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Brahmacharya wo shakti hai jisse insaan khudko 1000 tarah ki bimaariyon se dur rakh sakta hai 🔥
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बेर की दातुन से क्या लाभ हैं?
बेर की दातुन से दाँतों की सफाई तो होती हैं किन्तु जो व्यक्ति अपने गले में मधुरता लाने का इच्छुक हो व नियमित रूप से बेर की दातुन प्रयोग करें।
अपामार्ग की दातुन के लाभ बतायें ?
अपामार्ग की दातुन स्मरण शक्ति में वृद्धि करती हैं और मुख की दुर्गन्ध भी दूर भगाती हैं।
#sanatandharma
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बेर की दातुन से दाँतों की सफाई तो होती हैं किन्तु जो व्यक्ति अपने गले में मधुरता लाने का इच्छुक हो व नियमित रूप से बेर की दातुन प्रयोग करें।
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ब्रह्मचर्य ही जीवन (हरीॐ) pinned «1.खानपान राजसी तामसिक👉🏻 नाइटफॉल 2. रोजाना नही नहाए तो 👉🏻 नाइटफॉल 3. पाचन तंत्र टीक नही तो👉🏻 नाइटफॉल 4कब्ज.Constipation से👉🏻 नाइटफॉल 5. भय चिंता करने से👉🏻 नाइटफॉल😍 6 अधिक डिप्रेशन में रहने से 👉🏻 नाइटफॉल 7 रात को मल मूत्र का वेग बढ़ने से👉🏻 नाइटफॉल होता है 8रात…»
✍"बताओ मुझे देश कोई कहीं,
इसी हिंद का हो ऋणी जो नही ।।
"जहां थे भीष्म जैसे बली ।
सुखी दीर्घजीवी, शूची, निर्च्छली ।।
"रहा विश्व में जो बड़े से बड़ा !
वही देश ! हां ! आज नीचे पड़ा ।।
#meditation
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ब्रह्मचर्य ही जीवन (हरीॐ)
आप कोन हो ?
कृपया कर के सभी सहयोग करे ! उससे हम आगे का content add करेंगे चैनल पर. 🙏🙏
नीम की दातुन क्यों करें?
नीम की दातुन से एक नहीं बल्कि अनेकों लाभ हैं। प्रथम तो दाँतों की सफाई होती है, दूसरा लाभ पायरिया जैसे रोगों में नाम की दातुन अति उत्तम औषधि है। नीम की दातुन का तीसरा अति प्रभावकारी लाभ यह है कि दातुन करते समय जो दातुन का रस पेट में चला जाता है तो आंत में होने वाली कीड़िया (कृमि) मर जाते हैं। उन कीडियों के कारण पेट में अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न होते हैं। जैसे- गैस की समस्या, अपच आदि। नीम की दातुन से हमारे मुँह में अधिक मात्रा में लार बनती है जो पेट के एसिड़ को खत्म करता है और पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है। अमेरिका यूरोप के लोग भी अब भारत से नीम मगांकर, नीम की दातुन करने लगे हैं और हम मूर्खो की तरह हड्डियों के चूरे और केमिकल से बने कोलकेट, पेप्सोडेन्ट आदि उपयोग करने लगे हैं।
गूलर की दातुन की लाभ बतायें ?
जिसकी जुबान लड़खड़ाती हो, बोलते समय हकलाता हो, जीभ में कालापन
हो। ऐसे व्यक्तियों के लिए गूलर की दातुन फायदेमंद हैं।
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गूलर की दातुन की लाभ बतायें ?
जिसकी जुबान लड़खड़ाती हो, बोलते समय हकलाता हो, जीभ में कालापन
हो। ऐसे व्यक्तियों के लिए गूलर की दातुन फायदेमंद हैं।
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अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चैति घातकाः ।।-(मनु० ५/५१)
अर्थ:-पशु-हत्या की अनुमति देने वाला,शस्त्र से मांस काटने वाला,मारने वाला,खरीदने वाला,बेचने वाला,पकाने वाला,परोसने वाला और खाने वाला,ये सब घातक अर्थात् कसाई हैं।
वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ।
मांसानि च न खादेद्यस्तयोः पुण्यफलं समम् ।।
-(मनु० ५/५३)
अर्थ:-जो मनुष्य सौ वर्ष-पर्यन्त प्रत्येक वर्ष एक बार अश्वमेध यज्ञ करता है तथा अन्य पुरुष जो मांसभक्षी नहीं है,इन दोनों के पुण्य का फल समान है।
फलमूलाशनैर्मेध्यैर्मुन्यन्नानां च भोजनैः
न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्जनात् ।।
-(मनु० ५/५४)
अर्थ:-मनुष्य को सेब,केला आदि पवित्र फल,गाजर,मूली आदि कन्दमूल और अन्न के खाने से वह फल प्राप्त नहीं होता,जो मांस-भक्षण के परित्याग से प्राप्त होता है।
मांसभक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम् एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः ।।-(मनु० ५/५५)
अर्थ:-विद्वज्जन मांस का यह लक्षण कहते हैं कि जिसके मांस को मैं इस जन्म में खाता हूं वह आगामी जन्म में मेरे मांस का भक्षण करेगा।
उपर्युक्त श्लोकों से यह ज्ञात होता है कि मनु महाराज मांस-भक्षण के कितने प्रबल विरोधी थे। कुछ लोगों ने हमारे शास्त्रों में मिलावट करके पशुबलि पाषाणपूजा व मांसाहार को उचित बता कर जघन्य अपराध किया है।
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वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ।
मांसानि च न खादेद्यस्तयोः पुण्यफलं समम् ।।
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अर्थ:-जो मनुष्य सौ वर्ष-पर्यन्त प्रत्येक वर्ष एक बार अश्वमेध यज्ञ करता है तथा अन्य पुरुष जो मांसभक्षी नहीं है,इन दोनों के पुण्य का फल समान है।
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न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्जनात् ।।
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अर्थ:-मनुष्य को सेब,केला आदि पवित्र फल,गाजर,मूली आदि कन्दमूल और अन्न के खाने से वह फल प्राप्त नहीं होता,जो मांस-भक्षण के परित्याग से प्राप्त होता है।
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अर्थ:-विद्वज्जन मांस का यह लक्षण कहते हैं कि जिसके मांस को मैं इस जन्म में खाता हूं वह आगामी जन्म में मेरे मांस का भक्षण करेगा।
उपर्युक्त श्लोकों से यह ज्ञात होता है कि मनु महाराज मांस-भक्षण के कितने प्रबल विरोधी थे। कुछ लोगों ने हमारे शास्त्रों में मिलावट करके पशुबलि पाषाणपूजा व मांसाहार को उचित बता कर जघन्य अपराध किया है।
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सूर्य को जल देने का वैज्ञानिक कारण स्पष्ट करें।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य को जल दिये बिना अन्न ग्रहण करना पाप है। अंलकारिक भाषा में वेद कहते हैं कि सन्ध्या के समय सूर्य को दिये गये अर्ध्य के जलकण वज्र बनकर असुरों का नाश करते हैं। विज्ञान की दृष्टि में असुर कौन है? मनुष्यों को प्रताड़ित करने वाले ये असुर कौन हैं? ये असुर हैं - टायफाइड, निमोनिया, राजयक्ष्मा आदि रोग जिनको नष्ट करने की दिव्य शक्ति सूर्य की किरणों में होती हैं। एन्थ्रेक्स के वायरस जो कई वर्षों के शुद्धिकरण से नहीं मरते, वे सूर्य की किरणों से एक-डेढ़ घंटे में मर जाते हैं। हैजा, निमोनिया, चेचक आदि के कीटाणु पानी में डालकर उबालने पर नहीं मरते किन्तु सूर्य की प्रभातकालीन किरणों से शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। सूर्य को अर्घ्य (जल) देते समय साधक के ऊपर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं। शास्त्र अनुसार प्रातः काल पूर्व की ओर मुख करके जल देना चाहिए। जल के पात्र (लोटे) को छाती के बराबर ऊँचाई रखकर जल गिरायें और लोटे के उभरे भाग को तब तक देखते रहें जब तक जल समाप्त हो जाये ऐसा करने से आँखों में मोतियाबिन्दु नहीं होता।
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💥ब्रह्मचर्य पालन करने के लिए जरूरी नियम :–
⚡ब्रह्ममुहुर्त में उठना
⚡प्रतिदिन योग , प्राणायाम और ईश्वर का ध्यान करना
⚡सात्विक भोजन
⚡ब्रह्मचर्य संबंधित स्वाध्याय
⚡अश्लील फिल्म आदि थोड़ा सा भी नही
⚡मोबाइल का सिर्फ जरूरी काम के लिए प्रयोग
⚡हमेशा व्यस्त रहे , 1 मिनट भी खाली न बैठें
इनमे से एक भी नियम को तोड़ना यानी ब्रह्मचर्य नाश की तैयारी करना .....
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