✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें।
ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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नक्षत्रों के नाम और देवता ----
१-अश्विनी नक्षत्र के देवता अश्विनी कुमार जी और स्वामी केतु हैं !
२-भरणी नक्षत्र के देवता यमराज जी और स्वामी शुक्र हैं !
3-कृत्तिका नक्षत्र के देवता अग्नि देव जी और स्वामी सूर्य है !
४-रोहिणी नक्षत्र के देवता ब्रह्मा जी और स्वामी चन्द्रमा है !
५-मृगशिरा नक्षत्र के देवता चन्द्रमा जी और स्वामी मंगल है !
६-आर्द्रा नक्षत्र के देवता शिव जी और स्वामी राहु हैं !
७-पुनर्वसु नक्षत्र के देवता अदिति माता जी और स्वामी गुरु हैं !
८-पुष्य नक्षत्र के देवता बृहस्पति देव जी और स्वामी शनि हैं !
९-आश्लेषा नक्षत्र के देवता नागदेव जी और स्वामी बुध हैं !
१०-मघा नक्षत्र के देवता पितृदेव जी और स्वामी केतु हैं !
११-पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के देवता भग देव जी और स्वामी शुक्र हैं !
१२-उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के देवता अर्यमा देव जी और स्वामी सूर्य हैं !
१३-हस्त नक्षत्र के देवता सूर्य देव जी और स्वामी चन्द्रमा हैं !
१४-चित्रा नक्षत्र के देवता विश्वकर्मा जी और स्वामी मंगल हैं !
१५-स्वाति नक्षत्र के देवता पवन देव जी और स्वामी राहु हैं !
१६-विशाखा नक्षत्र के देवता इन्द्र देव एवं अग्नि देवजी और स्वामी गुरु हैं !
१७-अनुराधा नक्षत्र के देवता मित्र देव जी और स्वामी शनि हैं !
१८-ज्येष्ठा नक्षत्र के देवता इन्द्र देव जी और स्वामी बुध हैं !
१९-मूल नक्षत्र के देवता निरिती देव जी और स्वामी केतु हैं !
२०-पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के देवता जल देव जी और स्वामी शुक्र हैं !
२१-उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के देवता विश्वेदेव जी और स्वामी सूर्य हैं !
२२-श्रवण नक्षत्र के देवता विष्णु जी और स्वामी चन्द्र हैं !
२३-धनिष्ठा नक्षत्र के देवता अष्टवसु जी और स्वामी मंगल हैं !
२४-शतभिषा नक्षत्र के देवता वरुण देव जी और स्वामी राहु हैं !
२५-पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र के देवता अजैकपाद देव जी और स्वामी गुरु हैं !
२६-उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के देवता अहिर्बुध्न्य देवजी और स्वामी शनि हैं !
२७-रेवती नक्षत्र के देवता पूषा [सूर्य ]देव जी और स्वामी बुध है !
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*जब तक हम दूसरों की दिनचर्या या जीवन में दोष ढूंढते रहेंगे,हमारा ध्यान अपने अनगिनत दोषों या उत्तरदायित्वों पर कभी जाएगा ही नहीं...जीवन में हर उम्र के अपने पृथक और अनिवार्य कर्तव्य होते हैं...यदि हमारा ध्यान इन्हीं लक्ष्यों पर केंद्रित रहे,तो ही हम एक आदर्श और प्रगतिशील जीवन पा सकते,अन्यथा जीवन में एक सूनापन सदा ही अपना अस्तित्व बनाए रखेगा...प्रायः हम अपने निर्धारित कर्तव्यों का अस्त व्यस्त रूप से ही परिपालन करते हैं,नियमतः नहीं,जबकि सिद्धांत कहता है...बचपन हो तो माता पिता की आज्ञानुसार चलना,जब माता पिता का पद प्राप्त हो जाए तो बच्चों पर संपूर्ण समर्पण और जब असहाय हो जाएं तो नौन-मौन-कौन का परिपालन करते हुए,ईश्वर का ध्यान...बस इतना सा वर्गीकरण है उम्र के प्रबंधन का...इसमें ये सोच लेना कि फिर अपने लिए कब जिएं...तो ये ध्रुव सत्य है,इस तरह जी कर ही हम,अपना पूरा जीवन अपने लिए ही जी सकेंगे और जीवन का आनंद ले सकेंगे...आज अपने प्रभु से जीवन में,आयुनुसार दायित्वों का पालन करने की अलौकिक प्रार्थना के साथ.
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जैसे; ममता, ईर्ष्या, हर्ष, विषाद, जलन, दुष्टता, मन की कुटिलता, अहंकार, दंभ, कपट, मद, मान, तृष्णा, मात्सर्य (डाह) और अविवेक आदि का वर्णन करते हैं और शारीरिक रोगों के साथ इनकी तुलना करते हुए इन मनोरोगों की विकरालता को स्पष्ट करते हैं।

यहाँ मनोरोगों की तुलना शारीरिक व्याधियों से इस प्रकार और इतने सटीक ढंग से की गई है, कि किसी भी शारीरिक व्याधि की तीक्ष्णता और जटिलता से मनोरोग की तीक्ष्णता और जटिलता का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। शरीर का रोग प्रत्यक्ष होता है और शरीर में परिलक्षित होने वाले उसके लक्षणों को देखकर जहाँ एक ओर उपचार की प्रक्रिया को शुरू किया जा सकता है, वहीं दूसरी ओर व्याधिग्रस्त व्यक्ति को देखकर अन्य लोग उस रोग से बचने की सीख भी ले सकते हैं।

सामान्यतः मनोरोग प्रत्यक्ष परिलक्षित नहीं होता, और मनोरोगी भी स्वयं को व्याधिग्रस्त नहीं मानता है। इस कारण से बाबा तुलसी ने मनोरोगों की तुलना शारीरिक रोगों से करके एकदम अलग तरीके से सीख देने का कार्य किया है।

कागभुशुंडि कहते हैं कि एक बीमारी-मात्र से व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और यहाँ तो अनेक असाध्य रोग हैं। मनोरोगों के लिए नियम, धर्म, आचरण, तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान आदि अनेक औषधियाँ हैं, किंतु ये रोग इन औषधियों से भी नहीं जाते हैं।

इस प्रकार संसार के सभी जीव रोगी हैं। शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोग से दुःख की अधिकता हो जाती है। इन तमाम मानस रोगों को विरले ही जान पाते हैं। जानने के बाद ये रोग कुछ कम तो होते हैं, मगर विषय वासना रूपी कुपथ्य पाकर ये साधारण मनुष्य तो क्या, मुनियों के हृदय में भी अंकुरित हो जाते हैं।

मनोरोगों की विकरालता का वर्णन करने के उपरांत इन रोगों के उपचार का वर्णन भी होता है। कागभुशुंडि के माध्यम से तुलसीदास कहते हैं कि सद्गुरु रूपी वैद्य के वचनों पर भरोसा करते हुए विषयों की आशा को त्यागकर संयम का पालन करने पर श्रीराम की कृपा से ये समस्त मनोरोग नष्ट हो जाते हैं।

रघुपति भगति सजीवनि मूरी ।
अनूपान श्रद्धा मति पूरी ।।

इन मनोरोगों के उपचार के लिए श्रीराम की भक्ति संजीवनी जड़ की तरह है। श्रीराम की भक्ति को श्रद्धा से युक्त बुद्धि के अनुपात में निश्चित मात्रा के साथ ग्रहण करके मनोरोगों का शमन किया जा सकता है। यहाँ तुलसीदास ने भक्ति, श्रद्धा और मति के निश्चित अनुपात का ऐसा वैज्ञानिक तर्कसम्मत उल्लेख किया है, जिसे जान समझकर अनेक लोगों ने मानस को अपने जीवन का आधार बनाया और मनोरोगों से मुक्त होकर जीवन को सुखद और सुंदर बनाया।

यहाँ पर श्रीराम की भक्ति से आशय कर्मकांडों को कठिन और कष्टप्रद तरीके से निभाने, पूजा पद्धतियों का कड़ाई के साथ पालन करने और इतना सब करते हुए जीवन को जटिल बना लेने से नहीं है। इसी प्रकार श्रद्धा भी अंधश्रद्धा नहीं है।

भक्ति और श्रद्धा को संयमित, नियंत्रित और सही दिशा में संचालित करने हेतु मति है। मति को नियंत्रित करने हेतु श्रद्धा और भक्ति है। इन तीनों के सही और संतुलित व्यवहार से श्रीराम का वह स्वरूप प्रकट होता है, जिसमें मर्यादा, नैतिकता और आदर्श है। जिसमें लिप्सा लालसा नहीं, त्याग और समर्पण का भाव होता है।

जिसमें विखंडन की नहीं, संगठन की; सबको साथ लेकर चलने की भावना निहित होती है। जिसमें सभी के लिए करुणा, दया, ममता, स्नेह, प्रेम, वात्सल्य जैसे उदात्त गुण परिलक्षित होते हैं। श्रद्धा, भक्ति और मति का संगठन जब श्रीराम के इस स्वरूप को जीवन में उतारने का माध्यम बन जाता है, तब असंख्य मनोरोग दूर हो जाते हैं।

स्वयं का जीवन सुखद, सुंदर, सरल और सहज हो जाता है। जब अंतर्जगत में, मन में रामराज्य स्थापित हो जाता है, तब बाह्य जगत के संताप प्रभावित नहीं कर पाते हैं।

इसी भाव को लेकर, आत्मसात् करके विसंगतियों, विकृतियों और जीवन के संकटों से जूझने की सामर्थ्य अनगिनत लोगों को तुलसी के मानस से मिलती रही है। यह क्रम आज का नहीं, सैकड़ों वर्षों का है।

यह क्रम देश की सीमाओं के भीतर का ही नहीं, वरन् देश से बाहर कभी गिरमिटिया मजदूर बनकर, तो कभी प्रवासी बनकर जाने वाले लोगों के लिए भी रहा है। सैकड़ों वर्षों से लगाकर वर्तमान तक अनेक देशों में रहने वाले लोगों के लिए तुलसी का मानस इसी कारण पथ प्रदर्शक बनता है, सहारा बनता है।

आज के जीवन की सबसे जटिल समस्या ऐसे मनोरोगों की है, मनोविकृतियों की है, जिनका उपचार अत्याधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के पास भी उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में तुलसीदास का मानस व्यक्ति से लगाकर समाज तक, सभी को सही दिशा दिखाने, जीवन को सन्मार्ग में चलाने की सीख देने की सामर्थ्य रखता है।
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गरुड़ जी और कागभुसुंडिजी

मानस रोगों के विश्लेषण एवं उनके प्रदर्शन का तात्पर्य एक स्वस्थ्य और आदर्श जीवन की उपलब्धि है। खासकर तब जब विज्ञान ने मनुष्य की वांछित सुख सुविधाओं को उपलब्ध करा दिया हो, और फिर भी अशान्ति बढ़ती जा रही हो। तब यह निश्चित हो जाता है कि कारण बाहर नहीं अंदर है। कागभुशुण्डि संवाद के मध्य जीवन के मूलभूत प्रश्नों को बड़ी ही सूक्ष्मता से उभारा गया है।

नाथ मोहि निज सेवक जानी।
सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी॥

प्रथम: सृष्टि के अंदर जड़ तथा चेतन जितने भी जीव है, सब से दुर्लभ शरीर कौन-सा है?

उत्तर: मनुष्य देह के समान दूसरी कोई देह नहीं है। चर अथवा अचर अर्थात चलने फिरने और न चलने वाले, जड़ व चैतन सृष्टि के अंदर जितने भी जीव है, सब इस देह की याचना करते है।

दूसरा: इस संसार मैं सब से बड़ा दुःख क्या है?

उत्तर: संसार में दरिद्रता के समान दूसरा कोई दुःख नहीं है।

तीसरा: इस संसार में सबसे बड़ा सुख क्या है?

उत्तर: संतो के मिलने के समान दूसरा कोई सुख नहीं है।

यहाँ पर प्रश्न उठता है कि दरिद्रता कंगालपन को कहते है धनहीन को। तो यह धन की हीनता माया का धन है या भक्ति का धन? उत्तर साफ़ है यह भक्ति का धन है, जिसके बिना मनुष्य कंगाल और दुखी है। क्योंकि जब यह कहा गया कि संतो के मिलाप के समान दूसरा कोई सुख नहीं है तो फिर यह बात सिद्ध हो जाती है कि भक्ति से हीन होने के बराबर दूसरा कोई दुःख भी नहीं है। किन्तु जब संत मिलते है तो अपनी भक्ति का धन देकर सुखी कर देते है क्योंकि संतो के पास भक्ति ही का धन होता है।

चौथा: संत सत्पुरुषो तथा दुष्ट पुरुषों का सहज स्वभाव वर्णन कीजिये।

उत्तर: मन वचन और कर्म से उपकार करना संतो का सहज स्वभाव है। यहाँ तक कि संत दूसरे के हित के निमित्त अपने ऊपर दुःख भी सहते है, जैसे भोज पत्र का वृक्ष दूसरों को सुख देने के निमित अपनी खाल खिचवाता है (भोज परत के वृक्ष की खाल उतार कर ऋषि मुनि और तपस्वी लोग अपने शरीर को ढ़कते थे)।

तात्पर्य यह है कि संत दूसरों की भलाई के लिए दुःख सहन करते है तथा खोटे पुरुष दूसरों की बुराई के निमित दुःख सहते है। दुष्ट पुरुष बिना प्रयोजन ही दूसरों की बुराई करते है, जैसे साँप काट लेता है, तो उसको कुछ लाभ नहीं होता पर दूसरों के प्राण चले जाते है। चूहा बहुमूल्य वस्त्रों को काट डालता है, दूसरों की हानि हो जाती है परन्तु उसका कुछ लाभ नहीं होता। फिर कहते है जैसे बर्फ के ओले खेती का नाश करके आप नष्ट हो जाते है, ऐसे ही दुष्ट जन दूसरो की सम्पदा का नाश करके आप भी नष्ट हो जाते है।

पांचवा: वेदों ने कौन सा सबसे बड़ा पुण्य बताया है?

उत्तर: वेदों में सबसे बड़ा पुण्य अर्थात परम धर्म अहिंसा कहा गया है। अर्थात किसी की आत्मा को न ही दुखाना अहिंसा है।

छठा: सबसे घोर पाप कौन सा है।

उत्तर: परायी निंदा के समान कोई बड़ा पाप नहीं है। कागभुसुंडि जी का कथन है कि भगवान और गुरु की निंदा करने वाले मेंढ़क की योनि में जाते हैं और हजार जन्म तक मेंडक ही बनते रहते है तथा संतो की निंदा करने वाले उल्लू की योनि में जाते है। जिनको मोह रुपी रात्रि प्यारी है परन्तु ज्ञान रूपी सूर्य नहीं भाता अथवा जो मुर्ख सब की निंदा करते है, वे दूसरे जन्म में चमगादड़ बनते है।

सातँवा: मानसिक रोग कौन कौन से है?

उत्तर: अब मन के रोग सुनिए, जिन से सब लोग दुःख पाते है। सम्पूर्ण व्याधियो अर्थात रोगों की मूल जड़ मोह है। इस मोह से फिर अनेक प्रकार के शूल उत्पन्न होते है यदि मोह की जड़ कट जाए तो फिर शांति ही शांति है।

अंतिम प्रश्न के उत्तर में प्रायः वे सभी कारण निहित हैं, जो अनेक प्रकार के दुःखों का कारण बनते हैं। इस कारण बाबा तुलसी मानस रोगों का विस्तार से वर्णन करते हैं।

सुनहु तात अब मानस रोगा ।
जिन्ह तें दुख पावहिं सब लोगा ।।

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला ।
तिन्ह तें पुनि उपजहिं बहु सूला ।।

काम बात कफ लोभ अपारा।
क्रोध पित्त नित छाती जारा।।

प्रीति करहिं जौ तीनिउ भाई ।
उपजइ सन्यपात दुखदाई ।।

विषय मनोरथ दुर्गम नाना ।
ते सब सूल नाम को जाना ।।

कागभुशुंडि कहते हैं कि मानस रोगों के बारे में सुनिए, जिनके कारण सभी लोग दुःख पाते हैं। सारी मानसिक व्याधियों का मूल मोह है। इसके कारण ही अनेक प्रकार के मनोरोग उत्पन्न होते हैं। शरीर में विकार उत्पन्न करने वाले वात, कफ और पित्त की भाँति क्रमशः काम, अपार लोभ और क्रोध हैं।

जिस प्रकार पित्त के बढ़ने से छाती में जलन होने लगती है, उसी प्रकार क्रोध भी जलाता है। यदि ये तीनों मनोविकार मिल जाएँ, तो कष्टकारी सन्निपात की भाँति रोग लग जाता है। अनेक प्रकार की विषय वासना रूपी मनोकांक्षाएँ ही वे अनंत शूल हैं, जिनके नाम इतने ज्यादा हैं, कि उन सबको जानना भी बहुत कठिन है।

बाबा तुलसी इस प्रसंग में अनेक प्रकार के मानस रोगों,
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कहानी का समय

अहंकार का अंत


एक समय की बात है, एक खुला विशाल मैदान था जहाँ दूर-दूर तक हरियाली फैली हुई थी। उसी मैदान के बीचोंबीच एक बहुत ही विशाल और घना पेड़ खड़ा था। उसकी शाखाएँ चारों ओर फैली थीं, और उसकी जड़ें बहुत गहराई तक फैली हुई थीं। वह पेड़ अपने आप में बहुत गर्व महसूस करता था। उसके आसपास के छोटे पौधे, झाड़ियाँ, घास के तिनके — सभी उसकी छाया में रहते थे और उसकी ताकत से प्रभावित होकर उसे बहुत आदर देते थे।

पेड़ को लगता था कि वह इस मैदान का राजा है, और बाकी सब केवल उसकी सेवा के लिए हैं। उसके भीतर घमंड भर चुका था। वह अपने से छोटे किसी भी जीव या पौधे को कोई महत्व नहीं देता था।

एक दिन, आकाश में काले बादल छा गए। तेज़ हवाएं चलने लगीं और तूफान आने के संकेत मिलने लगे। सारे पक्षी उड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर चले गए। मैदान में खड़े सभी छोटे-बड़े पौधे डर के मारे काँपने लगे।

उसी समय, एक छोटा सा तिनका, जो तेज़ हवा में उड़ रहा था, पेड़ के पास आकर गिरा। तिनका बहुत हल्का था और तूफान के झोंकों में अपना संतुलन खो बैठा था। उसने पेड़ से विनम्रता से कहा,
"हे महान पेड़, मैं एक छोटा और निर्बल तिनका हूँ। यह तूफान मुझे उड़ा ले जाएगा। क्या मैं आपकी जड़ों के पास शरण ले सकता हूँ? आपकी जड़ें तो गहरी हैं, वहाँ मैं सुरक्षित रह पाऊँगा।"

पेड़ ने घमंड भरे स्वर में कहा,
"तिनके, तुम बहुत ही छोटे और तुच्छ हो। मैं इतना विशाल और ताकतवर हूँ कि मुझे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है। तुम्हारी उपस्थिति मेरे सम्मान को ठेस पहुँचाएगी। जाओ यहाँ से, मुझे तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं।"

बेचारा तिनका दुखी होकर वहाँ से चला गया और पास ही एक चट्टान की दरार में छिप गया। थोड़ी ही देर में तूफान पूरी शक्ति से मैदान पर टूट पड़ा। हवाएं भयानक गति से चलने लगीं। तेज़ वर्षा और गरजती बिजली ने सबको हिला कर रख दिया।

पेड़ ने भी अपनी पूरी ताकत से तूफान का सामना करने की कोशिश की। वह अपने आप को बहुत मजबूत समझता था, परंतु तूफान की शक्ति उससे कहीं अधिक थी। ज़ोरदार हवाओं ने उसकी जड़ों को ढीला कर दिया और अंत में वह विशाल पेड़ जमीन से उखड़ कर गिर पड़ा। उसकी टहनियाँ टूट गईं, और वह मैदान में नष्ट होकर बिखर गया।

तूफान के थमने के बाद, तिनका धीरे-धीरे बाहर निकला और देखा कि वह विशाल पेड़, जो कभी खुद को सबसे ताकतवर समझता था, अब धरती पर पड़ा हुआ है। तिनका शांत था, सुरक्षित था, और उसने सोचा —
"जिसने मुझे तुच्छ समझकर ठुकरा दिया था, उसका घमंड ही उसकी विनाश का कारण बन गया। मैं छोटा हूँ, पर विनम्रता और बुद्धिमत्ता के कारण आज सुरक्षित हूँ।"

सीख:-यह कहानी हमें यह सिखाती है कि अहंकार और घमंड का परिणाम विनाश होता है। जो व्यक्ति विनम्र होता है, वही विपरीत परिस्थितियों में भी सुरक्षित रहता है। हमें कभी भी किसी को छोटा या तुच्छ नहीं समझना चाहिए। हो सकता है, आज जो हमें छोटा लग रहा हो, वही कल किसी बड़ी शिक्षा का कारण बने। जीवन में विनम्रता, दयालुता, और सहनशीलता सबसे बड़ी ताकत होती है।
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उनकी साधना से साधक इन्द्रियनिग्रह, अन्तः सौन्दर्य, विवेक और वैराग्य प्राप्त करता है। कुण्डलिनी जाग्रत होकर आज्ञा और सहस्रार तक पहुँचती है। वे अष्टसिद्धियाँ देती हैं, ग्रहदोषों से रक्षा करती हैं और अंततः साधक को ब्रह्म में विलीन कर देती हैं। जब साधना परिपक्व होती है, तब गुरु, मंत्र और देवता का भेद मिट जाता है और साधक अनुभव करता है कि स्वयं माँ त्रिपुरा सुन्दरी ही उसकी अंतरात्मा में मार्गदर्शक बनकर विद्यमान हैं।

किन्तु यह साधना अत्यन्त गुप्त और शक्तिशाली है। यदि इसे बिना दीक्षा और अनुशासन के किया जाए तो साधक मानसिक असन्तुलन, अहंकार वृद्धि, अथवा दुष्परिणामों का अनुभव कर सकता है। इसीलिए यह बार-बार कहा गया है कि इस साधना को केवल योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।

इस प्रकार, माँ त्रिपुरा सुन्दरी केवल एक देवी नहीं हैं—वे स्वयं परम सत्य हैं। वे तीनों लोकों की सुन्दरता हैं, वह चेतना हैं जो मोह को काट देती है, और वह आनन्द हैं जो आत्मा को मुक्त कर देता है। उनकी उपासना का अर्थ है—अन्तर और बहिर दोनों जीवन में सामंजस्य लाना, भौतिक और आध्यात्मिक को जोड़ना, सीमित और असीम को एक करना। उनकी शरण में आने का अर्थ है अस्तित्व के हृदय का दर्शन करना.
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तीसरी महाविद्या षोडशी

माँ त्रिपुरा सुन्दरी, जिन्हें माँ शोडशी और माँ ललिता के नाम से भी जाना जाता है, दस महाविद्याओं में तीसरी महाविद्या मानी जाती हैं। वे आदिशक्ति का परम रूप हैं, वह दिव्य मातृशक्ति जो सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करती है। उन्हें “त्रिपुर सुन्दरी” कहा गया है क्योंकि वे तीनों लोकों—भौतिक, सूक्ष्म और कारण—में व्याप्त सुन्दरता और सामंजस्य की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे सृष्टि, पालन और संहार—तीनों शक्तियों को एक साथ समेटे हुए हैं। श्रीविद्या परंपरा में उन्हें सर्वोच्च सत्य माना गया है, यहाँ तक कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश से भी परे, जैसा कि त्रिपुरा उपनिषद् में वर्णित है। वे शिव की तेजस्विता के सामने शीतल चन्द्रकला की भाँति हैं—कोमल, पोषक और जीवनदायिनी।

उनकी प्रतिमा में गहन आध्यात्मिक रहस्य छिपे हैं। वे सदैव सोलह वर्षीय युवती के रूप में प्रकट होती हैं, इसीलिए माँ शोडशी कहलाती हैं। यह रूप शाश्वत यौवन, सौन्दर्य और पूर्णता का प्रतीक है। उनका वर्ण उगते हुए सूर्य के समान लालिमा से युक्त है, जो करुणा, हर्ष और प्रकाश का प्रतीक है। वे प्रायः श्रीचक्र पर या स्वयं सदाशिव पर विराजमान दिखायी देती हैं। उनके सिंहासन के आधार चार देव—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर—होते हैं, जो दर्शाता है कि सभी देवशक्तियाँ उन्हीं से प्रेरित हैं। उनके ललाट पर अर्धचन्द्र और अधरों पर मधुर मुस्कान शोभायमान रहती है, जो कामेश्वर तक को मोहित कर लेती है। वामकेश्वर तंत्र में उनका एक रूप वर्णित है जहाँ वे स्वच्छ क्रिस्टल के समान चमकती हुई, व्याघ्रचर्म और सर्पाभूषण धारण किए, त्रिशूल और डमरु धारण करती हैं, और नन्दी पर आरूढ़ रहती हैं।

उनकी चार भुजाएँ साधक को मार्गदर्शन देने वाले प्रतीक हैं। उनके हाथों में गन्ने का धनुष है—जो मन की मधुरता और एकाग्रता को दर्शाता है; पाँच पुष्पबाण हैं—जो पाँच इन्द्रियों पर विजय का प्रतीक हैं; पाश है—जो आसक्ति और मोह को बाँधकर नष्ट करता है; और अंकुश है—जो साधक को अनुशासन और आत्मनियंत्रण की ओर प्रवृत्त करता है। कभी-कभी उनके हाथों में वज्र, चक्र, गदा और त्रिशूल भी दिखाये जाते हैं, जो ब्रह्मांडीय नियंत्रण और संहार शक्ति का संकेत देते हैं। किन्तु उनका सर्वोच्च रूप श्रीचक्र से ही जुड़ा है—नौ त्रिकोणों का वह रहस्यमय यंत्र, जो अन्ततः एक बिन्दु में विलीन हो जाता है। यही बिन्दु शिव और शक्ति के मिलन का केन्द्र है। उनका मंत्र भी श्रीचक्र की तरह त्रिकोणीय है—वाग्भव ज्ञान का, कामराज इच्छा का और शक्ति बल का। इन तीनों से निर्मित योनित्रिकोण समस्त सृष्टि का मूल है।

ग्रंथों में उनकी महिमा असंख्य रूपों में वर्णित है। ब्रह्माण्ड पुराण में भण्डासुर पर उनकी विजय का वर्णन है, जहाँ दिव्य सौन्दर्य ने अहंकार और अराजकता पर विजय प्राप्त की। ललिता सहस्रनाम में उनके सहस्र नाम गाये जाते हैं, जिनमें प्रत्येक नाम उनकी अनंत महिमा का उद्घाटन करता है। त्रिपुरा रहस्य, त्रिपुरा उपनिषद् और त्रिपुरातापिनी उपनिषद् उन्हें सर्वोच्च चेतना के रूप में प्रतिपादित करते हैं। सौन्दर्यलहरी उनके बीज मंत्रों और इन्द्रियनिग्रह की महिमा का गान करती है। इस प्रकार वे केवल एक देवी नहीं, बल्कि स्वयं अद्वैत आनंद का मूर्त स्वरूप हैं—जो साधक को भौतिक सम्पन्नता से लेकर मोक्ष तक की यात्रा पर ले जाती हैं।

उनकी कृपा से साधक को अनेकों प्रकार के वरदान प्राप्त होते हैं। वे धन, ऐश्वर्य, सौन्दर्य, दाम्पत्य सुख, संतान, व्यवसाय में सफलता और ग्रहदोषों से मुक्ति देती हैं। साथ ही वे साधक के भीतर ज्ञान, शान्ति, और मोक्ष की ओर उन्मुखता जागृत करती हैं। उनका आराधन अहंकार को गलाकर करुणा और चेतना के प्रकाश को प्रकट करता है।

उनकी उपासना विशेष दीक्षा के बिना सम्भव नहीं। नवावरण पूजा में श्रीचक्र के प्रत्येक आवरण की साधना क्रमशः की जाती है, जब तक कि साधक बिन्दु तक न पहुँच जाए। तांत्रिक पूजा में कलश स्थापना, प्राण प्रतिष्ठा, षोडशोपचार, सहस्रनाम जप, महायज्ञ, और विसर्जन के विधान होते हैं। ललिता पंचमी, ललिता जयंती, नवरात्रि और विजयदशमी जैसे पर्व उनके उपासकों के लिए विशेष महत्व रखते हैं।

उनके मंत्र अत्यंत गूढ़ और पवित्र माने जाते हैं। पंद्रह बीजों वाला पंचदशी मंत्र चक्रों में उनकी उपस्थिति को जागृत करता है। शोडशी मंत्र साधक को तुरियातीत अवस्था तक ले जाता है। सरल रूप में “ॐ श्रीं ह्रीं” अथवा “ॐ श्री मातरे नमः” का जप भी हृदय में उनकी कृपा को प्रवाहित करता है। बाला त्रिपुरा सुन्दरी मंत्र आज्ञाचक्र को जाग्रत करता है। परन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि पंचदशी और शोडशी मंत्रों की साधना सदैव गुरु की आज्ञा और मार्गदर्शन से ही करनी चाहिए।
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जब कोई व्यक्ति नितांत अकेला हो जाता हैं,तो प्रकृति की सारी शुभ शक्तियां उसका साथ देने को आतुर हो जाती हैं !!

जिसे नितांत अकेले होने का साहस हैं,वही इस खोज पर जा भी सकता हैं,मन तो हमारा यही करता हैं,कि कोई साथ हो,
कोई गुरु साथ हो,कोई मित्र साथ हो,कोई जानकार साथ हो,
कोई मार्गदर्शक साथ हो,कोई सहयोगी साथ हो,अकेले होने के लिए हमारा मन नहीं करता,लेकिन जब तक कोई अकेला नहीं हो सकता हैं,तब तक आत्मिक खोज की दिशा में इंच भर भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता,अकेले होने की सामर्थ्य,दि करेज टु बी अलोन,सबसे कीमती बात हैं। हम तो दूसरे को साथ लेना चाहेंगे। महावीर को कोई निमंत्रण देता हैं,आकर कि मुझे साथ ले लो, मैं सहयोगी बन जाऊंगा, तो भी वे सधन्यवाद वह निमंत्रण वापस लौटा देते हैं! कथा यह हैं,कि देव इंद्र खुद कहता हैं, आकर कि मैं साथ दूं, सहयोगी बनूं! तो वे कहते हैं, क्षमा करें,यह खोज ऐसी नहीं हैं,कि कोई इसमें साथी हो सके,यह खोज तो नितांत अकेले ही करने की हैं,क्यों ? यह अकेले का इतना आग्रह क्यों हैं ? अकेले के आग्रह में बड़ी गहरी बातें हैं,पहली बात तो यह हैं,कि जब हम दूसरे का साथ मांगते हैं,तभी हम कमजोर हो जाते हैं। असल में साथ मांगना ही कमजोरी हैं,वह हमारा कमजोर चित्त ही है, जो कहता हैं,साथ चाहिए। और कमजोर चित्त क्या कर पाएगा ? जो पहले से ही साथ मांगने लगा,वह कर क्या पाएगा ? तो पहली तो जरूरत यह हैं,कि हम साथ की कमजोरी छोड़ दें। और पूरी तरह जो अकेला हो जाता हैं--जिसके चित्त से संग की, साथ की मांग,समाज की, सहयोग की इच्छा मिट जाती हैं,यह बड़ी अदभुत बात हैं, कि जो इस भांति अकेला हो जाता हैं,जिसे किसी के संग की कोई इच्छा नहीं हैं--सारा जगत उसे संग देने को उत्सुक हो जाता हैं!
इस कहानी में जो दूसरा मतलब हैं,वह यह कि खुद देवता भी उत्सुक हैं,उस व्यक्ति को सहारा देने को, जो अकेला खड़ा हो गया! जो साथ मांगता हैं,उसे तो साथ मिलता नहीं,नाम मात्र को लोग साथी हो जाते हैं, साथ मिलता नहीं,असल में मांग से कोई साथ पा ही नहीं सकता हैं।
लेकिन जो मांगता ही नहीं साथ,जो मिले हुए साथ को भी इनकार कर देता हैं,उसके लिए सारे जगत की शुभ शक्तियां आतुर हो जाती हैं, साथ देने को। कहानी तो काल्पनिक हैं,मिथ हैं,पुराण हैं,गाथा हैं,प्रबोध कथा हैं। वह कहती यह हैं,कि जब कोई व्यक्ति नितांत अकेला खड़ा हो जाता हैं,तो जगत की सारी शुभ शक्तियां उसको साथ देने को आतुर हो जाती हैं।
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काला बिछुआ या बाघनखी

बाघनखी या बाघनखी या बाघनख एक पौधा है जो बरसात में उगता है और सर्दी आते आते सूख जाता है. इसके फल सूख कर चटक जाते हैं और उनमे से एक काले या भूरे रंग का बड़ा सा बीज निकलता है. इस बीज की शकल बाघ के मुड़े हुए नाखूनों जैसी होती है. इसलिए इसे बघनखी या बाघनखी या बाघनख कहते हैं.

इसके पत्ते बड़े और रोएंदार होते हैं. कुछ लोग इसके पौधे को हाथाजोड़ी, बघनखी के पौधे का वैज्ञानिक नाम मार्टिनिया एनुआ है. देसी भाषाओं में कहीं इसे उलट कांटा भी कहते हैं. इसके मुड़े हुए कांटो की वजह से इसे बिच्छू फल या काला बिछुआ भी कहते हैं. कुछ लोग इसके पौधे को बिच्छू झाडी समझते हैं. जबकि बिच्छू झाड़ी एक अलग ही पौधा है.
कुछ लोगों ने ये भ्रम भी पाल रखा है की ये पौधा वहीँ उगता है जहां बिच्छू रहते हैं. और ये बिच्छू काटे की अच्छी दवा है.
इसके कई नाम होने के कारण अन्य पौधों की नामों में भ्रम हो जाता है. ये पौधा ही ऐसा है।
ये पौधा सूजन और दर्द को दूर करता है. इसमें रक्त शोधक गुण हैं. सूजन और दर्द को दूर करने के गुणों के कारण इसे गठिया रोग में इस्तेमाल किया जाता है. इसके पत्तों को सरसों के तेल में पकाकर ये तेल जोड़ो के दर्द में मालिश करने से बहुत आराम मिलता है. इसके सूखे फलों को कूटकर भी तेल में पका सकते हैं. ये एक अच्छा दर्द निवारक तेल बन जाता है.
इसके फलो का तेल में पकाकर बालों में लगाने से बाल जल्दी सफ़ेद नहीं होते,
इसकी जड़ का पाउडर एक से दो ग्राम की मात्रा में अश्वगंधा का पाउडर सामान मात्रा में मिलाकर शहद के साथ सुबह शाम इस्तेमाल करने से गठिया रोग में राहत मिलती है.
कुछ लोगों को इसके इस्तेमाल से एलर्जी हो जाती है, इसका प्रयोग करने से पहले किसी काबिल हकीम या वैद्य की सलाह अवश्य लें।
यह पौधा नमी वाली और गर्म जलवायु में उगता है,इसके फलों और बीजों में औषधीय गुण होते हैं.
यह एक पारंपरिक औषधि है, इसलिए इसका उपयोग करने से पहले किसी आयुर्वेदिक विशेषज्ञ से परामर्श करना आवश्यक है।
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कैला देवी मंदिर, करौली

यहाँ डकैत भी आकर करते है माँ काली की साधना – कैला देवी मंदिर सवाई माधोपुर के निकट राजस्थान के करौली जिले में स्थित एक प्राचीन मंदिर है। कैला देवी मंदिर में चांदी की चौकी पर स्वर्ण छतरियों के नीचे दो प्रतिमाएं हैं। इनमें एक बाईं ओर उसका मुंह कुछ टेढ़ा है, वो ही कैला मइया है। दाहिनी ओर दूसरी माता चामुंडा देवी की प्रतिमा है। कैला देवी की आठ भुजाएं हैं। मंदिर उत्तर भारत के प्रमुख शक्तिपीठ के रूप में ख्याति प्राप्त है।

उत्तर भारत के प्रमुख शक्तिपीठ के रूप में ख्याति प्राप्त कैला देवी मंदिर देवी भक्तों के लिए पूजनीय है, यहाँ आने वालों को सांसारिक भागमभाग से अलग अनोखा सुकून मिलता है। त्रिकूट मंदिर की मनोरम पहाड़ियों की तलहटी में स्थित इस मंदिर का निर्माण राजा भोमपाल ने 1600 ई. में करवाया था। इस मंदिर से जुड़ी अनेक कथाएं यहाँ प्रचलित है। माना जाता है कि भगवान कृष्ण के पिता वासुदेव और देवकी को जेल में डालकर जिस कन्या योगमाया का वध कंस ने करना चाहा था, वह योगमाया कैला देवी के रूप में इस मंदिर में विराजमान है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार पुरातन काल में त्रिकूट पर्वत के आसपास का इलाका घने वन से घिरा हुआ था। इस इलाके में नरकासुर नामक आतातायी राक्षस रहता था। नरकासुर ने आसपास के इलाके में काफ़ी आतंक कायम कर रखा था। उसके अत्याचारों से आम जनता दु:खी थी। परेशान जनता ने तब माँ दुर्गा की पूजा की और उन्हें यहाँ अवतरित होकर उनकी रक्षा करने की गुहार की। बताया जाता है कि आम जनता के दुःख निवारण हेतु माँ कैला देवी ने इस स्थान पर अवतरित होकर नरकासुर का वध किया और अपने भक्तों को भयमुक्त किया। तभी से भक्तगण उन्हें माँ दुर्गा का अवतार मानकर उनकी पूजा करते हुए आ रहे हैं। कैला देवी का मंदिर सफ़ेद संगमरमर और लाल पत्थरों से निर्मित है, जो स्थापत्य कला का बेमिसाल नमूना है।

माना जाता है कि मंदिर में स्थापित मूर्ति पूर्व में नगरकोट में स्थापित थी। विधर्मी शासकों के मूर्ति तोड़ो अभियान से आशंकित उस मंदिर के पुजारी योगिराज मूर्ति को मुकुंददास खींची के यहां ले आए। केदार गिरि बाबा की गुफा के निकट रात्रि हो जाने से उन्होंने मूर्ति बैलगाड़ी से उतारकर नीचे रख दी और बाबा से मिलने चले गए। दूसरे दिन सुबह जब योगिराज ने मूर्ति उठाने की चेष्टा की तो वह उस मूर्ति हिला भी नहीं सके। इसे माता भगवती की इच्छा समझ योगिराज ने मूर्ति को उसी स्थान पर स्थापित कर दिया और मूर्ति की सेवा करने की जिम्मेदारी बाबा केदारगिरी को सौंप कर वापस नगरकोट चले गए।

माता कैला देवी का एक भक्त दर्शन करने के बाद यह बोलते हुए मंदिर से बाहर गया था कि जल्दी ही लौटकर फिर वापस आउंगा। कहा जाता है कि वह आज तक नहीं आया है। ऐसी मान्यता है कि उसके इंतजार में माता आज भी उधर की ही ओर देख रहीं है जिधर वो गया।

करौली में स्तिथ माँ कैला देवी के इस मंदिर में फिल्मी स्टाइल में वेश बदलकर डकैत आते हैं और मां कैला देवी की आराधना करते हैं। वे अपने लक्ष्य की साधना के लिए मां से मन्नत मांगते हैं। मन्नत पूरा होने पर फिर आते हैं। मां की कई घंटों साधना कर विजय घंटा चढ़ाते हैं और निकल जाते हैं।

करौली में कैला देवी मंदिर के बाहर और अंदर पुलिस का कड़ा पहरा रहता है। पुलिस को भनक भी लग जाती है कि डकैत आने वाले हैं, लेकिन बावजूद इसके डकैत आते हैं और पूजा कर निकल जाते हैं। भरपूर कोशिश के बावजूद डकैतों को रोक पाना पुलिस के बस में नहीं रहता। जैसे फिल्मों में पुलिस और डकैतों के बीच चोर-सिपाही का खेल प्रतिष्ठा का सवाल होता है, वैसे ही यहां की भी स्थिति रहती रही है।

मंदिर के बाहर प्रसाद की दुकान लगाने वालों ने बताया कि अब डकैत कम हो गए या सरेंडर कर चुके हैं, लेकिन क्षेत्र के कुख्यात डकैत भी यहां आते रहे हैं। इनमें करौली का राम सिंह डकैत, जगन गूर्जर, धौलपुर के बीहड़ों में अड्डा बनाने वाला औतारी और करौली के जंगलों का सूरज माली डकैत नियमित रूप से कैला देवी आते रहे हैं।

पुलिस भी उन्हें पकड़ने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाई। हालांकि, साधना के समय आने वाले डकैतों ने श्रद्धालुओं को कभी हानि नहीं पहुंचाई।
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।।श्री रासेश्वरी स्तोत्रम् ।।

श्रीनारायण उवाच-
राधा रासेश्वरी रासवासिनी रसिकेश्वरी।
कृष्णप्राणाधिका कृष्णप्रिया कृष्णस्वरूपिणी।।१।।

कृष्णवामाङ्ग‌सम्भूता परमानन्दरूपिणी।
कृष्णा वृन्दावनी वृन्दा वृन्दावनविनोदिनी।।२।।

चन्द्रावली चन्द्रकान्ता शरच्चन्द्रप्रभानना।
नामान्येतानि साराणि तेषामभ्यन्तराणि च।।३।।

राधेत्येवं च संसिद्धौ राकारो दानवाचकः।
स्वयं निर्वाणदात्री या सा राधा परिकीर्तिता।।४।।

रासेश्वरस्य पत्नीयं तेन रासेश्वरी स्मृता।
रासे च वासो यस्याश्च तेन सा रासवासिनी।।५।।

सर्वासां रसिकानां च देवीनामीश्वरी परा।
प्रवदन्ति पुरा सन्तस्तेन तां रसिकेश्वरीम्।।६।।

प्राणाधिका प्रेयसी सा कृष्णस्य परमात्मनः।
कृष्णप्राणाधिका सा च कृष्णेन परिकीर्तिता।।७।।

कृष्णस्यातिप्रिया कान्ता कृष्णो वास्याः प्रियः सदा।
सर्वैर्देवगणैरुक्ता तेन कृष्णप्रिया स्मृता।।८।।

कृष्णरूपं संनिधातुं या शक्ता चावलीलया।
सर्वांशैः कृष्णसदृशी तेन कृष्णस्वरूपिणी।।९।।

वामाङ्गार्धेन कृष्णस्य या सम्भूता परा सती।
कृष्णवामाङ्गसम्भूता तेन कृष्णेन कीर्तिता।।१०।।

परमानन्दराशिश्च स्वयं मूर्तिमती सती।
श्रुतिभिः कीर्तिता तेन परमानन्दरूपिणी।।११।।

कृषिमोक्षार्थवचनो न एवोत्कृष्टवाचकः।
आकारो दातृवचनस्तेन कृष्णा प्रकीर्तिता।।१२।।

अस्ति वृन्दावनं यस्यास्तेन वृन्दावनी स्मृता।
वृन्दावनस्याधिदेवी तेन वाथ प्रकीर्तिता।।१३।।

सङ्घः सखीनां वृन्दः स्यादकारोऽप्यस्तिवाचकः।
सखिवृन्दोऽस्ति यस्याश्च सा वृन्दा परिकीर्तिता।।१४।।

वृन्दावने विनोदश्च सोऽस्या ह्यस्ति च तत्र वै।
वेदा वदन्ति तां तेन वृन्दावनविनोदिनीम्।।१५।।

नखचन्द्रावली वक्त्रचन्द्रोऽस्ति यत्र संततम्।
तेन चन्द्रावली सा च कृष्णेन परिकीर्तिता।।१६।।

कान्तिरस्ति चन्द्रतुल्या सदा यस्या दिवानिशम्।
सा चन्द्रकान्ता हर्षेण हरिणा परिकीर्तिता।।१७।।

शरच्चन्द्रप्रभा यस्याश्चाननेऽस्ति दिवानिशम्।
मुनिना कीर्तिता तेन शरच्चन्द्रप्रभानना।।१८।।

इदं षोडशनामोक्तमर्थव्याख्यानसंयुतम्।
नारायणेन यद्दत्तं ब्रह्मणे नाभिपङ्कजे।
ब्रह्मणा च पुरा दत्तं धर्माय जनकाय मे।।१९।।

धर्मेण कृपया दत्तं मह्यमादित्यपर्वणि।
पुष्करे च महातीर्थे पुण्याहे देवसंसदि।
राधाप्रभावप्रस्तावे सुप्रसन्नेन चेतसा।।२०।।

इदं स्तोत्रं महापुण्यं तुभ्यं दत्तं मया मुने।
निन्दकायावैष्णवाय न दातव्यं महामुने।।२१।।

यावज्जीवमिदं स्तोत्रं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः।
राधामाधवयोः पादपद्मे भक्तिर्भवेदिह।।२२।।

अन्ते लभेत्तयोर्दास्यं शश्वत्सहचरो भवेत्।
अणिमादिकसिद्धिं च सम्प्राप्य नित्यविग्रहम्।।२३।।

व्रतदानोपवासैश्च सर्वैर्नियमपूर्वकैः।
चतुर्णां चैव वेदानां पाठैः सर्वार्थसंयुतैः।।२४।।

सर्वेषां यज्ञतीर्थानां करणैर्विधिबोधितैः।
प्रदक्षिणेन भूमेश्च कृत्स्नाया एव सप्तधा।।२५।।

शरणागतरक्षायामज्ञानां ज्ञानदानतः।
देवानां वैष्णवानां च दर्शनेनापि यत् फलम्।।२६।।

तदेव स्तोत्रपाठस्य कलां नार्हति षोडशीम्।
स्तोत्रस्यास्य प्रभावेण जीवन्मुक्तो भवेन्नरः।।२७।।

।। इति श्रीरासेश्वरीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।
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श्रीगणेशन्यास एवं संकटहरणअष्टक (मुद्गलपुराण)।।
विधि:-आचमन एवं प्राणायाम करके अपनी बाधा निवारण के लिए संकल्पं करें,गणेशजी के पूजन के बाद अपने शरीर के अंगो को न्यास मंत्र बोलते हुए स्पर्श करें एवं गणेश अष्टक का पाठ बुधवार और चतुर्थी अवश्य करें।
।।श्रीगणेशन्यासः।।
दक्षिणहस्ते वक्रतुण्डाय नमः।
वामहस्ते शूर्पकर्णाय नमः।
ओष्ठे विघ्नेशाय नमः।
अधरोष्ठे चिन्तामणये नमः।
सम्पुटे गजाननाय नमः।
दक्षिणपादे लम्बोदराय नमः।
वामपादे एकदन्ताय नमः।
शिरसि एकदन्ताय नमः।
चिबुके ब्रह्मणस्पतये नमः।
दक्षिणनासिकायां विनायकाय नमः।
वामनासिकायां ज्येष्ठराजाय नमः।
दक्षिणनेत्रे विकटाय नमः।
वामनेत्रे कपिलाय नमः।
दक्षिणकर्णे धरणीधराय नमः।
वामकर्णे आशापूरकाय नमः।
नाभौ महोदराय नमः।
हृदये धूम्रकेतवे नमः।
ललाटे मयूरेशाय नमः।
दक्षिणबाहौ स्वानन्दवास कारकाय नमः।
वामबाहौ सच्चित्सुखधाम्नेनमः॥

॥इति मुद्गलपुराणोक्‍तो गणेशन्यासःसमाप्त॥

।।सङ्कष्टहरण गणेशाष्टक।।

ॐ अस्य श्री सङ्कष्टहरण स्तोत्र मन्त्रस्य श्री महागणपतिर्देवता सङ्कष्ट हरणार्थे जपेविनियोगः।

ॐ ॐ ॐकाररूपं त्र्यहमिति च परं यत्स्वरूपं तूरीयं त्रैगुण्यातीत नीलं कलयति मनसस्तेज सिन्दूरमूर्तिम्।
योगीन्द्रैर्ब्रह्मरन्ध्रैः सकलगुणमयं श्रीहरेन्द्रणसङ्गं
गं गं गं गं गणेशं गजमुखमभितो व्यापकं चिन्तयन्ति॥१

वं वं वं विघ्नराजं भजति निजभुजे दक्षिणे न्यस्तशुण्डं
क्रं क्रं क्रं क्रोधमुद्रादलितरिपुबलं कल्पवृक्षस्य मूले ।
दं दं दं दन्तमेकं दधति मुनिमुखं कामधेन्वा निषेव्यं
धं धं धं धारयन्तं धनदमतिधियं सिद्धिबुद्धिद्वितीयम्॥२

तुं तुं तुं तुङ्गरूपं गगनपथिगतं व्याप्नुवन्तं दिगन्तान्
क्लीं क्लीं क्लीं कारनाथं गलितमदमिलल्लोलमत्तालिमालम्।
ह्रीं ह्रीं ह्रीं कारपिङ्गं सकलमुनिवर ध्येयमुण्डं च शुण्डं
श्रीं श्रीं श्रीं श्रीं श्रयन्तं निखिल निधिकुलं नौमि हेरम्बबिम्बम्॥३

लौं लौं लौंकारमाद्यं प्रणवमिवपदं मन्त्रमुक्तावलीनां शुद्धं विघ्नेशबीजं शशिकरसदृशं योगिनां ध्यानगम्यम्।
डं डं डं डामरूपं दलितभवभयं सूर्यकोटिप्रकाशं
यं यं यं यज्ञनाथं जपति मुनिवरोबाह्यमभ्यन्तरं च॥४

हुं हुं हुं हेमवर्णं श्रुतिगणितगुणं शूर्पकर्णं कृपालुम्
ध्येयं सूर्यस्य बिम्बं ह्युरसि च विलसत् सर्पयज्ञोपवीतम् ।
स्वाहा हुं फट् नमोऽन्तैष्ठठठठ सहितैः पल्लवैः सेव्यमानम्
मन्त्राणां सप्तकोटि प्रगुणित महिमाधारमीशं प्रपद्ये॥५

पूर्वं पीठं त्रिकोणं तदुपरिरुचिरं षट्कपत्रं पवित्रं
यस्योर्ध्वं शुद्धरेखा वसुदल कमलं वा स्वतेजश्चतुस्रम्।
मध्ये हुङ्कारबीजं तदनु भगवतः स्वाङ्गषट्कं षडस्रे
अष्टौ शक्तीश्चसिद्धीर्बहुलगणपति र्विष्टरश्चाऽष्टकं च॥६

धर्माद्यष्टौ प्रसिद्धा दशदिशि विदिता वा ध्वजाल्यः कपालं
तस्य क्षेत्रादिनाथं मुनिकुलमखिलं मन्त्रमुद्रामहेशम्।
एवं यो भक्तियुक्तो जपति गणपतिं पुष्पधूपाऽक्षताद्यैः नैवेद्यै र्मोदकानां स्तुतियुतविलसद्गीत वादित्रनादैः॥७

राजानस्तस्य भृत्या इव युवतिकुलं दासवत् सर्वदास्ते
लक्ष्मीः सर्वाङ्गयुक्ता श्रयति च सदनं किङ्कराः सर्वलोकाः।
पुत्राः पुत्र्यः पवित्रा रणभुवि विजयी द्युतवादेऽपि वीरो
यस्येशो विघ्नराजो निवसति हृदये भक्तिभाग्यस्य रूद्रः॥८

॥इति सङ्कष्टहरणं गणेशाष्टकं सम्पूर्णम्॥
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कहानी का समय

हवन की सामग्री

एक गृह प्रवेश की पूजा में पंडित जी पूजा करा रहे थे।

पंडित जी ने सबको हवन में शामिल होने के लिए बुलाया। सबके सामने हवन सामग्री रख दी गई। पंडित जी मंत्र पढ़ते और कहते, “स्वाहा।”

लोग चुटकियों से हवन सामग्री लेकर अग्नि में डाल देते। गृह मालिक को स्वाहा कहते ही अग्नि में घी डालने की ज़िम्मेदीरी सौंपी गई।

हर व्यक्ति थोड़ी सामग्री डालता, इस आशंका में कि कहीं हवन खत्म होने से पहले ही सामग्री खत्म न हो जाए। गृह मालिक भी बूंद-बूंद घी डाल रहे थे। उनके मन में भी डर था कि घी खत्म न हो जाए।

मंत्रोच्चार चलता रहा, स्वाहा होता रहा और पूजा पूरी हो गई।
सबके पास बहुत सी हवन सामग्री बची रह गई। घी तो आधा से भी कम इस्तेमाल हुआ था।

हवन पूरा होने के बाद पंडित जी ने कहा कि आप लोगों के पास जितनी सामग्री बची है, उसे अग्नि में डाल दें। गृह स्वामी से भी उन्होंने कहा कि आप इस घी को भी कुंड में डाल दें।

एक साथ बहुत सी हवन सामग्री अग्नि में डाल दी गई। सारा घी भी अग्नि के हवाले कर दिया गया। पूरा घर धुंए से भर गया। वहां बैठना मुश्किल हो गया।
एक-एक कर सभी कमरे से बाहर निकल गए।

अब जब तक सब कुछ जल नहीं जाता, कमरे में जाना संभव नहीं था।काफी देर तक इंतज़ार करना पडा, सब कुछ स्वाहा होने के इंतज़ार में।

यह कहानी यहीं रुक जाती है।

उस पूजा में मौजूद हर व्यक्ति जानता था कि जितनी हवन सामग्री उसके पास है, उसे हवन कुंड में ही डालना है। पर सबने उसे बचाए रखा। सबने बचाए रखा कि आख़िर में सामग्री काम आएगी।

ऐसा ही हम करते हैं। यही हमारी फितरत है। हम अंत के लिए बहुत कुछ बचाए रखते हैं।

ज़िंदगी की पूजा खत्म हो जाती है और हवन सामग्री बची रह जाती है। हम बचाने में इतने खो जाते हैं कि जब सब कुछ होना हवन कुंड के हवाले है, उसे बचा कर क्या करना। बाद में तो वो सिर्फ धुंआ ही देगा।

संसार हवन कुंड है और जीवन पूजा। एक दिन सब कुछ हवन कुंड में समाहित होना है। अच्छी पूजा वही है, जिसमें हवन सामग्री का सही अनुपात में इस्तेमाल हो l
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कहानी का समय

प्रार्थना

एक जादूगर जो मृत्यु के करीब था, मृत्यु से पहले अपने बेटे को चाँदी के सिक्कों से भरा थैला देता है और बताता है कि- "जब भी इस थैले से चाँदी के सिक्के खत्म हो जाएँ तो मैं तुम्हें एक प्रार्थना बताता हूँ, उसे दोहराने से चाँदी के सिक्के फिर से भरने लग जाएँगे।" उसने बेटे के कान में चार शब्दों की प्रार्थना कही और वह मर गया।

अब बेटा चाँदी के सिक्कों से भरा थैला पाकर आनंदित हो उठा और उसे खर्च करने में लग गया। वह थैला इतना बड़ा था कि उसे खर्च करने में कई साल बीत गए, इस बीच वह प्रार्थना भूल गया। जब थैला खत्म होने को आया तब उसे याद आया कि- "अरे! वह चार शब्दों की प्रार्थना क्या थी।" उसने बहुत याद किया, उसे याद ही नहीं आया।

अब वह लोगों से पूँछने लगा। पहले पड़ोसी से पूछता है कि- "ऐसी कोई प्रार्थना तुम जानते हो क्या! जिसमें चार शब्द हैं !" पड़ोसी ने कहा- "हाँ, एक चार शब्दों की प्रार्थना मुझे मालूम है, "ईश्वर मेरी मदद करो।" उसने सुना और उसे लगा की ये वे शब्द नहीं थे, कुछ अलग थे। कुछ सुना होता है तो हमें जाना-पहचाना सा लगता है। फिर भी उसने वह शब्द बहुत बार दोहराए, लेकिन चाँदी के सिक्के नहीं बढ़े तो वह बहुत दुःखी हुआ।

फिर एक फादर से मिला, उन्होंने बताया कि- "ईश्वर तुम महान हो" ये चार शब्दों की प्रार्थना हो सकती है, मगर इसके दोहराने से भी थैला नहीं भरा। वह बहुत उदास हुआ। उसने सभी से मिलकर देखा मगर उसे वह प्रार्थना नहीं मिली, जो पिताजी ने बताई थी।

वह उदास होकर घर में बैठा हुआ था तब एक भिखारी उसके दरवाजे पर आया। उसने कहा, "सुबह से कुछ नहीं खाया, खाने के लिए कुछ हो तो दो।" उस लड़के ने बचा हुआ खाना भिखारी को दे दिया। उस भिखारी ने खाना खाकर बर्तन वापस लौटाया और ईश्वर से प्रार्थना की, "हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद।"

अचानक वह चोंक पड़ा और चिल्लाया कि- "अरे! यही तो वह चार शब्द थे।" उसने वे शब्द दोहराने शुरू किए- "हे ईश्वर तुम्हारा धन्यवाद" .. और उसके सिक्के बढ़ते गए ... बढ़ते गए ... इस तरह उसका पूरा थैला भर गया।

इससे समझें कि जब उसने किसी की मदद की तब उसे वह मंत्र फिर से मिल गया। "हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद।" यही उच्चतम प्रार्थना है क्योंकि जिस चीज के प्रति हम धन्यवाद देते हैं, वह चीज बढ़ती है। अगर पैसे के लिए धन्यवाद देते हैं तो पैसा बढ़ता है, प्रेम के लिए धन्यवाद देते हैं तो प्रेम बढ़ता है।

ईश्वर या गुरूजी के प्रति धन्यवाद के भाव निकलते हैं की ऐसा ज्ञान सुनने तथा पढ़ने का मौका हमें प्राप्त हुआ है। बिना किसी प्रयास से यह ज्ञान हमारे जीवन में उतर रहा है वरना ऐसे अनेक लोग हैं, जो झूठी मान्यताओं में जीते हैं और उन्हीं मान्यताओं में ही मरते हैं। मरते वक्त भी उन्हें सत्य का पता नहीं चलता। उसी अंधेरे में जीते हैं, मरते हैं।

सारांश-
उपरोक्त सत्संग से समझें की "हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद" ये चार शब्द, शब्द नहीं प्रार्थना की शक्ति है। अगर यह चार शब्द दोहराना किसी के लिए कठिन है तो इसे तीन शब्दों में कह सकते हैं- "ईश्वर तुम्हार धन्यवाद।" ये तीन शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो दो शब्द कहें, "ईश्वर धन्यवाद!" और दो शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो सिर्फ एक ही शब्द कह सकते हैं, "धन्यवाद!"*

आइए, हम सब मिलकर एक साथ धन्यवाद दें उस ईश्वर को, जिसने हमें मनुष्य जन्म दिया और उसमें दी दो बातें- पहली "साँस का चलना" दूसरी "सत्य की प्यास।" यही प्यास हमें खोजी से भक्त बनाएगी। भक्ति और प्रार्थना से होगा आनंद, परम आनंद, तेज आनंद।
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*अन्तस्तृष्णोपतप्तानां दावदाहमयं जगत्।भवत्यखिलजन्तूनां यदन्तस्तद्बहिःस्थितम्।योगवासिष्ठ-५/५६/३४*
जिनका अन्तःकरण तृष्णा से तप्त है, उनको यह जगत दावानल स्वरूप प्रतीत होता है। सभी प्राणियों के अन्दर जो भाव होता है वही बाहर जगत में दिखाई देता है।

*बुद्धिरुत्पद्यते तादृग् यादृक् कर्म फलोदयः।सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता॥शुक्रनीति-१।४६*
जैसा कर्मों का फल-उदय होता है, वैसी ही बुद्धि उत्पन्न होती है और जैसी भवितव्यता होती है,वैसे ही सहायक भी हो जाते हैं।
।।श्रीगुरवे नमः।।
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*बृं बृहस्पतयेनमः।*
बृहस्पति- वैदिक मन्त्र ॐ बृहस्पते अतियदर्यो अर्हाद्द्युमद्वि भाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋत प्रजाततदस्मासुद्रविणं धेहिचित्रम्॥(हवन समिधा पीपल।
एकाक्षरीबीजमन्त्र-ॐबृं बृहस्पतयेनमः।तान्त्रिकगुरुमन्त्र-ॐग्रां ग्रीं ग्रौं सःगुरवेनमः।जपसंख्या-१९००० (उन्नीसहजार)।जपकाल-संध्याकाल।🐘

ध्यानमूलंगुरूमूर्तिपूजामूलंगुरोपदं मंत्र मूलंगुरोर्वाक्यंमोक्षमूलंगुरूकृपा।
ॐदेवानां चऋषीणांचगुरुंकांचनसन्निभम्।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशंतंनमामिबृहस्पतिम्।
देवमंत्री विशालाक्ष:सदालोकहितेरत:।अनेकशिष्यसंपूर्ण:पीड़ांहरतुमेगुरु:।।

ॐ नमोभगवतेवासुदेवायनमः।जगदीश सुधीशभवेशविभो,परमेशपरात्परपूतपितः ।प्रणतंपतितंहतबुद्धिबलं,जनतारणतारय तापितकम्।।गुणहीनसुदीनमलीनमतिं त्वयि,पातरिदातरिचापरतिम्।तमसारजसा वृतवृत्तिमिमं,जनतारणतारयतापितकम्।।*
हे जगदीश,हे सुमतियों के स्वामी,हे विश्वेश, हे सर्वव्यापिन्, हे परमेश्वर,हे प्रकृति आदि से अतीत, हे परमपावन,हे पित, हे जीवों का निस्तारण करने वाले, इस शरणागत पतित और बुद्धिबल से हीन, संसारसन्तप्त दास का उद्धार कीजिये, जो सर्वथा गुणहीन,अत्यन्त दीन और मलीनमति है,जो अपने रक्षक और दाता से अर्थात प्रभु कृपा से विमुख है, हे जीवों का निस्तारण करने वाले,इस संसार से सन्तप्त,तमस,राजस की चक्र वृत्तिवाले,अपने दास का उद्धार कीजिये।हमारी रक्षा करें।

*वन्देमुकुन्दमरविन्ददलायताक्षं कुन्देन्दुशंख दशनं शिशुगोपवेषम्।इन्द्रादिदेवगणवन्दित पादपीठं वृन्दावनालयमहं वसुदेवसूनुम्॥(श्रीमुकुंदमाला श्लोक1)🪔*
जिनकेकमलदलसदृश विशालनेत्रहैं,कुन्द,चन्द्र अथवा शंखकेसदृश दन्तहैं,बाल-गोपालका वेषहै, इन्द्रादिक देवताओंकेद्वारा जिनके चरणों की पादुकाएँ वन्दितहैं,उनवृन्दावन निवासी वसुदेव नन्दन मुकुन्दकी मैं वन्दना करताहूँ।

*वृन्दावनतृणगुल्माद्यनीशं सच्चिद्रसात्मकं कलयन्।प्रणमन्नतिभक्तिभराद्यइहवसेत्तं नमन्त्यहोधन्याः।।श्रीवृन्दावनमहिमामृतम्।*
जो श्रीधाम वृन्दावन तृण -गुल्मादि का सच्चिदानन्दघन मुर्तिरूप में निशिदिन दर्शन करता हैएवं उनको भक्तिपूर्वक.निरन्तरप्रणाम करते हुए यहाँ श्रीधाम वृन्दावनमें अखन्ड वास करताहै|उनको भाग्यवान पुरुष सादर नमस्कार करतेहैं।

*श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्म निवेदनम्इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नव लक्षणा क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्(श्रीमद्भागवतमहापुराण ७/५/२३- २४)*
प्रह्लादजीने कहा-विष्णुभगवान्‌ की भक्ति के नौ भेद हैं -भगवान के गुण-लीला-नाम आदि का श्रवण, उन्हींका कीर्तन,उनके रूप-नाम आदिका स्मरण, उनके चरणोंकी सेवा, पूजा- अर्चा, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन।यदि भगवानके प्रतिसमर्पणके भावसे यह नौ प्रकारकी भक्तिकीजाय,तो मैं उसीकोउत्तम अध्ययन समझताहूँ।【श्रवण(परीक्षित), कीर्तन(शुकदेव),स्मरण(प्रह्लाद),चरणसेवन (लक्ष्मी),अर्चन(पृथुराजा),वंदन(अक्रूर),दास्य (हनुमान),सख्य(अर्जुन)औरआत्मनिवेदन (बलिराजा)इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं】

*श्याममेवपरं रूपं पुरीमधुपुरीपरा।
वयःकैशोरकं ध्येयमाद्य एवपरोरसः॥*
एक भक्त कहते हैँ कि- हमारे मतमें तो श्यामरूप ही सर्वश्रेष्ठ रूप है।मथुरापुरी ही सर्वश्वष्ठ पुरी है।भगवान्‌ श्रीकृष्ण की किशोरावस्था का ध्यान ही सर्वश्रेष्ठ है और शृङ्गाररस ही उत्कृष्ट रस है॥

*दानमिज्यातपःशौचं तीर्थसेवाश्रुतं तथा।सर्वाण्येतान्यतीर्थानि यदिभावो ननिर्मलः ।।स्कन्दमहापुराण,काशीखण्ड- ६/३९*
भीतर का भाव शुद्ध न हो तो दान,यज्ञ, तप, शौच, तीर्थसेवन, शास्त्र-श्रवण और स्वाध्याय - ये सभी अतीर्थ हो जाते हैं।

*पंचैवपूजयन्लोके,यश:प्राप्नोतिकेवलम्।देवान्पितॄन्मनुष्यांश्च,भिक्षूनतिथिपंचमान्॥*
देवता,पितर,मनुष्य,भिक्षुक तथा अतिथि- इन पाँचों की सदैव सच्चे मन से पूजा-स्तुति करनी चाहिए।इससे यश और सम्मान प्राप्त होताहै।

*न चातिप्रणयः कार्यः कर्त्तव्योप्रणयश्च ते।
उभयं हि महान् दोष: तस्मादन्तरदृग्भव॥*
किसी से अधिक प्रेम या अधिक वैर नही करना चाहिए, क्योंकि दोनों ही अत्यन्त अनिष्टकारक होते हैं, अतः सदा मध्यम मार्ग का ही अवलम्बन करना चाहिये।

*युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥श्रीमद्भगवद्गीता-६/१७*
यथायोग्य आहार-विहार करनेवालों के लिए, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करनेवालों के लिए और यथायोग्य सोने और जगने वालों के लिए ही योग दुखों का नाश करनेवाला होता है।

*शीलं प्रधानं पुरुषेक तद् यस्येह प्रणश्यति।
न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः॥*
शील ही मनुष्य का प्रमुख गुण है।जिस व्यक्ति का शील नष्ट हो जाता है- धन, जीवन और सगे-सम्बन्धी उसके किसी काम के नहीं रहते; अर्थात उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है।
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।। धर्म का स्वाद ।।

चिंतन-मनन द्वारा धर्म की सैद्धांतिक जानकारी कर लेने मात्र से हमारा वास्तविक लाभ नहीं होता। यह जान और समझ लेने मात्र से कि रसगुल्ला मीठा है, हमारा मुँह मीठा नहीं हो सकता। उसके लिए हमें रसगुल्ला जीभ पर धरना ही होता है।

केवल यह जान और समझ लेने से कि दूध पुष्टिकारक है, हमारी देह पुष्ट नहीं हो जाती। उसके लिए तो हमें दूध पीना ही होता है। जानना और समझ लेना हमारे कल्याण की पहली सीढ़ियां हैं। परंतु केवल जान और समझ कर ही रुक जायें और जानी समझी बात को जीवन में न उतारें तो ऐसा जानना समझना व्यर्थ गया। कोरा बुद्धिविलास, कोरी दिमागी कसरत हुई और यही तो हम करते हैं।

धार्मिक और दार्शनिक सिद्धांतों के ऊहापोह, वाद-विवाद, चर्चा परिचर्चा, बहस-मुबाहिसा, खंडन-मंडन, तर्क-वितर्क, व्यंजना-विश्लेषण, समझने-समझाने, सुनने सुनाने, पढ़ने पढ़ाने, लिखने लिखाने और बोलने बतलाने में ही हम अपना सारा जीवन बिता देते हैं और दुर्भाग्य यह है कि इसी में अपने जीवन की सफलता मानते हैं।

अजीब संतोष होता है हमें अपनी धर्म जिज्ञासा पूरी कर लेने में तथा बौद्धिक स्तर पर जाने हुए उस धर्म-ज्ञान को लच्छेदार भाषा में व्यक्त करने की क्षमता प्राप्त कर लेने में। इस आत्म संतुष्टि को ही हमने जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लिया है। सचमुच, कैसा आकर्षक है यह मृगजाल, जिसमें कि हम इतनी आसानी से फंस जाते हैं और फिर इस बंधन को ही आभूषण मान कर गर्व अनुभव करते हैं।

चाख धर्म का स्वाद-

मत कर, मत कर, बावला, मत कर वाद-विवाद।
खाल बाल की बैंच मत, चाख धर्म का स्वाद।।

कितने दिन यूं ही गए, करते बुद्धि-विलास।
धर्म स्वाद चाखा नहीं, बुझी न मन की प्यास।।

चर्चा ही चर्चा करे, धारण करे न कोय।
धर्म बिचारा क्या करे? धारे ही सुख होय।।

यही धर्म का नियम है, यही धर्म की रीत।
धारे ही ही निर्मल बने, पावन बने पुनीत।।

जीवन सारा खो दिया, ग्रंथ पढ़त पढंत।
तोता मैना की तरह, नाम रटंत रटंत।।

मानव जीवन रतन सा, किया व्यर्थ बरबाद।
चर्चा कर ली धर्म की, चाख न पाया स्वाद।।
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श्री गणेशमातृका न्यास

यह न्यास हमारी सभी भौतिक और आध्यात्मिक इच्छाओं को प्राप्त करने और आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में प्रगति करने के लिए, मातृकाओं की शक्तियों के साथ मिलकर भगवान गणेश के विभिन्न पहलुओं को उनकी शक्तियों (शक्तियों) के साथ साकार करने के लिए है। तथा गणेश मातृकान्यास करने से मन्त्र शीघ्र जाग्रत होता है ।

विनियोगः👉 ॐ अस्य श्रीगणेश मातृका न्यास मन्त्रस्य गणक ऋषिः र्निचृद्‌ गायत्रीच्छन्दः शक्तिविनायको देवता सर्वाभीष्ट सिद्ध्यर्थे न्यासे विनियोगः ॥

षडङ्गन्यासः👉

ॐ गां हृदयाय नमः,
ॐ गीं शिरसे स्वाहा,
ॐ गूं शिखायै वषट्,
ॐ गैं कवचाय हुम्,
ॐ गौं नेत्रत्रायाय वौषट्,
ॐ गः अस्त्राय फट् ॥

॥ ध्यान ॥

गुणांकुशवराभीतिपाणिं रक्ताब्ज हस्तया।
प्रिययालिंगितं रक्तं त्रिनेत्रं गणपतिं भजे ॥

अपने हाथों में त्रिशूल, अंकुश, वर और अभय धारण किये हुये, अपनी प्रियतमा द्वारा रक्तवर्ण के कमलों के समान हाथों से आलिंगित, त्रिनेत्र गणपति का मैं ध्यान करता हूँ ॥

गणेश मातृकाएं

ध्यान कर लेने के पश्चात् अपने बीजाक्षरों को पहले लगाकर तदनन्तर ‘विघ्नेश ह्रीं’ आदि में चतुर्थ्यन्त द्विवचन, फिर ‘नमः’लगा कर गणेश मातृका न्यास करना चाहिये ॥

विघ्नेश एवंं ह्रीं,
विघ्नराज एवंं श्री,
विनायक एवं पुष्टि,
शिवोत्तम एवं शान्ति,
विघ्नकृत् एवं स्वस्ति,
विघ्नहर्ता एवं सरस्वती,
गण एवं स्वाहा,
एकदन्त एवं सुमेधा,
द्विदन्त एवं कान्ति,
गजवक्त्र एवं कामिनी,
निरञ्जन एवं मोहिनी,
कपर्दी एवं नटी,
दीर्घजिह्व एवं पार्वती,
शंकुकर्ण एवं ज्वालिनी,
वृषभध्वज एवं नन्दा,
सुरेश एवं गणनायक,
गजेन्द्र एवं कामरूपिणी,
सूर्पकर्ण और उमा,
त्रिलोचन और तेजोवती,
लम्बोदर एवं सत्या,
महानन्द एवं विघ्नेशी,
चतुर्मूर्ति एवं सुरूपिणी,
सदाशिव एवं कामदा,
आमोद एवं मदजिह्वा,
दुर्मुख एवं भूति,
सुमुख एवं भौतिक,
प्रमोद एवं सिता,
एकपाद एवं रमा,
द्विजिह्वा एवं महिषी,
शूर एवं भञ्जिनी,
वीर एवं विकर्णा,
षण्मुख एवं भृकुटी,
वरद एवं लज्जा,
वामदेव एवं दीर्घघोण,
वक्रतुण्ड एवं धनुर्धरा,
द्विरद एवं यामिनी,
सेनानी एवं रात्रि,
कामान्ध एवं ग्रामणी,
मत्त एवं शशिप्रभा,
विमत्त एवं लोललोचन,
मत्तवाहन एवं चंचला,
जटी एवं दीप्ति,
मुण्डी एवं सुभगा,
खङ्गी एवं दुर्भगा,
वरेण्य एवं शिवा,
वृषकेतन एवं भगा,
भक्तप्रिय एवं भगिनी,
गणेश एवं भोगिनी,
मेघनाद एवं सुभगा,
व्यासी एवं कालरात्रि और
गणेश्वर एवं कालिका –

51गणेशमातृकाये हैं यकारादि वर्णो के साथ त्वगात्मभ्यामित्यादि का योग पूर्वोक्त रीति से कर लेना चाहिए॥

न्यास विधि

ॐ अं विघ्नेशह्रींभ्यां नमः ललाटे ।
ॐ आं विघ्नराजश्रीभ्यां नमः मुखवृत्ते ।
ॐ इं विनायकपुष्टिभ्यां नमः दक्षनेत्रे ।
ॐ ई शिवोत्तशान्तिभ्यां नमः वामनेत्रे ।
ॐ उं विघ्नकृत्स्वस्तिभ्यां नमः दक्षकर्णे।
ॐ ऊं विघ्नहर्तृसरस्वतीभ्यां नमः वामकर्णे ।
ॐ ऋं गणस्वाहाभ्या नमः दक्ष नासायाम्।
ॐ ऋं एकदन्तसुमेधाभ्यां नमः वाम नासायाम् ।
ॐ लृं द्विदन्तकान्तिभ्यां नमः दक्षगण्डे ।
ॐ लृं गजवक्त्रकामिनीभ्यां नमः वामगण्डे।
ॐ एं निरञ्जनमोहिनीभ्यां नमः ओष्ठे ।
ॐ ऐं कपर्दीनटीभ्यां नमः अधरे ।
ॐ ओं दीर्घजिह्वपार्वतीभ्यां नमः ऊर्ध्वदन्तपड्‌क्तौ ।
ॐ औं शड्‌कुकर्णज्वालिनीभ्यां नमः अधः दन्तपंक्तौ।
ॐ अं वृषमध्वजनन्दाभ्यां नमः शिरसि ।
ॐ अः सुरेशगणनायकाभ्यां नमः मुखे ।
ॐ कं गजेन्द्रकामरुपिणीभ्यां नमः दक्षबाहूमूले ।
ॐ खं सूर्पकर्णोमाभ्यां नमः दक्षकूर्परे ।
ॐ गं त्रिलोचनतेजोवतीभ्यां नमः दक्षमणिबन्धे।
ॐ घं लम्बोदरसत्याभ्यां नमः दक्षाङ्‌गुलिमूले ।
ॐ ङं महानन्दविघ्नेशीभ्यां नमः दक्षहस्ताड्‌गुल्यग्रे ।
ॐ चं चतुर्मूर्तिसुरुपिणीभ्यां नमः वामबाहूमूले ।
ॐ छं सदाशिवकामदाभ्यां नमः वाककूर्परे ।
ॐ जं आमोदमदजिह्वाभ्यां नमः वाममणिबन्धे ।
ॐ झं दुर्मुखभूतिभ्यां नमः वामबाहु अड्‌गुल्यग्रे ।
ॐ ञं सुमुखभौतिकाभ्यां नमः वामबाहु अड्‌गुल्यग्रे।
ॐ टं प्रमोदसिताभ्यां नमः, दक्षपादमूले।
ॐ ठं एकपादरमाभ्यां नमः दक्षजानौ ।
ॐ डं द्विजिह्वमहिषीभ्यां नमः दक्षगुल्फे।
ॐ ढं शूरभञ्जनीभ्यां नमः दक्षपाड्‌गुलिमूले ।
ॐ णं वीरविकर्णाभ्यां नमः दक्षपादाड्‌गुल्यग्रे ।
ॐ तं षण्मुख भ्रुकुटीभ्यां नमः वामपादमूले ।
ॐ थं वरदलज्जाभ्या नमः वामजानौ ।
ॐ दं वामदेवदीर्घघोणाभ्यां नमः वामगुल्फे ।
ॐ धं वक्रतुण्डधनुर्धराभ्यां नमः वामपदाड्‌गुलिमूले।
ॐ नं द्विरदयामिनीभ्यां नमः वामपादाड्‌गुल्यग्रे ।
ॐ पं सेनानीरात्रिभ्यां नमः दक्षपार्श्वे ।
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ॐ फं कामान्धग्रामणीभ्यां नमः वामपार्श्वे ।
ॐ बं मत्तशशिप्रभाम्यां नमः पृष्ठे ।
ॐ भं विमललोललोचनाभ्यां नमः नाभौ।
ॐ मं मत्तवाहनचञ्ज्चलाभ्यां नमः उदरे।
ॐ यं त्वगात्मभ्याञ्जटीदीप्तिभ्यां नमः हृदि ।
ॐ रं असृगात्मभ्यां मुण्डीसुभगान्यां नमः दक्षांसे।
ॐ लं मांसात्मभ्यां खड्‌गीदुर्भगाभ्यां नमः ककुदि।
ॐ वं मेदात्मभ्यां वरेण्यशिवाभ्यां नमः वामांसे।
ॐ शं अस्थ्यात्मभ्यां वृषकेतनभगाभ्यां नमः हृदयादिदक्षहस्तानाम्।
ॐ षं मज्जात्मभ्यां भक्तप्रियभगिनीभ्यां नमः हृदयादिवामहस्तान्तम् ।
ॐ सं शुक्रात्मभ्यां गणेशभोगिनीभ्यां नमः हृदयादिदक्षपादान्तम्।
ॐ हं प्राणात्मभ्यां मेघनादसुभगाभ्यां नमः हृदयादिवामपादान्तम् ।
ॐ ळं शक्त्यात्मभ्यां व्यासिकालरात्रिभ्यां नमः हृदयादिउदरान्तम् ।
ॐ क्षं क्रोधात्मभ्यां गणेश्वरकालिकाभ्यां नमः हृदयादिमस्तकान्तम् ।
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जो व्यक्ति बाहर से आँखें बन्द करके बैठा है वह ज़रूरी नहीं सो रहा हो, वह ध्यान में भी हो सकता है।
और जो व्यक्ति आँखें खोलकर बैठा है वह ज़रूरी नहीं सच में सब कुछ देख रहा हो, उसका ध्यान कहीं और भी हो सकता है।
यह वाक्य हमें सिखाता है कि बाहरी रूप देखकर ही किसी की स्थिति नहीं समझनी चाहिए।घर में माँ न हो तो वहाँ का वातावरण खाली और सूना लगने लगता है।
ठीक उसी तरह हमारे जीवन में अगर ईश्वर (श्रीजी) की याद, उनकी कृपा और उनका मार्गदर्शन न हो तो जीवन भी सूना और अँधकारमय लगता है।
यह वाक्य बताता है कि जैसे माँ घर को प्रेम और उजाला देती है, वैसे ही श्रीजी हमारे जीवन को अर्थ, उजाला और शांति देते हैं।वृत्त (गोला) की कुछ खास बातें होती हैं:

उसमें कोई किनारा (side) नहीं होता जो टूट सके।

उसका कोई अंत नहीं होता।

उसका कोई कोण नहीं होता जिसे मापा जा सके।

उसकी हर स्पर्शरेखा (tangent) अलग-अलग दिशा देती है और स्पर्शरेखाओं की संख्या अनगिनत होती है।


गणितज्ञ ने कहा –
मेरा श्रीजी के प्रति प्रेम ऐसा ही है।
इसका अर्थ है –
मेरे भगवान के प्रति प्रेम में न कोई टूटन है, न कोई अंत है, न कोई माप है।
और हर अनुभव (जैसे वृत्त की नई स्पर्शरेखा) मेरे प्रेम को नए आयाम और नई खोज देती रहती है।

यानी श्रीजी के प्रति प्रेम अनन्त, अटूट और असीम है।किसी को सच में सुखी करना हो तो उसे ये तीन चीज़ें दीजिए:

1. ध्यान (Attention) – उसे ईश्वर के बारे में बताइए, उसका मन भगवान की ओर लगने दीजिए।


2. स्नेह (Affection) – ईश्वर के प्रति प्रेम का भाव जगाइए।


3. सराहना (Appreciation) – ईश्वर की लीला, उनकी कृपा और उनकी मौजूदगी को महसूस कराइए, उसका महत्व बताइए।



यानी किसी को भगवान की ओर जोड़ना, उसका मन उनके प्रति लगाना ही सबसे बड़ा उपहार है।
क्योंकि भगवान ही सब कुछ हैं, उनके बारे में बताना मतलब सम्पूर्ण सत्य को बताना है। और जो आपको उनसे जोड़ता है, वह हमेशा सही ही होता है; वहाँ गलत की तो बात ही नहीं आती।
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