ब्रह्मचर्य ही जीवन (हरीॐ)
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ब्रम्हचर्य पालन करने वालो के लिये विश्व का सर्वोत्तम टेलिग्राम चॅनल,
यहा पर आपको ब्रम्हचर्य के बारे मैं सटीक और सही जानकारी मिलेगी लेख, pdf और पुस्तके |
इस भारतवर्ष मैं फिर से ब्रम्हचर्य की महिमा का परिचय सबको कराये यही हमारा उद्देश है|
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नमस्ते सभी मेरे भाई और बहन को 🙏

बोहोत दिन से /महीने से मे आपके सेवा मे उपस्थित नहीं रह पाया इसलिए मुझे खेद है !
पर आप बोहोत समझदार और सज्जन लोग मुझे बड़े मन से माफ़ करोगे ऐसे आशा करता हु।
शिक्षा,प्रतियोगिता,परीक्षा के कारण आपसे वार्तालाप नहीं कर पाया मेरे कुछ लेख भी नहीं लिख पाया ब्रम्हचर्य के सबंधित इसलिए खेद है।
पर आगे से हमारे चैनल पर प्रतिदिन पोस्ट,लेख,वीडियो और अन्य साहित्य साझा की जाएगी।
अगर हमारे से कोई भूल हो भी गयी तो उसे समझ लीजिये 🙏

कृपया आप सभी भाई/बहन इस चैनल का नोटिफिकेशन on कर ले ताकि हर रोज ताजा पोस्ट आपको मिले 👍

क्यू की विलंब होने के वजह से हमारे काफी member के views कम हो गये है
जब views और follower बढ़ जाएंगे तब मे मानूंगा की आपने हमे हमारे विलंब के लिए हमे क्षमा कर दिया ।


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24.5.2022
*"कुछ लोग जीवन में उन्नति करते हैं, और कुछ लोग पतित हो जाते हैं। ये घटनाएं प्रतिदिन देखने सुनने को मिलती हैं। समाचार पत्रों में और टेलीविजन आदि में बुरी घटनाओं के समाचार अधिक देखने सुनने पढ़ने को मिलते हैं, अच्छे समाचार तो बहुत कम मिलते हैं।"*
इसके साथ साथ हम संसार में यह भी देखते हैं, कि मनुष्यों की संख्या संसार में बहुत कम है, जबकि कीड़े मकोड़े सांप बिच्छू वृक्ष वनस्पति शेर भेड़िए जंगली जानवर समुद्री जीव आदि संख्या में बहुत अधिक हैं। शायद मनुष्यों की तुलना में लाखों गुना अधिक हैं। *"मनुष्य जन्म तो पुण्य कर्मों से मिलता है, इस बात को प्रायः सभी जानते हैं। और जो पशु पक्षी कीड़ा मकोड़ा वृक्ष आदि योनियां हैं, वह बुरे कर्मों का ही फल है।"*
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अब इन प्राणियों की संख्या को देखते हुए यही बात समझ में आती है, कि *"संसार में पाप कर्म अधिक होते हैं, और पुण्य कर्म बहुत कम। इसी कारण से मनुष्य से भिन्न प्राणियों की संख्या बहुत अधिक है, और मनुष्यों की बहुत कम, अर्थात उन्नति करने वाले लोग बहुत कम दिखते हैं। अधिकतर लोग तो पतन की ओर ही चल रहे हैं।"* पहाड़ी का उदाहरण हमारे सामने है। हमने देखा है, आपने भी देखा होगा, तथा आप हम में से बहुत लोगों ने अनुभव भी किया होगा, कि *"जब सीधी पहाड़ी पर चढ़ना होता है, तो अपने शरीर का संतुलन बनाने के लिए कुछ आगे की ओर झुकना पड़ता है। तब शरीर का संतुलन ठीक बनता है, और व्यक्ति धीरे-धीरे पहाड़ी पर चढ़ जाता है। यदि पहाड़ी से नीचे उतरना हो, तब भी शरीर का संतुलन बनाना आवश्यक होता है। तब आगे की ओर नहीं झुकते, बल्कि पीछे की ओर झुकना होता है, तभी शरीर का संतुलन ठीक बनता है, और व्यक्ति धीरे-धीरे पहाड़ी से नीचे की ओर उतर आता है।"*
अब यही बात जीवन में भी आप देख सकते हैं। *"अधिकांश लोग तो वैसी ही अकड़ में जी रहे हैं, जैसे कि पहाड़ी से नीचे उतरने वाले लोग अकड़कर पहाड़ी से नीचे उतरते हैं। और बहुत थोड़े लोग ऐसे भी दिखते हैं, जो झुक कर चलते हैं, अर्थात नम्रतापूर्वक सारे कार्य करते हैं। वे पहाड़ी पर चढ़ने वाले लोगों के समान हैं।"* इससे सार यह निकला, कि *"यदि किसी को पहाड़ी पर चढ़ने जैसी उन्नति करनी हो, तो उसे जीवन में अपने सब कार्य नम्रतापूर्वक करने पड़ेंगे, तभी उसकी सही उन्नति हो पाएगी। और जो लोग अकड़ कर चलते हैं, अर्थात दुष्टकर्म करते हैं, वे सब तो पतन की ओर ही जा रहे हैं, जैसे पहाड़ से नीचे उतरने वाला व्यक्ति अकड़ कर नीचे उतरता है।" "ऐसा सबको समझ लेना चाहिए और सबको सावधानी से चलना चाहिए, ताकि अपनी उन्नति कर सकें, तथा पतन से बच सकें।"*
----- *स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, रोजड़, गुजरात।*
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निरंतर खुद को भी और दूसरों को भी क्षमा करने की ताक़त सिर्फ और सिर्फ आध्यात्मिक प्रेम में होती हैं,
तभी आप किसी का मन परिवर्तित कर सकते हैं, तो प्रेम मांगिये नहीं प्रेम का झरना स्वयं बन जाइए, जब प्रेम आपके भीतर से निरंतर बहेगा, तब जो बात आपके पास नहीं हैं वो निर्माण होने लगेगी !
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एक बार मुगल सरदार बहलोल खाँ एवं शिवाजी महाराज की सेनाओं में युद्ध चल रहा था । शिवाजी महाराज युद्ध के विचारों में ही खोये हुए थे कि सेनापति भामलेकर तेजी से घोड़े को दौड़ाते हुए शिवाजी महाराज के पास आये । भामलेकर को देखकर ही शिवाजी महाराज समझ गये कि ये विजयी होकर आये हैं किंतु उनके पीछे दो सैनिक जो डोली लेकर आ रहे थे, उसके बारे में उनको कुछ समझ में नहीं आया । वे दौड़कर नीचे आये और भामलेकर को गले लगा लिया ।

भामलेकर ने कहा : ‘‘ राजे ! आज मुगल सेना दूर तक खदेड़ दी गयी है । बेचारा बहलोल खाँ जान बचाकर भाग गया । अब हिम्मत नहीं कि मुगल सेना इधर की तरफ मुँह भी कर सके ।’’

शिवाजी महाराज : ‘‘वह तो मैं तुम्हें देखकर ही समझ गया था, भामलेकर ! किंतु इस डोली में क्या है ?’’

अट्टहास्य करते हुए भामलेकर ने कहा : ‘‘इसमें मुस्लिमों में सुंदरता के लिए प्रसिद्ध बहलोल खाँ की बेगम है, महाराज ! मुगल सरदार ने हजारों-लाखों हिन्दू नारियों का सतीत्व लूटा है । उसी का प्रतिशोध लेने के लिए मेरी ओर से आपको यह भेंट है ।’’

यह सुनकर शिवाजी महाराज अवाक् रह गये । उन्हें अपने किसी सरदार और सामन्त से ऐसी मूर्खता की आशा नहीं थी । कुछ देर ठहरकर वे डोली के पास गये तथा पर्दा हटाया और बहलोल खाँ की बेगम को बाहर आने के लिए कहा । डरती-सहमती वह बाहर आयी।

उन्होंने अपने एक अन्य अधिकारी को आदेश दिया कि वह बेगम को बाइज्जत ले जाकर बहलोल खाँ को सौंप दे । फिर भामलेकर की ओर मुड़कर बोले : ‘‘तुम मेरे साथ इतने दिनों तक रहे पर मुझे पहचान नहीं पाये । वीर उसे नहीं कहते जो अबलाओं पर प्रहार करे, उनका सतीत्व लूटे । हमें अपनी सांस्कृतिक गरिमा और मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए ।’’

शिवाजी महाराज के कथन को सुनकर भामलेकर को अपनी भूल के लिए पश्चात्ताप होने लगा । इधर बेगम को ससम्मान लौटाया हुआ देखकर बहलोल खाँ भी विस्मित हुए बिना नहीं रहा । वह तो सोच रहा था कि ‘अब उसकी सबसे प्रिय बेगम शिवाजी के महल की शोभा बन चुकी होगी ।’

परंतु बेगम ने अपने पति को छत्रपति के बारे में जो कुछ बताया वह जानकर तथा अधिकारी के हाथों भेजा गया पत्र पढ़कर बहलोल खाँ जैसा क्रूर सेनापति भी पिघल गया । पत्र में शिवाजी महाराज ने अपने सेनानायक की गलती के लिए क्षमा माँगी थी । इस पत्र को देखकर स्वयं को बहुत महान् वीर और पराक्रमी समझनेवाला बहलोल खाँ अपनी ही नजर में छत्रपति शिवाजी महाराज के सामने बहुत छोटा दिखाई देने लगा । उसने निश्चय किया कि ‘इस फरिश्ते को देखकर ही दिल्ली लौटूँगा।’

इसके लिए आग्रह-पत्र भेजा गया । बहलोल खाँ और शिवाजी महाराज के मिलने का स्थान निश्चित हुआ । नियत तिथि, समय व स्थान पर शिवाजी महाराज बहलोल खाँ से पहले ही पहुँच गये । बहलोल खाँ जब वहाँ पहुँचा तो पश्चात्ताप व आत्मग्लानि के साथ-साथ शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धाभाव से इतना अभिभूत था कि देखते ही उनके पैरों में झुक गया और बोला : ‘‘माफ कर दो मुझे मेरे फरिश्ते ! बेगुनाहों का खून मेरे सर चढ़कर बोलेगा और मैं उनकी आह से जला करूँगा । उस समय आपकी सूरत की याद मुझे थोड़ी-सी ठंडक पहुँचायेगी ।’’

‘‘जो हुआ सो हुआ । अब आगे का होश करो ।’’ एक पराजित और श्रद्धानत सेनापति को गले लगाते हुए छत्रपति शिवाजी ने कहा ।

इन सबके मूल में क्या था ? समर्थ रामदास जैसे महापुरुष का सान्निध्य, यौवन-सुरक्षा के सिद्धांत का आदर, सज्जनता एवं दृढ़ संयम । अपने संयम के कारण ही वे भारतीय संस्कृति की गरिमा को बनाये रखने में सक्षम हुए एवं शत्रु के हृदय में भी अपना स्थान बना सके ।

हे भारत के युवानों ! उठो, जागो और अपने पूर्वजों के गौरव को याद करो । अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए कमर कसकर तैयार हो जाओ । अश्लील फिल्म, उपन्यास, साहित्य आदि गंदगी से बचो एवं ‘यौवन-सुरक्षा’ जैसी पुस्तकें पढ़कर, छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे महान् योद्धाओं का जीवन-चरित्र पढ़कर एवं ऋषि-मुनियों की दिव्य देन सत्शास्त्रों को पढ़कर अपने जीवन को उन्नत बनाओ। सत्संग-श्रवण करके, संतों के द्वारा श्रेष्ठ मार्गदर्शन पाकर, संयम एवं सदाचार का आश्रय लेकर अपने जीवन में भी ओजस्विता-तेजस्विता भर दो । पाश्चात्य जगत के अंधानुकरण से बचकर रॉक-पॉप, डिस्को आदि जीवन-शक्ति का ह्रास करनेवाली विकृति से बचकर अपनी भव्य भारतीय संस्कृति को अपनाओ । शाबाश वीर ! शाबाश…

~ ऋषि प्रसाद, अप्रैल 1998
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*अब हम बिमार हो रहे हैं*

अब हमने कच्चा खाना खाना छोड़ दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं....

अब हमने अकेलापन चालू कर दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.........

अब हमने धुप लेना बँद कर दिया है, इसलिय हम बिमार हो रहे हैं......

अब हमने खाना खाने के बाद वज्रासन मे बैठना छोड़ दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.......

अब हमने खाना खाने के बाद गुड खाना छोड़ दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.........

अब हमने खाने के बिच मे दबा कर पानी पीना शुरु कर दिया है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.......

अब हमने खाना खाने के बाद 100कदम चलना छोड़ दिया है, इसलिय हम बिमार हो रहे है......

अब खाना खाते समय तनाव मे खाना खा रहे है, इसलिय बिमार हो रहे है.........

अब हम खाना खाते समय बिना चबाए खाना निगल जा रहे है, इसलिय बिमार हो रहे हैं.......

अब हम depresion मे जी रहे है, इसलिय बिमार हो रहे है......
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काम विकारो को दबा देना ही इंन्द्रिय दमन है जिनका मन शुद्ध और संयमी है वहि अपने वीर्य को रोक सकता है।
कामवासना यह वो आग है जिसे समय चलते नहीं रोका गया तो सबकुछ जलाकर राख कर देगी . इससे बचना है तो पहले अपने बुद्धी में यह बात बैठालो किं , इसमे कोई सुख नहीं है . यह केवल सुख का आभास कराती है . जब इसमे हमारी भोग बुद्धी समाप्त हो जाऐगी तो यह अपने आप शांत होगी.मै अपना खुद का अनुभव बता रहा हूं प्रिय जनो असली आनंद तो केवल ब्रम्हचर्य में है . इसका जरुर निष्ठापूर्वक पालन करो फिर देखो चमत्कार ....
आप अपने वीर्य को जो बाजार में नही मिलता ,यूँही छनभर के सुख के लिए न गवाये , इसे ब्रह्मचर्य पालन द्वारा अपने शरीर में संचित करिये , इसकी रक्षा करिये तब देखिये आपके जीवन में कैसे बदलाव आते है ।
दोस्तों भीड़ से अलग बनिए ,1% वाली वर्ग में आईये ,आज 99% युवा अपने जीवन शक्ति (वीर्य) को पानी के तरह बहा रहे है ।

लेकिन हमें उनके जैसा नही बनना है ।

आज राम कृष्ण हनुमान के सिंद्धात है अनिवार्य ।
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जो सफर की शुरुआत करते हैं,
वे मंजिल भी पा लेते हैं
बस एक बार चलने का हौसला रखना जरुरी है क्योंकि,
अच्छे इंसानों का तो रास्ते भी इन्तजार करते हैं

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🥗 ब्रह्मचर्य औषधि समाधान भाग 4002🥗

🥗🥗🥗समाधान 3 प्रकृति का...

🥗आयुर्वेद के अनुसार किसी भी तरह के रोग होने के 3 कारण होते हैं-

🥗1. वात:- शरीर में गैस बनना।
🥗2. पित्त:- शरीर की गर्मी बढ़ना।
🥗3. कफ:- शरीर में बलगम बनना।

🥗🥗किसी भी रोग के होने का कारण एक भी हो सकता है और दो भी हो सकता है या दोनों का मिश्रण भी हो सकता है या तीनों दोषों के कारण भी रोग हो सकता है।

🥗1. वात होने का कारण - गलत भोजन, बेसन, मैदा, बारीक आटा तथा अधिक दालों का सेवन करने से शरीर में वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
दूषित भोजन, अधिक मांस का सेवन तथा बर्फ का सेवन करने के कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
आलसी जीवन, सूर्यस्नान, तथा व्यायाम की कमी के कारण पाचन क्रिया कमजोर हो जाती है जिसके कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
इन सभी कारणों से पेट में कब्ज (गंदी वायु) बनने लगती है और यही वायु शरीर में जहां भी रुकती है, फंसती है या टकराती है, वहां दर्द होता है। यही दर्द वात दोष कहलाता है।

🥗2. पित्त होने का कारण - पित्त दोष होने का कारण मूल रुप से गलत आहार है जैसे- चीनी, नमक तथा मिर्चमसाले का अधिक सेवन करना।
नशीली चीजों तथा दवाईयों का अधिक सेवन करने के कारण पित्त दोष उत्पन्न होता है।
दूषित भोजन तथा केवल पके हुए भोजन का सेवन करने से पित्त दोष उत्पन्न होता है।
भोजन में कम से कम 75 से 80 प्रतिशत क्षारीय पदार्थ (फल, सब्जियां इत्यादि अपक्वाहार) तथा 20 से 25 प्रतिशत अम्लीय पक्वाहार पदार्थ होने चाहिए। जब इसके विपरीत स्थिति होती है तो शरीर में अम्लता बढ़ जाती हैं और पित्त दोष उत्पन्न हो जाता है।

🥗3. कफ होने का कारण - तेल, मक्खन तथा घी आदि चिकनाई वाली चीजों को हजम करने के लिए बहुत अधिक कार्य करने तथा व्यायाम की आवश्यकता होती है और जब इसका अभाव होता है तो पाचनक्रिया कम हो जाती है और पाचनक्रिया की क्षमता से अधिक मात्रा में चिकनाई वाली वस्तुएं सेवन करते है तो कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।
रात के समय में दूध या दही का सेवन करने से कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।

🥗🥗वात, पित्त और कफ के कारण होने वाले रोग निम्नलिखित हैं-

🥗वात के कारण होने वाले रोग -

अफारा, टांगों में दर्द, पेट में वायु बनना, जोड़ों में दर्द, लकवा, साइटिका, शरीर के अंगों का सुन्न हो जाना, शिथिल होना, कांपना, फड़कना, टेढ़ा हो जाना, दर्द, नाड़ियों में खिंचाव, कम सुनना, वात ज्वर तथा शरीर के किसी भी भाग में अचानक दर्द हो जाना आदि।

🥗पित्त के कारण होने वाले रोग -

पेट, छाती, शरीर आदि में जलन होना, खट्टी डकारें आना, पित्ती उछलना (एलर्जी), रक्ताल्पता (खून की कमी), चर्म रोग (खुजली, फोड़े तथा फुन्सियां आदि), कुष्ठरोग, जिगर के रोग, तिल्ली की वृद्धि हो जाना, शरीर में कमजोरी आना, गुर्दे तथा हृदय के रोग आदि।

🥗कफ के कारण होने वाले रोग -

बार-बार बलगम निकलना, सर्दी लगना, श्वसन संस्थान सम्बंधी रोग (खांसी, दमा आदि), शरीर का फूलना, मोटापा बढ़ना, जुकाम होना तथा फेफड़ों की टी.बी. आदि।

🥗🥗वात से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-

🥗आहार चिकित्सा-

🥗 वात से पीड़ित रोगी को अपने भोजन में रेशेदार भोजन (बिना पकाया हुआ भोजन) फल, सलाद तथा पत्तेदार सब्जियों का अधिक प्रयोग करना चाहिए।

🥗मुनक्का अंजीर, बेर, अदरक, तुलसी, गाजर, सोयाबीन, सौंफ तथा छोटी इलायची का भोजन में अधिक उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

🥗 रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में लहसुन की 2-4 कलियां खानी चाहिए तथा अपने भोजन में मक्खन का उपयोग करना चाहिए इसके फलस्वरूप वात रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

🥗उपवास -

वात रोग से पीड़ित रोगी को सबसे पहले कुछ दिनों तक सब्जियों या फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए तथा इसके बाद अन्य चिकित्सा करनी चाहिए।

🥗🥗पित्त से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-

🥗आहार चिकित्सा

🥗पित्त रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सब्जियों तथा फलों का रस पीना चाहिए।

🥗 पित्त रोग से पीड़ित रोगी को भूख न लग रही हो तो केवल फलों का रस तथा सब्जियों का रस पीना चाहिए और सलाद का अपने भोजन में उपयोग करना चाहिए। इसके फलस्वरूप उसका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

🥗रोगी व्यक्ति को पूरी तरह स्वस्थ होने तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए।

🥗पित्त रोग से पीड़ित रोगी को खट्टी, मसालेदार, नमकीन चीजें तथा मिठाईयां नहीं खानी चाहिए क्योंकि इन चीजों के सेवन से पित्त रोग और बिगड़ जाता है।

🥗पित्त के रोगी के लिए गाजर का रस पीना बहुत ही लाभकारी होता है, इसलिए रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में कम से कम 1 गिलास गाजर का रस पीना चाहिए।

🥗 अनार, मुनक्का, अंजीर, जामुन, सिंघाड़ा, सौंफ तथा दूब का रस पीना पित्त रोगी के लिए बहुत ही लाभकारी होता है।
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ब्रह्मचर्य ही जीवन (हरीॐ)
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पतंजलि कहते हैं- ‘योगाश्चित्त वृत्तिनिरोधः’।* अर्थात योग चित्त की वृत्तियों का संयमन है। चित्त वृत्तियों के निरोध के लिए महर्षि पतंजलि ने द्वितीय और तृतीय पाद में जिस अष्टांग योग साधन का उपदेश दिया है, उसका संक्षिप्त परिचय निम्नानुसार है:-
1).यम: कायिक, वाचिक तथा मानसिक इस संयम के लिए अहिंसा, सत्य, अस्तेय चोरी न करना, ब्रह्मचर्य जैसे अपरिग्रह आदि पाँच आचार विहित हैं। इनका पालन न करने से व्यक्ति का जीवन और समाज दोनों ही दुष्प्रभावित होते हैं।
(2).नियम: मनुष्य को कर्तव्य परायण बनाने तथा जीवन को सुव्यवस्थित करते हेतु नियमों का विधान किया गया है। इनके अंतर्गत शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान का समावेश है। शौच में बाह्य तथा आन्तर दोनों ही प्रकार के शुद्धि समाविष्ट है।
(3).आसन: पतंजलि ने स्थिर तथा सुखपूर्वक बैठने की क्रिया को आसन कहा है। परवर्ती विचारकों ने अनेक आसनों की कल्पना की है। वास्तव में आसन हठयोग का एक मुख्य विषय ही है। इनसे संबंधित ‘हठयोग प्रदीपिका’ ‘घरेण्ड संहिता’ तथा ‘योगाशिखोपनिषद्’ में विस्तार से वर्णन मिलता है।
(4).प्राणायाम: योग की यथेष्ट भूमिका के लिए नाड़ी साधन और उनके जागरण के लिए किया जाने वाला श्वास और प्रश्वास का नियमन प्राणायाम है। प्राणायाम मन की चंचलता और विक्षुब्धता पर विजय प्राप्त करने के लिए बहुत सहायक है।(5).प्रत्याहार: इंद्रियों को विषयों से हटाने का नाम ही प्रत्याहार है। इंद्रियाँ मनुष्य को बाह्यभिमुख किया करती हैं। प्रत्याहार के इस अभ्यास से साधक योग के लिए परम आवश्यक अन्तर्मुखिता की स्थिति प्राप्त करता है।
(6).धारणा: चित्त को एक स्थान विशेष पर केंद्रित करना ही धारणा है।
(7).ध्यान: जब ध्येय वस्तु का चिंतन करते हुए चित्त तद्रूप हो जाता है तो उसे ध्यान कहते हैं। पूर्ण ध्यान की स्थिति में किसी अन्य वस्तु का ज्ञान अथवा उसकी स्मृति चित्त में प्रविष्ट नहीं होती।
(8).समाधि: यह चित्त की अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है। योग दर्शन समाधि के द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति को संभव मानता है।
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