वीर्य शरीर की बहुत मूल्यवान् धातु है । भोजन से वीर्य बनने की प्रक्रिया बड़ी लम्बी है। श्री सुश्रुताचार्य ने लिखा है :
रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते | मेदस्यास्थिः ततो मज्जा मज्जायाः शुक्रसंभवः ||
जो भोजन पचता है, उसका पहले रस बनता है | पाँच दिन तक उसका पाचन होकर रक्त बनता है | पाँच दिन बाद रक्त में से मांस, उसमें से 5-5 दिन के अंतर से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जा से अंत में वीर्य बनता है | स्त्री में जो यह धातु बनती है उसे 'रज' कहते हैं |
वीर्य किस प्रकार छः-सात मंजिलों से गुजरकर अपना यह अंतिम रूप धारण करता है, यह सुश्रुत के इस कथन से ज्ञात हो जाता है | कहते हैं कि इस प्रकार वीर्य बनने में करीब 30 दिन व 4 घण्टे लग जाते हैं |
रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते | मेदस्यास्थिः ततो मज्जा मज्जायाः शुक्रसंभवः ||
जो भोजन पचता है, उसका पहले रस बनता है | पाँच दिन तक उसका पाचन होकर रक्त बनता है | पाँच दिन बाद रक्त में से मांस, उसमें से 5-5 दिन के अंतर से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जा से अंत में वीर्य बनता है | स्त्री में जो यह धातु बनती है उसे 'रज' कहते हैं |
वीर्य किस प्रकार छः-सात मंजिलों से गुजरकर अपना यह अंतिम रूप धारण करता है, यह सुश्रुत के इस कथन से ज्ञात हो जाता है | कहते हैं कि इस प्रकार वीर्य बनने में करीब 30 दिन व 4 घण्टे लग जाते हैं |
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 प्राणायाम से रोग निवारण
❇ सर्वव्याधीनिवारक प्राणायाम
❇ बुद्धिवर्धक प्राणायाम
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#celibacybookssummary
पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 प्राणायाम से रोग निवारण
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🌺छत्रपती शिवाजी महाराज जी को उनकी जयंती पर शत्-शत् नमन 🌺
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औरंगजेब जैसे निर्दयी के राज्य काल मे उत्पन्न होकर आर्य जाति के गौरव को जीवित कर देने वाले शिवाजी महाराज को शत् शत् नमन ॥
गौ - ब्राह्मणों के लिए देवता स्वरूप ; शत्रु की स्त्रीयों से भी शुद्ध ह्रदय से पेश आने वाले ; गरीबों और निर्बल के रक्षक ; प्रजा को परिवार मानकर निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले वीर छत्रपति महाराज के जीवन से हम शिक्षा लेकर आर्य जाति की रक्षार्थ सदैव प्रयत्न करें॥
गौ - ब्राह्मणों के लिए देवता स्वरूप ; शत्रु की स्त्रीयों से भी शुद्ध ह्रदय से पेश आने वाले ; गरीबों और निर्बल के रक्षक ; प्रजा को परिवार मानकर निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले वीर छत्रपति महाराज के जीवन से हम शिक्षा लेकर आर्य जाति की रक्षार्थ सदैव प्रयत्न करें॥
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वीर्य इस शरीररूपी नगर का एक तरह से राजा ही है | यह वीर्यरूपी राजा यदि पुष्ट है, बलवान् है तो रोगरूपी शत्रु कभी शरीररूपी नगर पर आक्रमण नही करते | जिसका वीर्यरूपी राजा निर्बल है, उस शरीररूपी नगर को कई रोगरूपी शत्रु आकर घेर लेते हैं | इसीलिए कहा गया है :
मरणं बिन्दोपातेन जीवनं बिन्दुधारणात् |
'बिन्दुनाश (वीर्यनाश) ही मृत्यु है और बिन्दूरक्षण ही जीवन है ।'
जैन ग्रंथों में अब्रह्मचर्य को पाप बताया गया है :
अबंभचरियं घोरं पमायं दुरहिठ्ठियम् |
'अब्रह्मचर्य घोर प्रमादरूप पाप है |' (दश वैकालिक सूत्र: 6.17)
मरणं बिन्दोपातेन जीवनं बिन्दुधारणात् |
'बिन्दुनाश (वीर्यनाश) ही मृत्यु है और बिन्दूरक्षण ही जीवन है ।'
जैन ग्रंथों में अब्रह्मचर्य को पाप बताया गया है :
अबंभचरियं घोरं पमायं दुरहिठ्ठियम् |
'अब्रह्मचर्य घोर प्रमादरूप पाप है |' (दश वैकालिक सूत्र: 6.17)
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 ऊध्वरेता प्राणायाम
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प्राणायाम
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 मलबद्धतानाशक प्राणायाम
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ऐसे तो तपस्वी लोग कई प्रकार के तप करते हैं, परन्तु ब्रह्मचर्य के बारे में भगवान शंकर कहते हैं:
न तपस्तप इत्याहुर्ब्रह्मचर्यं तपोत्तमम् | ऊर्ध्वरेता भवेद्यस्तु स देवो न तु मानुषः ||
'ब्रह्मचर्य ही उत्कृष्ट तप है | इससे बढ़कर तपश्चर्या तीनों लोकों में दूसरी नहीं हो सकती | ऊर्ध्वरेता पुरुष इस लोक में मनुष्यरूप में प्रत्यक्ष देवता ही है ।'
न तपस्तप इत्याहुर्ब्रह्मचर्यं तपोत्तमम् | ऊर्ध्वरेता भवेद्यस्तु स देवो न तु मानुषः ||
'ब्रह्मचर्य ही उत्कृष्ट तप है | इससे बढ़कर तपश्चर्या तीनों लोकों में दूसरी नहीं हो सकती | ऊर्ध्वरेता पुरुष इस लोक में मनुष्यरूप में प्रत्यक्ष देवता ही है ।'
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 प्रतिश्यायनाशक प्राणायाम
🔴 सिरदर्दनाशक प्राणायाम
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जो नर या नारी यह मानते हैं कि वासना-भोग तो स्वाभाविक है अथवा वह हमारा अधिकार है, वास्तव में वे भूल में हैं। यदि ऐसा होता
तो शास्त्र इसे 'सर्प के विष से भी अधिक भयंकर' न बताते और इसे __ 'नरक का द्वार' न मानते। आश्चर्य की बात है कि लोग शास्त्रों को
सम्मान देते हुए भी उनमें कही हुई वात प्रैक्टिकल रूप में नहीं मानते!
तो शास्त्र इसे 'सर्प के विष से भी अधिक भयंकर' न बताते और इसे __ 'नरक का द्वार' न मानते। आश्चर्य की बात है कि लोग शास्त्रों को
सम्मान देते हुए भी उनमें कही हुई वात प्रैक्टिकल रूप में नहीं मानते!
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 श्वास
🔴 निद्रा न आने की चिकित्सा
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कुछ लोग कहते हैं - जब हम इन परिस्थितियों से बाहर आएंगे, तब फुर्सत से, भगवान की पढ़ाई पर पूरा ध्यान लगाएंगे | यह तो वैसे ही हो गया जैसे कोई बीमार व्यक्ति कहे - जब इस बीमारी से बाहर आएंगे, तब फुर्सत से , डॉक्टर के पास सलाह लेने जाएंगे।
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