वीर्य इस शरीररूपी नगर का एक तरह से राजा ही है | यह वीर्यरूपी राजा यदि पुष्ट है, बलवान् है तो रोगरूपी शत्रु कभी शरीररूपी नगर पर आक्रमण नही करते | जिसका वीर्यरूपी राजा निर्बल है, उस शरीररूपी नगर को कई रोगरूपी शत्रु आकर घेर लेते हैं | इसीलिए कहा गया है :
मरणं बिन्दोपातेन जीवनं बिन्दुधारणात् |
'बिन्दुनाश (वीर्यनाश) ही मृत्यु है और बिन्दूरक्षण ही जीवन है ।'
जैन ग्रंथों में अब्रह्मचर्य को पाप बताया गया है :
अबंभचरियं घोरं पमायं दुरहिठ्ठियम् |
'अब्रह्मचर्य घोर प्रमादरूप पाप है |' (दश वैकालिक सूत्र: 6.17)
मरणं बिन्दोपातेन जीवनं बिन्दुधारणात् |
'बिन्दुनाश (वीर्यनाश) ही मृत्यु है और बिन्दूरक्षण ही जीवन है ।'
जैन ग्रंथों में अब्रह्मचर्य को पाप बताया गया है :
अबंभचरियं घोरं पमायं दुरहिठ्ठियम् |
'अब्रह्मचर्य घोर प्रमादरूप पाप है |' (दश वैकालिक सूत्र: 6.17)
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 ऊध्वरेता प्राणायाम
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#celibacybookssummary
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( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 ऊध्वरेता प्राणायाम
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 मलबद्धतानाशक प्राणायाम
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( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
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ऐसे तो तपस्वी लोग कई प्रकार के तप करते हैं, परन्तु ब्रह्मचर्य के बारे में भगवान शंकर कहते हैं:
न तपस्तप इत्याहुर्ब्रह्मचर्यं तपोत्तमम् | ऊर्ध्वरेता भवेद्यस्तु स देवो न तु मानुषः ||
'ब्रह्मचर्य ही उत्कृष्ट तप है | इससे बढ़कर तपश्चर्या तीनों लोकों में दूसरी नहीं हो सकती | ऊर्ध्वरेता पुरुष इस लोक में मनुष्यरूप में प्रत्यक्ष देवता ही है ।'
न तपस्तप इत्याहुर्ब्रह्मचर्यं तपोत्तमम् | ऊर्ध्वरेता भवेद्यस्तु स देवो न तु मानुषः ||
'ब्रह्मचर्य ही उत्कृष्ट तप है | इससे बढ़कर तपश्चर्या तीनों लोकों में दूसरी नहीं हो सकती | ऊर्ध्वरेता पुरुष इस लोक में मनुष्यरूप में प्रत्यक्ष देवता ही है ।'
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 प्रतिश्यायनाशक प्राणायाम
🔴 सिरदर्दनाशक प्राणायाम
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 प्रतिश्यायनाशक प्राणायाम
🔴 सिरदर्दनाशक प्राणायाम
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जो नर या नारी यह मानते हैं कि वासना-भोग तो स्वाभाविक है अथवा वह हमारा अधिकार है, वास्तव में वे भूल में हैं। यदि ऐसा होता
तो शास्त्र इसे 'सर्प के विष से भी अधिक भयंकर' न बताते और इसे __ 'नरक का द्वार' न मानते। आश्चर्य की बात है कि लोग शास्त्रों को
सम्मान देते हुए भी उनमें कही हुई वात प्रैक्टिकल रूप में नहीं मानते!
तो शास्त्र इसे 'सर्प के विष से भी अधिक भयंकर' न बताते और इसे __ 'नरक का द्वार' न मानते। आश्चर्य की बात है कि लोग शास्त्रों को
सम्मान देते हुए भी उनमें कही हुई वात प्रैक्टिकल रूप में नहीं मानते!
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 श्वास
🔴 निद्रा न आने की चिकित्सा
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कुछ लोग कहते हैं - जब हम इन परिस्थितियों से बाहर आएंगे, तब फुर्सत से, भगवान की पढ़ाई पर पूरा ध्यान लगाएंगे | यह तो वैसे ही हो गया जैसे कोई बीमार व्यक्ति कहे - जब इस बीमारी से बाहर आएंगे, तब फुर्सत से , डॉक्टर के पास सलाह लेने जाएंगे।
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 प्राणायामपूर्वक व्यायाम
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प्राणायाम
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प्रश्न. जब कर्मों का फल मिलना ही है तो ईश्वर की उपासना करने से क्या लाभ है ?
उत्तर – ईश्वर की उपासना करने से बुद्धि पवित्र होती है और आनन्द की प्राप्ति होती है। आत्मिक बल मिलता है मन में उत्तम विचार उत्पन्न होते हैं परिणामस्वरूप मनुष्य भविष्य में बुरे कर्म नहीं करता है अथवा कम करता है .
उत्तर – ईश्वर की उपासना करने से बुद्धि पवित्र होती है और आनन्द की प्राप्ति होती है। आत्मिक बल मिलता है मन में उत्तम विचार उत्पन्न होते हैं परिणामस्वरूप मनुष्य भविष्य में बुरे कर्म नहीं करता है अथवा कम करता है .
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सुप्रसिद्ध पत्रकार पॉल ब्रिन्टिन सनातन धर्म की ऐसी धार्मिक पुस्तकें पढ़कर जब प्रभावित हुआ तभी वह हिन्दुस्तान आया था और यहाँ के रमण महर्षि जैसे महात्माओं के दर्शन करके धन्य हुआ था । देशभक्तिपूर्ण साहित्य पढ़कर ही चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह, वीर सावरकर जैसे रत्न अपने जीवन को देशाहित में लगा पाये |
इसलिये सत्साहित्य की तो जितनी महिमा गाई जाये, उतनी कम है । श्रीयोगवशिष्ठ महारामायण, उपनिषद, दासबोध, सुखमनि, विवेकचूडामणि, श्री रामकृष्ण साहित्य, स्वामी रामतीर्थ के प्रवचन आदि भारतीय संस्कृति की ऐसी कई पुस्तकें हैं जिन्हें पढ़ो और उन्हें अपने दैनिक जीवन का अंग बना लो | ऐसी-वैसी विकारी और कुत्सित पुस्तक-पुस्तिकाएँ हों तो उन्हें उठाकर कचरे ले ढेर पर फेंक दो या चूल्हे में डालकर आग तापो, मगर न तो स्वयं पढ़ो और न दूसरे के हाथ लगने दो।
इसलिये सत्साहित्य की तो जितनी महिमा गाई जाये, उतनी कम है । श्रीयोगवशिष्ठ महारामायण, उपनिषद, दासबोध, सुखमनि, विवेकचूडामणि, श्री रामकृष्ण साहित्य, स्वामी रामतीर्थ के प्रवचन आदि भारतीय संस्कृति की ऐसी कई पुस्तकें हैं जिन्हें पढ़ो और उन्हें अपने दैनिक जीवन का अंग बना लो | ऐसी-वैसी विकारी और कुत्सित पुस्तक-पुस्तिकाएँ हों तो उन्हें उठाकर कचरे ले ढेर पर फेंक दो या चूल्हे में डालकर आग तापो, मगर न तो स्वयं पढ़ो और न दूसरे के हाथ लगने दो।
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पुस्तक :- ब्रम्हचर्य के साधन
( षष्ठ भाग)
प्राणायाम
🔴 गहरे श्वास लेने की विधि का अभ्यास
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( षष्ठ भाग)
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