*अब हम बिमार हो रहे हैं*
अब हमने कच्चा खाना खाना छोड़ दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं....
अब हमने अकेलापन चालू कर दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.........
अब हमने धुप लेना बँद कर दिया है, इसलिय हम बिमार हो रहे हैं......
अब हमने खाना खाने के बाद वज्रासन मे बैठना छोड़ दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.......
अब हमने खाना खाने के बाद गुड खाना छोड़ दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.........
अब हमने खाने के बिच मे दबा कर पानी पीना शुरु कर दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.......
अब हमने खाना खाने के बाद 100कदम चलना छोड़ दिया है, इसलिय हम बिमार हो रहे है......
अब खाना खाते समय तनाव मे खाना खा रहे है, इसलिय बिमार हो रहे है.........
अब हम खाना खाते समय बिना चबाए खाना निगल जा रहे है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.......
अब हम depresion मे जी रहे है, इसलिय बिमार हो रहे है......
अब हमने कच्चा खाना खाना छोड़ दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं....
अब हमने अकेलापन चालू कर दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.........
अब हमने धुप लेना बँद कर दिया है, इसलिय हम बिमार हो रहे हैं......
अब हमने खाना खाने के बाद वज्रासन मे बैठना छोड़ दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.......
अब हमने खाना खाने के बाद गुड खाना छोड़ दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.........
अब हमने खाने के बिच मे दबा कर पानी पीना शुरु कर दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.......
अब हमने खाना खाने के बाद 100कदम चलना छोड़ दिया है, इसलिय हम बिमार हो रहे है......
अब खाना खाते समय तनाव मे खाना खा रहे है, इसलिय बिमार हो रहे है.........
अब हम खाना खाते समय बिना चबाए खाना निगल जा रहे है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.......
अब हम depresion मे जी रहे है, इसलिय बिमार हो रहे है......
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काम विकारो को दबा देना ही इंन्द्रिय दमन है जिनका मन शुद्ध और संयमी है वहि अपने वीर्य को रोक सकता है।
कामवासना यह वो आग है जिसे समय चलते नहीं रोका गया तो सबकुछ जलाकर राख कर देगी . इससे बचना है तो पहले अपने बुद्धी में यह बात बैठालो किं , इसमे कोई सुख नहीं है . यह केवल सुख का आभास कराती है . जब इसमे हमारी भोग बुद्धी समाप्त हो जाऐगी तो यह अपने आप शांत होगी.मै अपना खुद का अनुभव बता रहा हूं प्रिय जनो असली आनंद तो केवल ब्रम्हचर्य में है . इसका जरुर निष्ठापूर्वक पालन करो फिर देखो चमत्कार ....
आप अपने वीर्य को जो बाजार में नही मिलता ,यूँही छनभर के सुख के लिए न गवाये , इसे ब्रह्मचर्य पालन द्वारा अपने शरीर में संचित करिये , इसकी रक्षा करिये तब देखिये आपके जीवन में कैसे बदलाव आते है ।
दोस्तों भीड़ से अलग बनिए ,1% वाली वर्ग में आईये ,आज 99% युवा अपने जीवन शक्ति (वीर्य) को पानी के तरह बहा रहे है ।
लेकिन हमें उनके जैसा नही बनना है ।
आज राम कृष्ण हनुमान के सिंद्धात है अनिवार्य ।
कामवासना यह वो आग है जिसे समय चलते नहीं रोका गया तो सबकुछ जलाकर राख कर देगी . इससे बचना है तो पहले अपने बुद्धी में यह बात बैठालो किं , इसमे कोई सुख नहीं है . यह केवल सुख का आभास कराती है . जब इसमे हमारी भोग बुद्धी समाप्त हो जाऐगी तो यह अपने आप शांत होगी.मै अपना खुद का अनुभव बता रहा हूं प्रिय जनो असली आनंद तो केवल ब्रम्हचर्य में है . इसका जरुर निष्ठापूर्वक पालन करो फिर देखो चमत्कार ....
आप अपने वीर्य को जो बाजार में नही मिलता ,यूँही छनभर के सुख के लिए न गवाये , इसे ब्रह्मचर्य पालन द्वारा अपने शरीर में संचित करिये , इसकी रक्षा करिये तब देखिये आपके जीवन में कैसे बदलाव आते है ।
दोस्तों भीड़ से अलग बनिए ,1% वाली वर्ग में आईये ,आज 99% युवा अपने जीवन शक्ति (वीर्य) को पानी के तरह बहा रहे है ।
लेकिन हमें उनके जैसा नही बनना है ।
आज राम कृष्ण हनुमान के सिंद्धात है अनिवार्य ।
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जो सफर की शुरुआत करते हैं,
वे मंजिल भी पा लेते हैं
बस एक बार चलने का हौसला रखना जरुरी है क्योंकि,
अच्छे इंसानों का तो रास्ते भी इन्तजार करते हैं
━━━━✧❂✧━━━━
वे मंजिल भी पा लेते हैं
बस एक बार चलने का हौसला रखना जरुरी है क्योंकि,
अच्छे इंसानों का तो रास्ते भी इन्तजार करते हैं
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🥗 ब्रह्मचर्य औषधि समाधान भाग 4002🥗
🥗🥗🥗समाधान 3 प्रकृति का...
🥗आयुर्वेद के अनुसार किसी भी तरह के रोग होने के 3 कारण होते हैं-
🥗1. वात:- शरीर में गैस बनना।
🥗2. पित्त:- शरीर की गर्मी बढ़ना।
🥗3. कफ:- शरीर में बलगम बनना।
🥗🥗किसी भी रोग के होने का कारण एक भी हो सकता है और दो भी हो सकता है या दोनों का मिश्रण भी हो सकता है या तीनों दोषों के कारण भी रोग हो सकता है।
🥗1. वात होने का कारण - गलत भोजन, बेसन, मैदा, बारीक आटा तथा अधिक दालों का सेवन करने से शरीर में वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
दूषित भोजन, अधिक मांस का सेवन तथा बर्फ का सेवन करने के कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
आलसी जीवन, सूर्यस्नान, तथा व्यायाम की कमी के कारण पाचन क्रिया कमजोर हो जाती है जिसके कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
इन सभी कारणों से पेट में कब्ज (गंदी वायु) बनने लगती है और यही वायु शरीर में जहां भी रुकती है, फंसती है या टकराती है, वहां दर्द होता है। यही दर्द वात दोष कहलाता है।
🥗2. पित्त होने का कारण - पित्त दोष होने का कारण मूल रुप से गलत आहार है जैसे- चीनी, नमक तथा मिर्चमसाले का अधिक सेवन करना।
नशीली चीजों तथा दवाईयों का अधिक सेवन करने के कारण पित्त दोष उत्पन्न होता है।
दूषित भोजन तथा केवल पके हुए भोजन का सेवन करने से पित्त दोष उत्पन्न होता है।
भोजन में कम से कम 75 से 80 प्रतिशत क्षारीय पदार्थ (फल, सब्जियां इत्यादि अपक्वाहार) तथा 20 से 25 प्रतिशत अम्लीय पक्वाहार पदार्थ होने चाहिए। जब इसके विपरीत स्थिति होती है तो शरीर में अम्लता बढ़ जाती हैं और पित्त दोष उत्पन्न हो जाता है।
🥗3. कफ होने का कारण - तेल, मक्खन तथा घी आदि चिकनाई वाली चीजों को हजम करने के लिए बहुत अधिक कार्य करने तथा व्यायाम की आवश्यकता होती है और जब इसका अभाव होता है तो पाचनक्रिया कम हो जाती है और पाचनक्रिया की क्षमता से अधिक मात्रा में चिकनाई वाली वस्तुएं सेवन करते है तो कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।
रात के समय में दूध या दही का सेवन करने से कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।
🥗🥗वात, पित्त और कफ के कारण होने वाले रोग निम्नलिखित हैं-
🥗वात के कारण होने वाले रोग -
अफारा, टांगों में दर्द, पेट में वायु बनना, जोड़ों में दर्द, लकवा, साइटिका, शरीर के अंगों का सुन्न हो जाना, शिथिल होना, कांपना, फड़कना, टेढ़ा हो जाना, दर्द, नाड़ियों में खिंचाव, कम सुनना, वात ज्वर तथा शरीर के किसी भी भाग में अचानक दर्द हो जाना आदि।
🥗पित्त के कारण होने वाले रोग -
पेट, छाती, शरीर आदि में जलन होना, खट्टी डकारें आना, पित्ती उछलना (एलर्जी), रक्ताल्पता (खून की कमी), चर्म रोग (खुजली, फोड़े तथा फुन्सियां आदि), कुष्ठरोग, जिगर के रोग, तिल्ली की वृद्धि हो जाना, शरीर में कमजोरी आना, गुर्दे तथा हृदय के रोग आदि।
🥗कफ के कारण होने वाले रोग -
बार-बार बलगम निकलना, सर्दी लगना, श्वसन संस्थान सम्बंधी रोग (खांसी, दमा आदि), शरीर का फूलना, मोटापा बढ़ना, जुकाम होना तथा फेफड़ों की टी.बी. आदि।
🥗🥗वात से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-
🥗आहार चिकित्सा-
🥗 वात से पीड़ित रोगी को अपने भोजन में रेशेदार भोजन (बिना पकाया हुआ भोजन) फल, सलाद तथा पत्तेदार सब्जियों का अधिक प्रयोग करना चाहिए।
🥗मुनक्का अंजीर, बेर, अदरक, तुलसी, गाजर, सोयाबीन, सौंफ तथा छोटी इलायची का भोजन में अधिक उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
🥗 रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में लहसुन की 2-4 कलियां खानी चाहिए तथा अपने भोजन में मक्खन का उपयोग करना चाहिए इसके फलस्वरूप वात रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
🥗उपवास -
वात रोग से पीड़ित रोगी को सबसे पहले कुछ दिनों तक सब्जियों या फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए तथा इसके बाद अन्य चिकित्सा करनी चाहिए।
🥗🥗पित्त से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-
🥗आहार चिकित्सा
🥗पित्त रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सब्जियों तथा फलों का रस पीना चाहिए।
🥗 पित्त रोग से पीड़ित रोगी को भूख न लग रही हो तो केवल फलों का रस तथा सब्जियों का रस पीना चाहिए और सलाद का अपने भोजन में उपयोग करना चाहिए। इसके फलस्वरूप उसका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
🥗रोगी व्यक्ति को पूरी तरह स्वस्थ होने तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए।
🥗पित्त रोग से पीड़ित रोगी को खट्टी, मसालेदार, नमकीन चीजें तथा मिठाईयां नहीं खानी चाहिए क्योंकि इन चीजों के सेवन से पित्त रोग और बिगड़ जाता है।
🥗पित्त के रोगी के लिए गाजर का रस पीना बहुत ही लाभकारी होता है, इसलिए रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में कम से कम 1 गिलास गाजर का रस पीना चाहिए।
🥗 अनार, मुनक्का, अंजीर, जामुन, सिंघाड़ा, सौंफ तथा दूब का रस पीना पित्त रोगी के लिए बहुत ही लाभकारी होता है।
🥗🥗🥗समाधान 3 प्रकृति का...
🥗आयुर्वेद के अनुसार किसी भी तरह के रोग होने के 3 कारण होते हैं-
🥗1. वात:- शरीर में गैस बनना।
🥗2. पित्त:- शरीर की गर्मी बढ़ना।
🥗3. कफ:- शरीर में बलगम बनना।
🥗🥗किसी भी रोग के होने का कारण एक भी हो सकता है और दो भी हो सकता है या दोनों का मिश्रण भी हो सकता है या तीनों दोषों के कारण भी रोग हो सकता है।
🥗1. वात होने का कारण - गलत भोजन, बेसन, मैदा, बारीक आटा तथा अधिक दालों का सेवन करने से शरीर में वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
दूषित भोजन, अधिक मांस का सेवन तथा बर्फ का सेवन करने के कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
आलसी जीवन, सूर्यस्नान, तथा व्यायाम की कमी के कारण पाचन क्रिया कमजोर हो जाती है जिसके कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
इन सभी कारणों से पेट में कब्ज (गंदी वायु) बनने लगती है और यही वायु शरीर में जहां भी रुकती है, फंसती है या टकराती है, वहां दर्द होता है। यही दर्द वात दोष कहलाता है।
🥗2. पित्त होने का कारण - पित्त दोष होने का कारण मूल रुप से गलत आहार है जैसे- चीनी, नमक तथा मिर्चमसाले का अधिक सेवन करना।
नशीली चीजों तथा दवाईयों का अधिक सेवन करने के कारण पित्त दोष उत्पन्न होता है।
दूषित भोजन तथा केवल पके हुए भोजन का सेवन करने से पित्त दोष उत्पन्न होता है।
भोजन में कम से कम 75 से 80 प्रतिशत क्षारीय पदार्थ (फल, सब्जियां इत्यादि अपक्वाहार) तथा 20 से 25 प्रतिशत अम्लीय पक्वाहार पदार्थ होने चाहिए। जब इसके विपरीत स्थिति होती है तो शरीर में अम्लता बढ़ जाती हैं और पित्त दोष उत्पन्न हो जाता है।
🥗3. कफ होने का कारण - तेल, मक्खन तथा घी आदि चिकनाई वाली चीजों को हजम करने के लिए बहुत अधिक कार्य करने तथा व्यायाम की आवश्यकता होती है और जब इसका अभाव होता है तो पाचनक्रिया कम हो जाती है और पाचनक्रिया की क्षमता से अधिक मात्रा में चिकनाई वाली वस्तुएं सेवन करते है तो कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।
रात के समय में दूध या दही का सेवन करने से कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।
🥗🥗वात, पित्त और कफ के कारण होने वाले रोग निम्नलिखित हैं-
🥗वात के कारण होने वाले रोग -
अफारा, टांगों में दर्द, पेट में वायु बनना, जोड़ों में दर्द, लकवा, साइटिका, शरीर के अंगों का सुन्न हो जाना, शिथिल होना, कांपना, फड़कना, टेढ़ा हो जाना, दर्द, नाड़ियों में खिंचाव, कम सुनना, वात ज्वर तथा शरीर के किसी भी भाग में अचानक दर्द हो जाना आदि।
🥗पित्त के कारण होने वाले रोग -
पेट, छाती, शरीर आदि में जलन होना, खट्टी डकारें आना, पित्ती उछलना (एलर्जी), रक्ताल्पता (खून की कमी), चर्म रोग (खुजली, फोड़े तथा फुन्सियां आदि), कुष्ठरोग, जिगर के रोग, तिल्ली की वृद्धि हो जाना, शरीर में कमजोरी आना, गुर्दे तथा हृदय के रोग आदि।
🥗कफ के कारण होने वाले रोग -
बार-बार बलगम निकलना, सर्दी लगना, श्वसन संस्थान सम्बंधी रोग (खांसी, दमा आदि), शरीर का फूलना, मोटापा बढ़ना, जुकाम होना तथा फेफड़ों की टी.बी. आदि।
🥗🥗वात से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-
🥗आहार चिकित्सा-
🥗 वात से पीड़ित रोगी को अपने भोजन में रेशेदार भोजन (बिना पकाया हुआ भोजन) फल, सलाद तथा पत्तेदार सब्जियों का अधिक प्रयोग करना चाहिए।
🥗मुनक्का अंजीर, बेर, अदरक, तुलसी, गाजर, सोयाबीन, सौंफ तथा छोटी इलायची का भोजन में अधिक उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
🥗 रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में लहसुन की 2-4 कलियां खानी चाहिए तथा अपने भोजन में मक्खन का उपयोग करना चाहिए इसके फलस्वरूप वात रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
🥗उपवास -
वात रोग से पीड़ित रोगी को सबसे पहले कुछ दिनों तक सब्जियों या फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए तथा इसके बाद अन्य चिकित्सा करनी चाहिए।
🥗🥗पित्त से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-
🥗आहार चिकित्सा
🥗पित्त रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सब्जियों तथा फलों का रस पीना चाहिए।
🥗 पित्त रोग से पीड़ित रोगी को भूख न लग रही हो तो केवल फलों का रस तथा सब्जियों का रस पीना चाहिए और सलाद का अपने भोजन में उपयोग करना चाहिए। इसके फलस्वरूप उसका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
🥗रोगी व्यक्ति को पूरी तरह स्वस्थ होने तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए।
🥗पित्त रोग से पीड़ित रोगी को खट्टी, मसालेदार, नमकीन चीजें तथा मिठाईयां नहीं खानी चाहिए क्योंकि इन चीजों के सेवन से पित्त रोग और बिगड़ जाता है।
🥗पित्त के रोगी के लिए गाजर का रस पीना बहुत ही लाभकारी होता है, इसलिए रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में कम से कम 1 गिलास गाजर का रस पीना चाहिए।
🥗 अनार, मुनक्का, अंजीर, जामुन, सिंघाड़ा, सौंफ तथा दूब का रस पीना पित्त रोगी के लिए बहुत ही लाभकारी होता है।
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ब्रह्मचर्य ही जीवन (हरीॐ)
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पतंजलि कहते हैं- ‘योगाश्चित्त वृत्तिनिरोधः’।* अर्थात योग चित्त की वृत्तियों का संयमन है। चित्त वृत्तियों के निरोध के लिए महर्षि पतंजलि ने द्वितीय और तृतीय पाद में जिस अष्टांग योग साधन का उपदेश दिया है, उसका संक्षिप्त परिचय निम्नानुसार है:-
1).यम: कायिक, वाचिक तथा मानसिक इस संयम के लिए अहिंसा, सत्य, अस्तेय चोरी न करना, ब्रह्मचर्य जैसे अपरिग्रह आदि पाँच आचार विहित हैं। इनका पालन न करने से व्यक्ति का जीवन और समाज दोनों ही दुष्प्रभावित होते हैं।
(2).नियम: मनुष्य को कर्तव्य परायण बनाने तथा जीवन को सुव्यवस्थित करते हेतु नियमों का विधान किया गया है। इनके अंतर्गत शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान का समावेश है। शौच में बाह्य तथा आन्तर दोनों ही प्रकार के शुद्धि समाविष्ट है।
(3).आसन: पतंजलि ने स्थिर तथा सुखपूर्वक बैठने की क्रिया को आसन कहा है। परवर्ती विचारकों ने अनेक आसनों की कल्पना की है। वास्तव में आसन हठयोग का एक मुख्य विषय ही है। इनसे संबंधित ‘हठयोग प्रदीपिका’ ‘घरेण्ड संहिता’ तथा ‘योगाशिखोपनिषद्’ में विस्तार से वर्णन मिलता है।
(4).प्राणायाम: योग की यथेष्ट भूमिका के लिए नाड़ी साधन और उनके जागरण के लिए किया जाने वाला श्वास और प्रश्वास का नियमन प्राणायाम है। प्राणायाम मन की चंचलता और विक्षुब्धता पर विजय प्राप्त करने के लिए बहुत सहायक है।(5).प्रत्याहार: इंद्रियों को विषयों से हटाने का नाम ही प्रत्याहार है। इंद्रियाँ मनुष्य को बाह्यभिमुख किया करती हैं। प्रत्याहार के इस अभ्यास से साधक योग के लिए परम आवश्यक अन्तर्मुखिता की स्थिति प्राप्त करता है।
(6).धारणा: चित्त को एक स्थान विशेष पर केंद्रित करना ही धारणा है।
(7).ध्यान: जब ध्येय वस्तु का चिंतन करते हुए चित्त तद्रूप हो जाता है तो उसे ध्यान कहते हैं। पूर्ण ध्यान की स्थिति में किसी अन्य वस्तु का ज्ञान अथवा उसकी स्मृति चित्त में प्रविष्ट नहीं होती।
(8).समाधि: यह चित्त की अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है। योग दर्शन समाधि के द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति को संभव मानता है।
1).यम: कायिक, वाचिक तथा मानसिक इस संयम के लिए अहिंसा, सत्य, अस्तेय चोरी न करना, ब्रह्मचर्य जैसे अपरिग्रह आदि पाँच आचार विहित हैं। इनका पालन न करने से व्यक्ति का जीवन और समाज दोनों ही दुष्प्रभावित होते हैं।
(2).नियम: मनुष्य को कर्तव्य परायण बनाने तथा जीवन को सुव्यवस्थित करते हेतु नियमों का विधान किया गया है। इनके अंतर्गत शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान का समावेश है। शौच में बाह्य तथा आन्तर दोनों ही प्रकार के शुद्धि समाविष्ट है।
(3).आसन: पतंजलि ने स्थिर तथा सुखपूर्वक बैठने की क्रिया को आसन कहा है। परवर्ती विचारकों ने अनेक आसनों की कल्पना की है। वास्तव में आसन हठयोग का एक मुख्य विषय ही है। इनसे संबंधित ‘हठयोग प्रदीपिका’ ‘घरेण्ड संहिता’ तथा ‘योगाशिखोपनिषद्’ में विस्तार से वर्णन मिलता है।
(4).प्राणायाम: योग की यथेष्ट भूमिका के लिए नाड़ी साधन और उनके जागरण के लिए किया जाने वाला श्वास और प्रश्वास का नियमन प्राणायाम है। प्राणायाम मन की चंचलता और विक्षुब्धता पर विजय प्राप्त करने के लिए बहुत सहायक है।(5).प्रत्याहार: इंद्रियों को विषयों से हटाने का नाम ही प्रत्याहार है। इंद्रियाँ मनुष्य को बाह्यभिमुख किया करती हैं। प्रत्याहार के इस अभ्यास से साधक योग के लिए परम आवश्यक अन्तर्मुखिता की स्थिति प्राप्त करता है।
(6).धारणा: चित्त को एक स्थान विशेष पर केंद्रित करना ही धारणा है।
(7).ध्यान: जब ध्येय वस्तु का चिंतन करते हुए चित्त तद्रूप हो जाता है तो उसे ध्यान कहते हैं। पूर्ण ध्यान की स्थिति में किसी अन्य वस्तु का ज्ञान अथवा उसकी स्मृति चित्त में प्रविष्ट नहीं होती।
(8).समाधि: यह चित्त की अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है। योग दर्शन समाधि के द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति को संभव मानता है।
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उस मनुष्य का जीवन कौड़ी- तुल्य है, जिसका कोई लक्ष्य नहीं.
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जिसने मन को वश में कर लिया है, उसको परम-शान्ति स्वरूप परमात्मा पूर्ण-रूप से प्राप्त हो जाता है, उस मनुष्य के लिये सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान एक समान होते है।
ऎसा मनुष्य स्थिर चित्त वाला और इन्द्रियों को वश में करके, परमात्मा के ज्ञान द्वारा परमात्मा को प्राप्त करके, पूर्ण सन्तुष्ट रहता है, ऎसे परमात्मा को प्राप्त हुए मनुष्य के लिये मिट्टी, पत्थर और सोना एक समान होते है।
ऎसा मनुष्य स्वभाव से सभी का हित चाहने वाला, मित्रों और शत्रुओं में, तटस्थों और मध्यस्थों में, शुभ-चिन्तकों और ईर्ष्यालुओं में, पुण्यात्माओं और पापात्माओं में भी एक समान भाव रखने वाला होता है।
ऎसा मनुष्य निरन्तर मन सहित शरीर से किसी भी वस्तु के प्रति आकर्षित हुए बिना तथा किसी भी वस्तु का संग्रह किये बिना परमात्मा के ध्यान में एक ही भाव से स्थित रहने वाला होता है।
ऎसा मनुष्य स्थिर चित्त वाला और इन्द्रियों को वश में करके, परमात्मा के ज्ञान द्वारा परमात्मा को प्राप्त करके, पूर्ण सन्तुष्ट रहता है, ऎसे परमात्मा को प्राप्त हुए मनुष्य के लिये मिट्टी, पत्थर और सोना एक समान होते है।
ऎसा मनुष्य स्वभाव से सभी का हित चाहने वाला, मित्रों और शत्रुओं में, तटस्थों और मध्यस्थों में, शुभ-चिन्तकों और ईर्ष्यालुओं में, पुण्यात्माओं और पापात्माओं में भी एक समान भाव रखने वाला होता है।
ऎसा मनुष्य निरन्तर मन सहित शरीर से किसी भी वस्तु के प्रति आकर्षित हुए बिना तथा किसी भी वस्तु का संग्रह किये बिना परमात्मा के ध्यान में एक ही भाव से स्थित रहने वाला होता है।
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भगवान ने युवा को इतना अपार ऊर्जा घिसने के लिए ही देता है न कि घर में बैठ के दूसरे युवा के कारनामे (webseries ,मूवी आदि ) देखने के लिये । बिना घिसे तो हीरे का भी कोई मोल नही होता । कभी सूरत जाओ तो देखना कैसे व्यापारी लोग अफ्रीकी देशों से कम कीमत में कच्चा हीरा खरीदते हैं और उसे घिस घिस के उसकी चमक बढ़ाते है फिर इसे अमेरिका में 10 गुना कीमत पर बेचते हैं । अमरीका में भारतीय हीरे की बड़ी मांग है । इसलिए अपना कीमत बढ़ाना है तो घिसो , घर से बाहर निकलो , व्यायाम करो , ध्यान करो , जो कार्य तुम्हे कठिन लगती है वही ज्यादा करो ताकि एक दिन वो कार्य भी सरल लगनी लगे । लोगो से बात करना सीखो , अपना संचार कौशल बढ़ाओ । अपनी डिमांड बढ़ाओ । कुछ ऐसा करो जो कोई और नही कर सकता। यही तो सफलता है ।
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तुम शिक्षा ग्रहण कर रहे हो । अच्छी बात है। परंतु तुम
अश्लीलता भी देखते हो ।
ये बहुत बुरी बात है । अब
तुम्हारा सब ज्ञान व्यर्थ है । शून्य है ।
अश्लीलता भी देखते हो ।
ये बहुत बुरी बात है । अब
तुम्हारा सब ज्ञान व्यर्थ है । शून्य है ।
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This is choke against the wall main target eyes 👀
#selfdefense
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