नीम की दातुन क्यों करें?
नीम की दातुन से एक नहीं बल्कि अनेकों लाभ हैं। प्रथम तो दाँतों की सफाई होती है, दूसरा लाभ पायरिया जैसे रोगों में नाम की दातुन अति उत्तम औषधि है। नीम की दातुन का तीसरा अति प्रभावकारी लाभ यह है कि दातुन करते समय जो दातुन का रस पेट में चला जाता है तो आंत में होने वाली कीड़िया (कृमि) मर जाते हैं। उन कीडियों के कारण पेट में अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न होते हैं। जैसे- गैस की समस्या, अपच आदि। नीम की दातुन से हमारे मुँह में अधिक मात्रा में लार बनती है जो पेट के एसिड़ को खत्म करता है और पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है। अमेरिका यूरोप के लोग भी अब भारत से नीम मगांकर, नीम की दातुन करने लगे हैं और हम मूर्खो की तरह हड्डियों के चूरे और केमिकल से बने कोलकेट, पेप्सोडेन्ट आदि उपयोग करने लगे हैं।
गूलर की दातुन की लाभ बतायें ?
जिसकी जुबान लड़खड़ाती हो, बोलते समय हकलाता हो, जीभ में कालापन
हो। ऐसे व्यक्तियों के लिए गूलर की दातुन फायदेमंद हैं।
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नीम की दातुन से एक नहीं बल्कि अनेकों लाभ हैं। प्रथम तो दाँतों की सफाई होती है, दूसरा लाभ पायरिया जैसे रोगों में नाम की दातुन अति उत्तम औषधि है। नीम की दातुन का तीसरा अति प्रभावकारी लाभ यह है कि दातुन करते समय जो दातुन का रस पेट में चला जाता है तो आंत में होने वाली कीड़िया (कृमि) मर जाते हैं। उन कीडियों के कारण पेट में अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न होते हैं। जैसे- गैस की समस्या, अपच आदि। नीम की दातुन से हमारे मुँह में अधिक मात्रा में लार बनती है जो पेट के एसिड़ को खत्म करता है और पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है। अमेरिका यूरोप के लोग भी अब भारत से नीम मगांकर, नीम की दातुन करने लगे हैं और हम मूर्खो की तरह हड्डियों के चूरे और केमिकल से बने कोलकेट, पेप्सोडेन्ट आदि उपयोग करने लगे हैं।
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जिसकी जुबान लड़खड़ाती हो, बोलते समय हकलाता हो, जीभ में कालापन
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अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चैति घातकाः ।।-(मनु० ५/५१)
अर्थ:-पशु-हत्या की अनुमति देने वाला,शस्त्र से मांस काटने वाला,मारने वाला,खरीदने वाला,बेचने वाला,पकाने वाला,परोसने वाला और खाने वाला,ये सब घातक अर्थात् कसाई हैं।
वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ।
मांसानि च न खादेद्यस्तयोः पुण्यफलं समम् ।।
-(मनु० ५/५३)
अर्थ:-जो मनुष्य सौ वर्ष-पर्यन्त प्रत्येक वर्ष एक बार अश्वमेध यज्ञ करता है तथा अन्य पुरुष जो मांसभक्षी नहीं है,इन दोनों के पुण्य का फल समान है।
फलमूलाशनैर्मेध्यैर्मुन्यन्नानां च भोजनैः
न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्जनात् ।।
-(मनु० ५/५४)
अर्थ:-मनुष्य को सेब,केला आदि पवित्र फल,गाजर,मूली आदि कन्दमूल और अन्न के खाने से वह फल प्राप्त नहीं होता,जो मांस-भक्षण के परित्याग से प्राप्त होता है।
मांसभक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम् एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः ।।-(मनु० ५/५५)
अर्थ:-विद्वज्जन मांस का यह लक्षण कहते हैं कि जिसके मांस को मैं इस जन्म में खाता हूं वह आगामी जन्म में मेरे मांस का भक्षण करेगा।
उपर्युक्त श्लोकों से यह ज्ञात होता है कि मनु महाराज मांस-भक्षण के कितने प्रबल विरोधी थे। कुछ लोगों ने हमारे शास्त्रों में मिलावट करके पशुबलि पाषाणपूजा व मांसाहार को उचित बता कर जघन्य अपराध किया है।
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वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ।
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-(मनु० ५/५३)
अर्थ:-जो मनुष्य सौ वर्ष-पर्यन्त प्रत्येक वर्ष एक बार अश्वमेध यज्ञ करता है तथा अन्य पुरुष जो मांसभक्षी नहीं है,इन दोनों के पुण्य का फल समान है।
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न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्जनात् ।।
-(मनु० ५/५४)
अर्थ:-मनुष्य को सेब,केला आदि पवित्र फल,गाजर,मूली आदि कन्दमूल और अन्न के खाने से वह फल प्राप्त नहीं होता,जो मांस-भक्षण के परित्याग से प्राप्त होता है।
मांसभक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम् एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः ।।-(मनु० ५/५५)
अर्थ:-विद्वज्जन मांस का यह लक्षण कहते हैं कि जिसके मांस को मैं इस जन्म में खाता हूं वह आगामी जन्म में मेरे मांस का भक्षण करेगा।
उपर्युक्त श्लोकों से यह ज्ञात होता है कि मनु महाराज मांस-भक्षण के कितने प्रबल विरोधी थे। कुछ लोगों ने हमारे शास्त्रों में मिलावट करके पशुबलि पाषाणपूजा व मांसाहार को उचित बता कर जघन्य अपराध किया है।
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सूर्य को जल देने का वैज्ञानिक कारण स्पष्ट करें।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य को जल दिये बिना अन्न ग्रहण करना पाप है। अंलकारिक भाषा में वेद कहते हैं कि सन्ध्या के समय सूर्य को दिये गये अर्ध्य के जलकण वज्र बनकर असुरों का नाश करते हैं। विज्ञान की दृष्टि में असुर कौन है? मनुष्यों को प्रताड़ित करने वाले ये असुर कौन हैं? ये असुर हैं - टायफाइड, निमोनिया, राजयक्ष्मा आदि रोग जिनको नष्ट करने की दिव्य शक्ति सूर्य की किरणों में होती हैं। एन्थ्रेक्स के वायरस जो कई वर्षों के शुद्धिकरण से नहीं मरते, वे सूर्य की किरणों से एक-डेढ़ घंटे में मर जाते हैं। हैजा, निमोनिया, चेचक आदि के कीटाणु पानी में डालकर उबालने पर नहीं मरते किन्तु सूर्य की प्रभातकालीन किरणों से शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। सूर्य को अर्घ्य (जल) देते समय साधक के ऊपर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं। शास्त्र अनुसार प्रातः काल पूर्व की ओर मुख करके जल देना चाहिए। जल के पात्र (लोटे) को छाती के बराबर ऊँचाई रखकर जल गिरायें और लोटे के उभरे भाग को तब तक देखते रहें जब तक जल समाप्त हो जाये ऐसा करने से आँखों में मोतियाबिन्दु नहीं होता।
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💥ब्रह्मचर्य पालन करने के लिए जरूरी नियम :–
⚡ब्रह्ममुहुर्त में उठना
⚡प्रतिदिन योग , प्राणायाम और ईश्वर का ध्यान करना
⚡सात्विक भोजन
⚡ब्रह्मचर्य संबंधित स्वाध्याय
⚡अश्लील फिल्म आदि थोड़ा सा भी नही
⚡मोबाइल का सिर्फ जरूरी काम के लिए प्रयोग
⚡हमेशा व्यस्त रहे , 1 मिनट भी खाली न बैठें
इनमे से एक भी नियम को तोड़ना यानी ब्रह्मचर्य नाश की तैयारी करना .....
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सावधान !!
खड़े पहाड़ की चढ़ाई है ब्रह्मचर्य
एक छोटी सी गलती सीधे जमीन पर ला देगी
जो जितना ऊपर है वो उतना ज्यादा सावधान रहे क्युकी जितने ऊपर से गिरोगे चोट उतनी ज्यादा लगेगी
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मनुष्य को मांस खाना चाहिए अथवा नहीं खाना चाहिए?
मनुष्य के पास न तो मासांहारी दाँत हैं और न ही आँत। कहने का तात्पर्य यह कि मनुष्य जाति प्राकृतिक रूप से शाकाहारी हैं किन्तु अपनी जीभ का स्वाद बदलने के लिए लोग मांसाहारी व्यंजन खाते हैं। वस्तुतः जो जीभ से चिपकाकर पानी पीने वाले जीव हैं, वास्तव में मांस का भोजन उनके लिए है। प्रकृति ने मांस नोचने के लिए उन्हें नुकीले दाँत और मांस को पचाने के लिए आंत प्रदान किये हैं। मनुष्य के शरीर में मांस को पचाने के लिए 30 दिन का समय लगता हैं। जैसे कुत्ता, बिल्ली, शेर, बाघ आदि और घूँट-घूँटकर पानी पीने वाले जीव शाकाहारी होते हैं। जैसे गाय, भैंस, बन्दर, मनुष्य आदि मांसाहारी से जीवहत्या को प्रोत्साहन मिलता हैं जो हमारी संस्कृति, सभ्यता एवम् धर्म के अनुकूल नहीं हैं।
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शरीर पर तेल की मालिश करने का क्या रहस्य हैं?
शरीर पर तेल मालिश करने से थकावट, कमजोरी और वात जनित रोगों से मुक्ति मिलती है। सिर में मालिश तथा पैरों की तली में तेल मालिश करना विशेष रूप से फायदेमंद हैं। शरीर में तेल मलने से त्वचा में कोमलता आती है। शुष्की नष्ट हो जाती हैं, दृष्टि तेज होती है।
तेल मर्दन का वैज्ञानिक आधार क्या हैं?
तेल मर्दन त्वचा के रोम छिद्रों को खोल देता है जो स्वास्थ्य के लिए अत्याधिक लाभप्रद है। सिर में नियमित तेल लगाने से बालों का गिरना, सिर दर्द, मस्तिष्क की दुर्बलता आदि स्वतः नष्ट हो जाती हैं।
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तेल मर्दन का वैज्ञानिक आधार क्या हैं?
तेल मर्दन त्वचा के रोम छिद्रों को खोल देता है जो स्वास्थ्य के लिए अत्याधिक लाभप्रद है। सिर में नियमित तेल लगाने से बालों का गिरना, सिर दर्द, मस्तिष्क की दुर्बलता आदि स्वतः नष्ट हो जाती हैं।
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Napoleon Bonaparte Short Story in Hindi| Sanyami Jeevan Ke Fayde:
⚜नेपोलियन के हाथ में सत्ता आने से पहले वहाँ लुई सोलहवें (louis XVI )तथा उसके बोरबोर वंश का राज्य था । उसमें भी वासना और विलासिता काफी बढ़ चुकी थी ।
⚜राजा के प्रमुख सरदारों और सामंतों में भी ‘काम’ रूपी भेड़िया अच्छी तरह से घुस चुका था । आखिर सन् 1789 में वहाँ राज्य-क्रांति हुई और लोगों ने विलासी राजा-रानी और उसके प्रमुख सहायकों को मार डाला ।
⚜इधर नेपोलियन के हाथ में राज्य की बागडोर आ रही थी । वह एक के बाद एक विजय प्राप्त करता जा रहा था । जब नेपोलियन 26 वर्ष का था तब वह एक 36 वर्षीया सुंदरी, जिसका नाम जोजेफीन था और जो चरित्रहीन एवं निर्दयी थी, उसके रूप-लावण्य में गिरफ्तार हो चुका था । उसने उससे विवाह भी कर लिया ।
⚜सन् 1804 में जब उसका राज्याभिषेक हुआ तो उसने जोजेफीन के सिर पर राजमुकुट भी पहनाया ।
⚜उसके कुछ समय बाद नेपोलियन ने उसे तलाक देकर ‘मेरी लूसी’ नामक युवती से विवाह किया । फिर भी वह जोजेफीन के आकर्षण-पाश से मुक्त नहीं हो सका । उसकी वासना की आग बढ़ती ही गयी ।
⚜इतिहास कहता है कि अंत में वाटरलू के युद्ध में जाने से पहले सायं को नेपोलियन स्वयं को पतित बना चुका था । उसका मन उन मलिन विचारों के कारण युद्ध की योजना तथा निर्देशन कार्य में सही रीति से नहीं जुट सका ।
⚜इसका परिणाम यह हुआ कि नेपोलियन के भाग्य का तारा टूट गया । वह बुरी तरह परास्त हुआ और संसार के इतने महान सेनापति का दयनीय अंत हुआ ।
⚜इस हार के जहाँ सैनिक तथा अन्य कारण थे, वहीं काम वासना भी एक कारण थी क्योंकि इससे उसकी मानसिक एकाग्रता में और शारीरिक क्षमता इत्यादि पर बुरा प्रभाव पड़ा था ।
⚜युवावस्था की उम्र तक वह बहुत संयमी रहा जिससे वह सफलता के शिखर पर पहुँचा, परंतु बाद में असंयमी जीवन जीने के कारण उसका पतन हो गया ।
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Napoleon Bonaparte Short Story in Hindi| Sanyami Jeevan Ke Fayde:
⚜नेपोलियन के हाथ में सत्ता आने से पहले वहाँ लुई सोलहवें (louis XVI )तथा उसके बोरबोर वंश का राज्य था । उसमें भी वासना और विलासिता काफी बढ़ चुकी थी ।
⚜राजा के प्रमुख सरदारों और सामंतों में भी ‘काम’ रूपी भेड़िया अच्छी तरह से घुस चुका था । आखिर सन् 1789 में वहाँ राज्य-क्रांति हुई और लोगों ने विलासी राजा-रानी और उसके प्रमुख सहायकों को मार डाला ।
⚜इधर नेपोलियन के हाथ में राज्य की बागडोर आ रही थी । वह एक के बाद एक विजय प्राप्त करता जा रहा था । जब नेपोलियन 26 वर्ष का था तब वह एक 36 वर्षीया सुंदरी, जिसका नाम जोजेफीन था और जो चरित्रहीन एवं निर्दयी थी, उसके रूप-लावण्य में गिरफ्तार हो चुका था । उसने उससे विवाह भी कर लिया ।
⚜सन् 1804 में जब उसका राज्याभिषेक हुआ तो उसने जोजेफीन के सिर पर राजमुकुट भी पहनाया ।
⚜उसके कुछ समय बाद नेपोलियन ने उसे तलाक देकर ‘मेरी लूसी’ नामक युवती से विवाह किया । फिर भी वह जोजेफीन के आकर्षण-पाश से मुक्त नहीं हो सका । उसकी वासना की आग बढ़ती ही गयी ।
⚜इतिहास कहता है कि अंत में वाटरलू के युद्ध में जाने से पहले सायं को नेपोलियन स्वयं को पतित बना चुका था । उसका मन उन मलिन विचारों के कारण युद्ध की योजना तथा निर्देशन कार्य में सही रीति से नहीं जुट सका ।
⚜इसका परिणाम यह हुआ कि नेपोलियन के भाग्य का तारा टूट गया । वह बुरी तरह परास्त हुआ और संसार के इतने महान सेनापति का दयनीय अंत हुआ ।
⚜इस हार के जहाँ सैनिक तथा अन्य कारण थे, वहीं काम वासना भी एक कारण थी क्योंकि इससे उसकी मानसिक एकाग्रता में और शारीरिक क्षमता इत्यादि पर बुरा प्रभाव पड़ा था ।
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तेल मर्दन ही क्यों, घी से मर्दन क्यों नही?
क्योंकि तेल मर्दन से शरीर को शक्ति प्राप्त होती हैं। तेल का भक्षण करने से शक्ति नहीं मिलती जबकि घी को भोजन रूप में प्रयोग करने पर शक्ति प्राप्त होती है, मर्दन से नहीं।
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क्योंकि तेल मर्दन से शरीर को शक्ति प्राप्त होती हैं। तेल का भक्षण करने से शक्ति नहीं मिलती जबकि घी को भोजन रूप में प्रयोग करने पर शक्ति प्राप्त होती है, मर्दन से नहीं।
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