ब्रह्मचर्य ही जीवन (हरीॐ)
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ब्रम्हचर्य पालन करने वालो के लिये विश्व का सर्वोत्तम टेलिग्राम चॅनल,
यहा पर आपको ब्रम्हचर्य के बारे मैं सटीक और सही जानकारी मिलेगी लेख, pdf और पुस्तके |
इस भारतवर्ष मैं फिर से ब्रम्हचर्य की महिमा का परिचय सबको कराये यही हमारा उद्देश है|
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ब्रह्मचर्य ही जीवन (हरीॐ) pinned «🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆 Yoga (meditation) is the weapon in right hand and exercise 🏋️ is the left hand weapon of Bramhachari without this weapons you won't takale the problems which comes in bramhachrya journey. 🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆🏆 #sanatandharma #meditation…»
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
(प्रथम भाग)
प्रातः जागरण
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To be continue.........
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(प्रथम भाग)
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पुस्तक:- चाणक्य नीति
बारहवां अध्याय

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पुस्तक:- चाणक्य नीति
बारहवां अध्याय
श्लोक १
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जमीन पर बैठकर भोजन:
भारतीय संस्कृति के अनुसार जमीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है
वैज्ञानिक तर्क : पलती मारकर बैठना एक प्रकार का योग आसन है। इस पोजीशन में बैठने से मस्तिष्क शांत रहता है और भोजन करते वक्त अगर दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है। इस पोजीशन में बैठते ही खुद-ब-खुद दिमाग से 1 सिगनल पेट तक जाता है, कि वह भोजन के लिये तैयार हो जाये ।

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हमे ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र का निर्माण हो ,
मन कि शक्ति बड़े,
बुद्धि का विकास हो ,
ओर मनुष्य अपने पैरो पर खड़ा हो सके ।

🧠🧠
क्या आज जो शिक्षा दी जा रही वह उचित है मैकाले की पाश्चात्य शिक्षा ने इस देश की संस्कृति सभ्यता आर्थिक स्थिति सभी को बरबाद कर दिया हमे पुन: गुरुकुल की ओर लौटना होगा ।

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यदि तुम्हारी यह भ्रांति है कि सुंदर स्त्री से तुम सुखी जो जाओगे तो किसी सुंदर स्त्री वाले से जाकर पूछो क्या वे सुखी हो गए

या सुंदर पुरुष वालो से जाकर स्त्री पूछे क्या वे सुखी हो गए

विवाह का उदेश्य भोगना नहीं होता प्रत्यूत एक दूसरे का साथ देकर अपनी जीवन यात्रा को पूरा करना होता है एवम् इस आश्रम में व्यक्ति संयमी रहे


सुख ओर आनंद वीर्य रक्षा मे हे उसे निकालने मै तो दुख ही उत्पन्न होता है ।


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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
(प्रथम भाग)
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पुस्तक:- चाणक्य नीति
बारहवां अध्याय
श्लोक २
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पुस्तक:- चाणक्य नीति
बारहवां अध्याय
श्लोक ३
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भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे भी !

जब भी कोई धार्मिक या पारिवारिक अनुष्ठान होता है तो भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से होता है।
वैज्ञानिक तर्क : तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं इससे पाचन तंत्र ठीक से संचालित होता है। अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है इससे पेट में जलन नहीं होती है ।

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ब्रह्मचर्य का रहस्य | Rishi Dayanand
Brahmacharya Mahima
Sanyam


➠ एक बार ऋषि दयानंद (Rishi Dayanand) से किसी ने पूछाः “आपको कामदेव सताता है या नहीं ?”

➠ उन्होंने उत्तर दियाः “हाँ वह आता है, परन्तु उसे मेरे मकान के बाहर ही खड़े रहना पड़ता है क्योंकि वह मुझे कभी खाली ही नहीं पाता।”

➠ ऋषि दयानंद (Rishi Dayanand) कार्य में इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें सामान्य बातों के लिए फुर्सत ही नहीं थी। यही उनके ब्रह्मचर्य का रहस्य था।

➠हे युवानों ! अपने जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ न गँवाओ। स्वयं को किसी-न-किसी दिव्य सत्प्रवृत्ति में संलग्न रखो। व्यस्त रहने की आदत डालो। खाली दिमाग शैतान का घर। निठल्ले व्यक्ति को ही विकार अधिक सताते हैं। आप अपने विचारों को पवित्र, सात्त्विक व उच्च बनाओ। विचारों की उच्चता बढ़ाकर आप अपनी आंतरिक दशा को परिवर्तित कर सकते हो। उच्च व सात्त्विक विचारों के रहते हुए राजसी व हल्के विचारों व कर्मों की दाल नहीं गलेगी। सात्त्विक व पवित्र विचार ही ब्रह्मचर्य (Brahmacharyalife) का आधार है।

~ अपने रक्षक आप
25 वर्ष की उम्र तक ब्रह्मचर्य क्यों?

🔰 हालांकि आयुर्वेद मानता है कि मनुष्य लगभग 113 वर्ष तक जीवित रह सकता है। हिंदू धर्म अनुसार इंसान की 100 वर्ष की आयु के चार भाग हैं। 25-25 वर्ष में विभाजित इन चार भागों को चार आश्रमों में बांटा गया है, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। 
 
🔰 बाल्य और किशोरावस्था में व्यक्ति गुरुकुल में दीक्षा ग्रहण कर शिक्षा अर्जित करता था। यौवन में वह गृहस्थ के कर्तव्य का निर्वहन करता था। प्रौढ़ावस्था में वह भौतिक वस्तुओं और व्यक्तियों का मोह त्याग कर पूर्णत: सामाज और धर्म को जीवन समर्पित कर कार्य करता है। वानप्रस्थ का अर्थ यह भी है कि घर पर रहते हुए ही मनुष्य ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करे, संयम का अभ्यास करे, बच्चों को विद्या पढ़ाएं, फिर धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारी अपने बच्चों पर डालकर बाहर निकल जाए अंत में वृद्धावस्था में वह संन्यस्त होकर सभी वस्तुओं का त्याग कर संन्यासियों जैसा ही जीवन व्यतीत करता है।

🔰 इसमें पहला आश्रम है ब्रह्मचर्य आश्रम, जिसे आमतौर पर जीवन के पहले 25 साल तक माना गया है। 25 वर्ष की आयु तक हर व्यक्ति को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। ब्रह्मचर्य का प्रथम अर्थ शक्तियों का संचय करना। दूसरा अर्थ ज्ञान का संचय करना भक्ति करना। और तीसरा अर्थ ब्रह्म की राह पर चलना। अर्थात सिर्फ संचय ही संचय करना। कुछ भी खर्च नहीं करना।
 
🔰 हिन्दू धर्मानुसार जन्म से लेकर 7 वर्ष की उम्र तक व्यक्ति अपने माता ‍पिता के पास ही रहता है उसके बाद उसका विद्याआरंभ संस्कार होता है। इस दौरान वह किसी श्रेष्ठ गुरु के आश्रम में 25 वर्ष की उम्र तक रहकर शिक्षा, विद्या और ‍भक्ति का पाठ पढ़ता है।

🔰 उपरोक्तानुसार बताए गए ब्रह्मचर्य के पालन से व्यक्ति के वीर्य का, शिक्षा का, विद्या का और भक्ति का संचय होता है। उक्त संचय से ही व्यक्ति का गृहस्थ जीवन पुष्ट और सफल बनता है। इसीलिए 25 वर्ष की आयु तक व्यक्ति को अपनी शारीरिक और मानसिक क्षमता को बढ़ाना चाहिए क्योंकि इसी दौरान इनका विकास होता है।


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