आँसु एक सहज प्रार्थना
तुम्हें अगर प्रभु का नाम सुनकर आँसु आते हैं, अगर तुम्हें उसके नाम को लेकर आँसु आते हैं तो जिन्दगी के यही पल सार्थक हैं, मंगलदायी हैं । ये पल प्रभु की कृपा हैं, ये पल उसकी करुणा का प्रसाद हैं ।
आँसुओं को रोकना मत, उनको बहने देना, उन आँसुओं में बहुत कुछ कूडा़ कर्कट तुम्हारा बह जाएगा । तुम पीछे तरोताजा अनुभव करोगे । जैसे कि कोई स्नान हो गया हो । आँखों से कंजूसी मत करना, बहने दो इन आँसुओं को, ये आँसु भीतर उठती किसी रसधार की खबर हैं । बस, इतना ख्याल रहे कि इन आँसुओं को अपनी मस्ती जरुर बना लेना । इन आँसुओं को अपना रस, अपना आनन्द बनाना है ।
उस प्रभु के लिए यही तुम्हारी सरल, सहज और निर्मल प्रार्थना है । अगर तुम खुलकर हृदय से उसके लिए रोना सीख लेते हो तो समझो इससे आगे कुछ और नहीं चाहिए, उसको रिझाने के लिए । क्योंकि रोते-रोते ही हँसना आ जाता है । उसके लिए रोना ही सबसे सरल और सबसे सहज साधन है, इसलिए उसको रिझाने के लिए रोओ ।
दरअसल आँसुओं से बड़ी और कोई प्रार्थना नहीं है । इसलिए हृदय पूर्वक रोओ । आँसु निखारेंगे तुम्हें, बुहारेंगे तुम्हें, जो व्यर्थ है वह बाहर निकल जाएगा । जो सार्थक है, निर्मल है, वह स्फटिक मणि की भांति स्वच्छ होकर भीतर जगमगाने लगेगा ।
तुम्हें अगर प्रभु का नाम सुनकर आँसु आते हैं, अगर तुम्हें उसके नाम को लेकर आँसु आते हैं तो जिन्दगी के यही पल सार्थक हैं, मंगलदायी हैं । ये पल प्रभु की कृपा हैं, ये पल उसकी करुणा का प्रसाद हैं ।
आँसुओं को रोकना मत, उनको बहने देना, उन आँसुओं में बहुत कुछ कूडा़ कर्कट तुम्हारा बह जाएगा । तुम पीछे तरोताजा अनुभव करोगे । जैसे कि कोई स्नान हो गया हो । आँखों से कंजूसी मत करना, बहने दो इन आँसुओं को, ये आँसु भीतर उठती किसी रसधार की खबर हैं । बस, इतना ख्याल रहे कि इन आँसुओं को अपनी मस्ती जरुर बना लेना । इन आँसुओं को अपना रस, अपना आनन्द बनाना है ।
उस प्रभु के लिए यही तुम्हारी सरल, सहज और निर्मल प्रार्थना है । अगर तुम खुलकर हृदय से उसके लिए रोना सीख लेते हो तो समझो इससे आगे कुछ और नहीं चाहिए, उसको रिझाने के लिए । क्योंकि रोते-रोते ही हँसना आ जाता है । उसके लिए रोना ही सबसे सरल और सबसे सहज साधन है, इसलिए उसको रिझाने के लिए रोओ ।
दरअसल आँसुओं से बड़ी और कोई प्रार्थना नहीं है । इसलिए हृदय पूर्वक रोओ । आँसु निखारेंगे तुम्हें, बुहारेंगे तुम्हें, जो व्यर्थ है वह बाहर निकल जाएगा । जो सार्थक है, निर्मल है, वह स्फटिक मणि की भांति स्वच्छ होकर भीतर जगमगाने लगेगा ।
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*त्वमेव मृत्युममृतं तात देवं सर्वात्मनोपेहि जगत्परायणम् ।*
*यस्मै बलिं विश्र्वसृजो हरन्ति गावो यथा वै नसि दामयंत्रिता:।।*
जिस प्रकार नाक में नकेल पड़े हुए बैल अपने मालिक का बोझा ढोते रहते हैं,, इसी प्रकार जगत की रचना करने वाले ब्रह्मा आदि भी नाम रुप डोरी से बंधे हुए उन्ही की आज्ञा का पालन करते है । वे अभक्तओ के लिए मृत्युरुप और भक्तों के लिए अमृतरुप है तथा संसार के एक मात्र आश्रय रुप है ।
*अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च।*
*स्वं कालं नाऽतिवर्तन्ते तथा कर्म पुराकृतम् ।।*
भावार्थ : - बिना किसी आदेश या प्रेरणा के जिस प्रकार पुष्प और फल अपने निर्धारित समय पर वृक्षों में उत्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य द्वारा पूर्व किये हुए सत्कर्मों या दुष्कर्मों का फल भी उसे किसी अन्य प्रकार से नहीं परन्तु इसी प्रकार से समय आने पर स्वयं प्राप्त हो जाता है l
*यस्मै बलिं विश्र्वसृजो हरन्ति गावो यथा वै नसि दामयंत्रिता:।।*
जिस प्रकार नाक में नकेल पड़े हुए बैल अपने मालिक का बोझा ढोते रहते हैं,, इसी प्रकार जगत की रचना करने वाले ब्रह्मा आदि भी नाम रुप डोरी से बंधे हुए उन्ही की आज्ञा का पालन करते है । वे अभक्तओ के लिए मृत्युरुप और भक्तों के लिए अमृतरुप है तथा संसार के एक मात्र आश्रय रुप है ।
*अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च।*
*स्वं कालं नाऽतिवर्तन्ते तथा कर्म पुराकृतम् ।।*
भावार्थ : - बिना किसी आदेश या प्रेरणा के जिस प्रकार पुष्प और फल अपने निर्धारित समय पर वृक्षों में उत्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य द्वारा पूर्व किये हुए सत्कर्मों या दुष्कर्मों का फल भी उसे किसी अन्य प्रकार से नहीं परन्तु इसी प्रकार से समय आने पर स्वयं प्राप्त हो जाता है l
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*_ईश्वर का एक नाम है, लीलाधर ईश्वर अपने भक्तों को आनंद प्रदान करने के लिए, सुख देने के लिए साकार रुप धारण करते है।और मनुष्य को काल के अनुसार आनंद और सुखमय जीवन जीने की कला का संदेश देते है।*
*ईश्वर की लीला मनुष्य की बुद्धि से परे होती है। जिसे देख कर मनुष्य ही नहीं देवता भी भ्रम में पड़ जाते है। बड़े-बड़े ऋषि, मुनि भी ईश्वर की लीला को जान नहीं पाते। ईश्वर साधना साध्य नहीं कृपा साध्य हैं। विश्वास प्रेम और समर्पण ईश्वर को पाने का सरल मार्ग है।*
*ईश्वर की लीला मनुष्य की बुद्धि से परे होती है। जिसे देख कर मनुष्य ही नहीं देवता भी भ्रम में पड़ जाते है। बड़े-बड़े ऋषि, मुनि भी ईश्वर की लीला को जान नहीं पाते। ईश्वर साधना साध्य नहीं कृपा साध्य हैं। विश्वास प्रेम और समर्पण ईश्वर को पाने का सरल मार्ग है।*
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*🕉️🚩चैत्र माह2024: फाल्गुन पूर्णिमा के बाद चैत्र मास प्रारंभ होता है*
हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास
हिन्दू नववर्ष का पहला महीना माना जाता है। इस माह को मधुमह भी कहा जाता है। आपको बता दें कि हिंदू कैलेंडर के सभी महीनों के नाम नक्षत्रों के आधार पर रखे गए हैं। इस माह में चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में प्रवेश करता है। इसीलिए इसे चैत्र मास कहा जाता है। सनातन धर्म में इस माह का विशेष महत्व है। चैत्र नवरात्रि, राम नवमी, पापमोचनी एकादशी, शीतला अष्टमी, भाई दूज जैसे कई प्रमुख व्रत और त्योहार इसी महीने में आते हैं। आइए देखें चैत्र माह में आने वाले सभी व्रत और त्योहारों की सूची...
चैत्र मास 2024 कब से?
हिंदू कैलेंडर के अनुसार, चैत्र माह की शुरुआत 26 मार्च को हुई थी, जो 23 अप्रैल को पूर्णिमा के साथ समाप्त होगा।
चैत्र माह में करें इन देवताओं की पूजा
चैत्र माह में भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण किया था। इसलिए इस महीने में भगवान मत्स्य की पूजा करना शुभ माना जाता है। इसके अलावा इस दिन हनुमानजी और श्रीराम के साथ मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा भी विशेष मानी जाती है।
चैत्र मास का महत्व
हिंदू नववर्ष की शुरुआत चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है। नारद पुराण के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पहली किरण से सृष्टि की शुरुआत की थी। इस दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार में ऋषि मनु को बाढ़ से बचाया था। जलप्रलय समाप्त होने के बाद मनु ने नई सृष्टि प्रारम्भ की। इसके साथ ही चैत्र माह से नियमित रूप से मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। इसके अलावा इस महीने में भगवान विष्णु के साथ देवी लक्ष्मी की पूजा करना भी शुभ माना जाता है।
चैत्र माह में पड़ने वाले व्रत-त्योहार
तिथि दिवस व्रत त्योहार
1 अप्रैल 2024 सोमवार चेचक सप्तमी, कालाष्टमी, शीतला सप्तमी व्रत
05 अप्रैल 2024 शुक्रवार पापामोची एकादशी
06 अप्रैल 2024 शनिवार प्रदोष व्रत (कृष्ण)
07 अप्रैल 2024 रविवार मासिक शिवरात्रि
08 अप्रैल 2024 सोमवार चैत्र अमावस्या पूर्ण सूर्य ग्रहण
09 अप्रैल 2024 मंगलवार चैत्र नवरात्रि, उगादि घटस्थापना, गुड़ी पड़वा, झूलेलाल जयंती
10 अप्रैल 2024 बुधवार चेटी चंड
11 अप्रैल 2024 गुरुवार मत्स्य जयंती, गौरी पूजा, गणगौर
12 अप्रैल 2024 शुक्रवार विनायक चतुर्थी
13 अप्रैल 2024 शनिवार मेष संक्रांति, बैसाखी
17 अप्रैल 2024 बुधवार चैत्र नवरात्रि पारण, राम नवमी
19 अप्रैल 2024 शुक्रवार कामदा एकादशी
21 अप्रैल 2024 रविवार प्रदोष व्रत (शुक्ल)
23 अप्रैल 2024 मंगलवार हनुमान जयंती, चैत्र पूर्णिमा व्रत🙏🔱🔔
*🚩जय मां काली🚩*
हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास
हिन्दू नववर्ष का पहला महीना माना जाता है। इस माह को मधुमह भी कहा जाता है। आपको बता दें कि हिंदू कैलेंडर के सभी महीनों के नाम नक्षत्रों के आधार पर रखे गए हैं। इस माह में चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में प्रवेश करता है। इसीलिए इसे चैत्र मास कहा जाता है। सनातन धर्म में इस माह का विशेष महत्व है। चैत्र नवरात्रि, राम नवमी, पापमोचनी एकादशी, शीतला अष्टमी, भाई दूज जैसे कई प्रमुख व्रत और त्योहार इसी महीने में आते हैं। आइए देखें चैत्र माह में आने वाले सभी व्रत और त्योहारों की सूची...
चैत्र मास 2024 कब से?
हिंदू कैलेंडर के अनुसार, चैत्र माह की शुरुआत 26 मार्च को हुई थी, जो 23 अप्रैल को पूर्णिमा के साथ समाप्त होगा।
चैत्र माह में करें इन देवताओं की पूजा
चैत्र माह में भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण किया था। इसलिए इस महीने में भगवान मत्स्य की पूजा करना शुभ माना जाता है। इसके अलावा इस दिन हनुमानजी और श्रीराम के साथ मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा भी विशेष मानी जाती है।
चैत्र मास का महत्व
हिंदू नववर्ष की शुरुआत चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है। नारद पुराण के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पहली किरण से सृष्टि की शुरुआत की थी। इस दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार में ऋषि मनु को बाढ़ से बचाया था। जलप्रलय समाप्त होने के बाद मनु ने नई सृष्टि प्रारम्भ की। इसके साथ ही चैत्र माह से नियमित रूप से मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। इसके अलावा इस महीने में भगवान विष्णु के साथ देवी लक्ष्मी की पूजा करना भी शुभ माना जाता है।
चैत्र माह में पड़ने वाले व्रत-त्योहार
तिथि दिवस व्रत त्योहार
1 अप्रैल 2024 सोमवार चेचक सप्तमी, कालाष्टमी, शीतला सप्तमी व्रत
05 अप्रैल 2024 शुक्रवार पापामोची एकादशी
06 अप्रैल 2024 शनिवार प्रदोष व्रत (कृष्ण)
07 अप्रैल 2024 रविवार मासिक शिवरात्रि
08 अप्रैल 2024 सोमवार चैत्र अमावस्या पूर्ण सूर्य ग्रहण
09 अप्रैल 2024 मंगलवार चैत्र नवरात्रि, उगादि घटस्थापना, गुड़ी पड़वा, झूलेलाल जयंती
10 अप्रैल 2024 बुधवार चेटी चंड
11 अप्रैल 2024 गुरुवार मत्स्य जयंती, गौरी पूजा, गणगौर
12 अप्रैल 2024 शुक्रवार विनायक चतुर्थी
13 अप्रैल 2024 शनिवार मेष संक्रांति, बैसाखी
17 अप्रैल 2024 बुधवार चैत्र नवरात्रि पारण, राम नवमी
19 अप्रैल 2024 शुक्रवार कामदा एकादशी
21 अप्रैल 2024 रविवार प्रदोष व्रत (शुक्ल)
23 अप्रैल 2024 मंगलवार हनुमान जयंती, चैत्र पूर्णिमा व्रत🙏🔱🔔
*🚩जय मां काली🚩*
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*शीतला सप्तमी : पूजा का समय*
*🙏शीतला सप्तमी होली पर्व के सात दिन बाद चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है। इस दिन मां दुर्गा के स्वरूप माता शीतला की उपासना की जाती है। शीतला अष्टमी के दिन उन्हें बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। यह व्रत संतानवती स्त्रियां प्रमुख रूप से अपनी संतान के उत्तम स्वास्थ्य व उनकी दीर्घायु की कामना के लिए करती हैं।*
*शीतला सप्तमी - 01 अप्रैल, सोमवार*
*शीतला सप्तमी पूजा मुहूर्त - 05:49 AM से 06:14 PM*
*सप्तमी तिथि प्रारम्भ - 31 मार्च, 09:30 PM*
*सप्तमी तिथि समाप्त - 01 अप्रैल, 09:09 PM*
*उदय तिथि के अनुसार शीतला सप्तमी 1 अप्रैल को मनाई जाएगी। शीतला माता शीतलता प्रदान करने वाली देवी मानी गई हैं। इसलिए सूर्य का तेज बढ़ने से पहले इनकी पूजा उत्तम मानी जाती है।*
*शीतला सप्तमी की पूजा विधि-*
• सुबह जल्दी उठकर नहा लें।
• पूजा की थाली में दही, पुआ, रोटी, बाजरा, सप्तमी को बने मीठे चावल, नमक पारे और मठरी रखें।
• दूसरी थाली में आटे से बना दीपक, रोली, वस्त्र, अक्षत, हल्दी, मोली, होली वाली बड़कुले की माला, सिक्के और मेहंदी रखें।
• दोनों थालियों के साथ में ठंडे पानी का लोटा भी रख दें।
• अब शीतला माता की पूजा करें।
• माता को सभी सामग्री अर्पित करने के बाद खुद और घर से सभी सदस्यों को हल्दी का टीका लगाएं।
• मंदिर में पहले माता को जल चढ़ाकर रोली और हल्दी का टीका करें। आटे के दीपक को बिना जलाए माता को अर्पित करें। अंत में वापस जल चढ़ाएं और थोड़ा जल बचाकर उसे घर के सभी सदस्यों को आंखों पर लगाने को दें।
• बाकी बचा हुआ जल घर के हर हिस्से में छिड़क दें। इसके बाद होलिका दहन वाली जगह पर भी पूजा करें। वहां थोड़ा जल और पूजन सामग्री घर आने के बाद पानी रखने की जगह पर पूजा करें।
• अगर पूजन सामग्री बच जाए तो गाय या ब्राह्मण को दे दें।
• शास्त्रों के अनुसार, शीतला माता की पूजा के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है। माता शीतला की पूजा से पर्यावरण को स्वच्छ व साफ रखने की प्रेरणा प्राप्त होती है। मान्यता है कि इस दिन बासी खाना नहीं खाया जाता है।
🙏🔱🔔📿🐚🪷
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरीयसी। माता गुरुतरा भूमेरू।।
*सूर्यदेव भगवान जी की जय*
*🙏शीतला सप्तमी होली पर्व के सात दिन बाद चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है। इस दिन मां दुर्गा के स्वरूप माता शीतला की उपासना की जाती है। शीतला अष्टमी के दिन उन्हें बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। यह व्रत संतानवती स्त्रियां प्रमुख रूप से अपनी संतान के उत्तम स्वास्थ्य व उनकी दीर्घायु की कामना के लिए करती हैं।*
*शीतला सप्तमी - 01 अप्रैल, सोमवार*
*शीतला सप्तमी पूजा मुहूर्त - 05:49 AM से 06:14 PM*
*सप्तमी तिथि प्रारम्भ - 31 मार्च, 09:30 PM*
*सप्तमी तिथि समाप्त - 01 अप्रैल, 09:09 PM*
*उदय तिथि के अनुसार शीतला सप्तमी 1 अप्रैल को मनाई जाएगी। शीतला माता शीतलता प्रदान करने वाली देवी मानी गई हैं। इसलिए सूर्य का तेज बढ़ने से पहले इनकी पूजा उत्तम मानी जाती है।*
*शीतला सप्तमी की पूजा विधि-*
• सुबह जल्दी उठकर नहा लें।
• पूजा की थाली में दही, पुआ, रोटी, बाजरा, सप्तमी को बने मीठे चावल, नमक पारे और मठरी रखें।
• दूसरी थाली में आटे से बना दीपक, रोली, वस्त्र, अक्षत, हल्दी, मोली, होली वाली बड़कुले की माला, सिक्के और मेहंदी रखें।
• दोनों थालियों के साथ में ठंडे पानी का लोटा भी रख दें।
• अब शीतला माता की पूजा करें।
• माता को सभी सामग्री अर्पित करने के बाद खुद और घर से सभी सदस्यों को हल्दी का टीका लगाएं।
• मंदिर में पहले माता को जल चढ़ाकर रोली और हल्दी का टीका करें। आटे के दीपक को बिना जलाए माता को अर्पित करें। अंत में वापस जल चढ़ाएं और थोड़ा जल बचाकर उसे घर के सभी सदस्यों को आंखों पर लगाने को दें।
• बाकी बचा हुआ जल घर के हर हिस्से में छिड़क दें। इसके बाद होलिका दहन वाली जगह पर भी पूजा करें। वहां थोड़ा जल और पूजन सामग्री घर आने के बाद पानी रखने की जगह पर पूजा करें।
• अगर पूजन सामग्री बच जाए तो गाय या ब्राह्मण को दे दें।
• शास्त्रों के अनुसार, शीतला माता की पूजा के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है। माता शीतला की पूजा से पर्यावरण को स्वच्छ व साफ रखने की प्रेरणा प्राप्त होती है। मान्यता है कि इस दिन बासी खाना नहीं खाया जाता है।
🙏🔱🔔📿🐚🪷
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरीयसी। माता गुरुतरा भूमेरू।।
*सूर्यदेव भगवान जी की जय*
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*शीतला माता को प्रत्येक प्रकार के मेवे,मिठाई, पूआ, पूरी, दाल - भात, लपसी और रोटी - तरकारी आदि कच्चे-पक्के शीतल पदार्थ का नैवेद्य लगाया जाता है, जो एक दिन पूर्व रात्रि में बनाया जाता है।
👉 कुल परम्परा अनुसार शीतल पदार्थ बनाकर शीतला माता को नैवेद्य लगाया जाता है।
👉 शीतला माता के पूजन करने से परिवार में दाह ज्वर, पीत ज्वर, विस्फोटक, दुर्गन्धयुक्त फोड़े, नेत्रों के समस्त रोग, शीतला की फुंसियों के चिन्ह और शीतलाजनित सर्वदोष दूर होते हैं।
👉 अगर सम्भव हो तो इस दिन अपने गांव या उससे निकट शीतला माता के मंदिर में दर्शन या पूजन करने के लिए जाएं जिससे माता की कृपा आप पर बनी रहे।
👉 अनेक प्रकार के रोगों से बचने के लिए ऋषि - मुनियों ने शीतला माता पूजन को प्रचारित किया।
👉 स्कन्द पुराण में भी इसका विस्तार से उल्लेख है।
👉 शीतला पूजन के बाद उस दिन शीतल भोजन ही किया जाता है।
👉 शीतला स्तोत्र में शीतला माता का जो स्वरूप बतलाया है; वह शीतला रोगियों के लिए बहुत हितकारी है।
👉 शीतला माता गर्दभ पर आरुढ़ रहती हैं, शूप, मार्जनी (झाड़ू) और नीम के पत्तों से अलंकृत होती हैं तथा हाथ में शीतल जल का कलश रखती हैं।
👉 वास्तव में शीतला रोगी के सर्वाङ्ग में दाहयुक्त फोड़े होने से वह बिल्कुल नग्न हो जाता है। 'गर्दभ पिण्डी' (गधे की लीद) की गन्ध से फोड़ों की पीड़ा कम होती है। शूप के काम (अन्न की सफाई आदि) करने और झाड़ू लगाने से बीमारी बढ़ जाती है। अतः इन कामों को सर्वथा बंद रखने के लिए शूप और झाड़ू रोगी के समीप रखते हैं। नीम के पत्तों से शीतला के फोड़े सड़ नहीं सकते और शीतल जल के कलश का समीप रखना तो आवश्यक है ही।
👉 शीतला माता का स्त्रोत -
_*वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्।*_
_*मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालंकृतमस्तकाम्।।*_
👆 उक्त स्तोत्र का उच्चारण करते हुए शीतला माता को जल और शीतल पदार्थ (नैवेद्य) चढ़ाना चाहिए।
👉 शीतला माता का विस्तृत वर्णन *स्कन्द पुराण* में उल्लेखित है अगर आपको इनके विषय में विस्तार से जानना हैं तो इस पुराण का अध्ययन कर सकते हैं।
👉 कुल परम्परा अनुसार शीतल पदार्थ बनाकर शीतला माता को नैवेद्य लगाया जाता है।
👉 शीतला माता के पूजन करने से परिवार में दाह ज्वर, पीत ज्वर, विस्फोटक, दुर्गन्धयुक्त फोड़े, नेत्रों के समस्त रोग, शीतला की फुंसियों के चिन्ह और शीतलाजनित सर्वदोष दूर होते हैं।
👉 अगर सम्भव हो तो इस दिन अपने गांव या उससे निकट शीतला माता के मंदिर में दर्शन या पूजन करने के लिए जाएं जिससे माता की कृपा आप पर बनी रहे।
👉 अनेक प्रकार के रोगों से बचने के लिए ऋषि - मुनियों ने शीतला माता पूजन को प्रचारित किया।
👉 स्कन्द पुराण में भी इसका विस्तार से उल्लेख है।
👉 शीतला पूजन के बाद उस दिन शीतल भोजन ही किया जाता है।
👉 शीतला स्तोत्र में शीतला माता का जो स्वरूप बतलाया है; वह शीतला रोगियों के लिए बहुत हितकारी है।
👉 शीतला माता गर्दभ पर आरुढ़ रहती हैं, शूप, मार्जनी (झाड़ू) और नीम के पत्तों से अलंकृत होती हैं तथा हाथ में शीतल जल का कलश रखती हैं।
👉 वास्तव में शीतला रोगी के सर्वाङ्ग में दाहयुक्त फोड़े होने से वह बिल्कुल नग्न हो जाता है। 'गर्दभ पिण्डी' (गधे की लीद) की गन्ध से फोड़ों की पीड़ा कम होती है। शूप के काम (अन्न की सफाई आदि) करने और झाड़ू लगाने से बीमारी बढ़ जाती है। अतः इन कामों को सर्वथा बंद रखने के लिए शूप और झाड़ू रोगी के समीप रखते हैं। नीम के पत्तों से शीतला के फोड़े सड़ नहीं सकते और शीतल जल के कलश का समीप रखना तो आवश्यक है ही।
👉 शीतला माता का स्त्रोत -
_*वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्।*_
_*मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालंकृतमस्तकाम्।।*_
👆 उक्त स्तोत्र का उच्चारण करते हुए शीतला माता को जल और शीतल पदार्थ (नैवेद्य) चढ़ाना चाहिए।
👉 शीतला माता का विस्तृत वर्णन *स्कन्द पुराण* में उल्लेखित है अगर आपको इनके विषय में विस्तार से जानना हैं तो इस पुराण का अध्ययन कर सकते हैं।
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भतृहरी वैराग्य शतक में विद्या की प्रशंसा करते हुए कहा गया है -
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येषां न विद्या न तपो न दानं न शील न गुणों न धर्म:। ते मृत्यु लोके भूवि भारभूत मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।।
जिस मनुष्य ने न विद्या प्राप्त की है , न ही धर्म अथवा ज्ञान प्राप्ती के लिये तप किया है , न कष्ट सहन किया है , न कभी दान किया है , न उसने शील और दुसरे गुणों को धारण किया है , ऐसा मनुष्य इस पृथ्वी पर भार ही है।वह मनुष्य पशु रूप में पशु के समान ही विचरण कर रहा है।
सभी ऋषि , मुनियों और वेद का भी यही मानना है कि बिना ज्ञान के मुक्ति संभव नही है।इसलिए वेदों में ज्ञान प्राप्ती मनुष्य मात्र के लिये आवश्यक बताई गई है।इस विषय में यजुर्वेद का कहना है।
यथेमां वाचं कल्याणी भावदानी जनैभ्य:।
ब्रह्म राजन्याभ्यां शूद्रयचार्यायच स्वाय चारणाय च.।।
हें मनुष्यों जैसे मैं ईशवर ब्राह्मण और क्षत्रियों को , वैश्य को , शूद्रों को , स्त्रियों को सेवको आदि को , सबका कल्याण करने वाली वेद वाणी का उपदेश करता हूँ। वैसे आप भी करे।मंत्र में स्पष्ट रूप से ज्ञानार्जन प्रत्येक व्यक्ति के लिये सुलभ करने को कहां गया है।
फिर अथर्ववेद के काण्ड- ४ 'सुक्त २१' के सातो मंत्रों में विद्या की ही प्रशंसा की गयी है।अथर्ववेद का यह भी मानना है कि विद्या( वेदों ) का प्रादुर्भाव परब्रह्म परमेश्वर के द्वारा सृष्टि के प्रारम्भ से ही हुआ है। उसने अपने ज्ञान (वेद ) में से मनुष्य के लियें आवश्यक वेदों के ज्ञान का दान सृष्टि के प्रारम्भ में ही कर दिया है। विद्या ( वेदों ) का ज्ञान कल्याण करने वाला होता है और वह सृष्टि के प्रारम्भ में ही परमात्मा के द्वारा दिया जाता है।
सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते।
वार्यन्नगो-महीवासस्तिलकाञ्चनसर्पिषाम्। (मनुस्मृति )
संसार में जितने दान है अर्थात् जल, अन्न, गौ पृथ्वी , वस्त्र , तिल, सुवर्ण, धृत आदि इन सब दानों से विद्या का दान अति श्रेष्ठ है क्योंकि जब हमारे अन्दर ज्ञान का प्रस्फुटन होता है तो इसे हमें दूसरों को भी दानस्वरूप प्रदान कर देना चाहिए तभी इसे हमारे अन्दर और फैलने का अवसर प्राप्त होता है कहने का तात्पर्य यह है कि
ज्ञान का दान न केवल मिलने वाले को लाभ पहुंचाता है अपितु देने वाले को लाभान्वित करता है यही विद्या दान की महिमा है।
कोई कितना ही ज्ञानी और विद्यावान हो , यदि वह अपने आचरण में विद्या और ज्ञान का उपयोग नही करता तो वह मूर्ख ही नही महामूर्ख हैं। वह उस जानवर की तरह है जिस पर बहुत सी किताबें लदी होती है पर वह उन पुस्तकों के ज्ञान से लाभ नही उठा पाता। जैसे तपेली और कलछी को स्वादिष्ट व्यंजन के स्वाद का आनन्द नही मिलता।
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येषां न विद्या न तपो न दानं न शील न गुणों न धर्म:। ते मृत्यु लोके भूवि भारभूत मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।।
जिस मनुष्य ने न विद्या प्राप्त की है , न ही धर्म अथवा ज्ञान प्राप्ती के लिये तप किया है , न कष्ट सहन किया है , न कभी दान किया है , न उसने शील और दुसरे गुणों को धारण किया है , ऐसा मनुष्य इस पृथ्वी पर भार ही है।वह मनुष्य पशु रूप में पशु के समान ही विचरण कर रहा है।
सभी ऋषि , मुनियों और वेद का भी यही मानना है कि बिना ज्ञान के मुक्ति संभव नही है।इसलिए वेदों में ज्ञान प्राप्ती मनुष्य मात्र के लिये आवश्यक बताई गई है।इस विषय में यजुर्वेद का कहना है।
यथेमां वाचं कल्याणी भावदानी जनैभ्य:।
ब्रह्म राजन्याभ्यां शूद्रयचार्यायच स्वाय चारणाय च.।।
हें मनुष्यों जैसे मैं ईशवर ब्राह्मण और क्षत्रियों को , वैश्य को , शूद्रों को , स्त्रियों को सेवको आदि को , सबका कल्याण करने वाली वेद वाणी का उपदेश करता हूँ। वैसे आप भी करे।मंत्र में स्पष्ट रूप से ज्ञानार्जन प्रत्येक व्यक्ति के लिये सुलभ करने को कहां गया है।
फिर अथर्ववेद के काण्ड- ४ 'सुक्त २१' के सातो मंत्रों में विद्या की ही प्रशंसा की गयी है।अथर्ववेद का यह भी मानना है कि विद्या( वेदों ) का प्रादुर्भाव परब्रह्म परमेश्वर के द्वारा सृष्टि के प्रारम्भ से ही हुआ है। उसने अपने ज्ञान (वेद ) में से मनुष्य के लियें आवश्यक वेदों के ज्ञान का दान सृष्टि के प्रारम्भ में ही कर दिया है। विद्या ( वेदों ) का ज्ञान कल्याण करने वाला होता है और वह सृष्टि के प्रारम्भ में ही परमात्मा के द्वारा दिया जाता है।
सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते।
वार्यन्नगो-महीवासस्तिलकाञ्चनसर्पिषाम्। (मनुस्मृति )
संसार में जितने दान है अर्थात् जल, अन्न, गौ पृथ्वी , वस्त्र , तिल, सुवर्ण, धृत आदि इन सब दानों से विद्या का दान अति श्रेष्ठ है क्योंकि जब हमारे अन्दर ज्ञान का प्रस्फुटन होता है तो इसे हमें दूसरों को भी दानस्वरूप प्रदान कर देना चाहिए तभी इसे हमारे अन्दर और फैलने का अवसर प्राप्त होता है कहने का तात्पर्य यह है कि
ज्ञान का दान न केवल मिलने वाले को लाभ पहुंचाता है अपितु देने वाले को लाभान्वित करता है यही विद्या दान की महिमा है।
कोई कितना ही ज्ञानी और विद्यावान हो , यदि वह अपने आचरण में विद्या और ज्ञान का उपयोग नही करता तो वह मूर्ख ही नही महामूर्ख हैं। वह उस जानवर की तरह है जिस पर बहुत सी किताबें लदी होती है पर वह उन पुस्तकों के ज्ञान से लाभ नही उठा पाता। जैसे तपेली और कलछी को स्वादिष्ट व्यंजन के स्वाद का आनन्द नही मिलता।
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*राहुकाल और यमगंड में न करें कोई शुभ काम, जानें सातों दिन के अनुसार इन काल की अवधि :*
ज्योतिष विज्ञान अनुसार एक दिन में अलग-अलग अवधि होती है और उन सभी अवधि में अलग-अलग काल का वर्णन किया गया है।
इनमें से कुछ काल शुभ होते हैं तो कुछ अशुभ।
Panchang Muhurat : किसी भी मांगलिक कार्य को करने से अधिकतर लोग उस काम को करने का शुभ दिन और मुहूर्त पता करते हैं।
कहते हैं शुभ समय पर किये गये कार्य फलदायी साबित होते हैं और उससे शुभ परिणाम प्राप्त होने की संभावना कई गुना ज्यादा बढ़ जाती है। ज्योतिष विज्ञान अनुसार एक दिन में अलग-अलग अवधि होती है और उन सभी अवधि में अलग-अलग काल का वर्णन किया गया है।
*कब होता है राहु काल :*
रविवार को शाम
4.30 से 6.00 बजे तक, सोमवार को सुबह
7.30 से 9.00 बजे तक,
मंगलवार को दोपहर
3.00 से 4.30 बजे तक, बुधवार को दोपहर
12.00 से 1.30 बजे तक, गुरुवार को दोपहर
1.30 से 3.00 बजे तक, शुक्रवार को सुबह
10.30 से12.00 बजे तक, शनिवार को सुबह
9.00 से10.30 बजे तक समय को राहु काल माना गया है।
इस समय में सभी शुभ कार्य करना वर्जित माना गया है।
सोम,शनि,शुक्र,बुध,गुरु,मंगल और रविवार।
दिन के द्वितीय चौघडिये से शुरु होकर अंतिम चौघडिये तक क्रमशः इन वारों में राहुकाल होता है।
यमगंड काल : इस काल की अवधि भी प्रतिदिन डेढ़ घंटे की होती है।
राहुकाल की तरह ही इस दौरान भी शुभ कार्यों को करने से परहेज करना चाहिए।
इस काल की अवधि सातों दिन के अनुसार कुछ इस प्रकार है :
रविवार को यमगंड काल-
दोपहर 12 बजे से 1 बजकर 30 मिनट तक।
सोमवार को यमगंड काल-
प्रात: 10 बजकर 30 मिनट से 12 बजे तक।
मंगलवार को यमगंड काल-
प्रातः 9 बजे से 10 बजकर 30 मिनट तक।
बुधवार को यमगंड काल-
प्रातः 07 बजकर 30 मिनट से 9 बजे तक।
गुरुवार को यमगंड काल-
प्रातः 6 बजे से 7 बजकर 30 मिनट तक।
शुक्रवार को यमगंड काल-
दोपहर 3 बजे से 04 बजकर 30 मिनट तक।
शनिवार को यमगंड काल-
दोपहर 1 बजकर 30 मिनट से 3 बजे तक।
गुरु,बुध,मंगल,सोम,रवि,शनि,शुक्रवार।
यमगंड काल सप्ताह के विभिन्न दिनों में दिन के प्रथम चौघडिये से लेकर सप्तम चौघडिये तक अलग अलग समय में होता है।
ज्योतिष विज्ञान अनुसार एक दिन में अलग-अलग अवधि होती है और उन सभी अवधि में अलग-अलग काल का वर्णन किया गया है।
इनमें से कुछ काल शुभ होते हैं तो कुछ अशुभ।
Panchang Muhurat : किसी भी मांगलिक कार्य को करने से अधिकतर लोग उस काम को करने का शुभ दिन और मुहूर्त पता करते हैं।
कहते हैं शुभ समय पर किये गये कार्य फलदायी साबित होते हैं और उससे शुभ परिणाम प्राप्त होने की संभावना कई गुना ज्यादा बढ़ जाती है। ज्योतिष विज्ञान अनुसार एक दिन में अलग-अलग अवधि होती है और उन सभी अवधि में अलग-अलग काल का वर्णन किया गया है।
*कब होता है राहु काल :*
रविवार को शाम
4.30 से 6.00 बजे तक, सोमवार को सुबह
7.30 से 9.00 बजे तक,
मंगलवार को दोपहर
3.00 से 4.30 बजे तक, बुधवार को दोपहर
12.00 से 1.30 बजे तक, गुरुवार को दोपहर
1.30 से 3.00 बजे तक, शुक्रवार को सुबह
10.30 से12.00 बजे तक, शनिवार को सुबह
9.00 से10.30 बजे तक समय को राहु काल माना गया है।
इस समय में सभी शुभ कार्य करना वर्जित माना गया है।
सोम,शनि,शुक्र,बुध,गुरु,मंगल और रविवार।
दिन के द्वितीय चौघडिये से शुरु होकर अंतिम चौघडिये तक क्रमशः इन वारों में राहुकाल होता है।
यमगंड काल : इस काल की अवधि भी प्रतिदिन डेढ़ घंटे की होती है।
राहुकाल की तरह ही इस दौरान भी शुभ कार्यों को करने से परहेज करना चाहिए।
इस काल की अवधि सातों दिन के अनुसार कुछ इस प्रकार है :
रविवार को यमगंड काल-
दोपहर 12 बजे से 1 बजकर 30 मिनट तक।
सोमवार को यमगंड काल-
प्रात: 10 बजकर 30 मिनट से 12 बजे तक।
मंगलवार को यमगंड काल-
प्रातः 9 बजे से 10 बजकर 30 मिनट तक।
बुधवार को यमगंड काल-
प्रातः 07 बजकर 30 मिनट से 9 बजे तक।
गुरुवार को यमगंड काल-
प्रातः 6 बजे से 7 बजकर 30 मिनट तक।
शुक्रवार को यमगंड काल-
दोपहर 3 बजे से 04 बजकर 30 मिनट तक।
शनिवार को यमगंड काल-
दोपहर 1 बजकर 30 मिनट से 3 बजे तक।
गुरु,बुध,मंगल,सोम,रवि,शनि,शुक्रवार।
यमगंड काल सप्ताह के विभिन्न दिनों में दिन के प्रथम चौघडिये से लेकर सप्तम चौघडिये तक अलग अलग समय में होता है।
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सद्चिन्तन
भक्ति कहने में जितनी सहज है करने में उतनी ही कठिन है।केवल बाह्य आडंबर का नाम भक्ति नहीं है।
भक्ति दिखाने का नाम नहीं है वह तो हृदय का परम गुप्त धन है भक्ति का स्वरूप जितना गुप्त रहता है उतना ही वह अधिक मूल्यवान समझा जाता है।
भक्ति तत्व का समझना बड़ा कठिन है। अवश्य ही उन भाग्यवानों को इसके समझने में बहुत प्रयास या श्रम नहीं करना पड़ता,जो उस दयामय परमेश्वर के शरण हो जाते हैं।
अनन्य शरणागत भक्त को भक्ति का तत्व परमेश्वर स्वयं समझा देते हैं।
*_🚩🪷॥ जय श्री राम ॥🪷🚩_*
भक्ति कहने में जितनी सहज है करने में उतनी ही कठिन है।केवल बाह्य आडंबर का नाम भक्ति नहीं है।
भक्ति दिखाने का नाम नहीं है वह तो हृदय का परम गुप्त धन है भक्ति का स्वरूप जितना गुप्त रहता है उतना ही वह अधिक मूल्यवान समझा जाता है।
भक्ति तत्व का समझना बड़ा कठिन है। अवश्य ही उन भाग्यवानों को इसके समझने में बहुत प्रयास या श्रम नहीं करना पड़ता,जो उस दयामय परमेश्वर के शरण हो जाते हैं।
अनन्य शरणागत भक्त को भक्ति का तत्व परमेश्वर स्वयं समझा देते हैं।
*_🚩🪷॥ जय श्री राम ॥🪷🚩_*
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*🌷रात्रि चिन्तन 🌷*
*🕉️"यकीन"कीजिए जिस समय कोई समस्या जन्म लेती है उसके साथ ही उसका समाधान भी जन्म लेता है।जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है इसलिए स्वयं को अधिक तनावग्रस्त न करें क्योंकि"परिस्थितियां"चाहे कितनी भी खराब हों बदलेंगी जरूर वर्तमान से जीवन का आनंद लेने का प्रयास कीजिए क्योंकि "भविष्य" बहुत कपटी होता है जो केवल आश्वासन देता है गारंटी नहीं"रिश्ता" बहुत गहरा हो या न हो परन्तु भरोसा बहुत गहरा होना चाहिये गुरु वही श्रेष्ठ होता है जिसकी प्रेरणा से किसी का चरित्र बदल जाये और मित्र वही श्रेष्ठ होता है जिसकी संगत से रंगत बदल जाये*
*!!! जय श्री राधे कृष्ण !!!*
*🌺शुभरात्रि🌺*
*🕉️"यकीन"कीजिए जिस समय कोई समस्या जन्म लेती है उसके साथ ही उसका समाधान भी जन्म लेता है।जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है इसलिए स्वयं को अधिक तनावग्रस्त न करें क्योंकि"परिस्थितियां"चाहे कितनी भी खराब हों बदलेंगी जरूर वर्तमान से जीवन का आनंद लेने का प्रयास कीजिए क्योंकि "भविष्य" बहुत कपटी होता है जो केवल आश्वासन देता है गारंटी नहीं"रिश्ता" बहुत गहरा हो या न हो परन्तु भरोसा बहुत गहरा होना चाहिये गुरु वही श्रेष्ठ होता है जिसकी प्रेरणा से किसी का चरित्र बदल जाये और मित्र वही श्रेष्ठ होता है जिसकी संगत से रंगत बदल जाये*
*!!! जय श्री राधे कृष्ण !!!*
*🌺शुभरात्रि🌺*
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*ईश्वरीय अवतार का ध्येय साधुजनों का परित्राण और दुष्टों का संहार करना है । परन्तु संतों का कार्य तो सर्वथा भिन्न ही है । सन्तों के लिए साधु और दुष्ट प्रायःएक समान ही है । यथार्थ में उन्हें दुष्कर्म करने वालों की प्रथम चिन्ता होती है और वे उन्हें उचित पथ पर लगा देते है ।*
*हरे कृष्णा 👏*
*हरे कृष्णा 👏*
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*"व्यक्ति का स्वास्थ्य 2 प्रकार से ठीक होना चाहिए। एक शारीरिक और दूसरा आध्यात्मिक।आयुर्वेद कहता है, कि यदि व्यक्ति दोनों ही प्रकार से प्रसन्न है, तभी वह 'पूर्ण स्वस्थ' कहलाता है।"*
*आजकल के लोग शारीरिक स्वास्थ्य पर तो थोड़ा बहुत ध्यान देते हैं, परन्तु आध्यात्मिक स्वास्थ्य पर प्रायः ध्यान नहीं देते। *"शारीरिक रोग होने पर तो उसकी जांच और चिकित्सा भी कराते हैं। परंतु अपने आध्यात्मिक स्तर की कोई परीक्षा नहीं कराते। उस पर कोई विशेष ध्यान नहीं देते।"
*"प्रायः 40-50 वर्ष की आयु के बाद बहुत से लोग प्रतिवर्ष अपने शरीर का डॉक्टरी परीक्षण कराते हैं। और पता लगाते रहते हैं, कि उनके खून में विटामिन पोटेशियम कैल्शियम आदि तत्व कम हो गए, या कॉलेस्ट्रॉल शुगर आदि बढ़ गये, या क्या हुआ?" "वे ख़ून की जांच भी कराते हैं, और किसी रोग का पता चलने पर उसकी दवाई चिकित्सा भी कराते हैं। ऐसा करना उचित है। ताकि शरीर स्वस्थ रहे।"*
*परंतु उनका दूसरा पक्ष तो बिल्कुल ही उपेक्षित है। "अपने व्यक्तित्व की जांच किसी अच्छे योगी तपस्वी अथवा वैदिक विद्वान से नहीं कराते।" "यदि वह भी कराएं, तो उनको अपने आध्यात्मिक स्वास्थ्य का भी पता चलेगा, कि उनके जीवन व्यवहार में सेवा नम्रता परोपकार दान दया सहनशीलता आदि गुण घट रहे हैं या बढ़ रहे हैं?"*
यही नहीं प्राचीन योगविद्या के अनुसार हमारा शरीर मात्र भौतिक ही नहीं है अपितु इसके अंतःस्थ और बहुत से शरीर, चक्र उपस्थित हैं
जिसमें प्राणिक और मानसिक शरीर का इस भौतिक शरीर पर विशेष प्रभाव रहता है ये शरीर
इस भौतिक शरीर से सूक्ष्म हैं और इन शरीरों में
विशेष गुण और ऊर्जाएं होती हैं जिनका संतुलन आवश्यक होता है।
*"यदि ये सारे गुण घट रहे हैं, और क्रोध लोभ ईर्ष्या जलन अभिमान राग द्वेष अविद्या आदि दोष बढ़ रहे हैं, तो यह मानना चाहिए कि वे आध्यात्मिक स्तर पर स्वस्थ नहीं हैं, रोगी हैं।"*
*यदि ऐसा पता चले, तो "इन आध्यात्मिक रोगों की भी चिकित्सा योग्य विद्वानों से करानी चाहिए, और उत्तम गुणों को धारण करके आध्यात्मिक रूप से भी स्वस्थ एवं प्रसन्न रहना चाहिए।" "तभी जीवन में संतुलन बन पाएगा। तभी व्यक्ति 'पूरी तरह से स्वस्थ' कहलाएगा।"*
*❤आप सभी को ..... Har Har Mahadev 😊*
💐 *स्नेह वंदन* 💐
*🌿आप का दिन शुभ हो🌿*
*आजकल के लोग शारीरिक स्वास्थ्य पर तो थोड़ा बहुत ध्यान देते हैं, परन्तु आध्यात्मिक स्वास्थ्य पर प्रायः ध्यान नहीं देते। *"शारीरिक रोग होने पर तो उसकी जांच और चिकित्सा भी कराते हैं। परंतु अपने आध्यात्मिक स्तर की कोई परीक्षा नहीं कराते। उस पर कोई विशेष ध्यान नहीं देते।"
*"प्रायः 40-50 वर्ष की आयु के बाद बहुत से लोग प्रतिवर्ष अपने शरीर का डॉक्टरी परीक्षण कराते हैं। और पता लगाते रहते हैं, कि उनके खून में विटामिन पोटेशियम कैल्शियम आदि तत्व कम हो गए, या कॉलेस्ट्रॉल शुगर आदि बढ़ गये, या क्या हुआ?" "वे ख़ून की जांच भी कराते हैं, और किसी रोग का पता चलने पर उसकी दवाई चिकित्सा भी कराते हैं। ऐसा करना उचित है। ताकि शरीर स्वस्थ रहे।"*
*परंतु उनका दूसरा पक्ष तो बिल्कुल ही उपेक्षित है। "अपने व्यक्तित्व की जांच किसी अच्छे योगी तपस्वी अथवा वैदिक विद्वान से नहीं कराते।" "यदि वह भी कराएं, तो उनको अपने आध्यात्मिक स्वास्थ्य का भी पता चलेगा, कि उनके जीवन व्यवहार में सेवा नम्रता परोपकार दान दया सहनशीलता आदि गुण घट रहे हैं या बढ़ रहे हैं?"*
यही नहीं प्राचीन योगविद्या के अनुसार हमारा शरीर मात्र भौतिक ही नहीं है अपितु इसके अंतःस्थ और बहुत से शरीर, चक्र उपस्थित हैं
जिसमें प्राणिक और मानसिक शरीर का इस भौतिक शरीर पर विशेष प्रभाव रहता है ये शरीर
इस भौतिक शरीर से सूक्ष्म हैं और इन शरीरों में
विशेष गुण और ऊर्जाएं होती हैं जिनका संतुलन आवश्यक होता है।
*"यदि ये सारे गुण घट रहे हैं, और क्रोध लोभ ईर्ष्या जलन अभिमान राग द्वेष अविद्या आदि दोष बढ़ रहे हैं, तो यह मानना चाहिए कि वे आध्यात्मिक स्तर पर स्वस्थ नहीं हैं, रोगी हैं।"*
*यदि ऐसा पता चले, तो "इन आध्यात्मिक रोगों की भी चिकित्सा योग्य विद्वानों से करानी चाहिए, और उत्तम गुणों को धारण करके आध्यात्मिक रूप से भी स्वस्थ एवं प्रसन्न रहना चाहिए।" "तभी जीवन में संतुलन बन पाएगा। तभी व्यक्ति 'पूरी तरह से स्वस्थ' कहलाएगा।"*
*❤आप सभी को ..... Har Har Mahadev 😊*
💐 *स्नेह वंदन* 💐
*🌿आप का दिन शुभ हो🌿*
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*क्या है विक्रम संवत, जानिए कब प्रारंभ होता है हिन्दू नववर्ष*
*हिन्दू नववर्ष 2081: विक्रम संवत जब प्रारंभ नहीं हुआ था तब युधिष्ठिर संवत, कलियुग संवत और सप्तर्षि संवत प्रचलित थे। आज जिसे हम हिन्दू या भारतीय कैलेंडर कहते हैं, उसका प्रारंभ 57-58 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य ने किया था। विक्रमादित्य से पहले भी चैत्र मास की प्रतिपदा को नववर्ष मनाया जाता रहा है, लेकिन तब संपूर्ण भारत में कोई एक मान्य कैलेंडर नहीं था। इसके लिए सम्राट विक्रमादित्य ने खगोलविदों की मदद से एक स्पष्ट कैलेंडर बनाया और उस पर आधारित ही संपूर्ण वर्ष के व्रत, त्योहार, ग्रहण आदि का उल्लेख किया जाने लगा।*
*⚜️कब प्रारंभ हुआ विक्रम संवत किसने शुरु किया?*
राजा विक्रमादित्य ने संपूर्ण भारत को शकों के अत्याचारों वाले शासन से मुक्त करके अपना शासन स्थापित किया और जनता को भय मुक्त जीवन दिया। इसी विजय की स्मृति के रूप में राजा विक्रमादित्य ने विक्रम संवत पंचांग का निर्माण करवाया था। विक्रम संवत् का आरंभ 57 ईस्वी पूर्व में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के नाम पर हुआ था। वैसे तो फाल्गुन माह के समाप्त होते ही नववर्ष प्रारंभ हो जाता है परंतु कृष्ण पक्ष बितने के बाद चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में जिस दिन सूर्योदय के समय प्रतिपदा होती है उसी दिन से नवसंवत्सर प्रारंभ होना माना जाता है। इसी दिन को भारत के अन्य हिस्सा में गुड़ी पड़वा सहित अन्य कई नामों से जाना जाता है।
देश में अनेक विद्वान ऐसे हुए हैं, जो विक्रम संवत को उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा ही प्रवर्तित मानते हैं। इस संवत के प्रवर्तन की पुष्टि ज्योतिर्विदाभरण ग्रंथ से होती है, जो कि 3068 कलि अर्थात 34 ईसा पूर्व में लिखा गया था। इसके अनुसार विक्रमादित्य ने 3044 कलि अर्थात 57 ईसा पूर्व विक्रम संवत चलाया। इसके अलावा 3री सदी के बरनाला के स्तम्भ जिस पर अंकित लेख से भी यह स्पष्ट होता है कि विक्रम संवत कब से प्रचलित है।
*कब हुए थे राजा विक्रमादित्य?*
विक्रम संवत अनुसार विक्रमादित्य आज (2024) से 2296 वर्ष पूर्व हुए थे। उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य भी चक्रवर्ती सम्राट थे। विक्रमादित्य का नाम विक्रम सेन था। विक्रम वेताल और सिंहासन बत्तीसी की कहानियां महान सम्राट विक्रमादित्य से ही जुड़ी हुई है। कलि काल के 3000 वर्ष बीत जाने पर 101 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य का जन्म हुआ। उन्होंने 100 वर्ष तक राज किया।- (गीता प्रेस, गोरखपुर भविष्यपुराण, पृष्ठ 245)।
*🚩सात दिन और 12 माह का प्रचलन:-* इसी कैलेंडर से 12 माह और 7 दिवस बने हैं। 12 माह का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से ही शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। विक्रम कैलेंडर की इस धारणा को यूनानियों के माध्यम से अरब और अंग्रेजों ने अपनाया। बाद में भारत के अन्य प्रांतों ने अपने-अपने कैलेंडर इसी के आधार पर विकसित किए।
*🚩12 महीनों के नाम:-* चैत्र, बैसाखी, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।
*🚩चैत्र माह है प्रथम माह:-* प्राचीनकाल से ही यह परंपरा है कि इसी माह से देश दुनिया में पुराने कामकाज को समेटकर नए कामकाज की रूपरेखा तय की जाती रही है, क्योंकि यह माह वसंत के आगम का माह और इस माह से ही प्रकृति फिर से नई होने लगती है। आज भी भारत में चैत्र माह में बहिखाते नए किए जाते हैं। दुनिया के अन्य देशों में भी इसी माह में यह कार्य होता आ रहा है। यानी की मार्च माह में बदलाव होता है। दुनियाभर के समाज, धर्म और देशों में अलग-अलग समय में नववर्ष मनाया जाता है। अधिकतर कैलेंडर में नववर्ष मार्च से अप्रैल के बीच आता है और दूसरे दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है। मार्च में बदलने वाले कैलेंडर को ही प्रकृति और विज्ञान सम्मत माना जाता है जिसके कई कारण है।
*सूर्योदय से शुरु होता है नववर्ष प्रारंभ:-* रात्रि के अंधकार में नववर्ष का स्वागत नहीं होता। नया वर्ष सूरज की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार रात 12 बजे ही नववर्ष प्रारंभ मान लिया जाता है जो कि वैज्ञानिक नहीं है। दिन और रात को मिलाकर ही एक दिवस पूर्ण होता है। दिवस का प्रारंभ सूर्योदय से होता है और अगले सूर्योदय तक यह चलता है। सूर्यास्त को दिन और रात का संधिकाल मना जाता है।
*पंचांग:-* उक्त सभी कैलेंडर पंचांग पर आधारित है। पंचांग के पांच अंग हैं- 1. तिथि, 2. नक्षत्र, 3. योग, 4. करण, 5. वार (सप्ताह के सात दिनों के नाम)। भारत में प्राचलित श्रीकृष्ण संवत, विक्रम संवत और शक संवत सभी उक्त काल गणना और पंचांग पर ही आधारित है।
*हिन्दू नववर्ष 2081: विक्रम संवत जब प्रारंभ नहीं हुआ था तब युधिष्ठिर संवत, कलियुग संवत और सप्तर्षि संवत प्रचलित थे। आज जिसे हम हिन्दू या भारतीय कैलेंडर कहते हैं, उसका प्रारंभ 57-58 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य ने किया था। विक्रमादित्य से पहले भी चैत्र मास की प्रतिपदा को नववर्ष मनाया जाता रहा है, लेकिन तब संपूर्ण भारत में कोई एक मान्य कैलेंडर नहीं था। इसके लिए सम्राट विक्रमादित्य ने खगोलविदों की मदद से एक स्पष्ट कैलेंडर बनाया और उस पर आधारित ही संपूर्ण वर्ष के व्रत, त्योहार, ग्रहण आदि का उल्लेख किया जाने लगा।*
*⚜️कब प्रारंभ हुआ विक्रम संवत किसने शुरु किया?*
राजा विक्रमादित्य ने संपूर्ण भारत को शकों के अत्याचारों वाले शासन से मुक्त करके अपना शासन स्थापित किया और जनता को भय मुक्त जीवन दिया। इसी विजय की स्मृति के रूप में राजा विक्रमादित्य ने विक्रम संवत पंचांग का निर्माण करवाया था। विक्रम संवत् का आरंभ 57 ईस्वी पूर्व में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के नाम पर हुआ था। वैसे तो फाल्गुन माह के समाप्त होते ही नववर्ष प्रारंभ हो जाता है परंतु कृष्ण पक्ष बितने के बाद चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में जिस दिन सूर्योदय के समय प्रतिपदा होती है उसी दिन से नवसंवत्सर प्रारंभ होना माना जाता है। इसी दिन को भारत के अन्य हिस्सा में गुड़ी पड़वा सहित अन्य कई नामों से जाना जाता है।
देश में अनेक विद्वान ऐसे हुए हैं, जो विक्रम संवत को उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा ही प्रवर्तित मानते हैं। इस संवत के प्रवर्तन की पुष्टि ज्योतिर्विदाभरण ग्रंथ से होती है, जो कि 3068 कलि अर्थात 34 ईसा पूर्व में लिखा गया था। इसके अनुसार विक्रमादित्य ने 3044 कलि अर्थात 57 ईसा पूर्व विक्रम संवत चलाया। इसके अलावा 3री सदी के बरनाला के स्तम्भ जिस पर अंकित लेख से भी यह स्पष्ट होता है कि विक्रम संवत कब से प्रचलित है।
*कब हुए थे राजा विक्रमादित्य?*
विक्रम संवत अनुसार विक्रमादित्य आज (2024) से 2296 वर्ष पूर्व हुए थे। उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य भी चक्रवर्ती सम्राट थे। विक्रमादित्य का नाम विक्रम सेन था। विक्रम वेताल और सिंहासन बत्तीसी की कहानियां महान सम्राट विक्रमादित्य से ही जुड़ी हुई है। कलि काल के 3000 वर्ष बीत जाने पर 101 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य का जन्म हुआ। उन्होंने 100 वर्ष तक राज किया।- (गीता प्रेस, गोरखपुर भविष्यपुराण, पृष्ठ 245)।
*🚩सात दिन और 12 माह का प्रचलन:-* इसी कैलेंडर से 12 माह और 7 दिवस बने हैं। 12 माह का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से ही शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। विक्रम कैलेंडर की इस धारणा को यूनानियों के माध्यम से अरब और अंग्रेजों ने अपनाया। बाद में भारत के अन्य प्रांतों ने अपने-अपने कैलेंडर इसी के आधार पर विकसित किए।
*🚩12 महीनों के नाम:-* चैत्र, बैसाखी, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।
*🚩चैत्र माह है प्रथम माह:-* प्राचीनकाल से ही यह परंपरा है कि इसी माह से देश दुनिया में पुराने कामकाज को समेटकर नए कामकाज की रूपरेखा तय की जाती रही है, क्योंकि यह माह वसंत के आगम का माह और इस माह से ही प्रकृति फिर से नई होने लगती है। आज भी भारत में चैत्र माह में बहिखाते नए किए जाते हैं। दुनिया के अन्य देशों में भी इसी माह में यह कार्य होता आ रहा है। यानी की मार्च माह में बदलाव होता है। दुनियाभर के समाज, धर्म और देशों में अलग-अलग समय में नववर्ष मनाया जाता है। अधिकतर कैलेंडर में नववर्ष मार्च से अप्रैल के बीच आता है और दूसरे दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है। मार्च में बदलने वाले कैलेंडर को ही प्रकृति और विज्ञान सम्मत माना जाता है जिसके कई कारण है।
*सूर्योदय से शुरु होता है नववर्ष प्रारंभ:-* रात्रि के अंधकार में नववर्ष का स्वागत नहीं होता। नया वर्ष सूरज की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार रात 12 बजे ही नववर्ष प्रारंभ मान लिया जाता है जो कि वैज्ञानिक नहीं है। दिन और रात को मिलाकर ही एक दिवस पूर्ण होता है। दिवस का प्रारंभ सूर्योदय से होता है और अगले सूर्योदय तक यह चलता है। सूर्यास्त को दिन और रात का संधिकाल मना जाता है।
*पंचांग:-* उक्त सभी कैलेंडर पंचांग पर आधारित है। पंचांग के पांच अंग हैं- 1. तिथि, 2. नक्षत्र, 3. योग, 4. करण, 5. वार (सप्ताह के सात दिनों के नाम)। भारत में प्राचलित श्रीकृष्ण संवत, विक्रम संवत और शक संवत सभी उक्त काल गणना और पंचांग पर ही आधारित है।
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*🕉मंदिर जाना क्यों जरूरी और जानिए मंदिर संबंधी अपराध..*
*मंदिर' का अर्थ होता है- मन से दूर कोई स्थान। 'मंदिर' का शाब्दिक अर्थ 'घर' है और मंदिर को द्वार भी कहते हैं, जैसे रामद्वारा, गुरुद्वारा आदि। मंदिर को आलय भी कह सकते हैं, जैसे कि शिवालय, जिनालय। लेकिन जब हम कहते हैं कि मन से दूर जो है, वह मंदिर है तो उसके मायने बदल जाते हैं। मंदिर को अंग्रेजी में भी 'मंदिर' ही कहते हैं 'टेम्पल' (Temple) नहीं। जो लोग 'टेम्पल' कहते हैं, वे मंदिर के विरोधी हो सकते हैं।*
*मंदिर में संध्योपासना की जाती है, जिसे संध्यावंदन भी कहते हैं। संध्योपासना के 5 प्रकार हैं-*
*🚩1. प्रार्थना,*
*🚩2. ध्यान,*
*🚩3. कीर्तन,*
*🚩4. यज्ञ और*
*🚩5. पूजा-आरती।*
*🔔व्यक्ति की जिसमें जैसी श्रद्धा है वह वैसा करता है। सभी के अलग-अलग समय नियुक्त हैं।*
*⚜️इसलिए मंदिर जाना जरूरी...*
*卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐*
*🚩पहला कारण:-* मंदिर जाना इसलिए जरूरी है कि वहां जाकर आप यह सिद्ध करते हैं कि आप देव शक्तियों में विश्वास रखते हैं तो देव शक्तियां भी आपमें विश्वास रखेंगी। यदि आप नहीं जाते हैं तो आप कैसे व्यक्त करेंगे की आप परमेश्वर या देवताओं की तरफ है? यदि आप देवताओं की ओर देखेंगे तो देवता भी आपकी ओर देखेंगे। यदि नहीं तो नहीं।
*🚩दूसरा कारण:-* अच्छे मनोभाव से जाने वाले की सभी तरह की समस्याएं प्रतिदिन मंदिर जाने से समाप्त हो जाती है। मंदिर जाते रहने से मन में दृढ़ विश्वास और उम्मीद की ऊर्जा का संचार होता है। विश्वास की शक्ति से ही धन, समृद्धि और पुत्र-पुत्री रत्न की प्राप्ति होती है।
*🚩तीसरा कारण:-* यदि आपने कोई ऐसा अपराध किया है कि जिसे आप ही जानते हैं तो आपके लिए प्रायश्चित का समय है। आप क्षमा प्रार्थना करके अपने मन को हल्का कर सकते हैं। इससे मन की बैचेनी समाप्त होती है और आप का जीवन फिर से पटरी पर आ जाता है।
*🚩चौथा कारण:-* मंदिर में शंख और घंटियों की आवाजें वातावरण को शुद्ध कर मन और मस्तिष्क को शांत करती हैं। धूप और दीप से मन और मस्तिष्क के सभी तरह के नकारात्मक भाव हट जाते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
*🚩पांचवां कारण:-* मंदिर के वास्तु और वातावरण के कारण वहां सकारात्मक उर्जा ज्यादा होती है। प्राचीन मंदिर ऊर्जा और प्रार्थना के केंद्र थे। धरती के दो छोर हैं- एक उत्तरी ध्रुव और दूसरा दक्षिणी ध्रुव। उत्तर में मुख करके पूजा या प्रार्थना की जाती है इसलिए प्राचीन काल के सभी मंदिरों के द्वार उत्तर में होते थे। हमारे प्राचीन मंदिर वास्तुशास्त्रियों ने ढूंढ-ढूंढकर धरती पर ऊर्जा के सकारात्मक केंद्र ढूंढे और वहां मंदिर बनाए। मंदिर में शिखर होते हैं। शिखर की भीतरी सतह से टकराकर ऊर्जा तरंगें व ध्वनि तरंगें व्यक्ति के ऊपर पड़ती हैं। ये परावर्तित किरण तरंगें मानव शरीर आवृत्ति बनाए रखने में सहायक होती हैं। व्यक्ति का शरीर इस तरह से धीरे-धीरे मंदिर के भीतरी वातावरण से सामंजस्य स्थापित कर लेता है। इस तरह मनुष्य असीम सुख का अनुभव करता है। मंदिर का भव्य होना जरूरी है। भव्यता से ही दिव्यता का अवतरण होता है। मंदिर वास्तु का ध्यान रखना जरूरी है।
*⚜️मंदिर के अपराधी कौन...*
*卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐*
*🔔यदि आप मंदिर में हैं तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें अन्यथा आपकी पूजा, प्रार्थना आदि करने का कोई महत्व नहीं रहेगा। निम्नलिखित बातें करके आप मंदिर और देव संबंधी अपराध करते हैं। इसके दुष्परिणाम भी आपको ही झेलना होंगे। शास्त्रों में जो मना किया गया है उसे करना पाप और कर्म को बिगाड़ने वाला माना गया है। यहां प्रस्तुत हैं कुछ प्रमुख आचरण जिन्हें मंदिर में नहीं करना चाहिए अन्यथा आपकी प्रार्थना या पूजा निष्फल तो होती ही है, साथ ही आप देवताओं की नजरों में गिर जाते हो।*
1. भगवान के मंदिर में खड़ाऊं या सवारी पर चढ़कर जाना,
2. भगवान के सामने जाकर प्रणाम न करना,
3. उच्छिष्ट या अपवित्र अवस्था में भगवान की वन्दना करना,
5. एक हाथ से प्रणाम करना,
6. भगवान के सामने ही एक स्थान पर खड़े-खड़े प्रदक्षिणा करना,
7. भगवान के आगे पांव फैलाना,
8. मंदिर में पलंग पर बैठना या पलंग लगाना,
9. मंदिर में सोना,
10. मंदिर में बैठकर परस्पर बात करना,
11. मंदिर में रोना या जोर जोर से हंसना,
12. चिल्लाना, फोन पर बात करना, झगड़ना, झूठ बोलना, गाली बकना,
13. खाना या नशा करना,
14. किसी को दंड देना,
15. कंबल ओढ़कर बैठना,
16. अधोवायु का त्याग करना,
17. अपने बल के घंमड में आकर किसी पर अनुग्रह करना,
18. दूसरे की निंदा या स्तुति करना,
19. स्त्रियों के प्रति कठोर बात कहना,
20. भगवत-सम्बन्धी उत्सवों का सेवन न करना।
21. शक्ति रहते हुए गौण उपचारों से पूजा करना,
22. मुख्य उपचारों का प्रबन्ध न करना,
23. भगवान को भोग लगाए बिना ही भोजन करना,
*मंदिर' का अर्थ होता है- मन से दूर कोई स्थान। 'मंदिर' का शाब्दिक अर्थ 'घर' है और मंदिर को द्वार भी कहते हैं, जैसे रामद्वारा, गुरुद्वारा आदि। मंदिर को आलय भी कह सकते हैं, जैसे कि शिवालय, जिनालय। लेकिन जब हम कहते हैं कि मन से दूर जो है, वह मंदिर है तो उसके मायने बदल जाते हैं। मंदिर को अंग्रेजी में भी 'मंदिर' ही कहते हैं 'टेम्पल' (Temple) नहीं। जो लोग 'टेम्पल' कहते हैं, वे मंदिर के विरोधी हो सकते हैं।*
*मंदिर में संध्योपासना की जाती है, जिसे संध्यावंदन भी कहते हैं। संध्योपासना के 5 प्रकार हैं-*
*🚩1. प्रार्थना,*
*🚩2. ध्यान,*
*🚩3. कीर्तन,*
*🚩4. यज्ञ और*
*🚩5. पूजा-आरती।*
*🔔व्यक्ति की जिसमें जैसी श्रद्धा है वह वैसा करता है। सभी के अलग-अलग समय नियुक्त हैं।*
*⚜️इसलिए मंदिर जाना जरूरी...*
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*🚩पहला कारण:-* मंदिर जाना इसलिए जरूरी है कि वहां जाकर आप यह सिद्ध करते हैं कि आप देव शक्तियों में विश्वास रखते हैं तो देव शक्तियां भी आपमें विश्वास रखेंगी। यदि आप नहीं जाते हैं तो आप कैसे व्यक्त करेंगे की आप परमेश्वर या देवताओं की तरफ है? यदि आप देवताओं की ओर देखेंगे तो देवता भी आपकी ओर देखेंगे। यदि नहीं तो नहीं।
*🚩दूसरा कारण:-* अच्छे मनोभाव से जाने वाले की सभी तरह की समस्याएं प्रतिदिन मंदिर जाने से समाप्त हो जाती है। मंदिर जाते रहने से मन में दृढ़ विश्वास और उम्मीद की ऊर्जा का संचार होता है। विश्वास की शक्ति से ही धन, समृद्धि और पुत्र-पुत्री रत्न की प्राप्ति होती है।
*🚩तीसरा कारण:-* यदि आपने कोई ऐसा अपराध किया है कि जिसे आप ही जानते हैं तो आपके लिए प्रायश्चित का समय है। आप क्षमा प्रार्थना करके अपने मन को हल्का कर सकते हैं। इससे मन की बैचेनी समाप्त होती है और आप का जीवन फिर से पटरी पर आ जाता है।
*🚩चौथा कारण:-* मंदिर में शंख और घंटियों की आवाजें वातावरण को शुद्ध कर मन और मस्तिष्क को शांत करती हैं। धूप और दीप से मन और मस्तिष्क के सभी तरह के नकारात्मक भाव हट जाते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
*🚩पांचवां कारण:-* मंदिर के वास्तु और वातावरण के कारण वहां सकारात्मक उर्जा ज्यादा होती है। प्राचीन मंदिर ऊर्जा और प्रार्थना के केंद्र थे। धरती के दो छोर हैं- एक उत्तरी ध्रुव और दूसरा दक्षिणी ध्रुव। उत्तर में मुख करके पूजा या प्रार्थना की जाती है इसलिए प्राचीन काल के सभी मंदिरों के द्वार उत्तर में होते थे। हमारे प्राचीन मंदिर वास्तुशास्त्रियों ने ढूंढ-ढूंढकर धरती पर ऊर्जा के सकारात्मक केंद्र ढूंढे और वहां मंदिर बनाए। मंदिर में शिखर होते हैं। शिखर की भीतरी सतह से टकराकर ऊर्जा तरंगें व ध्वनि तरंगें व्यक्ति के ऊपर पड़ती हैं। ये परावर्तित किरण तरंगें मानव शरीर आवृत्ति बनाए रखने में सहायक होती हैं। व्यक्ति का शरीर इस तरह से धीरे-धीरे मंदिर के भीतरी वातावरण से सामंजस्य स्थापित कर लेता है। इस तरह मनुष्य असीम सुख का अनुभव करता है। मंदिर का भव्य होना जरूरी है। भव्यता से ही दिव्यता का अवतरण होता है। मंदिर वास्तु का ध्यान रखना जरूरी है।
*⚜️मंदिर के अपराधी कौन...*
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*🔔यदि आप मंदिर में हैं तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें अन्यथा आपकी पूजा, प्रार्थना आदि करने का कोई महत्व नहीं रहेगा। निम्नलिखित बातें करके आप मंदिर और देव संबंधी अपराध करते हैं। इसके दुष्परिणाम भी आपको ही झेलना होंगे। शास्त्रों में जो मना किया गया है उसे करना पाप और कर्म को बिगाड़ने वाला माना गया है। यहां प्रस्तुत हैं कुछ प्रमुख आचरण जिन्हें मंदिर में नहीं करना चाहिए अन्यथा आपकी प्रार्थना या पूजा निष्फल तो होती ही है, साथ ही आप देवताओं की नजरों में गिर जाते हो।*
1. भगवान के मंदिर में खड़ाऊं या सवारी पर चढ़कर जाना,
2. भगवान के सामने जाकर प्रणाम न करना,
3. उच्छिष्ट या अपवित्र अवस्था में भगवान की वन्दना करना,
5. एक हाथ से प्रणाम करना,
6. भगवान के सामने ही एक स्थान पर खड़े-खड़े प्रदक्षिणा करना,
7. भगवान के आगे पांव फैलाना,
8. मंदिर में पलंग पर बैठना या पलंग लगाना,
9. मंदिर में सोना,
10. मंदिर में बैठकर परस्पर बात करना,
11. मंदिर में रोना या जोर जोर से हंसना,
12. चिल्लाना, फोन पर बात करना, झगड़ना, झूठ बोलना, गाली बकना,
13. खाना या नशा करना,
14. किसी को दंड देना,
15. कंबल ओढ़कर बैठना,
16. अधोवायु का त्याग करना,
17. अपने बल के घंमड में आकर किसी पर अनुग्रह करना,
18. दूसरे की निंदा या स्तुति करना,
19. स्त्रियों के प्रति कठोर बात कहना,
20. भगवत-सम्बन्धी उत्सवों का सेवन न करना।
21. शक्ति रहते हुए गौण उपचारों से पूजा करना,
22. मुख्य उपचारों का प्रबन्ध न करना,
23. भगवान को भोग लगाए बिना ही भोजन करना,
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24. सामयिक फल आदि को भगवान की सेवा में अर्पण न करना,
25. उपयोग में लाने से बचे हुए भोजन को भगवान के लिए निवेदन करना,
26. आत्म-प्रशंसा करना,
27. देवताओं को कोसना,
28. आरती के समय उठकर चले जाना,
29. मंदिर के सामने से निकलते हुए प्रणाम न करना,
30. भजन-कीर्तन आदि के दौरान किसी भी भगवान का वेश बनाकर खुद की पूजा करवाना,
31. मूर्ति के ठीक सामने खड़े होना,
32. मंदिर से बाहर निकलते वक्त भगवान को पीठ दिखाकर बाहर निकलना,
33. हिन्दू देवी-देवताओं को छोड़कर अन्य किसी का मंदिर बनाना सबसे घोर अपराध है। धर्म की रक्षा के लिए नियुक्त श्रीहनुमानजी और माता कालिका ऐसे अपराधियों पर नजर रखे हुए हैं। इसके अलावा आप:, यम और धर्मराज की नजर भी आपके पाप और पुण्य पर हैं।
*⚜️मंदिर में प्रवेश से पूर्व...ये जानना जरूरी*
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*🚩आचमन विधान:-* मंदिर में प्रवेश से पूर्व शरीर और इंद्रियों को जल से शुद्ध करने के बाद आचमन करना जरूरी है। इस शुद्ध करने की प्रक्रिया को ही आचमन कहते हैं। मनुस्मृति में कहा गया है कि- नींद से जागने के बाद, भूख लगने पर, भोजन करने के बाद, छींक आने पर, असत्य भाषण होने पर, पानी पीने के बाद, और अध्ययन करने के बाद आचमन जरूर करें।
शास्त्रों में कहा गया है कि त्रिपवेद आपो गोकर्णवरद् हस्तेन त्रिराचमेत्। यानी आचमन के लिए बाएं हाथ की गोकर्ण मुद्रा ही होनी चाहिए तभी यह लाभदायी रहेगा। गोकर्ण मुद्रा बनाने के लिए दर्जनी को मोड़कर अंगूठे से दबा दें। उसके बाद मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठिका को परस्पर इस प्रकार मोड़ें कि हाथ की आकृति गाय के कान जैसी हो जाए।
*🚩आचमन करते समय हथेली में 5 तीर्थ बताए गए हैं:-*
1. देवतीर्थ,
2. पितृतीर्थ,
3. ब्रह्मातीर्थ,
4. प्राजापत्यतीर्थ और
5. सौम्यतीर्थ।
कहा जाता है कि अंगूठे के मूल में ब्रह्मातीर्थ, कनिष्ठा के मूल में प्रजापत्यतीर्थ, अंगुलियों के अग्रभाग में देवतीर्थ, तर्जनी और अंगूठे के बीच पितृतीर्थ और हाथ के मध्य भाग में सौम्यतीर्थ होता है, जो देवकर्म में प्रशस्त माना गया है। आचमन हमेशा ब्रह्मातीर्थ से करना चाहिए। आचमन करने से पहले अंगुलियां मिलाकर एकाग्रचित्त यानी एकसाथ करके पवित्र जल से बिना शब्द किए 3 बार आचमन करने से महान फल मिलता है। आचमन हमेशा 3 बार करना चाहिए।
*⚜️मंदिर में जाने का सर्वश्रेष्ठ वार, जानिए कौन-सा....*
*卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐*
शिव के मंदिर में सोमवार, विष्णु के मंदिर में रविवार, हनुमान के मंदिर में मंगलवार, शनि के मंदिर में शनिवार और दुर्गा के मंदिर में बुधवार और काली व लक्ष्मी के मंदिर में शुक्रवार को जाने का उल्लेख मिलता है। गुरुवार को गुरुओं का वार माना गया है।
*🚩रविवार और गुरुवार धर्म का दिन :-* विष्णु को देवताओं में सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त है और वेद अनुसार सूर्य इस जगत की आत्मा है। शास्त्रों के अनुसार रविवार को सर्वश्रेष्ठ दिन माना जाता है। रविवार (विष्णु) के बाद देवताओं की ओर से होने के कारण बृहस्पतिवार (देव गुरु बृहस्पति) को प्रार्थना के लिए सबसे अच्छा दिन माना गया है।
*🚩गुरुवार क्यों सर्वश्रेष्ठ?:-* रविवार की दिशा पूर्व है किंतु गुरुवार की दिशा ईशान है। ईशान में ही देवताओं का स्थान माना गया है। यात्रा में इस वार की दिशा पश्चिम, उत्तर और ईशान ही मानी गई है। इस दिन पूर्व, दक्षिण और नैऋत्य दिशा में यात्रा त्याज्य है। गुरुवार की प्रकृति क्षिप्र है। इस दिन सभी तरह के धार्मिक और मंगल कार्य से लाभ मिलता है अत: हिन्दू शास्त्रों के अनुसार यह दिन सर्वश्रेष्ठ माना गया है अत: सभी को प्रत्येक गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए और पूजा, प्रार्थना या ध्यान करना चाहिए।
*⚜️मंदिर में पूजा या प्रार्थना क्यों...*
*卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐*
*🚩पूजा:-* पूजा एक रासायनिक क्रिया है। इससे मंदिर के भीतर वातावरण की पीएच वैल्यू (तरल पदार्थ नापने की इकाई) कम हो जाती है जिससे व्यक्ति की पीएच वैल्यू पर असर पड़ता है। यह आयनिक क्रिया है, जो शारीरिक रसायन को बदल देती है। यह क्रिया बीमारियों को ठीक करने में सहायक होती है। दवाइयों से भी यही क्रिया कराई जाती है, जो मंदिर जाने से होती है।
*🚩प्रार्थना:-* प्रार्थना में शक्ति होती है। प्रार्थना करने वाला व्यक्ति मंदिर के ईथर माध्यम से जुड़कर अपनी बात ईश्वर या देव शक्ति तक पहुंचा सकता है। देवता सुनने और देखने वाले हैं। प्रतिदिन की जा रही प्रार्थना का देवताओं पर असर होने लगता है। मानसिक या वाचिक प्रार्थना की ध्वनि आकाश में चली जाती है। प्रार्थना के साथ यदि आपका मन सच्चा और निर्दोष है तो जल्द ही सुनवाई होगी और यदि आप धर्म के मार्ग पर नहीं हैं तो प्रकृति ही आपकी प्रार्थना सुनेगी देवता नहीं।
25. उपयोग में लाने से बचे हुए भोजन को भगवान के लिए निवेदन करना,
26. आत्म-प्रशंसा करना,
27. देवताओं को कोसना,
28. आरती के समय उठकर चले जाना,
29. मंदिर के सामने से निकलते हुए प्रणाम न करना,
30. भजन-कीर्तन आदि के दौरान किसी भी भगवान का वेश बनाकर खुद की पूजा करवाना,
31. मूर्ति के ठीक सामने खड़े होना,
32. मंदिर से बाहर निकलते वक्त भगवान को पीठ दिखाकर बाहर निकलना,
33. हिन्दू देवी-देवताओं को छोड़कर अन्य किसी का मंदिर बनाना सबसे घोर अपराध है। धर्म की रक्षा के लिए नियुक्त श्रीहनुमानजी और माता कालिका ऐसे अपराधियों पर नजर रखे हुए हैं। इसके अलावा आप:, यम और धर्मराज की नजर भी आपके पाप और पुण्य पर हैं।
*⚜️मंदिर में प्रवेश से पूर्व...ये जानना जरूरी*
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*🚩आचमन विधान:-* मंदिर में प्रवेश से पूर्व शरीर और इंद्रियों को जल से शुद्ध करने के बाद आचमन करना जरूरी है। इस शुद्ध करने की प्रक्रिया को ही आचमन कहते हैं। मनुस्मृति में कहा गया है कि- नींद से जागने के बाद, भूख लगने पर, भोजन करने के बाद, छींक आने पर, असत्य भाषण होने पर, पानी पीने के बाद, और अध्ययन करने के बाद आचमन जरूर करें।
शास्त्रों में कहा गया है कि त्रिपवेद आपो गोकर्णवरद् हस्तेन त्रिराचमेत्। यानी आचमन के लिए बाएं हाथ की गोकर्ण मुद्रा ही होनी चाहिए तभी यह लाभदायी रहेगा। गोकर्ण मुद्रा बनाने के लिए दर्जनी को मोड़कर अंगूठे से दबा दें। उसके बाद मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठिका को परस्पर इस प्रकार मोड़ें कि हाथ की आकृति गाय के कान जैसी हो जाए।
*🚩आचमन करते समय हथेली में 5 तीर्थ बताए गए हैं:-*
1. देवतीर्थ,
2. पितृतीर्थ,
3. ब्रह्मातीर्थ,
4. प्राजापत्यतीर्थ और
5. सौम्यतीर्थ।
कहा जाता है कि अंगूठे के मूल में ब्रह्मातीर्थ, कनिष्ठा के मूल में प्रजापत्यतीर्थ, अंगुलियों के अग्रभाग में देवतीर्थ, तर्जनी और अंगूठे के बीच पितृतीर्थ और हाथ के मध्य भाग में सौम्यतीर्थ होता है, जो देवकर्म में प्रशस्त माना गया है। आचमन हमेशा ब्रह्मातीर्थ से करना चाहिए। आचमन करने से पहले अंगुलियां मिलाकर एकाग्रचित्त यानी एकसाथ करके पवित्र जल से बिना शब्द किए 3 बार आचमन करने से महान फल मिलता है। आचमन हमेशा 3 बार करना चाहिए।
*⚜️मंदिर में जाने का सर्वश्रेष्ठ वार, जानिए कौन-सा....*
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शिव के मंदिर में सोमवार, विष्णु के मंदिर में रविवार, हनुमान के मंदिर में मंगलवार, शनि के मंदिर में शनिवार और दुर्गा के मंदिर में बुधवार और काली व लक्ष्मी के मंदिर में शुक्रवार को जाने का उल्लेख मिलता है। गुरुवार को गुरुओं का वार माना गया है।
*🚩रविवार और गुरुवार धर्म का दिन :-* विष्णु को देवताओं में सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त है और वेद अनुसार सूर्य इस जगत की आत्मा है। शास्त्रों के अनुसार रविवार को सर्वश्रेष्ठ दिन माना जाता है। रविवार (विष्णु) के बाद देवताओं की ओर से होने के कारण बृहस्पतिवार (देव गुरु बृहस्पति) को प्रार्थना के लिए सबसे अच्छा दिन माना गया है।
*🚩गुरुवार क्यों सर्वश्रेष्ठ?:-* रविवार की दिशा पूर्व है किंतु गुरुवार की दिशा ईशान है। ईशान में ही देवताओं का स्थान माना गया है। यात्रा में इस वार की दिशा पश्चिम, उत्तर और ईशान ही मानी गई है। इस दिन पूर्व, दक्षिण और नैऋत्य दिशा में यात्रा त्याज्य है। गुरुवार की प्रकृति क्षिप्र है। इस दिन सभी तरह के धार्मिक और मंगल कार्य से लाभ मिलता है अत: हिन्दू शास्त्रों के अनुसार यह दिन सर्वश्रेष्ठ माना गया है अत: सभी को प्रत्येक गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए और पूजा, प्रार्थना या ध्यान करना चाहिए।
*⚜️मंदिर में पूजा या प्रार्थना क्यों...*
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*🚩पूजा:-* पूजा एक रासायनिक क्रिया है। इससे मंदिर के भीतर वातावरण की पीएच वैल्यू (तरल पदार्थ नापने की इकाई) कम हो जाती है जिससे व्यक्ति की पीएच वैल्यू पर असर पड़ता है। यह आयनिक क्रिया है, जो शारीरिक रसायन को बदल देती है। यह क्रिया बीमारियों को ठीक करने में सहायक होती है। दवाइयों से भी यही क्रिया कराई जाती है, जो मंदिर जाने से होती है।
*🚩प्रार्थना:-* प्रार्थना में शक्ति होती है। प्रार्थना करने वाला व्यक्ति मंदिर के ईथर माध्यम से जुड़कर अपनी बात ईश्वर या देव शक्ति तक पहुंचा सकता है। देवता सुनने और देखने वाले हैं। प्रतिदिन की जा रही प्रार्थना का देवताओं पर असर होने लगता है। मानसिक या वाचिक प्रार्थना की ध्वनि आकाश में चली जाती है। प्रार्थना के साथ यदि आपका मन सच्चा और निर्दोष है तो जल्द ही सुनवाई होगी और यदि आप धर्म के मार्ग पर नहीं हैं तो प्रकृति ही आपकी प्रार्थना सुनेगी देवता नहीं।
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प्रार्थना का दूसरा पहलू यह कि प्रार्थना करने से मन में विश्वास और सकारात्मक भाव जाग्रत होते हैं, जो जीवन के विकास और सफलता के अत्यंत जरूरी हैं। खुद के जीवन के बारे में निरंतर सकारात्मक सोचते रहने से अच्छे भविष्य का निर्माण होता है। मंदिर का वातावरण आपके दिमाग को सकारात्मक दिशा में गति देने लगता है। परमेश्वर की प्रार्थना के लिए वेदों में कुछ ऋचाएं दी गई है, प्रार्थना के लिए उन्हें याद किया जाना चाहिए।
*⚜️मंदिर में जाने का समय...*
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हिन्दू मंदिर में जाने का समय होता है। सूर्य और तारों से रहित दिन-रात की संधि को तत्वदर्शी मुनियों ने संध्याकाल माना है। संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। संधिकाल में ही संध्या वंदना की जाती है। वैसे संधि 5 वक्त (समय) की होती है, लेकिन प्रात:काल और संध्याकाल- उक्त 2 समय की संधि प्रमुख है अर्थात सूर्य उदय और अस्त के समय। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है।
दोपहर 12 से अपराह्न 4 बजे तक मंदिर में जाना, पूजा, आरती और प्रार्थना आदि करना निषेध माना गया है अर्थात प्रात:काल से 11 बजे के पूर्व मंदिर होकर आ जाएं या फिर अपराह्नकाल में 4 बजे के बाद मंदिर जाएं।
*हरिऊँ*
*⚜️मंदिर में जाने का समय...*
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हिन्दू मंदिर में जाने का समय होता है। सूर्य और तारों से रहित दिन-रात की संधि को तत्वदर्शी मुनियों ने संध्याकाल माना है। संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। संधिकाल में ही संध्या वंदना की जाती है। वैसे संधि 5 वक्त (समय) की होती है, लेकिन प्रात:काल और संध्याकाल- उक्त 2 समय की संधि प्रमुख है अर्थात सूर्य उदय और अस्त के समय। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है।
दोपहर 12 से अपराह्न 4 बजे तक मंदिर में जाना, पूजा, आरती और प्रार्थना आदि करना निषेध माना गया है अर्थात प्रात:काल से 11 बजे के पूर्व मंदिर होकर आ जाएं या फिर अपराह्नकाल में 4 बजे के बाद मंदिर जाएं।
*हरिऊँ*
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*चैत्र नवरात्री 2024: चैत्र नवरात्रि में कैसे करें कलश और घट स्थापना, जानें शुभ मुहूर्त*
इस बार माता घोड़े पर सवार होकर आ रही हैं
*9 अप्रैल 2024 मंगलवार से चैत्र नवरात्रि का पर्व प्रारंभ हो रहा है जो 17 अप्रैल तक चलेगी। नवरात्रि में दुर्गा पूजा के पहले कलश और घट स्थापना करके उसकी पूजा की जाती है। आओ जानते हैं कि कैसे करते हैं कलश और घट स्थापना और उसकी पूजा की संपूर्ण विधि।*
*प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ-* 08 अप्रैल 2024 को रात्रि 11:50 बजे से।
*प्रतिपदा तिथि समाप्त-* 09 अप्रैल 2024 को रात्रि 08:30 को।
*उदयातिथि के अनुसार 09 अप्रैल 2024 को चैत्र नवरात्रि प्रारंभ होगी।*
*नवरात्रि प्रारंभ दिनांक:-* 09 अप्रैल 2024 मंगलवार से।
*नवरात्रि समाप्त दिनांक:-* 17 अप्रैल 2024 बुधवार को।
*नवरात्रि कुल 9 दिनों तक की ही रहेगी।*
माता हाथी पर सवार होकर चली जाएंगी
*🪔कलश स्थापना पूजा विधि*
- एक तांबे के कलश में जल भरें और उसके ऊपरी भाग पर नाड़ा बांधकर उसे उस मिट्टी के पात्र अर्थात घट के उपर रखें।
- अब कलश के ऊपर पत्ते रखें, पत्तों के बीच में नाड़ा बंधा हुआ नारियल लाल कपड़े में लपेटकर रखें।
- अब घट और कलश की पूजा करें। फल, मिठाई, प्रसाद आदि घट के आसपास रखें।
- इसके बाद गणेश वंदना करें और फिर देवी का आह्वान करें।
- अब देवी- देवताओं का आह्वान करते हुए प्रार्थना करें कि 'हे समस्त देवी-देवता, आप सभी 9 दिन के लिए कृपया कलश में विराजमान हों।'
- आह्वान करने के बाद ये मानते हुए कि सभी देवतागण कलश में विराजमान हैं, कलश की पूजा करें।
- कलश को टीका करें, अक्षत चढ़ाएं, फूल माला अर्पित करें, इत्र अर्पित करें।
- नैवेद्य यानी फल-मिठाई आदि अर्पित करें।
*🪔कैसे करें घट स्थापना*
- घट अर्थात मिट्टी का घड़ा। इसे नवरात्रि के प्रथम दिन शुभ मुहूर्त में ईशान कोण में स्थापित किया जाता है।
- घट में पहले थोड़ी सी मिट्टी डालें और फिर जौ डालें।
- फिर एक परत मिट्टी की बिछा दें।
- एक बार फिर जौ डालें।
- फिर से मिट्टी की परत बिछाएं।
- अब इस पर जल का छिड़काव करें।
- इस तरह उपर तक पात्र को मिट्टी से भर दें।
- अब इस पात्र को स्थापित करके पूजन करें।
- जहां घट स्थापित करना है वहां एक पाट रखें और उस पर साफ लाल कपड़ा बिछाकर फिर उस पर घट स्थापित करें।
- घट पर रोली या चंदन से स्वास्तिक बनाएं।
- घट के गले में मौली बांधे।
*🚩#जय_माता_की🚩*
इस बार माता घोड़े पर सवार होकर आ रही हैं
*9 अप्रैल 2024 मंगलवार से चैत्र नवरात्रि का पर्व प्रारंभ हो रहा है जो 17 अप्रैल तक चलेगी। नवरात्रि में दुर्गा पूजा के पहले कलश और घट स्थापना करके उसकी पूजा की जाती है। आओ जानते हैं कि कैसे करते हैं कलश और घट स्थापना और उसकी पूजा की संपूर्ण विधि।*
*प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ-* 08 अप्रैल 2024 को रात्रि 11:50 बजे से।
*प्रतिपदा तिथि समाप्त-* 09 अप्रैल 2024 को रात्रि 08:30 को।
*उदयातिथि के अनुसार 09 अप्रैल 2024 को चैत्र नवरात्रि प्रारंभ होगी।*
*नवरात्रि प्रारंभ दिनांक:-* 09 अप्रैल 2024 मंगलवार से।
*नवरात्रि समाप्त दिनांक:-* 17 अप्रैल 2024 बुधवार को।
*नवरात्रि कुल 9 दिनों तक की ही रहेगी।*
माता हाथी पर सवार होकर चली जाएंगी
*🪔कलश स्थापना पूजा विधि*
- एक तांबे के कलश में जल भरें और उसके ऊपरी भाग पर नाड़ा बांधकर उसे उस मिट्टी के पात्र अर्थात घट के उपर रखें।
- अब कलश के ऊपर पत्ते रखें, पत्तों के बीच में नाड़ा बंधा हुआ नारियल लाल कपड़े में लपेटकर रखें।
- अब घट और कलश की पूजा करें। फल, मिठाई, प्रसाद आदि घट के आसपास रखें।
- इसके बाद गणेश वंदना करें और फिर देवी का आह्वान करें।
- अब देवी- देवताओं का आह्वान करते हुए प्रार्थना करें कि 'हे समस्त देवी-देवता, आप सभी 9 दिन के लिए कृपया कलश में विराजमान हों।'
- आह्वान करने के बाद ये मानते हुए कि सभी देवतागण कलश में विराजमान हैं, कलश की पूजा करें।
- कलश को टीका करें, अक्षत चढ़ाएं, फूल माला अर्पित करें, इत्र अर्पित करें।
- नैवेद्य यानी फल-मिठाई आदि अर्पित करें।
*🪔कैसे करें घट स्थापना*
- घट अर्थात मिट्टी का घड़ा। इसे नवरात्रि के प्रथम दिन शुभ मुहूर्त में ईशान कोण में स्थापित किया जाता है।
- घट में पहले थोड़ी सी मिट्टी डालें और फिर जौ डालें।
- फिर एक परत मिट्टी की बिछा दें।
- एक बार फिर जौ डालें।
- फिर से मिट्टी की परत बिछाएं।
- अब इस पर जल का छिड़काव करें।
- इस तरह उपर तक पात्र को मिट्टी से भर दें।
- अब इस पात्र को स्थापित करके पूजन करें।
- जहां घट स्थापित करना है वहां एक पाट रखें और उस पर साफ लाल कपड़ा बिछाकर फिर उस पर घट स्थापित करें।
- घट पर रोली या चंदन से स्वास्तिक बनाएं।
- घट के गले में मौली बांधे।
*🚩#जय_माता_की🚩*
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*(एकादशी के बारे में जानकारी)*
*-एकादशी का उद्गम,कथा एवं क्यों रखा जाता है एकादशी व्रत*
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*संस्कृत शब्द एकादशी का शाब्दिक अर्थ ग्यारह होता है। एकादशी पंद्रह दिवसीय पक्ष (चन्द्र मास) के ग्यारहवें दिन आती है। एक चन्द्र मास (शुक्ल पक्ष) में चन्द्रमा अमावस्या से बढ़कर पूर्णिमा तक जाता है, और उसके अगले पक्ष में (कृष्ण पक्ष) वह पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्र से घटते हुए अमावस्या तक जाता है। इसलिए हर कैलंडर महीने (सूर्या) में एकादशी दो बार आती है, शुक्ल एकादशी जो कि बढ़ते हुए चन्द्रमा के ग्यारहवें दिन आती है, और कृष्ण एकादशी जो कि घटते हुए चन्द्रमा के ग्यारहवें दिन आती हैं। ऐसा निर्देश हैं कि हर वैष्णव को एकादशी के दिन व्रत करना चाहिये, इस प्रकार की गई तपस्या भक्तिमयी जीवन के लिए अत्यंत लाभकारी हैं।*
*एकादशी का उद्गम*
〰️〰️〰️〰️
*पद्मा पुराण के चतुर्दश अध्याय में, क्रिया-सागर सार नामक भाग में, श्रील व्यासदेव एकादशी के उद्गम की व्याख्या जैमिनी ऋषि को इस प्रकार करते हैं*
*इस भौतिक जगत् की उत्पत्ति के समय, परम पुरुष भगवान् ने, पापियों को दण्डित करने के लिए पाप का मूर्तिमान रूप लिए एक व्यक्तित्व की रचना की (पापपुरुष)। इस व्यक्ति के चारों हाथ पाँव की रचना अनेकों पाप-कर्मों से की गयी थी। इस पापपुरुष को नियंत्रित करने के लिए यमराज की उत्पत्ति अनेकों नरकीय ग्रह प्रणालियों की रचना के साथ हुई। वे जीवात्माएं जो अत्यंत पापी होती हैं, उन्हें मृत्युपर्यंत यमराज के पास भेज दिया जाता है, यमराज ,जीव को उसके पापों के भोगों के अनुसार नरक में पीड़ित होने के लिए भेज देते हैं।*
*इस प्रकार जीवात्मा अपने कर्मों के अनुसार सुख और दुःख भोगने लगी। इतने सारी जीवात्माओं को नरकों में कष्ट भोगते देख परम कृपालु भगवान् को उनके लिए बुरा लगने लगा। उनकी सहायतावश भगवान् ने अपने स्वयं के स्वरुप से, पाक्षिक एकादशी के रूप को अवतरित किया। इस कारण, एकादशी एक चन्द्र पक्ष के पन्द्रवें दिन उपवास करने के व्रत का ही व्यक्तिकरण है। इस कारण एकादशी और भगवान् श्री विष्णु अभिन्न नहीं हैं। श्रीएकादशी व्रत अत्यधिक पुण्य कर्म हैं, जो कि हर लिए गए संकल्पों में शीर्ष स्थान पर स्थित है।*
*तदुपरांत विभिन्न पाप कर्मी जीवात्माएं एकादशी व्रत का नियम पालन करने लगीं और उस कारण उन्हें तुरंत ही वैकुण्ठ-धाम की प्राप्ति होने लगी। श्रीएकादशी के पालन से हुए अधिरोहण से , पापपुरुष (पाप का मूर्तिमान स्वरुप) को धीरे धीरे दृश्य होने लगा कि अब उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ने लगा है। वह भगवान् श्रीविष्णु के पास प्रार्थना करते हुए पहुँचा, “हे प्रभु, मैं आपके द्वारा निर्मित आपकी ही कृति हूँ और मेरे माध्यम से ही आप घोर पाप कर्मों वाले जीवों को अपनी इच्छा से पीड़ित करते हैं। परन्तु अब श्रीएकादशी के प्रभाव से अब मेरा ह्रास हो रहा है। आप कृपा करके मेरी रक्षा एकादशी के भय से करें। कोई भी पुण्य कर्म मुझे नहीं बाँध सकता है, परन्तु आपके ही स्वरुप में एकादशी मुझे प्रतिरोधित कर रही है। मुझे ऐसा कोई स्थान ज्ञात नहीं जहाँ मैं श्रीएकादशी के भय से मुक्त रह सकूं। हे मेरे स्वामी! मैं आपकी ही कृति से उत्पन्न हूँ, इसलिए कृपा करके मुझे ऐसे स्थान का पता बताईये जहाँ मैं निर्भीक होकर निवास कर सकूँ।”*
*तदुपरांत, पापपुरुष की स्थिति पर अवलोकन करते हुए श्रीभगवान् विष्णु ने कहा, “हे पापपुरुष! उठो! अब और शोकाकुल मत हो। केवल सुनो, और मैं तुम्हे बताता हूँ कि तुम एकादशी के पवित्र दिन पर कहाँ निवास कर सकते हो। एकादशी का दिन जो त्रिलोक में लाभ देने वाला है, उस दिन तुम अन्न जैसे खाद्य पदार्थ की शरण में जा सकते हो। अब तुम्हारे पास शोकाकुल होने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि मेरे ही स्वरुप में श्रीएकादशी देवी अब तुम्हे अवरोधित नहीं करेगी।” पापपुरुष को आश्वाशन देने के बाद भगवान् श्रीविष्णु अंतर्ध्यान हो गए और पापपुरुष पुनः अपने कर्मों को पूरा करने में लग गया। भगवान विष्णु के इस निर्देश के अनुसार, संसार भर में जितने भी पाप कर्म पाए जा सकते हैं वे सब इन खाद्य पदार्थ (अनाज) में निवास करते हैं। इसलिए वे मनुष्य गण जो कि जीवात्मा के आधारभूत लाभ के प्रति सजग होते हैं, वे कभी एकादशी के दिन अन्न नहीं ग्रहण करते हैं।*
*एकादशी व्रत धारण करना*
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*सभी वैदिक शास्त्र एकादशी के दिन पूर्ण रूप से उपवास (निर्जल) करने की दृढ़ता से अनुशंसा करते हैं। आध्यात्मिक प्रगति के लिए आयु आठ से अस्सी तक के हर किसी को वर्ण आश्रम, लिंग भेद या और किसी भौतिक वैचारिकता की अपेक्षा कर के एकादशी के दिन व्रत करने की अनुशंसा की गयी है।*
*वे लोग जो पूर्ण रूप से उपवास नहीं कर सकते उनके लिए मध्याह्न या संध्या काल में एक बार भोजन करके एकादशी व्रत करने की भी अनुशंसा की गयी हैं। परन्तु इस दिन किसी भी रूप में, किसी को भी, किसी भी स्थिति में अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये।*
*-एकादशी का उद्गम,कथा एवं क्यों रखा जाता है एकादशी व्रत*
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*संस्कृत शब्द एकादशी का शाब्दिक अर्थ ग्यारह होता है। एकादशी पंद्रह दिवसीय पक्ष (चन्द्र मास) के ग्यारहवें दिन आती है। एक चन्द्र मास (शुक्ल पक्ष) में चन्द्रमा अमावस्या से बढ़कर पूर्णिमा तक जाता है, और उसके अगले पक्ष में (कृष्ण पक्ष) वह पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्र से घटते हुए अमावस्या तक जाता है। इसलिए हर कैलंडर महीने (सूर्या) में एकादशी दो बार आती है, शुक्ल एकादशी जो कि बढ़ते हुए चन्द्रमा के ग्यारहवें दिन आती है, और कृष्ण एकादशी जो कि घटते हुए चन्द्रमा के ग्यारहवें दिन आती हैं। ऐसा निर्देश हैं कि हर वैष्णव को एकादशी के दिन व्रत करना चाहिये, इस प्रकार की गई तपस्या भक्तिमयी जीवन के लिए अत्यंत लाभकारी हैं।*
*एकादशी का उद्गम*
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*पद्मा पुराण के चतुर्दश अध्याय में, क्रिया-सागर सार नामक भाग में, श्रील व्यासदेव एकादशी के उद्गम की व्याख्या जैमिनी ऋषि को इस प्रकार करते हैं*
*इस भौतिक जगत् की उत्पत्ति के समय, परम पुरुष भगवान् ने, पापियों को दण्डित करने के लिए पाप का मूर्तिमान रूप लिए एक व्यक्तित्व की रचना की (पापपुरुष)। इस व्यक्ति के चारों हाथ पाँव की रचना अनेकों पाप-कर्मों से की गयी थी। इस पापपुरुष को नियंत्रित करने के लिए यमराज की उत्पत्ति अनेकों नरकीय ग्रह प्रणालियों की रचना के साथ हुई। वे जीवात्माएं जो अत्यंत पापी होती हैं, उन्हें मृत्युपर्यंत यमराज के पास भेज दिया जाता है, यमराज ,जीव को उसके पापों के भोगों के अनुसार नरक में पीड़ित होने के लिए भेज देते हैं।*
*इस प्रकार जीवात्मा अपने कर्मों के अनुसार सुख और दुःख भोगने लगी। इतने सारी जीवात्माओं को नरकों में कष्ट भोगते देख परम कृपालु भगवान् को उनके लिए बुरा लगने लगा। उनकी सहायतावश भगवान् ने अपने स्वयं के स्वरुप से, पाक्षिक एकादशी के रूप को अवतरित किया। इस कारण, एकादशी एक चन्द्र पक्ष के पन्द्रवें दिन उपवास करने के व्रत का ही व्यक्तिकरण है। इस कारण एकादशी और भगवान् श्री विष्णु अभिन्न नहीं हैं। श्रीएकादशी व्रत अत्यधिक पुण्य कर्म हैं, जो कि हर लिए गए संकल्पों में शीर्ष स्थान पर स्थित है।*
*तदुपरांत विभिन्न पाप कर्मी जीवात्माएं एकादशी व्रत का नियम पालन करने लगीं और उस कारण उन्हें तुरंत ही वैकुण्ठ-धाम की प्राप्ति होने लगी। श्रीएकादशी के पालन से हुए अधिरोहण से , पापपुरुष (पाप का मूर्तिमान स्वरुप) को धीरे धीरे दृश्य होने लगा कि अब उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ने लगा है। वह भगवान् श्रीविष्णु के पास प्रार्थना करते हुए पहुँचा, “हे प्रभु, मैं आपके द्वारा निर्मित आपकी ही कृति हूँ और मेरे माध्यम से ही आप घोर पाप कर्मों वाले जीवों को अपनी इच्छा से पीड़ित करते हैं। परन्तु अब श्रीएकादशी के प्रभाव से अब मेरा ह्रास हो रहा है। आप कृपा करके मेरी रक्षा एकादशी के भय से करें। कोई भी पुण्य कर्म मुझे नहीं बाँध सकता है, परन्तु आपके ही स्वरुप में एकादशी मुझे प्रतिरोधित कर रही है। मुझे ऐसा कोई स्थान ज्ञात नहीं जहाँ मैं श्रीएकादशी के भय से मुक्त रह सकूं। हे मेरे स्वामी! मैं आपकी ही कृति से उत्पन्न हूँ, इसलिए कृपा करके मुझे ऐसे स्थान का पता बताईये जहाँ मैं निर्भीक होकर निवास कर सकूँ।”*
*तदुपरांत, पापपुरुष की स्थिति पर अवलोकन करते हुए श्रीभगवान् विष्णु ने कहा, “हे पापपुरुष! उठो! अब और शोकाकुल मत हो। केवल सुनो, और मैं तुम्हे बताता हूँ कि तुम एकादशी के पवित्र दिन पर कहाँ निवास कर सकते हो। एकादशी का दिन जो त्रिलोक में लाभ देने वाला है, उस दिन तुम अन्न जैसे खाद्य पदार्थ की शरण में जा सकते हो। अब तुम्हारे पास शोकाकुल होने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि मेरे ही स्वरुप में श्रीएकादशी देवी अब तुम्हे अवरोधित नहीं करेगी।” पापपुरुष को आश्वाशन देने के बाद भगवान् श्रीविष्णु अंतर्ध्यान हो गए और पापपुरुष पुनः अपने कर्मों को पूरा करने में लग गया। भगवान विष्णु के इस निर्देश के अनुसार, संसार भर में जितने भी पाप कर्म पाए जा सकते हैं वे सब इन खाद्य पदार्थ (अनाज) में निवास करते हैं। इसलिए वे मनुष्य गण जो कि जीवात्मा के आधारभूत लाभ के प्रति सजग होते हैं, वे कभी एकादशी के दिन अन्न नहीं ग्रहण करते हैं।*
*एकादशी व्रत धारण करना*
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*सभी वैदिक शास्त्र एकादशी के दिन पूर्ण रूप से उपवास (निर्जल) करने की दृढ़ता से अनुशंसा करते हैं। आध्यात्मिक प्रगति के लिए आयु आठ से अस्सी तक के हर किसी को वर्ण आश्रम, लिंग भेद या और किसी भौतिक वैचारिकता की अपेक्षा कर के एकादशी के दिन व्रत करने की अनुशंसा की गयी है।*
*वे लोग जो पूर्ण रूप से उपवास नहीं कर सकते उनके लिए मध्याह्न या संध्या काल में एक बार भोजन करके एकादशी व्रत करने की भी अनुशंसा की गयी हैं। परन्तु इस दिन किसी भी रूप में, किसी को भी, किसी भी स्थिति में अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये।*
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*एकादशी पर भक्तिमयी सेवा*
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*एकादशी को उसके सभी लाभों के साथ ऐसा उपाय या साधन समझना चाहिये जो सभी जीवों के परम लक्ष्य, भगवद्-भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक हैं । भगवान् की कृपा से यह दिन भगवान् की भक्तिमयी सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक बन गया है। पापमयी इच्छाओं से मुक्त हो, एक भक्त विशुद्ध भक्तिमयी सेवा कर सकता है और परमेश्वर का कृपापात्र बन सकता है।*
*इसलिए, भक्तों के लिए, एकादशी के दिन व्रत करना साधना-भक्ति के मार्ग में प्रगति करने का सशक्त माध्यम है। व्रत करने की क्रिया चेतना का शुद्धिकरण करती है और भक्त को कितने ही भौतिक विचारों से मुक्त करती है। क्योंकि इस दिन की गई भक्तिमयी सेवा का लाभ किसी और दिन की गई सेवा से कई गुना अधिक होता है, इसलिए भक्त जितना अधिक से अधिक हो सके आज के दिन जप, कीर्तन, भगवान् की लीला-संस्मरण पर चर्चाएँ आदि अन्य भक्तिमयी सेवाएं किया करते हैं।*
*श्रील् प्रभुपाद ने भक्तों के लिए इस दिन कम से कम पच्चीस जप माला संख्या पूरी करने, भगवान् के लीला-संस्मरणों को पढ़ने एवं भौतिक कार्यकलापों में न्यूनतम संलग्न होने की अनुशंसा की है। हालाँकि, वे भक्त जो पहले से ही भगवान् की भक्ति की सेवाओं (जैसे पुस्तक वितरण, प्रवचन आदि) में सक्रियता से लगे हुए हैं, उनके लिए उन्होंने कुछ छूट दी हैं, जैसे उन खाद्यों को वे इस दिन भी खा या पी सकते है जिनमें अन्न नहीं हैं।*
(*एकादशी का महात्म्य* )
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*श्रील जीव गोस्वामी द्वारा रचित, भक्ति-सन्दर्भ में स्कन्द पुराण में से लिया हुआ एक श्लोक भर्त्सना करते हुए बताता है कि जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न ग्रहण करते हैं, वे मनुष्य अपने माता, पिता, भाइयों एवं अपने गुरु की मृत्यु के दोषी होते हैं। वैसे मनुष्य अगर वैकुंठ धाम तक भी पहुँच जाएँ तो भी वे वहाँ से नीचे गिर जाते हैं। इस दिन किसी भी तरह के अन्न को ग्रहण करना सर्वथा वर्जित है, चाहे वह भगवान् विष्णु को ही क्यों न अर्पित हो।*
*ब्रह्म-वैवर्त पुराण में कहा गया है कि जो कोई भी एकादशी के दिन व्रत करता है वो सभी पाप कर्मों के दोषों से मुक्त हो जाता हैं और आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करता है। मूल सिद्धान्त केवल उस दिन भूखे रहना नहीं है, बल्कि अपनी निष्ठा और प्रेम को गोविन्द, या कृष्ण पर और भी सुदृढ़ करना है। एकादशी के दिन व्रत का मुख्य कारण है अपनी शरीर की जरूरतों को घटाना और अपने समय का भगवान् की सेवा में जप या किसी और सेवा के रूप में व्यय करना है। उपवास के दिन सर्वश्रेष्ठ कार्य तो भगवान् श्रीगोविन्द की मंगलमय लीलाओं का ध्यान करना और उनके पावन नामों को निरंतर सुनते रहना है।।*
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*एकादशी को उसके सभी लाभों के साथ ऐसा उपाय या साधन समझना चाहिये जो सभी जीवों के परम लक्ष्य, भगवद्-भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक हैं । भगवान् की कृपा से यह दिन भगवान् की भक्तिमयी सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक बन गया है। पापमयी इच्छाओं से मुक्त हो, एक भक्त विशुद्ध भक्तिमयी सेवा कर सकता है और परमेश्वर का कृपापात्र बन सकता है।*
*इसलिए, भक्तों के लिए, एकादशी के दिन व्रत करना साधना-भक्ति के मार्ग में प्रगति करने का सशक्त माध्यम है। व्रत करने की क्रिया चेतना का शुद्धिकरण करती है और भक्त को कितने ही भौतिक विचारों से मुक्त करती है। क्योंकि इस दिन की गई भक्तिमयी सेवा का लाभ किसी और दिन की गई सेवा से कई गुना अधिक होता है, इसलिए भक्त जितना अधिक से अधिक हो सके आज के दिन जप, कीर्तन, भगवान् की लीला-संस्मरण पर चर्चाएँ आदि अन्य भक्तिमयी सेवाएं किया करते हैं।*
*श्रील् प्रभुपाद ने भक्तों के लिए इस दिन कम से कम पच्चीस जप माला संख्या पूरी करने, भगवान् के लीला-संस्मरणों को पढ़ने एवं भौतिक कार्यकलापों में न्यूनतम संलग्न होने की अनुशंसा की है। हालाँकि, वे भक्त जो पहले से ही भगवान् की भक्ति की सेवाओं (जैसे पुस्तक वितरण, प्रवचन आदि) में सक्रियता से लगे हुए हैं, उनके लिए उन्होंने कुछ छूट दी हैं, जैसे उन खाद्यों को वे इस दिन भी खा या पी सकते है जिनमें अन्न नहीं हैं।*
(*एकादशी का महात्म्य* )
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*श्रील जीव गोस्वामी द्वारा रचित, भक्ति-सन्दर्भ में स्कन्द पुराण में से लिया हुआ एक श्लोक भर्त्सना करते हुए बताता है कि जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न ग्रहण करते हैं, वे मनुष्य अपने माता, पिता, भाइयों एवं अपने गुरु की मृत्यु के दोषी होते हैं। वैसे मनुष्य अगर वैकुंठ धाम तक भी पहुँच जाएँ तो भी वे वहाँ से नीचे गिर जाते हैं। इस दिन किसी भी तरह के अन्न को ग्रहण करना सर्वथा वर्जित है, चाहे वह भगवान् विष्णु को ही क्यों न अर्पित हो।*
*ब्रह्म-वैवर्त पुराण में कहा गया है कि जो कोई भी एकादशी के दिन व्रत करता है वो सभी पाप कर्मों के दोषों से मुक्त हो जाता हैं और आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करता है। मूल सिद्धान्त केवल उस दिन भूखे रहना नहीं है, बल्कि अपनी निष्ठा और प्रेम को गोविन्द, या कृष्ण पर और भी सुदृढ़ करना है। एकादशी के दिन व्रत का मुख्य कारण है अपनी शरीर की जरूरतों को घटाना और अपने समय का भगवान् की सेवा में जप या किसी और सेवा के रूप में व्यय करना है। उपवास के दिन सर्वश्रेष्ठ कार्य तो भगवान् श्रीगोविन्द की मंगलमय लीलाओं का ध्यान करना और उनके पावन नामों को निरंतर सुनते रहना है।।*
👍6
🕉️योग आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का नाम है। जीवात्मा का परमात्मा से मिलन कराना ही ही योग है। महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग में यम, नियम, प्रत्याहार, आसन, प्रणायाम, ध्यान, धारणा और समाधि के माध्यम से हम ईश्वर के प्राप्ति का रास्ता तय कर लेते हैं। मार्गदर्शन सही होना चाहिए,, जिस व्यक्ति ने पूर्ण रूप से योग कर लिया है ,, जिसके चित्र के वृत्तियों का निरोध हो चुका है,, ऐसे किसी व्यक्ति को ध्यान के द्वारा धारण करना चाहिए,, जब व्यक्ति की धारणा मजबूत हो जाती है तो समाधि की अवस्था स्वयं ही आ जाती है,, मनुष्य को कुछ करना नहीं पड़ता है किसी भी वीतराग पुरुष को सामने रखकर उसका ध्यान करने से सारी अवस्थाएं स्वयं ही आ जाती हैं,, यह जरूरी नहीं कि सामने ही बैठा हो ऐसा मन में विचार करना चाहिए कि वह वीतराग पुरुष जो मेरा गुरु है वह मेरे सामने प्रकाश रूप में बैठा है और मेरे हृदय के रोम रोम में उसका प्रकाश समाहित हो रहा है,, ऐसा करने से धीरे-धीरे उस गुरु की सारी शक्तियां सारे गुण सारा ज्ञान हमारे हृदय के अंतःकरण में स्वयं ही प्रकट होने लगता है और हम भी उनके सामान योग कर जाते हैं,,
जिसे महर्षि पतंजलि ने कहा है योगस्य चित्रवृत्ति निरोध:
जिसे महर्षि पतंजलि ने कहा है योगस्य चित्रवृत्ति निरोध:
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