रभाव और संगठनात्मक नेतृत्व को लेकर।


दूसरा विभाजन (1878 ई.)



परिणाम: साधारण ब्रह्म समाज की स्थापना
कारण: केशव चंद्र सेन की रूढ़िवादी नीतियाँ, विशेषकर उनकी बेटी का कम उम्र में विवाह (बाल विवाह का समर्थन)।
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मशहूर लोग और INC पर उनकी राय

लॉर्ड डफरिन (1884-88)

➖INC सिर्फ़ बहुत छोटे अल्पसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है

अरविंद घोष ➖

INC एक भीख मांगने वाली संस्था है

बाल गंगाधर तिलक ➖

INC को भीख मांगने और अधिकार मांगने के बीच फ़र्क समझना चाहिए

बिपिन चंद्र पाल ➖

INC बुलबुलों से खेल रही है

लाला लाजपत राय ➖

पढ़े-लिखे भारतीयों का सालाना राष्ट्रीय त्योहार
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तोषामारू कांड (Toshamaru Scandal)


तोषामारू एक जहाज था, जिस पर गदर पार्टी के कुछ सदस्य लौट रहे थे, जहाज सिंगापुर रुका जहाँ क्रांतिकारी परमानंद के भाषण से अनेक भारतीय सैनिकों में क्रांतिकारी भावना जागृत हुई। सिंगापुर लाइट इंफैन्ट्री के जवानों ने जमादार चिश्ती खाँ एवं डुंडे खाँ के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। इसे सिंगापुर क्रांति के नाम से भी जाना जाता है।




सिल्क पेपर षड्यंत्र (Silk Paper Scandal)


हिजरत आंदोलन से जुड़े नेताओं द्वारा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अफगानिस्तान एवं तुर्किस्तान में खुदाई सेना की स्थापना की गई थी। इसी सेना से जुड़े मौलवी उबैदुल्लाह सिंधी द्वारा कुछ गुप्त पत्र पौली सिल्क पर फारसी भाषा में लिखकर महमूद हसन को दिये गए थे, जो बाद में ब्रिटिशों के हाथ लग गए। इस घटना को सिल्क पेपर षड्यंत्र के नाम से जाना जाता है।
मद्रास नेटिव एसोसिएशन (Madras Native Association)




इस संस्था ने 1857 के विद्रोह की भरसक निंदा की,




परंतु व्यापक जन समर्थन के अभाव में संस्था शीघ्र ही समाप्त हो गई।
'भारतीय सिविल सेवा प्रदर्शन'




भारतीय सिविल सेवा में प्रवेश की न्यूनतम आयु कम किये जाने के विरोध में इंडियन एसोसिएशन द्वारा अखिल भारतीय प्रदर्शन किया गया। इस घटना को ही 'भारतीय सिविल सेवा प्रदर्शन' के रूप में जाना जाता है।
इंग्लैंड इमिग्रेशन एक्ट'




1859 का अंतर्देशीय उत्प्रवास अधिनियम ब्रिटिश भारत में औपनिवेशिक सरकार द्वारा पारित किया गया था।
1859 के अंतर्देशीय उत्प्रवास अधिनियम के तहत, बागान श्रमिकों को बिना अनुमति के चाय बागानों को छोड़ने की अनुमति नहीं थी , और उन्हें शायद ही कभी ऐसी अनुमति दी जाती थी।
इससे श्रमिक प्रभावी रूप से चाय बागानों से ही बंधे रहे।


1859 के अंतर्देशीय उत्प्रवास अधिनियम ने असम में बागान श्रमिकों की आवाजाही की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से प्रतिबंधित कर दिया।
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तड़ित चालक का सिद्धांत (Principle of Lightering Thunder)




इस सिद्धांत का उद्भव सुरक्षा कपाट की अवधारणा के विपरीत हुआ। गोपाल कृष्ण गोखले के दस्तावेजों को इस सिद्धांत का आधार बनाया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार, भारतीय बुद्धिजीवियों ने ह्यूम का उपयोग भारतीय हितों के लिये किया। ध्यातव्य है कि ब्रिटिश सरकार कांग्रेस जैसी अखिल भारतीय संस्था की स्थापना को संदेह की दृष्टि से देखती थी, किंतु एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी के इस संस्था से जुड़ने के फलस्वरूप यह सरकारी कोपभाजन का शिकार होने से (प्रारंभिक अवस्था में) बच गई। इसी संदर्भ में प्रसिद्ध इतिहासकार
विपिन चंद्र के शब्दों में,

अगर ह्यूम और दूसरे अंग्रेज़ उदारवादियों ने कांग्रेस का इस्तेमाल 'सुरक्षा वॉल्व' के तौर पर करना भी चाहा हो तो कांग्रेस के नेताओं ने उनका साथ इस आशा से दिया था कि ये लोग कांग्रेस के लिये 'तड़ित चालक' जैसा काम करेंगे और आंदोलन पर गिरने वाली सरकारी दमन की बिजली से बचा सकेंगे। जैसा कि बाद में हालात गवाह है, इस मामले में कांग्रेस के नेताओं का अंदाज और उम्मीदें सही निकली।
बंगाल विभाजन :गौण कारण,वास्तविक कारणऔर उद्देश्य





गौण कारण-

प्रशासनिक पुर्नव्यवस्थापन।

वास्तविक कारण- राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करना।

उद्देश्य - बंगाल में बंगालियों को अल्पसंख्यक बनाना, धार्मिक विभाजन करना।
अविभाजित बंगाल एक महाशक्ति है




लंदन में कर्जन ने बंगाल विभाजन के राजनीतिक उद्देश्यों की चर्चा करते हुए अपने अधिकारियों से कहा था कि "मैं विभाजन द्वारा विरोधियों के संगठित समूह को तोड़ना चाहता हूँ। अविभाजित बंगाल एक महाशक्ति है, जिसे विभाजन द्वारा खंडित कर दिया जाएगा।"
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पिछले 50 से 100 वर्षों के दौरान हम जो हासिल नहीं कर सकें, वह हमने छह महीनों में ही हासिल कर लिया है।






बारीसाल सम्मेलन (1906 ई.) के अध्यक्ष एस. अब्दुल रसूल ने स्वदेशी आंदोलन के सम्बंध में कहा था कि "पिछले 50 से 100 वर्षों के दौरान हम जो हासिल नहीं कर सकें, वह हमने छह महीनों में ही हासिल कर लिया है। हमें यहाँ तक पहुँचाया है, बंगाल विभाजन ने। विभाजन जैसी शर्मनाक घटना ने महान राष्ट्रीय आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन को जन्म दिया है।"
और विकास की दिशा में कार्य करना था। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों ने न तो पूंजीवाद का समर्थन किया, न ही साम्यवाद का, बल्कि अपने देशों के विकास के लिए एक स्वतंत्र और तटस्थ कूटनीति अपनाई।

यह आंदोलन मुख्य रूप से एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों को एक मंच पर लाया। गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने शीत युद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियों के बीच तनाव को कम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और वैश्विक स्तर पर स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र की पहल को बढ़ावा दिया। हालांकि, शीत युद्ध के अंत के बाद इस आंदोलन का प्रभाव कुछ कम हुआ, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मंच बना रहा।

बाइपोलैरिटी के बाद के चैलेंज और शीत युद्ध की भूमिका:

शीत युद्ध के समाप्त होने के बाद, दुनिया में एक नई व्यवस्था का निर्माण हुआ, जिसमें केवल एक प्रमुख महाशक्ति, यानी अमेरिका, बची। शीत युद्ध के दौरान दुनिया दो प्रमुख गुटों में विभाजित थी—अमेरिका द्वारा नेतृत्व किए गए पूंजीवादी गुट और सोवियत संघ द्वारा नेतृत्व किए गए साम्यवादी गुट। जब सोवियत संघ 1991 में विघटित हुआ, तो बाइपोलैरिटी समाप्त हो गई और युनिपोलैरिटी की स्थिति बनी, जिसमें अमेरिका अकेली वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरा।
वैश्विक शक्ति संतुलन: एकमात्र महाशक्ति के रूप में अमेरिका का प्रभुत्व दुनिया के अन्य देशों के लिए चुनौतीपूर्ण हो गया। कई देशों ने अमेरिका के नेतृत्व में होने वाली नीतियों के खिलाफ अपनी आवाज उठाई, खासकर उसकी सैन्य हस्तक्षेप की नीतियों जैसे इराक और अफगानिस्तान में युद्ध।

आर्थिक असमानताएँ: शीत युद्ध के बाद के दौर में, विकासशील देशों के बीच बढ़ती हुई आर्थिक असमानताएँ और वैश्विक गरीबी एक बड़ी चुनौती बनी। विकासशील देशों ने अमेरिकी और पश्चिमी नीतियों के दबाव को महसूस किया।

नए संघर्ष और आतंकवाद: शीत युद्ध के समाप्त होने के बाद नए प्रकार के संघर्ष और आतंकवाद के मुद्दे उभरे। यह वैश्विक सुरक्षा के लिए नया खतरा बन गया, जैसा कि 9/11 के हमलों के बाद देखा गया।


शीत युद्ध की भूमिका:

शीत युद्ध ने वैश्विक स्तर पर दो गुटों के बीच संतुलन बनाए रखा था, जिससे किसी भी एक गुट का अत्यधिक प्रभाव सीमित था। लेकिन शीत युद्ध के बाद अमेरिका के एकल प्रभुत्व ने नई समस्याओं को जन्म दिया। इसके बावजूद, शीत युद्ध के दौरान पैदा हुए कूटनीतिक और सैन्य उपायों, जैसे परमाणु निरस्त्रीकरण की पहल और वैश्विक संगठनों (संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन आदि) के प्रभावी कार्य, बाइपोलैरिटी के बाद के समय में भी काम आए और दुनिया को बेहतर दिशा में मार्गदर्शन देने का प्रयास किया।
इस तरह, शीत युद्ध का अंत दुनिया के लिए एक नए प्रकार की कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य स्थिति लेकर आया, जिसे विभिन्न देशों ने अपने-अपने तरीके से स्वीकार किया और उसका सामना किया।