ब्रह्मचारी जीवन जीने के लिए कुछ उपयोगी टिप्स,
सबसे पहले आपको 'मन' का निर्माण करना होगा।
भोजन शुद्ध और सरल होना चाहिए, सात्विक होना चाहिए।
1. सुबह उठकर ब्रह्ममुहूर्त में।
2. मसालेदार मिर्च मसाले से परहेज करें। प्रामाणिक शाकाहारी भोजन करें।
3. सभी नशीले पदार्थों से बचें।
4. गायत्री मंत्र या अपने मनचाहे मंत्र का जाप करें।
5. नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास करें।
6.मन को खाली न छोड़ें, उसे किसी रचनात्मक कार्य और लक्ष्य से जोड़े रखें।
7. नियमित योग करें।
8. यदि आप तीन बजे उठते हैं, तो आपको बिस्तर पर नहीं जाना चाहिए।
9.प्रतिदिन जप करने का प्रयास करेंlll
10. 🌟🌟🌟 🌟🌟वह हर क्षण धार्मिकता में व्यतीत करेगा, यह सोचकर कि मृत्यु निकट हैll
सबसे पहले आपको 'मन' का निर्माण करना होगा।
भोजन शुद्ध और सरल होना चाहिए, सात्विक होना चाहिए।
1. सुबह उठकर ब्रह्ममुहूर्त में।
2. मसालेदार मिर्च मसाले से परहेज करें। प्रामाणिक शाकाहारी भोजन करें।
3. सभी नशीले पदार्थों से बचें।
4. गायत्री मंत्र या अपने मनचाहे मंत्र का जाप करें।
5. नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास करें।
6.मन को खाली न छोड़ें, उसे किसी रचनात्मक कार्य और लक्ष्य से जोड़े रखें।
7. नियमित योग करें।
8. यदि आप तीन बजे उठते हैं, तो आपको बिस्तर पर नहीं जाना चाहिए।
9.प्रतिदिन जप करने का प्रयास करेंlll
10. 🌟🌟🌟 🌟🌟वह हर क्षण धार्मिकता में व्यतीत करेगा, यह सोचकर कि मृत्यु निकट हैll
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( चतुर्थ भाग)
व्यायाम संदेश
♦ भ्रमण वा वायुसेवन
♦ मल्लखम्ब का व्यायाम
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#celibacybookssummary
पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( चतुर्थ भाग)
व्यायाम संदेश
♦ भ्रमण वा वायुसेवन
♦ मल्लखम्ब का व्यायाम
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( द ) ब्रह्मचर्य -
मन , वचन एवं कर्म में यौन संयम अथवा मैथुन का सर्वथा त्याग ब्रह्मचर्य है। इसलिए कहा यह जाता है कि साधक को न तो काम करने वाली वस्तु का सेवन करना चाहिए और न ऐसे दृश्यों से गुजरना चाहिए , न उनसे सम्बंधित साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। पतंजलि स्पष्ट मानते हैं कि ब्रह्मचर्य की दृढ़ स्थिति हो जाने पर वीर्यलाभ होता है। वीर्य का तात्पर्य केवल यहाँ शारीरिक उर्जा के रूप में लेना सही नहीं होगा। वस्तुतः इसे समग्र अस्तित्वगत ऊर्जा संरक्षण के रूप में लिया जा सकता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसका सम्बन्ध इम्यूनो सिस्टम को संरक्षित एवं संवर्धित करने के रूप में लिया जा सकता है।
मन , वचन एवं कर्म में यौन संयम अथवा मैथुन का सर्वथा त्याग ब्रह्मचर्य है। इसलिए कहा यह जाता है कि साधक को न तो काम करने वाली वस्तु का सेवन करना चाहिए और न ऐसे दृश्यों से गुजरना चाहिए , न उनसे सम्बंधित साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। पतंजलि स्पष्ट मानते हैं कि ब्रह्मचर्य की दृढ़ स्थिति हो जाने पर वीर्यलाभ होता है। वीर्य का तात्पर्य केवल यहाँ शारीरिक उर्जा के रूप में लेना सही नहीं होगा। वस्तुतः इसे समग्र अस्तित्वगत ऊर्जा संरक्षण के रूप में लिया जा सकता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसका सम्बन्ध इम्यूनो सिस्टम को संरक्षित एवं संवर्धित करने के रूप में लिया जा सकता है।
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( चतुर्थ भाग)
व्यायाम संदेश
♦ मुग्दर का व्यायाम
♦ कुदना
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( चतुर्थ भाग)
व्यायाम संदेश
♦ मुग्दर का व्यायाम
♦ कुदना
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