कहानी का समय
एक ब्राह्मण यात्रा करते-करते किसी नगर से गुजरा बड़े-बड़े महल एवं अट्टालिकाओं को देखकर ब्राह्मण भिक्षा माँगने गया किन्तु किसी ने भी उसे दो मुट्ठी अऩ्न नहीं दिया आखिर दोपहर हो गयी ब्राह्मण दुःखी होकर अपने भाग्य को कोसता हुआ जा रहा थाः “कैसा मेरा दुर्भाग्य है इतने बड़े नगर में मुझे खाने के लिए दो मुट्ठी अन्न तक न मिला ? रोटी बना कर खाने के लिए दो मुट्ठी आटा तक न मिला ?
इतने में एक सिद्ध संत की निगाह उस पर पड़ी उन्होंने ब्राह्मण की बड़बड़ाहट सुन ली वे बड़े पहुँचे हुए संत थे उन्होंने कहाः
“ब्राह्मण तुम मनुष्य से भिक्षा माँगो, पशु क्या जानें भिक्षा देना ?”
ब्राह्मण दंग रह गया और कहने लगाः “हे महात्मन् आप क्या कह रहे हैं ? बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहने वाले मनुष्यों से ही मैंने भिक्षा माँगी है”
संतः “नहीं ब्राह्मण मनुष्य शरीर में दिखने वाले वे लोग भीतर से मनुष्य नहीं हैं अभी भी वे पिछले जन्म के हिसाब ही जी रहे हैं कोई शेर की योनी से आया है तो कोई कुत्ते की योनी से आया है, कोई हिरण की से आया है तो कोई गाय या भैंस की योनी से आया है उन की आकृति मानव-शरीर की जरूर है किन्तु अभी तक उन में मनुष्यत्व निखरा नहीं है और जब तक मनुष्यत्व नहीं निखरता, तब तक दूसरे मनुष्य की पीड़ा का पता नहीं चलता. ‘दूसरे में भी मेरा ही दिलबर ही है’ यह ज्ञान नहीं होता तुम ने मनुष्यों से नहीं, पशुओं से भिक्षा माँगी है”
ब्राह्मण का चेहरा दुःख रहा था ब्राह्मण का चेहरा इन्कार की खबरें दे रहा था सिद्धपुरुष तो दूरदृष्टि के धनी होते हैं उन्होंने कहाः “देख ब्राह्मण मैं तुझे यह चश्मा देता हूँ इस चश्मे को पहन कर जा और कोई भी मनुष्य दिखे, उस से भिक्षा माँग फिर देख, क्या होता है”
ब्राह्मण जहाँ पहले गया था, वहीं पुनः गया योगसिद्ध कला वाला चश्मा पहनकर गौर से देखाः ‘ओहोऽऽऽऽ…. वाकई कोई कुत्ता है कोई बिल्ली है. तो कोई बघेरा है आकृति तो मनुष्य की है लेकिन संस्कार पशुओं के हैं मनुष्य होने पर भी मनुष्यत्व के संस्कार नहीं हैं’ घूमते-घूमते वह ब्राह्मण थोड़ा सा आगे गया तो देखा कि एक मोची जूते सिल रहा है ब्राह्मण ने उसे गौर से देखा तो उस में मनुष्यत्व का निखार पाया
ब्राह्मण ने उस के पास जाकर कहाः “भाई तेरा धंधा तो बहुत हल्का है औऱ मैं हूँ ब्राह्मण रीति रिवाज एवं कर्मकाण्ड को बड़ी चुस्ती से पालता हूँ मुझे बड़ी भूख लगी है लेकिन तेरे हाथ का नहीं खाऊँगा फिर भी मैं तुझसे माँगता हूँ क्योंकि मुझे तुझमें मनुष्यत्व दिखा है”
उस मोची की आँखों से टप-टप आँसू बरसने लगे वह बोलाः “हे प्रभु आप भूखे हैं ? हे मेरे रब आप भूखे हैं ? इतनी देर आप कहाँ थे ?”
यह कहकर मोची उठा एवं जूते सिलकर टका, आना-दो आना वगैरह जो इकट्ठे किये थे, उस चिल्लर ( रेज़गारी ) को लेकर हलवाई की दुकान पर पहुँचा और बोलाः “हे हलवाई मेरे इन भूखे भगवान की सेवा कर लो ये चिल्लर यहाँ रखता हूँ जो कुछ भी सब्जी-पराँठे-पूरी आदि दे सकते हो, वह इन्हें दे दो मैं अभी जाता हूँ”
यह कहकर मोची भागा घर जाकर अपने हाथ से बनाई हुई एक जोड़ी जूती ले आया एवं चौराहे पर उसे बेचने के लिए खड़ा हो गया
उस राज्य का राजा जूतियों का बड़ा शौकीन था उस दिन भी उस ने कई तरह की जूतियाँ पहनीं किंतु किसी की बनावट उसे पसंद नहीं आयी तो किसी का नाप नहीं आया दो-पाँच बार प्रयत्न करने पर भी राजा को कोई पसंद नहीं आयी तो मंत्री से क्रुद्ध होकर बोलाः “अगर इस बार ढंग की जूती लाया तो जूती वाले को इनाम दूँगा और ठीक नहीं लाया तो मंत्री के बच्चे तेरी खबर ले लूँगा”
दैव योग से मंत्री की नज़र इस मोची के रूप में खड़े असली मानव पर पड़ गयी जिस में मानवता खिली थी, जिस की आँखों में कुछ प्रेम के भाव थे, चित्त में दया-करूणा थी, ब्राह्मण के संग का थोड़ा रंग लगा था मंत्री ने मोची से जूती ले ली एवं राजा के पास ले गया राजा को वह जूती एकदम ‘फिट’ आ गयी, मानो वह जूती राजा के नाप की ही बनी थी राजा ने कहाः “ऐसी जूती तो मैंने पहली बार ही पहन रहा हूँ किस मोची ने बनाई है यह जूती ?”
मंत्री बोला “हुजूर यह मोची बाहर ही खड़ा है”
मोची को बुलाया गया उस को देखकर राजा की भी मानवता थोड़ी खिली राजा ने कहाः “जूती के तो पाँच रूपये होते हैं किन्तु यह पाँच रूपयों वाली नहीं, पाँच सौ रूपयों वाली जूती है जूती बनाने वाले को पाँच सौ और जूती के पाँच सौ, कुल एक हजार रूपये इसको दे दो”
मोची बोलाः “राजा साहिब तनिक ठहरिये यह जूती मेरी नहीं है, जिसकी है उसे मैं अभी ले आता हूँ”
मोची जाकर विनयपूर्वक ब्राह्मण को राजा के पास ले आया एवं राजा से बोलाः “राजा साहब यह जूती इन्हीं की है”
राजा को आश्चर्य हुआ वह बोलाः “यह तो ब्राह्मण है इस की जूती कैसे ?”
राजा ने ब्राह्मण से पूछा तो ब्राह्मण ने कहा मैं तो ब्राह्मण हूँ यात्रा करने निकला हूँ”
एक ब्राह्मण यात्रा करते-करते किसी नगर से गुजरा बड़े-बड़े महल एवं अट्टालिकाओं को देखकर ब्राह्मण भिक्षा माँगने गया किन्तु किसी ने भी उसे दो मुट्ठी अऩ्न नहीं दिया आखिर दोपहर हो गयी ब्राह्मण दुःखी होकर अपने भाग्य को कोसता हुआ जा रहा थाः “कैसा मेरा दुर्भाग्य है इतने बड़े नगर में मुझे खाने के लिए दो मुट्ठी अन्न तक न मिला ? रोटी बना कर खाने के लिए दो मुट्ठी आटा तक न मिला ?
इतने में एक सिद्ध संत की निगाह उस पर पड़ी उन्होंने ब्राह्मण की बड़बड़ाहट सुन ली वे बड़े पहुँचे हुए संत थे उन्होंने कहाः
“ब्राह्मण तुम मनुष्य से भिक्षा माँगो, पशु क्या जानें भिक्षा देना ?”
ब्राह्मण दंग रह गया और कहने लगाः “हे महात्मन् आप क्या कह रहे हैं ? बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहने वाले मनुष्यों से ही मैंने भिक्षा माँगी है”
संतः “नहीं ब्राह्मण मनुष्य शरीर में दिखने वाले वे लोग भीतर से मनुष्य नहीं हैं अभी भी वे पिछले जन्म के हिसाब ही जी रहे हैं कोई शेर की योनी से आया है तो कोई कुत्ते की योनी से आया है, कोई हिरण की से आया है तो कोई गाय या भैंस की योनी से आया है उन की आकृति मानव-शरीर की जरूर है किन्तु अभी तक उन में मनुष्यत्व निखरा नहीं है और जब तक मनुष्यत्व नहीं निखरता, तब तक दूसरे मनुष्य की पीड़ा का पता नहीं चलता. ‘दूसरे में भी मेरा ही दिलबर ही है’ यह ज्ञान नहीं होता तुम ने मनुष्यों से नहीं, पशुओं से भिक्षा माँगी है”
ब्राह्मण का चेहरा दुःख रहा था ब्राह्मण का चेहरा इन्कार की खबरें दे रहा था सिद्धपुरुष तो दूरदृष्टि के धनी होते हैं उन्होंने कहाः “देख ब्राह्मण मैं तुझे यह चश्मा देता हूँ इस चश्मे को पहन कर जा और कोई भी मनुष्य दिखे, उस से भिक्षा माँग फिर देख, क्या होता है”
ब्राह्मण जहाँ पहले गया था, वहीं पुनः गया योगसिद्ध कला वाला चश्मा पहनकर गौर से देखाः ‘ओहोऽऽऽऽ…. वाकई कोई कुत्ता है कोई बिल्ली है. तो कोई बघेरा है आकृति तो मनुष्य की है लेकिन संस्कार पशुओं के हैं मनुष्य होने पर भी मनुष्यत्व के संस्कार नहीं हैं’ घूमते-घूमते वह ब्राह्मण थोड़ा सा आगे गया तो देखा कि एक मोची जूते सिल रहा है ब्राह्मण ने उसे गौर से देखा तो उस में मनुष्यत्व का निखार पाया
ब्राह्मण ने उस के पास जाकर कहाः “भाई तेरा धंधा तो बहुत हल्का है औऱ मैं हूँ ब्राह्मण रीति रिवाज एवं कर्मकाण्ड को बड़ी चुस्ती से पालता हूँ मुझे बड़ी भूख लगी है लेकिन तेरे हाथ का नहीं खाऊँगा फिर भी मैं तुझसे माँगता हूँ क्योंकि मुझे तुझमें मनुष्यत्व दिखा है”
उस मोची की आँखों से टप-टप आँसू बरसने लगे वह बोलाः “हे प्रभु आप भूखे हैं ? हे मेरे रब आप भूखे हैं ? इतनी देर आप कहाँ थे ?”
यह कहकर मोची उठा एवं जूते सिलकर टका, आना-दो आना वगैरह जो इकट्ठे किये थे, उस चिल्लर ( रेज़गारी ) को लेकर हलवाई की दुकान पर पहुँचा और बोलाः “हे हलवाई मेरे इन भूखे भगवान की सेवा कर लो ये चिल्लर यहाँ रखता हूँ जो कुछ भी सब्जी-पराँठे-पूरी आदि दे सकते हो, वह इन्हें दे दो मैं अभी जाता हूँ”
यह कहकर मोची भागा घर जाकर अपने हाथ से बनाई हुई एक जोड़ी जूती ले आया एवं चौराहे पर उसे बेचने के लिए खड़ा हो गया
उस राज्य का राजा जूतियों का बड़ा शौकीन था उस दिन भी उस ने कई तरह की जूतियाँ पहनीं किंतु किसी की बनावट उसे पसंद नहीं आयी तो किसी का नाप नहीं आया दो-पाँच बार प्रयत्न करने पर भी राजा को कोई पसंद नहीं आयी तो मंत्री से क्रुद्ध होकर बोलाः “अगर इस बार ढंग की जूती लाया तो जूती वाले को इनाम दूँगा और ठीक नहीं लाया तो मंत्री के बच्चे तेरी खबर ले लूँगा”
दैव योग से मंत्री की नज़र इस मोची के रूप में खड़े असली मानव पर पड़ गयी जिस में मानवता खिली थी, जिस की आँखों में कुछ प्रेम के भाव थे, चित्त में दया-करूणा थी, ब्राह्मण के संग का थोड़ा रंग लगा था मंत्री ने मोची से जूती ले ली एवं राजा के पास ले गया राजा को वह जूती एकदम ‘फिट’ आ गयी, मानो वह जूती राजा के नाप की ही बनी थी राजा ने कहाः “ऐसी जूती तो मैंने पहली बार ही पहन रहा हूँ किस मोची ने बनाई है यह जूती ?”
मंत्री बोला “हुजूर यह मोची बाहर ही खड़ा है”
मोची को बुलाया गया उस को देखकर राजा की भी मानवता थोड़ी खिली राजा ने कहाः “जूती के तो पाँच रूपये होते हैं किन्तु यह पाँच रूपयों वाली नहीं, पाँच सौ रूपयों वाली जूती है जूती बनाने वाले को पाँच सौ और जूती के पाँच सौ, कुल एक हजार रूपये इसको दे दो”
मोची बोलाः “राजा साहिब तनिक ठहरिये यह जूती मेरी नहीं है, जिसकी है उसे मैं अभी ले आता हूँ”
मोची जाकर विनयपूर्वक ब्राह्मण को राजा के पास ले आया एवं राजा से बोलाः “राजा साहब यह जूती इन्हीं की है”
राजा को आश्चर्य हुआ वह बोलाः “यह तो ब्राह्मण है इस की जूती कैसे ?”
राजा ने ब्राह्मण से पूछा तो ब्राह्मण ने कहा मैं तो ब्राह्मण हूँ यात्रा करने निकला हूँ”
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राजाः “मोची जूती तो तुम बेच रहे थे इस ब्राह्मण ने जूती कब खरीदी और बेची ?”
मोची ने कहाः “राजन् मैंने मन में ही संकल्प कर लिया था कि जूती की जो रकम आयेगी वह इन ब्राह्मणदेव की होगी जब रकम इन की है तो मैं इन रूपयों को कैसे ले सकता हूँ ? इसीलिए मैं इन्हें ले आया हूँ न जाने किसी जन्म में मैंने दान करने का संकल्प किया होगा और मुकर गया होऊँगा तभी तो यह मोची का चोला मिला है अब भी यदि मुकर जाऊँ तो तो न जाने मेरी कैसी दुर्गति हो ? इसीलिए राजन् ये रूपये मेरे नहीं हुए मेरे मन में आ गया था कि इस जूती की रकम इनके लिए होगी फिर पाँच रूपये मिलते तो भी इनके होते और एक हजार मिल रहे हैं तो भी इनके ही हैं हो सकता है मेरा मन बेईमान हो जाता इसीलिए मैंने रूपयों को नहीं छुआ और असली अधिकारी को ले आया”
राजा ने आश्चर्य चकित होकर ब्राह्मण से पूछाः “ब्राह्मण मोची से तुम्हारा परिचय कैसे हुआ ?”
ब्राह्मण ने सारी आप बीती सुनाते हुए सिद्ध पुरुष के चश्मे वाली आप के राज्य में पशुओं के दीदार तो बहुत हुए लेकिन मनुष्यत्व का विकास इस मोची में ही नज़र आया”
राजा ने कौतूहलवश कहाः “लाओ, वह चश्मा जरा हम भी देखें”
राजा ने चश्मा लगाकर देखा तो दरबारी वगैरह में उसे भी कोई सियार दिखा तो कोई हिरण, कोई बंदर दिखा तो कोई रीछ राजा दंग रह गया कि यह तो पशुओं का दरबार भरा पड़ा है उसे हुआ कि ये सब पशु हैं तो मैं कौन हूँ ? उस ने आईना मँगवाया एवं उसमें अपना चेहरा देखा तो शेर उस के आश्चर्य की सीमा न रही ‘ ये सारे जंगल के प्राणी और मैं जंगल का राजा शेर यहाँ भी इनका राजा बना बैठा हूँ ’ राजा ने कहाः “ब्राह्मणदेव योगी महाराज का यह चश्मा तो बड़ा गज़ब का है वे योगी महाराज कहाँ होंगे ?”
ब्राह्मणः “वे तो कहीं चले गये ऐसे महापुरुष कभी-कभी ही और बड़ी कठिनाई से मिलते हैं”
श्रद्धावान ही ऐसे महापुरुषों से लाभ उठा पाते हैं, बाकी तो जो मनुष्य के चोले में पशु के समान हैं वे महापुरुष के निकट रहकर भी अपनी पशुता नहीं छोड़ पाते
ब्राह्मण ने आगे कहाः ‘राजन् अब तो बिना चश्मे के भी मनुष्यत्व को परखा जा सकता है व्यक्ति के व्यवहार को देखकर ही पता चल सकता है कि वह किस योनि से आया है एक मेहनत करे और दूसरा उस पर हक जताये तो समझ लो कि वह सर्प योनि से आया है क्योंकि बिल खोदने की मेहनत तो चूहा करता है लेकिन सर्प उस को मारकर बल पर अपना अधिकार जमा बैठता है”
अब इस चश्मे के बिना भी विवेक का चश्मा काम कर सकता है और दूसरे को देखें उसकी अपेक्षा स्वयं को ही देखें कि हम सर्पयोनि से आये हैं कि शेर की योनि से आये हैं या सचमुच में हम में मनुष्यता खिली है ? यदि पशुता बाकी है तो वह भी मनुष्यता में बदल सकती है कैसे ?
तुलसीदाज जी ने कहा हैः
बिगड़ी जनम अनेक की सुधरे अब और आजु
तुलसी होई राम को रामभजि तजि कुसमाजु
कुसंस्कारों को छोड़ दें… बस अपने कुसंस्कार आप निकालेंगे तो ही निकलेंगे अपने भीतर छिपे हुए पशुत्व को आप निकालेंगे तो ही निकलेगा यह भी तब संभव होगा जब आप अपने समय की कीमत समझेंगे मनुष्यत्व आये तो एक-एक पल को सार्थक किये बिना आप चुप नहीं बैठेंगे पशु अपना समय ऐसे ही गँवाता है पशुत्व के संस्कार पड़े रहेंगे तो आपका समय बिगड़ेगा अतः पशुत्व के संस्कारों को आप निकालिये एवं मनुष्यत्व के संस्कारों को उभारिये फिर सिद्धपुरुष का चश्मा नहीं, वरन् अपने विवेक का चश्मा ही कार्य करेगा और इस विवेक के चश्मे को पाने की युक्ति मिलती है सत्संग से
मानवता से जो पूर्ण हो, वही मनुष्य कहलाता
बिन मानवता के मानव भी, पशुतुल्य रह जाता है
🪷जय श्री राम
मोची ने कहाः “राजन् मैंने मन में ही संकल्प कर लिया था कि जूती की जो रकम आयेगी वह इन ब्राह्मणदेव की होगी जब रकम इन की है तो मैं इन रूपयों को कैसे ले सकता हूँ ? इसीलिए मैं इन्हें ले आया हूँ न जाने किसी जन्म में मैंने दान करने का संकल्प किया होगा और मुकर गया होऊँगा तभी तो यह मोची का चोला मिला है अब भी यदि मुकर जाऊँ तो तो न जाने मेरी कैसी दुर्गति हो ? इसीलिए राजन् ये रूपये मेरे नहीं हुए मेरे मन में आ गया था कि इस जूती की रकम इनके लिए होगी फिर पाँच रूपये मिलते तो भी इनके होते और एक हजार मिल रहे हैं तो भी इनके ही हैं हो सकता है मेरा मन बेईमान हो जाता इसीलिए मैंने रूपयों को नहीं छुआ और असली अधिकारी को ले आया”
राजा ने आश्चर्य चकित होकर ब्राह्मण से पूछाः “ब्राह्मण मोची से तुम्हारा परिचय कैसे हुआ ?”
ब्राह्मण ने सारी आप बीती सुनाते हुए सिद्ध पुरुष के चश्मे वाली आप के राज्य में पशुओं के दीदार तो बहुत हुए लेकिन मनुष्यत्व का विकास इस मोची में ही नज़र आया”
राजा ने कौतूहलवश कहाः “लाओ, वह चश्मा जरा हम भी देखें”
राजा ने चश्मा लगाकर देखा तो दरबारी वगैरह में उसे भी कोई सियार दिखा तो कोई हिरण, कोई बंदर दिखा तो कोई रीछ राजा दंग रह गया कि यह तो पशुओं का दरबार भरा पड़ा है उसे हुआ कि ये सब पशु हैं तो मैं कौन हूँ ? उस ने आईना मँगवाया एवं उसमें अपना चेहरा देखा तो शेर उस के आश्चर्य की सीमा न रही ‘ ये सारे जंगल के प्राणी और मैं जंगल का राजा शेर यहाँ भी इनका राजा बना बैठा हूँ ’ राजा ने कहाः “ब्राह्मणदेव योगी महाराज का यह चश्मा तो बड़ा गज़ब का है वे योगी महाराज कहाँ होंगे ?”
ब्राह्मणः “वे तो कहीं चले गये ऐसे महापुरुष कभी-कभी ही और बड़ी कठिनाई से मिलते हैं”
श्रद्धावान ही ऐसे महापुरुषों से लाभ उठा पाते हैं, बाकी तो जो मनुष्य के चोले में पशु के समान हैं वे महापुरुष के निकट रहकर भी अपनी पशुता नहीं छोड़ पाते
ब्राह्मण ने आगे कहाः ‘राजन् अब तो बिना चश्मे के भी मनुष्यत्व को परखा जा सकता है व्यक्ति के व्यवहार को देखकर ही पता चल सकता है कि वह किस योनि से आया है एक मेहनत करे और दूसरा उस पर हक जताये तो समझ लो कि वह सर्प योनि से आया है क्योंकि बिल खोदने की मेहनत तो चूहा करता है लेकिन सर्प उस को मारकर बल पर अपना अधिकार जमा बैठता है”
अब इस चश्मे के बिना भी विवेक का चश्मा काम कर सकता है और दूसरे को देखें उसकी अपेक्षा स्वयं को ही देखें कि हम सर्पयोनि से आये हैं कि शेर की योनि से आये हैं या सचमुच में हम में मनुष्यता खिली है ? यदि पशुता बाकी है तो वह भी मनुष्यता में बदल सकती है कैसे ?
तुलसीदाज जी ने कहा हैः
बिगड़ी जनम अनेक की सुधरे अब और आजु
तुलसी होई राम को रामभजि तजि कुसमाजु
कुसंस्कारों को छोड़ दें… बस अपने कुसंस्कार आप निकालेंगे तो ही निकलेंगे अपने भीतर छिपे हुए पशुत्व को आप निकालेंगे तो ही निकलेगा यह भी तब संभव होगा जब आप अपने समय की कीमत समझेंगे मनुष्यत्व आये तो एक-एक पल को सार्थक किये बिना आप चुप नहीं बैठेंगे पशु अपना समय ऐसे ही गँवाता है पशुत्व के संस्कार पड़े रहेंगे तो आपका समय बिगड़ेगा अतः पशुत्व के संस्कारों को आप निकालिये एवं मनुष्यत्व के संस्कारों को उभारिये फिर सिद्धपुरुष का चश्मा नहीं, वरन् अपने विवेक का चश्मा ही कार्य करेगा और इस विवेक के चश्मे को पाने की युक्ति मिलती है सत्संग से
मानवता से जो पूर्ण हो, वही मनुष्य कहलाता
बिन मानवता के मानव भी, पशुतुल्य रह जाता है
🪷जय श्री राम
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*श्रद्धा का बल सबसे बड़ा बल होता है*
, जनबल धनबल के सामने श्रधाबल का जब जागरण हो जाता है सारे बल उस बल के सामने निस्तेज नजर आने प्रारंभ हो जाते हैं
जिस व्यक्ति के भीतर में श्रद्धा का बल जग गया मान लेना चाहिए वह व्यक्ति अपने आप ही वीर बजरंगबली हनुमान की तरह बलवान बन गया है
हनुमान के पास में सबसे बड़ा जो बल था वह बल उस के श्रद्धा का ही बल था
श्रद्धा के कारण ही वह राम के प्रिय बन सके शक्ति भक्ति दोनों का प्रतीक पुरुष कहलाते हैं हनुमान
, हम भी हमारे जीवन में जब हनुमान जैसी श्रद्धा भक्ति का जागरण करना प्रारंभ करेंगे तब हमारे भीतर में बैठा हुआ हमारा राम है वह अपने आप ही जागृत होना प्रारंभ हो जाएगा
,राम हमारे को अपने आप ही नयी शक्ति प्रदान करना प्रारंभ कर देंगे इसलिए हम अपने आप को श्रद्धाबान बनाते हुए आगे बढ़ने का संकल्प करेंगे तब ही हमारा जीवन सार्थक दिशा की ओर अग्रसर होता हुआ नजर आएगा
, जनबल धनबल के सामने श्रधाबल का जब जागरण हो जाता है सारे बल उस बल के सामने निस्तेज नजर आने प्रारंभ हो जाते हैं
जिस व्यक्ति के भीतर में श्रद्धा का बल जग गया मान लेना चाहिए वह व्यक्ति अपने आप ही वीर बजरंगबली हनुमान की तरह बलवान बन गया है
हनुमान के पास में सबसे बड़ा जो बल था वह बल उस के श्रद्धा का ही बल था
श्रद्धा के कारण ही वह राम के प्रिय बन सके शक्ति भक्ति दोनों का प्रतीक पुरुष कहलाते हैं हनुमान
, हम भी हमारे जीवन में जब हनुमान जैसी श्रद्धा भक्ति का जागरण करना प्रारंभ करेंगे तब हमारे भीतर में बैठा हुआ हमारा राम है वह अपने आप ही जागृत होना प्रारंभ हो जाएगा
,राम हमारे को अपने आप ही नयी शक्ति प्रदान करना प्रारंभ कर देंगे इसलिए हम अपने आप को श्रद्धाबान बनाते हुए आगे बढ़ने का संकल्प करेंगे तब ही हमारा जीवन सार्थक दिशा की ओर अग्रसर होता हुआ नजर आएगा
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*आने वाले व्रत त्यौहार*
19 मई मोहिनी एकादशी
20 मई प्रदोष व्रत,
21 मई नरसिंघ जयंती,
22 मई श्रीछिन्नमस्तिका जयंती
23 मई बैशाख पूर्णिया, श्रीबुद्ध जयंती, बैशाख स्नान समाप्त,
24 मई नारद जयंती, इष्टि,
26 मई एकदन्त संकष्टी चतुर्थी
19 मई मोहिनी एकादशी
20 मई प्रदोष व्रत,
21 मई नरसिंघ जयंती,
22 मई श्रीछिन्नमस्तिका जयंती
23 मई बैशाख पूर्णिया, श्रीबुद्ध जयंती, बैशाख स्नान समाप्त,
24 मई नारद जयंती, इष्टि,
26 मई एकदन्त संकष्टी चतुर्थी
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जानिये शरीर से जुड़े ज्योतिष के कुछ रोचक तथ्य
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फलित ज्योतिष की भारत में अनेक विधियां प्रचलित हैं, उन्ही में से एक सामुद्रिक शास्त्र प्रसिद्ध है जिसके द्वारा शरीर की रचना, अंग लक्षण, वर्ण तिल आदि के आधार पर भविष्य वाणी की जाती है।
1- जिन लोगों के हाथ लम्बे होते हैं, वे अधिक कल्पनाशील एवं कर्मठ होते हैं। ऐसे लोग अपने परिवार या जाती से हटकर कार्य करने वाले होते हैं। अधिकतर सफल जीवन जीते हैं।
2- हंसते वक्त जिन जातक-जातिकाओं के गाल पर गड्ढे बनते हैं वे धनी होते हैं, लेकिन चालाक होते हैं एवं राजनीति करने में प्रवीण होते हैं।
3- जिस स्त्री के शरीर पर पुरुषों के समान अधिक बाल होते हैं या मूंछे आती हो, उसके जीवन में दाम्पत्य सुख कम होता है।
4- जिन लोगों के हाथ के अगूंठे के पीछे बाल होते हैं वे अधिक बुद्धिमान होते हैं।
5- दांतों के मध्य छिद्र हो तो ऐसे लोग बहुत बोलते हैं एवं कुटिल होते हैं।
6- लम्बी जीभ व्यक्ति के जीवन में सुखों की अधिकता दर्शाती है। जिन जातकों की जीभ नाक को छूती है, वे सत्य बोलने वाले होते हैं।
7- जिन लोगों की नाक तोते के समान होती हैं वे धनवान अवश्य बनते हैं।
8- जो लोग पलके अधिक झपकाते हैं वे प्राय: कम विश्वनीय होते हैं।
9- जो लोग बात करते समय अपने मुहं को ढकने का प्रयास करते हैं वे अधिकतर झूठ बोलने के आदि होते हैं।
10 पेट पर तिल हो तो व्यक्ति चटोरा होता है। ऐसे लोग खाने पीने के बडे शौकिन होते हैं।
11- जिनके माथे पर चंद्र, पुंडरीक, त्रिशूल या धनुष जैसा चिन्ह बना हो वे अधिक मान सम्मान प्राप्त करने वाले तथा ऐश्वर्य से युक्त जीवन जीते हैं।
12- जो व्यक्ति अपने अंगूठे को दबाकर रखते हैं या मुट्ठी बंद करते समय अगूंठा भी बंद होता हो उनके अंदर आत्मविश्वास की कमी होती है।
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फलित ज्योतिष की भारत में अनेक विधियां प्रचलित हैं, उन्ही में से एक सामुद्रिक शास्त्र प्रसिद्ध है जिसके द्वारा शरीर की रचना, अंग लक्षण, वर्ण तिल आदि के आधार पर भविष्य वाणी की जाती है।
1- जिन लोगों के हाथ लम्बे होते हैं, वे अधिक कल्पनाशील एवं कर्मठ होते हैं। ऐसे लोग अपने परिवार या जाती से हटकर कार्य करने वाले होते हैं। अधिकतर सफल जीवन जीते हैं।
2- हंसते वक्त जिन जातक-जातिकाओं के गाल पर गड्ढे बनते हैं वे धनी होते हैं, लेकिन चालाक होते हैं एवं राजनीति करने में प्रवीण होते हैं।
3- जिस स्त्री के शरीर पर पुरुषों के समान अधिक बाल होते हैं या मूंछे आती हो, उसके जीवन में दाम्पत्य सुख कम होता है।
4- जिन लोगों के हाथ के अगूंठे के पीछे बाल होते हैं वे अधिक बुद्धिमान होते हैं।
5- दांतों के मध्य छिद्र हो तो ऐसे लोग बहुत बोलते हैं एवं कुटिल होते हैं।
6- लम्बी जीभ व्यक्ति के जीवन में सुखों की अधिकता दर्शाती है। जिन जातकों की जीभ नाक को छूती है, वे सत्य बोलने वाले होते हैं।
7- जिन लोगों की नाक तोते के समान होती हैं वे धनवान अवश्य बनते हैं।
8- जो लोग पलके अधिक झपकाते हैं वे प्राय: कम विश्वनीय होते हैं।
9- जो लोग बात करते समय अपने मुहं को ढकने का प्रयास करते हैं वे अधिकतर झूठ बोलने के आदि होते हैं।
10 पेट पर तिल हो तो व्यक्ति चटोरा होता है। ऐसे लोग खाने पीने के बडे शौकिन होते हैं।
11- जिनके माथे पर चंद्र, पुंडरीक, त्रिशूल या धनुष जैसा चिन्ह बना हो वे अधिक मान सम्मान प्राप्त करने वाले तथा ऐश्वर्य से युक्त जीवन जीते हैं।
12- जो व्यक्ति अपने अंगूठे को दबाकर रखते हैं या मुट्ठी बंद करते समय अगूंठा भी बंद होता हो उनके अंदर आत्मविश्वास की कमी होती है।
👍39❤1
कहानी का समय
प्रभु–विश्वास
(यहां पर प्रभु विश्वास से तात्पर्य ईश्वरीय श्रद्धा से
है विश्वास एक तरह से किसी पर थोपा गया है ऐसा प्रतीत होता है जबकि श्रद्धा स्वयं आंतरिक
चेतना से फलित होती है इसलिए श्रद्धा का महत्व है क्योंकि जब ईश्वर के प्रति हृदय में एक बार श्रद्धा अवतरित हो जाती है तो उसके बाद कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती है श्रद्धा स्वयं ही सर्व काज कर देती है क्योंकि उसके बाद सतत् ईश्वरीय प्रसाद बरसता ही रहता है जिसमें साधक पूरी तरह ओत प्रोत हो जाता है
रही बात कहानी में विश्वास शब्द की तो यह बस
कहानी के रस को बनाए रखने के लिए जरूरी है
तो बस इतना ही, अब कहानी प्रारंभ करते हैं)
उत्तर भारत में भागीरथी के तट पर एक ग्राम है। वहाँ स्वामी ध्यानानन्द निवास करते थे। धीरे-धीरे उनका एक आश्रम बन गया। यह आश्रम धन-धान्य से पूर्ण था। भक्त लोग स्वामीजी की सेवा करते थे। दोनों समय कीर्तन-प्रवचन इत्यादि होते थे। कुछ साधक बाहर से भी आकर रहते थे।
उस ग्राम में एक विचित्र साधु आये। उनके पास एक झोली थी, जिसमें कुछ फल-मेवा इत्यादि थे। वे साधु ग्राम के प्रत्येक घर के द्वार पर पहुँचते और राधाकृष्ण की धुन लगाते, लोग बाहर निकलकर आते और भिक्षा देने लगते। किंतु महाराज भिक्षा न लेते हुए, झोली में से निकालकर सबको फल इत्यादि वितरण कर देते। साधु के चेहरे पर तेज था, शान्ति थी और प्रेम का नि:स्पृह प्रकाश था। साधु गंगातट पर निवास करने लगे। ग्राम के लोगों की उनके प्रति श्रद्धा-भक्ति का अविरल प्रवाह बहने लगा–
स्वामी ध्यानानन्द के प्रति लोगों का खिंचाव कम हो गया। स्वामी ध्यानानन्द के मन में एक प्रश्न बार-बार उठता कि नये साधु के प्रति लोगों का इतना आकर्षण तथा सम्मान क्यों है, मैं तो बहुत समय से ग्रामवासियों की सेवा करता चला आया हूँ। इस प्रश्न ने स्वामीजी की शान्ति का अपहरण कर लिया। एक दिन स्वामीजी साधु महाराज से एकान्त में यह प्रश्न कर ही बैठे। साधु महाराज ने कहा– आपके प्रश्न का ठीक-ठीक उत्तर उस दिन दिया जायगा, जब आप मेरे साथ कभी बाहर चलेंगे और मैं आपको बिना सूचना के चलने के लिये कहूँगा।'
थोड़े दिनों के पश्चात् एक दिन साधु महाराज ने स्वामीजी को चलने के लिये कहा–'दोनों बाहर निकल गये। दिन भर यात्रा करते रहे। धधकती ग्रीष्म ऋतु की चिलचिलाती धूप में जनविहीन तथा चरण-चिह्न-विरहित अरण्य के बीच यात्रा हो रही थी। स्वामीजी ने कहा– महाराज! कहीं विश्राम करना चाहिये। स्वामीजी भूख और गरमी से व्याकुल हो रहे थे। साधु ने कहा–मैंने अपना जीवन प्रभु को समर्पित कर दिया है। जब वे विश्राम देंगे, तब विश्राम करूँगा। मैं भिक्षा भी नहीं माँगता, जब वे खिला देते हैं, तब ग्रहण कर लेता हूँ। सूर्यास्त होने लगा। अन्धकार की चादर का फैलाव बढ़ने लगा। इसी समय एक व्यक्ति ने सामने से आकर साधु महाराज को प्रणाम किया और कहा–'महाराज! इस अन्धकार में आप कहाँ जा रहे हैं, मेरे यहाँ रात्रि में विश्राम कीजिये।'
साधु और स्वामीजी उसके साथ चल दिये। वह एक टीले की तरफ बढ़ने लगा। उस टीले पर उसका निवास था। वहाँ ले जाकर उसने साधु तथा स्वामीजी को अच्छा आसन दिया, सब प्रकार की सुविधा दी तथा भोजन करवाया। उस टीले के चारों ओर घनी वनमाला फैली हुई थी। क्षितिज पृथ्वी से आलिंगन कर रहा था। सब दृश्य अन्धकार में विलीन हो रहे थे।
साधु महाराज बोले–'देखो, इस गोलाकार क्षितिज के उस पार सूर्यभगवान् ने पदार्पण किया है, उनके जाते ही अन्धकार ने अपने पैर फैला दिये हैं। क्या यह अन्धकार कोई सत्ता रखता है ? क्या इसे कोई निकालकर बाहर कर सकता है। यह तो केवल प्रकाश का अभाव है। प्रकाश के आते ही अन्धकार नहीं रहता। यही बात प्रभु–विश्वास के सम्बन्ध में है। प्रभु–विश्वास का प्रकाश सब प्रकार के अभाव के अन्धकार को दूर कर देता है। जब तक हम वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति में विश्वास करते हैं, तब तक हमें अभाव, अतृप्ति, दुःख, निराशा घेरे रहते हैं, जो हटाये नहीं जा सकते, भोजन करने से तृप्ति होती है, यह भ्रमात्मक है; क्योंकि वह तृप्ति ठहरती नहीं, फिर अतृप्ति आ घेरती है। किंतु प्रभु–विश्वास से, प्रभु–समर्पण से अतृप्ति, अभाव सदा के लिये चले जाते हैं। वस्तु, पदार्थ मिलें या न मिलें, शान्ति का साम्राज्य विशाल अपरिच्छिन्न आकाश की भाँति कभी नहीं छोड़ता।'
साधु महाराज चुप हो गये। उनकी उस मूकता में आनन्द की छटा मूक नक्षत्रों की छटा के समान छिटक रही थी। साधु महाराज ब्राह्ममुहूर्त में उठ खड़े हुए और उन्होंने स्वामीजी से चलने के लिये कहा। आतिथेय महोदय भी आ गये। उन्होंने कुछ दिन विश्राम करने के लिये आग्रह किया। स्वामीजी का भी आग्रह था–एक दिन वहाँ विश्राम किया जाय। सुन्दर भोजन, दूध, मीठा जल तथा सब सुविधाएँ वहाँ उपलब्ध थीं; किंतु साधु ने कहा–'नहीं चलना ही होगा।' आगे का पथ कठिन था, कुछ भी प्राप्य न
प्रभु–विश्वास
(यहां पर प्रभु विश्वास से तात्पर्य ईश्वरीय श्रद्धा से
है विश्वास एक तरह से किसी पर थोपा गया है ऐसा प्रतीत होता है जबकि श्रद्धा स्वयं आंतरिक
चेतना से फलित होती है इसलिए श्रद्धा का महत्व है क्योंकि जब ईश्वर के प्रति हृदय में एक बार श्रद्धा अवतरित हो जाती है तो उसके बाद कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती है श्रद्धा स्वयं ही सर्व काज कर देती है क्योंकि उसके बाद सतत् ईश्वरीय प्रसाद बरसता ही रहता है जिसमें साधक पूरी तरह ओत प्रोत हो जाता है
रही बात कहानी में विश्वास शब्द की तो यह बस
कहानी के रस को बनाए रखने के लिए जरूरी है
तो बस इतना ही, अब कहानी प्रारंभ करते हैं)
उत्तर भारत में भागीरथी के तट पर एक ग्राम है। वहाँ स्वामी ध्यानानन्द निवास करते थे। धीरे-धीरे उनका एक आश्रम बन गया। यह आश्रम धन-धान्य से पूर्ण था। भक्त लोग स्वामीजी की सेवा करते थे। दोनों समय कीर्तन-प्रवचन इत्यादि होते थे। कुछ साधक बाहर से भी आकर रहते थे।
उस ग्राम में एक विचित्र साधु आये। उनके पास एक झोली थी, जिसमें कुछ फल-मेवा इत्यादि थे। वे साधु ग्राम के प्रत्येक घर के द्वार पर पहुँचते और राधाकृष्ण की धुन लगाते, लोग बाहर निकलकर आते और भिक्षा देने लगते। किंतु महाराज भिक्षा न लेते हुए, झोली में से निकालकर सबको फल इत्यादि वितरण कर देते। साधु के चेहरे पर तेज था, शान्ति थी और प्रेम का नि:स्पृह प्रकाश था। साधु गंगातट पर निवास करने लगे। ग्राम के लोगों की उनके प्रति श्रद्धा-भक्ति का अविरल प्रवाह बहने लगा–
स्वामी ध्यानानन्द के प्रति लोगों का खिंचाव कम हो गया। स्वामी ध्यानानन्द के मन में एक प्रश्न बार-बार उठता कि नये साधु के प्रति लोगों का इतना आकर्षण तथा सम्मान क्यों है, मैं तो बहुत समय से ग्रामवासियों की सेवा करता चला आया हूँ। इस प्रश्न ने स्वामीजी की शान्ति का अपहरण कर लिया। एक दिन स्वामीजी साधु महाराज से एकान्त में यह प्रश्न कर ही बैठे। साधु महाराज ने कहा– आपके प्रश्न का ठीक-ठीक उत्तर उस दिन दिया जायगा, जब आप मेरे साथ कभी बाहर चलेंगे और मैं आपको बिना सूचना के चलने के लिये कहूँगा।'
थोड़े दिनों के पश्चात् एक दिन साधु महाराज ने स्वामीजी को चलने के लिये कहा–'दोनों बाहर निकल गये। दिन भर यात्रा करते रहे। धधकती ग्रीष्म ऋतु की चिलचिलाती धूप में जनविहीन तथा चरण-चिह्न-विरहित अरण्य के बीच यात्रा हो रही थी। स्वामीजी ने कहा– महाराज! कहीं विश्राम करना चाहिये। स्वामीजी भूख और गरमी से व्याकुल हो रहे थे। साधु ने कहा–मैंने अपना जीवन प्रभु को समर्पित कर दिया है। जब वे विश्राम देंगे, तब विश्राम करूँगा। मैं भिक्षा भी नहीं माँगता, जब वे खिला देते हैं, तब ग्रहण कर लेता हूँ। सूर्यास्त होने लगा। अन्धकार की चादर का फैलाव बढ़ने लगा। इसी समय एक व्यक्ति ने सामने से आकर साधु महाराज को प्रणाम किया और कहा–'महाराज! इस अन्धकार में आप कहाँ जा रहे हैं, मेरे यहाँ रात्रि में विश्राम कीजिये।'
साधु और स्वामीजी उसके साथ चल दिये। वह एक टीले की तरफ बढ़ने लगा। उस टीले पर उसका निवास था। वहाँ ले जाकर उसने साधु तथा स्वामीजी को अच्छा आसन दिया, सब प्रकार की सुविधा दी तथा भोजन करवाया। उस टीले के चारों ओर घनी वनमाला फैली हुई थी। क्षितिज पृथ्वी से आलिंगन कर रहा था। सब दृश्य अन्धकार में विलीन हो रहे थे।
साधु महाराज बोले–'देखो, इस गोलाकार क्षितिज के उस पार सूर्यभगवान् ने पदार्पण किया है, उनके जाते ही अन्धकार ने अपने पैर फैला दिये हैं। क्या यह अन्धकार कोई सत्ता रखता है ? क्या इसे कोई निकालकर बाहर कर सकता है। यह तो केवल प्रकाश का अभाव है। प्रकाश के आते ही अन्धकार नहीं रहता। यही बात प्रभु–विश्वास के सम्बन्ध में है। प्रभु–विश्वास का प्रकाश सब प्रकार के अभाव के अन्धकार को दूर कर देता है। जब तक हम वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति में विश्वास करते हैं, तब तक हमें अभाव, अतृप्ति, दुःख, निराशा घेरे रहते हैं, जो हटाये नहीं जा सकते, भोजन करने से तृप्ति होती है, यह भ्रमात्मक है; क्योंकि वह तृप्ति ठहरती नहीं, फिर अतृप्ति आ घेरती है। किंतु प्रभु–विश्वास से, प्रभु–समर्पण से अतृप्ति, अभाव सदा के लिये चले जाते हैं। वस्तु, पदार्थ मिलें या न मिलें, शान्ति का साम्राज्य विशाल अपरिच्छिन्न आकाश की भाँति कभी नहीं छोड़ता।'
साधु महाराज चुप हो गये। उनकी उस मूकता में आनन्द की छटा मूक नक्षत्रों की छटा के समान छिटक रही थी। साधु महाराज ब्राह्ममुहूर्त में उठ खड़े हुए और उन्होंने स्वामीजी से चलने के लिये कहा। आतिथेय महोदय भी आ गये। उन्होंने कुछ दिन विश्राम करने के लिये आग्रह किया। स्वामीजी का भी आग्रह था–एक दिन वहाँ विश्राम किया जाय। सुन्दर भोजन, दूध, मीठा जल तथा सब सुविधाएँ वहाँ उपलब्ध थीं; किंतु साधु ने कहा–'नहीं चलना ही होगा।' आगे का पथ कठिन था, कुछ भी प्राप्य न
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था। आगन्तुक ने कहा–'थोड़ा भोजन लेते जाइये;' किंतु साधु महाराज ने कहा 'संग्रह सर्वथा त्याज्य है, संग्रह प्रभु- विश्वास में विघ्न है। केवल प्रभु–विश्वास ही जीवन का सहारा होना चाहिये। '
साधु तथा स्वामीजी यात्रा पर निकल पड़े। आगे का प्रदेश मरुस्थल था। बालू के कण उड़-उड़कर शरीर को आच्छादित कर देते थे। मरुस्थल की प्रचण्ड ऊष्मा, जलविहीन धरा ने स्वामीजी को विकल कर दिया। साधु महाराज भगवान् के नाम का उच्चारण करने लगे। प्रगाढ़ अन्धकार ने फिर घेरा डाल दिया–यात्रा असम्भव हो गयी। साधु तथा स्वामीजी एक वृक्ष के नीचे ठहर गये।
दूर एक टिमटिमाता प्रकाश आता हुआ दृष्टिगोचर हुआ। वह प्रकाश उसी वृक्ष की ओर आ रहा था। एक बूढ़ा एक लालटेन लिये आ गया। उसने उन्हें देखकर पूछा–आप भूखे-प्यासे जान पड़ते हैं, थोड़ा भोजन कर लीजिये।' उसने कुछ भोजन दिया तथा जल पिलाया। उसके पास लोटे में जल था और थैली में सूखा भोजन। स्वामीजी को पृथ्वी पर सोने से नींद नहीं आयी। किंतु साधु महाराज खूब सोये और उष:काल में उठ खड़े हुए।
मरुस्थल में उष:काल में अनुपम सौन्दर्य होता है। क्षितिज के नीचे से प्रकाश ने फूटकर निर्मल आकाश को लालिमायुक्त कर दिया। साधु महाराज बोले–'जिस प्रकार निर्मल आकाश में लालिमा की भ्रान्ति हो रही है, उसी प्रकार हमारे निजस्वरूप आत्मा में भ्रान्ति से सीमित अहं का भास हो रहा है। आकाश अनन्त है, अपरिच्छिन्न है, उसका वारापार नहीं है। लालिमा तो उससे बहुत नीचे है और वास्तव में नहीं, केवल प्रतीतिमात्र है। सूर्य निकलने पर कहीं लालिमा का पता नहीं लगता। वास्तव में होती तो तब भी रहती। इसी प्रकार सीमित अहं भी अवास्तविक है, जाग्रत् में भासित होता है और फिर विलीन हो जाता है।
साधु महाराज और स्वामीजी यात्रा पर चल दिये। साधु ने पूछा–'स्वामीजी! आपको प्रश्न का उत्तर मिला कि नहीं?' स्वामीजी ने कहा–'महाराज मिल गया, मैंने आश्रम बनाकर धन-धान्य-सामग्री का संग्रह करके प्रभु–विश्वास खो दिया। जब मैं आया था, प्रभु–विश्वास था, लोगों ने सम्मान दिया और सब कुछ दिया। मैंने संग्रह किया और प्रभु से दूर हो गया। मैंने सोचा कि मेरे पश्चात् आश्रम चलाने के लिये धन की आवश्यकता होगी। धन नहीं रहेगा तो आश्रम बन्द हो जायगा। मैंने प्रभु पर विश्वास न करके धन में विश्वास किया। यह मेरी बड़ी भूल थी। अब मैं संगृहीत सब धन सेवा में व्यय करके प्रभु पर ही आश्रित रहूँगा।'
साधु ने कहा–'स्वामीजी! सम्मान चाहने से नहीं मिलता। सम्मान जगत् की सेवा तथा प्रभु में भक्ति से स्वत: प्राप्त होता है। पर सम्मान में कभी भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये।' स्वामीजी ने कहा–आपको प्रभु की अनन्य भक्ति कैसे प्राप्त हुई?
साधु ने कहा–'में जिज्ञासु था, ब्रह्मसाक्षात्कार मेरा लक्ष्य था। विचार, मनन तथा निदिध्यासन से मैंने ब्रह्म का साक्षात्कार किया। एक समय मैं मीरा का जीवन-चरित्र पढ़ रहा था, उसमें मैंने पढ़ा कि मीरा ने अनन्त रस की प्राप्ति की। मीरा ने एक प्रभु से नाता जोड़ लिया, वह अर्धरात्रि को बिखरे हुए नक्षत्रों की छाया में महल से निकल पड़ी। प्रभु के गीत गाती हुई, निर्जन प्रदेश में भ्रमण करती हुई वृन्दावन पहुँची। वहाँ सुमधुर गीतों से, अनोखे नृत्यों से वह श्रीकृष्ण का आह्वान करने लगी। वहाँ से फिर कृष्ण से साकार भेंट के लिये द्वारका पहुँची, वहीं श्रीकृष्ण से उसका सशरीर मिलन हुआ। नित-नव रसका संचार हुआ और परम रस की उपलब्धिकर वह श्रीकृष्ण से अभिन्न हो गयी। मीरा के जीवन से मुझे एक प्रेरणा हुई कि श्रीकृष्ण के रूप में सविशेष ब्रह्म के दर्शन करूँ।'
'अर्धरात्रि को पूर्णचन्द्र की श्वेत किरणें समस्त धरातल को स्नान करा रही थीं। उस समय गंगा की लहरों से गीत-गोविन्द की मधुर तानें सुनायी दे रही थीं। मैं अपने को भूल गया। किसी ने कहा–'वृन्दावन जाओ, वहाँ तुम्हारा श्रीकृष्ण से साक्षात् मिलन होगा।' मैं वृन्दावन आया और यमुना-तट पर बैठ गया। रात्रि के एकान्त में एक श्वेत वस्त्र धारण की हुई महिला दिखायी दी। उसने मुझे देखकर कहा कि 'तू कौन है, यहाँ क्यों बैठा है ? चला जा ?' मैंने महिला को प्रणाम किया और विनीत शब्दों में कहा–'मैं प्रेम-पंथ का पथिक हूँ, श्रीकृष्ण से मिलने के लिये आया हूँ।' महिला ने कहा–'यदि तू श्रीकृष्ण के दर्शन करना चाहता है तो श्रीकृष्ण के किसी विग्रह के रूप में उनका ध्यान कर, यों बैठे रहने से उनके दर्शन नहीं होंगे।' मैंने कहा–मैं ध्यान के द्वारा श्रीकृष्ण के मानस रूप के दर्शन नहीं करना चाहता, मैं तो उनके उस स्वरूप का दर्शन चाहता हूँ, जिस शरीर से उन्होंने लीला की थी।'
साधु तथा स्वामीजी यात्रा पर निकल पड़े। आगे का प्रदेश मरुस्थल था। बालू के कण उड़-उड़कर शरीर को आच्छादित कर देते थे। मरुस्थल की प्रचण्ड ऊष्मा, जलविहीन धरा ने स्वामीजी को विकल कर दिया। साधु महाराज भगवान् के नाम का उच्चारण करने लगे। प्रगाढ़ अन्धकार ने फिर घेरा डाल दिया–यात्रा असम्भव हो गयी। साधु तथा स्वामीजी एक वृक्ष के नीचे ठहर गये।
दूर एक टिमटिमाता प्रकाश आता हुआ दृष्टिगोचर हुआ। वह प्रकाश उसी वृक्ष की ओर आ रहा था। एक बूढ़ा एक लालटेन लिये आ गया। उसने उन्हें देखकर पूछा–आप भूखे-प्यासे जान पड़ते हैं, थोड़ा भोजन कर लीजिये।' उसने कुछ भोजन दिया तथा जल पिलाया। उसके पास लोटे में जल था और थैली में सूखा भोजन। स्वामीजी को पृथ्वी पर सोने से नींद नहीं आयी। किंतु साधु महाराज खूब सोये और उष:काल में उठ खड़े हुए।
मरुस्थल में उष:काल में अनुपम सौन्दर्य होता है। क्षितिज के नीचे से प्रकाश ने फूटकर निर्मल आकाश को लालिमायुक्त कर दिया। साधु महाराज बोले–'जिस प्रकार निर्मल आकाश में लालिमा की भ्रान्ति हो रही है, उसी प्रकार हमारे निजस्वरूप आत्मा में भ्रान्ति से सीमित अहं का भास हो रहा है। आकाश अनन्त है, अपरिच्छिन्न है, उसका वारापार नहीं है। लालिमा तो उससे बहुत नीचे है और वास्तव में नहीं, केवल प्रतीतिमात्र है। सूर्य निकलने पर कहीं लालिमा का पता नहीं लगता। वास्तव में होती तो तब भी रहती। इसी प्रकार सीमित अहं भी अवास्तविक है, जाग्रत् में भासित होता है और फिर विलीन हो जाता है।
साधु महाराज और स्वामीजी यात्रा पर चल दिये। साधु ने पूछा–'स्वामीजी! आपको प्रश्न का उत्तर मिला कि नहीं?' स्वामीजी ने कहा–'महाराज मिल गया, मैंने आश्रम बनाकर धन-धान्य-सामग्री का संग्रह करके प्रभु–विश्वास खो दिया। जब मैं आया था, प्रभु–विश्वास था, लोगों ने सम्मान दिया और सब कुछ दिया। मैंने संग्रह किया और प्रभु से दूर हो गया। मैंने सोचा कि मेरे पश्चात् आश्रम चलाने के लिये धन की आवश्यकता होगी। धन नहीं रहेगा तो आश्रम बन्द हो जायगा। मैंने प्रभु पर विश्वास न करके धन में विश्वास किया। यह मेरी बड़ी भूल थी। अब मैं संगृहीत सब धन सेवा में व्यय करके प्रभु पर ही आश्रित रहूँगा।'
साधु ने कहा–'स्वामीजी! सम्मान चाहने से नहीं मिलता। सम्मान जगत् की सेवा तथा प्रभु में भक्ति से स्वत: प्राप्त होता है। पर सम्मान में कभी भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये।' स्वामीजी ने कहा–आपको प्रभु की अनन्य भक्ति कैसे प्राप्त हुई?
साधु ने कहा–'में जिज्ञासु था, ब्रह्मसाक्षात्कार मेरा लक्ष्य था। विचार, मनन तथा निदिध्यासन से मैंने ब्रह्म का साक्षात्कार किया। एक समय मैं मीरा का जीवन-चरित्र पढ़ रहा था, उसमें मैंने पढ़ा कि मीरा ने अनन्त रस की प्राप्ति की। मीरा ने एक प्रभु से नाता जोड़ लिया, वह अर्धरात्रि को बिखरे हुए नक्षत्रों की छाया में महल से निकल पड़ी। प्रभु के गीत गाती हुई, निर्जन प्रदेश में भ्रमण करती हुई वृन्दावन पहुँची। वहाँ सुमधुर गीतों से, अनोखे नृत्यों से वह श्रीकृष्ण का आह्वान करने लगी। वहाँ से फिर कृष्ण से साकार भेंट के लिये द्वारका पहुँची, वहीं श्रीकृष्ण से उसका सशरीर मिलन हुआ। नित-नव रसका संचार हुआ और परम रस की उपलब्धिकर वह श्रीकृष्ण से अभिन्न हो गयी। मीरा के जीवन से मुझे एक प्रेरणा हुई कि श्रीकृष्ण के रूप में सविशेष ब्रह्म के दर्शन करूँ।'
'अर्धरात्रि को पूर्णचन्द्र की श्वेत किरणें समस्त धरातल को स्नान करा रही थीं। उस समय गंगा की लहरों से गीत-गोविन्द की मधुर तानें सुनायी दे रही थीं। मैं अपने को भूल गया। किसी ने कहा–'वृन्दावन जाओ, वहाँ तुम्हारा श्रीकृष्ण से साक्षात् मिलन होगा।' मैं वृन्दावन आया और यमुना-तट पर बैठ गया। रात्रि के एकान्त में एक श्वेत वस्त्र धारण की हुई महिला दिखायी दी। उसने मुझे देखकर कहा कि 'तू कौन है, यहाँ क्यों बैठा है ? चला जा ?' मैंने महिला को प्रणाम किया और विनीत शब्दों में कहा–'मैं प्रेम-पंथ का पथिक हूँ, श्रीकृष्ण से मिलने के लिये आया हूँ।' महिला ने कहा–'यदि तू श्रीकृष्ण के दर्शन करना चाहता है तो श्रीकृष्ण के किसी विग्रह के रूप में उनका ध्यान कर, यों बैठे रहने से उनके दर्शन नहीं होंगे।' मैंने कहा–मैं ध्यान के द्वारा श्रीकृष्ण के मानस रूप के दर्शन नहीं करना चाहता, मैं तो उनके उस स्वरूप का दर्शन चाहता हूँ, जिस शरीर से उन्होंने लीला की थी।'
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महिला ने कहा–'ऐसा नहीं होगा, तू यहाँ से चला जा।'
'मेरी आँखों से अश्रुधारा का प्रबल वेग उमड़ पड़ा।' महिला बोली–अच्छा, तू यहाँ से कुछ दूर चला जा और वहाँ से चुपचाप कृष्ण के दर्शन कर लेना।' मैंने कहा–'मैं केवल दर्शन ही नहीं चाहता, मैं उनके चरणों का स्पर्श, उनकी मधुर वाणी का श्रवण, उनके शरीर का सौरभ तथा उनके प्रसाद का रस भी प्राप्त करना चाहता हूँ, ताकि प्राकृतिक शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध से सदा के लिये मुक्त हो जाऊँ। ‘ विषयरूपी शब्द, रस, रूप, स्पर्श तथा गन्ध से कभी तृप्ति नहीं होती; क्योंकि क्षणिक तृप्ति के पश्चात् फिर अतृप्ति आ जाती है। किंतु श्रीकृष्ण के शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध की सदैव उपलब्धि होगी; क्योंकि वह दिव्य-अलौकिक है।' महिला ने कहा–'ठीक है।'
'रात्रि का समय था। यमुना का कलरव सुनायी देता था। प्रकृति निस्तब्ध थी। नक्षत्रों का झिलमिला प्रकाश पृथ्वी पर पड़ रहा था। दूर से बाँसुरी का शब्द सुनायी दिया और देखते-देखते श्रीकृष्ण आ गये। उनके मुख की शोभा अवर्णनीय थी। माधुर्य फूट-फूटकर बह रहा था। उनके शरीर से एक ज्योति निकल रही थी। मैंने चरण-स्पर्श किया। उन्होंने माखन अपने हाथ से मेरे मुख में दे दिया और वे अदृश्य हो गये।'
इतना कहकर साधु मूक हो गये स्वामीजी भी मूक हो गये। ग्राम निकट आ गया। स्वामीजी ने साधु के चरणों की धूलि अपने मस्तक पर लगायी और विदा हो गये।
सुना गया, बाद में स्वामीजी भी साधु हो गये। आश्रम का धन-धान्य सब वितरण कर दिया और वृन्दावनधाम की ओर रवाना हो गये।
– ✍
~०~
*।। जय सियाराम जी।।*
*।। ॐ नमः शिवाय।।*
'मेरी आँखों से अश्रुधारा का प्रबल वेग उमड़ पड़ा।' महिला बोली–अच्छा, तू यहाँ से कुछ दूर चला जा और वहाँ से चुपचाप कृष्ण के दर्शन कर लेना।' मैंने कहा–'मैं केवल दर्शन ही नहीं चाहता, मैं उनके चरणों का स्पर्श, उनकी मधुर वाणी का श्रवण, उनके शरीर का सौरभ तथा उनके प्रसाद का रस भी प्राप्त करना चाहता हूँ, ताकि प्राकृतिक शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध से सदा के लिये मुक्त हो जाऊँ। ‘ विषयरूपी शब्द, रस, रूप, स्पर्श तथा गन्ध से कभी तृप्ति नहीं होती; क्योंकि क्षणिक तृप्ति के पश्चात् फिर अतृप्ति आ जाती है। किंतु श्रीकृष्ण के शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध की सदैव उपलब्धि होगी; क्योंकि वह दिव्य-अलौकिक है।' महिला ने कहा–'ठीक है।'
'रात्रि का समय था। यमुना का कलरव सुनायी देता था। प्रकृति निस्तब्ध थी। नक्षत्रों का झिलमिला प्रकाश पृथ्वी पर पड़ रहा था। दूर से बाँसुरी का शब्द सुनायी दिया और देखते-देखते श्रीकृष्ण आ गये। उनके मुख की शोभा अवर्णनीय थी। माधुर्य फूट-फूटकर बह रहा था। उनके शरीर से एक ज्योति निकल रही थी। मैंने चरण-स्पर्श किया। उन्होंने माखन अपने हाथ से मेरे मुख में दे दिया और वे अदृश्य हो गये।'
इतना कहकर साधु मूक हो गये स्वामीजी भी मूक हो गये। ग्राम निकट आ गया। स्वामीजी ने साधु के चरणों की धूलि अपने मस्तक पर लगायी और विदा हो गये।
सुना गया, बाद में स्वामीजी भी साधु हो गये। आश्रम का धन-धान्य सब वितरण कर दिया और वृन्दावनधाम की ओर रवाना हो गये।
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*।। जय सियाराम जी।।*
*।। ॐ नमः शिवाय।।*
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Happy Independence Day
78वें स्वतंत्रता दिवस की
हार्दिक शुभकामनाएँ
Freedom is precious. Let’s honour the sacrifices of all the soldiers who sacrificed their lives for our independence!
Jai Hind! 🇮🇳🇮🇳
78वें स्वतंत्रता दिवस की
हार्दिक शुभकामनाएँ
Freedom is precious. Let’s honour the sacrifices of all the soldiers who sacrificed their lives for our independence!
Jai Hind! 🇮🇳🇮🇳
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*व्रत-उपवास-नियम-तप-तत्पर,*
*दान शक्तिभर, वत्सल-भृत्य।*
*दया, विनय, परनारी-वर्जन,*
*स्व-स्त्री-रति, सब सुन्दर कृत्य॥*
*आदर करता सब कुटुम्बका,*
*पालन, सबका करता मान।*
*उस गृहस्थपर कृपा-सुधा*
*बरसाते संतत श्रीभगवान॥*
*दान शक्तिभर, वत्सल-भृत्य।*
*दया, विनय, परनारी-वर्जन,*
*स्व-स्त्री-रति, सब सुन्दर कृत्य॥*
*आदर करता सब कुटुम्बका,*
*पालन, सबका करता मान।*
*उस गृहस्थपर कृपा-सुधा*
*बरसाते संतत श्रीभगवान॥*
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*विवाह रेखा पर चिंतन*
विवाह रेखा (Marriage-line) या लगाव रेखा (Affection-line) एक हो रेखा के दो नाम हैं। यह रेखा हथेली के अन्त में कनिष्ठिका अंगुली के नीचे बुध पर्वत पर अन्दर की ओर जाती हुई दिखलाई देती है। कुछ हाथों में यह बिलकुल नहीं दिखाई देती जबकि कुछ हाथों में एक से अधिक स्थिति में दिखलाई पड़ती है। प्राचीनकाल से ही हस्तरेखा विशेषज्ञों ने इसे विवाहरेखा या यूनियन लाइन (Union-line) माना है। विदेशी मान्यता है कि इस रेखा की उपस्थिति से यह मानना कि इस जातक का विवाह होगा ही होगा, गलत है क्योंकि विदेशों में विवाह एक सामान्य घटना है। व्यक्ति जिस तरह से कपड़े बदलता है, उसी तरह से स्त्रियों को बदल देता है। ऐसे व्यक्तियों को विवाह की आवश्यकता भी नहीं और उसके हाथ में शायद यह रेखा हो भी नहीं। परन्तु जिन्होंने जीवन में सम्पूर्ण मनोयोग के साथ जीवन भर साथ निभाने के लिए विवाह किया है, उनके हाथ में य रेखा गहरी व घनी पाई जाती है। विदेशी विद्वान जार्ज विलियम बेन्हाम के अनुसार इस 'लगाव रेखा' को विवाह रेखा कहना गलत होगा क्योंकि यह रेखा कानूनी विवाह को प्रमाणित न करके, किसी स्त्री के प्रति लगाव को अवश्य प्रकाशित करती है। क्योंकि यह रेखा उन स्त्री-पुरुषों के हाथों में भी पाई गयी है जिन्होंने कानूनी तौर पर या धार्मिक तौर पर किसी से विवाह नहीं कर रखा था परन्तु पर-पुरुष से इतना लगाव था कि जितना एक शादीशुदा को भी शायद न हो। स्पष्ट रूप से यदि कहूं तो भारत में जिसे विवाह रेखा कहते हैं, विदेशी हाथों में इसे मैरिज लाइन, यूनियन लाइन की जगह 'एफेक्शन लाइन' लगाव रेखा) कहना, ज्यादा सही रहेगा। क्योंकि इसी रूप में इनका फलादेश ज्यादा सटीक होता है। यह रेखा चाहे स्त्री के हाथ में हो या पुरुष के, यह विपरीत लिंगी के प्रति लगाव (आकर्षण) को अवश्य बताती है। यह रेखा जितनी गहरी व स्पष्ट होगी, जातक का लगाव उतना ही गहरा स्पष्ट होगा। रेखाएं जितनी अधिक मात्रा में होंगी जातक का लगाव उतने ही अधिक विपरीत लिंगियों से होगा। वैवाहिक क्रियाकलाप एवं प्रेम सम्पर्क के सन्दर्भ में इस रेखा का अध्ययन अत्यधिक अनिवार्य है।
विवाहरेखा का परिमापन
आप स्केल के माध्यम से बारीक बिन्दु लगाकर लगाव रेखाओं की उपस्थिति की औसत आयु निकाल सकते हैं जो कि हमारे लक्ष्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। इन रेखाओं को पैमाने के माध्यम से अलग पृष्ठ पर और भी बारीक रूप से नापा जा सकता है और सही समय निकाला जा सकता है।
किसी से लगाव कब तक रहेगा, यह जानने के लिए लगाव रेखा की स्वयं की लम्बाई प्रारम्भ से लेकर अन्त तक नापें। इस रेखा की लम्बाई का मानबिन्दु भी 70 वर्ष ही होगा। और बीचो-बीच में 36 वर्ष का निशान लगेगा।
जानें विवाहरेखा
तुलनात्मक अध्ययन विधि
जहां तक रेखा पतली हो, गायब हो, मोटी हो, उसी अंदाज से जातक के लगाव का अनुमान लगाया जा सकता है। लगाव रेखा जितनी लम्बी होगी लगाव का समय भी उतना ही लम्बा होगा। जब अनेक 'लगाव रेखाएं' हों तो रेखाओं की लम्बाई व गहराई के अनुपात से तथा हृदय रेखा एवं बुध पर्वत के बीच बने हुए पैमाने के अनुपात से लगाव की आयु एवं उसके समय को निकाला (मापा) जा सकता है। इस प्रकार से इन सबके बीच सबसे लम्बी एवं गहरी 'लगाव रेखा' को देखें, उसके समय को देखें और फिर अन्य लगाव रेखाओं की उनके अनुपात से तुलना करें।
हस्त पर उपस्थित अनेक विवाह रेखा
(अत्यधिक शौकीन मिजाज)
यदि बहुत-सी लगाव रेखाएं बुध पर्वत पर दिखलाई दें तो जातक अत्यधिक भावुक होता है तथा दूसरों को हृदय देने के मामले में अत्यधिक उदार होता है। 'लगाव रेखा' की गहराई एवं सूक्ष्मता से जातक के प्रेम प्रसंगों की गम्भीरता का पता चलता है। लगाव रेखाएं हमेशा आड़ी ही होती हैं तथा हथेली के बाहरी भाग से बुध पर्वत के अन्दर तक पहुंचती हुई दिखलाई पड़ती हैं। यदि यह रेखा एक मात्र अकेली एवं गहरी हो तो जातक का लगाव विपरीत लिंगी के प्रति गहरा है। यहां यह ध्यान रखना है कि 'लगाव रेखा' अपने परिवार या किसी कुटुम्बी जन के प्रति प्रेम को नहीं बताती है। लगाव रेखा केवल विपरीत लिंगी के प्रति वैषयिक वितृष्णा को बताती है।
समानान्तर विवाहरेखा
दोहरा लगाव
यदि दो रेखाएं समान्तर रूप से चलती हुई बराबर लम्बाई में हों तो जातक एक ही समय में दो स्त्रियों से समान रूप से प्यार करेगा। ध्यान रहे, प्रत्येक केस में लगाव रेखा जो सबसे लम्बी व गहरी होगी वही जातक की अन्तिम रूप से स्थायी लगाव रेखा मानी जायेगी।
विवाहरेखा प्रारम्भ में पतली फिर मोटी होती चली जाये
(जीवनसाथी से गहरा प्यार)
यदि रेखा प्रारम्भिक अवस्था में पतली और फिर मोटी होती चली जाये तो इस रेखा की ही तरह जातक प्रारम्भ में कम और फिर अपने प्रेमी को गहरा प्यार करता चला जायेगा।
विवाहरेखा पर द्वीप
(प्रेम प्रसंगों में अप्रियता, कलहपूर्ण वैवाहिक जीवन)
विवाह रेखा (Marriage-line) या लगाव रेखा (Affection-line) एक हो रेखा के दो नाम हैं। यह रेखा हथेली के अन्त में कनिष्ठिका अंगुली के नीचे बुध पर्वत पर अन्दर की ओर जाती हुई दिखलाई देती है। कुछ हाथों में यह बिलकुल नहीं दिखाई देती जबकि कुछ हाथों में एक से अधिक स्थिति में दिखलाई पड़ती है। प्राचीनकाल से ही हस्तरेखा विशेषज्ञों ने इसे विवाहरेखा या यूनियन लाइन (Union-line) माना है। विदेशी मान्यता है कि इस रेखा की उपस्थिति से यह मानना कि इस जातक का विवाह होगा ही होगा, गलत है क्योंकि विदेशों में विवाह एक सामान्य घटना है। व्यक्ति जिस तरह से कपड़े बदलता है, उसी तरह से स्त्रियों को बदल देता है। ऐसे व्यक्तियों को विवाह की आवश्यकता भी नहीं और उसके हाथ में शायद यह रेखा हो भी नहीं। परन्तु जिन्होंने जीवन में सम्पूर्ण मनोयोग के साथ जीवन भर साथ निभाने के लिए विवाह किया है, उनके हाथ में य रेखा गहरी व घनी पाई जाती है। विदेशी विद्वान जार्ज विलियम बेन्हाम के अनुसार इस 'लगाव रेखा' को विवाह रेखा कहना गलत होगा क्योंकि यह रेखा कानूनी विवाह को प्रमाणित न करके, किसी स्त्री के प्रति लगाव को अवश्य प्रकाशित करती है। क्योंकि यह रेखा उन स्त्री-पुरुषों के हाथों में भी पाई गयी है जिन्होंने कानूनी तौर पर या धार्मिक तौर पर किसी से विवाह नहीं कर रखा था परन्तु पर-पुरुष से इतना लगाव था कि जितना एक शादीशुदा को भी शायद न हो। स्पष्ट रूप से यदि कहूं तो भारत में जिसे विवाह रेखा कहते हैं, विदेशी हाथों में इसे मैरिज लाइन, यूनियन लाइन की जगह 'एफेक्शन लाइन' लगाव रेखा) कहना, ज्यादा सही रहेगा। क्योंकि इसी रूप में इनका फलादेश ज्यादा सटीक होता है। यह रेखा चाहे स्त्री के हाथ में हो या पुरुष के, यह विपरीत लिंगी के प्रति लगाव (आकर्षण) को अवश्य बताती है। यह रेखा जितनी गहरी व स्पष्ट होगी, जातक का लगाव उतना ही गहरा स्पष्ट होगा। रेखाएं जितनी अधिक मात्रा में होंगी जातक का लगाव उतने ही अधिक विपरीत लिंगियों से होगा। वैवाहिक क्रियाकलाप एवं प्रेम सम्पर्क के सन्दर्भ में इस रेखा का अध्ययन अत्यधिक अनिवार्य है।
विवाहरेखा का परिमापन
आप स्केल के माध्यम से बारीक बिन्दु लगाकर लगाव रेखाओं की उपस्थिति की औसत आयु निकाल सकते हैं जो कि हमारे लक्ष्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। इन रेखाओं को पैमाने के माध्यम से अलग पृष्ठ पर और भी बारीक रूप से नापा जा सकता है और सही समय निकाला जा सकता है।
किसी से लगाव कब तक रहेगा, यह जानने के लिए लगाव रेखा की स्वयं की लम्बाई प्रारम्भ से लेकर अन्त तक नापें। इस रेखा की लम्बाई का मानबिन्दु भी 70 वर्ष ही होगा। और बीचो-बीच में 36 वर्ष का निशान लगेगा।
जानें विवाहरेखा
तुलनात्मक अध्ययन विधि
जहां तक रेखा पतली हो, गायब हो, मोटी हो, उसी अंदाज से जातक के लगाव का अनुमान लगाया जा सकता है। लगाव रेखा जितनी लम्बी होगी लगाव का समय भी उतना ही लम्बा होगा। जब अनेक 'लगाव रेखाएं' हों तो रेखाओं की लम्बाई व गहराई के अनुपात से तथा हृदय रेखा एवं बुध पर्वत के बीच बने हुए पैमाने के अनुपात से लगाव की आयु एवं उसके समय को निकाला (मापा) जा सकता है। इस प्रकार से इन सबके बीच सबसे लम्बी एवं गहरी 'लगाव रेखा' को देखें, उसके समय को देखें और फिर अन्य लगाव रेखाओं की उनके अनुपात से तुलना करें।
हस्त पर उपस्थित अनेक विवाह रेखा
(अत्यधिक शौकीन मिजाज)
यदि बहुत-सी लगाव रेखाएं बुध पर्वत पर दिखलाई दें तो जातक अत्यधिक भावुक होता है तथा दूसरों को हृदय देने के मामले में अत्यधिक उदार होता है। 'लगाव रेखा' की गहराई एवं सूक्ष्मता से जातक के प्रेम प्रसंगों की गम्भीरता का पता चलता है। लगाव रेखाएं हमेशा आड़ी ही होती हैं तथा हथेली के बाहरी भाग से बुध पर्वत के अन्दर तक पहुंचती हुई दिखलाई पड़ती हैं। यदि यह रेखा एक मात्र अकेली एवं गहरी हो तो जातक का लगाव विपरीत लिंगी के प्रति गहरा है। यहां यह ध्यान रखना है कि 'लगाव रेखा' अपने परिवार या किसी कुटुम्बी जन के प्रति प्रेम को नहीं बताती है। लगाव रेखा केवल विपरीत लिंगी के प्रति वैषयिक वितृष्णा को बताती है।
समानान्तर विवाहरेखा
दोहरा लगाव
यदि दो रेखाएं समान्तर रूप से चलती हुई बराबर लम्बाई में हों तो जातक एक ही समय में दो स्त्रियों से समान रूप से प्यार करेगा। ध्यान रहे, प्रत्येक केस में लगाव रेखा जो सबसे लम्बी व गहरी होगी वही जातक की अन्तिम रूप से स्थायी लगाव रेखा मानी जायेगी।
विवाहरेखा प्रारम्भ में पतली फिर मोटी होती चली जाये
(जीवनसाथी से गहरा प्यार)
यदि रेखा प्रारम्भिक अवस्था में पतली और फिर मोटी होती चली जाये तो इस रेखा की ही तरह जातक प्रारम्भ में कम और फिर अपने प्रेमी को गहरा प्यार करता चला जायेगा।
विवाहरेखा पर द्वीप
(प्रेम प्रसंगों में अप्रियता, कलहपूर्ण वैवाहिक जीवन)
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यदि लगाव रेखा पर कोई द्वीप दिखलाई दे तो प्रेम प्रसंगों के दौरान कोई अप्रिय घटना घटित होगी। विवाह रेखा पर द्वीप जातक की अपराध प्रवृत्ति को बतलाता है। ऐसा व्यक्ति अपने जीवनसाथी के साथ झगड़ता रहता है। वैवाहिक जीवन कलह व कष्टमय रहता है। यह सुखी वैवाहिक जीवन के लिए अशुभ चिह्न है।
विवाहरेखा पर क्रॉस
(प्रेम-प्रसंग में विघ्न)
यदि लगाव रेखा पर कड़ी (Cross) दिखलाई पड़े तो विवाह या प्रेम प्रसंग में भयंकर विघ्न आयेगा। ऐसे जातक की पत्नी विदुषी होती है पर उनके जीवन की अन्तिम अवस्था कष्टपूर्ण होती है।
विवाहरेखा पर सितारा
यदि यह रेखा एक सितारे की आकृति के साथ समाप्त हो तो प्रेम प्रसंग विस्फोटक होगा।
और यदि यह रेखा कुछ लम्बी होकर सूर्य पर्वत तक पहुंच जाये और वहां पर एक सितारा हो तो जातक का किसी ऐसे व्यक्ति से प्यार होगा जो अत्यन्त ही सौभाग्यशाली, धनी एवं मानी होगा।
विवाहरेखा पर क्रॉस
(प्रेम-प्रसंग में विघ्न)
यदि लगाव रेखा पर कड़ी (Cross) दिखलाई पड़े तो विवाह या प्रेम प्रसंग में भयंकर विघ्न आयेगा। ऐसे जातक की पत्नी विदुषी होती है पर उनके जीवन की अन्तिम अवस्था कष्टपूर्ण होती है।
विवाहरेखा पर सितारा
यदि यह रेखा एक सितारे की आकृति के साथ समाप्त हो तो प्रेम प्रसंग विस्फोटक होगा।
और यदि यह रेखा कुछ लम्बी होकर सूर्य पर्वत तक पहुंच जाये और वहां पर एक सितारा हो तो जातक का किसी ऐसे व्यक्ति से प्यार होगा जो अत्यन्त ही सौभाग्यशाली, धनी एवं मानी होगा।
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*रक्षाबंधन 2024 पर विशेष लेख*
*19 अगस्त 2024 सोमवार के दिन रक्षाबंधन का पर्व है। ज्योतिष मान्यता के अनुसार भद्रा काल में राखी नहीं बांधी जाती है।
*भद्रा का वास:-* 19 अगस्त 2024 को भद्रा का वास पाताल लोक में रहेगा। ज्योतिष मान्यता के अनुसार यदि भद्रा पृथ्वीलोक की हो तो ही इसके नियम मान्य होते हैं। इसलिए अधिकतर ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस दिन कभी भी शुभ मुहूर्त में राखी बांध सकते हैं। भद्राकाल सुबह 09:51 से प्रारंभ होकर दोपहर 01:30 तक रहेगा।
*भद्रा मुख-* सुबह 10:56 से दोपहर 12:37 तक।
*भद्रा अन्त समय-* दोपहर 01:30 से।
*कब बांधें राखी:-* यानी सुबह 09 बजकर 51 मिनट से दोपहर 01 बजकर 30 मिनट के बीच राखी नहीं बांध सकते हैं। इसके बाद शाम 7 बजे के पहले तक राखी बांध सकते हैं क्योंकि शाम 7:00 बजे से पंचक प्रारंभ होंगे। इसलिए शाम 7 के पहले ही राखी बांध लें।
*🌻रक्षाबंधन पर राखी बांधने का शुभ मुहूर्त:-*
*अभिजीत मुहूर्त:-* सुबह 11:58 से दोपहर 12:51 तक।
*विजय मुहूर्त:-* दोपहर 02:35 से दोपहर 03:27 तक।
*गोधूलि मुहूर्त:-* शाम 06:56 से 07:18 तक।
*रक्षा बंधन प्रदोष मुहूर्त:-* शाम 06:56:06 से रात्रि 09:07:31 तक।
*सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त:-* मध्याह्न 3:30 से 6:45 मिनट तक।
*19 अगस्त 2024 सोमवार के दिन रक्षाबंधन का पर्व है। ज्योतिष मान्यता के अनुसार भद्रा काल में राखी नहीं बांधी जाती है।
*भद्रा का वास:-* 19 अगस्त 2024 को भद्रा का वास पाताल लोक में रहेगा। ज्योतिष मान्यता के अनुसार यदि भद्रा पृथ्वीलोक की हो तो ही इसके नियम मान्य होते हैं। इसलिए अधिकतर ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस दिन कभी भी शुभ मुहूर्त में राखी बांध सकते हैं। भद्राकाल सुबह 09:51 से प्रारंभ होकर दोपहर 01:30 तक रहेगा।
*भद्रा मुख-* सुबह 10:56 से दोपहर 12:37 तक।
*भद्रा अन्त समय-* दोपहर 01:30 से।
*कब बांधें राखी:-* यानी सुबह 09 बजकर 51 मिनट से दोपहर 01 बजकर 30 मिनट के बीच राखी नहीं बांध सकते हैं। इसके बाद शाम 7 बजे के पहले तक राखी बांध सकते हैं क्योंकि शाम 7:00 बजे से पंचक प्रारंभ होंगे। इसलिए शाम 7 के पहले ही राखी बांध लें।
*🌻रक्षाबंधन पर राखी बांधने का शुभ मुहूर्त:-*
*अभिजीत मुहूर्त:-* सुबह 11:58 से दोपहर 12:51 तक।
*विजय मुहूर्त:-* दोपहर 02:35 से दोपहर 03:27 तक।
*गोधूलि मुहूर्त:-* शाम 06:56 से 07:18 तक।
*रक्षा बंधन प्रदोष मुहूर्त:-* शाम 06:56:06 से रात्रि 09:07:31 तक।
*सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त:-* मध्याह्न 3:30 से 6:45 मिनट तक।
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