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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 उपनिषदों में प्राण का महत्व
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#celibacybookssummary
पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 उपनिषदों में प्राण का महत्व
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जब भी कोई वीर्य निकालने जाता है . तब उसकी दिल की धड़कन तेज हो जाती है। | एक प्रकार का भय उसे घेर लेता है । यह अशुभ । संकेत हमें बताते हैं कि हम जाने - अनजाने में बहुत बड़ा पाप करने जा रहे हैं ।
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 प्राणायाम से बुद्धि का विकास
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#celibacybookssummary
पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 प्राणायाम से बुद्धि का विकास
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#celibacybookssummary
आज सभी लोग स्मार्टफोन
इस्तेमाल करते हैं । इन
फोन्स में बैटरी की क्या
अहमियत है , ये सब जानते
ही है | इसी प्रकार शरीर में
व्याप्त वीर्य हमें चार्ज रखता
है । वीर्य के कम हो जाने पे
हम मुर्दा हो जाते हैं।😐
इस्तेमाल करते हैं । इन
फोन्स में बैटरी की क्या
अहमियत है , ये सब जानते
ही है | इसी प्रकार शरीर में
व्याप्त वीर्य हमें चार्ज रखता
है । वीर्य के कम हो जाने पे
हम मुर्दा हो जाते हैं।😐
हो गये हैं स्वप्न सब साकार कैसे मान लें हम
ढल गया सिर से व्यथा का भार कैसे मान लें हम ।।
आ गया स्वातंत्र्य फिर भी चेतना आने न पाई
प्रगति के ही नाम श्रध्दा और श्रम को दी विदाई
इस विदेशी तन्त्र को निज तन्त्र कैसे मान लें हम
ढल गया सिर से व्यथा का भार कैसे मान लें हम ।।१।।
राष्ट्र को सब लोग भूले स्वार्थ है युग मंत्र सारा
प्रान्त,भाषा,वर्ग की अब बह रही है कलुष धारा
इस भयंकर मौज को पतवार कैसे मान लें हम
ढल गया सिर से व्यथा का भार कैसे मान लें हम ।।२।।
देश सारा घिर रहा है दान्य के घन बादलों से
घिर रही प्रिय मातृभू है दुष्ट जन और अरिदलों से
इस अमा के तिमिर को अब अरुणिमा क्या मान लें हम
ढल गया सिर से व्यथा का भार कैसे मान लें हम ।।३।।
अलस तज कर उद्यमी बन लें हृदय में ध्येय निष्ठा
हम सभी का एक व्रत हो देश में माँ की प्रतिष्ठा
आज की कटु विषमता को अब चुनौती मान लें हम
ढल गया सिर से व्यथा का भार कैसे मान लें हम ।।४।।
@bramachrya01
ढल गया सिर से व्यथा का भार कैसे मान लें हम ।।
आ गया स्वातंत्र्य फिर भी चेतना आने न पाई
प्रगति के ही नाम श्रध्दा और श्रम को दी विदाई
इस विदेशी तन्त्र को निज तन्त्र कैसे मान लें हम
ढल गया सिर से व्यथा का भार कैसे मान लें हम ।।१।।
राष्ट्र को सब लोग भूले स्वार्थ है युग मंत्र सारा
प्रान्त,भाषा,वर्ग की अब बह रही है कलुष धारा
इस भयंकर मौज को पतवार कैसे मान लें हम
ढल गया सिर से व्यथा का भार कैसे मान लें हम ।।२।।
देश सारा घिर रहा है दान्य के घन बादलों से
घिर रही प्रिय मातृभू है दुष्ट जन और अरिदलों से
इस अमा के तिमिर को अब अरुणिमा क्या मान लें हम
ढल गया सिर से व्यथा का भार कैसे मान लें हम ।।३।।
अलस तज कर उद्यमी बन लें हृदय में ध्येय निष्ठा
हम सभी का एक व्रत हो देश में माँ की प्रतिष्ठा
आज की कटु विषमता को अब चुनौती मान लें हम
ढल गया सिर से व्यथा का भार कैसे मान लें हम ।।४।।
@bramachrya01
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