*जिंदगी के आईने में देख रोज ही संवरना पड़ता हैं हो दिल में कितने भी गम लेकिन ओढ़ के नकाब इस जमाने के सामने हर रोज मुस्कुराना पड़ता हैं भाग्य को मत कोसो क्यों कि भाग्य से बड़ा तो कर्म है जो स्वयं आप के हाथों में है बिना कुछ किए सिर्फ एक ही चीज आगे बढ़ती है और वो है उम्र एक बार टूटकर कभी पहले जैसा नहीं रहता वो फिर चाहे रिश्ता हो या विश्वास कल्पना सुंदर होती है,पर उससे जिया नहीं जा सकता और वास्तविकता कडवी होती है पर उसे छोड़ा नहीं जा सकता एक सफल इंसान की नीव उसके अच्छे विचार होते हैं अपने लिए जीना तो आम कहानी हैं औरों के लिए जीना ही जिंदगानी हैं*
*आपको लगता है आप तो झूठ बोलते ही नहीं बिलकुल सत्य प्रेम और धर्म के मार्ग पऱ चल रहे है वैसा हमें भी लगता है इसी तरह हर व्यक्ति क़ो लगता होगा क्योंकि झूठा जीवन मे किसी क़ो वरदास्त नहीं है फिर अगर सारा देश धर्म सत्य प्रेम की राह पऱ चल रहा है तो लोग सहयोग प्रेम के लिए क्यों तड़प रहे है ग़रीबी और अमीरी का भेद क्यों है क्या आप और हम अपने आपसे पूछते है की आखिर हम कैसे है,इस भीषण गर्मी तपन से व्याकुल समस्त जन मानस का हाल यह है कि कहने के लिए ये तीनों सर्प मोर बाघ एक जगह नहीं रहते, किन्तु इस जगत की तपन ने सबको इतना विहृवल कर दिया कि व्याकुलता से सर्प मोर और बाघ एक जगह हैं।*
*अगर हम हर समय खूबसूरत जवाब दे तो सुनने को सदा खूबसूरत ही मिलेगा जिससे उत्साह बना रहेगा और अन्य को उत्साहित करते रहेंगे जो सभी संपदाओं में श्रेष्ठ रहेगा तभी तो हम विशाल हो पाते है और मानव होने की यही खूबसूरती भी है,जब हम सोचते है कि बड़े है तो बहुत ही छोटा कद हो जाता है मगर जब जानते है कि हम कुछ भी नहीं है तो महान होना सफलता है,जीवन में जब कुछ न हो,तो धैर्य की परीक्षा होती है,और जब सब कुछ होता है,तो व्यवहार की परीक्षा होती है,अतः धैर्य एवं व्यवहार का समन्वय,हमे बनाये रखना चाहिए*
*आपको लगता है आप तो झूठ बोलते ही नहीं बिलकुल सत्य प्रेम और धर्म के मार्ग पऱ चल रहे है वैसा हमें भी लगता है इसी तरह हर व्यक्ति क़ो लगता होगा क्योंकि झूठा जीवन मे किसी क़ो वरदास्त नहीं है फिर अगर सारा देश धर्म सत्य प्रेम की राह पऱ चल रहा है तो लोग सहयोग प्रेम के लिए क्यों तड़प रहे है ग़रीबी और अमीरी का भेद क्यों है क्या आप और हम अपने आपसे पूछते है की आखिर हम कैसे है,इस भीषण गर्मी तपन से व्याकुल समस्त जन मानस का हाल यह है कि कहने के लिए ये तीनों सर्प मोर बाघ एक जगह नहीं रहते, किन्तु इस जगत की तपन ने सबको इतना विहृवल कर दिया कि व्याकुलता से सर्प मोर और बाघ एक जगह हैं।*
*अगर हम हर समय खूबसूरत जवाब दे तो सुनने को सदा खूबसूरत ही मिलेगा जिससे उत्साह बना रहेगा और अन्य को उत्साहित करते रहेंगे जो सभी संपदाओं में श्रेष्ठ रहेगा तभी तो हम विशाल हो पाते है और मानव होने की यही खूबसूरती भी है,जब हम सोचते है कि बड़े है तो बहुत ही छोटा कद हो जाता है मगर जब जानते है कि हम कुछ भी नहीं है तो महान होना सफलता है,जीवन में जब कुछ न हो,तो धैर्य की परीक्षा होती है,और जब सब कुछ होता है,तो व्यवहार की परीक्षा होती है,अतः धैर्य एवं व्यवहार का समन्वय,हमे बनाये रखना चाहिए*
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जीवन की हर स्वाँस में ईश्वर का ही रंग भरा है, कहीं सूर्य की ताजी लालिमा कही किरणों के संग सज़ा है। कहीं मधुर-मधुर अनगित रंगो में खुद को पिरोया है तितलियाँ में, तो कहीं मेघों के बीच से कौंधती कड़कती काली बिजलियों में, कहीं सघन अविराम शान्ति चेतन राग समेटे निस्तब्ध निशा में, तो कहीं उदित है अविरल विराट नित् व्योम में, कही खेतों में लहलहाती फसलों के हरे सुनहरे रंगो में, कही सरसों और सूरजमुखी की पीली-पीली रंग अंकिया में। हर ओर ही हर रंग में बस ईश्वर का ही रंग दिखा है।
ईश्वर ने वरदान स्वरुप ही ये परम दिव्य जीवन रचा है। परम आभारी है ये संपूर्ण जीव जगत प्रभु तेरा ! तू सब का है, सब में है, सभी तुझ में ही हैं, तू ही सब है और सभी तेरे हैं।
।। श्री परमात्मने नमः ।।
ईश्वर ने वरदान स्वरुप ही ये परम दिव्य जीवन रचा है। परम आभारी है ये संपूर्ण जीव जगत प्रभु तेरा ! तू सब का है, सब में है, सभी तुझ में ही हैं, तू ही सब है और सभी तेरे हैं।
।। श्री परमात्मने नमः ।।
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*मनको विशुद्ध करो*
इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम पाप करते रहो, दुष्ट विचार और दुर्गुणोंमें प्रीति करके उन्हें बढ़ाते रहो, भगवान् को न मानकर पार्थिव पदार्थोंपर अभिमान करो और ऐसा करते हुए भी अपनेको शक्तिमान् और बलवान मान बैठो और भगवान् को भूलकर केवल अहंकारमें ही डूबे रहो। मनके शुभ निश्चयके अनुसार ही शुभ आचरण भी करो। यह सत्य है कि भगवान् की कृपाके बलसे तुम्हारे मनका निश्चय अटल हो जायगा और तुम्हारे आचरण अपने-आप शुभ बनने लगेंगे, परंतु तुम नित्य उस कृपाका अनुभव करते रहो और कृपाके बलसे तमाम बुराइयोंको हटाते हुए कल्याणके मार्गमें बढ़ते रहो!
इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम पाप करते रहो, दुष्ट विचार और दुर्गुणोंमें प्रीति करके उन्हें बढ़ाते रहो, भगवान् को न मानकर पार्थिव पदार्थोंपर अभिमान करो और ऐसा करते हुए भी अपनेको शक्तिमान् और बलवान मान बैठो और भगवान् को भूलकर केवल अहंकारमें ही डूबे रहो। मनके शुभ निश्चयके अनुसार ही शुभ आचरण भी करो। यह सत्य है कि भगवान् की कृपाके बलसे तुम्हारे मनका निश्चय अटल हो जायगा और तुम्हारे आचरण अपने-आप शुभ बनने लगेंगे, परंतु तुम नित्य उस कृपाका अनुभव करते रहो और कृपाके बलसे तमाम बुराइयोंको हटाते हुए कल्याणके मार्गमें बढ़ते रहो!
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।। श्री गणेश ।।
जेतुं यस्त्रिपुरं हरेण हरिणा व्याजाद्वलिं बध्नता
सृष्टुम् वारिभवोद्भवेन भुवनं शेषेण धर्तुं धराम्।
पार्वत्या महिषासुरप्रमथने सिद्धाधिपै: सिद्धये
ध्यातः पञ्चशरेणविश्वजितये पायात्सनागाननः।।
भावार्थ-
त्रिपुरासुर को जीतने के लिए शिव ने, बलि को छल से बांधते समय विष्णु ने, जगत को रचने के लिए ब्रह्मा ने, पृथ्वी को धारण करने के लिए शेषनाग ने, महिषासुर को मारने के लिए पार्वती ने, सिद्धि पाने के लिए सिद्धों के अधिपतियों ने और सब संसार को जीतने के लिए कामदेव ने जिन गणेशजी का ध्यान किया है, वे हमलोगों की रक्षा करें।
जेतुं यस्त्रिपुरं हरेण हरिणा व्याजाद्वलिं बध्नता
सृष्टुम् वारिभवोद्भवेन भुवनं शेषेण धर्तुं धराम्।
पार्वत्या महिषासुरप्रमथने सिद्धाधिपै: सिद्धये
ध्यातः पञ्चशरेणविश्वजितये पायात्सनागाननः।।
भावार्थ-
त्रिपुरासुर को जीतने के लिए शिव ने, बलि को छल से बांधते समय विष्णु ने, जगत को रचने के लिए ब्रह्मा ने, पृथ्वी को धारण करने के लिए शेषनाग ने, महिषासुर को मारने के लिए पार्वती ने, सिद्धि पाने के लिए सिद्धों के अधिपतियों ने और सब संसार को जीतने के लिए कामदेव ने जिन गणेशजी का ध्यान किया है, वे हमलोगों की रक्षा करें।
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कर्म फल की मान्यता क्यों?
भारतीय संस्कृति में कर्मफल के सिद्धांत को विश्वासपूर्वक मान्यता प्रदान की गई है। मनुष्य को जो कुछ भी उसके जीवन में प्राप्त होता है, वह सब उसके क्मो का ही फल है। मनुष्य के सुख-दुख, हानि-लाभ, जीत-हार, सुख-दुख के पीछे उसके कर्मो को आधार माना गया है।
कर्म फल भोगने की अनिवार्यता पर कहा गया है
नाभक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतरपि।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥ -ब्रह्मवैवर्तपुराण 37/16
अर्थात् करोड़ों कल्प वर्ष बीत जाने पर भी कर्मफल भोगे बिना, मनुष्य को कर्म से छुटकारा नहीं मिल सकता। वह शुभ या अशुभ जैसे भी कर्म करता है, उसका फल अवश्य भोगना पड़ता है। यही बात शिवमहापुराण और महाभारत के वनपर्व में भी कही गई है।
ऐहिकं प्राक्तनं वापि कर्म यचितं स्फुरत। पौरुषोऽसौ परो यत्नो न कदाचन निष्फलः ॥ -योगवासिष्ठ 3/95/34
अर्थात् पूर्वजन्म और इस जन्म के किए हुए कर्म, फल रूप में अवश्य प्रकट होते हैं। मनुष्य का किया हुआ यत्न, फल लाए बिना नहीं रहता है।
रामायण के अयोध्याकांड में देवगुरु बृहस्पति देवराज इंद्र को भगवान् की कर्म-मर्यादा का बोध कराते हुए कहते हैं
कर्म प्रधान विश्व करि राखा।
जो जस करै सो तस फल चाखा॥
काहु न कोउ सुख-दुख कर दाता।
निज कृत करम भोग सब भ्राता ।
अर्थात् विश्व में कर्म ही प्रधान है, जो जैसा करता है, उसे वैसा फल भोगना ही पड़ता है। दुनिया में कोई किसी को न दुख देने में समर्थ है, न सुख देने में। सभी व्यक्ति अपने किए हुए कमों का ही फल भोगते हैं। कहा जाता है कि बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों, ज्ञानी-ध्यानी, महाराजाधिराज, पराक्रमी, बड़े-बड़े सम्राट, महापुरुषों, बलशाली व्यक्तियों को भी अपने- अपने कर्मों का फल भोगना पड़ा है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास मिला और उनकी पत्नी माता सीता का अपहरण हुआ। महाबलशाली भीम को रसोइया बनकर नौकरी करनी पड़ी। महाप्रतापी सम्राट् नल को अपनी प्राण प्यारी पत्नी दमयंती को वन में अकेला छोड़कर राजा ऋतुपर्ण का कोचवान बनना पड़ा। महाराजा हरिश्चन्द्र को श्मशान में चांडाल की चाकरी करनी पड़ी। महारानी द्रौपदी को सैरन्ध्री बनकर रानियों की सेवा करनी पड़ी। महाप्रतापी और गांडीवधारी अर्जुन को हिजड़ा बनकर विराटूराज की कन्या को नाचना सिखाना पड़ा।
भारतीय संस्कृति में कर्मफल के सिद्धांत को विश्वासपूर्वक मान्यता प्रदान की गई है। मनुष्य को जो कुछ भी उसके जीवन में प्राप्त होता है, वह सब उसके क्मो का ही फल है। मनुष्य के सुख-दुख, हानि-लाभ, जीत-हार, सुख-दुख के पीछे उसके कर्मो को आधार माना गया है।
कर्म फल भोगने की अनिवार्यता पर कहा गया है
नाभक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतरपि।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥ -ब्रह्मवैवर्तपुराण 37/16
अर्थात् करोड़ों कल्प वर्ष बीत जाने पर भी कर्मफल भोगे बिना, मनुष्य को कर्म से छुटकारा नहीं मिल सकता। वह शुभ या अशुभ जैसे भी कर्म करता है, उसका फल अवश्य भोगना पड़ता है। यही बात शिवमहापुराण और महाभारत के वनपर्व में भी कही गई है।
ऐहिकं प्राक्तनं वापि कर्म यचितं स्फुरत। पौरुषोऽसौ परो यत्नो न कदाचन निष्फलः ॥ -योगवासिष्ठ 3/95/34
अर्थात् पूर्वजन्म और इस जन्म के किए हुए कर्म, फल रूप में अवश्य प्रकट होते हैं। मनुष्य का किया हुआ यत्न, फल लाए बिना नहीं रहता है।
रामायण के अयोध्याकांड में देवगुरु बृहस्पति देवराज इंद्र को भगवान् की कर्म-मर्यादा का बोध कराते हुए कहते हैं
कर्म प्रधान विश्व करि राखा।
जो जस करै सो तस फल चाखा॥
काहु न कोउ सुख-दुख कर दाता।
निज कृत करम भोग सब भ्राता ।
अर्थात् विश्व में कर्म ही प्रधान है, जो जैसा करता है, उसे वैसा फल भोगना ही पड़ता है। दुनिया में कोई किसी को न दुख देने में समर्थ है, न सुख देने में। सभी व्यक्ति अपने किए हुए कमों का ही फल भोगते हैं। कहा जाता है कि बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों, ज्ञानी-ध्यानी, महाराजाधिराज, पराक्रमी, बड़े-बड़े सम्राट, महापुरुषों, बलशाली व्यक्तियों को भी अपने- अपने कर्मों का फल भोगना पड़ा है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास मिला और उनकी पत्नी माता सीता का अपहरण हुआ। महाबलशाली भीम को रसोइया बनकर नौकरी करनी पड़ी। महाप्रतापी सम्राट् नल को अपनी प्राण प्यारी पत्नी दमयंती को वन में अकेला छोड़कर राजा ऋतुपर्ण का कोचवान बनना पड़ा। महाराजा हरिश्चन्द्र को श्मशान में चांडाल की चाकरी करनी पड़ी। महारानी द्रौपदी को सैरन्ध्री बनकर रानियों की सेवा करनी पड़ी। महाप्रतापी और गांडीवधारी अर्जुन को हिजड़ा बनकर विराटूराज की कन्या को नाचना सिखाना पड़ा।
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कहानी का समय
अगले सफर की तैयारी
एक राज्य का क़ानून था कि वो एक साल बाद अपना राजा बदल लेते थे। उस दिन जो भी सब से पहले शहर में आता था तो उसे राजा घोषित कर लेते थे, और इससे पहले वाले राजा को एक बहुत ही ख़तरनाक और मीलों मॆं फैले जंगल के बीचों बीच छोड़कर आते जहां बेचारा अगर खूंखार जानवरो से किसी तरह अपने आप को बचा लेता तो भूख- प्यास से मर जाता । ना जाने कितने ही राजा ऐसे ही एक साल की राजगद्दी के बाद जंगल में जा कर मर गए ।
एक बार राज्य में एक नौजवान किसी दूसरे राज्य से आया और इस राज्य के कानून से अनजान था, तब सब लोगों ने आगे बढ़कर उसे बधाईयाँ दी और उसे बताया कि उसको इस राज्य का राजा चुन लिया गया है और उसे बड़े मान-शान के साथ राजमहल में ले गए । वो हैरान भी हुआ और बहुत ख़ुश भी ।राजगद्दी पर बैठते ही उसने पूछा कि
मुझ से पहले जो राजा था, वो कहाँ है? तो दरबारियों ने उसे इस राज्य का क़ानून बताया कि हर राजा को एक साल बाद जंगल में छोड़ दिया जाता है और नया राजा चुन लिया जाता है । ये बात सुनते ही वो एक बार तो परेशान हुआ लेकिन फिर उसने अपनी दिमाग का इस्तेमाल करते हुए कहा कि मुझे उस जगह लेकर चलो जहाँ तुम अपने पहले के राजाओ को छोड़कर आते हो।दरबारियों ने सिपाहियों को साथ लिया और नये नियुक्त राजा को वो जगह दिखाने जंगल में ले गए। राजा ने अच्छी तरह उस जगह को देख लिया और वापस आ गया । अगले दिन उसने सबसे पहला आदेश ये दिया कि मेरे राजमहल से जंगल तक एक सड़क बनाई जाये और जंगल के बीचों बीच एक ख़ूबसूरत राजमहल बनाया जाये जहाँ पर हर तरह की सुविधा मौजूद हों और राजमहल के बाहर ख़ूबसूरत बाग़ बनाया जाएं।राजा के आदेश का पालन किया गया। जंगल मे सड़क और राजमहल बनकर तैयार हो गया। एक साल के पूरे होते ही राजा ने दरबारियों से कहा कि आप अपने कानून का पालन करो और मुझे वहाँ छोड़ आओ जहाँ मुझ से पहले राजाओ को छोड़ के आते थे।दरबारियों ने कहा कि महाराज आज से ये कानून ख़त्म हो गया क्योंकि हमें एक अक़लमंद राजा मिल गया है, वहाँ तो हम उन बेवक़ूफ राजाओ को छोड़कर आते थे जो एक साल की राजशाही के मज़े में बाक़ी की ज़िंदगी को भूल जाते और अपने लिए कोई बंदोबस्त ना करते थे, लेकिन आप ने अपने दिमाग का इस्तेमाल किया और आगे का बंदोबस्त कर लिया। हमें ऐसे ही होशियार राजा की ज़रूरत थी अब आप आराम से सारी ज़िंदगी हमारे राज्य पर राज करें ।
👉शिक्षा
अब हम लोग भी यह सोचें कि कुछ दिन बाद हमें भी ये दुनिया वाले एक दिन ऐसी जगह छोड़कर आयेंगे जहां से कोई वापस नहीं आता तो क्यो ना हम भी वक्त रहते हुए सकर्म और अपने परिवार,देश के लिए कुछ करके अपने अगले सफर की तैयारी कर लें या बेवक़ूफ़ बन कर कुछ दिनों की ज़िंदगी के मज़ों में लगे रहें और ये जन्म बर्बाद कर लें ।
सदैव प्रसन्न रहिये।
अगले सफर की तैयारी
एक राज्य का क़ानून था कि वो एक साल बाद अपना राजा बदल लेते थे। उस दिन जो भी सब से पहले शहर में आता था तो उसे राजा घोषित कर लेते थे, और इससे पहले वाले राजा को एक बहुत ही ख़तरनाक और मीलों मॆं फैले जंगल के बीचों बीच छोड़कर आते जहां बेचारा अगर खूंखार जानवरो से किसी तरह अपने आप को बचा लेता तो भूख- प्यास से मर जाता । ना जाने कितने ही राजा ऐसे ही एक साल की राजगद्दी के बाद जंगल में जा कर मर गए ।
एक बार राज्य में एक नौजवान किसी दूसरे राज्य से आया और इस राज्य के कानून से अनजान था, तब सब लोगों ने आगे बढ़कर उसे बधाईयाँ दी और उसे बताया कि उसको इस राज्य का राजा चुन लिया गया है और उसे बड़े मान-शान के साथ राजमहल में ले गए । वो हैरान भी हुआ और बहुत ख़ुश भी ।राजगद्दी पर बैठते ही उसने पूछा कि
मुझ से पहले जो राजा था, वो कहाँ है? तो दरबारियों ने उसे इस राज्य का क़ानून बताया कि हर राजा को एक साल बाद जंगल में छोड़ दिया जाता है और नया राजा चुन लिया जाता है । ये बात सुनते ही वो एक बार तो परेशान हुआ लेकिन फिर उसने अपनी दिमाग का इस्तेमाल करते हुए कहा कि मुझे उस जगह लेकर चलो जहाँ तुम अपने पहले के राजाओ को छोड़कर आते हो।दरबारियों ने सिपाहियों को साथ लिया और नये नियुक्त राजा को वो जगह दिखाने जंगल में ले गए। राजा ने अच्छी तरह उस जगह को देख लिया और वापस आ गया । अगले दिन उसने सबसे पहला आदेश ये दिया कि मेरे राजमहल से जंगल तक एक सड़क बनाई जाये और जंगल के बीचों बीच एक ख़ूबसूरत राजमहल बनाया जाये जहाँ पर हर तरह की सुविधा मौजूद हों और राजमहल के बाहर ख़ूबसूरत बाग़ बनाया जाएं।राजा के आदेश का पालन किया गया। जंगल मे सड़क और राजमहल बनकर तैयार हो गया। एक साल के पूरे होते ही राजा ने दरबारियों से कहा कि आप अपने कानून का पालन करो और मुझे वहाँ छोड़ आओ जहाँ मुझ से पहले राजाओ को छोड़ के आते थे।दरबारियों ने कहा कि महाराज आज से ये कानून ख़त्म हो गया क्योंकि हमें एक अक़लमंद राजा मिल गया है, वहाँ तो हम उन बेवक़ूफ राजाओ को छोड़कर आते थे जो एक साल की राजशाही के मज़े में बाक़ी की ज़िंदगी को भूल जाते और अपने लिए कोई बंदोबस्त ना करते थे, लेकिन आप ने अपने दिमाग का इस्तेमाल किया और आगे का बंदोबस्त कर लिया। हमें ऐसे ही होशियार राजा की ज़रूरत थी अब आप आराम से सारी ज़िंदगी हमारे राज्य पर राज करें ।
👉शिक्षा
अब हम लोग भी यह सोचें कि कुछ दिन बाद हमें भी ये दुनिया वाले एक दिन ऐसी जगह छोड़कर आयेंगे जहां से कोई वापस नहीं आता तो क्यो ना हम भी वक्त रहते हुए सकर्म और अपने परिवार,देश के लिए कुछ करके अपने अगले सफर की तैयारी कर लें या बेवक़ूफ़ बन कर कुछ दिनों की ज़िंदगी के मज़ों में लगे रहें और ये जन्म बर्बाद कर लें ।
सदैव प्रसन्न रहिये।
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जो मोसों मोसी करौ, नाहीं कछु मोहि ठौर ।
तुम हो तैसी कीजिए, अहो रसिक सिर मौर॥
यदि आप मेरे साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा मेरे कर्मों के अनुसार होना चाहिए, तो हे प्रभु, मैं इतना बड़ा पापी हूँ कि मेरा उद्धार कभी संभव नहीं होगा। आपके अतिरिक्त अब मेरा कोई दूसरा आश्रय नहीं है। आप तो परम कृपालु हैं, पतितों को भी अपने हृदय से लगाने वाले हैं। कृपा करके, हे रसिक सिरमौर, अपने उसी स्वभाव वश मुझ दीन पर भी अपनी कृपा बरसाइए।
तुम हो तैसी कीजिए, अहो रसिक सिर मौर॥
यदि आप मेरे साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा मेरे कर्मों के अनुसार होना चाहिए, तो हे प्रभु, मैं इतना बड़ा पापी हूँ कि मेरा उद्धार कभी संभव नहीं होगा। आपके अतिरिक्त अब मेरा कोई दूसरा आश्रय नहीं है। आप तो परम कृपालु हैं, पतितों को भी अपने हृदय से लगाने वाले हैं। कृपा करके, हे रसिक सिरमौर, अपने उसी स्वभाव वश मुझ दीन पर भी अपनी कृपा बरसाइए।
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*आनन्द तो केवल श्री कृष्ण प्रेम में है..*
कोई भक्त,रसिक जब लम्बी गहरी सांस लेकर..आँखों में प्रेमाश्रु भर कर..आह कृष्ण...हे गोविन्द !..मेरे माधव कह कर पुकारता है
तो वह कैसे असीम आनन्द में खो जाता है उस आनन्द के स्वरूपको शब्दों के द्वारा लिख कर या बोल कर प्रकट नहीं किया जा सकता ।ये तो अनुभूति का विषय है।
हाँ अगर शास्त्र या संतजन से जैसा सुना है उस अनुसार आनन्द के स्वरूपकी चर्चा करे तो...भगवान् और आनन्द पर्यावाची शब्द हैं।
आत्मा की परमात्मा की एकता है और दोनों में अपनापन होने पर जीव स्वाभाविक रूप से आनन्दित हो जाता है।
क्यों कि अंश अपने अंशी से मिलकर ही आनन्द पा सकता है और वह आनन्द नित्य ,नवीन शाश्वत रहता है।
आत्मा को अपना निजानन्द मिल जाने के बाद छिनता नहीं बल्कि यह आनन्द हमेशा रहता है और दिन प्रति दिन बढ़ता रहता है। फिर जीव मायातीत हो जाता है।
आत्मा का सुख उसका अपना सहज स्वरूपहै और वह नित्य है। हम मन को श्री कृष्ण में लगाकर जितना दृढ़ता से अपनापन करेंगे,उतना ही आनन्द हमें मिलेगा।
लेकिन हम ने माया के वशीभूत हो कर मन को भोग पूर्ण आहार विहार में लगा दिया और संसार में आनन्द खोजने लगे।
आनन्द तो हमें मिला नहीं पर दुःखी जरूर हो गए। हमारा शरीर और संसार एकही तत्व से बना है इस लिए जड़ एवं नश्वर वस्तु या व्यक्ति में सुख खोजना हमारा स्वभाव बन गया है,
यह हमारा अज्ञान ही है कि जिस में सुख है ही नहीं वो हमें सुख कहाँ से देगा। हम जन्म-जन्मान्तर से संसार में सुख खोजते आ रहे हैं
किन्तु हमारी सुख की चाह आज तक अपूर्ण ही है। सुख चाहने की यह मान्यता इतनी मजबूती से हमारे मानने में आ गईहै कि अब इसको मिटाना इतना आसान काम नहीं रह गया है।
श्री कृष्ण प्रेम और शरणागति ही एक साधन है।...पूर्ण शरणागत हुए बिना इस अज्ञान को दूर नहीं किया जा सकता कि आनन्द संसार में नहीं केवल श्री कृष्ण में है।
श्री कृष्ण हमारे माता-पिता एवं सर्वस्य हैं। इस लिए हमें एक श्री कृष्ण को अपना मान कर पुकार लगानी चाहिए
कि ...हे गोविन्द ! हमें अपनी शरण प्रदान करने की कृपा करें जिस से हम शाश्वत आनन्द की अनुभूति कर सके।
जेहि विधि तोहे अति प्यारी लागो..
तैसी मोहे कीजिये किशोरी, मैं तो बार बार ये मांगो..
और न काज कछु का हो,सो बस तुम संग ही अनुरागो..
भोरी तेरी रीझ लहन हित,ये त्रिभुवन तृण सो त्यागो..!!
कोई भक्त,रसिक जब लम्बी गहरी सांस लेकर..आँखों में प्रेमाश्रु भर कर..आह कृष्ण...हे गोविन्द !..मेरे माधव कह कर पुकारता है
तो वह कैसे असीम आनन्द में खो जाता है उस आनन्द के स्वरूपको शब्दों के द्वारा लिख कर या बोल कर प्रकट नहीं किया जा सकता ।ये तो अनुभूति का विषय है।
हाँ अगर शास्त्र या संतजन से जैसा सुना है उस अनुसार आनन्द के स्वरूपकी चर्चा करे तो...भगवान् और आनन्द पर्यावाची शब्द हैं।
आत्मा की परमात्मा की एकता है और दोनों में अपनापन होने पर जीव स्वाभाविक रूप से आनन्दित हो जाता है।
क्यों कि अंश अपने अंशी से मिलकर ही आनन्द पा सकता है और वह आनन्द नित्य ,नवीन शाश्वत रहता है।
आत्मा को अपना निजानन्द मिल जाने के बाद छिनता नहीं बल्कि यह आनन्द हमेशा रहता है और दिन प्रति दिन बढ़ता रहता है। फिर जीव मायातीत हो जाता है।
आत्मा का सुख उसका अपना सहज स्वरूपहै और वह नित्य है। हम मन को श्री कृष्ण में लगाकर जितना दृढ़ता से अपनापन करेंगे,उतना ही आनन्द हमें मिलेगा।
लेकिन हम ने माया के वशीभूत हो कर मन को भोग पूर्ण आहार विहार में लगा दिया और संसार में आनन्द खोजने लगे।
आनन्द तो हमें मिला नहीं पर दुःखी जरूर हो गए। हमारा शरीर और संसार एकही तत्व से बना है इस लिए जड़ एवं नश्वर वस्तु या व्यक्ति में सुख खोजना हमारा स्वभाव बन गया है,
यह हमारा अज्ञान ही है कि जिस में सुख है ही नहीं वो हमें सुख कहाँ से देगा। हम जन्म-जन्मान्तर से संसार में सुख खोजते आ रहे हैं
किन्तु हमारी सुख की चाह आज तक अपूर्ण ही है। सुख चाहने की यह मान्यता इतनी मजबूती से हमारे मानने में आ गईहै कि अब इसको मिटाना इतना आसान काम नहीं रह गया है।
श्री कृष्ण प्रेम और शरणागति ही एक साधन है।...पूर्ण शरणागत हुए बिना इस अज्ञान को दूर नहीं किया जा सकता कि आनन्द संसार में नहीं केवल श्री कृष्ण में है।
श्री कृष्ण हमारे माता-पिता एवं सर्वस्य हैं। इस लिए हमें एक श्री कृष्ण को अपना मान कर पुकार लगानी चाहिए
कि ...हे गोविन्द ! हमें अपनी शरण प्रदान करने की कृपा करें जिस से हम शाश्वत आनन्द की अनुभूति कर सके।
जेहि विधि तोहे अति प्यारी लागो..
तैसी मोहे कीजिये किशोरी, मैं तो बार बार ये मांगो..
और न काज कछु का हो,सो बस तुम संग ही अनुरागो..
भोरी तेरी रीझ लहन हित,ये त्रिभुवन तृण सो त्यागो..!!
👍4
*जो मिलना है वो मिलता ही है, जो नहीं मिलना वो नहीं ही मिलता, तब प्रयास करने से क्या होगा? नींद में जो सुख मिलता है, वो विषय सुख है क्या? अप्राप्त विषय के लिए यह मन चारों और भटकता है, और न मिलने पर तड़पता है। यह स्वरूप में वैसे ही नहीं डूबता जैसे कितना ही वेग से तुम्बा जल में फेंको, वह बाहर आ ही जाता है। ऐसे कुमार्गी मन के लिए वैराग्य ही एक मात्र छड़ी है।*
*नदी यदि सागर तक न जाए और एक स्थान पर ही स्थिर हो जाए, तो वो स्वयं ही सागर हो जाए। मन विषयों में न जाकर अपने में ही रहता हुआ अपने कारण का विचार करे तो मन ही आत्मरूप हो जाए। तमोगुणी और पापमयी विषयासक्त मन अगर वैराग्याग्नि में तप जाए तो वह स्वतः सत्वगुणी हो जाए। बिना दरवाजे के किले में बंद सिंह, लाख प्रयास करके भी जब मार्ग नहीं पाता, तब थक कर श्वास भरता हुआ शांत बैठ ही जाता है, यों ही इंद्रियों के द्वार रोक देने पर यह मन अन्य कोई उपाय न पाता हुआ, शांत हो ही जाता है। वासना के त्याग, श्वास में जप, सत्संग और भगवान के चरणों के ध्यान से, मन धीरे धीरे अपना वेग छोड़ ही देता है।
*नदी यदि सागर तक न जाए और एक स्थान पर ही स्थिर हो जाए, तो वो स्वयं ही सागर हो जाए। मन विषयों में न जाकर अपने में ही रहता हुआ अपने कारण का विचार करे तो मन ही आत्मरूप हो जाए। तमोगुणी और पापमयी विषयासक्त मन अगर वैराग्याग्नि में तप जाए तो वह स्वतः सत्वगुणी हो जाए। बिना दरवाजे के किले में बंद सिंह, लाख प्रयास करके भी जब मार्ग नहीं पाता, तब थक कर श्वास भरता हुआ शांत बैठ ही जाता है, यों ही इंद्रियों के द्वार रोक देने पर यह मन अन्य कोई उपाय न पाता हुआ, शांत हो ही जाता है। वासना के त्याग, श्वास में जप, सत्संग और भगवान के चरणों के ध्यान से, मन धीरे धीरे अपना वेग छोड़ ही देता है।
👍8
*कुदरत को नापसंद है सख्ती बयान में।*
*इसीलिए तो दी नहीं हड्डी जुबान में।।*
*शरीर के प्रत्येक अंग में हड्डी है, पर इस जीभ में हड्डी नहीं है। यह सुर में मिली ही नहीं है, और जब सुर में मिल जाय। कबीर दास जी कहते हैं --*
*खेंचत तार मरोड़त खूंटी।*
*और जब सुर में मिल जाय, तो यह जब बजेगा --*
*निकसत राग हजूरे का ।।*
*सुर में मिल जाय तो परमात्मा का स्वर निकलता है।*
*खेंचत तार मरोड़त खूंटी।*
*निकसत राग हजूरे का।*
*साधो यह तन साज तमूरे का।।*
*और जब मिल जाय, तो -*
*सदा अलमस्त रहते हैं मिसाले तार तम्बूरे।*
*जरा छेड़े से बजते हैं, बजा ले जिसका जी चाहे।।*
*संत सुर में मिले तार हैं और सुर किससे मिला है? ईश्वर से। एक गीत बड़ा प्रसिद्ध है --*
*मिले सुर मेरा तुम्हारा, और ईश्वर से सुर मिल जाय। तो स्वर मिलना चाहिए ईश्वर से, लेकिन हमारा स्वर मिला है नश्वर से। यह शरीर नश्वर है कि नहीं? एक दिन छूटेगा। पर हमने अपना स्वर मिलाया नश्वर से, और हमारा स्वर मिलना चाहिए ईश्वर से।*
*तो शरीर है नश्वर, पर इस नश्वर शरीर में बैठकर स्वर मिल जाय ईश्वर से, और कब मिलेगा? जब हम गाने लगें --*
*मैं नहीं मेरा नहीं, यह तन किसी का है दिया।*
*देने वाले ने दिया, वह भी दिया किस शान से।।*
*मेरा है यह लेने वाला, कह उठा अभिमान से।*
*मेरा मेरा कहने वाला, मन किसी का है दिया।।*
*अच्छा हम लोग क्या कहते हैं, अपने मित्रों से भी कहते हैं -- जब तक हमारी सांस चल रही है, तब तक हम तुम्हारा साथ देंगे। भावना अच्छी है, लेकिन जरा यह विचार करो, स्वांस हमारी है क्या? हमारी नहीं है।*
*अच्छा एक बात बताओ, स्वांस हमारी है कि स्वांस हमारे लिए है? अच्छा बोलो, अगर स्वांस हमारी होती, तो हमारा जब मन होता तो लेते जब मन नहीं होता तो नहीं लेते, और कोई कहता -- स्वांस नहीं ले रहे हो तुम? तो हम कहते -- हमारी स्वांस, लें कि न लें, तुम्हें क्या मतलब? कई लोग नहीं लेते हैं और रविवार को तो बिल्कुल नहीं लेते कि छुट्टी का दिन है। लेकिन स्वांस हम लेते हैं कि स्वांस लेनी पड़ती है? अच्छा लेनी पड़ती है, इसी से सिद्ध होता है कि स्वांस हमारी नहीं है, स्वांस हमारे लिए है, पर हमें ध्यान नहीं रहता।*
*रेलगाड़ी में बैठे हैं, अब मोबाइल पर फोन आया। हैलो! अब उधर से पूछता है -- कहाँ पहुंचे? रेलगाड़ी में बैठा आदमी कहता है -- अभी तो चले ही आ रहे हैं, कल से चले हैं। इनसे पूछो-- कल सेे चले हैं कि कल से बैठे हैं? चल तो रेलगाड़ी रही है, जो सरकारी है।*
*और मैं भी आपसे कहता हूँ कि चल स्वांस रही है जो सरकारी है, भगवान की है, भगवान ने हमें दी है।*
*तेरी रहमत का अजीब करिश्मा देखा।*
*चलता तू है और पहुंचता मैं हूँ।।*
*यह स्वांस भी चल रही है भगवान के कारण। यह शरीर मिला है भगवान के कारण, हम इस लायक नहीं थे कि हमें मनुष्य बना दिया जाय। अच्छा, हम मनुष्य होने लायक हैं ही नहीं। क्रोध में क्या बोलते हैं? जब क्रोध आता है तो कहते हैं -- हम तुम्हें कच्चा खा जायेंगे। यह आदमी का काम है? तुम्हारी हड्डी चबा जायेंगे, तुम्हारा खून पी जाऊंगा, ये आदमी के लक्षण हैं? नहीं हैं ना।*
*इसीलिए तो दी नहीं हड्डी जुबान में।।*
*शरीर के प्रत्येक अंग में हड्डी है, पर इस जीभ में हड्डी नहीं है। यह सुर में मिली ही नहीं है, और जब सुर में मिल जाय। कबीर दास जी कहते हैं --*
*खेंचत तार मरोड़त खूंटी।*
*और जब सुर में मिल जाय, तो यह जब बजेगा --*
*निकसत राग हजूरे का ।।*
*सुर में मिल जाय तो परमात्मा का स्वर निकलता है।*
*खेंचत तार मरोड़त खूंटी।*
*निकसत राग हजूरे का।*
*साधो यह तन साज तमूरे का।।*
*और जब मिल जाय, तो -*
*सदा अलमस्त रहते हैं मिसाले तार तम्बूरे।*
*जरा छेड़े से बजते हैं, बजा ले जिसका जी चाहे।।*
*संत सुर में मिले तार हैं और सुर किससे मिला है? ईश्वर से। एक गीत बड़ा प्रसिद्ध है --*
*मिले सुर मेरा तुम्हारा, और ईश्वर से सुर मिल जाय। तो स्वर मिलना चाहिए ईश्वर से, लेकिन हमारा स्वर मिला है नश्वर से। यह शरीर नश्वर है कि नहीं? एक दिन छूटेगा। पर हमने अपना स्वर मिलाया नश्वर से, और हमारा स्वर मिलना चाहिए ईश्वर से।*
*तो शरीर है नश्वर, पर इस नश्वर शरीर में बैठकर स्वर मिल जाय ईश्वर से, और कब मिलेगा? जब हम गाने लगें --*
*मैं नहीं मेरा नहीं, यह तन किसी का है दिया।*
*देने वाले ने दिया, वह भी दिया किस शान से।।*
*मेरा है यह लेने वाला, कह उठा अभिमान से।*
*मेरा मेरा कहने वाला, मन किसी का है दिया।।*
*अच्छा हम लोग क्या कहते हैं, अपने मित्रों से भी कहते हैं -- जब तक हमारी सांस चल रही है, तब तक हम तुम्हारा साथ देंगे। भावना अच्छी है, लेकिन जरा यह विचार करो, स्वांस हमारी है क्या? हमारी नहीं है।*
*अच्छा एक बात बताओ, स्वांस हमारी है कि स्वांस हमारे लिए है? अच्छा बोलो, अगर स्वांस हमारी होती, तो हमारा जब मन होता तो लेते जब मन नहीं होता तो नहीं लेते, और कोई कहता -- स्वांस नहीं ले रहे हो तुम? तो हम कहते -- हमारी स्वांस, लें कि न लें, तुम्हें क्या मतलब? कई लोग नहीं लेते हैं और रविवार को तो बिल्कुल नहीं लेते कि छुट्टी का दिन है। लेकिन स्वांस हम लेते हैं कि स्वांस लेनी पड़ती है? अच्छा लेनी पड़ती है, इसी से सिद्ध होता है कि स्वांस हमारी नहीं है, स्वांस हमारे लिए है, पर हमें ध्यान नहीं रहता।*
*रेलगाड़ी में बैठे हैं, अब मोबाइल पर फोन आया। हैलो! अब उधर से पूछता है -- कहाँ पहुंचे? रेलगाड़ी में बैठा आदमी कहता है -- अभी तो चले ही आ रहे हैं, कल से चले हैं। इनसे पूछो-- कल सेे चले हैं कि कल से बैठे हैं? चल तो रेलगाड़ी रही है, जो सरकारी है।*
*और मैं भी आपसे कहता हूँ कि चल स्वांस रही है जो सरकारी है, भगवान की है, भगवान ने हमें दी है।*
*तेरी रहमत का अजीब करिश्मा देखा।*
*चलता तू है और पहुंचता मैं हूँ।।*
*यह स्वांस भी चल रही है भगवान के कारण। यह शरीर मिला है भगवान के कारण, हम इस लायक नहीं थे कि हमें मनुष्य बना दिया जाय। अच्छा, हम मनुष्य होने लायक हैं ही नहीं। क्रोध में क्या बोलते हैं? जब क्रोध आता है तो कहते हैं -- हम तुम्हें कच्चा खा जायेंगे। यह आदमी का काम है? तुम्हारी हड्डी चबा जायेंगे, तुम्हारा खून पी जाऊंगा, ये आदमी के लक्षण हैं? नहीं हैं ना।*
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*सहिब श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी*
*चरणी चलउ मारगि ठाकुर कै रसना हरि गुण गाए ॥२॥*
मैं पैरों से मालिक के मार्ग पर चलता हूँ और जिह्म से प्रभु के गुण गाता हूँ॥२॥
*देखिओ द्रिसटि सरब मंगल रूप उलटी संत कराए ॥*
मैं अपनी आँखों से सर्व मंगल रूप देखता हूँ, संतों ने मेरा जीवन बदल दिया है।
*पाइओ लालु अमोलु नामु हरि छोडि न कतहू जाए ॥३॥*
मैंने हरिनाम रूपी अमूल्य रत्न पा लिया है, जिसे अब बिल्कुल नहीं छोड़ सकता ॥३॥
*कवन उपमा कउन बडाई किआ गुन कहउ रीझाए ॥*
परमात्मा की क्या उपमा वर्णन करूँ, कौन-सी महिमा एवं क्या गुण गाऊँ कि वह खुश हो जाए।
*होत क्रिपाल दीन दइआ प्रभ जन नानक दास दसाए ॥४॥८॥*
हे नानक ! दीनों पर दया करने वाला प्रभु सदैव अपने दासों पर कृपालु है॥४॥८॥
*सारग महला ५ ॥*
सारग महला ५ ॥
*ओइ सुख का सिउ बरनि सुनावत ॥*
वह सुख किस तरह बताकर सुनाऊँ,
*अनद बिनोद पेखि प्रभ दरसन मनि मंगल गुन गावत ॥१॥ रहाउ ॥*
प्रभु के दर्शनों से खुशियाँ एवं उल्लास उत्पन्न हो जाता है और मन उसके ही गुण गाता है॥१॥रहाउ॥।
*बिसम भई पेखि बिसमादी पूरि रहे किरपावत ॥*
कृपालु प्रभु की अद्भुत लीलाओं को देखकर चकित हो गई हूँ।
*पीओ अम्रित नामु अमोलक जिउ चाखि गूंगा मुसकावत ॥१॥*
ज्यों गूगा व्यक्ति मिठाई खा कर अपनी खुशी का इजहार करता है, वैसे ही मैंने अमूल्य नाम अमृत का पान किया है।॥१॥
*जैसे पवनु बंध करि राखिओ बूझ न आवत जावत ॥*
जैसे प्राण-वायु को शरीर में बाँध कर रखा हुआ है और उसके आने जाने की खबर नहीं होती,
*जा कउ रिदै प्रगासु भइओ हरि उआ की कही न जाइ कहावत ॥२॥*
वैसे ही जिसके हृदय में परम-सत्य का प्रकाश होता है, उसकी कीर्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता ॥२ ॥
*आन उपाव जेते किछु कहीअहि तेते सीखे पावत ॥*
अन्य जितने भी उपाय हैं, सबका इस्तेमाल कर लिया है।
*अचिंत लालु ग्रिह भीतरि प्रगटिओ अगम जैसे परखावत ॥३॥*
मेरा प्रभु नैसर्गिक हृदय घर में प्रगट हो गया है, ज्यों अगम को जानने का बल मिला है॥३॥
*निरगुण निरंकार अबिनासी अतुलो तुलिओ न जावत ॥*
वह निर्गुण निराकार, अविनाशी, अतुल्य है, उसकी महिमा की तुलना नहीं की जा सकती।
*कहु नानक अजरु जिनि जरिआ तिस ही कउ बनि आवत ॥४॥९॥*
हे नानक ! जिसने अजरावस्था को प्राप्त कर लिया है, उसी को सफलता प्राप्त हुई है॥ ४ ॥६॥
*सारग महला ५ ॥*
सारग महला ५ ॥
*बिखई दिनु रैनि इव ही गुदारै ॥*
विलासी पुरुष दिन-रात व्यर्थ ही गुजार देता है,
*गोबिंदु न भजै अह्मबुधि माता जनमु जूऐ जिउ हारै ॥१॥ रहाउ ॥*
वह गोविंद का भजन नहीं करता और अहंकार में लीन रहकर अपनी जीवन बाजी को जुए में हार देता है॥१॥रहाउ॥।
*नामु अमोला प्रीति न तिस सिउ पर निंदा हितकारै ॥*
वह अमूल्य प्रभु-नाम से प्रेम नहीं करता और पराई निंदा को ही लाभदायक मानता है।
*छापरु बांधि सवारै त्रिण को दुआरै पावकु जारै ॥१॥*
वह तिनकों को संवार कर झोंपड़ी तैयार करता है और द्वार पर माया की अग्नि जला लेता है॥१॥
*कालर पोट उठावै मूंडहि अम्रितु मन ते डारै ॥*
वह सिर पर मिट्टी की पोटली उठा लेता है और अमृत को मन से निकाल देता है।
*ओढै बसत्र काजर महि परिआ बहुरि बहुरि फिरि झारै ॥२॥*
वह काजल में पड़े हुए वस्त्रों को पहनता है और बार-बार उनको झाड़ता है॥ २ ॥
*काटै पेडु डाल परि ठाढौ खाइ खाइ मुसकारै ॥*
जिस पेड़ की डाल पर खड़ा होता है, उस पेड़ को काट देता है और विषय-विकारों का सेवन कर मुस्कुराता है।
*गिरिओ जाइ रसातलि परिओ छिटी छिटी सिर भारै ॥३॥*
परिणामस्वरूप सिर के बल गिरता जाता है और रसातल में पड़ता है॥३॥
*निरवैरै संगि वैरु रचाए पहुचि न सकै गवारै ॥*
वह सज्जन पुरुषों से वैर करता है, लेकिन वह मूर्ख अपनी कोशिश में सफल नहीं होता।
*कहु नानक संतन का राखा पारब्रहमु निरंकारै ॥४॥१०॥*
हे नानक ! निराकार परब्रह्म सदैव भक्तजनों की रक्षा करने वाला है॥ ४ ॥ १० ॥
*सारग महला ५ ॥*
सारग महला ५ ॥
*अवरि सभि भूले भ्रमत न जानिआ ॥*
अन्य सभी लोग भूले हुए हैं और उन्होंने सत्य को नहीं जाना।
*एकु सुधाखरु जा कै हिरदै वसिआ तिनि बेदहि ततु पछानिआ ॥१॥ रहाउ ॥*
जिसके हृदय में एक शुद्ध अक्षर ऑकार बस गया है, उसने वेदों के सार तत्व को पहचान लिया है॥ १॥ रहाउ ॥
*परविरति मारगु जेता किछु होईऐ तेता लोग पचारा ॥*
जितना भी प्रवृति-मार्ग अपनाया जाता है, उतना ही लोकाचार है।
*जउ लउ रिदै नही परगासा तउ लउ अंध अंधारा ॥१॥*
जब तक ह्रदय में सत्य का आलोक नहीं होता, तब तक ज्ञान का घोर अंधेरा ही बना रहता है।॥ १॥
*जैसे धरती साधै बहु बिधि बिनु बीजै नही जांमै ॥*
जिस प्रकार धरती पर अनेक प्रकार से सिंचाई की जाए परन्तु बीज बोए बिना खेती नहीं जमती।
*राम नाम बिनु मुकति न होई है तुटै नाही अभिमानै ॥२॥*
वैसे ही राम नाम के स्मरण बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती और न ही अभिमान समाप्त होता है।॥२॥
*नीरु बिलोवै अति स्रमु पावै नैनू कैसे रीसै ॥*
*चरणी चलउ मारगि ठाकुर कै रसना हरि गुण गाए ॥२॥*
मैं पैरों से मालिक के मार्ग पर चलता हूँ और जिह्म से प्रभु के गुण गाता हूँ॥२॥
*देखिओ द्रिसटि सरब मंगल रूप उलटी संत कराए ॥*
मैं अपनी आँखों से सर्व मंगल रूप देखता हूँ, संतों ने मेरा जीवन बदल दिया है।
*पाइओ लालु अमोलु नामु हरि छोडि न कतहू जाए ॥३॥*
मैंने हरिनाम रूपी अमूल्य रत्न पा लिया है, जिसे अब बिल्कुल नहीं छोड़ सकता ॥३॥
*कवन उपमा कउन बडाई किआ गुन कहउ रीझाए ॥*
परमात्मा की क्या उपमा वर्णन करूँ, कौन-सी महिमा एवं क्या गुण गाऊँ कि वह खुश हो जाए।
*होत क्रिपाल दीन दइआ प्रभ जन नानक दास दसाए ॥४॥८॥*
हे नानक ! दीनों पर दया करने वाला प्रभु सदैव अपने दासों पर कृपालु है॥४॥८॥
*सारग महला ५ ॥*
सारग महला ५ ॥
*ओइ सुख का सिउ बरनि सुनावत ॥*
वह सुख किस तरह बताकर सुनाऊँ,
*अनद बिनोद पेखि प्रभ दरसन मनि मंगल गुन गावत ॥१॥ रहाउ ॥*
प्रभु के दर्शनों से खुशियाँ एवं उल्लास उत्पन्न हो जाता है और मन उसके ही गुण गाता है॥१॥रहाउ॥।
*बिसम भई पेखि बिसमादी पूरि रहे किरपावत ॥*
कृपालु प्रभु की अद्भुत लीलाओं को देखकर चकित हो गई हूँ।
*पीओ अम्रित नामु अमोलक जिउ चाखि गूंगा मुसकावत ॥१॥*
ज्यों गूगा व्यक्ति मिठाई खा कर अपनी खुशी का इजहार करता है, वैसे ही मैंने अमूल्य नाम अमृत का पान किया है।॥१॥
*जैसे पवनु बंध करि राखिओ बूझ न आवत जावत ॥*
जैसे प्राण-वायु को शरीर में बाँध कर रखा हुआ है और उसके आने जाने की खबर नहीं होती,
*जा कउ रिदै प्रगासु भइओ हरि उआ की कही न जाइ कहावत ॥२॥*
वैसे ही जिसके हृदय में परम-सत्य का प्रकाश होता है, उसकी कीर्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता ॥२ ॥
*आन उपाव जेते किछु कहीअहि तेते सीखे पावत ॥*
अन्य जितने भी उपाय हैं, सबका इस्तेमाल कर लिया है।
*अचिंत लालु ग्रिह भीतरि प्रगटिओ अगम जैसे परखावत ॥३॥*
मेरा प्रभु नैसर्गिक हृदय घर में प्रगट हो गया है, ज्यों अगम को जानने का बल मिला है॥३॥
*निरगुण निरंकार अबिनासी अतुलो तुलिओ न जावत ॥*
वह निर्गुण निराकार, अविनाशी, अतुल्य है, उसकी महिमा की तुलना नहीं की जा सकती।
*कहु नानक अजरु जिनि जरिआ तिस ही कउ बनि आवत ॥४॥९॥*
हे नानक ! जिसने अजरावस्था को प्राप्त कर लिया है, उसी को सफलता प्राप्त हुई है॥ ४ ॥६॥
*सारग महला ५ ॥*
सारग महला ५ ॥
*बिखई दिनु रैनि इव ही गुदारै ॥*
विलासी पुरुष दिन-रात व्यर्थ ही गुजार देता है,
*गोबिंदु न भजै अह्मबुधि माता जनमु जूऐ जिउ हारै ॥१॥ रहाउ ॥*
वह गोविंद का भजन नहीं करता और अहंकार में लीन रहकर अपनी जीवन बाजी को जुए में हार देता है॥१॥रहाउ॥।
*नामु अमोला प्रीति न तिस सिउ पर निंदा हितकारै ॥*
वह अमूल्य प्रभु-नाम से प्रेम नहीं करता और पराई निंदा को ही लाभदायक मानता है।
*छापरु बांधि सवारै त्रिण को दुआरै पावकु जारै ॥१॥*
वह तिनकों को संवार कर झोंपड़ी तैयार करता है और द्वार पर माया की अग्नि जला लेता है॥१॥
*कालर पोट उठावै मूंडहि अम्रितु मन ते डारै ॥*
वह सिर पर मिट्टी की पोटली उठा लेता है और अमृत को मन से निकाल देता है।
*ओढै बसत्र काजर महि परिआ बहुरि बहुरि फिरि झारै ॥२॥*
वह काजल में पड़े हुए वस्त्रों को पहनता है और बार-बार उनको झाड़ता है॥ २ ॥
*काटै पेडु डाल परि ठाढौ खाइ खाइ मुसकारै ॥*
जिस पेड़ की डाल पर खड़ा होता है, उस पेड़ को काट देता है और विषय-विकारों का सेवन कर मुस्कुराता है।
*गिरिओ जाइ रसातलि परिओ छिटी छिटी सिर भारै ॥३॥*
परिणामस्वरूप सिर के बल गिरता जाता है और रसातल में पड़ता है॥३॥
*निरवैरै संगि वैरु रचाए पहुचि न सकै गवारै ॥*
वह सज्जन पुरुषों से वैर करता है, लेकिन वह मूर्ख अपनी कोशिश में सफल नहीं होता।
*कहु नानक संतन का राखा पारब्रहमु निरंकारै ॥४॥१०॥*
हे नानक ! निराकार परब्रह्म सदैव भक्तजनों की रक्षा करने वाला है॥ ४ ॥ १० ॥
*सारग महला ५ ॥*
सारग महला ५ ॥
*अवरि सभि भूले भ्रमत न जानिआ ॥*
अन्य सभी लोग भूले हुए हैं और उन्होंने सत्य को नहीं जाना।
*एकु सुधाखरु जा कै हिरदै वसिआ तिनि बेदहि ततु पछानिआ ॥१॥ रहाउ ॥*
जिसके हृदय में एक शुद्ध अक्षर ऑकार बस गया है, उसने वेदों के सार तत्व को पहचान लिया है॥ १॥ रहाउ ॥
*परविरति मारगु जेता किछु होईऐ तेता लोग पचारा ॥*
जितना भी प्रवृति-मार्ग अपनाया जाता है, उतना ही लोकाचार है।
*जउ लउ रिदै नही परगासा तउ लउ अंध अंधारा ॥१॥*
जब तक ह्रदय में सत्य का आलोक नहीं होता, तब तक ज्ञान का घोर अंधेरा ही बना रहता है।॥ १॥
*जैसे धरती साधै बहु बिधि बिनु बीजै नही जांमै ॥*
जिस प्रकार धरती पर अनेक प्रकार से सिंचाई की जाए परन्तु बीज बोए बिना खेती नहीं जमती।
*राम नाम बिनु मुकति न होई है तुटै नाही अभिमानै ॥२॥*
वैसे ही राम नाम के स्मरण बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती और न ही अभिमान समाप्त होता है।॥२॥
*नीरु बिलोवै अति स्रमु पावै नैनू कैसे रीसै ॥*
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अगर सख्त मेहनत करके जल को बिलोया जाए, तो भी मक्खन प्राप्त नहीं होता।
*बिनु गुर भेटे मुकति न काहू मिलत नही जगदीसै ॥३॥*
इसी प्रकार गुरु से साक्षात्कार के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती और न ही परमेश्वर मिलता है।॥३॥
*बिनु गुर भेटे मुकति न काहू मिलत नही जगदीसै ॥३॥*
इसी प्रकार गुरु से साक्षात्कार के बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती और न ही परमेश्वर मिलता है।॥३॥
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स्वप्नशास्त्र
सच साबित होते हैं भोर के सपने
*सोते समय सपना देखना एक सामान्य प्रक्रिया होती है. लगभग हर इंसान सपना जरूर देखता है. ये सपने कई तरह के हो सकते हैं. कुछ सपने ऐसे होते हैं, अगर नींद टूट जाए, तो पछतावा होने लगता है. लेकिन कुछ सपने ऐसे होते हैं, जिनको देखने पर गहरी नींद में सोता हुआ व्यक्ति भी उठ के बैठ जाता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, ये सपने व्यक्ति की जिंदगी में होने वाली घटनाओं की ओर इशारा करती हैं, जो कि अच्छे और बुरे दोनों हो सकते हैं. ऐसे में कुछ सपने होते हैं, जो कि सच साबित हो जाते हैं.*
*सपने कब साबित होते हैं सच*
स्वप्न शास्त्र के अनुसार, ब्रह्म मुहूर्त में दिखाई देने वाले सपनों के सच साबित होने की प्रबल संभावना रहती है, क्योंकि यह समय भगवान का माना जाता है. अगर आपने सुबह 4 बजे से 5:30 बजे के बीच में सपना देखते हैं, तो यह आपकी जिंदगी बदल सकते हैं. व्यक्ति की जिंदगी में धन-दौलत, शान-शौकत की कोई कमी नहीं रहती है.
*ब्रह्म मुहूर्त के ये सपने होते हैं सच*
सुख-समृद्धि में होती है बढ़ोतरी
स्वप्न शास्त्र के मुताबिक, ब्रह्म मुहूर्त में अगर देवी-देवता नजर आएं, तो उस व्यक्ति पर भगवान की खास कृपा रहती है. ये सपने आपके भाग्य को बदलने का संकेत देते हैं. इससे घर में सुख-समृद्धि और मान-सम्मान में बढ़ावा देने का काम करते हैं. इसके अलावा, व्यक्ति को मनचाही मुराद भी मिल सकती है.
*आर्थिक स्थिति होती है मजबूत*
स्वप्न शास्त्र के अनुसार, अगर सपने में पानी से भरा हुआ मटका दिखाई दे, तो यह जिंदगी बदलने का संकेत देता है. यह आपकी आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने का काम करता है. इससे जिंदगी में सुख-समृद्धि आती है.
*अमीर बनने का होता है संकेत*
स्वप्न शास्त्र की माने तो ब्रह्म मुहूर्त में या भोर के समय जगमगाता हुआ दीपक नजर आए, तो बहुत शुभ होता है. यह भगवान की कृपा की ओर इशारा करता है. यह सपना आपको जल्द अमीर बनने का संकेत देता है.
*किसी के साथ न करें शेयर*
हालांकि, एक बात का खास ख्याल रखना पड़ता है. अगर आपको सपने में ये चीजें नजर आएं, तो आपको किसी के साथ इनको साझा नहीं करना चाहिए. अगर आप इस बात को नजर अंदाज करते हैं, तो इससे मिलने वाला लाभ खत्म हो जाएगा.
सच साबित होते हैं भोर के सपने
*सोते समय सपना देखना एक सामान्य प्रक्रिया होती है. लगभग हर इंसान सपना जरूर देखता है. ये सपने कई तरह के हो सकते हैं. कुछ सपने ऐसे होते हैं, अगर नींद टूट जाए, तो पछतावा होने लगता है. लेकिन कुछ सपने ऐसे होते हैं, जिनको देखने पर गहरी नींद में सोता हुआ व्यक्ति भी उठ के बैठ जाता है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, ये सपने व्यक्ति की जिंदगी में होने वाली घटनाओं की ओर इशारा करती हैं, जो कि अच्छे और बुरे दोनों हो सकते हैं. ऐसे में कुछ सपने होते हैं, जो कि सच साबित हो जाते हैं.*
*सपने कब साबित होते हैं सच*
स्वप्न शास्त्र के अनुसार, ब्रह्म मुहूर्त में दिखाई देने वाले सपनों के सच साबित होने की प्रबल संभावना रहती है, क्योंकि यह समय भगवान का माना जाता है. अगर आपने सुबह 4 बजे से 5:30 बजे के बीच में सपना देखते हैं, तो यह आपकी जिंदगी बदल सकते हैं. व्यक्ति की जिंदगी में धन-दौलत, शान-शौकत की कोई कमी नहीं रहती है.
*ब्रह्म मुहूर्त के ये सपने होते हैं सच*
सुख-समृद्धि में होती है बढ़ोतरी
स्वप्न शास्त्र के मुताबिक, ब्रह्म मुहूर्त में अगर देवी-देवता नजर आएं, तो उस व्यक्ति पर भगवान की खास कृपा रहती है. ये सपने आपके भाग्य को बदलने का संकेत देते हैं. इससे घर में सुख-समृद्धि और मान-सम्मान में बढ़ावा देने का काम करते हैं. इसके अलावा, व्यक्ति को मनचाही मुराद भी मिल सकती है.
*आर्थिक स्थिति होती है मजबूत*
स्वप्न शास्त्र के अनुसार, अगर सपने में पानी से भरा हुआ मटका दिखाई दे, तो यह जिंदगी बदलने का संकेत देता है. यह आपकी आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने का काम करता है. इससे जिंदगी में सुख-समृद्धि आती है.
*अमीर बनने का होता है संकेत*
स्वप्न शास्त्र की माने तो ब्रह्म मुहूर्त में या भोर के समय जगमगाता हुआ दीपक नजर आए, तो बहुत शुभ होता है. यह भगवान की कृपा की ओर इशारा करता है. यह सपना आपको जल्द अमीर बनने का संकेत देता है.
*किसी के साथ न करें शेयर*
हालांकि, एक बात का खास ख्याल रखना पड़ता है. अगर आपको सपने में ये चीजें नजर आएं, तो आपको किसी के साथ इनको साझा नहीं करना चाहिए. अगर आप इस बात को नजर अंदाज करते हैं, तो इससे मिलने वाला लाभ खत्म हो जाएगा.
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स्वप्नशास्त्र
* सपने में कुलदेवता-कुलदेवी को देखना*
सपने में कुलदेवता-कुलदेवी को देखना शुभ या अशुभ दोनों सपने हो सकते है। *अगर आपको अपने कुलदेवता या कुलदेवी से अच्छे संकेत मिलते है* तब यह आपके के लिए शुभ सपना है। जैसे सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का आशीर्वाद मिलना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता की पूजा, आरती करना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता मूर्ति देखना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का दर्शन होना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का मंदिर देखना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का फूल अर्पित करना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता के दुवार प्रसाद देना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता नारियल चढ़ाना। इत्यादि सपने शुभ सपने होते है। पर वही आप सपने में देखते है ,सपने में कुलदेवी या कुलदेवता को गुस्सा में /क्रोध में ,सपने में कुलदेवी या कुलदेवता मूर्ति खंडित होना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता मंदिर का खंडित होना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता की मूर्ति में आग लगाना इत्यादि सपने अशुभ होते है।
कुलदेवता या कुलदेवी ऐसे देवी-देवता होते है,जो हमारे पूर्वजो की परंपरा के अनुसार स्थापित किया गया था। पूर्वजो से हम उस देवी देवता की पूजा करते आते रहते है मान्यता को मानते आते रहते है, हम सब कुलदेवी या कुलदेवता को हमारे रक्षक ,समृद्धि ,खुशी,सौभाग्य, उन्नति, वंश की प्रगति के लिए पूजते रहते है। और कुलदेवी कुल देवता की कृपा से हमें सुख शांति की प्राप्ति होती रहती है। पर वही कुलदेवी और कुलदेवता को सपने में देखना सकरात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के सपने हो सकते है। इस सपनो का मतलब विस्तार से जानते है।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का आशीर्वाद मिलना- यह शुभ सपना माना जाता है। यह सपना किसी क्षत्रे में सफलता की निशानी है। आपका रुका हुआ कार्य पूरा हो जायेगा। आपकी कोई मनोकामना पूरी हो सकती है।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता की पूजा, आरती करना- यह सपना शुभ माना जाता है। यह सपना आपकी प्रगति का सूचक है। आपके परिवार में कोई मांगलिक कार्य हो सकता है ,कोई उत्सव हो सकता है। यह सपना समृद्धि और खुशी का संकेत देता है। शुभ समाचार प्राप्त हो सकता है।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता की मूर्ति देखना - सकारात्मक सपना है। अगर आप अच्छे अवस्थ में मूर्ति देखते है ,तो आपको कोई शुभ समाचार प्राप्त हो सकता है। जल्द आपका अच्छा समय आने वाला है। भविष्य आपका उज्जवल होगा। सफलता का संकेत है।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता की खंडित मूर्ति देखते है / कुलदेवी या कुलदेवता की मूर्ति में आग लगाना देखते है - तो यह सपना आपके लिए अशुभ है ,किसी बीमारी का संकेत देता है, किसी क्षत्रे में हानि हो सकता है। जैसे परिवार में लड़ाई होना ,असफ़लता ,आर्थिक हानि ,व्यापार में हानि ,कार्य में अवरोध, परिवार में संतान को कष्ट, या संतान का न होना इत्यादि। उपाय -आपको अपनी परम्पर के अनुसार पूजा विधि करना चाहिए। कुलदेवी कुलदेवता का ताकि आपको उनका आशीर्वाद मिल सके और आपके के लिए लाभदायक हो सके।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का दर्शन होना- यह सपना अत्यंत शुभ सपना माना गया है। आपका कोई कार्य जल्द सिद्धा होने वाला है। यह सपना आपके आध्यात्मिक उन्नति का संकेत देता है। यह सपना समृद्धि और सौभाग्य का सूचक है।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का मंदिर देखना- अच्छे अवस्थ में मंदिर देखना शुभ सपना माना गया है। आप कीसी नये कार्य की शुरुआत का सकते है, आप के लिए शुभ समय है। समस्या का नाश होगा।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता को फूल अर्पित करना- यह शुभ फल प्रदान करने वाला सपना माना गया है। कुलदेवी कुलदेता की कृपा आपको मिलेगी। समृद्धि, खुशी, उन्नति का सूचक है।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता के दुवार प्रसाद देना/ सपने में कुलदेवी या कुलदेवता को नारियल चढ़ाना - दोनों सपने शुभ माने गए है। यह सफलता का सूचक माना जाता है। आपका जल्द मन सामान बढ़ेगा। यह सपना खुशी का संकेत प्रदान करता है। जीवन के समस्या का जल्द निदान होगा।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता को गुस्सा में /क्रोध में देखना - यह सपना अशुभ माना जाता है ,यह सपना आपके नकरात्मक विचारो को प्रदर्शित करता है। अशुभ सामचार मिल सकता है। परिवार में कोई अशुभ घटना का संकेत करता है।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का मंदिर खंडित होना - अशुभ सपना माना गया है। असंतोष का भाव प्रदर्शित करता है। आपके कार्य क्षत्रे में कोई हानि हो सकता है। असफलता का संकेत। यह सपना अचानक समस्या का उत्पन्न होना इत्यादि का संकेत देता है।
* सपने में कुलदेवता-कुलदेवी को देखना*
सपने में कुलदेवता-कुलदेवी को देखना शुभ या अशुभ दोनों सपने हो सकते है। *अगर आपको अपने कुलदेवता या कुलदेवी से अच्छे संकेत मिलते है* तब यह आपके के लिए शुभ सपना है। जैसे सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का आशीर्वाद मिलना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता की पूजा, आरती करना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता मूर्ति देखना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का दर्शन होना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का मंदिर देखना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का फूल अर्पित करना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता के दुवार प्रसाद देना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता नारियल चढ़ाना। इत्यादि सपने शुभ सपने होते है। पर वही आप सपने में देखते है ,सपने में कुलदेवी या कुलदेवता को गुस्सा में /क्रोध में ,सपने में कुलदेवी या कुलदेवता मूर्ति खंडित होना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता मंदिर का खंडित होना। सपने में कुलदेवी या कुलदेवता की मूर्ति में आग लगाना इत्यादि सपने अशुभ होते है।
कुलदेवता या कुलदेवी ऐसे देवी-देवता होते है,जो हमारे पूर्वजो की परंपरा के अनुसार स्थापित किया गया था। पूर्वजो से हम उस देवी देवता की पूजा करते आते रहते है मान्यता को मानते आते रहते है, हम सब कुलदेवी या कुलदेवता को हमारे रक्षक ,समृद्धि ,खुशी,सौभाग्य, उन्नति, वंश की प्रगति के लिए पूजते रहते है। और कुलदेवी कुल देवता की कृपा से हमें सुख शांति की प्राप्ति होती रहती है। पर वही कुलदेवी और कुलदेवता को सपने में देखना सकरात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के सपने हो सकते है। इस सपनो का मतलब विस्तार से जानते है।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का आशीर्वाद मिलना- यह शुभ सपना माना जाता है। यह सपना किसी क्षत्रे में सफलता की निशानी है। आपका रुका हुआ कार्य पूरा हो जायेगा। आपकी कोई मनोकामना पूरी हो सकती है।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता की पूजा, आरती करना- यह सपना शुभ माना जाता है। यह सपना आपकी प्रगति का सूचक है। आपके परिवार में कोई मांगलिक कार्य हो सकता है ,कोई उत्सव हो सकता है। यह सपना समृद्धि और खुशी का संकेत देता है। शुभ समाचार प्राप्त हो सकता है।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता की मूर्ति देखना - सकारात्मक सपना है। अगर आप अच्छे अवस्थ में मूर्ति देखते है ,तो आपको कोई शुभ समाचार प्राप्त हो सकता है। जल्द आपका अच्छा समय आने वाला है। भविष्य आपका उज्जवल होगा। सफलता का संकेत है।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता की खंडित मूर्ति देखते है / कुलदेवी या कुलदेवता की मूर्ति में आग लगाना देखते है - तो यह सपना आपके लिए अशुभ है ,किसी बीमारी का संकेत देता है, किसी क्षत्रे में हानि हो सकता है। जैसे परिवार में लड़ाई होना ,असफ़लता ,आर्थिक हानि ,व्यापार में हानि ,कार्य में अवरोध, परिवार में संतान को कष्ट, या संतान का न होना इत्यादि। उपाय -आपको अपनी परम्पर के अनुसार पूजा विधि करना चाहिए। कुलदेवी कुलदेवता का ताकि आपको उनका आशीर्वाद मिल सके और आपके के लिए लाभदायक हो सके।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का दर्शन होना- यह सपना अत्यंत शुभ सपना माना गया है। आपका कोई कार्य जल्द सिद्धा होने वाला है। यह सपना आपके आध्यात्मिक उन्नति का संकेत देता है। यह सपना समृद्धि और सौभाग्य का सूचक है।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का मंदिर देखना- अच्छे अवस्थ में मंदिर देखना शुभ सपना माना गया है। आप कीसी नये कार्य की शुरुआत का सकते है, आप के लिए शुभ समय है। समस्या का नाश होगा।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता को फूल अर्पित करना- यह शुभ फल प्रदान करने वाला सपना माना गया है। कुलदेवी कुलदेता की कृपा आपको मिलेगी। समृद्धि, खुशी, उन्नति का सूचक है।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता के दुवार प्रसाद देना/ सपने में कुलदेवी या कुलदेवता को नारियल चढ़ाना - दोनों सपने शुभ माने गए है। यह सफलता का सूचक माना जाता है। आपका जल्द मन सामान बढ़ेगा। यह सपना खुशी का संकेत प्रदान करता है। जीवन के समस्या का जल्द निदान होगा।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता को गुस्सा में /क्रोध में देखना - यह सपना अशुभ माना जाता है ,यह सपना आपके नकरात्मक विचारो को प्रदर्शित करता है। अशुभ सामचार मिल सकता है। परिवार में कोई अशुभ घटना का संकेत करता है।
सपने में कुलदेवी या कुलदेवता का मंदिर खंडित होना - अशुभ सपना माना गया है। असंतोष का भाव प्रदर्शित करता है। आपके कार्य क्षत्रे में कोई हानि हो सकता है। असफलता का संकेत। यह सपना अचानक समस्या का उत्पन्न होना इत्यादि का संकेत देता है।
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!!श्री हरि: !!
अन्तसमयमें मनुष्य जिस-जिसका चिन्तन करता है, शरीर छोड़नेके बाद उस-उसको प्राप्त हो जाता है (८।६)। इस विधानमें भगवान् की कितनी उदारता भरी हुई है कि अन्तसमयमें जैसे *हरिणका चिन्तन होनेसे भरतमुनिको हरिणकी योनि प्राप्त हो गयी, ऐसे ही भगवान्का चिन्तन होनेसे भगवान्की प्राप्ति हो जाती है।* तात्पर्य है कि जिस अन्तिम चिन्तनसे हरिण आदि योनियोंकी प्राप्ति होती है, उसी चिन्तनसे भगवान्की प्राप्ति हो जाती है। भगवान्की इस उदारताका कोई पारावार नहीं है!
ब्रह्मलोकतक जितने भी लोक हैं, उनमें जानेपर फिर लौटकर आना पड़ता है, जन्म-मरणके चक्करमें जाना पड़ता है; परन्तु भगवान्की प्राप्ति होनेपर फिर लौटकर संसारमें नहीं आना पड़ता (८।१६) - यह भगवान्की कितनी महती उदारता है !
*राम !.
अन्तसमयमें मनुष्य जिस-जिसका चिन्तन करता है, शरीर छोड़नेके बाद उस-उसको प्राप्त हो जाता है (८।६)। इस विधानमें भगवान् की कितनी उदारता भरी हुई है कि अन्तसमयमें जैसे *हरिणका चिन्तन होनेसे भरतमुनिको हरिणकी योनि प्राप्त हो गयी, ऐसे ही भगवान्का चिन्तन होनेसे भगवान्की प्राप्ति हो जाती है।* तात्पर्य है कि जिस अन्तिम चिन्तनसे हरिण आदि योनियोंकी प्राप्ति होती है, उसी चिन्तनसे भगवान्की प्राप्ति हो जाती है। भगवान्की इस उदारताका कोई पारावार नहीं है!
ब्रह्मलोकतक जितने भी लोक हैं, उनमें जानेपर फिर लौटकर आना पड़ता है, जन्म-मरणके चक्करमें जाना पड़ता है; परन्तु भगवान्की प्राप्ति होनेपर फिर लौटकर संसारमें नहीं आना पड़ता (८।१६) - यह भगवान्की कितनी महती उदारता है !
*राम !.
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कहानी का समय
चार टका
एक गाँव में एक ब्राह्मण सपरिवार रहता था। उसका भानजा उसके साथ रहता था। भानजा एकदम मूर्ख था। कोई काम-धाम नहीं करता। घर में रहकर मामा-मामी की रोटियाँ तोड़ता रहता था। मामा-मामी उससे अत्यंत परेशान रहते थे। वे उसे कुछ कमाने-धमाने को कहते, पर उस मूर्ख को कोई काम न आता था, न ही कोई उसे कुछ काम देता था।
मामा-मामी ने यह सोचकर उसका विवाह कर दिया कि शायद पत्नी के घर आने से उसका भाग्य खुल जाए! उन्होंने उनके रहने की भी अलग व्यवस्था कर दी।
उसकी पत्नी अपने साथ कुछ दहेज लेकर आई थी। उसी से उसकी गृहस्थी की गाड़ी चल रही थी। परंतु जैसे बूंद-बूंद से घड़ा भरता है, वैसे ही बूंद-बूंद टपकने से घड़ा खाली भी हो जाता है। कुछ ही दिनों में उसके घर का सारा सामान खत्म हो गया। पत्नी समझ गई थी कि उसका पति मूर्ख है, इसे कोई भी काम नहीं देगा। इसीलिए एक दिन उसने अपने पति से कहा कि वह कहीं से भी कुछ ज्ञान सीखकर आए। राह खर्च के लिए उसने उसे कुछ रुपए दिए।
पत्नी की बात मानकर वह ज्ञानी को ढूँढ़ने निकला। अनेक दिन भटकने के उपरांत उसे एक ज्ञानी मिला। ज्ञानी को प्रणाम कर उसने कहा, "ज्ञानीजी, मुझे कुछ ज्ञान दीजिए। मैं अत्यंत कष्ट में हूँ।"
ज्ञानी बोले, "बिना ज्ञान के तो मनुष्य को कष्ट होगा ही। मैं तुम्हें ज्ञान जरूर दूंगा, पर मैं मुफ्त में किसी को भी ज्ञान नहीं देता।"
मूर्ख ने पूछा, “आप ज्ञान देने का क्या लेंगे?"
ज्ञानी बोला, “एक ज्ञान का एक टका।"
मूर्ख के पास चार टके बचे थे। वे उसने ज्ञानी को दे दिए। टके लेकर ज्ञानी ने पहले ध्यान किया, फिर बोले, “अच्छी तरह याद कर लो। पहला ज्ञान यह कि जिस बात को पाँच आदमी कहें, उसे सत्य मान लेना चाहिए। दूसरा ज्ञान यह कि धन मिलने पर किसी को भी उसके बारे में नहीं बताना चाहिए। तीसरा ज्ञान यह कि पत्नी को कभी सच बात नहीं बतानी चाहिए और चौथा ज्ञान यह कि अपने स्वामी या राजा को सच बात ही बतानी चाहिए।"
ज्ञान की चारों बातों को अच्छी तरह याद कर वह मूर्ख ब्राह्मण अपने घर को लौटा। रास्ते में एक गाँव में उसने देखा कि एक जगह भीड़ जुटी हुई है। उसे पता चला कि कोई भिखारी मर गया है, पर कोई उसे वहाँ से उठाने को तैयार नहीं था। तभी मूर्ख ब्राह्मण वहाँ पहुँचा। सभी ने उसे घेर लिया और कहा, वह उस लाश को उठाकर कहीं फेंक आए। पहले तो उसने सोचा कि ब्राह्मण होकर वह ऐसा काम क्यों करेगा? फिर उसे ज्ञानी द्वारा दिए गए पहले ज्ञान की याद आई कि पाँच आदमी जो कहें, उसे मान लेना चाहिए। यहाँ तो पाँच से भी अधिक आदमी हैं। उसने लाश उठाई और गाँव से बाहर एक वीरान जगह में उठाकर फेंकने लगा। तभी उसने देखा कि भिखारी के फटे-पुराने चोगे से अनेक रुपए गिर रहे हैं। उसने सारे रुपयों को इकट्ठा किया और अपनी जेब में रखकर चुपचाप अपने घर आ गया।
घर पहुँचने पर जब पत्नी ने उससे पूछा कि ज्ञान सीखकर आए, तो उसने 'हाँ' कहा, पर रुपया पाने की बात उससे छिपा ली। अब उसके पास अनेक रुपए थे। उसके दिन सूखपूर्वक बीतने लगे। उसका रहन-सहन बदल गया। उन लोगों ने एक अच्छा मकान भी बनवा लिया। उनके ठाठ-बाट देख पड़ोसियों को जलन होने लगी। एक दिन एक पड़ोसन मूर्ख ब्राह्मण के घर आई और उसकी पत्नी से पूछा, "दीदी, आपका पति क्या करता है, जो आप लोग इतने ठाठ-बाट से रहते हैं?"
वह बोली, “मैंने तो कभी पूछा नहीं।"
पड़ोसन बोली, “पूछना चाहिए। जो पति पत्नी से अपनी आमदनी छुपाता है, निश्चित रूप से वह गलत तरीके से धन कमाता है। यदि वह आपसे सचमुच प्रेम करता है, तो उसे आप से कोई भी बात नहीं छुपानी चाहिए।"
वह बोली, "ठीक है, मैं आज ही रात उनसे पूछूँगी।"
रात में मूर्ख ब्राह्मण की पत्नी ने उसकी आमदनी का रहस्य जानना चाहा, तो उसे तीसरे ज्ञान की बात याद आई कि पत्नी को कभी सच नहीं बताना चाहिए। उसने पत्नी को झूठ कह दिया कि उसने हाट से एक छंटाक हरड़ एवं बहेड़ा खरीदा और उसे चूर्णकर पानी के साथ पी गया, जिससे उसे अपार धन की प्राप्ति हुई।"
उसकी पत्नी ने दूसरे ही दिन अपनी पड़ोसन को सारी बातें बता दीं। उसने अपने पति को यह बात बताई। उसका पति तुरंत हरड़ और बहेड़ा बाजार से ले आया और उसे पीसकर पानी के साथ पी गया। थोड़ी ही देर में वह पेट दर्द से तड़पने लगा। उसे दस्त आने लगे। अंत में वह मर गया।
पड़ोसन ने राजा के पास जाकर उनकी शिकायत की। राजा ने मूर्ख ब्राह्मण को बुलाया और सारा माजरा पूछा। उसे ज्ञानी की चौथी बात याद आई कि अपने स्वामी या राजा को झूठ नहीं बोलना चाहिए। उसने राजा को सारी बातें बता दी। राजा उसके सच बोलने से बहुत खुश हुआ और उसे ढेर सारा धन देकर विदा किया।
चार टका
एक गाँव में एक ब्राह्मण सपरिवार रहता था। उसका भानजा उसके साथ रहता था। भानजा एकदम मूर्ख था। कोई काम-धाम नहीं करता। घर में रहकर मामा-मामी की रोटियाँ तोड़ता रहता था। मामा-मामी उससे अत्यंत परेशान रहते थे। वे उसे कुछ कमाने-धमाने को कहते, पर उस मूर्ख को कोई काम न आता था, न ही कोई उसे कुछ काम देता था।
मामा-मामी ने यह सोचकर उसका विवाह कर दिया कि शायद पत्नी के घर आने से उसका भाग्य खुल जाए! उन्होंने उनके रहने की भी अलग व्यवस्था कर दी।
उसकी पत्नी अपने साथ कुछ दहेज लेकर आई थी। उसी से उसकी गृहस्थी की गाड़ी चल रही थी। परंतु जैसे बूंद-बूंद से घड़ा भरता है, वैसे ही बूंद-बूंद टपकने से घड़ा खाली भी हो जाता है। कुछ ही दिनों में उसके घर का सारा सामान खत्म हो गया। पत्नी समझ गई थी कि उसका पति मूर्ख है, इसे कोई भी काम नहीं देगा। इसीलिए एक दिन उसने अपने पति से कहा कि वह कहीं से भी कुछ ज्ञान सीखकर आए। राह खर्च के लिए उसने उसे कुछ रुपए दिए।
पत्नी की बात मानकर वह ज्ञानी को ढूँढ़ने निकला। अनेक दिन भटकने के उपरांत उसे एक ज्ञानी मिला। ज्ञानी को प्रणाम कर उसने कहा, "ज्ञानीजी, मुझे कुछ ज्ञान दीजिए। मैं अत्यंत कष्ट में हूँ।"
ज्ञानी बोले, "बिना ज्ञान के तो मनुष्य को कष्ट होगा ही। मैं तुम्हें ज्ञान जरूर दूंगा, पर मैं मुफ्त में किसी को भी ज्ञान नहीं देता।"
मूर्ख ने पूछा, “आप ज्ञान देने का क्या लेंगे?"
ज्ञानी बोला, “एक ज्ञान का एक टका।"
मूर्ख के पास चार टके बचे थे। वे उसने ज्ञानी को दे दिए। टके लेकर ज्ञानी ने पहले ध्यान किया, फिर बोले, “अच्छी तरह याद कर लो। पहला ज्ञान यह कि जिस बात को पाँच आदमी कहें, उसे सत्य मान लेना चाहिए। दूसरा ज्ञान यह कि धन मिलने पर किसी को भी उसके बारे में नहीं बताना चाहिए। तीसरा ज्ञान यह कि पत्नी को कभी सच बात नहीं बतानी चाहिए और चौथा ज्ञान यह कि अपने स्वामी या राजा को सच बात ही बतानी चाहिए।"
ज्ञान की चारों बातों को अच्छी तरह याद कर वह मूर्ख ब्राह्मण अपने घर को लौटा। रास्ते में एक गाँव में उसने देखा कि एक जगह भीड़ जुटी हुई है। उसे पता चला कि कोई भिखारी मर गया है, पर कोई उसे वहाँ से उठाने को तैयार नहीं था। तभी मूर्ख ब्राह्मण वहाँ पहुँचा। सभी ने उसे घेर लिया और कहा, वह उस लाश को उठाकर कहीं फेंक आए। पहले तो उसने सोचा कि ब्राह्मण होकर वह ऐसा काम क्यों करेगा? फिर उसे ज्ञानी द्वारा दिए गए पहले ज्ञान की याद आई कि पाँच आदमी जो कहें, उसे मान लेना चाहिए। यहाँ तो पाँच से भी अधिक आदमी हैं। उसने लाश उठाई और गाँव से बाहर एक वीरान जगह में उठाकर फेंकने लगा। तभी उसने देखा कि भिखारी के फटे-पुराने चोगे से अनेक रुपए गिर रहे हैं। उसने सारे रुपयों को इकट्ठा किया और अपनी जेब में रखकर चुपचाप अपने घर आ गया।
घर पहुँचने पर जब पत्नी ने उससे पूछा कि ज्ञान सीखकर आए, तो उसने 'हाँ' कहा, पर रुपया पाने की बात उससे छिपा ली। अब उसके पास अनेक रुपए थे। उसके दिन सूखपूर्वक बीतने लगे। उसका रहन-सहन बदल गया। उन लोगों ने एक अच्छा मकान भी बनवा लिया। उनके ठाठ-बाट देख पड़ोसियों को जलन होने लगी। एक दिन एक पड़ोसन मूर्ख ब्राह्मण के घर आई और उसकी पत्नी से पूछा, "दीदी, आपका पति क्या करता है, जो आप लोग इतने ठाठ-बाट से रहते हैं?"
वह बोली, “मैंने तो कभी पूछा नहीं।"
पड़ोसन बोली, “पूछना चाहिए। जो पति पत्नी से अपनी आमदनी छुपाता है, निश्चित रूप से वह गलत तरीके से धन कमाता है। यदि वह आपसे सचमुच प्रेम करता है, तो उसे आप से कोई भी बात नहीं छुपानी चाहिए।"
वह बोली, "ठीक है, मैं आज ही रात उनसे पूछूँगी।"
रात में मूर्ख ब्राह्मण की पत्नी ने उसकी आमदनी का रहस्य जानना चाहा, तो उसे तीसरे ज्ञान की बात याद आई कि पत्नी को कभी सच नहीं बताना चाहिए। उसने पत्नी को झूठ कह दिया कि उसने हाट से एक छंटाक हरड़ एवं बहेड़ा खरीदा और उसे चूर्णकर पानी के साथ पी गया, जिससे उसे अपार धन की प्राप्ति हुई।"
उसकी पत्नी ने दूसरे ही दिन अपनी पड़ोसन को सारी बातें बता दीं। उसने अपने पति को यह बात बताई। उसका पति तुरंत हरड़ और बहेड़ा बाजार से ले आया और उसे पीसकर पानी के साथ पी गया। थोड़ी ही देर में वह पेट दर्द से तड़पने लगा। उसे दस्त आने लगे। अंत में वह मर गया।
पड़ोसन ने राजा के पास जाकर उनकी शिकायत की। राजा ने मूर्ख ब्राह्मण को बुलाया और सारा माजरा पूछा। उसे ज्ञानी की चौथी बात याद आई कि अपने स्वामी या राजा को झूठ नहीं बोलना चाहिए। उसने राजा को सारी बातें बता दी। राजा उसके सच बोलने से बहुत खुश हुआ और उसे ढेर सारा धन देकर विदा किया।
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जीव प्रभु का अंश है इसलिए अव्यक्त रूप से बहुत गुण भी उसके भीतर छिपे हैं। इस प्रकृति में कोई भी जीवन अपात्र एवं मूल्यहीन नहीं है। उस प्रभु के अंशरूप होने के कारण हम सभी पात्र ही हैं पर पात्र की भी समय-समय पर सफाई अवश्य होनी चाहिए। गंदे पात्र में अमृत भी विष बन जायेगा।
जीवन के इस पात्र में दुर्गुण, दुराचार एवं अनाचार रूपी कंकड़-पत्थर भरे हों तो सद्गुण एवं सदाचार रूपी रत्न का उसमें प्रवेश संभव नहीं है। प्रभु कथा, सत्संग एवं सदग्रंथों के आश्रय में मन की नित्य सफाई करते रहो, ताकि हमारे मन के पात्र में गंदगी इकट्ठी न हो सके।
सदैव निष्कपट, निर्दोष, निर्वैर और सहज बने रहने का प्रयास करते हुए सर्व हिताय का चिन्तन रखो। जिस मन से प्राणी मात्र के मंगल की भावनाएं उठती हैं, मन रुपी वो पात्र स्वच्छ ही समझना चाहिए। पात्र की स्वच्छता ही हमारी पात्रता विकसित करता है।
जीवन के इस पात्र में दुर्गुण, दुराचार एवं अनाचार रूपी कंकड़-पत्थर भरे हों तो सद्गुण एवं सदाचार रूपी रत्न का उसमें प्रवेश संभव नहीं है। प्रभु कथा, सत्संग एवं सदग्रंथों के आश्रय में मन की नित्य सफाई करते रहो, ताकि हमारे मन के पात्र में गंदगी इकट्ठी न हो सके।
सदैव निष्कपट, निर्दोष, निर्वैर और सहज बने रहने का प्रयास करते हुए सर्व हिताय का चिन्तन रखो। जिस मन से प्राणी मात्र के मंगल की भावनाएं उठती हैं, मन रुपी वो पात्र स्वच्छ ही समझना चाहिए। पात्र की स्वच्छता ही हमारी पात्रता विकसित करता है।
👍2
।।श्रीहरिः।।
कहावत है कि 'जिस गाँव में नहीं जाना है, उसका रास्ता ही क्यों पूछा जाय ? ऐसा दृढ़ भाव हो जाय कि 'अपनी उम्र में अमुक काम हमें नहीं ही करना है' तो वह कार्य हो ही कैसे सकता है ? जैसे सिनेमा नहीं देखना है, तो नहीं ही देखना है। बीड़ी-सिगरेट आदि व्यसन नहीं करना है, तो नहीं ही करना है। चाय आज से नहीं पीना है, तो नहीं ही पीना है। समाप्त हुआ काम। अब झूठ नहीं बोलना है, तो झूठ बोलेंगे ही क्यों ? फिर झूठ निकल ही नहीं सकता। ऐसे ही प्रत्येक सद्गुण-सदाचार के ग्रहण और दुर्गुण-दुराचार के त्याग के लिये दृढ़ भाव बना लिया जाय तो यह भाव बहुत जल्दी बन सकता है और फिर वह अनायास ही आचरण में भी आ सकता है।
इसके लिये एक बहुत उपयोगी बात यह है कि हम अपने को दृढ़प्रतिज्ञ बनावें। अर्थात् हर एक व्यवहार में जो विचार कर लें, बस वैसा ही करें- यों करने पर विचारों की एक परिपक्वता हो जाती है, फिर संकल्प दृढ़ हो जाता है। इसी प्रकार जबान से कह दें तो फिर वैसा ही करने की चेष्टा करें। बहुत ज्यादा दृढ़ता से कहें तो उसके पालन की प्राणपर्यन्त चेष्टा करें। मर भले ही जायँ, पर अब तो करेंगे ऐसे ही। छोटे- छोटे कामों में इस प्रकार दृढ़प्रतिज्ञता का स्वभाव बनाने की चेष्टा करें तो हमारा स्वभाव सुधर जाता है। स्वभाव सुधरने पर फिर बड़ी-से-बड़ी बातें भी जो विचार कर लें, वे धारण हो जाती हैं। यह भाव-निर्माण तथा भाव- धारण-साधन बहुत सुगम है और बहुत ही श्रेष्ठ है।
एक साधै सब सधै
कहावत है कि 'जिस गाँव में नहीं जाना है, उसका रास्ता ही क्यों पूछा जाय ? ऐसा दृढ़ भाव हो जाय कि 'अपनी उम्र में अमुक काम हमें नहीं ही करना है' तो वह कार्य हो ही कैसे सकता है ? जैसे सिनेमा नहीं देखना है, तो नहीं ही देखना है। बीड़ी-सिगरेट आदि व्यसन नहीं करना है, तो नहीं ही करना है। चाय आज से नहीं पीना है, तो नहीं ही पीना है। समाप्त हुआ काम। अब झूठ नहीं बोलना है, तो झूठ बोलेंगे ही क्यों ? फिर झूठ निकल ही नहीं सकता। ऐसे ही प्रत्येक सद्गुण-सदाचार के ग्रहण और दुर्गुण-दुराचार के त्याग के लिये दृढ़ भाव बना लिया जाय तो यह भाव बहुत जल्दी बन सकता है और फिर वह अनायास ही आचरण में भी आ सकता है।
इसके लिये एक बहुत उपयोगी बात यह है कि हम अपने को दृढ़प्रतिज्ञ बनावें। अर्थात् हर एक व्यवहार में जो विचार कर लें, बस वैसा ही करें- यों करने पर विचारों की एक परिपक्वता हो जाती है, फिर संकल्प दृढ़ हो जाता है। इसी प्रकार जबान से कह दें तो फिर वैसा ही करने की चेष्टा करें। बहुत ज्यादा दृढ़ता से कहें तो उसके पालन की प्राणपर्यन्त चेष्टा करें। मर भले ही जायँ, पर अब तो करेंगे ऐसे ही। छोटे- छोटे कामों में इस प्रकार दृढ़प्रतिज्ञता का स्वभाव बनाने की चेष्टा करें तो हमारा स्वभाव सुधर जाता है। स्वभाव सुधरने पर फिर बड़ी-से-बड़ी बातें भी जो विचार कर लें, वे धारण हो जाती हैं। यह भाव-निर्माण तथा भाव- धारण-साधन बहुत सुगम है और बहुत ही श्रेष्ठ है।
एक साधै सब सधै
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*सत्य को सिद्ध करने के लिए किसी से जिद्द अथवा बहस करने कि जरूरत नही है क्योंकि सत्य अपने समय मे स्वयं सिद्ध हो जाता है बिखरा हुआ परिवार या विखरा हुआ समाज कभी बादशाह नही बनता लेकिन आपस मे लड़कर दूसरे को बादशाह जरूर बना देता है दूसरे से ईर्ष्या कपट रखने से जीवन मे सुख नही मिलता बल्कि जो मिला होता है वह भी चला जाता है सरल बने रहे सहज बनकर एक दूसरे का सहयोग करते रहे यही अनमोल सत्य है जो लोग अपनी गलती नहीं मानते वह आपको अपना कैसे मानेंगे अच्छे विचार और अच्छे संस्कार सदैव अच्छे कार्यों के लिए ही प्रेषित करेंगे कुम्हार जब घडा़ बनाता है तो बाहर से तेज थप थपाता है और अन्दर प्यार से सहलाता है एक सुन्दर मजबूत इन्सान बनने के लिए अपने कुम्हार ईश्वर पर भरोसा रखिये वो हमको टूटने नही देगा उठिए, जागिये और मुस्कुराइए प्रभु की कृपा से हम सब अपनों के साथ हैं जीवन मे दो तरह के लोग आपके साथ हमेशा होने चाहिए एक कृष्ण जैसे जो आपके लिए ना भी लड़ें तब भी आपकी जीत पक्की कर दें और दूसरे कर्ण जैसे जो आपके लिए तब भी लड़ें जब आपकी हार सामने दिख रही हो मन वचन और कर्म से कपट छोड़कर जो भूदेव ब्राह्मणों की सेवा करता है मुझ समेत ब्रह्मा , शिव आदि सब देवता उसके वश हो जाते हैं ।*
*सोच अच्छी रखो लोग अपने आप अच्छे लगेंगे इस बात से कोई अन्तर नहीं पड़ता कि हमारे पास कितने लाख अथवा करोड़ रूपये हैं इस बात से भी कोई अन्तर नहीं पड़ता कि हमारे पास किस प्रकार का और कितना बल है वस्तुतःअन्तर तो इस बात से पड़ता है कि हमारी मृत्यु के उपरान्त शेष सभी व्यक्ति हमारे सम्बन्ध में क्या टीका टिप्पणी करते हैं वही हमारा सही और उचित मूल्याँकन होता है अतः हमें अपने जीवन काल में वही कार्य करने चाहिए कि हमारा वह अन्तिम मूल्यांकन अच्छा और सही हो सके तकलीफ़ देने केबाद जताई गई हम दर्दी और नजर अंदाज कर ने के बाद दी गई अह मियत कोई मायने नहीं रखती*
*हम और आप सभी के लिए सरल साधना है रात्री में सोने से पहले भगवान से प्रार्थना करनी है कि आज दिन भर मुझ से जो कर्म हुए हैं वह सभी आप को समर्पित करता हूं तथा भगवान के नाम का सतत जप हो उस के लिए सतत अभ्यास करना दोनों सरल साधन है इस से ही भगवद प्राप्ती निश्चित हो जाएगी बस जाय के में थोड़ा कड़वा है वरना सच का कोई जवाब नहीं मन वचन और कर्म से कपट छोड़ कर जो भूदेव ब्राह्मणों की सेवा करता है मुझ समेत ब्रह्मा शिव आदि सब देवता उसके वश हो जाते हैं*
*जीवन मे सभी लोग किसी ना किसी पर भरोषा कर के जीते है हमेशा यही कोशिश करते रहे कि जिस पर आप का विस्वास है उन पर विस्वास करते रहे ताकि उन का विस्वास कभी ना टूटे अपने जीवन को हर कोई अपने ढंग से पालते है फिर भी दूसरे से ईर्ष्या और नफ़रत करते है जब कि हर जीव अंश मे ईश्वर है सब का दाता वही ईश्वर है फिर भी इंसान इंसान से ही भेद कर के परेशान है क्योंकि हर कोई आगे रहना चाहता है शरीर को ही नहीं अपने शब्दों को भी सुन्दर रखिए लोग आप की शक्ल को चाहे भूल जाएं लेकिन आप के शब्दों को नहीं भूलते*
*अतीत में जीवन जीना दूसरों से अत्यधिक अपेक्षा रखना आवश्यकता से अधिक सोचना एवं स्वयं को दूसरों से अधिक बुद्धिमान समझना यह चारों व्यक्ति के दुख का कारण बनते हैं मन वचन और कर्म से कपट छोड़ कर जो भू देव ब्राह्मणों की सेवा करता है मुझ समेत ब्रह्मा शिव आदि सब देवता उस के वश हो जाते हैं*
*यह संसार माया के आधीन है इस माया से बचने के लिए माया पति नारायण की शरण लेनी चाहिए नही नही तो माया कभी किसी को नहीं छोडती हैं मनो स्थिति को परि स्थिति के हिसाब से बदलते रहिए यही सुख का मूल आधार है सुख एवं दुख सिर्फ आपकी अपनी सोच है वास्त विक परिस्थिति नही साथ ऐसा हो कि कभी दुरी ना लगे और साथ चलना कभी मज़बूरी ना लगे*
*शिक्षा के जहाज बड़े शौक से डुबाए जा रहे हैं स्कूलों को बंद कर के लोग रैलियों में बुलाये जा रहे हैं तू कब तक फ्री के राशन का मजा लेता रहेगा ए आदमी तेरे बच्चे जिस्म से नही दिमाग से अपा हिज बनाये जा रहे हैं मजबूर और मजबूत में ज्यादा फर्क नही होता स्वार्थी मनुष्य से दोस्ती करो गे तो वो आप को मजबूर बना देगा और सच्चे मनुष्य से मनुष्य से दोस्ती करोगे तो वो आप को मजबूत बना एगा उम्र दराज न बनें उम्रको दराज़ में रख दें खो जाएं ज़िन्दगी में मौत का इन्तज़ार न करें जिनको आना है आए जिसको जाना है जाए पर हमें जीना है ये न भूल जाएं जिनसे मिलता है प्यार उनसे ही मिलें बार बार महफिलों का शौक रखें दोस्तों से प्यार करें जो रिश्ते हमें समझ सकें उन रिश्तों की कद्र करें बंधें नहीं किसी से भी ना किसी को बँधने पर मजबूर करें दिल से जोड़ें हर रिश्ता और उन रिश्तों से दिल से जुड़े रहें हँसना अच्छा होता है पर अपनों के लिये रोया भी करें याद आएं कभी अपने तो आँखें अपनी नम भी करें ज़िन्दगी चार दिन की है तो फिर शिकवे शिकायतें कम ही करें उम्र को दराज़ में रख दें उम्र दराज़ न बनें मुस्कान हृदय
*सोच अच्छी रखो लोग अपने आप अच्छे लगेंगे इस बात से कोई अन्तर नहीं पड़ता कि हमारे पास कितने लाख अथवा करोड़ रूपये हैं इस बात से भी कोई अन्तर नहीं पड़ता कि हमारे पास किस प्रकार का और कितना बल है वस्तुतःअन्तर तो इस बात से पड़ता है कि हमारी मृत्यु के उपरान्त शेष सभी व्यक्ति हमारे सम्बन्ध में क्या टीका टिप्पणी करते हैं वही हमारा सही और उचित मूल्याँकन होता है अतः हमें अपने जीवन काल में वही कार्य करने चाहिए कि हमारा वह अन्तिम मूल्यांकन अच्छा और सही हो सके तकलीफ़ देने केबाद जताई गई हम दर्दी और नजर अंदाज कर ने के बाद दी गई अह मियत कोई मायने नहीं रखती*
*हम और आप सभी के लिए सरल साधना है रात्री में सोने से पहले भगवान से प्रार्थना करनी है कि आज दिन भर मुझ से जो कर्म हुए हैं वह सभी आप को समर्पित करता हूं तथा भगवान के नाम का सतत जप हो उस के लिए सतत अभ्यास करना दोनों सरल साधन है इस से ही भगवद प्राप्ती निश्चित हो जाएगी बस जाय के में थोड़ा कड़वा है वरना सच का कोई जवाब नहीं मन वचन और कर्म से कपट छोड़ कर जो भूदेव ब्राह्मणों की सेवा करता है मुझ समेत ब्रह्मा शिव आदि सब देवता उसके वश हो जाते हैं*
*जीवन मे सभी लोग किसी ना किसी पर भरोषा कर के जीते है हमेशा यही कोशिश करते रहे कि जिस पर आप का विस्वास है उन पर विस्वास करते रहे ताकि उन का विस्वास कभी ना टूटे अपने जीवन को हर कोई अपने ढंग से पालते है फिर भी दूसरे से ईर्ष्या और नफ़रत करते है जब कि हर जीव अंश मे ईश्वर है सब का दाता वही ईश्वर है फिर भी इंसान इंसान से ही भेद कर के परेशान है क्योंकि हर कोई आगे रहना चाहता है शरीर को ही नहीं अपने शब्दों को भी सुन्दर रखिए लोग आप की शक्ल को चाहे भूल जाएं लेकिन आप के शब्दों को नहीं भूलते*
*अतीत में जीवन जीना दूसरों से अत्यधिक अपेक्षा रखना आवश्यकता से अधिक सोचना एवं स्वयं को दूसरों से अधिक बुद्धिमान समझना यह चारों व्यक्ति के दुख का कारण बनते हैं मन वचन और कर्म से कपट छोड़ कर जो भू देव ब्राह्मणों की सेवा करता है मुझ समेत ब्रह्मा शिव आदि सब देवता उस के वश हो जाते हैं*
*यह संसार माया के आधीन है इस माया से बचने के लिए माया पति नारायण की शरण लेनी चाहिए नही नही तो माया कभी किसी को नहीं छोडती हैं मनो स्थिति को परि स्थिति के हिसाब से बदलते रहिए यही सुख का मूल आधार है सुख एवं दुख सिर्फ आपकी अपनी सोच है वास्त विक परिस्थिति नही साथ ऐसा हो कि कभी दुरी ना लगे और साथ चलना कभी मज़बूरी ना लगे*
*शिक्षा के जहाज बड़े शौक से डुबाए जा रहे हैं स्कूलों को बंद कर के लोग रैलियों में बुलाये जा रहे हैं तू कब तक फ्री के राशन का मजा लेता रहेगा ए आदमी तेरे बच्चे जिस्म से नही दिमाग से अपा हिज बनाये जा रहे हैं मजबूर और मजबूत में ज्यादा फर्क नही होता स्वार्थी मनुष्य से दोस्ती करो गे तो वो आप को मजबूर बना देगा और सच्चे मनुष्य से मनुष्य से दोस्ती करोगे तो वो आप को मजबूत बना एगा उम्र दराज न बनें उम्रको दराज़ में रख दें खो जाएं ज़िन्दगी में मौत का इन्तज़ार न करें जिनको आना है आए जिसको जाना है जाए पर हमें जीना है ये न भूल जाएं जिनसे मिलता है प्यार उनसे ही मिलें बार बार महफिलों का शौक रखें दोस्तों से प्यार करें जो रिश्ते हमें समझ सकें उन रिश्तों की कद्र करें बंधें नहीं किसी से भी ना किसी को बँधने पर मजबूर करें दिल से जोड़ें हर रिश्ता और उन रिश्तों से दिल से जुड़े रहें हँसना अच्छा होता है पर अपनों के लिये रोया भी करें याद आएं कभी अपने तो आँखें अपनी नम भी करें ज़िन्दगी चार दिन की है तो फिर शिकवे शिकायतें कम ही करें उम्र को दराज़ में रख दें उम्र दराज़ न बनें मुस्कान हृदय
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की मधुरता को दर्शाती है शांति बुद्धि की परिपक्वता को दर्शाती है और मनुष्य मे इन दोनों का होना एक मनुष्य की संपूर्णता को दर्शाता हैं*
*अल्फाज़ बेहद खूब सूरत होते हैं पर ख़ामोशी की तो बात ही अलग हैं बेहद खूब सूरत होते हैं वो लोग जो आज की बिजी दुनिया में भी किसी को अपना अन मोल वक्त देते हैं क्योंकि जो मन को छुआ करते है वहीं तो अपने हुआ करतें हैं बड़ों के द्वारा दिये गए उप देश चोराहे की रेड लाइट की तरह हैं जो बुरा मानने के लिए नहीं बल्कि ऐक्सिडेंट रोकने के लिए होते हैं सुख और दुख में कोई ज्यादा भेद नहीं है जिसे मन स्वीकारे वह सुख और जिसे न स्वीकारे वह दुख खुश रहना है तो चुप रहना सीखो क्योंकि खुशियों को शौर पसंद नही है प्रार्थना और विश्वास दोनों अदृश्य हैं परन्तु इनमें इतनी ताकत है कि असम्भव को भी सम्भव कर देते हैं विद्वान् होने पर भी जो आजी विका के साधन से रहित हैं और दुर्बल तथा दुःखी हैं ऐसे व्यक्ति की भूख मिटाने वाले के समान कोई अन्य पुण्यात्मा पुरुष नहीं है*
*जिस वाणी मे अहंकार आवेश और शोर हो ऐसी वाणी को हमारे ऋषियो ने राक्षसी कहा है और यह सभी वैर की जननी होते हुए पूरे सभ्य समाज को नष्ट करती है हे संतोषी माँ तेरी महिमा बड़ी महान मैं अव गुण अज्ञान माँ कैसे करु बखान जिस प्रकार रस्सी में में गांँठें लग जाने पर भी उसका बुनि यादी स्वरुप नहीं बदलता उसी प्रकार मनुष्य में भी कुछ विकार आ जाने से उसके अंदर से अच्छाई के बीज ख़त्म नहीं होते जैसे हम रस्सी की गांठें खोल सकते हैं वैसे ही हम मनुष्य की समस्याएं भी हल कर सकते हैं इस बात को समझो कि जीवन है तो समस्याएं भी होंगी ही और समस्याएं हैं तो समाधान भी अवश्य होगा आवश्यकता है कि हम किसी भी समस्या के कारण को अच्छी तरह से जानें निवारण स्वतः ही प्राप्त हो जाएगा क्या देना है क्या नहीं देना बाबा ये तेरी मर जी चरणों से कभी दूर ना करना बस इतनी सी अरजी कहते है कि जलो वहाँ जहाँ जरूरत हो उजालों में चिरागों के मायने नहींहोते केवल रक्त सम्बंध से ही कोई अपना नही होता प्रेम सहयोग विश्वास निष्ठा सुरक्षा सहानु भूति और सम्मान ये सभी ऐसे भाव है जो परायो को भी अपना बनाते हैं प्रेम या सम्मान का भाव सिर्फ उन्हीं के प्रति रखिएगा जो आपके मन की भावनाओं को समझते हैं*
*शक्ति शाली होकर भी क्षमा करने और दरिद्र होकर भी दान करने का सामर्थ्य रखने वाला सदैव आदर णीय होता है खूबसूरत प्राणायाम अपने भविष्य को पूरी शक्ति से अपने भीतर खींचे अपने वर्तमान को अपनी क्षमता अनुसार रोक कर रखें अपने भूत काल को पूरी ताकत से बाहर निकाल दें यही है सर्वश्रेष्ठ जीवन योग सत्य वचन ईर्ष्या लोभ क्रोध और कठोर वचन इन 4 वस्तुओं से हमेशा दूर रहने का नाम है धर्म सच होने का एक ही उपाय है और वह यह है कि इस जगत में दिखावे की आकांक्षा छोड़ दे सब झूठ उस से ही पैदा होते हैं ऊंची आवाज में तो वो चिल्लाते हैं जिन्हें झूठ बोलना होता है सच तो धीमे स्वर का भी पूरे ब्रह्मांड में गूंजता है आज कल के रिश्तो की यही हकी कत है साहब सुन लो तो सुलझ जाते हैं सुना दो तो उलझ जाते हैं जीवन में कुछ नया सीखने के लिए यह स्वीकार करना जरूरी है कि हर व्यक्ति किसी न किसी बात में हम से बेहतर होता है श्री महा लक्ष्मी देवी जी को नमस्कार है जो देवताओं की भी ईश्वरी है देवता भी जिनकी स्तुति करते है जो श्री विष्णु भगवान की प्रिया है उन्हें नमस्कार है जो अत्यंत ही दयालु है उन्हें नमस्कार है*
*जय महालक्ष्मीवंदना:*
*ॐ:सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो,धन धान्यः सुतान्वितः,मनुष्यो मत्प्रसादेन,भविष्यति न संशयःॐ*
*सर्वमंगल: मांगल्ये,शिवे सर्वार्थ साधिके,शरण्ये त्रयम्बिके गौरि,नारायणी नमोस्तुते,या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै:नमो: नमः*
*ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु: पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी: प्रचोदयात् *
*माता लक्ष्मी:आप और आपके परिवार में सुख समृद्धि और वैभव प्रदान करें आपकी पूरे परिवार का शुभ मंगल कार्य पूर्ण हो माँ भवानी जी से यही प्रार्थना है,मनोकामनाएं पूर्ण करें👏,*
*अल्फाज़ बेहद खूब सूरत होते हैं पर ख़ामोशी की तो बात ही अलग हैं बेहद खूब सूरत होते हैं वो लोग जो आज की बिजी दुनिया में भी किसी को अपना अन मोल वक्त देते हैं क्योंकि जो मन को छुआ करते है वहीं तो अपने हुआ करतें हैं बड़ों के द्वारा दिये गए उप देश चोराहे की रेड लाइट की तरह हैं जो बुरा मानने के लिए नहीं बल्कि ऐक्सिडेंट रोकने के लिए होते हैं सुख और दुख में कोई ज्यादा भेद नहीं है जिसे मन स्वीकारे वह सुख और जिसे न स्वीकारे वह दुख खुश रहना है तो चुप रहना सीखो क्योंकि खुशियों को शौर पसंद नही है प्रार्थना और विश्वास दोनों अदृश्य हैं परन्तु इनमें इतनी ताकत है कि असम्भव को भी सम्भव कर देते हैं विद्वान् होने पर भी जो आजी विका के साधन से रहित हैं और दुर्बल तथा दुःखी हैं ऐसे व्यक्ति की भूख मिटाने वाले के समान कोई अन्य पुण्यात्मा पुरुष नहीं है*
*जिस वाणी मे अहंकार आवेश और शोर हो ऐसी वाणी को हमारे ऋषियो ने राक्षसी कहा है और यह सभी वैर की जननी होते हुए पूरे सभ्य समाज को नष्ट करती है हे संतोषी माँ तेरी महिमा बड़ी महान मैं अव गुण अज्ञान माँ कैसे करु बखान जिस प्रकार रस्सी में में गांँठें लग जाने पर भी उसका बुनि यादी स्वरुप नहीं बदलता उसी प्रकार मनुष्य में भी कुछ विकार आ जाने से उसके अंदर से अच्छाई के बीज ख़त्म नहीं होते जैसे हम रस्सी की गांठें खोल सकते हैं वैसे ही हम मनुष्य की समस्याएं भी हल कर सकते हैं इस बात को समझो कि जीवन है तो समस्याएं भी होंगी ही और समस्याएं हैं तो समाधान भी अवश्य होगा आवश्यकता है कि हम किसी भी समस्या के कारण को अच्छी तरह से जानें निवारण स्वतः ही प्राप्त हो जाएगा क्या देना है क्या नहीं देना बाबा ये तेरी मर जी चरणों से कभी दूर ना करना बस इतनी सी अरजी कहते है कि जलो वहाँ जहाँ जरूरत हो उजालों में चिरागों के मायने नहींहोते केवल रक्त सम्बंध से ही कोई अपना नही होता प्रेम सहयोग विश्वास निष्ठा सुरक्षा सहानु भूति और सम्मान ये सभी ऐसे भाव है जो परायो को भी अपना बनाते हैं प्रेम या सम्मान का भाव सिर्फ उन्हीं के प्रति रखिएगा जो आपके मन की भावनाओं को समझते हैं*
*शक्ति शाली होकर भी क्षमा करने और दरिद्र होकर भी दान करने का सामर्थ्य रखने वाला सदैव आदर णीय होता है खूबसूरत प्राणायाम अपने भविष्य को पूरी शक्ति से अपने भीतर खींचे अपने वर्तमान को अपनी क्षमता अनुसार रोक कर रखें अपने भूत काल को पूरी ताकत से बाहर निकाल दें यही है सर्वश्रेष्ठ जीवन योग सत्य वचन ईर्ष्या लोभ क्रोध और कठोर वचन इन 4 वस्तुओं से हमेशा दूर रहने का नाम है धर्म सच होने का एक ही उपाय है और वह यह है कि इस जगत में दिखावे की आकांक्षा छोड़ दे सब झूठ उस से ही पैदा होते हैं ऊंची आवाज में तो वो चिल्लाते हैं जिन्हें झूठ बोलना होता है सच तो धीमे स्वर का भी पूरे ब्रह्मांड में गूंजता है आज कल के रिश्तो की यही हकी कत है साहब सुन लो तो सुलझ जाते हैं सुना दो तो उलझ जाते हैं जीवन में कुछ नया सीखने के लिए यह स्वीकार करना जरूरी है कि हर व्यक्ति किसी न किसी बात में हम से बेहतर होता है श्री महा लक्ष्मी देवी जी को नमस्कार है जो देवताओं की भी ईश्वरी है देवता भी जिनकी स्तुति करते है जो श्री विष्णु भगवान की प्रिया है उन्हें नमस्कार है जो अत्यंत ही दयालु है उन्हें नमस्कार है*
*जय महालक्ष्मीवंदना:*
*ॐ:सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो,धन धान्यः सुतान्वितः,मनुष्यो मत्प्रसादेन,भविष्यति न संशयःॐ*
*सर्वमंगल: मांगल्ये,शिवे सर्वार्थ साधिके,शरण्ये त्रयम्बिके गौरि,नारायणी नमोस्तुते,या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै:नमो: नमः*
*ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु: पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी: प्रचोदयात् *
*माता लक्ष्मी:आप और आपके परिवार में सुख समृद्धि और वैभव प्रदान करें आपकी पूरे परिवार का शुभ मंगल कार्य पूर्ण हो माँ भवानी जी से यही प्रार्थना है,मनोकामनाएं पूर्ण करें👏,*
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