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"काम विकार (वासना) का जन्म ही मत होने दो"
एक मनुष्य ने शेर का बच्चा पाला था। बच्चा बहुत गरीब था । एक दिन नींद में वह बच्चा मालिक का बाँया हाथ चाटने लगा। चाटते- चाटते दाँत लग जाने से हाथ का थोड़ा-सा खून निकला। अब बच्चा कान टेढ़ा किये खून चाटने लगा। तकलीफ के मारे मालिक जग पड़ा और अपना हाथ हटाना चाहा। किंचित हाथ हटाते ही शेर एकदम खड़ा हो गया और जाति स्वभावानुसार "गुर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्र गर्जन कर उसने हाथ को पंजे के नीचे मजबूती से दबा लिया और फिर रक्त चाटने लगा। मालिक ने सोचा 'अरे बाप रे! अब तो मामला बड़ा बेढब है। यदि मैं इसको और प्यार करूँ तो यह मुझे फाड़ खाये बिना नहीं रहेगा।' उसने निश्चय किया और तुरन्त सन्दूक में से पिस्तौल मँगवाई। पिस्तौल मिलते ही 'रे नमकहराम' ऐसा कहकर तत्काल धड़ाके से गोली छोड़कर उसे मार डाला।
ओ मेरे प्यारे भाईयो और बहनों ! यदि कामरूपी शेर तुम्हारा शोषण करना चाहता हो तो तुम भी उसे फौरन मार डालो। कम से कम 30 वर्ष तक विषय से बिलकुल दूर रहो । उसका स्मरण तक मत करो। क्योंकि पूर्वोक्त नव मैथुनों में से प्रत्येक मैथुन ब्रह्मचर्य का नाशक है।
जो विषय अत्यन्त प्रिय व मधुर मालूम होता है और जो परमार्थ मनुष्य का इसी जीवन में अमृत तुल्य फल शान्ति देने वाला और अन्त में मुक्तिप्रद है तथा जिसका आधार ब्रह्मचर्य के ऊपर ही मुख्यतः निर्भर करता है: वह परमार्थ उन्हें विष के समान कडुआ मालूम होता है। जो वास्तव में विष है, उसे अमृत समझना और जो प्रत्यक्ष अमृत है उसे विष समझना, ये घोर पाप के लक्षण है!
यह बात निःसन्देह सत्य है कि जिसे साँप काटता है, उसको मिर्च भी तीती नहीं लगती है और न नीम कड़वी लगती है। परन्तु चीनी उसे बहुत कड़वी लगती है। ठीक यही हालत विषय रूपी सर्प से दंशित पुरुषों की भी समझिये। उन्हें सब उलटी ही बातें सूझती हैं और उनकी दृष्टि में पाप ही पाप भरा रहता है। सभी स्त्रियों की ओर पाप दृष्टि से देखते और इस प्रकार व्यर्थ पाप के भागी बन अन्त में नरक को जाते हैं।
आज, बड़े-बड़े देवस्थानों में भी नाच रङ्ग व व्यभिचार घुस गया है। कई मन्दिरों पर तो भद्दे चित्र भी खुदे हुए हैं। हा! पापी पुरुष क्या नहीं करेंगे। गंगा जी में गर्दन तक डूबे रहने पर भी उनकी पाप-दृष्टि नहीं जाती। देव-दर्शन के बहाने मन्दिरों में और वायु-सेवन के मिस से घाट पर तथा जगह-जगह कई गीध बैठे हुए नित्य दिखाई देते हैं। - धिक्कार है ऐसे नारकी जीवों को!
आभार : ये लेख स्वामी शिवानंद जी द्वारा लिखी गई बुक "ब्रह्मचर्य ही जीवन है !"से लिया गया है ।
ऐसे लेख पढ़ने के लिए टेलीग्राम पर इस लिंक से जुड़े 👇
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📝इक बून्द से लेकर
राख की ढेरी तक🔥
बस
इतनी कहानी तेरी है!
न बचपन था
न बुढ़ापा होगा
और
न ही जवानी तेरी है...👌
🎁 शिक्षा:- प्यारे साथियों आपके शुद्ध और सात्विक कार्य ही आपके जीवन की सार्थकता है। यह जीवन क्षणिक है, आप इसका सर्वोत्तम सदुपयोग करने का प्रयास करे...
संयम और अनुशासन ही आपके महान जीवन की खूबसूरती का आधार है,
इस निरंतर बनाए रखिए...👍
यदि आप भी अपना जीवन संवारना चाहते है, तो जॉइन कीजिये👌
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🔰 स्वास्थ्य से संबंधित कुछ विशेष जानकारियां
1- 90 प्रतिशत रोग केवल पेट से होते हैं। पेट में कब्ज नहीं रहना चाहिए। अन्यथा रोगों की कभी कमी नहीं रहेगी।
2- कुल 13 अधारणीय वेग हैं
3-160 रोग केवल मांसाहार से होते है
4- 103 रोग भोजन के बाद जल पीने से होते हैं। भोजन के 1 घंटे बाद ही जल पीना चाहिये।
5- 80 रोग चाय पीने से होते हैं।
6- 48 रोग ऐलुमिनियम के बर्तन या कुकर के खाने से होते हैं।
7- शराब, कोल्डड्रिंक और चाय के सेवन से हृदय रोग होता है।
8- अण्डा खाने से हृदयरोग, पथरी और गुर्दे खराब होते हैं।
9- ठंडेजल (फ्रिज)और आइसक्रीम से बड़ी आंत सिकुड़ जाती है।
10- मैगी, गुटका, शराब, सूअर का माँस, पिज्जा, बर्गर, बीड़ी, सिगरेट, पेप्सी, कोक से बड़ी आंत सड़ती है।
11- भोजन के पश्चात् स्नान करने से पाचनशक्ति मन्द हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है।
12- बाल रंगने वाले द्रव्यों(हेयरकलर) से आँखों को हानि (अंधापन भी) होती है।
13- दूध(चाय) के साथ नमक (नमकीन पदार्थ) खाने से चर्म रोग हो जाता है।
14- शैम्पू, कंडीशनर और विभिन्न प्रकार के तेलों से बाल पकने, झड़ने और दोमुहें होने लगते हैं।
15- गर्म जल से स्नान से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कम हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है। गर्म जल सिर पर डालने से आँखें कमजोर हो जाती हैं।
16- टाई बांधने से आँखों और मस्तिष्क हो हानि पहुँचती है।
17- खड़े होकर जल पीने से घुटनों(जोड़ों) में पीड़ा होती है।
18- खड़े होकर मूत्रत्याग करने से रीढ़ की हड्डी को हानि होती है।
19- भोजन पकाने के बाद उसमें नमक डालने से रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) बढ़ता है।
20- जोर लगाकर छींकने से कानों को क्षति पहुँचती है।
21- मुँह से साँस लेने पर आयु कम होती है।
22- पुस्तक पर अधिक झुकने से फेफड़े खराब हो जाते हैं और क्षय(टीबी) होने का डर रहता है।
23- चैत्र माह में नीम के पत्ते खाने से रक्त शुद्ध हो जाता है मलेरिया नहीं होता है।
24- तुलसी के सेवन से मलेरिया नहीं होता है।
25- मूली प्रतिदिन खाने से व्यक्ति अनेक रोगों से मुक्त रहता है।
26- अनार आंव, संग्रहणी, पुरानी खांसी व हृदय रोगों के लिए सर्वश्रेश्ठ है।
27- हृदयरोगी के लिए अर्जुनकी छाल, लौकी का रस, तुलसी, पुदीना, मौसमी,
सेंधा नमक, गुड़, चोकरयुक्त आटा, छिलकेयुक्त अनाज औषधियां हैं।
28- भोजन के पश्चात् पान, गुड़ या सौंफ खाने से पाचन अच्छा होता है। अपच नहीं होता है।
29- अपक्व भोजन (जो आग पर न पकाया गया हो) से शरीर स्वस्थ रहता है और आयु दीर्घ होती है।
30- मुलहठी चूसने से कफ बाहर आता है और आवाज मधुर होती है।
31- जल सदैव ताजा(चापाकल, कुएंआदि का) पीना चाहिये, बोतलबंद (फ्रिज) पानी बासी और अनेक रोगों के कारण होते हैं।
32- नीबू गंदे पानी के रोग (यकृत, टाइफाइड, दस्त, पेट के रोग) तथा हैजा से बचाता है।
33- चोकर खाने से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। इसलिए सदैव गेहूं मोटा ही पिसवाना चाहिए।
34- फल, मीठा और घी या तेल से बने पदार्थ खाकर तुरन्त जल नहीं पीना चाहिए।
35- भोजन पकने के 48 मिनट के
अन्दर खा लेना चाहिए। उसके पश्चात् उसकी पोषकता कम होने लगती है। 12 घण्टे के बाद पशुओं के खाने लायक भी नहीं रहता है।।
36- मिट्टी के बर्तन में भोजन पकाने से पोषकता 100%, कांसे के बर्तन में 97%, पीतल के बर्तन में 93%, अल्युमिनियम के बर्तन और प्रेशर कुकर में 7-13% ही बचते हैं।
37- गेहूँ का आटा 15 दिनों पुराना और चना, ज्वार, बाजरा, मक्का का आटा 7 दिनों से अधिक पुराना नहीं प्रयोग करना चाहिए।
38- 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को मैदा (बिस्कुट, ब्रेड , समोसा आदि) कभी भी नहीं खिलाना चाहिए।
39- खाने के लिए सेंधा नमक सर्वश्रेष्ठ होता है उसके बाद काला नमक का स्थान आता है। सफेद नमक जहर के समान होता है।
40- जल जाने पर आलू का रस, हल्दी, शहद, घृतकुमारी में से कुछ भी लगाने पर जलन ठीक हो जाती है और फफोले नहीं पड़ते।
41- सरसों, तिल,मूंगफली , सुरजमुखी या नारियल का कच्ची घानी का तेल और देशी घी ही खाना चाहिए है। रिफाइंड तेल और
वनस्पति घी (डालडा) जहर होता है।
42- पैर के अंगूठे के नाखूनों को सरसों तेल से भिगोने से आँखों की खुजली लाली और जलन ठीक हो जाती है।
43- खाने का चूना 70 रोगों को ठीक करता है।
44- चोट, सूजन, दर्द, घाव, फोड़ा होने पर उस पर 5-20 मिनट तक चुम्बक रखने से जल्दी ठीक होता है। हड्डी टूटने पर चुम्बक का प्रयोग करने से आधे से भी कम समय में ठीक होती है।
45- मीठे में मिश्री, गुड़, शहद, देशी(कच्ची) चीनी का प्रयोग करना चाहिए सफेद चीनी जहर होता है।
46- कुत्ता काटने पर हल्दी लगाना चाहिए।
47-बर्तन मिटटी के ही प्रयोग करने चाहिए।
48- टूथपेस्ट और ब्रश के स्थान पर दातून और मंजन करना चाहिए दाँत मजबूत रहेंगे।
(आँखों के रोग में दातून नहीं करना चाहिए)
49- यदि सम्भव हो तो सूर्यास्त के पश्चात् न तो पढ़ें और लिखने का काम तो न ही करें तो अच्छा है।
50- निरोग रहने के लिए अच्छी नींद
1- 90 प्रतिशत रोग केवल पेट से होते हैं। पेट में कब्ज नहीं रहना चाहिए। अन्यथा रोगों की कभी कमी नहीं रहेगी।
2- कुल 13 अधारणीय वेग हैं
3-160 रोग केवल मांसाहार से होते है
4- 103 रोग भोजन के बाद जल पीने से होते हैं। भोजन के 1 घंटे बाद ही जल पीना चाहिये।
5- 80 रोग चाय पीने से होते हैं।
6- 48 रोग ऐलुमिनियम के बर्तन या कुकर के खाने से होते हैं।
7- शराब, कोल्डड्रिंक और चाय के सेवन से हृदय रोग होता है।
8- अण्डा खाने से हृदयरोग, पथरी और गुर्दे खराब होते हैं।
9- ठंडेजल (फ्रिज)और आइसक्रीम से बड़ी आंत सिकुड़ जाती है।
10- मैगी, गुटका, शराब, सूअर का माँस, पिज्जा, बर्गर, बीड़ी, सिगरेट, पेप्सी, कोक से बड़ी आंत सड़ती है।
11- भोजन के पश्चात् स्नान करने से पाचनशक्ति मन्द हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है।
12- बाल रंगने वाले द्रव्यों(हेयरकलर) से आँखों को हानि (अंधापन भी) होती है।
13- दूध(चाय) के साथ नमक (नमकीन पदार्थ) खाने से चर्म रोग हो जाता है।
14- शैम्पू, कंडीशनर और विभिन्न प्रकार के तेलों से बाल पकने, झड़ने और दोमुहें होने लगते हैं।
15- गर्म जल से स्नान से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कम हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है। गर्म जल सिर पर डालने से आँखें कमजोर हो जाती हैं।
16- टाई बांधने से आँखों और मस्तिष्क हो हानि पहुँचती है।
17- खड़े होकर जल पीने से घुटनों(जोड़ों) में पीड़ा होती है।
18- खड़े होकर मूत्रत्याग करने से रीढ़ की हड्डी को हानि होती है।
19- भोजन पकाने के बाद उसमें नमक डालने से रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) बढ़ता है।
20- जोर लगाकर छींकने से कानों को क्षति पहुँचती है।
21- मुँह से साँस लेने पर आयु कम होती है।
22- पुस्तक पर अधिक झुकने से फेफड़े खराब हो जाते हैं और क्षय(टीबी) होने का डर रहता है।
23- चैत्र माह में नीम के पत्ते खाने से रक्त शुद्ध हो जाता है मलेरिया नहीं होता है।
24- तुलसी के सेवन से मलेरिया नहीं होता है।
25- मूली प्रतिदिन खाने से व्यक्ति अनेक रोगों से मुक्त रहता है।
26- अनार आंव, संग्रहणी, पुरानी खांसी व हृदय रोगों के लिए सर्वश्रेश्ठ है।
27- हृदयरोगी के लिए अर्जुनकी छाल, लौकी का रस, तुलसी, पुदीना, मौसमी,
सेंधा नमक, गुड़, चोकरयुक्त आटा, छिलकेयुक्त अनाज औषधियां हैं।
28- भोजन के पश्चात् पान, गुड़ या सौंफ खाने से पाचन अच्छा होता है। अपच नहीं होता है।
29- अपक्व भोजन (जो आग पर न पकाया गया हो) से शरीर स्वस्थ रहता है और आयु दीर्घ होती है।
30- मुलहठी चूसने से कफ बाहर आता है और आवाज मधुर होती है।
31- जल सदैव ताजा(चापाकल, कुएंआदि का) पीना चाहिये, बोतलबंद (फ्रिज) पानी बासी और अनेक रोगों के कारण होते हैं।
32- नीबू गंदे पानी के रोग (यकृत, टाइफाइड, दस्त, पेट के रोग) तथा हैजा से बचाता है।
33- चोकर खाने से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। इसलिए सदैव गेहूं मोटा ही पिसवाना चाहिए।
34- फल, मीठा और घी या तेल से बने पदार्थ खाकर तुरन्त जल नहीं पीना चाहिए।
35- भोजन पकने के 48 मिनट के
अन्दर खा लेना चाहिए। उसके पश्चात् उसकी पोषकता कम होने लगती है। 12 घण्टे के बाद पशुओं के खाने लायक भी नहीं रहता है।।
36- मिट्टी के बर्तन में भोजन पकाने से पोषकता 100%, कांसे के बर्तन में 97%, पीतल के बर्तन में 93%, अल्युमिनियम के बर्तन और प्रेशर कुकर में 7-13% ही बचते हैं।
37- गेहूँ का आटा 15 दिनों पुराना और चना, ज्वार, बाजरा, मक्का का आटा 7 दिनों से अधिक पुराना नहीं प्रयोग करना चाहिए।
38- 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को मैदा (बिस्कुट, ब्रेड , समोसा आदि) कभी भी नहीं खिलाना चाहिए।
39- खाने के लिए सेंधा नमक सर्वश्रेष्ठ होता है उसके बाद काला नमक का स्थान आता है। सफेद नमक जहर के समान होता है।
40- जल जाने पर आलू का रस, हल्दी, शहद, घृतकुमारी में से कुछ भी लगाने पर जलन ठीक हो जाती है और फफोले नहीं पड़ते।
41- सरसों, तिल,मूंगफली , सुरजमुखी या नारियल का कच्ची घानी का तेल और देशी घी ही खाना चाहिए है। रिफाइंड तेल और
वनस्पति घी (डालडा) जहर होता है।
42- पैर के अंगूठे के नाखूनों को सरसों तेल से भिगोने से आँखों की खुजली लाली और जलन ठीक हो जाती है।
43- खाने का चूना 70 रोगों को ठीक करता है।
44- चोट, सूजन, दर्द, घाव, फोड़ा होने पर उस पर 5-20 मिनट तक चुम्बक रखने से जल्दी ठीक होता है। हड्डी टूटने पर चुम्बक का प्रयोग करने से आधे से भी कम समय में ठीक होती है।
45- मीठे में मिश्री, गुड़, शहद, देशी(कच्ची) चीनी का प्रयोग करना चाहिए सफेद चीनी जहर होता है।
46- कुत्ता काटने पर हल्दी लगाना चाहिए।
47-बर्तन मिटटी के ही प्रयोग करने चाहिए।
48- टूथपेस्ट और ब्रश के स्थान पर दातून और मंजन करना चाहिए दाँत मजबूत रहेंगे।
(आँखों के रोग में दातून नहीं करना चाहिए)
49- यदि सम्भव हो तो सूर्यास्त के पश्चात् न तो पढ़ें और लिखने का काम तो न ही करें तो अच्छा है।
50- निरोग रहने के लिए अच्छी नींद
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💐आज ये पढ़कर सोएं 💐
आज की रात – खुद को सौंप देने की रात
आज का दिन पूरा हुआ।
जो करना था, जितना हो सका — आपने किया।
अब इस क्षण में कुछ भी अधूरा नहीं है।
धीरे से एक गहरी साँस लीजिए…
और छोड़ दीजिए।
आज जो गलत हुआ,
वह अब बदला नहीं जा सकता।
और जो अच्छा हुआ,
वह आपके भीतर सुरक्षित है।
इस समय किसी चिंता को पकड़कर रखने की ज़रूरत नहीं।
कल का दिन अपनी जगह आएगा।
अभी सिर्फ यह पल है —
और इस पल में आप सुरक्षित हैं।
अपने शरीर को महसूस कीजिए…
पैर ढीले हो रहे हैं…
कंधों का बोझ उतर रहा है…
माथा हल्का हो रहा है…
मन से कहिए —
“अब आराम करने का समय है।”
आपको हर चीज़ का हल अभी नहीं ढूँढना है।
कुछ सवालों को रात भर सोने देना भी
एक समझदारी है।
जैसे धरती हर रात अँधेरे में भी
सूरज के लौटने पर भरोसा रखती है,
वैसे ही आपका मन भी
कल की रोशनी का इंतज़ार कर सकता है।
अगर कोई विचार आए —
उसे जाने दीजिए।
जैसे बादल आते हैं और चले जाते हैं।
आप विचार नहीं हैं।
आप वह शांति हैं
जिसमें विचार आते-जाते हैं।
आज अपने आप से कुछ भी माँगिए मत।
आज बस अपने आप को अनुमति दीजिए —
आराम करने की।
कहिए मन ही मन:
“मैंने आज पर्याप्त किया।”
“मैं ठीक हूँ।”
“अब मैं खुद को विश्राम देता/देती हूँ।”
नींद कोई मजबूरी नहीं है,
नींद एक उपहार है।
और आज आप इस उपहार के योग्य हैं।
अब शब्दों को भी धीरे-धीरे छोड़ दीजिए…
साँस को हल्का होने दीजिए…
और खुद को नींद के हवाले कर दीजिए। 🌙
शुभ रात्रि।
आप सुरक्षित हैं।
आप शांत हैं।
आप सो सकते हैं। 🤍
आज की रात – खुद को सौंप देने की रात
आज का दिन पूरा हुआ।
जो करना था, जितना हो सका — आपने किया।
अब इस क्षण में कुछ भी अधूरा नहीं है।
धीरे से एक गहरी साँस लीजिए…
और छोड़ दीजिए।
आज जो गलत हुआ,
वह अब बदला नहीं जा सकता।
और जो अच्छा हुआ,
वह आपके भीतर सुरक्षित है।
इस समय किसी चिंता को पकड़कर रखने की ज़रूरत नहीं।
कल का दिन अपनी जगह आएगा।
अभी सिर्फ यह पल है —
और इस पल में आप सुरक्षित हैं।
अपने शरीर को महसूस कीजिए…
पैर ढीले हो रहे हैं…
कंधों का बोझ उतर रहा है…
माथा हल्का हो रहा है…
मन से कहिए —
“अब आराम करने का समय है।”
आपको हर चीज़ का हल अभी नहीं ढूँढना है।
कुछ सवालों को रात भर सोने देना भी
एक समझदारी है।
जैसे धरती हर रात अँधेरे में भी
सूरज के लौटने पर भरोसा रखती है,
वैसे ही आपका मन भी
कल की रोशनी का इंतज़ार कर सकता है।
अगर कोई विचार आए —
उसे जाने दीजिए।
जैसे बादल आते हैं और चले जाते हैं।
आप विचार नहीं हैं।
आप वह शांति हैं
जिसमें विचार आते-जाते हैं।
आज अपने आप से कुछ भी माँगिए मत।
आज बस अपने आप को अनुमति दीजिए —
आराम करने की।
कहिए मन ही मन:
“मैंने आज पर्याप्त किया।”
“मैं ठीक हूँ।”
“अब मैं खुद को विश्राम देता/देती हूँ।”
नींद कोई मजबूरी नहीं है,
नींद एक उपहार है।
और आज आप इस उपहार के योग्य हैं।
अब शब्दों को भी धीरे-धीरे छोड़ दीजिए…
साँस को हल्का होने दीजिए…
और खुद को नींद के हवाले कर दीजिए। 🌙
शुभ रात्रि।
आप सुरक्षित हैं।
आप शांत हैं।
आप सो सकते हैं। 🤍
❤74🙏14👍4👏1
आप पूरे दिन में खुद के लिए कितना टाइम निकालते है ? सच सच बताना , पढ़ो तो इसका जवाब जरूर देना❤️
Anonymous Poll
36%
बिल्कुल नहीं 😢
13%
5 मिनट
17%
30 मिनट
11%
1 घंटा
23%
1 घंटे से ज्यादा 🤗
👍20❤7
🔥युवा कौन है? जवानी क्या है??🔥
☀️उठो जागो और तब तक मत रुको
जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए✅
🌈हे भारत के वीर भाइयों और बहनो क्यों निराश हो?🤔
क्यों हताश हो?🤔
🌈कब तक मन की गुलामी करते हुए जीओगे?? आखिर कब तक।
क्षणिक सुख के पीछे पागल बन रोते रहोगे??क्योंकि ये अदभुत जवानी तुम्हे नाली में बहाने के लिये नही मिली है??😊
धिक्कार है ऐसी जवानी पर जो सिर्फ कंचन कामिनी के पीछे ही बरबाद हो जाती है।✅
एक बात याद रखिये:-🤔
🌻वो जवानी नही,
🌻जो खूंन को जलाती नही
🌻दाग लेकर गुलामी का
🌻 क्यूँ हम जीए
🌻सोचकर रातो को नींद आती नही
🔥जवानी एक धधकती आग है🔥
चाहो तो खुद को भोगो में जलाकर जवानी को राख कर दो। या फिर इसी आग में तपकर दुनिया के अंधकार और अज्ञानता को जला कर राख कर दो👍
अब राख कौनसी चुननी है??🤔
ये निर्णय तुम्हे करना है।✅
🔥लोग कहते है की
🔥ज़माना बदलता है हरदम
🔥मर्द वो है
🔥जो ज़माने बदल देते है
ज़िंदगी सुधारने के लिये अभी जुड़े👇
https://t.me/+RCBOO24o4PS1h2mj
🕊️🌻जय माता दी🌻🕊️
Humanity is The Best Religion😊
🌈Note:- (राष्ट्र सेवा व नारी शक्ति के सम्मान में सिर्फ एक share कीजिये। यह बोहत बडी सेवा है 🙏)
☀️उठो जागो और तब तक मत रुको
जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए✅
🌈हे भारत के वीर भाइयों और बहनो क्यों निराश हो?🤔
क्यों हताश हो?🤔
🌈कब तक मन की गुलामी करते हुए जीओगे?? आखिर कब तक।
क्षणिक सुख के पीछे पागल बन रोते रहोगे??क्योंकि ये अदभुत जवानी तुम्हे नाली में बहाने के लिये नही मिली है??😊
धिक्कार है ऐसी जवानी पर जो सिर्फ कंचन कामिनी के पीछे ही बरबाद हो जाती है।✅
एक बात याद रखिये:-🤔
🌻वो जवानी नही,
🌻जो खूंन को जलाती नही
🌻दाग लेकर गुलामी का
🌻 क्यूँ हम जीए
🌻सोचकर रातो को नींद आती नही
🔥जवानी एक धधकती आग है🔥
चाहो तो खुद को भोगो में जलाकर जवानी को राख कर दो। या फिर इसी आग में तपकर दुनिया के अंधकार और अज्ञानता को जला कर राख कर दो👍
अब राख कौनसी चुननी है??🤔
ये निर्णय तुम्हे करना है।✅
🔥लोग कहते है की
🔥ज़माना बदलता है हरदम
🔥मर्द वो है
🔥जो ज़माने बदल देते है
ज़िंदगी सुधारने के लिये अभी जुड़े👇
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मकर संक्रांति का आध्यात्मिक रहस्य
मकर संक्रांति पर प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालुओं का मेला विभिन्न नदियों के घाटों पर लगता है। इस शुभ दिन तिल खिचड़ी का दान करते हैं। वास्तव में स्थूल परम्पराओं मे आध्यात्मिक रहस्य छुपे हुए हैं। अभी कलियुग का अंतिम समय चल रहा है। सारी मानवता दुखी-अशांत हैं। हर कोई परिवर्तन के इंतजार मेँ हैं । सारी व्यवस्थाएं व मनुष्य की मनोदशा जीर्ण-शीर्ण हो चुकी हैं। ऐसे समय मेँ विश्व सृष्टिकर्ता परमात्मा शिव कलियुग, सतयुग के संधिकाल अर्थात संगमयुग पर ब्रह्मा के तन मेँ आ चुके हैं।
जिस प्रकार भक्ति मार्ग मेँ पुरुषोत्तम मास मेँ दान-पुण्य आदि का महत्व होता है, उसी प्रकार पुरुषोत्तम संगमयुग, जिसमें ज्ञान स्नान करके बुराइयों का दान करने से, पुण्य का खाता जमा करने वाली हर आत्मा उत्तम पुरुष बन सकती है। इस दिन खिचड़ी और तिल का दान करते हैं, इसका भाव यह है कि मनुष्य के संस्कारों मेँ आसुरियता की मिलावट हो चुकी है, अर्थात उसके संस्कार खिचड़ी हो चुके हैं, जिन्हें परिवर्तन करके अब दिव्य संस्कार धारण करने हैं । इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक मनुष्य को ईर्ष्या-द्वेष आदि संस्कारों को छोडकर संस्कारों का मिलन इस प्रकार करना है, जिस प्रकार खिचड़ी मिलकर एक हो जाती है।
परमात्मा की अभी आज्ञा है कि तिल समान अपनी सूक्ष्म से सूक्ष्म बुराइयों को भी हमें तिलांजलि देना है। जैसे उस गंगा मेँ भाव-कुभाव से ज़ोर जबर्दस्ती से एक दो को नहलाकर खुश होते हैं और शुभ मानते हैं; इसी प्रकार अब हमें ज्ञान गंगा मेँ नहलाकर मुक्ति-जीवनमुक्ति का मार्ग दिखाना है। जैसे जब नयी फसल आती है तो सभी खुशियाँ मनाते हैं। इसी प्रकार वास्तविक और अविनाशी खुशी प्राप्त होती है, बुराइयों का त्याग करने से। फसल कटाई का समय देशी मास के हिसाब से पौष महीने के अंतिम दिन तथा अंग्रेजी महीने के 12,13, 14 जनवरी को आता है। इस समय एक सूर्य राशि से दूसरी राशि मेँ जाता है। इसलिए इसे संक्रमण काल कहा जाता है, अर्थात एक दशा से दूसरी दशा मेँ जाने का समय। यह संक्रमण काल उस महान संक्रमण काल का यादगार है जो कलियुग के अंत सतयुग के आरंभ मेँ घटता है। इस संक्रमण काल मेँ ज्ञान सूर्य परमात्मा भी राशि बदलते हैं। वे परमधाम छोड़ कर साकार वतन मेँ अवतरित होते हैं। संसार मेँ अनेक क्रांतियाँ हुई। हर क्रांति के पीछे उद्देश्य – परिवर्तन रहा है...
हथियारों के बल पर जो क्रांतियाँ हुई उनसे आंशिक परिवर्तन तो हुआ, किन्तु सम्पूर्ण परिवर्तन को आज मनुष्य तरस रहा है। सतयुग मेँ खुशी का आधार अभी का संस्कार परिवर्तन है, इस क्रांति के बाद सृष्टि पर कोई क्रांति नहीं हुई। संक्रांति का त्योहार संगमयुग पर हुई उस महान क्रांति की यादगार मेँ मनाया जाता है।
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1) स्नान - ब्रह्म मुहूर्त मेँ उठ स्नान, ज्ञान स्नान का यादगार है।
2) तिल खाना - तिल खाना, खिलाना, दान करने का भी रहस्य है। वास्तव में छोटी चीज़ की तुलना तिल से की गयी है। आत्मा भी अति सूक्ष्म है। अर्थात तिल आत्म स्वरूप में टिकने का यादगार है।
3) पतंग उड़ाना - आत्मा हल्की हो तो उड़ने लगती है; देहभान वाला उड़ नहीं सकता है। जबकि आत्माभिमानी अपनी डोर भगवान को देकर तीनों लोकों की सैर कर सकता है।
4) तिल के लड्डू खाना - तिल को अलग खाओ तो कड़वा महसूस होता है। अर्थात अकेले मेँ भारीपन का अनुभव होता है। लड्डू एकता एवं मिठास का भी प्रतीक है।
5) तिल का दान - दान देने से भाग्य बनता है। अतः वर्तमान संगंयुग में हमें परमात्मा को अपनी छोटी कमज़ोरी का भी दान देना है।
6) आग जलाना - अग्नि मेँ डालने से चीज़ें पूरी तरह बदल जाती, सामूहिक आग - योगीजन संगठित होकर एक ही स्मृति से ईश्वर की स्मृति मे टिकते हैं, जिसके द्वारा न केवल उनके जन्म-जन्म के विकर्म भस्म होते हैं, बल्कि उनकी याद की किरणें समस्त विश्व में फाइल कर शांति, पवित्रता, आनंद, प्रेम, शक्ति की तरंगे फैलाती हैं।
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यदि इस पर्व को निम्नलिखित विधि द्वारा मनाए तो न केवल हमें सच्चे सुख की प्राप्ति होगी बल्कि हम परमात्म दुआओं के भी अधिकारी बनेंगे !
आप सबको इस महान पर्व मकर सक्रांति की बहुत-बहुत शुभ कामनाएँ।
मकर संक्रांति पर प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालुओं का मेला विभिन्न नदियों के घाटों पर लगता है। इस शुभ दिन तिल खिचड़ी का दान करते हैं। वास्तव में स्थूल परम्पराओं मे आध्यात्मिक रहस्य छुपे हुए हैं। अभी कलियुग का अंतिम समय चल रहा है। सारी मानवता दुखी-अशांत हैं। हर कोई परिवर्तन के इंतजार मेँ हैं । सारी व्यवस्थाएं व मनुष्य की मनोदशा जीर्ण-शीर्ण हो चुकी हैं। ऐसे समय मेँ विश्व सृष्टिकर्ता परमात्मा शिव कलियुग, सतयुग के संधिकाल अर्थात संगमयुग पर ब्रह्मा के तन मेँ आ चुके हैं।
जिस प्रकार भक्ति मार्ग मेँ पुरुषोत्तम मास मेँ दान-पुण्य आदि का महत्व होता है, उसी प्रकार पुरुषोत्तम संगमयुग, जिसमें ज्ञान स्नान करके बुराइयों का दान करने से, पुण्य का खाता जमा करने वाली हर आत्मा उत्तम पुरुष बन सकती है। इस दिन खिचड़ी और तिल का दान करते हैं, इसका भाव यह है कि मनुष्य के संस्कारों मेँ आसुरियता की मिलावट हो चुकी है, अर्थात उसके संस्कार खिचड़ी हो चुके हैं, जिन्हें परिवर्तन करके अब दिव्य संस्कार धारण करने हैं । इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक मनुष्य को ईर्ष्या-द्वेष आदि संस्कारों को छोडकर संस्कारों का मिलन इस प्रकार करना है, जिस प्रकार खिचड़ी मिलकर एक हो जाती है।
परमात्मा की अभी आज्ञा है कि तिल समान अपनी सूक्ष्म से सूक्ष्म बुराइयों को भी हमें तिलांजलि देना है। जैसे उस गंगा मेँ भाव-कुभाव से ज़ोर जबर्दस्ती से एक दो को नहलाकर खुश होते हैं और शुभ मानते हैं; इसी प्रकार अब हमें ज्ञान गंगा मेँ नहलाकर मुक्ति-जीवनमुक्ति का मार्ग दिखाना है। जैसे जब नयी फसल आती है तो सभी खुशियाँ मनाते हैं। इसी प्रकार वास्तविक और अविनाशी खुशी प्राप्त होती है, बुराइयों का त्याग करने से। फसल कटाई का समय देशी मास के हिसाब से पौष महीने के अंतिम दिन तथा अंग्रेजी महीने के 12,13, 14 जनवरी को आता है। इस समय एक सूर्य राशि से दूसरी राशि मेँ जाता है। इसलिए इसे संक्रमण काल कहा जाता है, अर्थात एक दशा से दूसरी दशा मेँ जाने का समय। यह संक्रमण काल उस महान संक्रमण काल का यादगार है जो कलियुग के अंत सतयुग के आरंभ मेँ घटता है। इस संक्रमण काल मेँ ज्ञान सूर्य परमात्मा भी राशि बदलते हैं। वे परमधाम छोड़ कर साकार वतन मेँ अवतरित होते हैं। संसार मेँ अनेक क्रांतियाँ हुई। हर क्रांति के पीछे उद्देश्य – परिवर्तन रहा है...
हथियारों के बल पर जो क्रांतियाँ हुई उनसे आंशिक परिवर्तन तो हुआ, किन्तु सम्पूर्ण परिवर्तन को आज मनुष्य तरस रहा है। सतयुग मेँ खुशी का आधार अभी का संस्कार परिवर्तन है, इस क्रांति के बाद सृष्टि पर कोई क्रांति नहीं हुई। संक्रांति का त्योहार संगमयुग पर हुई उस महान क्रांति की यादगार मेँ मनाया जाता है।
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1) स्नान - ब्रह्म मुहूर्त मेँ उठ स्नान, ज्ञान स्नान का यादगार है।
2) तिल खाना - तिल खाना, खिलाना, दान करने का भी रहस्य है। वास्तव में छोटी चीज़ की तुलना तिल से की गयी है। आत्मा भी अति सूक्ष्म है। अर्थात तिल आत्म स्वरूप में टिकने का यादगार है।
3) पतंग उड़ाना - आत्मा हल्की हो तो उड़ने लगती है; देहभान वाला उड़ नहीं सकता है। जबकि आत्माभिमानी अपनी डोर भगवान को देकर तीनों लोकों की सैर कर सकता है।
4) तिल के लड्डू खाना - तिल को अलग खाओ तो कड़वा महसूस होता है। अर्थात अकेले मेँ भारीपन का अनुभव होता है। लड्डू एकता एवं मिठास का भी प्रतीक है।
5) तिल का दान - दान देने से भाग्य बनता है। अतः वर्तमान संगंयुग में हमें परमात्मा को अपनी छोटी कमज़ोरी का भी दान देना है।
6) आग जलाना - अग्नि मेँ डालने से चीज़ें पूरी तरह बदल जाती, सामूहिक आग - योगीजन संगठित होकर एक ही स्मृति से ईश्वर की स्मृति मे टिकते हैं, जिसके द्वारा न केवल उनके जन्म-जन्म के विकर्म भस्म होते हैं, बल्कि उनकी याद की किरणें समस्त विश्व में फाइल कर शांति, पवित्रता, आनंद, प्रेम, शक्ति की तरंगे फैलाती हैं।
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यदि इस पर्व को निम्नलिखित विधि द्वारा मनाए तो न केवल हमें सच्चे सुख की प्राप्ति होगी बल्कि हम परमात्म दुआओं के भी अधिकारी बनेंगे !
आप सबको इस महान पर्व मकर सक्रांति की बहुत-बहुत शुभ कामनाएँ।
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