ब्रह्मचर्य ही जीवन (हरीॐ)
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ब्रम्हचर्य पालन करने वालो के लिये विश्व का सर्वोत्तम टेलिग्राम चॅनल,
यहा पर आपको ब्रम्हचर्य के बारे मैं सटीक और सही जानकारी मिलेगी लेख, pdf और पुस्तके |
इस भारतवर्ष मैं फिर से ब्रम्हचर्य की महिमा का परिचय सबको कराये यही हमारा उद्देश है|
#hastag
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वासना और कुछ नहीं बल्कि आपके विचार है, आप किस तरह की सोच रखते है, वही आपकी वासना है, मोबाइल में देखने को पोर्न भी है और भागवत गीता भी।
दुनिया कैसी है यह आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है
ब्रह्मचर्य पालन करे
अपनी दिव्य दृष्टि बनाए
वासना पर अगर काबू पाना है तो सबसे पहले अपने विचारों पर काबू करना सीखो और अपने विचारों को एक सकारात्मक दिशा दो, पोर्न की लत छोड़ना मुश्किल नहीं है।
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जैसों खावे तन, वैसी होवे मन।। सीधी सी बात है आप पोर्न और adult content देखकर Nofap या ब्रह्मचर्य पालन नहीं कर सकते, इसलिए वासना से बचने के लिए इनका त्याग ज़रूर करें।
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👉किसी भी बहाने से अच्छे लोगों के साथ रहने की कोशिश करनी चाहिए।

👉विपरीत परिस्थितियों में तो धैर्य छोड़ना ही नहीं चाहिए, वरना बड़ा नुकसान हो सकता है।

👉 दूसरों की समस्याएं दूर करने के लिए हमें अपने स्तर पर प्रयास करते रहना चाहिए।

👉 हर काम भगवान भरोसे न छोड़ें, हमें अपनी जिम्मेदारियां खुद पूरी करनी चाहिए।
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चरित्रवान व्यक्ति ही समाज, राष्ट्र व विश्वसमुदाय का सही नेतृत्व और मार्गदर्शन कर सकता है। आज जनता को दुनियावी सुख-भोग व सुविधाओं की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी चरित्र की।
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चरित्र मानव की श्रेष्ठ संपत्ति है, दुनिया की समस्त संपदाओं में महान संपदा है। पंचभूतों से निर्मित मानव-शरीर की मृत्यु के बाद, पंचमहाभूतों में विलीन होने के बाद भी जिसका अस्तित्व बना रहता है, वह है उसका चरित्र।
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व्यक्तित्व का निर्माण चरित्र से ही होता है। बाह्य रूप से व्यक्ति कितना ही सुन्दर क्यों न हो, कितना ही निपुण गायक क्यों न हो, बड़े-से-बड़ा कवि या वैज्ञानिक क्यों न हो, पर यदि वह चरित्रवान न हुआ तो समाज में उसके लिए सम्मानित स्थान का सदा अभाव ही रहेगा। चरित्रहीन व्यक्ति आत्मसंतोष और आत्मसुख से वंचित रहता है। आत्मग्लानि व अशांति देर-सवेर चरित्रहीन व्यक्ति का पीछा करती ही है। चरित्रवान व्यक्ति के आस-पास आत्मसंतोष, आत्मशांति और सम्मान वैसे ही मंडराते हैं. जैसे कमल के इर्द-गिर्द भौरे, मधु के इर्द-गिर्द मधुमक्खी व सरोवर के इर्द-गिर्द पानी के प्यासे।
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🔰ब्रह्मचर्य के परीक्षा के नियम

●ये परीक्षा का कोई तय समय नही है ( न वार्षिक न मासिक न साप्ताहिक )
● ये परीक्षा कभी भी ली जा सकती है , आज के इस अश्लीलता भरी दौर में आपको ये परीक्षा अधिक बार देनी होगी ।
●ये परीक्षा उत्तरीन करने पर ही आपको इस परीक्षा से मुक्ति मिलेगी
●ये परीक्षा में आप जितना विफल होंगे उतना आपको इससे गुजरना पड़ेगा
●आप ये नियंत्रित कर सकते है की आपको कब कब ये परीक्षा देना है ।
● फिल्मे, वेबसेरीज़ ,आदि देखते हो तो आपको ये परीक्षा अधिक देनी होगी ।
● इस परीक्षा को टालने के लिए आपको ध्यान , प्राणायाम , व्यायाम आदि निरंतर करना होगा ओर मूवीज वगेरा देखना बंद करना होगा।
● अकेले रहने पर भी आपसे ये परीक्षा ली जाएगी , केवल निष्ठावान लोग ही इस परीक्षा को उत्तरीन कर पाते है ।
● इस परीक्षा को उत्तरीन करने पर आपको मिलेगा आत्मविश्वास , अच्छी स्वास्थ्य , मन की संतुष्टि ।
●ये परीक्षा को कुछ ही बिरले लोग उत्तरीन कर पाते है ।
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"लोगों की इतनी भी कदर ना करो की लोग तुम्हें गिरा हुआ समझने लगे।"

"आपका मूल्य आप जानते है फिर दूसरों से क्या पूछना।"

"आप अपने आप को परख ले फिर किसी और को परखने की जरुरत नहीं पड़ेगी।"

"इस दुनियां में हर चीज से समझौता कर सकते है अपने आत्म सम्मान से नहीं।"

"रोटी कम हो लेकिन इज़्ज़त की हो।"

"जिस दिन अपना Profit और अपना Loss समझ आ जायेगा, अपनी इज़्ज़त भी समझ आ जायेगी।"

"तुम अपनी ज़िंदगी की कहानी का नायक खुद बनो।"


"जहाँ आत्म सम्मान न हो, वो जगह मेरे लिए श्मशान के सामान है।"

"मेरी ज़िंदगी का उसूल, इज़्ज़त दो इज़्ज़त लो।"
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चरित्र एक शक्तिशाली उपकरण है जो शांति, धैर्य, स्नेह, प्रेम, सरलता, नम्रता आदि दैवी गुणों को निखारता है। यह उस पुष्प की भाँति है जो अपना सौरभ सुदूर देशों तक फैलाता है। महान विचार तथा उज्जवल चरित्र वाले व्यक्ति का ओज चुंबक की भाँति प्रभावशाली होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निमित्त बनाकर सम्पूर्ण मानव-समुदाय को उत्तम चरित्र-निर्माण के लिए श्रीमद भगवद गीता के सोलहवें अध्याय में दैवी गुणों का उपदेश किया है, जो मानवमात्र के लिए प्रेरणास्रोत हैं, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म अथवा संप्रदाय का हो। उन दैवी गुणों को प्रयत्नपूर्वक अपने आचरण में लाकर कोई भी व्यक्ति महान बन सकता है।
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निष्कलंक चरित्र निर्माण के लिए नम्रता, अहिंसा, क्षमाशीलता, गुरुसेवा, शुचिता, आत्मसंयम, विषयों के प्रति अनासक्ति, निरहंकारिता, जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि तथा दुःखों के प्रति
अंतर्दृष्टि, निर्भयता, स्वच्छता, दानशीलता, स्वाध्याय, तपस्या, त्याग-परायणता, अलोलुपता, ईर्ष्या, अभिमान, कुटिलता व क्रोध का अभाव तथा शाँति और शौर्य जैसे गुण विकसित करने चाहिए।
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बिगड़ी जनम अनेक की सुधरे अब और आज।


यदि बुरे विचारों और बुरी भावनाओं का स्थान अच्छे विचारों और आदर्शों को दिया जाए तो मनुष्य सदगुणों के मार्ग में प्रगति कर सकता है। असत्यभाषी सत्यभाषी बन सकता है, दुष्चरित्र सच्चरित्र में परिवर्तित हो सकता है, डाकू एक नेक इन्सान ही नहीं ऋषि भी बन सकता है। व्यक्ति की आदतों, गुणों और आचारों की प्रतिपक्षी भावना (विरोधी गुणों की भावना) से बदला जा सकता है। सतत अभ्यास से अवश्य ही सफलता प्राप्त होती है। दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस से जो व्यक्ति उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ता है, सफलता तो उसके चरण चूमती
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चरित्र-निर्माण का अर्थ होता है आदतों का निर्माण। आदत को बदलने से चरित्र भी बदल जाता है। संकल्प, रूचि, ध्यान तथा श्रद्धा से स्वभाव में किसी भी क्षण परिवर्तन किया जा सकता है। योगाभ्यास द्वारा भी मनुष्य अपनी पुरानी क्षुद्र आदतों को त्याग कर नवीन कल्याणकारी आदतों को ग्रहण कर सकता है।
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जिसके शरीर में वीर्य नही होता वह नपुंसक - और महाकुलक्षणी
होता है।


सत्यार्थ प्रकाश
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