ब्रह्मचर्य ही जीवन (हरीॐ)
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ब्रम्हचर्य पालन करने वालो के लिये विश्व का सर्वोत्तम टेलिग्राम चॅनल,
यहा पर आपको ब्रम्हचर्य के बारे मैं सटीक और सही जानकारी मिलेगी लेख, pdf और पुस्तके |
इस भारतवर्ष मैं फिर से ब्रम्हचर्य की महिमा का परिचय सबको कराये यही हमारा उद्देश है|
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इससे आपको उस समय का ब्रम्हचर्य का महत्व कितना था इसका अंदाजा आता होगा ।

ब्रम्हचर्य से बोहोत बड़े बड़े कार्य सफल हो सकते है जो व्यक्ति सिर्फ स्वार्थ हेतु ब्रम्हचर्य का पालन करते है किसीको आकर्षित करने हेतु हम उनसे गुजारिश करते है की ब्रम्हचर्य को पहले जानो । ब्रम्हचर्य का पालन अपने एवं समाज तथा देश के उन्नति के लिए करो।

जय आर्यावर्त 🚩
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वीर्यक्षय से विशेषकर तरूणावस्था में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं -


चेहरे पर मुँहासे , नेत्रों के चतुर्दिक नीली रेखाएँ, दाढ़ी का अभाव, धंसे हुए नेत्र, रक्तक्षीणता से पीला चेहरा, स्मृतिनाश, दृष्टि की क्षीणता, मूत्र के साथ वीर्यस्खलन, दुर्बलता, आलस्य, उदासी, हृदय-कम्प, शिरोवेदना, संधि-पीड़ा, दुर्बल वृक्क, निद्रा में मूत्र निकल जाना, मानसिक अस्थिरता, विचारशक्ति का अभाव, दुःस्वप्न, स्वप्नदोष व मानसिक अशांति।
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संसार में ऐसी कोई वस्तु या स्थिति नहीं है जो संकल्पबल और पुरुषार्थ के द्वारा प्राप्त न हो सके। पूर्ण उत्साह और लगन से किया गया पुरुषार्थ कभी व्यर्थ नहीं जाता।
अपनी उन्नति में बाधक दुर्बलता के विचारों को जड़ से उखाड़ फेंको। उनके मूल पर ही कुठाराघात करो।
पाणिनि नाम का बालक पहली कक्षा में वर्षों तक अभ्यास करने के बाद भी लगातार अनुत्तीर्ण ही होता रहा, पर बाद में वही बालक अपने दृढ़ संकल्प, पुरुषार्थ, उपासना और योग के अभ्यास से संस्कृत व्याकरण का विश्वविख्यात रचयिता बना । आज भी पाणिनि का संस्कृत व्याकरण 'अष्टाध्यायी' अद्वितीय माना जाता है।
अपनी मानसिक व शारीरिक शक्तियों को नष्ट करनेवाली बुरी आदतों में पड़ना यह अपना पतन आप आमंत्रित करना है। तुम्हें महान, तेजस्वी व श्रेष्ठ इन्सान बनना हो तो अभी से दृढ़ संकल्प करके त्याज्य चीजों को छोड़ो और जीवन-विकास में उपयोगी मूल्यों को अपनाओ। तुम्हारा भविष्य तुम्हारे ही हाथों में है। हजार बार फिसल जाने पर भी फिर से हिम्मत करो... विजय तुम्हारी ही होगी।
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वीर्य रक्षण से लाभ -
शरीर में वीर्य संरक्षित होने पर आँखों में तेज, वाणी में प्रभाव, कार्य में उत्साह एवं प्राण ऊर्जा में अभिवृद्धि होती है। ऐसे व्यक्ति को जल्दी से कोई रोग नहीं होता है उसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता आ जाती है ।
पहले के जमाने में हमारे गुरुकुल शिक्षा पद्धति में ब्रह्मचर्य अनिवार्य हुआ करता था। और उस वक्त में यहाँ वीर योद्धा, ज्ञानी, तपस्वी व ऋषि स्तर के लोग हुए।
ऋषि दयानंद ने कहा ब्रह्मचर्य ब्रत का पालन करने बाले ब्यक्ति का अपरिमित शक्ति, प्राप्त होता है एक ब्रह्मचारी संसार का जितना उपकार कर सकता है दूसरा कोई नही कर सकता.
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"एक मनुष्य चारों वेदों को जाननेवाला हो
और दूसरा पूर्ण ब्रह्मचारी हो तो इन दोनों में ब्रह्मचारी ही श्रेष्ठ है ।"
- भीष्म पितामह
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जब जल गंदा हो तो उसे हिलाते नहीं
बल्की शांत छोड़ देते है, जिससे गंदगी अपने आप नीचे बैठ जाती है, इसी प्रकार जीवन में परेशानी आने पर
बेचैन होने के बजाय शांत रहकर विचार करे हल जरुर निकलेगा।
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भाइयों, हस्तमैथुन की आदत एक ऐसा जाल बनाती है,
जिसमें आप फंसते चले जाते हो, आप जितना ज्यादा हस्तमैथुन करते हो उतने ही ज्यादा आप कमज़ोर होते जाते हो और जितने ज्यादा आप कमज़ोर होते जाते हो उतना ही ज्यादा आप हस्तमैथुन करने लगते हो, यही हस्तमैथुन का
जाल है।
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एक टाइम ऐसा भी आता है जब आप वीर्यनाश करते करते ऐसी स्टेज पर पहुंच जाते हो कि फिर आपको लगता है कि अब सबकुछ बर्बाद हो गया, ये आदत मुझसे कभी नहीं छूटेगी। लेकिन मेरे भाई इस दुनिया में कोई भी चीज
नामुमकिन नहीं है।
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जो निरंतर कोशिश से ब्रह्मचर्य साध लेता है | फिर उसे प्रयास नहीं करना पड़ता । तब विर्य नीचे नहीं बल्कि ऊपर की ओर बहता है ।
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ब्रह्मचर्य मात्र काम से दूरी नहीं अपितु अंतःकरण को विकार मुक्त कर निर्मल कर लेने की एक स्थिति है, चित्त को साध लेने की एक दशा है, स्थित प्रज्ञ हो जाने की एक अवस्था है,ब्रह्म के मार्ग का अनुसरण करना है, सच तो ये है कि ब्रह्मचर्य तो इस अस्तित्व का अनुसरण है।
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शरीर उस दीपक कि तरह है जिसका तेल यदि निकाल दिया जाय,तो वह किसी काम का नहीं रहता। इसी प्रकार वीर्य बर्बाद तो
तुम भी किसी काम के नहीं।
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यदि साधक स्वप्नदोष से बचना चाहता है तो प्रभु की शरणागति से युक्त होकर के वह निरन्तर नामजप करे, सत्शास्त्रों का स्वाध्याय करे, सात्विक भोजन पाये और खूब शरीर से श्रम करे यानी शरीर को थकाए। शरीर को थकाना बहुत जरूरी है । यदि साधक नित्य प्रातःकाल उठकर के कम से कम 1 घंटा व्यायाम करे तो उसको अनुभव होगा कि हमारा धातु क्षरण होना कम हुआ है, वीर्यपात में अन्तराय होता चला जाएगा।
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जो लोग ये कहते हैं कि कामवासना से यदि दूर रहना ही होता तो भगवान इसमें इतना आकर्षण और सख क्यों देता ? भगवान ने तो बुद्धि और विवेक भी दिया है । उसका प्रयोग तो करते नहीं और भगवान को दोष देते हैं । कामवेग को शरीर की रक्षा हेतु सहन करो । ये ही अनुशासन है । ये ही धर्म है ।
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