✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
5.93K subscribers
1.17K photos
94 videos
5.07K files
248 links
ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें।
ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
Download Telegram
🕉️योग आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का नाम है। जीवात्मा का परमात्मा से मिलन कराना ही ही योग है। महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग में यम, नियम, प्रत्याहार, आसन, प्रणायाम, ध्यान, धारणा और समाधि के माध्यम से हम ईश्वर के प्राप्ति का रास्ता तय कर लेते हैं। मार्गदर्शन सही होना चाहिए,, जिस व्यक्ति ने पूर्ण रूप से योग कर लिया है ,, जिसके चित्र के वृत्तियों का निरोध हो चुका है,, ऐसे किसी व्यक्ति को ध्यान के द्वारा धारण करना चाहिए,, जब व्यक्ति की धारणा मजबूत हो जाती है तो समाधि की अवस्था स्वयं ही आ जाती है,, मनुष्य को कुछ करना नहीं पड़ता है किसी भी वीतराग पुरुष को सामने रखकर उसका ध्यान करने से सारी अवस्थाएं स्वयं ही आ जाती हैं,, यह जरूरी नहीं कि सामने ही बैठा हो ऐसा मन में विचार करना चाहिए कि वह वीतराग पुरुष जो मेरा गुरु है वह मेरे सामने प्रकाश रूप में बैठा है और मेरे हृदय के रोम रोम में उसका प्रकाश समाहित हो रहा है,, ऐसा करने से धीरे-धीरे उस गुरु की सारी शक्तियां सारे गुण सारा ज्ञान हमारे हृदय के अंतःकरण में स्वयं ही प्रकट होने लगता है और हम भी उनके सामान योग कर जाते हैं,,
जिसे महर्षि पतंजलि ने कहा है योगस्य चित्रवृत्ति निरोध:
👍3
*धीरे - धीरे रे मना धीरे सब कुछ होए।माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आए फल होए।।*
*फल तो धीरज से ही मिलेगा। सतसंग में मन लगे या ना लगे। समझ में कुछ आए या ना आए, पर सुनो। तुम्हारा यह सत्य वचन का सुनना ही, तुम्हारे अवचेतन में अपनी जगह बना लेगा। फिर चाहे याद रहे या ना रहे, पर जब भी तुम्हें इसकी सबसे अधिक ज़रूरत होगी, तब तुम्हारी यादों से निकल कर तुम्हारा साथ निभाएगा और हर हाल में सम्भाल लेगा।*
👍7
॥ श्रीहरि: ॥

*याद रखो - भगवान् का यथार्थ ज्ञान पुस्तकें पढ़नेसे, तर्कयुक्तियोंकी प्रबलतासे या केवल दर्शनोंकी मीमांसासे नहीं हो सकता।*

*इनसे बुद्धिकी प्रखरता तो बढ़ती है; परंतु आगे चलकर वही बुद्धि ऐसे तर्कजालमें फँसा देती है कि फिर बाध्य होकर अभिमान और राग-द्वेषादिका प्रभाव स्वीकार करना पड़ता है और जीवन ही जंजाल बन जाता है।*

*भगवान् सारी गीता कह जानेके बाद अठारहवें अध्यायके अन्तिम भागमें अपने यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिके उपाय बतलाते हैं। गीता तो सुना ही दी थी, फिर आवश्यकता क्या थी उपाय बतलानेकी ?*

*उपाय बतलानेका यही तात्पर्य है कि केवल पढ़नेसे काम नहीं होता, पढ़-सुनकर वैसा करना पड़ेगा, तब भगवान् की 'परा भक्ति' मिलेगी और परा भक्ति मिलनेपर भगवत्कृपासे भगवान् का यथार्थ ज्ञान होगा।*
👍6
हिंदू धर्म के 12 महीनों के नाम

*हिंदी कलेंडर में चैत्र साल का पहला और फाल्गुन साल का आखिरी महीना होता है,,!*
*आइए जानें हिंदू धर्म में आने वाले सभी महीनों के नाम इस प्रकार कितने हैं,, चैत्र, बैसाखी, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन,,!*
*१. चैत्र (मार्च-अप्रैल) :-कई क्षेत्रों में हिंदू नव वर्ष की शुरुआत होती है, जिसे दक्षिण में उगादि और कश्मीर में नवरेह के रूप में मनाया जाता है। भगवान राम के जन्मोत्सव राम नवमी का त्योहार इसी महीने में आता है,,!*
*२. वैशाख (अप्रैल-मई) :- यह महीना विवाह के लिए बहुत शुभ माना जाता है। इस महीने में मनाई जाने वाली अक्षय तृतीया को हिंदू मान्यताओं के अनुसार सबसे शुभ दिनों में से एक माना जाता है,,!*
*३. ज्येष्ठ (मई-जून) :-वट पूर्णिमा के त्योहार के लिए जाना जाता है, जहां विवाहित महिलाएं अपने पतियों की दीर्घायु के लिए दिन भर का उपवास रखती हैं। यह भारत के कई हिस्सों में गर्म, शुष्क मौसम की शुरुआत भी है,,!*
*४. आषाढ़ (जून-जुलाई) :-मानसून के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है। आध्यात्मिक और शैक्षणिक शिक्षकों का सम्मान करने वाला गुरु पूर्णिमा का त्योहार इसी महीने में आता है,,!*
*५. श्रावण (जुलाई-अगस्त) :-अत्यधिक शुभ, रक्षा बंधन जैसे कई त्योहारों से भरा, भाई-बहन के बीच के बंधन का पर्व और भगवान कृष्ण के जन्म का प्रतीक जन्माष्टमी,,!*
*६. भाद्रपद (अगस्त-सितंबर) :-भगवान श्री गणेश के जन्म का पर्व मनाने वाले गणेश चतुर्थी उत्सव के लिए जाना जाता है। गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन उत्सव के समापन का प्रतीक है,,!*
*७. अश्विन (सितंबर-अक्टूबर) :-नवरात्रि उत्सव मनाया जाता है, जिसका समापन दशहरा में होता है, बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है और देवी दुर्गा की पूजा की जाती है,,!*
*८. कार्तिका (अक्टूबर-नवंबर):-प्रकाश के त्योहार दिवाली जो अंधेरे पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह अनुष्ठानिक स्नान, कार्तिक स्नान के लिए भी जाना जाता है,,!*
*९. मार्गशीर्ष (नवंबर-दिसंबर) :-भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित एक पवित्र महीना माना जाता है। यह आध्यात्मिक चिंतन और भक्ति का समय है,,!*
*१०. पौष (दिसंबर-जनवरी) :-उत्तर भारत में लोहड़ी त्योहार के लिए जाना जाता है, जो सर्दियों के अंत और रबी फसलों की कटाई का प्रतीक है,,!*
*११. माघ.(जनवरी-फरवरी) :-बसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाता है, जो ज्ञान और विद्या की देवी सरस्वती को समर्पित है। यह नदियों में अनुष्ठानिक स्नान का भी समय है,,!*
*१२. फाल्गुन (फरवरी-मार्च) :-रंगों के त्योहार होली के लिए मनाया जाता है, जो बसंत के आगमन और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है,,,!*
*इनमें से प्रत्येक महीने का अपना महत्व है, जो ऋतुओं की चक्रीय प्रकृति, कृषि पद्धतियों और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा है, जो भारतीय उपमहाद्वीप में संस्कृति, प्रकृति और देवत्व के बीच गहरे संबंध को दर्शाता है,,!!
👍5
कल्प भेद से रुद्राष्टाध्यायी, नील लोहित रुद्रोपनिषद्, श्वेताश्वतरोपनिषद्, अथर्वशीर्ष रुद्रोपनिषद्, शिव पुराण, लिङ्ग पुराण, स्कन्द पुराण, शिव धर्मोत्तर पुराण, महाभारत तथा अनेक आगम ग्रन्थों में जिसे परम शिव कहा है, उसी को नारायणोपिषद् , त्रिपादविभूति महानारायणोपनिषद्, महोपनिषद्, नृसिंहोपनिषद् , विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत् पुराण, विष्णु धर्मोत्तर तथा महाभारत आदि ग्रन्थों में "महाविष्णु" कहा गया है।

उसी महाविष्णु को व्यास जी ने ब्रह्मवैवर्त पुराण में महाविराट् और विष्णु को (चतुर्भुजी रूप) क्षुद्र विराट् कहा है।

उसी परम तत्त्व को अध्यात्म रामायण, महारामायण, अद्भुत रामायण, आनन्द रामायण, वाल्मीकीय रामायण तथा रामचरितमानस में राम कहा गया है।

उसी परम तत्त्व को ब्रह्माण्ड पुराण तथा गर्ग संहिता आदि ग्रन्थों में गोलोकवासी श्रीकृष्ण कहा गया है

यह तत्त्व एक ही है, किन्तु तत्ववेत्ता एक ही तत्त्व के अनेक नाम, रूप तथा लीला में होने से अनेक रूपों में वर्णन करते हैं।~~

"एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति"
एक ही ब्रह्म को सद्ब्राह्मण बहुत प्रकार से वर्णन करते हैं।

विष्णु शब्द "विश् प्रशेवने" धातु से बना है अर्थात् जो जगत् की सृष्टि करके उसके अणु-अणु में व्याप्त है, उसे विष्णु कहते हैं।

उपनिषदों में आया है कि परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में एक से अनेक होने का संकल्प किया~~~

"एकोऽहं बहुस्यां प्रजायेय""""

"स: तपोऽतप्यत् स: तपस्तप्त्वा इदं सर्वमसृजत् यस्य ज्ञानमयं तप:, यदिदं, किञ्च तद् सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत्।"

उस सोपाधिक ब्रह्म ने सत्व प्रधान माया को अपने अधीन करके इच्छा की कि मैं एक से अनेक हो जाऊं।

निराकार-निर्गुण शुद्ध ब्रह्म में इच्छा नहीं हो सकती, किन्तु उसने सद्-असद् से विलक्षण अनिर्वचनीय माया को अपने अधीन करके निष्काम होने पर भी सकाम के समान कार्य किया।

"किसने इच्छा की ?"

इस शंका का समाधान करते हुए कहते हैं कि जिससे आकाशादि पंच-महाभूत उत्पन्न हुये हैं।

"एक से अनेक कैसे हुआ ?"

इसपर कहते हैं---- जैसे जीव सोने से पूर्व जाग्रत अवस्था में एक होता है किंतु स्वप्न में अनेक हो जाता है।

तब उसने ज्ञानमय तप किया, शरीर-इंद्रियों को तपाने वाला तप परमात्मा का तप नहीं ; किन्तु सृष्टि रचने से पूर्व पिछले कल्प के प्राणियों के शुभाशुभ मिश्रित कर्मों को ज्ञानरूप समाधि से प्रत्यक्ष किया कि किस प्राणी का पूर्व जन्म का कैसा कर्म है।

नई सृष्टि रचने से पूर्व विचार किया कि किस प्राणी को मुझे देव, मनुष्य, तिर्यक् तथा स्थावर योनियों में जन्म देना है, यही परमात्मा का ज्ञानरूपी तप है।

ऐसा तप करके उसने इन सब की रचना की और उसमें प्रवेश किया।

ईश्वर ने जगत् में ऐसे प्रवेश नहीं किया जैसे हम एक कमरे से दूसरे कमरे में प्रवेश करते हैं, परन्तु जैसे कुम्हार मिट्टी का घड़ा बनाता है, घट की दीवारों की उपाधि से महाकाश घटाकाश में प्रवेश करता है ; इसी प्रकार उस सर्वव्यापी परमात्मा का सृष्टि में प्रवेश होता है ; क्योंकि ब्रह्म देश-काल-वस्तु तीनों परिच्छेद से रहित है।

अणु-परमाणु में व्याप्त परम तत्त्व को ही विष्णु कहा गया है।
👍7❤1
जिस स्थानमें सच्चे साधु लोग अधिक बसते हैं, चाहे वे वाणीसे कोई भी उपदेश न देते हों या किसीसे मिलते-जुलते भी न हों, उस स्थानका वायुमंडल शुद्ध और साधु भावोंसे भरा रहता है। जहाँ इसके विपरीत चोर-डाकू, हत्यारा, व्यभिचारी, कपटी, कामी मनुष्य रहते हैं, वहाँका वायुमंडल उन लोगोंके ऊपरसे अच्छे-अच्छे उपदेशकी बातें कहनेपर भी दूषित रहता है। जो सर्वथा लोकसमाजसे अलग और मौन रहते हैं, परंतु जिनका अंतःकरण केवल भगवद्भावोंसे भरा होता है, उनके अंदरसे निकली हुई भगवद्भावोंकी किरणें सारे वायुमंडलमें फैलकर वहाँ सर्वत्र सदाचार, साधुशील और भगवत्प्रेमकी ज्योति छिटका देती हैं और उसके प्रकाशको पाकर पामर प्राणी भी कृतार्थ हो जाते हैं।
👍7👏1
सत्य को चुनें

🕉️ सत्य का मार्ग ही सृजन का मार्ग है,सत्य का मार्ग ही साहस का मार्ग है और सत्य का मार्ग ही आत्मकल्याण का मार्ग भी है। गलत दिशा की ओर हजार कदम चलने की अपेक्षा लक्ष्य की ओर चार कदम चलना श्रेष्ठ है।सत्य के मार्ग में विघ्न - बाधाएँ अवश्य आयेंगी पर जीवन दिग्भ्रमित होने से बच जायेगा।जीवन में लक्ष्य विहीन गति का नाम ही तो भटकाव है।

🕉️ सत्य के मार्ग का अनुकरण सबके बस की बात नहीं इसलिए सत्य का मार्ग आपको दुनिया की भीड़ से भी बचा लेता है।सत्य के मार्ग पर चलने से व्यर्थ उसी प्रकार छूट जाता है जिस प्रकार सूर्योदय होने से अंधकार स्वतः मिट जाता है।केवल गति महत्वपूर्ण नहीं, श्रेष्ठ मार्ग का चयन भी महत्वपूर्ण है। जो सत्य की राह पर चलते हैं उन्हें एक दिन सच्चिदानंद अवश्य मिल जाते हैं
👍7👏3🙏2
#_तत्त्वासार_

वास्तव मे सृष्टि मे एक ब्रह्म की ही सत्ता है जो विभिन्न रूपों मे अभिव्यक्त हुआ है । इसलिए सभी रूप उससे भिन्न नही है बल्कि भ्रम के कारण आत्मज्ञान के अभाव के कारण ये भिन्न भिन्न प्रतीत होते है । इसी प्रकार शरीर भी भ्रम वश उससे भिन्न प्रतीत होता है तथा जिस भ्रम के कारण प्रतीत होने वाले की सत्ता नही होती ,जिस भ्रम से रस्सी मे सर्प दिखाई देता है किन्तु उसमे सर्प की सत्ता नही होती ,वह रस्सी ही है ।इसी प्रकार शरीर भी भ्रम मात्र ही है ।
जिनको ऐसी शंका होती है कि यदि ज्ञान से अज्ञान का मूल सहित नाश हो जाता है, तो ज्ञानी का यह देह स्थूल कैसे रह जाता है उन मूर्खों को समझाने के लिए श्रुति ऊपरी दृष्टि ऊपरी दृष्टि से प्रारब्ध को उसका कारण बता देती है वह विद्वान को देहादि का सत्य स्व समझाने के लिए ऐसा नही कहती ; क्योंकि श्रुति का अभिप्राय तो एकमात्र परमार्थ वस्तु का वर्णन करने से ही है।
ज्ञानी और अज्ञानी को समझाने की भाषा मे भिन्नता रखनी ही पड़ती है। जिस भाषा मे ज्ञानी अथवा विद्वान को समझाया जाता है उस भाषा मे मूर्ख को नही समझाया जा सकता ।उसको भिन्न प्रतीकों, उदाहरणों के द्वारा ही समझाया जाता है। इसलिए श्रुतियों मे प्रारब्ध को शरीर का कारण बताया गया है वह अज्ञानियों के लिए है। आत्मज्ञानी को यही कहा जाता है, कि सब कुछ ब्रह्म ही है तथा शरीर, प्रारब्ध आदि भ्रममात्र है जिसका को अस्तित्व नही है।
किन्तु अज्ञानी इसे नही मान सकता क्या कि वह शरीर को ही अपना स्वरूप मानता है इसलिए उसको समझाने के लिए प्रारब्ध की बात कही गई है ज्ञानी के लिए प्रारब्ध जैसी कोई वस्तु ही नही है बल्कि सभी आत्मा ही है एवं आत्मा का कोई प्रारब्ध नही होता है ।
यदा नास्ति स्वयंकर्त्ता,कारण, न जगत बीजम,।अव्यक्तं च परं शिवम, अनामा विद् यते तदा ।।
जब कोई कर्ता नही होता , कार्य के अभाव मे जगत की उत्पत्ति करने वाला कारण भी नही होता, तब वह सदा शिव एवं नाम रहित होता है ।
यह वर्णन अव्यक्त विभु परमतेजोमय शाश्वत तत्त्व के अनन्त फैलाव से तात्पर्यित है। एक परमतेजोमय , परम सुक्ष्म, कालातीत, भौतिक गुणों से रिक्त, निर्गुण, निष्क्रिय तत्त्व, जहां तक स्थान है वहाँ तक विधमान है। स्थान का कोई अन्तः नही इसलिए इस तत्त्व के अस्तित्व को भी कोई छोर नही है। यह अनन्त है कालातीत है सदा से है सदा रहेगा यह न जन्म लेता है न उत्पन्न होता है, न मृत होता है यही वैदिक परमात्मा का ही वर्णन है।
आत्मा को वैदिक संस्कृति सार के अर्थ मे लेती रही है इस तरह परमात्मा का अर्थ परमसार । इस सृष्टि का जो परमसार है, सृष्टि जिसमे उत्पन्न होती है उस परमसार तत्त्व मे न कोई कर्ता होता है, और नही कोई कर्ता के अभाव मे क्रिया होती है । यह उसकी अव्यक्त अवस्था है इस समय न सृष्टि मे बीज उत्पन्न होता ,न उसके कारण का अस्तित्व होता नवार्णमन्त्र की व्यापकता १- यह सांसारिक सुख और मोक्ष दोनों को देने वाला मन्त्र है।
-२- इस मन्त्र का जप किसी भी वर्ण,जाति,धर्म, सम्प्रदाय, मान्यता वाला व्यक्ति कर सकता है।
३- यह भी गायत्री मंत्र की तरह अपने भीतर गुप्त रूप से २४ वर्णाक्षरों को समेट रखा है।
४-जैसे सावित्री मन्त्र में ब्रह्मा,विष्णु,महेश समाहित हैं वैसे ही नवार्ण में भी ये तीनों देव हैं।
५- यह ब्रह्मस्वरूपिणी महाशक्ति का मन्त्र है,जो सगुणरूप में महाकाली,महालक्ष्मी, महासरस्वती होती है।
( ॐ रहित नवार्ण का जप श्रेयस्कर )
प्रमुख नौ अक्षरों वाला यह मन्त्र है।इसमें ॐ लगाने से यह दशार्ण मन्त्र हो जाता है।
मूलमंत्र--- ऐम् ह्रीम् क्लीम् चामुण्डायै विच्चे --
यह मूलनवार्ण है।इसीसे सप्तशती का सम्पुटितपाठ किया जाता है। इससे देवीजी का हवन भी किया जाता है।
( यह गुप्त देवी गायत्री है ) ------
महान साधक श्री भास्कर राय ने इसमें प्रत्यक्ष ९ स्वर , ४ बिंदु ( म् ) और ११ व्यंजन लेकर २४ वर्णाक्षर माना है।
*-- ऐम् वाग्बीज है जो योनि (जगत्कारण)स्वरूप है।
*-- ह्रीम् मायास्वरूप है जिससेसृष्टि बढ़ती घटतीरहती है
*--- क्लीम् काम या ब्रह्मा रूप है।
*--- अ नारायण का वाचक है।
*---- य वायु का वाचक है।
*----- ह देवी का स्वरूप है।
*----- र अग्नि का वाचक है।
*----- ई लक्ष्मी का वाचक है।
*----- ल इन्द्र का वाचक है।ऐ , म् , ह , र , ई , म् , क , ल , ई , म् , च , आ , म ,उ , म् , ड , आ , य ,ऐ , व , इ , च् , च , ए ।। ये कुल २४ वर्णाक्षर हैं।
इस मन्त्र की साधना चार काल में की जाती है--- प्रातः , मध्याह्न , सायं और मध्यरात्रि। अतः नवार्ण मन्त्र को ब्रह्म प्रणव ( ॐ ) रहित जप कर सिद्ध करना चाहिए।यह भगवती महाशक्ति का ब्रह्ममय विग्रह है।
इसी तरह देवीकवचं भी त्रिकाल पाठ करने से सिद्ध होता है।केवल एक काल पाठ से इसका व्यापक लाभ नहीं हो पाता। दुर्गासप्तशती का अंग पाठ के रूप में करने से कवच, अर्गला, और कीलक अपना पूर्ण फल देते हैं।
👍4❤2🙏2
विशेष-- जप माला के पहले मनके पर ॐ लगाना चाहिए और एक सौ आठवे पर ॐ लगाना चाहिए।
साधना के पूर्व ३ बार हरि ॐ क्यों?

मंत्र अनुष्ठानों को प्रारम्भ करने के पूर्व प्रबुद्ध साधक तीन बार 'हरि ॐ' का पूरे स्वर से व पूरी एकाग्रता से गुंजरण करते हैं। उनकी यह क्रिया वेदसम्मत भी है, वैविक प्रणाली के अनुसार मंत्रों एवं वैदिक ऋचाओं का अशुद्ध उच्चारण करने से महापातक लगता है। साधक के अति सावधान व सतर्क रहने पर भी आलस्यवश अथवा साधना में पूर्ण एकाग्रता न होने से मंत्रोच्चारण में अस्पष्टता या अशुद्धि आ जाना स्वाभाविक ही है। इसी सम्भावित दोष की निवृत्ति के लिए ऋषियों ने मंत्र अनुष्ठान अथवा वेद पाठादि के पूर्व एवं समापन पर 'हरि ॐ' शब्द का उच्चारण करने उचित एवं अनिवार्य बताया है।
मंत्रोच्चारण, विधि विधान, देशकाल और वस्तु की कमी के कारण साधनानुष्ठानों में जो कमी हो, वह 'हरि' एवं आदि मंत्र 'ॐ' के गुंजरण से वे बाधायें या कमियां सभी दूर हो जाती है। मंत्र जप में मन का एकाग्र होना भी आवश्यक है, तभी अपेक्षित लाभ मिल पाता है और 'हरि ॐ' के तीन बार पूरी सांस खींचते हुए गुंजरण करने से एक तरह की ध्यानावस्था में साधक स्थित हो जाता है, अतः 'हरि ॐ' का गुंजरण साधक को अपने दैनिक साधनात्मक क्रिया में सम्मिलित करना ही चाहिए।
👍2🙏1
*पूर्ण विकास की १६ सीढ़ियाँ*

* ये १६ बातें समझ लें तो आपका पूर्ण विकास चुटकी में होगा ।*

* (१) आत्मबल : अपना आत्मबल विकसित करने के लिए 'ॐ... ॐ.... ॐ... ॐ... ॐ...' ऐसा जप करें ।*

* (२) दृढ़ संकल्प : कोई भी निर्णय लें तो पहले तीसरे नेत्र पर (भ्रूमध्य में आज्ञाचक्र पर) ध्यान करें फिर निर्णय लें और एक बार कोई भी छोटे-मोटे काम का संकल्प करें तो उसमें लगे रहें ।*

* (३) निर्भयता : भय आये तो उसके भी साक्षी बन जायें और उसे झाड़कर फेंक दें । यह सफलता की कुंजी है ।*

* (४) ज्ञान : आत्मा-परमात्मा और प्रकृति का ज्ञान पा लें । यह शरीर 'क्षेत्र' है और आत्मा 'क्षेत्रज्ञ' है । इस शरीररूपी खेत के द्वारा हम कर्म करते हैं अर्थात् बीज बोते हैं और फिर उसके फल मिलते हैं । तो हम क्षेत्रज्ञ हैं शरीर को और कर्मों को जाननेवाले हैं । प्रकृति परिवर्तित होनेवाली है और हम एकरस है। बचपन परिवर्तित हो गया, हम उसको जाननेवाले वही-के-वही हैं । गरीबी अमीरी चली गयी, सुख-दुःख चला गया लेकिन हम हैं अपने- आप, हर परिस्थिति के बाप। ऐसा दृढ़ विचार करने से, ज्ञान का आश्रय लेने से आप निर्भय और निःशंक होने लगेंगे ।*

* (५) नित्य योग : नित्य योग अर्थात् आप भगवान में थोड़ा शांत होइये और 'भगवान नित्य हैं, आत्मा नित्य है और शरीर मरने के बाद भी मेरा आत्मा रहता है' इस प्रकार नित्य योग की स्मृति करें ।*

* (६) ईश्वर-चिंतन : सत्यस्वरूप ईश्वर का चिंतन करें ।*

* (७) श्रद्धा : सत्शास्त्र, भगवान और गुरु में श्रद्धा यह आपके आत्मविकास का बहुमूल्य खजाना है ।*

* (८) ईश्वर विश्वास : ईश्वर में विश्वास रखें । जो हुआ, अच्छा हुआ, जो हो रहा है, अच्छा है और जो होगा वह भी अच्छा होगा, भले हमें अभी, इस समय बुरा लगता है । विघ्न-बाधा, मुसीबत और कठिनाइयों आती हैं तो विष की तरह लगती हैं लेकिन भीतर अमृत सैंजोये हुए होती हैं । इसलिए कोई भी परिस्थिति आ जाय तो समझ लेना, 'यह हमारी भलाई के लिए आयी है ।' आँधी-तूफान आया है तो फिर शुद्ध वातावरण भी आयेगा ।*

* (९) सदाचरण : वचन देकर मुकर जाना, झूठ-कपट, चुगली करना आदि दुराचरण से अपने को बचाना ।*

* १०) संयम : पति-पत्नी के व्यवहार में, खाने-पीने में संयम रखें । इससे मनोबल, बुद्धिबल, आत्मबल का विकास होगा ।*

* (११) अहिंसा : वाणी, मन, बुद्धि के द्वारा किसीको चोट न पहुंचायें । शरीर के द्वारा जीव- जंतुओं की हत्या, हिंसा न करें ।*

* (१२) उचित व्यवहार : अपने से श्रेष्ठ पुरुषों का आदर से संग करें । अपने से छोटों के प्रति उदारता, दया रखें । जो अच्छे कार्य में, दैवी कार्य में लगे हैं उनका अनुमोदन करें और जो निपट निराले हैं उनकी उपेक्षा करें । यह कार्यकुशलता में आपको आगे ले जायेगा ।*

* (१३) सेवा-परोपकार : आपके जीवन में परोपकार, सेवा का सद्‌गुण होना चाहिए । स्वार्थरहित भलाई के काम प्रयत्नपूर्वक करने चाहिए । इससे आपके आत्मसंतोष, आत्मबल का विकास होता है ।*

* (१४) तप : अपने जीवन में तपस्या लाइये । कठिनाई सहकर भी भजन, सेवा, धर्म-कर्म आदि में लगना चाहिए ।*

* (१५) सत्य का पक्ष लेना : कहीं भी कोई बात हो तो आप हमेशा सत्य, न्याय का पक्ष लीजिये । अपनेवाले की तरफ ज्यादा झुकाव और परायेवाले के प्रति क्रूरता करके आप अपनी आत्मशक्ति का गला मत घोटिये । अपनेवाले के प्रति न्याय और दूसरे के प्रति उदारता रखें ।*

* (१६) प्रेम व मधुर स्वभाव : सबसे प्रेम व मधुर स्वभाव से पेश आइये ।*

* ये १६ बातें लौकिक उन्नति, आधिदैविक उन्नति और आध्यात्मिक अर्थात् आत्मिक उन्नति आदि सभी उन्नतियों की कुंजियाँ हैं ।*

🌞 *" ll जय श्री राम ll "*
👍5❤2👏2🙏1
चार वेद और उसके चार उपवेद ।

" आध्वर्यवं यजुर्भिस्तु ऋग्भिर्होत्रं तथा मुनिः ।
औद्गात्रं सामभिश्चक्रे ब्रह्मत्वं चाप्यथर्वभिः ।। "
☛ श्री व्यास जी ने यजुः से अध्वर्यु के -- ऋक् से होता के -- साम से उद्गाता के तथा अथर्व से ब्रह्मा के कर्म की व्यवस्था की है ।

ऋग्वेद:---
" ऋग्रूपा यत्र ये मन्त्राः पादयोऽर्द्धर्चशोऽपि वा ।
येषां होत्रं स ऋग्भागः हमाख्यानं च यत्र वा ।।"
☛ जिसमें ऋचा स्वरूप स्तुतिपरक मंत्र हों - अथवा जो एक चरण या आधी ऋचा के रूप में पढ़ा जाता हो - तथा जिन मंत्रों के द्वारा होम किया जाता हो - जिन में अच्छी तरह आख्यान कहा गया हो - जो होत्रप्रयोग का सम्पादक हो - वह " ऋग्वेद " कहलाता है ।

यजुर्वेद :---
" प्रश्लिष्टपठिता मन्त्रा वृतगीतिविवर्जिताः ।
आध्वर्यवं यत्र कर्म त्रिगुणं यत्र पाठनम् ।।
मन्त्रब्राह्मणयोरेव यजुर्वेदः स उच्यते ।। "
☛ जिसमें अलग - अलग मंत्र पढे जाते हों-- जो मंत्र छंद और गान से रहित हों - आध्वर्यप्रयोग का सम्पादक हो तथा जिसमें मंत्र और ब्राह्मण भाग का तीन आवृति के साथ पाठ होता हो - उसे " यजुर्वेद " कहते हैं ।

सामवेद :---
" उद्गीथं यस्य शस्त्रादेर्यज्ञे तत्सामसंज्ञितम् ।।"
☛ जिसमें शास्त्रादि की स्तुति उच्चस्वर से गाकर जिस संहिता में की जाती हो अर्थात् जो औद्गात्रप्रयोग का सम्पादक हो - उसे " सामवेद " कहा जाता है ।

अथर्ववेद :---
" अथर्वाङ्गिरसो नाम ह्युपास्योपासनात्मकः ।
इति वेदचतुष्कन्तु ह्युद्दिष्टञ्च समासतः ।।"
☛ वेद के जिस भाग में उपासनीय देवताओं का तथा उनकी उपासना का वर्णन हो - उसे अथर्वाङ्गिरा अर्थात् अथर्ववेद कहते हैं ।

इस प्रकार संक्षेप में चारों वेदों का रूप बताया गया है ।

उपवेद

ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद :---

इसमें रोगों के लक्षण- उपयुक्त औषधि और चिकित्साज्ञान प्राप्त है ---
ब्रह्मा - प्रजापति - अश्विनीकुमार - धन्वतरी आदिक हैं-- चरक -- वाङ्ग्भट्टादिकृत चिकित्सा शास्त्र भी आयुर्वेद हैं और ---
वात्स्यायन कृत कामशास्त्र भी आयुर्वेद के अंतर्गत है -- क्यों ? -- क्यों कि काम शास्त्र का विषय वाजीकरण स्तंभनादिक भी चरकादिक ने कथन किये हैं--

( उस आयुर्वेद का वैराग्य में ही अभिप्राय है-- इसलिए कि आयुर्वेद की रीति से रोगादिक की निवृत्ति होने से भी फिर रोगादिक उत्पन्न होते हैं-- इससे लौकिक उपाय तुच्छ हैं और औषधादिक का दान करने से पुण्य लाभ होने से अंतःकरण की शुद्धि होती है जो ज्ञान में उपयोगी है )

यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद :---
इस उपवेद के ज्ञान से मानव युद्ध में आयुधप्रहार
और सैन्यसंस्थापनरचना में कुशल होता है---
यह उपवेद ब्रह्मा जी से महर्षि विश्वामित्र को प्राप्त हुआ ---
आयुध चार प्रकार के हैं-- मुक्त -- अमुक्त -- मुक्तामुक्त -- यंत्रमुक्त ।
चक्रादिक जो फैंककर चलाये जाते हैं वे मुक्त कहे
गये हैं ।
खड्ग- तलवारादि अमुक्त है ।
बरछीआदिक मुक्तामुक्त हैं ।
शर - गोली आदिक यंत्रमुक्त हैं ।

फैंक कर चलाने वाले अस्त्र कहे जाते हैं-- हाथ में पकड कर चलाये जाने वाले शस्त्र कहलाते हैं--
( दुष्ट- चोर आदि से प्रजापालन क्षत्रिय का धर्मबोधक धनुर्वेद है -- धर्मपालन में सहायक होने से अंतःकरण की शुद्धि करके मोक्ष में भी इसका अभिप्रायः है )

सामवेद का उपवेद गान्धर्ववेद :---
इस उपवेद को भरत ने प्रकट किया-- इसमें स्वर - ताल - उदात्त - स्वरित - स्वर तथा वीणा और कण्ठ से निकले निषादादि - स- रे - ग - म - प - ध - नि - इन सात स्वरों में ताल के साथ गाने में कुशल होता है--
( देवाराधन - निर्विकल्प समाधि की सिद्धि गन्धर्ववेद का प्रयोजन कहा है- इससे इसका भी अंतःकरण की एकाग्रता करके ज्ञान द्वारा मोक्ष ही प्रयोजन है )

अथर्ववेद का उपवेद अर्थवेद - तन्त्र या आगम :---
ये उपवेद भी नानाप्रकार के हैं -- जिसमें अनेक प्रकार के उपास्यदेवों के मंत्रों के प्रयोग तथा मारण - मोहन - उच्चाटन- विद्वेषण - आकर्षण और स्तम्भन - इन प्रयोगों के भेद - प्रयोग तथा उपसंहार धर्म तथा नियम के साथ वर्णित हों - उसे अर्थ या तन्त्र कहते हैं---
नीतिशास्त्र - सूपकारशास्त्र - अश्वशास्त्र - शिल्पशास्त्र - से लेकर धन प्राप्ति के सब उपाय बोधक शास्त्र अर्थवेद हैं---
( धन प्राप्ति के सब उपाय में निपुण पुरूष भी प्रारब्ध बिना धन की प्राप्ति नहीं कर सकता-- इससे अर्थवेद का भी वैराग्य में ही तात्पर्य है ।
👍5❤1
सोमवार विशेष

भगवान् शिवजी पंचदेवों में प्रधान, अनादि सिद्ध परमेश्वर, एवम् निगमागम सभी शास्त्रों में महिमामण्डित महादेव हैं, वेदों ने अव्यक्त, अजन्मा, सबका कारण, विश्वपंच का स्रष्टा, पालक एवम् संहारक कहकर उनका गुणगान किया है, श्रुतियों ने सदा शिवजी को स्वयम्भू, शान्त, प्रपंचातीत, परात्पर, परमतत्त्व, ईश्वरों के भी परम महेश्वर कहकर स्तुति की है, शिव का अर्थ ही है- "कल्याणस्वरूप" और "कल्याणप्रदाता" भगवान् शिवजी देवों के भी देव हैं।

भगवान् शिवजी वैसे तो परिवार के देवता कहे गयें है, लेकिन फिर भी श्मशान में निवास करते हैं, भगवान् शिवजी के सांसारिक होते हुए भी श्मशान में निवास करने के पीछे जीवन मंत्र का एक गूढ़ सूत्र छिपा है, संसार मोह-माया का प्रतीक है जबकि श्मशान वैराग्य का, भगवान् शिवजी कहते हैं कि संसार में रहते हुये अपने कर्तव्य पूरे करो, लेकिन मोह-माया से दूर रहो।

क्योंकि ये संसार तो नश्वर है, एक न एक दिन ये सबकुछ नष्ट होने वाला है, इसलिये संसार में रहते हुए भी किसी से मोह मत रखो और अपने कर्तव्य पूरे करते हुए वैरागी की तरह आचरण करो, शिवजी को संहार का देवता कहा गया है, अर्थात जब मनुष्य अपनी सभी मर्यादाओं को तोड़ने लगता है तब शिवजी उसका संहार कर देते हैं, जिन्हें अपने पाप कर्मों का फल भोगना बचा रहता है वे ही प्रेतयोनि को प्राप्त होते हैं।

चूंकि शिवजी संहार के देवता हैं, इसलिये इनको दंड भी वे ही देते हैं, इसलिये शिवजी को भूत-प्रेतों का देवता भी कहा जाता है, दरअसल यह जो भूत-प्रेत है वह कुछ और नहीं बल्कि सूक्ष्म शरीर का प्रतीक है, भगवान् शिवजी का यह संदेश है कि हर तरह के जीव जिससे सब घृणा करते हैं या भय करते हैं, वे भी शिवजी के समीप पहुंच सकते हैं, केवल शर्त है कि वे अपना सर्वस्व भगवान् शिवजी को समर्पित कर दें।

भगवान् शिवजी जितने रहस्यमयी हैं, उनके वस्त्र व आभूषण भी उतने ही विचित्र हैं, सांसारिक लोग जिनसे दूर भागते हैं, भगवान् शिवजी उसे ही अपने साथ रखते हैं, भगवान शिवजी एकमात्र ऐसे देवता हैं जो गले में नाग धारण करते हैं, देखा जाए तो नाग बहुत ही खतरनाक प्राणी है, लेकिन वह बिना कारण किसी को नहीं काटता, नाग पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण जीव है, जाने-अंजाने में ये मनुष्यों की सहायता ही करता है।

कुछ लोग डर कर या अपने निजी स्वार्थ के लिए नागों को मार देते हैं, जीवन मंत्र के दृष्टिकोण से देखा जाये तो भगवान् शिवजी नाग को गले में धारण कर ये संदेश देते हैं, कि जीवन चक्र में हर प्राणी का अपना विशेष योगदान है, इसलिये बिना वजह किसी प्राणी की हत्या न करें, त्रिशूल भगवान् शिवजी का प्रमुख अस्त्र है, यदि त्रिशूल का प्रतीक चित्र देखें तो उसमें तीन नुकीले सिरे दिखते हैं, यूं तो यह अस्त्र संहार का प्रतीक है पर वास्तव में यह बहुत ही गूढ़ बात बताता है।

संसार में तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं- सत, रज और तम, सत मतलब सात्विक, रज मतलब सांसारिक और तम मतलब तामसी अर्थात निशाचरी प्रवृति, हर मनुष्य में ये तीनों प्रवृत्तियां पायीं जाती हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी मात्रा में अंतर होता है, त्रिशूल के तीन नुकीले सिरे इन तीनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, त्रिशूल के माध्यम से भगवान शिव यह संदेश देते हैं कि इन गुणों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण हो, यह त्रिशूल तभी उठाया जाये जब कोई मुश्किल आये, तभी इन तीन गुणों का आवश्यकता अनुसार उपयोग हो।

देवताओं और दानवों द्वारा किये गयें समुद्र मंथन से निकला विष भगवान् शंकरजी ने अपने कंठ में धारण किया था, विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुयें, समुद्र मंथन का अर्थ है? अपने मन को मथना, विचारों का मंथन करना, मन में असंख्य विचार और भावनाएं होती हैं, उन्हें मथ कर निकालना और अच्छे विचारों को अपनाना, हम जब अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही निकलेंगे।

यही विष हैं, विष बुराइयों का प्रतीक है, शिवजी ने उसे अपने कंठ में धारण किया, उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया, शिव का विष पीना हमें यह संदेश देता है कि हमें बुराइयों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिये, बुराइयों का हर कदम पर सामना करना चाहिये, शिवजी द्वारा विष पीना यह भी सीख देता है कि यदि कोई बुराई पैदा हो रही हो तो हम उसे दूसरों तक नहीं पहुंचने दें।

भगवान् शंकरजी का वाहन नंदी यानी बैल है, बैल बहुत ही मेहनती जीव होता है, वह शक्तिशाली होने के बावजूद शान्त एवम भोला होता है, वैसे ही भगवान् शिवजी भी परमयोगी एवं शक्तिशाली होते हुये भी परम शान्त एवम् इतने भोले हैं कि उनका एक नाम भोलेनाथ भी जगत में प्रसिद्ध है, भगवान् शंकरजी ने जिस तरह कामदेव को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त की थी, उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता, उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है।
❤3👍1
साथ ही नंदी को पुरुषार्थ का भी प्रतीक माना गया है, कड़ी मेहनत करने के बाद भी बैल कभी थकता नहीं, वह लगातार अपने कर्म करते रहता है, इसका अर्थ है कि हमें भी सदैव अपना कर्म करते रहना चाहिये, कर्म करते रहने के कारण जिस तरह नंदी शिवजी को प्रिय है, उसी प्रकार हम भी भगवान् शंकरजी की कृपा पा सकते हैं, भगवान् शिवजी का एक नाम भालचंद्र भी प्रसिद्ध है, भालचंद्र का अर्थ है मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाला।

चंद्रमा का स्वभाव शीतल होता है, चंद्रमा की किरणें भी शीतलता प्रदान करती हैं, जीवन मंत्र के दृष्टिकोण से देखा जाये तो भगवान् शिवजी कहते हैं कि जीवन में कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न आ जाये, दिमाग हमेशा शान्त ही रखना चाहिये, यदि दिमाग शान्त रहेगा तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल भी निकल आयेगा, ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है, मन की प्रवृत्ति बहुत चंचल होती है।

भगवान् शिवजी का चंद्रमा को धारण करने का अर्थ है कि मन को सदैव अपने काबू में रखना चाहिये, मन भटकेगा तो लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पायेगी, जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह अपने जीवन में कठिन से कठिन लक्ष्य भी आसानी से पा लेता है, धर्म ग्रंथों के अनुसार, सभी देवताओं की दो आंखें हैं, लेकिन एकमात्र शिवजी ही ऐसे देवता हैं जिनकी तीन आंखें हैं, तीन आंखों के कारण भगवान् शिवजी को त्रिनेत्रधारी भी कहते हैं।

जीवन मंत्र की दृष्टि से देखा जाये तो शिवजी का तीसरा नेत्र प्रतीकात्मक है, आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में आने वाली मुसीबतों से सावधान करना, जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं, जिन्हें हम समझ नहीं पाते, ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराते हैं, यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है, यहीं हमारा तीसरा नेत्र है, बस जरूरत है उसे जगाने की।

हमारे धर्म शास्त्रों में जहां सभी देवी-देवताओं को वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है, वहीं भगवान् शंकरजी को सिर्फ मृग चर्म लपेटे और भस्म लगाये बताया गया है, भस्म शिवजी का प्रमुख वस्त्र भी है, क्योंकि शिवजी का पूरा शरीर ही भस्म से ढंका रहता है, शिवजी का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक कारण भी हैं, भस्म की एक विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है।

इसका मुख्य गुण है कि इसको शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती, भस्म त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम करती है, भस्मी धारण करने वाले शिवजी यह संदेश भी देते हैं, कि परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना ही मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है, भगवान् शिवजी को भांग-धतूरा मुख्य रूप से चढ़ाया जाता है, ऐसा माना जाता है कि भगवान् को भांग-धतूरा चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं।

भांग व धतूरा नशीले पदार्थ हैं, आमजन इनका सेवन नशे के लिये करते हैं, जीवन मंत्र के अनुसार, भगवान शिव को भांग-धतूरा चढ़ाने का अर्थ है अपनी बुराइयों को भगवान को समर्पित करना, यानी अगर आप किसी प्रकार का नशा करते हैं तो इसे भगवान् को अर्पित करे दें, और भविष्य में कभी भी नशीले पदार्थों का सेवन न करने का संकल्प लें, ऐसा करने से भगवान् की कृपा आप पर बनी रहेगी और जीवन सुखमय होगा।

शिवपुराण और सभी ग्रंथों में भगवान् शिवजी को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व बताया गया है, तीन पत्तों वाला बिल्व पत्र ही शिवजी के पूजन में उपयुक्त माना गया है, यह भी ध्यान रखना चाहिये कि बिल्वपत्र के तीनों पत्ते कहीं से कटे-फटे न हो, जीवन मंत्र के दृष्टिकोण से देखा जाये तो बिल्व पत्र के ये तीन पत्ते चार पुरुषार्थों में से तीन का प्रतीक हैं- धर्म, अर्थ व काम।

जब आप ये तीनों निस्वार्थ भाव से भगवान् शिवजी को समर्पित कर देते हैं तो चौथा पुरुषार्थ यानी मोक्ष अपने आप ही प्राप्त हो जाता है, शिवपुराण के अनुसार, भगवान् शिवजी कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं, पर्वतों पर आम लोग नहीं आते-जाते, सिद्ध पुरुष ही वहां तक पहुंच पाते हैं, भगवान् शिवजी भी कैलाश पर्वत पर योग में लीन रहते हैं।

जीवन मंत्र की दृष्टि से देखा जाए तो पर्वत प्रतीक है एकान्त व ऊँचाई का, यदि आप किसी प्रकार की सिद्धि पाना चाहते हैं, तो इसके लिये आपको एकांत स्थान पर ही साधना करनी चाहिये, ऐसे स्थान पर साधना करने से आपका मन भटकेगा नहीं और साधना की उच्च अवस्था तक पहुंच जाओगे, भगवान् शिवजी के नाम का स्मरण और पूजा से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है, तथा इस जीवन में बड़े-बड़े उत्कृष्ट भोगों का उपभोग करके अन्त में शिवलोक को प्राप्त कर लेता है।
❤3👍1
* तिलक चार प्रकार के होते हैं *
१- कुमकुम
२- केशर
३- चंदन
४- भस्म

*कुमकुम* - हल्दी चुना मिलकर बना होता है जो हमारे आज्ञा चक्र की शुद्धि करते हुए उसे केल्शियम देते हुए ज्ञान चक्र को प्रज्व्व्लित करता है।

*केशर* - जिसका मस्तिष्क ठंडा शीतल होता है उसको केसर का तिलक प्रज्ज्वलित करता है।

*चंदन* - दिमाग को शीतलता प्रदान करते हुए मानसिक शान्ति भी देता है।

*भस्मी*- वैराग्य की अग्रसर करते हुए मस्तष्क के रोम कूपों के विषाणुओं को भी नष्ट करता है।

*तिलक* हिंदू संस्कृति में एक पहचान चिन्ह का काम करता है। तिलक केवल धार्मिक मान्यता नहीं है बल्कि कई वैज्ञानिक कारण भी हैं इसके पीछे। तिलक केवल एक तरह से नहीं लगाया जाता। हिंदू धर्म में जितने संतों के मत हैं, जितने पंथ है, संप्रदाय हैं, उन सबके अपने अलग-अलग तिलक होते हैं। आइए जानते हैं कितनी तरह के होते हैं- तिलक सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक होते हैं।

शैव- शैव परंपरा में ललाट पर *चंदन* की आड़ी रेखा या त्रिपुंड लगाया जाता है।

शाक्त- शाक्त *सिंदूर* का तिलक लगाते हैं। *सिंदूर* उग्रता का प्रतीक है। यह साधक की शक्ति या तेज बढ़ाने में सहायक माना जाता है।

वैष्णव- वैष्णव परंपरा में *चौंसठ* प्रकार के तिलक बताए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं -

*लालश्री तिलक* - इसमें आसपास चंदन की व बीच में कुंकुम या हल्दी की खड़ी रेखा बनी होती है।

*विष्णुस्वामी तिलक* - यह तिलक माथे पर दो चौड़ी खड़ी रेखाओं से बनता है। यह तिलक संकरा होते हुए भोहों के बीच तक आता है।

*रामानंदि तिलक* - विष्णुस्वामी तिलक के बीच में कुंकुम से खड़ी रेखा देने से रामानंदी तिलक बनता है।

*श्यामश्री तिलक* - इसे कृष्ण उपासक वैष्णव लगाते हैं। इसमें आसपास गोपीचंदन की तथा बीच में काले रंग की मोटी खड़ी रेखा होती है।

*अन्य तिलक* - "गाणपत्य, तांत्रिक, कापालिक" आदि के भिन्न तिलक होते हैं। साधु व संन्यासी भस्म का तिलक लगाते हैं।
👍8
शिवलिंग पर बने त्रिपुण्ड की तीन रेखाओं का रहस्य

⚘️प्राय: साधु-सन्तों और विभिन्न पंथों के अनुयायियों के माथे पर अलग- अलग तरह के तिलक दिखाई देते हैं । तिलक विभिन्न सम्प्रदाय, अखाड़ों और पंथों की पहचान होते हैं । हिन्दू धर्म में संतों के जितने मत, पंथ और सम्प्रदाय है उन सबके तिलक भी अलग-अलग हैं । अपने-अपने इष्ट के अनुसार लोग तरह-तरह के तिलक लगाते हैं ।

शैव परम्परा का तिलक कहलाता है त्रिपुण्ड …..

भगवान शिव के मस्तक पर और शिवलिंग पर सफेद चंदन या भस्म से लगाई गई तीन आड़ी रेखाएं त्रिपुण्ड कहलाती हैं । ये भगवान शिव के श्रृंगार का हिस्सा हैं । शैव परम्परा में शैव संन्यासी ललाट पर चंदन या भस्म से तीन आड़ी रेखा त्रिपुण्ड् बनाते हैं ।

बीच की तीन अंगुलियों से भस्म लेकर भक्तिपूर्वक ललाट में त्रिपुण्ड लगाना चाहिए । ललाट से लेकर नेत्रपर्यन्त और मस्तक से लेकर भौंहों (भ्रकुटी) तक त्रिपुण्ड् लगाया जाता है

भस्म मध्याह्न से पहले जल मिला कर, मध्याह्न में चंदन मिलाकर और सायंकाल सूखी भस्म ही त्रिपुण्ड् रूप में लगानी चाहिए ।

त्रिपुण्ड की तीन आड़ी रेखाओं का रहस्य

त्रिपुण्ड् की तीनों रेखाओं में से प्रत्येक के नौ-नौ देवता हैं, जो सभी अंगों में स्थित हैं ।

1- पहली रेखा—गार्हपत्य अग्नि, प्रणव का प्रथम अक्षर अकार, रजोगुण, पृथ्वी, धर्म, क्रियाशक्ति, ऋग्वेद, प्रात:कालीन हवन और महादेव—ये त्रिपुण्ड की प्रथम रेखा के नौ देवता हैं ।

2– दूसरी रेखा— दक्षिणाग्नि, प्रणव का दूसरा अक्षर उकार, सत्वगुण, आकाश, अन्तरात्मा, इच्छाशक्ति, यजुर्वेद, मध्याह्न के हवन और महेश्वर—ये दूसरी रेखा के नौ देवता हैं ।

3– तीसरी रेखा—आहवनीय अग्नि, प्रणव का तीसरा अक्षर मकार, तमोगुण, स्वर्गलोक, परमात्मा, ज्ञानशक्ति, सामवेद, तीसरे हवन और शिव—ये तीसरी रेखा के नौ देवता हैं ।

शरीर के बत्तीस, सोलह, आठ या पांच स्थानों पर त्रिपुण्ड लगाया जाता है त्रिपुण्ड लगाने के बत्तीस स्थान…..

मस्तक, ललाट, दोनों कान, दोनों नेत्र, दोनों नाक, मुख, कण्ठ, दोनों हाथ, दोनों कोहनी, दोनों कलाई, हृदय, दोनों पार्श्व भाग, नाभि, दोनों अण्डकोष, दोनों उरु, दोनों गुल्फ, दोनों घुटने, दोनों पिंडली और दोनों पैर ।

त्रिपुण्ड् लगाने के सोलह स्थान….

मस्तक, ललाट, कण्ठ, दोनों कंधों, दोनों भुजाओं, दोनों कोहनी, दोनों कलाई, हृदय, नाभि, दोनों पसलियों, तथा पृष्ठभाग में ।

त्रिपुण्ड् लगाने के आठ स्थान…….गुह्य स्थान, ललाट, दोनों कान, दोनों कंधे, हृदय, और नाभि ।

त्रिपुण्ड लगाने के पांच स्थान……मस्तक, दोनों भुजायें, हृदय और नाभि।इन सम्पूर्ण अंगों में स्थान देवता बताये गये हैं उनका नाम लेकर त्रिपुण्ड् धारण करना चाहिए ।

त्रिपुण्ड धारण करने का फल…….

इस प्रकार जो कोई भी मनुष्य भस्म का त्रिपुण्ड करता है वह छोटे-बड़े सभी पापों से मुक्त होकर परम पवित्र हो जाता है ।

lउसे सब तीर्थों में स्नान का फल मिल जाता है । त्रिपुण्ड भोग और मोक्ष को देने वाला है ।

वह सभी रुद्र-मन्त्रों को जपने का अधिकारी होता है ।

वह सब भोगों को भोगता है और मृत्यु के बाद शिव-सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है ।
उसे पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता है ।

गौरीशंकर तिलक…..

कुछ शिव-भक्त शिवजी का त्रिपुण्ड लगाकर उसके बीच में माता गौरी के लिए रोली का बिन्दु लगाते हैं । इसे वे गौरीशंकर का स्वरूप मानते हैं ।

गौरीशंकर के उपासकों में भी कोई पहले बिन्दु लगाकर फिर त्रिपुण्ड लगाते हैं तो कुछ पहले त्रिपुण्ड लगाकर फिर बिन्दु लगाते हैं ।

जो केवल भगवती के उपासक हैं वे केवल लाल बिन्दु का ही तिलक लगाते हैं ।

शैव परम्परा में अघोरी, कापालिक, तान्त्रिक जैसे पंथ बदल जाने पर तिलक लगाने का तरीका भी बदल जाता है।

🙏🏻📿हर हर महादेव📿🙏🏻
👍6
देवपूजा होने के बाद तीर्थ ग्रहण करना एक महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है। किसी मंदिर में जाने पर वहां के पुजारी भक्तजनों को तीर्थ देते हैं। यह तीर्थ लेते समय हाथ की गोकर्ण मुद्रा करें। यानी अंगूठे के पास तर्जनी उंगली को थोड़ी झुकाकर उसके पृष्ठ भाग पर एक के पीछे एक तीनों उंगलियां रखें। साधक भगवान का तीर्थ हथेली के गहरे हिस्से में लेकर मुंह से आवाज न निकालते हुए प्राशन करें। तीर्थ के रूप में लिया जाने वाला उदक या पंचामृत सिर्फ एक ही बंद लें। कारण-तीर्थ का रूपांतर लार में हो, मल में नहीं। दूसरी बूंद लेने से मुख के अंतर्भाग, अन्ननलिका एवं जठर का लेपन होता है लेकिन उसका अन्न के साथ मिश्रण नहीं होता।

तीर्थ कितनी बार ग्रहण करें, इसके भी शास्त्र संकेत हैं। सामान्य रूप से घर में पूजा होने के बाद दो बार तीर्थ ग्रहण करें। यदि उस दिन अन्न ग्रहण होने की संभावना न हो तो तीन बार तीर्थ ग्रहण करें। मंदिर में जाने पर एक ही बार तीर्थ से। एकादशी का व्रत करने वाले साधक उस दिन उपवास रखकर दूसरे दिन सूर्योदय के समय तीर्थ ग्रहण करके उपवास की इतिश्री करते हैं। यदि घर में नैमित्तिक सत्यनारायण जैसी महापूजा हो तो उस दिन सुबह नित्य पूजन के बाद तत्काल तीर्थ नहीं लेना चाहिए। महापूजा या श्राद्ध संपन्न होने के बाद भोजन से पहले तीर्थ ग्रहण करें। इससे देव गौरव एवं पितृ गौरव साधा जा सकता है। नित्य पूजा का तीर्थ अच्छी द्विमुखी में रखें। दिन भर प्रसंग आने पर यह तीर्थ प्राशन

किया जा सकता है।

यदि किसी का अंतिम समय निकट आ गया हो तो तुलसीपत्र एवं देवतीर्थ उसके मुंह में डालें। अगर कोई गंभीर बीमार हो तो उसे भी तीर्थ पिलाएं। यदि परिवार के किसी सदस्य ने चुगली की हो या उससे परपीड़न, वाक्ताड़न तथा परनिंदा आदि अपराध हुए हों तो उसे सर्वप्रथम तीर्थ ग्रहण कराएं। बाद में उचित प्रायश्चित करें। यदि पंचामृत अभिषेक हो तो मूर्ति का चरण स्पर्श कराकर उदक को शुद्धोदक तीर्थ के रूप में घर में रखें। पंचामृतयुक्त तीर्थ शाम तक दूषित हो जाता है। पंचामृत तीर्थ प्राशन करने के बाद वह हाथ सिर पर न फिराएं। पंचामृत तीर्थ में शहद होने के कारण उसका अनिष्ट परिणाम बालों पर हो सकता है। घर में स्थित देवताओं का तीर्थ प्राशन करने से पूर्व शंख में थोड़ा पानी रखकर शंख से देवता की आरती उतारकर निम्नवत मंत्र का उच्चारण करें-

शंखमध्ये स्थितं तोयं भ्रमितं विष्णोधरि।

अङ्कलग्नं मनुष्याणां महापापं व्यपोहति ।।

फिर सर्वत्र शंखतीर्थ छिड़कने के बाद देवतीर्थ लेते समय यह मंत्र बोले-

अकाल मृत्यु हरणं सर्वव्याधि विनाशम् । अमुक तीर्थं जठरे धारयाम्यहम् ॥

पहले मंत्र में 'विष्णोः 'के स्थान पर संबंधित देवता का नाम लें। शिवतीर्थ के संकेत का निर्वाह अपनी परंपरानुसार ही करें। दूसरे मंत्र में' अमुक' के स्थान पर विष्णुपादोदकं, शिवपादोदकं, गणेशपादोदकं, सूर्यपादोदकं या देवीपादोदकं का उच्चारण करना चाहिए।

पूजा के अंतर्गत तीर्थ ग्रहण करना अति महत्वपूर्ण है। प्राशन किया जाने वाला तीर्थ स्वास्थ्य की दृष्टि से शुद्ध होना आवश्यक है। कई दिनों से न पूजी गई मूर्ति का तीर्थ नहीं लेना चाहिए। साथ ही साथ देवमूर्ति का कुंकुम, सिंदूर, निकृष्ट प्रकार का अष्टगंध, गुलाल एवं अबीर आदि द्रव्यों से युक्त तीर्थ का भी प्राशन न करें। यदि अभिषेक का तीर्थ संग्रह करना हो तो पूजाकर्ता की बैठक से अभिषेक की थाली कम से कम एक प्रादेश दूर हो। पूजा के पूर्व विष्णो देवजनं रक्षस्व बोलकर अपने से एक प्रादेश का अंतर गिनें।

इसके अलावा आचमन एवं संकल्प के बाद थाली का पानी दूसरी तरफ फेंककर थाली साफ कर लें। थाली साफ करने के बाद तत्काल पूजा प्रारंभ करें। कहीं-कहीं पर पूजा के लिए बड़ी थाली और आचमन-संकल्प के लिए छोटी थाली का उपयोग किया जाता है। इससे पूजा की शुद्धता एवं सफाई रखने में सहयोग मिलता है। तीर्थ में रुद्राक्ष डालकर हृदय रोग परिहार के रूप में उसका उपयोग किया जा सकता ह
👍9
*9 औषधियों के पेड़ पौधे जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है -*

(1) *प्रथम शैलपुत्री (हरड़)* : कई प्रकार के रोगों में काम आने वाली औषधि हरड़ हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप है.यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है यह पथया, हरीतिका, अमृता, हेमवती, कायस्थ, चेतकी और श्रेयसी सात प्रकार की होती है.

(2) *ब्रह्मचारिणी (ब्राह्मी)* : ब्राह्मी आयु व याददाश्त बढ़ाकर, रक्तविकारों को दूर कर स्वर को मधुर बनाती है.इसलिए इसे सरस्वती भी कहा जाता है.

(3) *चंद्रघंटा (चंदुसूर)* : यह एक ऎसा पौधा है जो धनिए के समान है. यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है इसलिए इसे चर्महंती भी कहते हैं.

(4) *कूष्मांडा (पेठा)* : इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है.इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं. इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो रक्त विकार दूर कर पेट को साफ करने में सहायक है. मानसिक
रोगों में यह अमृत समान है. आज कल सैक्रीन से बनने वाला पेठा नहीं खाये घर में बनाये

(5) *स्कंदमाता (अलसी)* : देवी स्कंदमाता औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं. यह वात, पित्त व कफ रोगों की नाशक औषधि है.इसमे फाइबर की मात्रा ज्यादा होने से इसे सभी को भोजन के पश्चात काले नमक सेभूंजकर प्रतिदिन सुबह शाम लेना चाहिए यह खून भी साफ करता है

(6) *कात्यायनी (मोइया)* : देवी कात्यायनी को आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका व अम्बिका.इसके अलावा इन्हें मोइया भी कहते हैं.यह औषधि कफ, पित्त व गले के रोगों का नाश करती है.

(7) *कालरात्रि (नागदौन)* : यह देवी नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती हैं.यह सभी प्रकार के रोगों में लाभकारी और मन एवं मस्तिष्क के विकारों को दूर करने वाली औषधि है.यह पाइल्स के लिये भी रामबाण औषधि है इसे स्थानीय भाषा जबलपुर में दूधी कहा जाता है

(8) *महागौरी (तुलसी)* : तुलसी सात प्रकार की होती है सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरूता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र. ये रक्त को साफ कर ह्वदय रोगों का नाश करती है. एकादशी को छोडकर प्रतिदिन सुबह ग्रहण करना चाहिए

(9) *सिद्धिदात्री (शतावरी)* : दुर्गा का नौवां रूप सिद्धिदात्री है जिसे नारायणी शतावरी कहते हैं. यह बल, बुद्धि एवं विवेक के लिए उपयोगी है.विशेषकर प्रसूताओं (जिन माताओं को ऑपरेशन के पश्चात अथवा कम दूध आता है) उनके लिए यह रामबाण औषधि है को इसका सेवन करना चाहिए ।

आइए हम सभी इस नवरात्रि के पावन अवसर पर इन प्राकृतिक आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन कर स्वयं को स्वस्थ बनाएं एवं जन जन तक पहुंचाएं।

जय माता दी
👍9👏2
इसके साथ यह भी सत्य है कि हमारे अंतःकरण में आध्यात्मिक उत्कर्ष के प्रति गहन श्रद्धा का भाव हो। जो व्यक्तित्व में बैठी हुई गहरी बुराइयाँ हैं, जन्म-जन्मांतरों से वहीं धँसी हुई हैं, उनको अकेले पुरुषार्थ से दूर कर पाना असंभव नहीं तो दुष्कर तो अवश्य होता है। यदि ऐसे में हृदय में श्रद्धा का भाव हो तो यह कार्य सहजता से संभव हो जाता है।

श्रद्धा का अर्थ सरल है- भगवान के प्रति, परमात्मा के प्रति, गुरुदेव के प्रति गहन भरोसे का, विश्वास का भाव। ये सारे तत्त्व मिलकर आध्यात्मिक व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। स्वयं को समग्र रूप से जान लेना ही अध्यात्म है और हमें इसी यात्रा पर आगे बढ़ने के लिए स्वयं को तैयार कर लेना चाहिए।👏🙏
स्वयं को समग्रता से जान लेना है -अध्यात्म

यह मनुष्य का जीवन जो हम लोगों को एक सौभाग्य के रूप में प्राप्त हुआ है, वह एक ऐसा अवसर है, जहाँ से अनंत प्रकाश की यात्रा प्रारंभ हो सकती है। भगवान कृष्ण जब श्रीमद्भगवद्गीता को कहने के क्रम में अपना विराट रूप अर्जुन को दिखाते हैं तो गीताकार ने उस दृश्य के लिए कहा है-

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥

भावार्थ में कहें तो यह कह सकते हैं कि यदि आकाश में हजारों सूर्य भी एक साथ उदित हो जाएँ तो उन सबका जो सम्मिलित प्रकाश है, वो भी मिलकर परमात्मा के उस प्रकाश की बराबरी कर पाने में समर्थ नहीं था।

अब कल्पना करके देखें कि उस अनंत, अतुलनीय, अपरिमित प्रकाश के एक अंश के रूप में, परमात्मा के एक अंश के रूप में, भगवान के एक अंश के रूप में हम और आप जन्मे हैं, परंतु यदि हम अपने जीवन की यात्रा मात्र किलकारी मारने से लेकर चिता पर जलने तक सीमित मानकर बैठ जाएँ तो फिर हमारे भीतर का परमात्मा तो अभिव्यक्त नहीं हो पाता, परंतु हमारे भीतर का पशु अवश्य जाग उठता है।

उस स्थिति में पेट भरने एवं परिवार बड़ा कर लेने के अतिरिक्त जीवन का कोई अन्य भी उद्देश्य हो सकता है- यह फिर इनसान समझ ही नहीं पाता।

ऐसे जीवन की यात्रा मात्र जलने, कुढ़ने, चिढ़ने, तड़पने में ही नष्ट हो जाती है। व्यक्ति यह भूल ही जाता है कि मनुष्य का जीवन वस्तुस्थिति में एक अवसर के रूप में हमको मिला है। जो इस अवसर का सही, सार्थक व सम्यक उपयोग करना जान जाते हैं, उनके जीवन की यात्रा उनको परमात्मा तक ले जाती है। सच पूछा जाए तो इसके अतिरिक्त फिर जीवन का और उद्देश्य ही क्या है ?

यदि हम सब जान गए, पर स्वयं को न जान सके तो जो भी जाना वो व्यर्थ ही है, मूल्यविहीन है, निरर्थक है। अपने को जानने की यात्रा ही अध्यात्म की यात्रा है और स्वयं के भीतर छिपी हुई, परंतु सोई हुई शक्तियों को जगाने का जो विज्ञान है, वो अध्यात्म का विज्ञान है।

हमें ऐसा लगता है कि हम अपने को जानते हैं, पर सच ऐसा नहीं है। अपने को जानने का मतलब यह जानना नहीं होता कि हमारे रिश्तेदार कौन हैं, दोस्त कौन हैं, हमारा कैरियर क्या बनना चाहिए; बल्कि ये होता है कि अपने व्यक्तित्व के ऊपर हम संपूर्ण स्वामित्व कैसे स्थापित कर सकते हैं।

स्वयं को जानने का मतलब औरों का जो हमारे प्रति मंतव्य है, जिसे हम पब्लिक ऑपिनियन कह करके पुकारते हैं- उसको जानना नहीं है; बल्कि अपने मन पर, इंद्रियों पर पूर्ण वशीकार के भाव को स्थापित कर लेना है।

यदि हम सच में स्वयं को जानते तो हमारे मन में एक भी विचार ऐसा न आता जिसको कि हम नहीं आने देना चाहते, परंतु ऐसा होता कहाँ है ? हमें खुद को भी नहीं पता कि कब- कहाँ-से, कौन- सा विचार प्रकट होएगा और हमारे मन की शांति को छीनकर चला जाएगा।

प्रश्न उठता है कि मन आखिर इतना चंचल क्यों है तो उसका एक कारण तो यह है कि मन है तो एक इंद्रिय, एक उपकरण, परंतु हम उसको मालिक बनाकर बैठे हैं। जो हम नहीं भी सोचना चाहते होंगे, वो भी मन सोचता है। जो हम नहीं भी करना चाहते होंगे, वो भी मन करता है। वह न किसी की सुनता है, न समझता है; क्योंकि वह था तो इंद्रिय, परंतु हमने संपूर्ण व्यक्तित्व का एकाधिकार उसको दे दिया है।

कौन चाहता है कि मन में कामुकता के विचार आएँ ? कौन चाहता है कि मन क्रोध की ज्वालाओं से दग्ध हो ? कौन चाहता है कि मन ईर्ष्या और द्वेष से विकल हो ? चाहता तो कोई भी नहीं, परंतु आदत ऐसी पड़ चुकी है कि मन जैसा कराना चाहता है, वैसा हम करते हैं; क्योंकि हमने एक गलती कर दी। गलती यह कर दी कि जो किरायेदार बनकर के आया था, उसे घर की चाबियाँ हमने पकड़ा दी हैं और अब शिकायत करते हम घूमते हैं कि वो घर खाली नहीं कर रहा।

स्वाभाविक है कि मन की चंचलता, व्यक्तित्व में अस्थिरता को, असंतुलन को जन्म देती है। इन सब असंतुलन के कारणों के मध्य में संतुलन को लाना, अपने मन पर संपूर्ण स्वामित्व को लाना, जो हम चाहें वो मन सोचे- यह एक तरह से व्यक्तित्व के रूपांतरण की दिशा में पहला, परंतु महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।

मन के ऊपर एकाधिकार को स्थापित किए बिना आध्यात्मिक यात्रा पूर्णरूपेण अधूरी ही रह जाती है। यह सही तरह से हो इसके लिए जरूरी है कि हम स्वयं से झूठ‌ बोलना बंद करें। परमपूज्य गुरुदेव ने इसे निष्पक्ष आत्मसमीक्षा का नाम दिया है। गलती हो जाना बड़ी बात नहीं है, पर गलती को सही समझकर उसी पर अड़े रहना-व्यक्तित्व के पतन का द्वार बन जाता है।

अध्यात्म अपने आप को समग्र रूप से जान लेने का नाम है और ऐसे में अपने आप को पूरी तरह से जान लेना सही है कि क्या हमारे लिए अच्छा है और क्या बुरा ? जो आज बुरा है, वो कल अच्छे में बदल सकता है, पर तभी; जब हम उसे बुरे रूप में देखना प्रारंभ करते हैं।
❤2👍2