✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें।
ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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।। आदिपराशक्ति भगवती पार्वती स्तुति ।।

पार्वती शंकरार्धांगी आदिशक्ति महेश्वरी।
सर्वलोकैकधीश्वरी सिंहवाहिनी नमोस्तुते।।

जगन्मात्रे महामाये पराशक्ति गणेश्वरी।
सर्वसिद्धिप्रदा देवी सदाशिवायै नमो नमः।।

नमस्ते शैलपुत्रीश्च नमस्ते वृषवाहिनी।
नमस्ते दुर्गतिशमनी नमस्ते दुर्गनाशिनी।।

सर्वशास्त्रमयीं देवीं अनेकास्त्रशस्त्र धारिणी।
मधुकैटभ हंत्रिश्च चण्डिकायै नमो नमः।।

गौरवर्णा महागौरी सर्वालंकार भूषितां।
अम्बिका सर्वसाक्षिण्यै शिवप्रियायै नमो नमः।।

नित्यायै निर्मलायै च कन्यकायै सुरेश्वरि।
त्रिपुरायै त्रिगुणायै च मोक्षदायै नमो नमः।।

कालिका कौशिकी आर्या भवानी भावमोचिनी।
शांभवी शंकरी बाला पराम्बिकायै नमो नमः।।

प्रतिदिन इस स्तुति के मात्र ७पाठ से आदिशक्ति माँ पार्वती की असीम कृपा प्राप्त होती है। जीवन मे व्याप्त संशय दूर होकर शाश्वत भक्ति की प्राप्ति होती है। बाकी इससे जो जीवन में मिलेगा यह बात हृदय से कभी जिव्हा पर लाने का सामर्थ्य नहीं होगा।
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।।शिव षडक्षरी स्तोत्रम् ।।

"ॐ ॐ"
ॐकारबिंदु संयुक्तं नित्यं ध्यायंति योगिनः।
कामदं मोक्षदं तस्मादोंकाराय नमोनमः।।१।।

"ॐ नं"
नमंति मुनयः सर्वे नमंत्यप्सरसां गणाः।
नराणामादिदेवाय नकाराय नमोनमः।।२।।

"ॐ म"
महातत्वं महादेव प्रियं ज्ञानप्रदं परं।
महापापहरं तस्मान्मकाराय नमोनमः।।३।।

"ॐ शिं"
शिवं शांतं शिवाकारं शिवानुग्रहकारणं।
महापापहरं तस्माच्छिकाराय नमोनमः।।४।।

"ॐ वा"
वाहनं वृषभोयस्य वासुकिः कंठभूषणं।
वामे शक्तिधरं देवं वकाराय नमोनमः।।५।।

"ॐ य"
यकारे संस्थितो देवो यकारं परमं शुभं।
यं नित्यं परमानंदं यकाराय नमोनमः।।६।।

षडक्षरमिदं स्तोत्रं यः पठेच्छिव सन्निधौ।
तस्य मृत्युभयं नास्ति ह्यपमृत्युभयं कुतः।।७।।

शिवशिवेति शिवेति शिवेति वा भवभवेति भवेति भवेति वा।
हरहरेति हरेति हरेति वा भुजमनश्शिवमेव निरंतरम्।।८।।

।। इति श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमच्छंकर भगवत्पादपूज्य कृत शिवषडक्षरी स्तोत्रं संपूर्णम् ।।
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।। श्री लांगूलास्त्र शत्रुन्जय हनुमान स्तोत्र ।।

आवाहन।
ॐ हनुमन्तं महावीरं वायुतुल्य-पराक्रमम्।
मम कार्यार्थमागच्छ प्रणमामि मुहुर्मुहुः।।

विनियोग।
ॐ अस्य श्रीहनुमच्छत्रुञ्जयस्तोत्रमाला मंत्रस्य श्रीरामचन्द्रऋषिः, नानाच्छन्दांसि, श्रीमन्महावीरो हनुमान् देवता, मारुतात्मज इति हसौं बीजम् अञ्जनीसूनुरिति हृफ्रें शक्तिः, ॐ हाहाहा इति कीलकम्, श्रीरामभक्त इति हां प्राणः, श्रीराम- लक्ष्मणानन्दकर इति ह्रां ह्रीं हूं जीवः, ममाऽराति शत्रुञ्जय-स्तोत्र मालामंत्रजपे विनियोगः।

दाहिने हाथ में जल लेकर ॐ अस्य श्री हनुमच्छत्रुञ्जयस्तोत्र-मालामन्त्रस्य से आरम्भ कर, मालामंत्रपजे विनियोगः, तक मंत्र पढ़क जल छोड़ना चाहिए।

करन्यास।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं हूं स्फें फ्रें इस्त्रौं हस् हसौं नमो हनुमते अगुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें कें इस्त्रौं हसौं रामदूताय तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ह्स्त्रौं खफ्रें हस्ख्फ्रें हृसौं
लक्ष्मणप्राणदात्रे मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें हस्त्रौं हस्ख्फ्रें हसौं अञ्जनीसूनवे अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें हस्त्रौं हस्ख्फ्रैं हसौं सीताशोकविनाशनाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ ऐं श्रीं ह्मां ह्मीं हू्ं स्फ्रैं ख्फ्रैं हस्त्रौं हस्ख्फ्रैं हसौं
लंकाप्रासाद भंजनाय करतलकरपृषठाभ्यां नमः।

हृदयादिन्यास।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फैं ह्स्त्रौं हस्ख्फ्रैं
हसौं नमो हनुमते हृदयाय नमः।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें हस्त्रौं हस्ख्फ्रैं
हसौं रामदूताय शिरसे स्वाहा।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें खफ्रें ह्स्त्रौं हस्ख्फ्रैं हसौं लक्ष्मणप्राणदात्रे शिखायै वषट्।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं हूं स्फ्रें ख्फ्रें हस्त्रौं हस्ख्फ्रैं हसौंं अञ्जनीसूनवे कवचाय हुम्।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रैं ह्स्त्रौं हस्ख्फ्रें हसौं सीताशोकविनाशनाय नेत्रत्रयाय वौषट्।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं हस्ख्फ्रें हसौं लङ्काप्रासादभञ्जनाय अस्त्राय फट्।

ध्यानम्।
ध्यायेद् बालदिवाकरद्युतिनिभं देवारिदर्पापहं
देवेन्द्रप्रमुखैः प्रशस्तयशसं देदीप्यमानं रुचा।।

सुग्रीवादिसमस्तवानरयुतं सुव्यक्ततत्त्वप्रियं।
संरक्ताऽरुण-लोचनं पवनजं पीताम्बरालङ्कृतम्।।

मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतांवरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।

वज्राङ्गं पिङ्गकेशाढ्यं स्वर्णकुण्डलमण्डितम्।
नियुद्धमुपसङ्कल्पपारावारपराक्र मम्।।

गदायुक्तं वामहस्तं पाशहस्तं कमण्डलुम्।
उद्यदक्षिणदोर्दण्डं हनुमन्तं विचिन्तयेत्।।

इति ध्यात्वा, 'अरे मल्ल चटख'
इत्युच्चारणेऽथवा 'तोडरमल्ल चटख'
इत्युच्चारणे कपिमुद्रां प्रदर्शयेत्।

हनुमान मालामंत्र।
ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं स्फ्रें ख्फ्रें हस्त्रौं हस्ख्फ्रैं
हसौं नमो हनुमते त्रैलोक्याक्रमण-पराक्रम श्रीराम-भक्त! मम परस्य च सर्वशत्रून् चतुर्वर्णसम्भवान् पुरूष -स्त्री-नपुंसकान् भूत भविष्यद्-वर्तमानान् नानादूरस्थ-समीपस्थान् नाना-नामधेयान् नानासङ्करजातिकान् कलत्र पुत्र-मित्र भृत्य - बन्धु-सुहृत् समेतान् प्रभुशक्ति सहितान् धन-धान्यादि सम्पत्तियुतान् राज्ञो राजपुत्रसेवकान् मन्त्रि।

सचिव-सखीन् आत्यन्तिकक्षणेन त्वरया एतद्-दिनावधि नानोपायैर्मारय मारय शस्त्रैश्छेदय छेदय अग्निना ज्वालय ज्वालय दाहय दाहय अक्षयकुमारवत्पादतला क्रमणेनाऽनेन शिलातले आत्रोटय आत्रोटय घातय घातय वध वध भूतसङ्घैः सह भक्षय भक्षय क्रुद्धचेतसा नखैर्विदारय विदारय देशादस्मादुच्चाटय उच्चाटय पिशाचवत् भ्रंशय भ्रंशय भ्रामय भ्रामय भयातुरान् विसंज्ञान् सद्यः कुरु कुरु भस्मीभूतान उद्धूलय उद्धृलय भक्तजनवत्सल ! सीताशोकापहारक! सर्वत्र माम् एनं च रक्ष रक्ष हाहाहा हुँहुँहुँ घेघेघे हुँफट् स्वाहा।

ॐ नमो भगवते हनुमते महाबलपराक्रमाय महाविपत्ति-निवारकाय भक्तजनमन: कामना- कल्पद्रुमाय दुष्टजन- मनोरथ स्तम्भनाय प्रभञ्जन-प्राणप्रियाय स्वाहा।

ॐ ह्रां ह्रीं हूं हैं ह्रौं ह्रः मम शत्रून् शूलेन छेदय छेदय अग्निना ज्वालय ज्वालय दाहय दाहय उच्चाटय उच्चाटय हूं फट स्वाहा।

।। शत्रुन्जय हनुमान स्तोत्र ।।

श्रीमन्तं हनुमन्त-मार्तरिपुभिद् भूभृत्तरुभ्राजितं।
चाल्पद्- बालधिबन्धवैरिनिचयं चामीकराद्रिप्रभम्।।

अष्टौ रक्त-पिशङ्ग-नेत्र नलिनं भूभङ्गमङ्ग-स्फुरत्।
प्रोद्यच्चण्ड-मयूख मण्डल-मुखं दुःखापहं दुःखिनाम्।।

कौपीनं कटिसूत्र-मौञ्ज्यजिनयुगदेहं विदेहात्मजा।
प्राणाधीश पदारविन्दनिरतं स्वान्तं कृतान्तं द्विषाम्।।

ध्यात्वैवं समराङ्गणस्थितमथानीय स्व-हृत्पङ्कजे।
सम्पूज्या ऽखिल-पूजनोक्त विधिना सम्प्रार्थयेत् प्रार्थितम्।।
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हनुमन्नञ्जनीसूनो! महाबलपराक्रम ! लोलल्लाङ्गूलपातेत ममाऽरातीन् निपातय।
मर्कटाधिप! मार्तण्ड-मण्डल ग्रास कारक! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।।

अक्षयन्नापि पिङ्गाक्ष ! क्षितिशोकक्षयङ्कर ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।
रुद्रावतार ! संसार- -दुःख-भारापहारक! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।।

श्रीराम-चरणाम्भोज-मधुपायत मानस ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।
बालिकोदरद-क्लान्त सुग्रीवोन्मोचनप्रभो।
लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।।

सीता-विरह-वारीश मग्न-सीतेशतारक ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।
रक्षोराज-प्रतापाऽग्नि-दह्यमान- जगद्धन ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।।

ग्रस्ताऽशेष-जगत्-स्वास्थ्य राक्षसाम्भोधिमन्दर ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।
पुच्छ-गुच्छ-स्फुरद्-भूमि-जगद्-दग्धारिपत्तन । लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।।

जगन्मनो दुरुल्लंघ्य - पारावार विलङ्घन ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।
स्मृतमात्र समस्तेष्टपूरक ! प्रणतप्रिय ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।।

रात्रिञ्चर-चमूराशि कर्तनैक-विकर्तन !।
लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।।

जानकी-जानकीज्यानि प्रेमपात्र परन्तप ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।
भीमादिक महावीर-वीरा वेशावतारक ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।।

वैदेही-विरह क्लान्त रामरोषैक-विग्रह ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।
वज्राङ्गनख-दंष्ट्रेश! बज्रिवज्रावगुण्ठन
लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।।

अखर्व गर्व गन्धर्व-पर्वतोद्भेदन-स्वर ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।
लक्ष्मणप्राण- सन्त्राण-त्रातातीक्ष्णकरान्वय! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।।

रामाधिविप्रयोगार्त भरताद्यार्तिनाशन ! लोलल्लाङ्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।।

द्रोणाचल-समुत्क्षेप-समत्क्षिप्तारि-वैभव!
लोलल्लाड्ग्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय
सीताशीर्वाद संपन्न समस्ताऽवयवाक्षत
लोलल्लाड्गूलपातेन ममाऽरातीन् निपातय।

इत्येवमश्वत्थ-तलोपविष्टः शत्रुञ्जयं नाम पठेत् स्तयं यः सशीघ्रमेवास्त समस्त- शत्रुः प्रमोदतेमारुतज-प्रसादात्।

।। इति लांगूलास्त्र- शत्रुञ्जय- हनुमत्स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।
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।। श्रीहरि स्तोत्रम् ।।

जगज्जालपालं चलत्कण्ठमालं
शरच्चन्द्रभालं महादैत्यकालं।
नभोनीलकायं दुरावारमायं
सुपद्मासहायम् भजेऽहं भजेऽहं।।

सदाम्भोधिवासं गलत्पुष्पहासं
जगत्सन्त्रिवासं शतादित्यभासं।
गदाचक्रशस्त्रं लसत्पीतवस्त्रं
हसच्चारुवक्त्रं भजेऽहं भजेऽहं।।

रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारं
जलान्तर्विहारं धराभारहारं।
चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपं
ध्रुतानेकरूपं भजेऽहं भजेऽहं।।

जराजन्महीनं परानन्दपीनं
समाधानलीनं सदैवानवीनं।
जगज्जन्महेतुं सुरानीककेतुं
त्रिलोकैकसेतुं भजेऽहं भजेऽहं।।

कृताम्नायगानं खगाधीशयानं
विमुक्तेर्निदानं हरारातिमानं।
स्वभक्तानुकूलं जगद्द्रुक्षमूलं
निरस्तार्तशूलं भजेऽहं भजेऽहं।।

समस्तामरेशं द्विरेफाभकेशं
जगद्विम्बलेशं हुदाकाशदेशं।
सदा दिव्यदेहं विमुक्ताखिलेहं
सुवैकुण्ठगेहं भजेऽहं भजेऽहं।।

सुरालिबलिष्ठं त्रिलोकीवरिष्ठं
गुरूणां गरिष्ठं स्वरूपैकनिष्ठं।
सदा युद्धधीरं महावीरवीरं
महाम्भोधितीरं भजेऽहं भजेऽहं।।

रमावामभागं तलानग्रनागं
कृताधीनयागं गतारागरागं।
मुनीन्द्रैः सुगीतं सुरैः संपरीतं
गुणौधैरतीतं भजेऽहं भजेऽहं।।

फलश्रुति-
इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तं
पठेदष्टकं कण्ठहारम् मुरारेः।
स विष्णोर्विशोकं ध्रुवं याति लोकं
जराजन्मशोकं पुनर्विन्दते नो।।
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।। धेनुरूपा लक्ष्मीशक्ति ।।

या लक्ष्मीः सर्वभूतानां या च देवेषु संस्थिता।
धेनुरूपेण सा देवी मम शांति प्रयच्छतु।।

देहस्था या च रुद्राणी शंकरस्य सदा प्रिया।
धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु।।

विष्णोर्वक्षसि या लक्ष्मीः स्वाहा या च विभावसोः।
चंद्रार्कश क्रशक्तिर्या धेनुरूपास्तु सा श्रिये।।

चतुर्मुखस्य या लक्ष्मीर्या लक्ष्मीर्धनदस्य च।
लक्ष्मीर्या लोकपालानां सा धेनुर्वरदास्तु मे।।

स्वधा या पितृमुख्यानां स्वाहा यज्ञभुजां च या।
सर्वपापहरा धेनुस्तस्माच्छांतिं प्रयच्छ मे।।

भावार्थ-
जो समस्त प्राणियों की तत्त्वतः वास्तविक लक्ष्मी हैं और जो सभी देवताओं में हविष्य रूप से स्थित हैं, वह धेनुरूपा देवी मुझे सुख-शांति प्रदान करें। भगवान शंकर के आधे अंग में विराजने वाली जो मूल रुद्राणी नाम की प्रियतमा शक्ति हैं, वह गोरूपा देवी मेरे पाप-ताप को दूर करें।

जो भगवान विष्णु के हृदय में विराजने वाली पद्मालया भगवती लक्ष्मी हैं और जो अग्नि के साथ नित्य स्थित रहने वाली स्वाहा नाम की शक्ति है तथा जो चंद्रमा, सूर्य एवं इंद्र की साक्षात इष्ट शक्ति हैं, वह गो रूपा देवी मेरे लिए कल्याणदायिनी लक्ष्मी बनें।

जो चतुर्मुख ब्रह्मा जी की आत्मशक्ति रूपा विद्या की अधिष्ठात्री सरस्वती देवी हैं और जो धनाधीश कुबेर की लक्ष्मी रूपा शक्ति हैं तथा जो समस्त लोक पालों की ऐश्वर्य रूपा लक्ष्मी हैं, वह गोरूपा धेनु मेरे लिए वरदायिनी हो।

जो श्रेष्ठ पितरों की स्वधा नाम की शक्ति हैं और जो यज्ञ भुक देवताओं के लिए स्वाहा नाम की सहायिका शक्ति हैं, वह सब पाप-तापों को नष्ट करने वाली कल्याण स्वरूपा गो मुझे परम शांति प्रदान करे।
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।। सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र ।।

सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र, जिसका पाठ जीवन की सभी बाधाओं और दुखों को दूर करने के लिए किया जाता है, श्री भृगु संहिता से संबंधित है और इसमें गणेश, नवग्रहों तथा विभिन्न देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है। इसका पाठ करने से धन-संपत्ति, बुद्धि, सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है और शत्रु परास्त होते हैं।

* सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र *

ॐ गं गणपतये नम:।

सर्व-विघ्न-विनाशनाय, सर्वारिष्ट निवारणाय,
सर्व-सौख्य-प्रदाय, बालानां बुद्धि-प्रदाय,
नाना-प्रकार-धन-वाहन-भूमि-प्रदाय,
मनोवांछित-फल-प्रदाय रक्षां कुरू कुरू स्वाहा।।

ॐ गुरवे नम:, ॐ श्रीकृष्णाय नम:, ॐ बलभद्राय नम:, ॐ श्रीरामाय नम:, ॐ हनुमते नम:, ॐ शिवाय नम:, ॐ जगन्नाथाय नम:, ॐ बदरीनारायणाय नम:, ॐ श्री दुर्गा-देव्यै नम:।।

ॐ सूर्याय नम:, ॐ चन्द्राय नम:, ॐ भौमाय नम:, ॐ बुधाय नम:, ॐ गुरवे नम:, ॐ भृगवे नम:, ॐ शनिश्चराय नम:, ॐ राहवे नम:, ॐ पुच्छानयकाय नम:, ॐ नव-ग्रह रक्षा कुरू कुरू नम:।।

ॐ मन्येवरं हरिहरादय एव दृष्ट्वा द्रष्टेषु येषु हृदयस्थं त्वयं तोषमेति विविक्षते न भवता भुवि येन नान्य कश्विन्मनो हरति नाथ भवान्तरेऽपि।
ॐ नमो मणिभद्रे। जय-विजय-पराजिते! भद्रे! लभ्यं कुरू कुरू स्वाहा।।

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्-सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि, धियो यो न: प्रचोदयात्।।
सर्व विघ्नं शांन्तं कुरू कुरू स्वाहा।।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीबटुक-भैरवाय आपदुद्धारणाय महान्-श्याम-स्वरूपाय दिर्घारिष्ट-विनाशाय नाना प्रकार भोग प्रदाय मम (यजमानस्य वा) सर्वरिष्टं हन हन, पच पच, हर हर, कच कच, राज-द्वारे जयं कुरू कुरू, व्यवहारे लाभं वृद्धिं वृद्धिं, रणे शत्रुन् विनाशय विनाशय, पूर्णा आयु: कुरू कुरू, स्त्री-प्राप्तिं कुरू कुरू, हुम् फट् स्वाहा।।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:।
ॐ नमो भगवते, विश्व-मूर्तये, नारायणाय, श्रीपुरुषोत्तमाय। रक्ष रक्ष, युग्मदधिकं प्रत्यक्षं परोक्षं वा अजीर्णं पच पच, विश्व-मूर्तिकान् हन हन, ऐकाह्निकं द्वाह्निकं त्राह्निकं चतुरह्निकं ज्वरं नाशय नाशय, चतुरग्नि वातान् अष्टादष-क्षयान् रांगान्, अष्टादश-कुष्ठान् हन हन, सर्व दोषं भंजय-भंजय, तत्-सर्वं नाशय-नाशय, शोषय-शोषय, आकर्षय-आकर्षय, मम शत्रुं मारय-मारय, उच्चाटय-उच्चाटय, विद्वेषय-विद्वेषय, स्तम्भय-स्तम्भय, निवारय-निवारय, विघ्नं हन हन, दह दह, पच पच, मथ मथ, विध्वंसय-विध्वंसय, विद्रावय-विद्रावय, चक्रं गृहीत्वा शीघ्रमागच्छागच्छ, चक्रेण हन हन, पा-विद्यां छेदय-छेदय, चौरासी-चेटकान् विस्फोटान् नाशय-नाशय, वात-शुष्क-दृष्टि-सर्प-सिंह-व्याघ्र-द्विपद-चतुष्पद अपरे बाह्यं ताराभि: भव्यन्तरिक्षं अन्यान्य-व्यापि-केचिद् देश-काल-स्थान सर्वान् हन हन, विद्युन्मेघ-नदी-पर्वत, अष्ट-व्याधि, सर्व-स्थानानि, रात्रि-दिनं, चौरान् वशय-वशय, सर्वोपद्रव-नाशनाय, पर-सैन्यं विदारय-विदारय, पर-चक्रं निवारय-निवारय, दह दह, रक्षां कुरू कुरू, ॐ नमो भगवते, ॐ नमो नारायणाय, हुं फट् स्वाहा।।

ठ: ठ: ॐ ह्रीं ह्रीं। ॐ ह्रीं क्लीं भुवनेश्वर्या: श्रीं ॐ भैरवाय नम:। हरि ॐ उच्छिष्ट-देव्यै नम:। डाकिनी-सुमुखी-देव्यै, महा-पिशाचिनी ॐ ऐं ठ: ठ:। ॐ चक्रिण्या अहं रक्षां कुरू कुरू, सर्व-व्याधि-हरणी-देव्यै नमो नम:।
सर्व प्रकार बाधा शमनमरिष्ट निवारणं कुरू कुरू फट्। श्रीं ॐ कुब्जिका देव्यै ह्रीं ठ: स्वाहा।।
शीघ्रमरिष्ट निवारणं कुरू कुरू शाम्बरी क्रीं ठ: स्वाहा।।

शारिका भेदा महामाया पूर्णं आयु: कुरू।
हेमवती मूलं रक्षा कुरू।
चामुण्डायै देव्यै शीघ्रं विध्नं सर्वं वायु कफ पित्त रक्षां कुरू।
मंत्र तंत्र यंत्र कवच ग्रह पीड़ा नडतर, पूर्व जन्म दोष नडतर, यस्य जन्म दोष नडतर, मातृदोष नडतर, पितृ दोष नडतर, मारण मोहन उच्चाटन वशीकरण स्तम्भन उन्मूलनं भूत प्रेत पिशाच जात जादू टोना शमनं कुरू।
सन्ति सरस्वत्यै कण्ठिका देव्यै गल विस्फोटकायै विक्षिप्त शमनं महान् ज्वर क्षयं कुरू स्वाहा।।

सर्व सामग्री भोगं सप्त दिवसं देहि देहि, रक्षां कुरू क्षण क्षण अरिष्ट निवारणं, दिवस प्रति दिवस दु:ख हरणं मंगल करणं कार्य सिद्धिं कुरू कुरू।
हरि ॐ श्रीरामचन्द्राय नम:। हरि ॐ भूर्भुव: स्व: चन्द्र तारा नव ग्रह शेषनाग पृथ्वी देव्यै आकाशस्य सर्वारिष्ट निवारणं कुरू कुरू स्वाहा।।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं बटुक भैरवाय आपदुद्धारणाय सर्व विघ्न निवारणाय मम रक्षां कुरू कुरू स्वाहा।।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीवासुदेवाय नम:, बटुक भैरवाय आपदुद्धारणाय मम रक्षां कुरू कुरू स्वाहा।।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीविष्णु भगवान् मम अपराध क्षमा कुरू कुरू, सर्व विघ्नं विनाशय, मम कामना पूर्णं कुरू कुरू स्वाहा।।
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ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीबटुक भैरवाय आपदुद्धारणाय सर्व विघ्न निवारणाय मम रक्षां कुरू कुरू स्वाहा।।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं ॐ श्रीदुर्गा देवी रूद्राणी सहिता, रूद्र देवता काल भैरव सह, बटुक भैरवाय, हनुमान सह मकर ध्वजाय, आपदुद्धारणाय मम सर्व दोषक्षमाय कुरू कुरू सकल विघ्न विनाशाय मम शुभ मांगलिक कार्य सिद्धिं कुरू कुरू स्वाहा।।

एष विद्या माहात्म्यं च, पुरा मया प्रोक्तं ध्रुवं।
शम क्रतो तु हन्त्येतान्, सर्वाश्च बलि दानवा:।।

य पुमान् पठते नित्यं, एतत् स्तोत्रं नित्यात्मना।
तस्य सर्वान् हि सन्ति, यत्र दृष्टि गतं विषं।।

अन्य दृष्टि विषं चैव, न देयं संक्रमे ध्रुवम्।
संग्रामे धारयेत्यम्बे, उत्पाता च विसंशय:।।

सौभाग्यं जायते तस्य, परमं नात्र संशय:।
द्रुतं सद्यं जयस्तस्य, विघ्नस्तस्य न जायते।।

किमत्र बहुनोक्तेन, सर्व सौभाग्य सम्पदा।
लभते नात्र सन्देहो, नान्यथा वचनं भवेत्।।

ग्रहीतो यदि वा यत्नं, बालानां विविधैरपि।
शीतं समुष्णतां याति, उष्ण: शीत मयो भवेत्।।

नान्यथा श्रुतये विद्या, पठति कथितं मया।
भोज पत्रे लिखेद् यंत्रं, गोरोचन मयेन च।।

इमां विद्यां शिरो बध्वा, सर्व रक्षा करोतु मे।
पुरुषस्याथवा नारी, हस्ते बध्वा विचक्षण:।।

विद्रवन्ति प्रणश्यन्ति, धर्मस्तिष्ठति नित्यश:।
सर्वशत्रुरधो यान्ति, शीघ्रं ते च पलायनम्।।

।। श्री परमात्मने नमः ।।
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यह शरीर भी हमारा नहीं है और जो इस शरीरमें एवं इन्द्रियोंमें जो भी जिस प्रकार की भी शक्ति होती है, वह भी हमारी नहीं होती है; क्योंकि ये शरीरादि और इसमें जो भी शक्ति होती है, वह आने-जाने वाली ही होती है।
इस शरीरको और इस शरीरकी शक्ति को रोक कर रखने की सामर्थ्य हम सभी प्राणियों में होती ही नहीं है। लेकिन फिर भी अविवेकी लोग इस शरीरको अपना और इस शरीरकी शक्ति को अपनी शक्ति ही मानते हैं -
इसी मान्यता से ही अविवेकी लोगों के लिये यह माया बड़ी दुस्तर हो जाती है और ऐसे अविवेकी लोग इस संसार सागर से नहीं तर सकते हैं अर्थात् चौरासी लाख योनियों के ही चक्करमें पड़े रहते हैं।
इस शरीरादिको अपना मानना और इस शरीरकी शक्तिको अपनी शक्ति मानना ही प्राणिसमुदाय का परमात्माकी मायासे मोहित होना है। इसीलिये ही भगवान् भी कहते हैं -
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्।।
गुणोंके कार्यरूप सात्त्विक, राजस और तामस - इन तीनों प्रकारके भावोंसे यह सारा संसार - प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिये इन तीनों गुणोंसे परे मुझ अविनाशीको नहीं जानता।।१३।।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।
क्योंकि यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है; परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरन्तर भजते हैं, वे इस मायाको उल्लङ्घन कर जाते हैं अर्थात् संसारसे तर जाते हैं।।१४।।
अब यह जानना भी आवश्यक हो जाता है कि भगवान् अर्थात् परमात्माकी माया क्या है?
प्रकृति को ही स्वभाव कहते हैं और इसी प्रकृति को ही माया भी कहते हैं, भगवान् इसी अपने स्वभाव अर्थात् अपनी प्रकृतिका ही वर्णन करते हुए कहते हैं -
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी - इस प्रकार यह आठ प्रकारसे विभाजित मेरी प्रकृति है। यह आठ प्रकारके भेदोंवाली तो अपरा अर्थात् मेरी जड़ प्रकृति है और हे महाबाहो! इससे दूसरीको, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता है, मेरी जीवरूपा परा अर्थात् चेतन प्रकृति जान।।४-५।।
इस प्रकारसे सब कुछ वासुदेव ही है 'वासुदेवः सर्वम्' ऐसा हजारों-करोड़ों मनुष्योंमें कोई एक ही बिरला मनुष्य ही जानता है -
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।।
हजारों मनुष्योंमें कोई एक मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले योगियोंमें भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्त्वसे अर्थात् यथार्थरूपसे जानता है।।३।। (गीता अ० ७)
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।। परमात्मा और जीवात्मा ।।

जीवात्मा सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा का अंश है। जैसे घटाकाश, महाकाश, शरावाकाश के भीतर, बाहर, मध्य में महाकाश, कटक, मुकुट, कुण्डल आदि के भीतर, बाहर, मध्य में जल विद्यमान है, वैसे ही चेतन, अमल, सहज सुखराशि जीवात्माओं के भीतर, बाहर, मध्य में सच्चिदानन्द परमात्मा विद्यमान है।

इस दृष्टि से जीवात्मा भगवान का पुत्र, अंश एवं स्वरूप है। जैसे शूकर-कूकर के बच्चे शूकर-कूकर होते हैं, सिंह के बच्चे सिंह होते हैं वैसे ही ‘अमृतस्य पुत्राः’, ‘मर्मवांशो जीवलोके’ इत्यादि श्रुतिस्मृति के अनुसार भगवान के पुत्र या अंश जीवात्मा भगवान का स्वरूप ही ठहरता है।

जैसे निर्मल जल पृथ्वी पर पड़ते ही मलिन हो जाता है, वैसे ही शुद्ध चिदात्मा माया के संसर्ग से मलिन हो जाता है। भगवान जीवों के परम अन्तरंग और घनिष्ठ सम्बन्धी हैं। संसार की सब वस्तुओं का वियोग अनिवार्य है।

कलत्र, पुत्र, मित्र, क्षेत्र सभी वस्तुओं के साथ जीवात्मा का सम्बन्ध गौण ही है। मुख्य सम्बन्ध तो भगवान ही का है। जीवात्मा स्वर्ग, नरक जहाँ भी जाय भगवान ही उसके साथ होते हैं, और सभी लोग सम्बन्ध तोड़ लेते हैं। अघासुर के मुख में ग्वालबाल प्रविष्ट हो गये, उसके विष से उन्हें जलते हुए देखकर प्रभु श्रीकृष्ण भी प्रविष्ट हो गये। संसार में किसी की प्रीति या शक्ति ऐसी है जो एक साँप के मुख में पड़े पुत्र या मित्र के साथ स्वयं भी जाय?

किसी स्त्री का पुत्र कूप में गिरता है, वह कूप के तट पर खड़ी होकर चिल्लाती है- “दौड़ो, दौड़ो, बच्चे को निकालो” पर कूप में उतरने की हिम्मत उसकी नहीं होती। फिर साँप के मुख में कौन प्रविष्ट होने के तैयार रहेगा?

गाढ़ से गाढ़, विषम से विषम स्थानों में जीवात्मा का साथी भगवान ही है। माँ के पेट में, विभिन्न योनियों में, नरक में, किंबहुना जहाँ भी जीवात्मा को जाना होता है, भगवान वहीं जाते हैं। जैसे महाकाश घटाकाश का, जल तरंग का संग नहीं छोड़ सकता वैसे ही भगवान् संग नहीं छोड़ते।

जब जीवात्मा अपने असली सम्बन्धी भगवान को भूलकर नकली सम्बन्धियों के मायाजाल में फँस जाता है, तभी माया उसे दुःख महोदधि में डालकर उसके मस्तिष्क को ठिकाने लाने का प्रयत्न करती है।

जब प्राणी यहाँ तक उन्मादी बन बैठता है कि ईश्वर और धर्म को अनावश्यक समझने लगता है। भगवान के ही बनाये दिल-दिमाग से अपनी वैज्ञानिक चमत्कृतियों पर मुग्ध होकर कहता है कि “वैज्ञानिक दृष्टि से पार्थिवादि प्रपंचों या प्रकृति से ही सम्पूर्ण काम सिद्ध हो जाते हैं; ईश्वर और धर्म तो केवल झगड़े की जड़ है या भीरु प्राणियों के मन का एक वहम है” तब कहीं व्यापक भूकम्पों द्वारा, कहीं महामारियों द्वारा, कहीं प्राकृतिक विकट तूफानों या विश्वव्यापी नरसंहारों द्वारा प्रणियों को परमात्मा का स्मरण दिलाया जाता है।

फिर भी जैसे कल्याणमयी, करुणामयी, पुत्रवत्सला, अम्बा अपने शिशुओं का कभी भी अहित नहीं चाहती, वैसे ही प्रभु भी कभी भी प्राणियों का अहित नहीं चाहते। तभी तो वे निरीश्वरवादी प्राणियों का भी कल्याण चाहते हैं। उन पर भी कुपित नहीं होते।

इसी आशा पर तो ब्रह्मा ने कहा था-

हे नाथ! यद्यपि मैंने आपकी कौतुकपूर्ण क्रीड़ा में विघ्न डाला, आपके बछड़ों और ग्वालबालों का हरण करके बड़ा ही अपराध किया, तथापि प्रभो, जैसे बछड़ों और ग्वालबालों का हरण करके बड़ा ही अपराध किया, तथापि प्रभो, जैसे अम्बा गर्भगत शिशु के पैर चलाने को अपराध नहीं मानती, वैसे ही आप भी हमारे ऐसे कर्मों पर ध्यान न दें।

प्रभो, सम्पूर्ण विश्व ही आपके उदर में है फिर गर्भगत शिशु के समान ही प्राणियों के अपराधों को क्षमा करना क्या उचित नहीं है?

उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयोः
किं कल्पते मातुरधोक्षजागसे।
किमस्तिनास्ति व्यपदेशभूषितं
तवास्ति कुक्षेः कियदप्यनन्तः।।"

प्रभु ने क्षमा भी कर दिया। उन्होंने सरल से सरल उपाय शास्त्रों द्वारा बता रखा है। पत्र, पुष्प, फल, जल, नमस्कार ही से प्रभु प्रसन्न हो सकते हैं। कुछ भी न हो तो केवल मन से ही पूजन, स्मरण और वह भी न बने तो भाव, कुभाव जिस किसी तरह भगवान के नाम जप से ही परम गति प्राप्त हो सकती है।

जब एक अदृष्ट की जो, कि वस्तुतः सबका द्रष्टा या असली स्वरूप है और विश्वास होगा तब सम्पूर्ण दुनिया के सम्बन्ध, नाते अपने आप फीके लगने लगेंगे। संसार के कलत्र, मित्र, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, क्षेत्र, वित्त आदि सभी वस्तुओं का सम्बन्ध केवल स्थूल देह के साथ ही है। उसके नष्ट होते ही वे सब सम्बन्ध अपने-आप ही छूट जाते हैं।

‘यदद्य पच्यते ह्यन्नं सायं तच्च विनश्यति।’ जो भात आज प्रातःकाल पकाया जाता है सायंकाल तक सड़ जाता है। उसमें दुर्गन्ध आने लगता है। फिर, ऐसे विनश्वर, क्षणभंगुर शरीर का आत्मा के साथ कहाँ तक सम्बन्ध रह सकता है?
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एक जन्म की बात कौन कहे, जन्म-जन्मान्तरों, युग-युगान्तरों, कल्प-कल्पान्तरों के देहों एवं तत्सम्बन्धी पुत्र, पौत्र, कलत्रों का स्मरण करें तो चित्त की क्या दशा होगी?

कति नाम सुता न लालिता
कति वा नेह वधूरभुंजिहि।
क्वनु ते क्वनु ताश्च वा वयं
भवसंग खलु पान्थसंगमः।।

जन्म-जन्मातरों में कितने पुत्रों का लालन नहीं किया, कितनी सुन्दरी रमणियों का संस्पर्श नहीं किया, परन्तु आज कहाँ वे पुत्रादि, कहाँ वे रमणियाँ, कहाँ हम सब? यह संसार का संगम केवल यात्रियों के संग के समान अस्थिर है।

स्थिर सम्बन्ध तो एकमात्र भगवान का ही है, जो कि स्वर्ग, नरक, कहीं भी जीव का संग नहीं छोड़ते। जीवात्मा और परमात्मा दोनों ही एक शोभन पंखवाले सुपर्ण पक्षी हैं, दोनों सुपर्ण एक जाति के पक्षी हैं, इसलिये भी उन दोनों का आपस में मुख्य सम्बन्ध है। साथ ही दोनों की परस्पर पूर्ण मैत्री है। परमात्मा पालकसखा है, जीवात्मा बालक-सखा है। दोनों ही की ‘चेतन अमल सहज-सुख-राशिरूप’ से ख्याति भी है। कहीं साजात्य सख्य होने पर भी दुर्दैवयोग से भिन्न देश में रहने के कारण सम्बन्ध कमज़ोर जो जाता है। परन्तु यहाँ तो एक ही शरीररूप’ वृक्ष पर जीवात्मा-परमात्मा दोनों ही पक्षी रहते हैं। अतः साजात्य, सख्य, सादेश्य तीनों तरह के सम्बन्ध दृढ़ है।

यद्यपि भगवान जड़वर्ग से सर्वदा असंस्पृष्ट और निर्लेप ही रहते हैं तथापि चिद्रूप जीवात्मा के साथ तो भगवान का तादात्म्य या अभेद सम्बन्ध रहता है। अतः साजात्य, सख्य, सादेश्य के समान ही सायुज्य भी सर्वदा ही रहता है। जैसे कभी घटाकाश महाकाश से वियुक्त नहीं होता, तरंग जल से पृथक नहीं होते, वैसे ही जीवात्मा कभी भी भगवान से विमुख नहीं होता। इस तरह अपने असली सम्बन्धी भगवान को भूल जाने से ही प्राणी अनेकानर्थ परिप्लुत भवाटवी ही में भटकता है और दुःख पाता है। जब कभी भी सावधान होकर वह भगवान की ओर दृष्टि करता है, प्रभु उस पर पूर्ण कृपा करके अपना लेते हैं।
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प्रेम , श्रद्धा , करुणा -- यह तीनों के बिना मनुष्य परेशान रहता है । किन्तु हर किसी को पता नहीं होता कि वह इन तीन के अभाव से व्यथित हैं ।

जीवन में अथाह व्यथा ही क्यों न हो ! प्रातः काल उठकर गौ माता के पास शान्त-चित्त होकर केवल बैठ जाना चाहिए । आप कुछ खिलाओ या नहीं , उनपर प्रेम से हाथ फेरों या नहीं , यह कोई मायने नहीं रखता । क्योंकि यह तो आपके श्रद्धा से अधिक मानवता पर निर्भर करता है ।

बस आप उन्हें देखो । उनका दर्शन करो । उन्हें देखने से ही आपके हृदय के किसी कोने में सोया हुआ जो सुषुप्त प्रेम है , वह अपने आप जाग उठेगा जैसे प्रातः कालीन सूर्य-रश्मियों का दर्शन करते ही सरोवरों के कमल खिल जाते हैं । जिस प्रकार कमलों के खिलते ही उनके पराग से वातावरण सुगन्धित हो जाता है , ठीक उसी प्रकार हृदय का प्रेम जागृत होते ही वहां श्रद्धा की धारा स्वतः बहने लगती है ।

प्रेम और श्रद्धा भी अधूरे और अनाथ हैं , यदि उनके ऊपर किसी की करुणा न हो । तब आप गौ माता के नेत्रों में देखना । सारे विश्व की ममता , सारे ब्रह्माण्ड की करुणा उनके नेत्रों में उतर आया होगा । गौमाता के नेत्रों में करुणा को देखते ही प्रेम और श्रद्धा सनाथ हो उठेंगें ।

श्रद्धा, प्रेम और करुणा का जीवन में आते ही जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण बदल जायेगा । सकारात्मकता और ऊर्जा के श्रोत हैं यह तीनों । दुनिया के सारे व्यथाओं की औषधि है !
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सुबह की शुरूवात जैसी होती है बाकि दिन भी उसी अनुसार बीतता है ऐसे में जरूरी है कि सुबह को बेहतर बनाया जाया .. शास्त्रों में सुबह के समय उठते ही कुछ विशेष कार्य करने की सलाह ही दी गई है। मान्यता है कि अगर सुबह उठकर जमीन पर पैर रखने से पहले आप ये कार्य कर लें तो आपका पूरा दिन बन जाएगा और हर काम-काज में सफलता मिलेगी ।आज हम आपको इसी के बारे में बताने जा रहे हैं ताकि आप भी उसका अनुसरण कर जीवन में सफलता और सुख-समृद्धी पा सकें।

प्राचीन शास्त्र भले ही आज से कई वर्षों पहले लिखे गए हों पर उनमें कही गई बातें आज भी हमारे लिए उतनी ही उपयोगी हैं.. जो कि हमे आदर्श जीवन जीन की सीख देते हैं और व्यक्ति को हर कार्य करने की उचित विधि बतलाते हैं। ऐसे में अगर हम शास्त्रों में बताए उन नियमों और आदर्शों का पालन करें तो हमारा जीवन बेहतर और सफल हो सकता है। विशेषकर अगर हम अपने दिन की शुरूवात शास्त्रों के नियमानुसार करें तो हम हमेशा सुखी रह सकते हैं। तो चलिए जानते हैं सुबह के लिए शास्त्रों में क्या नियम और आदर्श बताए गए हैं।
दरअसल शास्त्रों के अनुसार सुबह उठकर बिस्तर से जमीन पर अपने पैर रखने से पहले व्यक्ति को धरती को प्रणाम करने की बात कही गई । क्योकि शास्त्रों में भूमि को भी देवी मां माना गया है और ऐसे में जब हम धरती पर पैर रखते हैं तो उससे हमें दोष लगता है। इसलिए हमें इस दोष को दूर करने के लिए धरती को प्रणाम कर उनसे क्षमा मांगनी चाहिए और जब हम इस तरह धरती का सम्मान करते हैं तो धरती मां की कृपा हमारे घर-परिवार पर बरसती है और हमारे जीवन की मुसीबतें कम होती हैं।कराग्रे वसते लक्ष्मी:, करमध्ये सरस्वती।
कर मूले तु गोविन्द:, प्रभाते करदर्शनम॥ १॥

भावार्थ
हाथ के अग्र भाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती तथा मूल में गोविन्द (परमात्मा ) का वास होता है। प्रातः काल में (पुरुषार्थ के प्रतीक) हाथों का दर्शन करें॥१॥

समुद्रवसने देवि ! पर्वतस्तनमंड्ले।
विष्णुपत्नि! नमस्तुभ्यं पाद्स्पर्श्म क्षमस्वे॥ २॥

भावार्थ
समुद्ररूपी वस्त्रोवाली, पर्वतरूपी स्तनवाली और विष्णु भगवान की पत्नी हे पृथ्वी देवी ! तुम्हे नमस्कार करता हूँ ! तुम्हे मेरे पैरों का स्पर्श होता है इसलिए क्षमायाचना करता हूँ॥ २॥

ब्रह्मा मुरारीस्त्रिपुरांतकारी
भानु: शाशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्र: शनि-राहु-केतवः
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम॥ ३॥

भावार्थ
ब्रह्मा, मुरारि (विष्णु) और त्रिपुर-नाशक शिव (अर्थात तीनों देवता) तथा सूर्य, चन्द्रमा, भूमिपुत्र (मंगल), बुध, बृहस्पति, शुक्र्र, शनि, राहु और केतु ये नवग्रह, सभी मेरे प्रभात को शुभ एवं मंगलमय करें।

सनत्कुमार: सनक: सन्दन:
सनात्नोप्याsसुरिपिंलग्लौ च।
सप्त स्वरा: सप्त रसातलनि
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम॥ ४॥

भावार्थ

(ब्रह्मा के मानसपुत्र बाल ऋषि) सनतकुमार, सनक, सनन्दन और सनातन तथा (सांख्य-दर्शन के प्रर्वतक कपिल मुनि के शिष्य) आसुरि एवं छन्दों का ज्ञान कराने वाले मुनि पिंगल मेरे इस प्रभात को मंगलमय करें। साथ ही (नाद-ब्रह्म के विवर्तरूप षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद) ये सातों स्वर और (हमारी पृथ्वी से नीचे स्थित) सातों रसातल (अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल, और पाताल) मेरे लिए सुप्रभात करें।

सप्तार्णवा: सप्त कुलाचलाश्च
सप्तर्षयो द्वीपवनानि सप्त
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम॥ ५॥

भावार्थ
सप्त समुद्र (अर्थात भूमण्डल के लवणाब्धि, इक्षुसागर, सुरार्णव, आज्यसागर, दधिसमुद्र, क्षीरसागर और स्वादुजल रूपी सातों सलिल-तत्व) सप्त पर्वत (महेन्द्र, मलय, सह्याद्रि, शुक्तिमान्, ऋक्षवान, विन्ध्य और पारियात्र), सप्त ऋषि (कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ, और विश्वामित्र), सातों द्वीप (जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौच, शाक, और पुष्कर), सातों वन (दण्डकारण्य, खण्डकारण्य, चम्पकारण्य, वेदारण्य, नैमिषारण्य, ब्रह्मारण्य और धर्मारण्य), भूलोक आदि सातों भूवन (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, और सत्य) सभी मेरे प्रभात को मंगलमय करें।

पृथ्वी सगंधा सरसास्तापथाप:
स्पर्शी च वायु ज्वर्लनम च तेज: नभ: सशब्दम महता सहैव
कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम॥ ६॥

भावार्थ
अपने गुणरूपी गंध से युक्त पृथ्वी, रस से युक्त जल, स्पर्श से युक्त वायु, ज्वलनशील तेज, तथा शब्द रूपी गुण से युक्त आकाश महत् तत्व बुद्धि के साथ मेरे प्रभात को मंगलमय करें अर्थात पांचों बुद्धि-तत्व कल्याण हों।

प्रातः स्मरणमेतद यो
विदित्वाssदरत: पठेत।
स सम्यग धर्मनिष्ठ: स्यात्
संस्मृताsअखंड भारत:॥७॥

भावार्थ
इन श्लोको का प्रातः स्मरण भली प्रकार से ज्ञान करके आदरपूर्वक पढ़ना चाहिए। ठीक-ठीक धर्म में निष्ठा रखकर अखण्ड भारत का स्मरण करना चाहिए।
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आपको बता दें इस शास्त्रीय मान्यता के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथ्य भी हैं.. जैसे कि उठते ही जमीन में पैर रखने से सेहत पर बुरा असर पड़ता है.. इसलिए जागने के साथ ही सीधे अपने पैर जमीन में नहीं रखना चाहिए.. इसकी वजह ये है कि जब हम सुबह के समय उठते हैं तो हमारे शरीर का तापमान और कमरे के तापमान में बहुत अंतर होता है। ऐसे में अगर हम उठते ही अपने गर्म पैर ठंडी जमीन पर रख देंगे तो इससे सेहत को नुकसान हो सकता है और सर्दी-जुकाम जैसी समस्या हो सकती है। इसीलिए सुबह उठने के बाद तुरंत बिस्तर से उतरने की बजाए कुछ देर बर बिस्तर पर ही बैठने की सलाह दी जाती है जिससे कि आपके शरीर का तापमान सामान्य हो सके और फिर जमीन पर पैर रखें ।

इसके साथ ही शास्त्रों में पूरे दिन को बेहतर बनाने के लिए सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठने की सलाह दी गई। ब्रह्म मुहूर्त सूर्योदय से ठीक पहले का समय होता है और अगर आपके लिए ये संभव ना हो तो अधिक से अधिक 6 से 7 बजे तक जरूर उठ जाना चाहिए। ऐसा करने से धर्म लाभ के साथ ही स्वास्थ्य लाभ मिलता है।धर्म लाभ की बात करें तो देवी-देवता इस काल में विचरण कर रहे होते हैं और इस समय सत्व गुणों की प्रधानता रहती है.. इसीलिए प्रमुख मंदिरों के द्वार भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल जाते हैं और भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाते है। इसलिए अगर आप इस उठकर स्नान ध्यान कर लेत हैं तो आप इस समय दिव्य वातावरण का लाभ उठा पाते हैं।
वहीं अगर स्वास्थ्य लाभ की बात करें तो ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। विज्ञान भी कहता है कि ब्रह्म मुहुर्त में वायुमंडल प्रदूषणरहित होता है और इसी वक्त वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा सबसे अधिक होती है, जो कि फेफड़ों की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती है।साथ ही ऐसी शुद्ध वायु से मन, मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है। इसीलिए शास्त्रों में ब्रह्म मुहूर्त में बहने वाली वायु को अमृततुल्य माना गया है और कहा गया है कि ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है।
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मंदिर और घर के शिवलिंग में अंतर

*भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए लोग शिवलिंग की पूजा करते है। क्योंकि शिवलिंग महादेव का एक प्रतीक है। शिवलिंग को लोग मंदिर में भी स्थापित करते हैं और घर में भी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मंदिर और घर के शिवलिंग में क्या अंतर होता है। वास्तु और ज्योतिष शास्त्र में दोनों जगह शिवलिंग रखने के नियम व महत्व भी अलग-अलग होते हैं।

*मुख्य अंतर*

मंदिर और घर के शिवलिंग में मुख्य अंतर यह है कि मंदिर में शिवलिंग को बड़े और विशाल रूप में स्थापित किया जाता है। यहां नियमित रूप से पूजा-पाठ और आरती होती है। जबकि घर में एक छोटा शिवलिंग स्थापित होता है। उसकी देखभाल और पूजा के लिए कुछ नियमों का पालन करना होता है।

*घर में शिवलिंग रखने के नियम*

ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक घर में एक निश्चित आकार का शिवलिंग स्थापित करना चाहिए। घर में रखने से पहले इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि शिवलिंग अंगूठे के आकार का होना चाहिए। घर में कभी भी टूटा हुआ शिवलिंग नहीं रखना चाहिए। घर में शिवलिंग की स्थापना ऐसे करें कि उसका मुख ईशान कोण की तरफ हो। वास्तु के मुताबिक घर में एक से ज्यादा शिवलिंग नहीं रखना चाहिए। घर में सोने, चांदी, पीतल, मिट्टी, एल्युमिनियम धातु के शिवलिंग रखना शुभ माना जाता है।
*घर में शिवलिंग रखने का महत्व*

शिवलिंग का घर में होना अत्यंत शुभ माना जाता है। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और खुशहाली आती है। यह घर में शांति बनाए रखने और परिवार के सदस्यों के बीच आपसी ताल-मेल बनाए रखने में मदद करता है।

*मंदिर में शिवलिंग का महत्व*

वहीं, मंदिर में शिवलिंग का विशेष महत्व होता है। क्योंकि भगवान शिव निराकार हैं और यह शिवलिंग उनके इसी निराकार, अनंत और असीमित स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का वास है। ऐसे में मंदिर में शिवलिंग की पूजा करने से सभी देवी-देवताओं को आसानी से प्रसन्न किया जा सकता है। मंदिर में शिवलिंग की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है, साथ ही अध्यात्मिक शांति मिलती है जिससे सोचने-समझने की क्षमता में बढ़ोतरी होती है।
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श्री और समृद्धि देता है एकाक्षी नारियल (श्रीफल)

हमारी सनातन पूजा पद्धति में श्रीफल अर्थात् नारियल का विशेष महत्व है। हिन्दू धर्म की कोई भी पूजा बिना श्रीफल अर्पण के पूर्ण नहीं होती। चाहे वह प्रसाद रूप में हो या भेंट के रूप में, श्रीफल का हमारी पूजा पद्धति में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि सभी नारियल श्रीफल नहीं होते केवल एकाक्षी नारियल ही श्रीफल होता है।

'श्री' अर्थात् लक्ष्मी, 'एकाक्षी नारियल' को साक्षात् लक्ष्मी का रूप माना गया है। यह अत्यन्त दुर्लभ होता है। सैंकड़ों-हजारों नारियलों में कोई एक श्रीफल होता है। एकाक्षी नारियल अर्थात् श्रीफल जिसके भी पास होता है उस पर सदैव लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। उसे जीवन में कभी आर्थिक संकटों का सामना नहीं करना पड़ता। एकाक्षी नारियल को तोड़ना अशुभ होता है।

सामान्य नारियल की आकृति में तीन छिद्र दिखाई देते हैं जिन्हें प्रचलित भाषा में दो आंखें व एक मुख कहा जाता है। ध्यान से देखने पर आपको नारियल में तीन खड़ी रेखाएं भी दिखाई देती हैं किन्तु एकाक्षी नारियल अर्थात् श्रीफल में केवल दो छिद्र होते हैं। जिन्हें एक मुख व एक आँख कहा जाता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है एकाक्षी अर्थात् एक आँख वाला।

एकाक्षी नारियल में तीन के स्थान पर केवल दो रेखाएं ही होती हैं। एकाक्षी नारियल प्राप्त होने पर विशेष मुहूर्तों जैसे दीपावली, होली, रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य, ग्रहण काल आदि पर षोडषोपचार पूजा कर उसे लाल रेशमी वस्त्र में बांधकर अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान या तिजोरी में रखने या पूजा स्थान में रखने से सदैव लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। एकाक्षी नारियल में धन आकर्षण की अद्भुत क्षमता होती है।

कैसे करें एकाक्षी नारियल की पूजा
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विधि - स्नान आदि करके साफ़ वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर दिशा की और मुँह कर लाल उनी आसन पर बैठ जाय अपने सामने लकड़ी की चौकी पर सवा मीटर लाल वस्त्र बिछाये ! अब बाजोट पर बिछे वस्त्र के मध्य में सवा किलो गेंहू की ढेरी बनाये ! एकाक्षी नारियल को गंगाजल से शुद्ध कर दे और सिंदूर को गाय के घी में मिला कर लेप बना ले और इस लेप को नारियल में अछी तरह लेपित कर दे , बाद में चारो तरफ चाँदी का वर्क लगा दे ! अब इस नारियल को गेंहू की ढ़ेरी के ऊपर स्थान दे ! अब सर्व प्रथम आचमन - पवित्रीकरण आदि क्रिया के बाद दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करे कि .... मैं....... पुत्र श्री ...........गोत्र .....का साधक आज 2076 परिधावी नामक संवत्सर के माघ माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि दिन गुरूवार (दिन जो भी हो) को पुष्य नक्षत्र में, मैं अपनी आर्थिक उन्नति - वयपार उन्नति धन -धान्य यश -पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति के उद्देश से अपने निवास स्थान में चिरकाल तक एकाक्षी नारियल की स्थापना कर रहा हु , आपसे यह प्रार्थना करता हु कि आप मेरे यहाँ विराजे और अपनी सम्पूर्ण कृपा प्रदान करे !
संकल्प करने के बाद हाथ में लिया जल भूमि पर छोड़ दे , तत्पश्चात गणेश - गौरी का पूजन कर गुरु पूजन आदि संपन्न कर ले ! अब नारियल के समक्ष 11 गोमती चक्र , 11 सफ़ेद कौड़ी , 5 काली कौड़ी , 3 पीली हल्दी की गाठ रखे ! नारियल एवं समस्त सामग्री पर आम पल्लव से गंगाजल से स्नान कराये , सभी पर रोली - हल्दी - चन्दन का तिलक करे , अक्षत ,लाल पुष्प अर्पित करे , तीव्र सुगन्ध वाली धुप लगाये .. घी का दीपक प्रज्वलित कर हाथ धोले और दूध से बनी मिठायी का भोग लगा कर एक पान पत्ते पर 2 लौंग - 2 इलायची और एक सुपारी रख कर अर्पित करे नारियल के समक्ष सामर्थ्यानुसार रूपए दक्षिणा के रूप में अर्पित करे ! अब पुनः अपनी प्रार्थना बोल कर स्फटिक माला या कमलगट्टे की माला से निम्न मंत्र का 5 माला जप करे !

मंत्र - ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं एकाक्षीश्रीफलं भगवते विश्वरूपाय सर्वेश्वराय त्रैलोक्यनाथाय सर्वकार्य सिद्धिप्रदायके नमः

मंत्र जप पूर्ण होने के बाद कपूर द्वारा आरती करे और पूजा में हुई त्रुटियो की क्षमा प्रार्थना कर अपने आसन के नीचे जल डाल कर अपने मस्तक एवं नेत्रो में लगा कर पूजा से उठ जाय ! अब जब तक दीपक जलता रहे , तब तक सब कुछ ऐसे ही रहने दें ! दीपक ठंडा हो जाने के बाद एकाक्षी नारियल को श्रद्धापूर्वक घर के पूजास्थल में लाल वस्त्र के आसन पर स्थान दें ! कौड़ियो , गोमती चक्र और हल्दी की गाठ को एक अन्य लाल वस्त्र में रख कर पोटली का रूप दें और धन रखने के स्थान पर रख दें ! प्रसाद को परिवार के सदस्यो में वितरित कर दें ! दीपक को अलग कर के बाजोट के ऊपर रखीं समस्त सामग्री बिछे हुए लाल वस्त्र सहित उठा कर एक पोटली बना ले ! बाद में कुछ नगद दक्षिणा के साथ किसी ब्राह्मण या हिजड़े को दान कर दें !
ऐसा करने के उपरांत एकाक्षी नारियल अन्य कार्यो हेतु सिद्ध एवं प्रभावशाली माना जाता है ! इसलिए अब यह आपके लिए कार्यसिद्ध हेतु शुभप्रदाता हो जाएगा और ऐसे सिद्ध नारियल पर आप कोइ अन्य प्रयोग भी करना चाहे तो कर सकते है यह नारियल आप को पूर्ण लाभ प्रदान करेगा !
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श्री शनि वंदना स्तुति

*नम: कृष्णाय नीलाय शितिकंठनिभाय च।*
*नम: कालाग्रिरूपाय कृतान्ताय च वै नम:॥*

*नमो निर्मासदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।*
*नमो: विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते॥*

*नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णे च वै पुन:।*
*नमो दीर्घाय शुष्काय कालदष्ट्रं नमोस्तुते॥*

*नमस्ते कोटरक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नम:।*
*नमो घोराय रौद्राय भीषणाय करालिने॥*

*नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोस्तुते।*
*सूर्यपुत्र नमस्तेस्तु भास्करेअभयदाय च॥*

*अधोदृष्टे नमस्तेस्तु संवर्तक नमोस्तुते।*
*नमो मंदगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोस्तुते॥*

*ज्ञान चक्षुर्नमस्तेस्तु कश्पात्मजसूनवे।*
*तुष्टो ददासि वै राज्यं रूष्टो हरिस तत्क्षणात्‌॥*

जय श्री शनिदेव
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पंचमुखी हनुमान

भगवान हनुमान का एक शक्तिशाली और दिव्य रूप है। इस रूप में, हनुमान जी के पाँच मुख हैं, जो पाँच अलग-अलग दिशाओं में देखते हैं और पाँच विभिन्न देवताओं या शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह रूप अत्यधिक शुभ और विघ्ननाशक माना जाता है।

पाँच मुख और उनका महत्व
पंचमुखी हनुमान के प्रत्येक मुख का एक विशेष अर्थ, शक्ति और दिशा होती है:
| मुख का नाम | प्रतिनिधित्व/शक्ति | दिशा | रंग |
|---|---|---|---|
| वानर मुख (हनुमान) | शक्ति, साहस, भक्ति | पूर्व (East) | लाल |
| गरुड़ मुख | भय और जादू-टोना का नाश, दुर्भाग्य का निवारण | पश्चिम (West) | सफ़ेद/हल्का पीला |
| वराह मुख | समृद्धि, धन, पृथ्वी पर सुरक्षा | उत्तर (North) | नीला/काला |
| नृसिंह मुख | भय का नाश, अंतिम शक्ति, शत्रुओं पर विजय | दक्षिण (South) | गहरा लाल/केसरिया |
| हयग्रीव मुख | ज्ञान, बुद्धि, विद्या का संचार | आकाश/ऊपर (Upward) | सफ़ेद/पीला |

उत्पत्ति की कथा
पंचमुखी हनुमान के इस रूप को धारण करने के पीछे एक प्रसिद्ध कथा है, जो रामायण से जुड़ी हुई है:
* अहिरावण का वध: लंका युद्ध के दौरान, पाताल लोक के राजा अहिरावण (रावण का भाई) ने छल से राम और लक्ष्मण का अपहरण कर लिया और उन्हें पाताल लोक ले गया।
* पाँच दीपकों की शर्त: जब हनुमान जी उन्हें बचाने पाताल लोक पहुँचे, तो अहिरावण ने बताया कि उसके वध के लिए एक साथ पाँच अलग-अलग दिशाओं में जल रहे दीपकों को बुझाना होगा।
* रूप धारण: इस शर्त को पूरा करने के लिए, हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण किया। पाँच मुखों से उन्होंने एक ही समय में पाँचों दीपकों को बुझाया, अहिरावण का वध किया, और राम-लक्ष्मण को मुक्त कराया।
पूजा और लाभ
पंचमुखी हनुमान की पूजा करने से भक्तों को कई लाभ मिलते हैं:
* विघ्नों का नाश: यह रूप सभी प्रकार की बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है।
* सुरक्षा: यह पूजा करने वाले को सभी दिशाओं से सुरक्षा प्रदान करता है।
* शत्रु पर विजय: नृसिंह मुख की शक्ति के कारण यह शत्रुओं और विरोधियों पर विजय दिलाने में सहायक है।
* ज्ञान और समृद्धि: हयग्रीव और वराह मुख के कारण ज्ञान, बुद्धि और भौतिक समृद्धि प्राप्त होती है।
यह रूप समग्र शक्ति, सुरक्षा और भक्ति का प्रतीक है।
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शकुन-अपशकुन शास्त्र

शकुन-अपशकुन की मान्यता क्यों?


प्राचीन काल से ही भारत में शकुन द्वारा शुभाशुभ विचार करके यात्रा या किसी नवीन कार्य के आरम्भ करने की परंपरा रही है। प्रकृति से प्राप्त संकेत ही शकुन का आधार हैं। अच्छी या बुरी किसी भी महत्वपूर्ण घटना से पूर्व प्रकृति में कुछ विकार उत्पन्न होता है। हमारे ऋषि मुनियों ने इन प्राकृतिक विकारों का अपने अनुभव के आधार पर शुभाशुभ वर्गों में वर्गीकरण किया वास्तव में शकुन स्वयं न तो शुभ हैं न अशुभ , ये केवल इष्ट अथवा अनिष्ट के सूचक मात्र हैं। किसी महत्वपूर्ण कार्य को आरम्भ करते समय या उसके लिए यात्रा पर जाते समय शकुन पर विचार किया जाता है। शुभ शकुन होने पर कार्यसिद्धि तथा अशुभ शकुन होने पर कार्य की हानि का संकेत मिलता है। प्राचीन राजा –महाराजा भी अपने दरबार में विद्वान शकुनी को महत्वपूर्ण स्थान देते थे तथा प्रत्येक कार्य से पूर्व उसका परामर्श लेते थे।

पुराणों में शकुन विचार

वेदों, स्मृतियों, पुराणादि धर्मशास्त्रों एवं फलित ज्योतिष शास्त्रों तथा धर्मसिन्धु में शुभ-अशुभ शकुनों के विषय में विस्तार से जानकारी दी गई है। शकुन हेतु तुलसीकृत 'रामाज्ञा-प्रश्न' एवं 'रामशलाका' भी प्रसिद्ध हैं। शकुन के संबंध में प्रसिद्ध ग्रंथ वसंतराज शाकुन का कथन है-'शुभाशुभज्ञानविनिर्णयाय हेतुर्नृणां यः शकुन अर्थात् जिन चिह्नों को देखने से 'शुभ-अशुभ' का ज्ञान हो-वह शकुन है। जिस चिह्न संकेत निमित्त द्वारा शुभ जानकारी मिले, वह शुभ शकुन और अशुभ जानकारी मिले, उसे अपशकुन कहते हैं।

भगवान् राम की बारात चढ़ने के समय शकुन होने से मंगल हुआ, ऐसा रामायण में उल्लेख मिलता है।

बनई न वरनत वनी बराता।
होइ सगुन सुन्दर शुभदाता।।
चारा चाषु वाम दिसि लेइ ।
मनहु सकल मंगल कहि देइ।।
दाहिन काग सुखेत सुहावा ।
नकुल दरसु सब काहू पावा ॥
सानुकूल बह त्रिबिध बयारी ।
सघट सबाल आव बर नारी ॥
लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा ।
सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा ॥ मृगमाला फिरि दाहिनि आई ।
मंगल गन जनु दीन्हि देखाई ॥
छेमकरी कह छेम बिसेषी ।
स्यामा बाम सुतरु पर देखी ॥
सनमुख आयउ दधि अरु मीना।
कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना ॥

-रामचरितमानसाबालकांड 302/24

अग्नि पुराण के अनुसार शकुन दो प्रकार के होते हैं।

1.दीप्त शकुन
2.शांत शकुन

दीप्त शकुन

काल की सूक्ष्म गति को जानने वाले ऋषि मुनियों ने दीप्त शकुन का फल अशुभ व कार्य नाशक कहा है। दीप्त शकुन के छह भेद कहे गए हैं।

1👉 वेला दीप्त शकुन👉 शकुन का विचार करते समय दिन में विचरने वाले प्राणी रात्री को तथा रात्रिचर प्राणी दिन में शकुन कारक हों तो वेलादीप्त शकुन कहा जाता है। शकुनकालीन लग्न या नक्षत्र पाप ग्रह से पीड़ित हो तो भी वेला दीप्त शकुन होता है।

2👉 दिग्दीप्त शकुन👉 सूर्य जिस दिशा में स्थित हो उसे ज्वलिता ,जिस दिशा से आये हों उसे धूमिता तथा जिस दिशा में जाने वाले हों उसे अन्गारिणी कहते हैं। ये तीनों दिशाएँ दीप्त कही गयी हैं। दीप्त दिशा में होने वाले शकुन को दिग्दीप्त कहा गया है जिसका फल अशुभ व कार्य नाशक होता है।

3👉 देश दीप्त शकुन👉 जंगली पशु-पक्षी का गाँव व शहर में तथा शहर के पालतू पशु-पक्षियों का जंगल में दिखना देश दीप्त शकुन है। शकुन यदि अशुभ स्थान पर दिखाई दे तो भी देश दीप्त शकुन होता है जिस का फल अशुभ कहा गया है।

4👉 क्रिया दीप्तशकुन👉 कोई पुरुष,स्त्री या पशु पक्षी अपने स्वभाव के विरुद्ध आचरण करता हुआ दिखाई दे तो क्रिया दीप्त शकुन कहलाता है।

5👉 रुतदीप्त शकुन👉 फटी हुई ,कर्कश एवम रोने की आवाज का सुनाई देना रुतदीप्त शकुन कहलाता है।

6👉 जाति दीप्त शकुन👉 मांसाहारी प्राणियों का दर्शन जाति दीप्त शकुन कहलाता है जिसका फल कार्य की असफलता का सूचक है।

शांत शकुन

उपरोक्त सभी दीप्त शकुनों से विपरीत शकुनों वाले सभी शकुन शांत शकुन होते हैं जिनका दर्शन या श्रवण कार्य में सफलता का संकेत देता है। दीप्त व शांत दोनों ही शकुन दिखाई दें तो कठिनता से कार्य सिद्धि समझनी चाहिए।

आगे हम शकुन अपशकुनो के विषय मे विस्तृत रूप से बता रहे है।

छींक संबंधित शकुन अपशकुन

1- यदि घर से निकलते समय कोई सामने से छींकता है तो कार्य में बाधा आती है।
अगर एक से अधिक बार छींकता है तो कार्य सरलता से संपन्न हो जाता है।

2- किसी मेहमान के जाते समय कोई उसके बाईं ओर छींकता है तो यह अशुभ संकेत है।

3- कोई वस्तु क्रय करते समय यदि छींक आ जाए तो खरीदी गई वस्तु से लाभ होता है।

4- सोने से पूर्व और जागने के तुरंत बाद छींक की ध्वनि सुनना अशुभ माना जाता है।

5- नए मकान में प्रवेश करते समय यदि छींक सुनाई दे तो प्रवेश स्थगित कर देना ही उचित होता है।

6- व्यावसायिक कार्य आरंभ करने से पूर्व छींक आना व्यापार वृद्धि का सूचक होती है।

7- कोई मरीज यदि दवा ले रहा हो और छींक आ जाए तो वह शीघ्र ही ठीक हो जाता है।
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