*अद्या देवा उदिता सूर्यस्य*
*निरंहस: पिपृता निरवद्यात्।*
*तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति:*
*सिन्धु: पृथिवी उत द्यौ:।।*
( ऋग्वेद)
*हे देवों! आज सूर्योदय के समय हमें पाप,निन्द्यकर्म और अपकीर्ति के गति से निकालकर हमारी रक्षा करो। मित्र, वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और द्यौ - ये सभी देव हमारी इस प्रार्थना का सम्मान कर इसे पूर्ण करें, हमारी उन्नति और अभिवृद्धि साधित करें।'*
* जय श्री सूर्य देव *
*निरंहस: पिपृता निरवद्यात्।*
*तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति:*
*सिन्धु: पृथिवी उत द्यौ:।।*
( ऋग्वेद)
*हे देवों! आज सूर्योदय के समय हमें पाप,निन्द्यकर्म और अपकीर्ति के गति से निकालकर हमारी रक्षा करो। मित्र, वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और द्यौ - ये सभी देव हमारी इस प्रार्थना का सम्मान कर इसे पूर्ण करें, हमारी उन्नति और अभिवृद्धि साधित करें।'*
* जय श्री सूर्य देव *
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*°°"जले रक्षतु वाराह,स्थले रक्षतु वामनः,अट्वंय्या नारसिंह्च्,सर्वत पातु केशवः,।।*
*यह मंत्र शास्त्रों में सोने जाने के पूर्व जप करने के लिए एक प्रभावी मंत्र बतलाया गया है, यह एक रक्षा मंत्र है, जिसका अर्थ है कि: -हे श्री हरि अपने अलग-अलग रुपों में इस ब्रह्मांड में मेरी रक्षा करें। पाताल में वाराह देव रक्षा करें। पृथ्वी पर वामन रुप में रहते हुए रक्षा करें। आकाश मे नरसिंह रक्षा करें। और श्री केशव सभी दिशाओं से रक्षा करें।।*
*श्री हरि.स्मंरण..!!*
*श्री कृष्णाय वासूदेवाय,हरये श्री परमात्मनैं,प्रणत् क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमों नंमः,।।*
*यह मंत्र शास्त्रों में सोने जाने के पूर्व जप करने के लिए एक प्रभावी मंत्र बतलाया गया है, यह एक रक्षा मंत्र है, जिसका अर्थ है कि: -हे श्री हरि अपने अलग-अलग रुपों में इस ब्रह्मांड में मेरी रक्षा करें। पाताल में वाराह देव रक्षा करें। पृथ्वी पर वामन रुप में रहते हुए रक्षा करें। आकाश मे नरसिंह रक्षा करें। और श्री केशव सभी दिशाओं से रक्षा करें।।*
*श्री हरि.स्मंरण..!!*
*श्री कृष्णाय वासूदेवाय,हरये श्री परमात्मनैं,प्रणत् क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमों नंमः,।।*
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🚩🔱‼ॐ नमः पार्वती पतये हर हर महादेव हर ‼🔱🚩
शिव जी जटाओं में गंगाजी को धारण करने वाले, सिर पर चंद्रमा को सजाने वाले,मस्तक पर त्रिपुंड तथा तीसरे नेत्र वाले ,कंठ में कालपाश [नागराज] तथा रुद्राक्षमाला से सुशोभित , हाथ में डमरू और त्रिशूल है जिनके और भक्तगण बड़ी श्रद्दा से जिन्हें शिवशंकर, शंकर, भोलेनाथ, महादेव, भगवान् आशुतोष, उमापति, गौरीशंकर,सोमेश्वर, महाकाल, ओंकारेश्वर, वैद्यनाथ, नीलकंठ, त्रिपुरारि, सदाशिव तथा अन्य सहस्त्रों नामों से संबोधित कर उनकी पूजा-अर्चना किया करते हैं —– ऐसे भगवान् शिव एवं शिवा हम सबके चिंतन को सदा-सदैव सकारात्मक बनाये।
शिव जी जटाओं में गंगाजी को धारण करने वाले, सिर पर चंद्रमा को सजाने वाले,मस्तक पर त्रिपुंड तथा तीसरे नेत्र वाले ,कंठ में कालपाश [नागराज] तथा रुद्राक्षमाला से सुशोभित , हाथ में डमरू और त्रिशूल है जिनके और भक्तगण बड़ी श्रद्दा से जिन्हें शिवशंकर, शंकर, भोलेनाथ, महादेव, भगवान् आशुतोष, उमापति, गौरीशंकर,सोमेश्वर, महाकाल, ओंकारेश्वर, वैद्यनाथ, नीलकंठ, त्रिपुरारि, सदाशिव तथा अन्य सहस्त्रों नामों से संबोधित कर उनकी पूजा-अर्चना किया करते हैं —– ऐसे भगवान् शिव एवं शिवा हम सबके चिंतन को सदा-सदैव सकारात्मक बनाये।
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साथ ही नंदी को पुरुषार्थ का भी प्रतीक माना गया है, कड़ी मेहनत करने के बाद भी बैल कभी थकता नहीं, वह लगातार अपने कर्म करते रहता है, इसका अर्थ है कि हमें भी सदैव अपना कर्म करते रहना चाहिये, कर्म करते रहने के कारण जिस तरह नंदी शिवजी को प्रिय है, उसी प्रकार हम भी भगवान् शंकरजी की कृपा पा सकते हैं, भगवान् शिवजी का एक नाम भालचंद्र भी प्रसिद्ध है, भालचंद्र का अर्थ है मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाला।
चंद्रमा का स्वभाव शीतल होता है, चंद्रमा की किरणें भी शीतलता प्रदान करती हैं, जीवन मंत्र के दृष्टिकोण से देखा जाये तो भगवान् शिवजी कहते हैं कि जीवन में कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न आ जाये, दिमाग हमेशा शान्त ही रखना चाहिये, यदि दिमाग शान्त रहेगा तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल भी निकल आयेगा, ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है, मन की प्रवृत्ति बहुत चंचल होती है।
भगवान् शिवजी का चंद्रमा को धारण करने का अर्थ है कि मन को सदैव अपने काबू में रखना चाहिये, मन भटकेगा तो लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पायेगी, जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह अपने जीवन में कठिन से कठिन लक्ष्य भी आसानी से पा लेता है, धर्म ग्रंथों के अनुसार, सभी देवताओं की दो आंखें हैं, लेकिन एकमात्र शिवजी ही ऐसे देवता हैं जिनकी तीन आंखें हैं, तीन आंखों के कारण भगवान् शिवजी को त्रिनेत्रधारी भी कहते हैं।
जीवन मंत्र की दृष्टि से देखा जाये तो शिवजी का तीसरा नेत्र प्रतीकात्मक है, आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में आने वाली मुसीबतों से सावधान करना, जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं, जिन्हें हम समझ नहीं पाते, ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराते हैं, यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है, यहीं हमारा तीसरा नेत्र है, बस जरूरत है उसे जगाने की।
हमारे धर्म शास्त्रों में जहां सभी देवी-देवताओं को वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है, वहीं भगवान् शंकरजी को सिर्फ मृग चर्म लपेटे और भस्म लगाये बताया गया है, भस्म शिवजी का प्रमुख वस्त्र भी है, क्योंकि शिवजी का पूरा शरीर ही भस्म से ढंका रहता है, शिवजी का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक कारण भी हैं, भस्म की एक विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है।
इसका मुख्य गुण है कि इसको शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती, भस्म त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम करती है, भस्मी धारण करने वाले शिवजी यह संदेश भी देते हैं, कि परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना ही मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है, भगवान् शिवजी को भांग-धतूरा मुख्य रूप से चढ़ाया जाता है, ऐसा माना जाता है कि भगवान् को भांग-धतूरा चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं।
भांग व धतूरा नशीले पदार्थ हैं, आमजन इनका सेवन नशे के लिये करते हैं, जीवन मंत्र के अनुसार, भगवान शिव को भांग-धतूरा चढ़ाने का अर्थ है अपनी बुराइयों को भगवान को समर्पित करना, यानी अगर आप किसी प्रकार का नशा करते हैं तो इसे भगवान् को अर्पित करे दें, और भविष्य में कभी भी नशीले पदार्थों का सेवन न करने का संकल्प लें, ऐसा करने से भगवान् की कृपा आप पर बनी रहेगी और जीवन सुखमय होगा।
शिवपुराण और सभी ग्रंथों में भगवान् शिवजी को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व बताया गया है, तीन पत्तों वाला बिल्व पत्र ही शिवजी के पूजन में उपयुक्त माना गया है, यह भी ध्यान रखना चाहिये कि बिल्वपत्र के तीनों पत्ते कहीं से कटे-फटे न हो, जीवन मंत्र के दृष्टिकोण से देखा जाये तो बिल्व पत्र के ये तीन पत्ते चार पुरुषार्थों में से तीन का प्रतीक हैं- धर्म, अर्थ व काम।
जब आप ये तीनों निस्वार्थ भाव से भगवान् शिवजी को समर्पित कर देते हैं तो चौथा पुरुषार्थ यानी मोक्ष अपने आप ही प्राप्त हो जाता है, शिवपुराण के अनुसार, भगवान् शिवजी कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं, पर्वतों पर आम लोग नहीं आते-जाते, सिद्ध पुरुष ही वहां तक पहुंच पाते हैं, भगवान् शिवजी भी कैलाश पर्वत पर योग में लीन रहते हैं।
जीवन मंत्र की दृष्टि से देखा जाए तो पर्वत प्रतीक है एकान्त व ऊँचाई का, यदि आप किसी प्रकार की सिद्धि पाना चाहते हैं, तो इसके लिये आपको एकांत स्थान पर ही साधना करनी चाहिये, ऐसे स्थान पर साधना करने से आपका मन भटकेगा नहीं और साधना की उच्च अवस्था तक पहुंच जाओगे, भगवान् शिवजी के नाम का स्मरण और पूजा से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है, तथा इस जीवन में बड़े-बड़े उत्कृष्ट भोगों का उपभोग करके अन्त में शिवलोक को प्राप्त कर लेता है।
चंद्रमा का स्वभाव शीतल होता है, चंद्रमा की किरणें भी शीतलता प्रदान करती हैं, जीवन मंत्र के दृष्टिकोण से देखा जाये तो भगवान् शिवजी कहते हैं कि जीवन में कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न आ जाये, दिमाग हमेशा शान्त ही रखना चाहिये, यदि दिमाग शान्त रहेगा तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल भी निकल आयेगा, ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है, मन की प्रवृत्ति बहुत चंचल होती है।
भगवान् शिवजी का चंद्रमा को धारण करने का अर्थ है कि मन को सदैव अपने काबू में रखना चाहिये, मन भटकेगा तो लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पायेगी, जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह अपने जीवन में कठिन से कठिन लक्ष्य भी आसानी से पा लेता है, धर्म ग्रंथों के अनुसार, सभी देवताओं की दो आंखें हैं, लेकिन एकमात्र शिवजी ही ऐसे देवता हैं जिनकी तीन आंखें हैं, तीन आंखों के कारण भगवान् शिवजी को त्रिनेत्रधारी भी कहते हैं।
जीवन मंत्र की दृष्टि से देखा जाये तो शिवजी का तीसरा नेत्र प्रतीकात्मक है, आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में आने वाली मुसीबतों से सावधान करना, जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं, जिन्हें हम समझ नहीं पाते, ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराते हैं, यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है, यहीं हमारा तीसरा नेत्र है, बस जरूरत है उसे जगाने की।
हमारे धर्म शास्त्रों में जहां सभी देवी-देवताओं को वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है, वहीं भगवान् शंकरजी को सिर्फ मृग चर्म लपेटे और भस्म लगाये बताया गया है, भस्म शिवजी का प्रमुख वस्त्र भी है, क्योंकि शिवजी का पूरा शरीर ही भस्म से ढंका रहता है, शिवजी का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक कारण भी हैं, भस्म की एक विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है।
इसका मुख्य गुण है कि इसको शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती, भस्म त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम करती है, भस्मी धारण करने वाले शिवजी यह संदेश भी देते हैं, कि परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना ही मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है, भगवान् शिवजी को भांग-धतूरा मुख्य रूप से चढ़ाया जाता है, ऐसा माना जाता है कि भगवान् को भांग-धतूरा चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं।
भांग व धतूरा नशीले पदार्थ हैं, आमजन इनका सेवन नशे के लिये करते हैं, जीवन मंत्र के अनुसार, भगवान शिव को भांग-धतूरा चढ़ाने का अर्थ है अपनी बुराइयों को भगवान को समर्पित करना, यानी अगर आप किसी प्रकार का नशा करते हैं तो इसे भगवान् को अर्पित करे दें, और भविष्य में कभी भी नशीले पदार्थों का सेवन न करने का संकल्प लें, ऐसा करने से भगवान् की कृपा आप पर बनी रहेगी और जीवन सुखमय होगा।
शिवपुराण और सभी ग्रंथों में भगवान् शिवजी को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व बताया गया है, तीन पत्तों वाला बिल्व पत्र ही शिवजी के पूजन में उपयुक्त माना गया है, यह भी ध्यान रखना चाहिये कि बिल्वपत्र के तीनों पत्ते कहीं से कटे-फटे न हो, जीवन मंत्र के दृष्टिकोण से देखा जाये तो बिल्व पत्र के ये तीन पत्ते चार पुरुषार्थों में से तीन का प्रतीक हैं- धर्म, अर्थ व काम।
जब आप ये तीनों निस्वार्थ भाव से भगवान् शिवजी को समर्पित कर देते हैं तो चौथा पुरुषार्थ यानी मोक्ष अपने आप ही प्राप्त हो जाता है, शिवपुराण के अनुसार, भगवान् शिवजी कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं, पर्वतों पर आम लोग नहीं आते-जाते, सिद्ध पुरुष ही वहां तक पहुंच पाते हैं, भगवान् शिवजी भी कैलाश पर्वत पर योग में लीन रहते हैं।
जीवन मंत्र की दृष्टि से देखा जाए तो पर्वत प्रतीक है एकान्त व ऊँचाई का, यदि आप किसी प्रकार की सिद्धि पाना चाहते हैं, तो इसके लिये आपको एकांत स्थान पर ही साधना करनी चाहिये, ऐसे स्थान पर साधना करने से आपका मन भटकेगा नहीं और साधना की उच्च अवस्था तक पहुंच जाओगे, भगवान् शिवजी के नाम का स्मरण और पूजा से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है, तथा इस जीवन में बड़े-बड़े उत्कृष्ट भोगों का उपभोग करके अन्त में शिवलोक को प्राप्त कर लेता है।
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भगवान शिव
भगवान् शिवजी पंचदेवों में प्रधान, अनादि सिद्ध परमेश्वर, एवम् निगमागम सभी शास्त्रों में महिमामण्डित महादेव हैं, वेदों ने अव्यक्त, अजन्मा, सबका कारण, विश्वपंच का स्रष्टा, पालक एवम् संहारक कहकर उनका गुणगान किया है, श्रुतियों ने सदा शिवजी को स्वयम्भू, शान्त, प्रपंचातीत, परात्पर, परमतत्त्व, ईश्वरों के भी परम महेश्वर कहकर स्तुति की है, शिव का अर्थ ही है- "कल्याणस्वरूप" और "कल्याणप्रदाता" भगवान् शिवजी देवों के भी देव हैं।
भगवान् शिवजी वैसे तो परिवार के देवता कहे गयें है, लेकिन फिर भी श्मशान में निवास करते हैं, भगवान् शिवजी के सांसारिक होते हुए भी श्मशान में निवास करने के पीछे जीवन मंत्र का एक गूढ़ सूत्र छिपा है, संसार मोह-माया का प्रतीक है जबकि श्मशान वैराग्य का, भगवान् शिवजी कहते हैं कि संसार में रहते हुये अपने कर्तव्य पूरे करो, लेकिन मोह-माया से दूर रहो।
क्योंकि ये संसार तो नश्वर है, एक न एक दिन ये सबकुछ नष्ट होने वाला है, इसलिये संसार में रहते हुए भी किसी से मोह मत रखो और अपने कर्तव्य पूरे करते हुए वैरागी की तरह आचरण करो, शिवजी को संहार का देवता कहा गया है, अर्थात जब मनुष्य अपनी सभी मर्यादाओं को तोड़ने लगता है तब शिवजी उसका संहार कर देते हैं, जिन्हें अपने पाप कर्मों का फल भोगना बचा रहता है वे ही प्रेतयोनि को प्राप्त होते हैं।
चूंकि शिवजी संहार के देवता हैं, इसलिये इनको दंड भी वे ही देते हैं, इसलिये शिवजी को भूत-प्रेतों का देवता भी कहा जाता है, दरअसल यह जो भूत-प्रेत है वह कुछ और नहीं बल्कि सूक्ष्म शरीर का प्रतीक है, भगवान् शिवजी का यह संदेश है कि हर तरह के जीव जिससे सब घृणा करते हैं या भय करते हैं, वे भी शिवजी के समीप पहुंच सकते हैं, केवल शर्त है कि वे अपना सर्वस्व भगवान् शिवजी को समर्पित कर दें।
भगवान् शिवजी जितने रहस्यमयी हैं, उनके वस्त्र व आभूषण भी उतने ही विचित्र हैं, सांसारिक लोग जिनसे दूर भागते हैं, भगवान् शिवजी उसे ही अपने साथ रखते हैं, भगवान शिवजी एकमात्र ऐसे देवता हैं जो गले में नाग धारण करते हैं, देखा जाए तो नाग बहुत ही खतरनाक प्राणी है, लेकिन वह बिना कारण किसी को नहीं काटता, नाग पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण जीव है, जाने-अंजाने में ये मनुष्यों की सहायता ही करता है।
कुछ लोग डर कर या अपने निजी स्वार्थ के लिए नागों को मार देते हैं, जीवन मंत्र के दृष्टिकोण से देखा जाये तो भगवान् शिवजी नाग को गले में धारण कर ये संदेश देते हैं, कि जीवन चक्र में हर प्राणी का अपना विशेष योगदान है, इसलिये बिना वजह किसी प्राणी की हत्या न करें, त्रिशूल भगवान् शिवजी का प्रमुख अस्त्र है, यदि त्रिशूल का प्रतीक चित्र देखें तो उसमें तीन नुकीले सिरे दिखते हैं, यूं तो यह अस्त्र संहार का प्रतीक है पर वास्तव में यह बहुत ही गूढ़ बात बताता है।
संसार में तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं- सत, रज और तम, सत मतलब सात्विक, रज मतलब सांसारिक और तम मतलब तामसी अर्थात निशाचरी प्रवृति, हर मनुष्य में ये तीनों प्रवृत्तियां पायीं जाती हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी मात्रा में अंतर होता है, त्रिशूल के तीन नुकीले सिरे इन तीनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, त्रिशूल के माध्यम से भगवान शिव यह संदेश देते हैं कि इन गुणों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण हो, यह त्रिशूल तभी उठाया जाये जब कोई मुश्किल आये, तभी इन तीन गुणों का आवश्यकता अनुसार उपयोग हो।
देवताओं और दानवों द्वारा किये गयें समुद्र मंथन से निकला विष भगवान् शंकरजी ने अपने कंठ में धारण किया था, विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुयें, समुद्र मंथन का अर्थ है? अपने मन को मथना, विचारों का मंथन करना, मन में असंख्य विचार और भावनाएं होती हैं, उन्हें मथ कर निकालना और अच्छे विचारों को अपनाना, हम जब अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही निकलेंगे।
यही विष हैं, विष बुराइयों का प्रतीक है, शिवजी ने उसे अपने कंठ में धारण किया, उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया, शिव का विष पीना हमें यह संदेश देता है कि हमें बुराइयों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिये, बुराइयों का हर कदम पर सामना करना चाहिये, शिवजी द्वारा विष पीना यह भी सीख देता है कि यदि कोई बुराई पैदा हो रही हो तो हम उसे दूसरों तक नहीं पहुंचने दें।
भगवान् शंकरजी का वाहन नंदी यानी बैल है, बैल बहुत ही मेहनती जीव होता है, वह शक्तिशाली होने के बावजूद शान्त एवम भोला होता है, वैसे ही भगवान् शिवजी भी परमयोगी एवं शक्तिशाली होते हुये भी परम शान्त एवम् इतने भोले हैं कि उनका एक नाम भोलेनाथ भी जगत में प्रसिद्ध है, भगवान् शंकरजी ने जिस तरह कामदेव को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त की थी, उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता, उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है।
भगवान् शिवजी पंचदेवों में प्रधान, अनादि सिद्ध परमेश्वर, एवम् निगमागम सभी शास्त्रों में महिमामण्डित महादेव हैं, वेदों ने अव्यक्त, अजन्मा, सबका कारण, विश्वपंच का स्रष्टा, पालक एवम् संहारक कहकर उनका गुणगान किया है, श्रुतियों ने सदा शिवजी को स्वयम्भू, शान्त, प्रपंचातीत, परात्पर, परमतत्त्व, ईश्वरों के भी परम महेश्वर कहकर स्तुति की है, शिव का अर्थ ही है- "कल्याणस्वरूप" और "कल्याणप्रदाता" भगवान् शिवजी देवों के भी देव हैं।
भगवान् शिवजी वैसे तो परिवार के देवता कहे गयें है, लेकिन फिर भी श्मशान में निवास करते हैं, भगवान् शिवजी के सांसारिक होते हुए भी श्मशान में निवास करने के पीछे जीवन मंत्र का एक गूढ़ सूत्र छिपा है, संसार मोह-माया का प्रतीक है जबकि श्मशान वैराग्य का, भगवान् शिवजी कहते हैं कि संसार में रहते हुये अपने कर्तव्य पूरे करो, लेकिन मोह-माया से दूर रहो।
क्योंकि ये संसार तो नश्वर है, एक न एक दिन ये सबकुछ नष्ट होने वाला है, इसलिये संसार में रहते हुए भी किसी से मोह मत रखो और अपने कर्तव्य पूरे करते हुए वैरागी की तरह आचरण करो, शिवजी को संहार का देवता कहा गया है, अर्थात जब मनुष्य अपनी सभी मर्यादाओं को तोड़ने लगता है तब शिवजी उसका संहार कर देते हैं, जिन्हें अपने पाप कर्मों का फल भोगना बचा रहता है वे ही प्रेतयोनि को प्राप्त होते हैं।
चूंकि शिवजी संहार के देवता हैं, इसलिये इनको दंड भी वे ही देते हैं, इसलिये शिवजी को भूत-प्रेतों का देवता भी कहा जाता है, दरअसल यह जो भूत-प्रेत है वह कुछ और नहीं बल्कि सूक्ष्म शरीर का प्रतीक है, भगवान् शिवजी का यह संदेश है कि हर तरह के जीव जिससे सब घृणा करते हैं या भय करते हैं, वे भी शिवजी के समीप पहुंच सकते हैं, केवल शर्त है कि वे अपना सर्वस्व भगवान् शिवजी को समर्पित कर दें।
भगवान् शिवजी जितने रहस्यमयी हैं, उनके वस्त्र व आभूषण भी उतने ही विचित्र हैं, सांसारिक लोग जिनसे दूर भागते हैं, भगवान् शिवजी उसे ही अपने साथ रखते हैं, भगवान शिवजी एकमात्र ऐसे देवता हैं जो गले में नाग धारण करते हैं, देखा जाए तो नाग बहुत ही खतरनाक प्राणी है, लेकिन वह बिना कारण किसी को नहीं काटता, नाग पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण जीव है, जाने-अंजाने में ये मनुष्यों की सहायता ही करता है।
कुछ लोग डर कर या अपने निजी स्वार्थ के लिए नागों को मार देते हैं, जीवन मंत्र के दृष्टिकोण से देखा जाये तो भगवान् शिवजी नाग को गले में धारण कर ये संदेश देते हैं, कि जीवन चक्र में हर प्राणी का अपना विशेष योगदान है, इसलिये बिना वजह किसी प्राणी की हत्या न करें, त्रिशूल भगवान् शिवजी का प्रमुख अस्त्र है, यदि त्रिशूल का प्रतीक चित्र देखें तो उसमें तीन नुकीले सिरे दिखते हैं, यूं तो यह अस्त्र संहार का प्रतीक है पर वास्तव में यह बहुत ही गूढ़ बात बताता है।
संसार में तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं- सत, रज और तम, सत मतलब सात्विक, रज मतलब सांसारिक और तम मतलब तामसी अर्थात निशाचरी प्रवृति, हर मनुष्य में ये तीनों प्रवृत्तियां पायीं जाती हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी मात्रा में अंतर होता है, त्रिशूल के तीन नुकीले सिरे इन तीनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, त्रिशूल के माध्यम से भगवान शिव यह संदेश देते हैं कि इन गुणों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण हो, यह त्रिशूल तभी उठाया जाये जब कोई मुश्किल आये, तभी इन तीन गुणों का आवश्यकता अनुसार उपयोग हो।
देवताओं और दानवों द्वारा किये गयें समुद्र मंथन से निकला विष भगवान् शंकरजी ने अपने कंठ में धारण किया था, विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुयें, समुद्र मंथन का अर्थ है? अपने मन को मथना, विचारों का मंथन करना, मन में असंख्य विचार और भावनाएं होती हैं, उन्हें मथ कर निकालना और अच्छे विचारों को अपनाना, हम जब अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही निकलेंगे।
यही विष हैं, विष बुराइयों का प्रतीक है, शिवजी ने उसे अपने कंठ में धारण किया, उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया, शिव का विष पीना हमें यह संदेश देता है कि हमें बुराइयों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिये, बुराइयों का हर कदम पर सामना करना चाहिये, शिवजी द्वारा विष पीना यह भी सीख देता है कि यदि कोई बुराई पैदा हो रही हो तो हम उसे दूसरों तक नहीं पहुंचने दें।
भगवान् शंकरजी का वाहन नंदी यानी बैल है, बैल बहुत ही मेहनती जीव होता है, वह शक्तिशाली होने के बावजूद शान्त एवम भोला होता है, वैसे ही भगवान् शिवजी भी परमयोगी एवं शक्तिशाली होते हुये भी परम शान्त एवम् इतने भोले हैं कि उनका एक नाम भोलेनाथ भी जगत में प्रसिद्ध है, भगवान् शंकरजी ने जिस तरह कामदेव को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त की थी, उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता, उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है।
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स्वप्नशास्त्र
*सपने में भगवान शिव को देखने के हैं शुभ-अशुभ संकेत*
नींद में आने वाले सपने आपके अच्छे और बुरे भविष्य की ओर इशारा करते हैं। सपनों में मिले इन संकेतों से आप जीवन में होने वाली घटनाओं के बारे में जान सकते हैं। आज यहां हम जानेंगे कि अगर आपको सपने में भगवान शिवजी दिखाई देते हैं तो उन सपनों का क्या अर्थ होता है।*
*जानिए यहां 15 खास स्वप्न फल के बारे में-*
1. सपने में आपको शिव जी की जटाओं में चांद दिखाई पड़ना ज्ञान प्राप्ति का प्रतीक माना जा सकता है।
2. सपने में शिव जी को उग्र रूप में तांडव करते हुए देखना अशुभ स्वप्न कहा जा सकता हैं, क्योंकि यह शिव का रौद्र रूप है, जो उनके क्रोध को दर्शाता है।
3. सपने में शिव जी और सांप का एकसाथ दिखाई देना शुभ संकेत और धनलाभ का संकेत है।
4. अगर आप भी बार-बार सपने में शिव जी का देखते हैं तो इसका अर्थ आपके जीवन में एक खास संदेश आने की पूर्व सूचना है।
5. स्वप्न में शिव मंदिर का दिखाई देना या स्वयं का शिव मंदिर में प्रवेश करना शुभ संकेत माना गया है, इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि किसी रोग के कारण आप परेशान हैं, तो यह रोग शीघ्र ही ठीक होने का संकेत है।
6. सपने में देवों के देव महादेव को त्रिशूल के साथ देखना शक्ति का प्रतीक और शुभ संकेत है, जो जीवन के संकटों का नाश तथा परेशानियों से लड़ने की शक्ति देने वाला माना जा सकता है।
7. अगर आप सपने में भगवान शिव जी से बात करते हुए देखते हैं तो यह स्वप्न बहुत ही शुभ माना गया है।
8. स्वप्न में शिवलिंग देखना बेहद शुभ और जीवन के अशुभ तत्वों का नाश करने वाला माना जाता है।
9. सपने में शिवलिंग दिखने का दूसरा अर्थ आपका अच्छा समय शुरू होने का संकेत और जीवन में लंबे समय से चल रही परेशानियां दूर करने वाला माना जाता है।
10. सपने में शिव जी त्रिशूल या हाथ में डमरू दिखाई दें तो यह अच्छी खबर मिलने तथा शुभ संकेत माना जाता है।
11. स्वप्न में शिव जी की तीसरी आंख दिखाई देना जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। यह आपको कार्य में सतर्कता रखने तथा जागरूक रहने के लिए आगाह कर रहा है।
12. सपने में शिवलिंग को देखना आर्थिक सुधार का संकेत है, यह अचानक धन की प्राप्ति का संदेश भी है।
13. अगर आप सपने में भगवान शिव का तांडव नृत्य देखते हैं, तो यह जीवन में चल रही समस्या हल होने का संकेत है।
14. सपने में शिव-पार्वती के एकसाथ दर्शन करने का अर्थ कार्यक्षेत्र या व्यापार में नए अवसर मिलने तथा धनलाभ मिलने का संकेत है।
15. अगर कुंवारे युवक-युवतियां शिव-पार्वती को स्वप्न में देखते हैं तो जल्दी विवाह होने का संकेत बतलाता है।
*#उपाय- स्वप्न शास्त्र की मानें तो अगर आपने सपने में शिवलिंग के दर्शन किए हो तो आपको शिवालय में जाकर वहां शिवलिंग पर दूध चढ़ाना चाहिए, शिव जी प्रसन्न होकर अपना आशीष प्रदान करेंगे।*
*सपने में भगवान शिव को देखने के हैं शुभ-अशुभ संकेत*
नींद में आने वाले सपने आपके अच्छे और बुरे भविष्य की ओर इशारा करते हैं। सपनों में मिले इन संकेतों से आप जीवन में होने वाली घटनाओं के बारे में जान सकते हैं। आज यहां हम जानेंगे कि अगर आपको सपने में भगवान शिवजी दिखाई देते हैं तो उन सपनों का क्या अर्थ होता है।*
*जानिए यहां 15 खास स्वप्न फल के बारे में-*
1. सपने में आपको शिव जी की जटाओं में चांद दिखाई पड़ना ज्ञान प्राप्ति का प्रतीक माना जा सकता है।
2. सपने में शिव जी को उग्र रूप में तांडव करते हुए देखना अशुभ स्वप्न कहा जा सकता हैं, क्योंकि यह शिव का रौद्र रूप है, जो उनके क्रोध को दर्शाता है।
3. सपने में शिव जी और सांप का एकसाथ दिखाई देना शुभ संकेत और धनलाभ का संकेत है।
4. अगर आप भी बार-बार सपने में शिव जी का देखते हैं तो इसका अर्थ आपके जीवन में एक खास संदेश आने की पूर्व सूचना है।
5. स्वप्न में शिव मंदिर का दिखाई देना या स्वयं का शिव मंदिर में प्रवेश करना शुभ संकेत माना गया है, इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि किसी रोग के कारण आप परेशान हैं, तो यह रोग शीघ्र ही ठीक होने का संकेत है।
6. सपने में देवों के देव महादेव को त्रिशूल के साथ देखना शक्ति का प्रतीक और शुभ संकेत है, जो जीवन के संकटों का नाश तथा परेशानियों से लड़ने की शक्ति देने वाला माना जा सकता है।
7. अगर आप सपने में भगवान शिव जी से बात करते हुए देखते हैं तो यह स्वप्न बहुत ही शुभ माना गया है।
8. स्वप्न में शिवलिंग देखना बेहद शुभ और जीवन के अशुभ तत्वों का नाश करने वाला माना जाता है।
9. सपने में शिवलिंग दिखने का दूसरा अर्थ आपका अच्छा समय शुरू होने का संकेत और जीवन में लंबे समय से चल रही परेशानियां दूर करने वाला माना जाता है।
10. सपने में शिव जी त्रिशूल या हाथ में डमरू दिखाई दें तो यह अच्छी खबर मिलने तथा शुभ संकेत माना जाता है।
11. स्वप्न में शिव जी की तीसरी आंख दिखाई देना जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। यह आपको कार्य में सतर्कता रखने तथा जागरूक रहने के लिए आगाह कर रहा है।
12. सपने में शिवलिंग को देखना आर्थिक सुधार का संकेत है, यह अचानक धन की प्राप्ति का संदेश भी है।
13. अगर आप सपने में भगवान शिव का तांडव नृत्य देखते हैं, तो यह जीवन में चल रही समस्या हल होने का संकेत है।
14. सपने में शिव-पार्वती के एकसाथ दर्शन करने का अर्थ कार्यक्षेत्र या व्यापार में नए अवसर मिलने तथा धनलाभ मिलने का संकेत है।
15. अगर कुंवारे युवक-युवतियां शिव-पार्वती को स्वप्न में देखते हैं तो जल्दी विवाह होने का संकेत बतलाता है।
*#उपाय- स्वप्न शास्त्र की मानें तो अगर आपने सपने में शिवलिंग के दर्शन किए हो तो आपको शिवालय में जाकर वहां शिवलिंग पर दूध चढ़ाना चाहिए, शिव जी प्रसन्न होकर अपना आशीष प्रदान करेंगे।*
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भीगे वस्त्रों वाले, चर्बी, सर्प, शत्रु, नमक, औषधि, गिरगिट सामने आ जाए, अपने ही कुटुंबी सामने लड़ते हों, सामने कोई छींक दे या यात्रा के वक्त अप्रिय बचन सुनाई पड़ें तो, अपशकुन का सूचक है। यदि कौआ अचानक शोरगुल करे या किसी के सिर पर बैठे तो, आर्थिक हानि दर्शाता है। यदि स्त्री के सिर पर बैठे तो, पति को वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। संध्या के समय मुर्गों की ध्वनियां महामारी दर्शाती हैं।।
*वर्षा के बारे में शकुन :*
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जब मछलियां जल की सतह पर छलांग मारें, मेढक टर्र- टर्र करे, बिल्ली भूमि खोदे, चीटियां अपने अंडों को स्थानांतरित करें, सांपों का जोड़ा व पशु आकाश की ओर देखे, पालतू पशु बाहर जाने से घबराएं तो, तुरंत ही वर्षा होती है। यदि रात्रि में दीपकीट दिखाई दे, कीड़े या सरीसृप घास के ऊपर बैठें तो भी तत्काल वर्षा होती है। यदि वर्षा ऋतु के दौरान सायंकाल में गीदड़ों की चिल्लाहट सुनाई दे तो, बिल्कुल वर्षा नहीं होती। वर्षा के बारे में प्रश्न शास्त्र तथा मेदिनीय ज्योतिष में भी शकुन- संकेत अपना विशेष महत्व रखते हैं। जैसे की उदाहरण स्वरूप-- वर्षा होगी या नहीं होगी, कम होगी या अधिक होगी इस प्रकार की भविष्य वाणियां भी शकुनों के आधार पर की जाती हैं। आसमान बादलों से घिरा हो व पालतू कुत्ता- बिल्ली घर से बाहर न जाए, पर लगे चींटियों ने बिल से बाहर निकले तो, शीघ्र वर्षा होने का सूचक है। यदि आसमान में चील बहुत ऊंचाई पर उड़ रही हो तो भी वर्षा होने वाली होती है। यदि मकड़ी घर के बाहर जाला बनाए तो, वर्षा ऋतु समाप्ति का सूचक है। मेढकों की टर्रराहट वर्षा का संकेत है। मोर का नृत्य तथा शोर भी वर्षा का सूचक है। ऐसे बहुत कुछ सूचना से अभिज्ञ लोगों ने आधुनिक 'वेदर- फोरकास्ट' को न जानकर भी वर्षा के बारे में सही भविष्य वाणी करते हैं।।
*वर्षा के बारे में शकुन :*
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जब मछलियां जल की सतह पर छलांग मारें, मेढक टर्र- टर्र करे, बिल्ली भूमि खोदे, चीटियां अपने अंडों को स्थानांतरित करें, सांपों का जोड़ा व पशु आकाश की ओर देखे, पालतू पशु बाहर जाने से घबराएं तो, तुरंत ही वर्षा होती है। यदि रात्रि में दीपकीट दिखाई दे, कीड़े या सरीसृप घास के ऊपर बैठें तो भी तत्काल वर्षा होती है। यदि वर्षा ऋतु के दौरान सायंकाल में गीदड़ों की चिल्लाहट सुनाई दे तो, बिल्कुल वर्षा नहीं होती। वर्षा के बारे में प्रश्न शास्त्र तथा मेदिनीय ज्योतिष में भी शकुन- संकेत अपना विशेष महत्व रखते हैं। जैसे की उदाहरण स्वरूप-- वर्षा होगी या नहीं होगी, कम होगी या अधिक होगी इस प्रकार की भविष्य वाणियां भी शकुनों के आधार पर की जाती हैं। आसमान बादलों से घिरा हो व पालतू कुत्ता- बिल्ली घर से बाहर न जाए, पर लगे चींटियों ने बिल से बाहर निकले तो, शीघ्र वर्षा होने का सूचक है। यदि आसमान में चील बहुत ऊंचाई पर उड़ रही हो तो भी वर्षा होने वाली होती है। यदि मकड़ी घर के बाहर जाला बनाए तो, वर्षा ऋतु समाप्ति का सूचक है। मेढकों की टर्रराहट वर्षा का संकेत है। मोर का नृत्य तथा शोर भी वर्षा का सूचक है। ऐसे बहुत कुछ सूचना से अभिज्ञ लोगों ने आधुनिक 'वेदर- फोरकास्ट' को न जानकर भी वर्षा के बारे में सही भविष्य वाणी करते हैं।।
शकुन अपशकुन शास्त्र
भारतीय शकुन शास्त्र विशेष और ज्ञानिवर गृद्धराज गरुड़ :
----------------------------------------------------------
पुराणों के मान्यताओं से ज्ञानिवर गरुड़ जी को पक्षियों के राजा और भगवान विष्णु के प्रिय वाहन के परिचय में स्मरण किया जाता है। महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी विनता की सन्तान तथा अरुण के छोटे भाई है यह गरुड़देव। रामायण के अनुसार त्रेतायुग में दशरथ नन्दन श्रीराम के छोटे भाई भरत थे गरुड़ जी के अवतार।मूलतः विष्णु- वाहन गरुड़ और उनके भाई सूर्यरथ के सारथी अरुण को चील या गृद्ध के रूप में वर्णित किया गया है। जैसे अरुण जी तथाकथित 'अरुण- संहिता' के मूल- रचयिता के रूप में मान्यता प्राप्त, ऐसे ही सायद गरुड़ जी को 'शकुन शास्त्रकार' के रूप से कुछ विद्वान मान्यता देते हैं-- यदिच गरुड़ जी ने यह मान्यता पाने की ठोस शास्त्रीय प्रमाण कंहा है कि नहीं, यह निष्पक्ष खोज की विषय है।।
*भारतीय शकुन शस्त्र :*
--------------------------
दरअसल शकुन- अपशकुन विचार आधारित विश्वास, सिर्फ भारतीय समाज में प्रचलित एक अवधारणा नहीं है, भारत के बाहर देशों में भी कंहा- कंहा विभिर्ण रूप में मान्यता प्राप्त है। स्थूलतः शकुन तथा अपशकुन विचार का मतलब है-- कुछ विशेष प्रकार की परिघटनाओं से ही भविष्य के बारे में लब्ध पूर्वाभास। इस क्षेत्र में अनुकूल- भविष्य- वाणी को 'शुभ शकुन' तथा प्रतिकूल- भविष्य- वाणी को 'अपशकुन' कहा जाता है।।
भारतीय संस्कृति में पारम्परिक प्रवाह के अलावा वेदों, पुराणों व धार्मिक ग्रंथों में भी शकुन का संकेत मिलता है। प्राचीन ज्योतिष अंतर्गत 'प्रश्न- शास्त्र' तथा 'मेदिनीय ज्योतिष- वाणी' के पीछे शकुन ज्ञान भी जुड़े हुए हैं। अमर महाकाव्य रामायण, महाभारत आदि में भी शकुन और अपशकुन के बारे में अनेक प्रमाण लिपिबद्ध है। प्राचीन काल में लोकमुख से यह शकुन- ज्ञान पीढ़ी- दर पीढ़ी तक पहुंचते थे। फिर लिखन कला आरम्भ होने के बाद, इसको सम्भवमत इकट्ठी कर ताड़पत्र तथा भुर्जपत्र पोथीओं में लिखा गया था। लेकिन अब इस आधुनिक युग में तो वैज्ञानिक- दृष्टि से शकुनों को बहुधा अंधविश्वास ही माना जाता हैं। इसी स्थिति में भी पृथ्वी, आकाश, स्वप्न तथा शरीर के अंगों से संबंधित शकुन ज्ञान से स्थल विशेष में मिले संकेत को आधार कर, किसी भी कार्य के वक्त घटित होने वाले प्राकृतिक अथवा अप्राकृतिक दृश्य से अच्छे व बुरे फल को विचार कर, अनुभवी लोगों ने भविष्य वाणी करने की उदाहरण बहुत है।।
*कुछ शुभ शकुन :*
---------------------
ब्राह्मण, घोड़ा, हाथी, न्योला, बाज, मोर, दूध, दही, फल, फूल, कमल, वेदध्वनि, अन्न, सिंहासन, जल से भरा कलश, बंधा हुआ एक पशु, चापा या चाहा पक्ष मछली, प्रज्वलित अग्नि, छाता, वैश्या, पनाली, अंजन, ऐना, शस्त्र, रत्न, स्त्री, कन्या, धुले हुए वस्त्र सहित धोबी, घी, मिट्टी, सरसों, मांस, गन्ना, खज्जन पक्ष, रोदन रहित मुर्दा, पालकी, भारद्वाज पक्षी, ध्वजा, अंकुश, बकरा, अपना प्रिय मित्र, बच्चे के सहित स्त्री, गाय या गोह के सहित बछड़ा, सफेद बैल, साधु, अमृत, कल्पवृक्ष- चारों वेद, शहद, शराब, गोरोचन आदि में से कुछ भी सम्मुख पड़े या कूड़े से भरी टोकरी, प्रिय वाणी या सामान से लदा वाहन यदि यात्रा के वक्त सम्मुख पड़ जाए, खाली घड़ा पीठ के पिछे हो तो, ये सब शुभ शकुन माने जाते है, जिससे इच्छा पूर्ति का संकेत मिलते हैं। नीलकण्ठ छिक्कर नामक विशेष मृग, पिक्कर पक्षी, कौवी, भालू व कुत्ता यदि दाएं हाथ पर दिखाई पड़े तो कार्य सिद्ध होता है। यदि हिरण बायीं तरफ से रास्ता काटकर दायीं तरफ आ जाए या बायीं तरफ गधा बोलना प्रारंभ कर दे तो, शुभ शकुन है। यदि खरगोश, सर्प, सूअर, जाहक, पशु, कछुआ व गोह के शब्द सिर्फ कानों में पड़े और ये सब दिखाई न दें तो, अत्यंत शुभ शकुन समझें। यदि वानर भालू यात्रा आरंभ वक्त आगे जाए तो उत्तम शकुन है।।
*अपशकुनुन विचार :*
------------------------
यदि यात्रा के दौरान गधा दायीं तरफ बोले या कोई सामने से टूटी खाट लाता हुआ मिले, अशुभ संकेत है। यदि कुत्ता भूमि पर लेटे या कान फड़फड़ाये, पांच भैंस सामने आये, एक बकरी नौ स्त्री, लड़ती हुई दो बिल्ली, छः कुत्ते, तीन गाय, दो वैश्य, एक बैल एक शूद्र, सात हाथी या भैंसे पर बैठा हुआ व्यक्ति यदि सम्मुख पड़े तो, अपशकुन का सूचक है। यात्रा में चलते समय जननी या किसी गुरुजन का तिरस्कार करे या अकाल वर्षा हो, चार क्षत्रिय, तीन ब्राह्मण बैरागी, सन्यासी, खुले केशों वाला गैरिक वस्त्र धारण करने वाला कोई सम्मुख में पड़ जाए तो, अपशकुन है। इसी प्रकार बांझ औरत, स्त्री का रज या रजोवती स्त्री, भूसा, हड्डी, चमड़ा, अंधा, बहरा, कूबड़ा, विधवा स्त्री, जलाने वाली लकड़ी, उपला, पागल, कीचड़ सामने आये, दो भैंसे लड़ते हुए, नपुसंक, विष्ठा, तेल मालिश किये आदमी, अंग भंग, नंगा पुरुष या नारी, दीर्घ रोगी, गंजा,
भारतीय शकुन शास्त्र विशेष और ज्ञानिवर गृद्धराज गरुड़ :
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पुराणों के मान्यताओं से ज्ञानिवर गरुड़ जी को पक्षियों के राजा और भगवान विष्णु के प्रिय वाहन के परिचय में स्मरण किया जाता है। महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी विनता की सन्तान तथा अरुण के छोटे भाई है यह गरुड़देव। रामायण के अनुसार त्रेतायुग में दशरथ नन्दन श्रीराम के छोटे भाई भरत थे गरुड़ जी के अवतार।मूलतः विष्णु- वाहन गरुड़ और उनके भाई सूर्यरथ के सारथी अरुण को चील या गृद्ध के रूप में वर्णित किया गया है। जैसे अरुण जी तथाकथित 'अरुण- संहिता' के मूल- रचयिता के रूप में मान्यता प्राप्त, ऐसे ही सायद गरुड़ जी को 'शकुन शास्त्रकार' के रूप से कुछ विद्वान मान्यता देते हैं-- यदिच गरुड़ जी ने यह मान्यता पाने की ठोस शास्त्रीय प्रमाण कंहा है कि नहीं, यह निष्पक्ष खोज की विषय है।।
*भारतीय शकुन शस्त्र :*
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दरअसल शकुन- अपशकुन विचार आधारित विश्वास, सिर्फ भारतीय समाज में प्रचलित एक अवधारणा नहीं है, भारत के बाहर देशों में भी कंहा- कंहा विभिर्ण रूप में मान्यता प्राप्त है। स्थूलतः शकुन तथा अपशकुन विचार का मतलब है-- कुछ विशेष प्रकार की परिघटनाओं से ही भविष्य के बारे में लब्ध पूर्वाभास। इस क्षेत्र में अनुकूल- भविष्य- वाणी को 'शुभ शकुन' तथा प्रतिकूल- भविष्य- वाणी को 'अपशकुन' कहा जाता है।।
भारतीय संस्कृति में पारम्परिक प्रवाह के अलावा वेदों, पुराणों व धार्मिक ग्रंथों में भी शकुन का संकेत मिलता है। प्राचीन ज्योतिष अंतर्गत 'प्रश्न- शास्त्र' तथा 'मेदिनीय ज्योतिष- वाणी' के पीछे शकुन ज्ञान भी जुड़े हुए हैं। अमर महाकाव्य रामायण, महाभारत आदि में भी शकुन और अपशकुन के बारे में अनेक प्रमाण लिपिबद्ध है। प्राचीन काल में लोकमुख से यह शकुन- ज्ञान पीढ़ी- दर पीढ़ी तक पहुंचते थे। फिर लिखन कला आरम्भ होने के बाद, इसको सम्भवमत इकट्ठी कर ताड़पत्र तथा भुर्जपत्र पोथीओं में लिखा गया था। लेकिन अब इस आधुनिक युग में तो वैज्ञानिक- दृष्टि से शकुनों को बहुधा अंधविश्वास ही माना जाता हैं। इसी स्थिति में भी पृथ्वी, आकाश, स्वप्न तथा शरीर के अंगों से संबंधित शकुन ज्ञान से स्थल विशेष में मिले संकेत को आधार कर, किसी भी कार्य के वक्त घटित होने वाले प्राकृतिक अथवा अप्राकृतिक दृश्य से अच्छे व बुरे फल को विचार कर, अनुभवी लोगों ने भविष्य वाणी करने की उदाहरण बहुत है।।
*कुछ शुभ शकुन :*
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ब्राह्मण, घोड़ा, हाथी, न्योला, बाज, मोर, दूध, दही, फल, फूल, कमल, वेदध्वनि, अन्न, सिंहासन, जल से भरा कलश, बंधा हुआ एक पशु, चापा या चाहा पक्ष मछली, प्रज्वलित अग्नि, छाता, वैश्या, पनाली, अंजन, ऐना, शस्त्र, रत्न, स्त्री, कन्या, धुले हुए वस्त्र सहित धोबी, घी, मिट्टी, सरसों, मांस, गन्ना, खज्जन पक्ष, रोदन रहित मुर्दा, पालकी, भारद्वाज पक्षी, ध्वजा, अंकुश, बकरा, अपना प्रिय मित्र, बच्चे के सहित स्त्री, गाय या गोह के सहित बछड़ा, सफेद बैल, साधु, अमृत, कल्पवृक्ष- चारों वेद, शहद, शराब, गोरोचन आदि में से कुछ भी सम्मुख पड़े या कूड़े से भरी टोकरी, प्रिय वाणी या सामान से लदा वाहन यदि यात्रा के वक्त सम्मुख पड़ जाए, खाली घड़ा पीठ के पिछे हो तो, ये सब शुभ शकुन माने जाते है, जिससे इच्छा पूर्ति का संकेत मिलते हैं। नीलकण्ठ छिक्कर नामक विशेष मृग, पिक्कर पक्षी, कौवी, भालू व कुत्ता यदि दाएं हाथ पर दिखाई पड़े तो कार्य सिद्ध होता है। यदि हिरण बायीं तरफ से रास्ता काटकर दायीं तरफ आ जाए या बायीं तरफ गधा बोलना प्रारंभ कर दे तो, शुभ शकुन है। यदि खरगोश, सर्प, सूअर, जाहक, पशु, कछुआ व गोह के शब्द सिर्फ कानों में पड़े और ये सब दिखाई न दें तो, अत्यंत शुभ शकुन समझें। यदि वानर भालू यात्रा आरंभ वक्त आगे जाए तो उत्तम शकुन है।।
*अपशकुनुन विचार :*
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यदि यात्रा के दौरान गधा दायीं तरफ बोले या कोई सामने से टूटी खाट लाता हुआ मिले, अशुभ संकेत है। यदि कुत्ता भूमि पर लेटे या कान फड़फड़ाये, पांच भैंस सामने आये, एक बकरी नौ स्त्री, लड़ती हुई दो बिल्ली, छः कुत्ते, तीन गाय, दो वैश्य, एक बैल एक शूद्र, सात हाथी या भैंसे पर बैठा हुआ व्यक्ति यदि सम्मुख पड़े तो, अपशकुन का सूचक है। यात्रा में चलते समय जननी या किसी गुरुजन का तिरस्कार करे या अकाल वर्षा हो, चार क्षत्रिय, तीन ब्राह्मण बैरागी, सन्यासी, खुले केशों वाला गैरिक वस्त्र धारण करने वाला कोई सम्मुख में पड़ जाए तो, अपशकुन है। इसी प्रकार बांझ औरत, स्त्री का रज या रजोवती स्त्री, भूसा, हड्डी, चमड़ा, अंधा, बहरा, कूबड़ा, विधवा स्त्री, जलाने वाली लकड़ी, उपला, पागल, कीचड़ सामने आये, दो भैंसे लड़ते हुए, नपुसंक, विष्ठा, तेल मालिश किये आदमी, अंग भंग, नंगा पुरुष या नारी, दीर्घ रोगी, गंजा,
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#_दिन_के_आठ_प्रहर_कौन_से_हैं
हिन्दू धर्म में समय की धारणा बहुत ही वृहत्त तौर पे रही है। जो वर्तमान में सेकंड, मिनट, घंटे, दिन-रात, माह, वर्ष, दशक और शताब्दी तक सीमित हो गई है।
लेकिन हिन्दू धर्म में एक अणु, तृसरेणु, त्रुटि, वेध, लावा, निमेष, क्षण, काष्ठा, लघु, दंड, मुहूर्त, प्रहर या याम, दिवस, पक्ष, माह, ऋतु, अयन, वर्ष (वर्ष के पांच भेद- संवत्सर, परिवत्सर, इद्वत्सर, अनुवत्सर, युगवत्सर), दिव्य वर्ष, युग, महायुग, मन्वंतर, कल्प,
अंत में दो कल्प मिलाकर ब्रह्मा का एक दिन और रात, तक की वृहत्तर समय पद्धति निर्धारित है।
आठ प्रहर : हिन्दू धर्मानुसार दिन-रात मिलाकर 24 घंटे में आठ प्रहर होते हैं। औसतन एक प्रहर तीन घंटे या साढ़े सात घटी का होता है जिसमें दो मुहूर्त होते हैं।एक प्रहर एक घटी 24 मिनट की होती है।
दिन के चार और रात के चार मिलाकर कुल आठ प्रहर।
दिन के चार प्रहर- 1.पूर्वान्ह, 2.मध्यान्ह, 3.अपरान्ह और 4.सायंकाल।
रात के चार प्रहर- 5.प्रदोष, 6.निशिथ, 7.त्रियामा एवं 8.उषा।
आठ_प्रहर : एक प्रहर तीन घंटे का होता है।
सूर्योदय के समय दिन का पहला प्रहर प्रारंभ होता है जिसे पूर्वान्ह कहा जाता है। दिन का दूसरा प्रहर जब सूरज सिर पर आ जाता है तब तक रहता है जिसे मध्याह्न कहते हैं। इसके बाद अपरान्ह (दोपहर बाद) का समय शुरू होता है, जो लगभग 4 बजे तक चलता है।
4 बजे बाद दिन अस्त तक सायंकाल चलता है।
फिर क्रमश: प्रदोष, निशिथ एवं उषा काल। सायंकाल के बाद ही प्रार्थना करना चाहिए। अष्टयाम : वैष्णव मन्दिरों में आठ प्रहर की सेवा-पूजा का विधान 'अष्टयाम' कहा जाता है।
वल्लभ सम्प्रदाय में मंगला, श्रृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, संध्या-आरती
तथा शयन के नाम से ये कीर्तन-सेवाएं हैं।
इसी के आधार पर भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रत्येक राग के गाने का समय निश्चित है।प्रत्येक राग प्रहर अनुसार निर्मित है।
प्रहर 1
सुबह 6 बजे से 9 बजे तक वैरव, बंगाल वैरव, रामकली, विभास, जोगई, तोरी, जयदेव, सुबह कीर्तन, प्रभात भैरव,गुंकाली और कलिंगरा,
प्रहर 2
सुबह 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक: देव गांधार, भैरवी, मिश्र भैरवी, असावरी, जोनपुरी, दुर्गा, गांधारी, मिश्रा बिलावल, बिलावल, बृंदावानी सारंग, सामंत सारंग, कुरुभ, देवनागिरी
प्रहर 3
दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक गोर सारंग, भीमपलासी, पीलू, मुल्तानी, धानी,त्रिवेणी, पलासी, हंसकनकिनी
प्रहर 4
दोपहर 3 से शाम 6 बजे बंगाल का पारंपरिक कीर्तन, धनसारी, मनोहर, रागश्री, पुरावी, मालश्री, मालवी, श्रीटंक और हंस नारायणी
प्रहर 5
शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक यमन, यमन कल्याण, हेम कल्याण, पूर्वी कल्याण, भूपाली, पुरिया, केदार, जलधर केदार, मारवा, छाया, खमाज, नारायणी, दुर्गा, तिलक कामोद, हिंडोल, मिश्रा खमाज नट, हमीर
प्रहर 6
रात्रि 9 से 12 बजे तक सोरत, बिहाग, दर्श, चंपक, मिश्र गारा, तिलंग, जय जवान्ति, बहार, काफी, अरना, मेघा, बागीशारी, रागेश्वरी, मल्हाल, मिया, मल्हार
प्रहर 7
12 बजे से 3 बजे तक मालगुंजी, दरबारी कनरा, बसंत बहार, दीपक, बसंत, गौरी, चित्रा गौरी, शिवरंजिनी, जैतश्री, धवलश्री, परज, माली गौरा, माड़, सोहनी, हंस रथ, हंस ध्वनि
प्रहर 8
सुबह 3 बजे से सुबह 6 बजे तक चंद्रकोस, मालकोस, गोपिका बसंत, पंचम, मेघ रंजिनी, भांकर, ललिता गौरी,ललिता, खाट, गुर्जरी तोरी, बाराती तोरी, भोपाल तोरी, प्रभाती कीर्तन
#जय_महाकाल
हिन्दू धर्म में समय की धारणा बहुत ही वृहत्त तौर पे रही है। जो वर्तमान में सेकंड, मिनट, घंटे, दिन-रात, माह, वर्ष, दशक और शताब्दी तक सीमित हो गई है।
लेकिन हिन्दू धर्म में एक अणु, तृसरेणु, त्रुटि, वेध, लावा, निमेष, क्षण, काष्ठा, लघु, दंड, मुहूर्त, प्रहर या याम, दिवस, पक्ष, माह, ऋतु, अयन, वर्ष (वर्ष के पांच भेद- संवत्सर, परिवत्सर, इद्वत्सर, अनुवत्सर, युगवत्सर), दिव्य वर्ष, युग, महायुग, मन्वंतर, कल्प,
अंत में दो कल्प मिलाकर ब्रह्मा का एक दिन और रात, तक की वृहत्तर समय पद्धति निर्धारित है।
आठ प्रहर : हिन्दू धर्मानुसार दिन-रात मिलाकर 24 घंटे में आठ प्रहर होते हैं। औसतन एक प्रहर तीन घंटे या साढ़े सात घटी का होता है जिसमें दो मुहूर्त होते हैं।एक प्रहर एक घटी 24 मिनट की होती है।
दिन के चार और रात के चार मिलाकर कुल आठ प्रहर।
दिन के चार प्रहर- 1.पूर्वान्ह, 2.मध्यान्ह, 3.अपरान्ह और 4.सायंकाल।
रात के चार प्रहर- 5.प्रदोष, 6.निशिथ, 7.त्रियामा एवं 8.उषा।
आठ_प्रहर : एक प्रहर तीन घंटे का होता है।
सूर्योदय के समय दिन का पहला प्रहर प्रारंभ होता है जिसे पूर्वान्ह कहा जाता है। दिन का दूसरा प्रहर जब सूरज सिर पर आ जाता है तब तक रहता है जिसे मध्याह्न कहते हैं। इसके बाद अपरान्ह (दोपहर बाद) का समय शुरू होता है, जो लगभग 4 बजे तक चलता है।
4 बजे बाद दिन अस्त तक सायंकाल चलता है।
फिर क्रमश: प्रदोष, निशिथ एवं उषा काल। सायंकाल के बाद ही प्रार्थना करना चाहिए। अष्टयाम : वैष्णव मन्दिरों में आठ प्रहर की सेवा-पूजा का विधान 'अष्टयाम' कहा जाता है।
वल्लभ सम्प्रदाय में मंगला, श्रृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, संध्या-आरती
तथा शयन के नाम से ये कीर्तन-सेवाएं हैं।
इसी के आधार पर भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रत्येक राग के गाने का समय निश्चित है।प्रत्येक राग प्रहर अनुसार निर्मित है।
प्रहर 1
सुबह 6 बजे से 9 बजे तक वैरव, बंगाल वैरव, रामकली, विभास, जोगई, तोरी, जयदेव, सुबह कीर्तन, प्रभात भैरव,गुंकाली और कलिंगरा,
प्रहर 2
सुबह 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक: देव गांधार, भैरवी, मिश्र भैरवी, असावरी, जोनपुरी, दुर्गा, गांधारी, मिश्रा बिलावल, बिलावल, बृंदावानी सारंग, सामंत सारंग, कुरुभ, देवनागिरी
प्रहर 3
दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक गोर सारंग, भीमपलासी, पीलू, मुल्तानी, धानी,त्रिवेणी, पलासी, हंसकनकिनी
प्रहर 4
दोपहर 3 से शाम 6 बजे बंगाल का पारंपरिक कीर्तन, धनसारी, मनोहर, रागश्री, पुरावी, मालश्री, मालवी, श्रीटंक और हंस नारायणी
प्रहर 5
शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक यमन, यमन कल्याण, हेम कल्याण, पूर्वी कल्याण, भूपाली, पुरिया, केदार, जलधर केदार, मारवा, छाया, खमाज, नारायणी, दुर्गा, तिलक कामोद, हिंडोल, मिश्रा खमाज नट, हमीर
प्रहर 6
रात्रि 9 से 12 बजे तक सोरत, बिहाग, दर्श, चंपक, मिश्र गारा, तिलंग, जय जवान्ति, बहार, काफी, अरना, मेघा, बागीशारी, रागेश्वरी, मल्हाल, मिया, मल्हार
प्रहर 7
12 बजे से 3 बजे तक मालगुंजी, दरबारी कनरा, बसंत बहार, दीपक, बसंत, गौरी, चित्रा गौरी, शिवरंजिनी, जैतश्री, धवलश्री, परज, माली गौरा, माड़, सोहनी, हंस रथ, हंस ध्वनि
प्रहर 8
सुबह 3 बजे से सुबह 6 बजे तक चंद्रकोस, मालकोस, गोपिका बसंत, पंचम, मेघ रंजिनी, भांकर, ललिता गौरी,ललिता, खाट, गुर्जरी तोरी, बाराती तोरी, भोपाल तोरी, प्रभाती कीर्तन
#जय_महाकाल
👍4❤1
स्वप्नशास्त्र
सपने में होते हैं श्रीगणेश के दर्शन तो मिलता है ऐसा फल
*स्वप्न का हमारे जीवन में सबसे बड़ा महत्व है। सपने हमारी कंपनियां, साझीदार, भविष्य की परिभाषा और हमारे दिल-दिमाग में चल रही उधेड़बुन का आईना होता है। सपने कई तरह के होते है। कभी-कभी सपने में हमें देवी-देवताओं के दर्शन होते हैं। आइए जानते हैं सपने में गणेशजी दर्शन दे तो हमारे जीवन पर कैसा असर होता है।*
*श्रीगणेश दर्शन शुभ फलोदय*
ऐसा अक्सर होता है कि हमारा कोई विशेष सपना आता है तो हम किसी न किसी तरह से उसके बारे में चर्चा करते हैं। लेकिन सपने में यदि आप गणपति देव के दर्शन करते हैं तो यह स्वप्न किसी को नहीं बताना चाहिए, ऐसा माना जाता है कि इस सपने का शुभ फल नष्ट हो जाता है। सपने में गजानन के दर्शन करना अति शुभ फल देता है। इसका अर्थ यह होता है कि खुशियों की माला होने वाली है और आपके घर पर कोई मांगलिक कार्य होने वाला है। सपने में श्रीगणेश के दर्शन होते हुए गणपति देव का स्मरण होना चाहिए।
*पृष्ण के दर्शन अशुभ फलाद*
सपने में गणेशजी की पीठ के दर्शन करना शुभ नहीं माना जाता है। सपने में गणेशजी की पीठ के दर्शन करने का मतलब यह होता है कि भविष्य में आपको धन संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। ऐसा स्वप्न आने पर गणेशजी से प्रार्थना कर शुभता का आह्वान करना चाहिए। श्रीगणेश की कृपा आपको प्राप्त होगी।
*सपने का समय से ऐसा है रिश्ता*
गणेश जी के स्वप्न का रात्रि के समय से भी संबंध रहता है। इस बात पर प्रतिबंध है कि रात का सपना किस प्रहर में आए। दिन के सपने का कभी कोई फल प्राप्त नहीं होता है। रात 12 से 3 बजे के बीच एक माह में स्वप्न का फल प्राप्त हो सकता है। ब्रह्म मुहूर्त के स्वप्न का फल अतिशीघ्र प्राप्त होता है।
सपने में होते हैं श्रीगणेश के दर्शन तो मिलता है ऐसा फल
*स्वप्न का हमारे जीवन में सबसे बड़ा महत्व है। सपने हमारी कंपनियां, साझीदार, भविष्य की परिभाषा और हमारे दिल-दिमाग में चल रही उधेड़बुन का आईना होता है। सपने कई तरह के होते है। कभी-कभी सपने में हमें देवी-देवताओं के दर्शन होते हैं। आइए जानते हैं सपने में गणेशजी दर्शन दे तो हमारे जीवन पर कैसा असर होता है।*
*श्रीगणेश दर्शन शुभ फलोदय*
ऐसा अक्सर होता है कि हमारा कोई विशेष सपना आता है तो हम किसी न किसी तरह से उसके बारे में चर्चा करते हैं। लेकिन सपने में यदि आप गणपति देव के दर्शन करते हैं तो यह स्वप्न किसी को नहीं बताना चाहिए, ऐसा माना जाता है कि इस सपने का शुभ फल नष्ट हो जाता है। सपने में गजानन के दर्शन करना अति शुभ फल देता है। इसका अर्थ यह होता है कि खुशियों की माला होने वाली है और आपके घर पर कोई मांगलिक कार्य होने वाला है। सपने में श्रीगणेश के दर्शन होते हुए गणपति देव का स्मरण होना चाहिए।
*पृष्ण के दर्शन अशुभ फलाद*
सपने में गणेशजी की पीठ के दर्शन करना शुभ नहीं माना जाता है। सपने में गणेशजी की पीठ के दर्शन करने का मतलब यह होता है कि भविष्य में आपको धन संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। ऐसा स्वप्न आने पर गणेशजी से प्रार्थना कर शुभता का आह्वान करना चाहिए। श्रीगणेश की कृपा आपको प्राप्त होगी।
*सपने का समय से ऐसा है रिश्ता*
गणेश जी के स्वप्न का रात्रि के समय से भी संबंध रहता है। इस बात पर प्रतिबंध है कि रात का सपना किस प्रहर में आए। दिन के सपने का कभी कोई फल प्राप्त नहीं होता है। रात 12 से 3 बजे के बीच एक माह में स्वप्न का फल प्राप्त हो सकता है। ब्रह्म मुहूर्त के स्वप्न का फल अतिशीघ्र प्राप्त होता है।
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#महाशिवरात्री2024
महाशिवरात्रि व्रत
महाशिवरात्रि की पूजा का शुभ मुहूर्त, निशीथ काल
-----------------------------------------------------
*महाशिवरात्रि का त्योहार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस बार यह चतुर्दशी 8 मार्च 2024 शुक्रवार को रहेगी। आओ जानते हैं कि महाशिवरात्रि मनाने के क्या है शास्त्र सम्मत नियम। नियम से पूजा आरती या अनुष्ठान करेंगे तो शिवजी और मां पार्वती का आशीर्वाद मिलेगा।*
*चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ-* 08 मार्च 2024 को रात्रि 09:57 बजे
*चतुर्दशी तिथि समाप्त-* 09 मार्च 2024 को 06:17 बजे।
*निशीथ काल पूजा समय-* रात्रि (मार्च 09) 12:07 am से 12:56am.
*पूजा का शुभ मुहूर्त:-*
*अभिजीत मुहूर्त:-* दोपहर 12:08 से 12:56 तक।
*विजय मुहूर्त:-* दोपहर 02:30 से 03:17 तक।
*गोधूलि मुहूर्त:-* शाम 06:23 से 06:48 तक।
*सायाह्न सन्ध्या:-* शाम 06:25 से 07:39 तक।
*अमृत काल:-* रात्रि 10:43 से 12:08 तक।
*सर्वार्थ सिद्धि योग:-* सुबह 06:38 से 10:41 तक।
*निशिता मुहूर्त:-* रात्रि 12:07 से 12:56 तक।
*रात्रि पूजा के लिए चार प्रहर का समय:-*
*रात्रि प्रथम प्रहर पूजा समय-* शाम 06:25 से रात्रि 09:28 के बीच।
*रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा समय-* रात्रि 09:28 से 12:31 के बीच (09 मार्च)।
*रात्रि तृतीय प्रहर पूजा समय-* रात्रि (09 मार्च) 12:31 से 03:34 के बीच।
*रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा समय-* रात्रि (09 मार्च 03:34 से 06:37 के बीच।
*महाशिवरात्रि पूजा और व्रत के नियम:-*
जिस दिन चतुर्दशी निशीथव्यापिनी तो उसी दिन महाशिवरात्रि का पर्व मनाते हैं। क्योंकि महाशिवरात्रि की मुख्य पूजा निशीथ काल में होती है।
निशीथ काल हमेशा मध्यरात्रि में 12 बजे के आसपास ही रहता है।
रात्रि काल के आठवें मुहूर्त क निशीथ काल कहते हैं। यानी चतुर्तशी तिथि में आठवां मुहूर्त पड़ रहा हो तो उस दिन महाशिवरात्रि मनाने का शास्त्रोक्त नियम है।
8 मार्च को रात्रि को ही चतुर्दशी तिथि में निशीथकाल रहेगा इसलिए महाशिवरात्रि 8 मार्च को ही मनाई जाएगी। इसमें उदयातिथि का महत्व नहीं रहता है।
यदि चतुर्दशी तिथि दूसरे दिन निशीथकाल के पहले हिस्से को छुए और पहले दिन पूरे निशीथ को व्याप्त करे, तो पहले दिन ही महाशिवरात्रि मनाते हैं।
उपर्युक्त दो स्थितियों को छोड़कर बाकी अन्य स्थिति में व्रत अगले दिन ही रखा जाता है।
शिवरात्रि के एक दिन पहले यानी त्रयोदशी तिथि के दिन केवल एक समय ही भोजन ग्रहण करके व्रत प्रारंभ करना चाहिए।
अगले दिन यानी चतुर्दशी के दिन सुबह नित्य कर्म करने के पश्चात्, पूरे दिन के व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
व्रत के संकल्प के दौरान यदि आपकी कोई प्रतिज्ञा और मनोकामना है तो उसे दोहराना चाहिए।
निशीथकाल की पूजा के बाद अगले दिन ही व्रत खोलना चाहिए।
महाशिवरात्रि पर सुबह से लेकर रात्रि तक हर प्रहर में शिवजी की पूजा होती है।
तांबे या मिट्टी के लोटे में पानी या दूध लेकर ऊपर से बेलपत्र, आंकड़श, धतूरे के फूल, चावल आदि डालकर शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए।
शिव पुराण का पाठ और महामृत्युंजय मंत्र या शिव के पंचाक्षर मंत्र *•ॐ नमः शिवाय'* का जाप करना चाहिए।
महाशिवरात्रि के सन्ध्याकाल स्नान करने के पश्चात् ही पूजा करने और मन्दिर जाने का महत्व है।
अंत में निशीथ काल में विधि विधान से शिवजी की पूजा करना चाहिए।
रात्रि के चारों प्रहर की पूजा करना चाहते हैं तो ऊपर पूजा का समय दिया गया है।
महाशिवरात्रि व्रत
महाशिवरात्रि की पूजा का शुभ मुहूर्त, निशीथ काल
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*महाशिवरात्रि का त्योहार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस बार यह चतुर्दशी 8 मार्च 2024 शुक्रवार को रहेगी। आओ जानते हैं कि महाशिवरात्रि मनाने के क्या है शास्त्र सम्मत नियम। नियम से पूजा आरती या अनुष्ठान करेंगे तो शिवजी और मां पार्वती का आशीर्वाद मिलेगा।*
*चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ-* 08 मार्च 2024 को रात्रि 09:57 बजे
*चतुर्दशी तिथि समाप्त-* 09 मार्च 2024 को 06:17 बजे।
*निशीथ काल पूजा समय-* रात्रि (मार्च 09) 12:07 am से 12:56am.
*पूजा का शुभ मुहूर्त:-*
*अभिजीत मुहूर्त:-* दोपहर 12:08 से 12:56 तक।
*विजय मुहूर्त:-* दोपहर 02:30 से 03:17 तक।
*गोधूलि मुहूर्त:-* शाम 06:23 से 06:48 तक।
*सायाह्न सन्ध्या:-* शाम 06:25 से 07:39 तक।
*अमृत काल:-* रात्रि 10:43 से 12:08 तक।
*सर्वार्थ सिद्धि योग:-* सुबह 06:38 से 10:41 तक।
*निशिता मुहूर्त:-* रात्रि 12:07 से 12:56 तक।
*रात्रि पूजा के लिए चार प्रहर का समय:-*
*रात्रि प्रथम प्रहर पूजा समय-* शाम 06:25 से रात्रि 09:28 के बीच।
*रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा समय-* रात्रि 09:28 से 12:31 के बीच (09 मार्च)।
*रात्रि तृतीय प्रहर पूजा समय-* रात्रि (09 मार्च) 12:31 से 03:34 के बीच।
*रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा समय-* रात्रि (09 मार्च 03:34 से 06:37 के बीच।
*महाशिवरात्रि पूजा और व्रत के नियम:-*
जिस दिन चतुर्दशी निशीथव्यापिनी तो उसी दिन महाशिवरात्रि का पर्व मनाते हैं। क्योंकि महाशिवरात्रि की मुख्य पूजा निशीथ काल में होती है।
निशीथ काल हमेशा मध्यरात्रि में 12 बजे के आसपास ही रहता है।
रात्रि काल के आठवें मुहूर्त क निशीथ काल कहते हैं। यानी चतुर्तशी तिथि में आठवां मुहूर्त पड़ रहा हो तो उस दिन महाशिवरात्रि मनाने का शास्त्रोक्त नियम है।
8 मार्च को रात्रि को ही चतुर्दशी तिथि में निशीथकाल रहेगा इसलिए महाशिवरात्रि 8 मार्च को ही मनाई जाएगी। इसमें उदयातिथि का महत्व नहीं रहता है।
यदि चतुर्दशी तिथि दूसरे दिन निशीथकाल के पहले हिस्से को छुए और पहले दिन पूरे निशीथ को व्याप्त करे, तो पहले दिन ही महाशिवरात्रि मनाते हैं।
उपर्युक्त दो स्थितियों को छोड़कर बाकी अन्य स्थिति में व्रत अगले दिन ही रखा जाता है।
शिवरात्रि के एक दिन पहले यानी त्रयोदशी तिथि के दिन केवल एक समय ही भोजन ग्रहण करके व्रत प्रारंभ करना चाहिए।
अगले दिन यानी चतुर्दशी के दिन सुबह नित्य कर्म करने के पश्चात्, पूरे दिन के व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
व्रत के संकल्प के दौरान यदि आपकी कोई प्रतिज्ञा और मनोकामना है तो उसे दोहराना चाहिए।
निशीथकाल की पूजा के बाद अगले दिन ही व्रत खोलना चाहिए।
महाशिवरात्रि पर सुबह से लेकर रात्रि तक हर प्रहर में शिवजी की पूजा होती है।
तांबे या मिट्टी के लोटे में पानी या दूध लेकर ऊपर से बेलपत्र, आंकड़श, धतूरे के फूल, चावल आदि डालकर शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए।
शिव पुराण का पाठ और महामृत्युंजय मंत्र या शिव के पंचाक्षर मंत्र *•ॐ नमः शिवाय'* का जाप करना चाहिए।
महाशिवरात्रि के सन्ध्याकाल स्नान करने के पश्चात् ही पूजा करने और मन्दिर जाने का महत्व है।
अंत में निशीथ काल में विधि विधान से शिवजी की पूजा करना चाहिए।
रात्रि के चारों प्रहर की पूजा करना चाहते हैं तो ऊपर पूजा का समय दिया गया है।
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#सत्यनारायणाष्टकम्
आदिदेवं जगत्कारणं श्रीधरं लोकनाथं विभुं व्यापकं शङ्करम् ।
सर्वभक्तेष्टदं मुक्तिदं माधवं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे १
सर्वदा लोक-कल्याण-पारायणं देव-गो-विप्र-रक्षार्थ-सद्विग्रहम् ।
दीन-हीनात्म-भक्ताश्रयं सुन्दरं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे २
दक्षिणे यस्य गङ्गा शुभा शोभते राजते सा रमा यस्य वामे सदा ।
यः प्रसन्नाननो भाति भव्यश्च तं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे ३
सङ्कटे सङ्गरे यं जनः सर्वदा स्वात्मभीनाशनाय स्मरेत् पीडितः ।
पूर्णकृत्यो भवेद् यत्प्रसादाच्च तं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे ४
वाञ्छितं दुर्लभं यो ददाति प्रभुः साधवे स्वात्मभक्ताय भक्तिप्रियः ।
सर्वभूताश्रयं तं हि विश्वम्भरं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे ५
ब्राह्मणः साधु-वैश्यश्च तुङ्गध्वजो येऽभवन् विश्रुता यस्य भक्त्याऽमरा ।
लीलया यस्य विश्वं ततं तं विभुं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे ६
येन चाब्रह्मबालतृणं धार्यते सृज्यते पाल्यते सर्वमेतज्जगत् ।
भक्तभावप्रियं श्रीदयासागरं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे ७
सर्वकामप्रदं सर्वदा सत्प्रियं वन्दितं देववृन्दैर्मुनीन्द्रार्चितम् ।
पुत्र-पौत्रादि-सर्वेष्टदं शाश्वतं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे ८
अष्टकं सत्यदेवस्य भक्त्या नरः भावयुक्तो मुदा यस्त्रिसन्ध्यं पठेत् ।
तस्य नश्यन्ति पापानि तेनाऽग्निना इन्धनानीव शुष्काणि सर्वाणि वै ९
इति सत्यनारायणाष्टकं सम्पूर्णम् ।
आदिदेवं जगत्कारणं श्रीधरं लोकनाथं विभुं व्यापकं शङ्करम् ।
सर्वभक्तेष्टदं मुक्तिदं माधवं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे १
सर्वदा लोक-कल्याण-पारायणं देव-गो-विप्र-रक्षार्थ-सद्विग्रहम् ।
दीन-हीनात्म-भक्ताश्रयं सुन्दरं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे २
दक्षिणे यस्य गङ्गा शुभा शोभते राजते सा रमा यस्य वामे सदा ।
यः प्रसन्नाननो भाति भव्यश्च तं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे ३
सङ्कटे सङ्गरे यं जनः सर्वदा स्वात्मभीनाशनाय स्मरेत् पीडितः ।
पूर्णकृत्यो भवेद् यत्प्रसादाच्च तं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे ४
वाञ्छितं दुर्लभं यो ददाति प्रभुः साधवे स्वात्मभक्ताय भक्तिप्रियः ।
सर्वभूताश्रयं तं हि विश्वम्भरं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे ५
ब्राह्मणः साधु-वैश्यश्च तुङ्गध्वजो येऽभवन् विश्रुता यस्य भक्त्याऽमरा ।
लीलया यस्य विश्वं ततं तं विभुं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे ६
येन चाब्रह्मबालतृणं धार्यते सृज्यते पाल्यते सर्वमेतज्जगत् ।
भक्तभावप्रियं श्रीदयासागरं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे ७
सर्वकामप्रदं सर्वदा सत्प्रियं वन्दितं देववृन्दैर्मुनीन्द्रार्चितम् ।
पुत्र-पौत्रादि-सर्वेष्टदं शाश्वतं सत्यनारायणं विष्णुमीशं भजे ८
अष्टकं सत्यदेवस्य भक्त्या नरः भावयुक्तो मुदा यस्त्रिसन्ध्यं पठेत् ।
तस्य नश्यन्ति पापानि तेनाऽग्निना इन्धनानीव शुष्काणि सर्वाणि वै ९
इति सत्यनारायणाष्टकं सम्पूर्णम् ।
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परम-शान्त-स्वरूपाय, सोहं-तेजोरूपाय, हंस-तेजोमयाय,
सच्चिदेकं ब्रह्म महा-मन्त्र-स्वरुपाय,
श्रीं ह्रीं क्लीं नमो भगवते विश्व-गुरवे, स्मरण-मात्र-
सन्तुष्टाय, महा-ज्ञान-प्रदाय, सच्चिदानन्दात्मने महा-
योगिने सर्व-काम-फल-प्रदाय, भव-बन्ध-प्रमोचनाय,
क्रों सकल-विभूतिदाय, क्रीं सर्व-विश्वाकर्षणाय ।
जय जय रुद्र, महा-रौद्र, वीर-भद्रावतार, महा-भैरव, काल-
भैरव, कल्पान्त-भैरव, कपाल-माला-धर, खट्वाङ्ग-खङ्ग-
चर्म-पाशाङ्कुश-डमरु-शूल-चाप-बाण-गदा-शक्ति-भिन्दिपाल-
तोमर-मुसल-मुद्-गर-पाश-परिघ-भुशुण्डी-शतघ्नी-ब्रह्मास्त्र-
पाशुपतास्त्रादि-महास्त्र-चक्रायुधाय ।
भीषण-कर-सहस्र-मुख-दंष्ट्रा-कराल-वदन-विकटाट्ट-हास-
विस्फारित ब्रह्माण्ड-मंडल नागेन्द्र-कुण्डल नागेन्द्र-हार
नागेन्द्र-वलय नागेन्द्र-चर्म-धर मृत्युञ्जय त्र्यम्बक
त्रिपुरान्तक विश्व-रूप विरूपाक्ष विश्वम्भर विश्वेश्वर वृषभ-
वाहन वृष-विभूषण, विश्वतोमुख ! सर्वतो रक्ष रक्ष, ज्वल
ज्वल प्रज्वल प्रज्वल स्फुर स्फुर आवेशय आवेशय, मम
हृदये प्रवेशय प्रवेशय, प्रस्फुर प्रस्फुर।
महा-मृत्युमप-मृत्यु-भयं नाशय-नाशय, चोर-भय-
मुत्सादयोत्सादय, विष-सर्प-भयं शमय शमय, चोरान् मारय
मारय, मम शत्रुनुच्चाट्योच्चाटय, मम क्रोधादि-सर्व-सूक्ष्म-
तमात् स्थूल-तम-पर्यन्त-स्थितान् शत्रूनुच्चाटय, त्रिशूलेन
विदारय विदारय, कुठारेण भिन्धि भिन्धि, खड्गेन
छिन्धि छिन्धि, खट्वांगेन विपोथय विपोथय, मुसलेन निष्पेषय
निष्पेषय, वाणैः सन्ताडय सन्ताडय, रक्षांसि भीषय भीषय,
अशेष-भूतानि विद्रावय विद्रावय, कूष्माण्ड-वेताल-मारीच-
गण-ब्रह्म-राक्षस-गणान् संत्रासय संत्रासय, सर्व-रोगादि-
महा-भयान्ममाभयं कुरु कुरु, वित्रस्तं मामाश्वासयाश्वासय,
नरक-महा-भयान्मामुद्धरोद्धर, सञ्जीवय सञ्जीवय, क्षुत्-
तृषा-ईर्ष्यादि-विकारेभ्यो मामाप्याययाप्यायय दुःखातुरं
मामानन्दयानन्दय शिवकवचेन मामाच्छादयाच्छादय।
मृत्युञ्जय त्र्यंबक सदाशिव ! नमस्ते नमस्ते, शं ह्रीं ॐ
ह्रों। ॐ अघोरेभ्यो थघोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सवेॅभ्यःसवॅ सवेॅभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्र रूपेभ्यः।
*जय शिव ओंकारा *
सच्चिदेकं ब्रह्म महा-मन्त्र-स्वरुपाय,
श्रीं ह्रीं क्लीं नमो भगवते विश्व-गुरवे, स्मरण-मात्र-
सन्तुष्टाय, महा-ज्ञान-प्रदाय, सच्चिदानन्दात्मने महा-
योगिने सर्व-काम-फल-प्रदाय, भव-बन्ध-प्रमोचनाय,
क्रों सकल-विभूतिदाय, क्रीं सर्व-विश्वाकर्षणाय ।
जय जय रुद्र, महा-रौद्र, वीर-भद्रावतार, महा-भैरव, काल-
भैरव, कल्पान्त-भैरव, कपाल-माला-धर, खट्वाङ्ग-खङ्ग-
चर्म-पाशाङ्कुश-डमरु-शूल-चाप-बाण-गदा-शक्ति-भिन्दिपाल-
तोमर-मुसल-मुद्-गर-पाश-परिघ-भुशुण्डी-शतघ्नी-ब्रह्मास्त्र-
पाशुपतास्त्रादि-महास्त्र-चक्रायुधाय ।
भीषण-कर-सहस्र-मुख-दंष्ट्रा-कराल-वदन-विकटाट्ट-हास-
विस्फारित ब्रह्माण्ड-मंडल नागेन्द्र-कुण्डल नागेन्द्र-हार
नागेन्द्र-वलय नागेन्द्र-चर्म-धर मृत्युञ्जय त्र्यम्बक
त्रिपुरान्तक विश्व-रूप विरूपाक्ष विश्वम्भर विश्वेश्वर वृषभ-
वाहन वृष-विभूषण, विश्वतोमुख ! सर्वतो रक्ष रक्ष, ज्वल
ज्वल प्रज्वल प्रज्वल स्फुर स्फुर आवेशय आवेशय, मम
हृदये प्रवेशय प्रवेशय, प्रस्फुर प्रस्फुर।
महा-मृत्युमप-मृत्यु-भयं नाशय-नाशय, चोर-भय-
मुत्सादयोत्सादय, विष-सर्प-भयं शमय शमय, चोरान् मारय
मारय, मम शत्रुनुच्चाट्योच्चाटय, मम क्रोधादि-सर्व-सूक्ष्म-
तमात् स्थूल-तम-पर्यन्त-स्थितान् शत्रूनुच्चाटय, त्रिशूलेन
विदारय विदारय, कुठारेण भिन्धि भिन्धि, खड्गेन
छिन्धि छिन्धि, खट्वांगेन विपोथय विपोथय, मुसलेन निष्पेषय
निष्पेषय, वाणैः सन्ताडय सन्ताडय, रक्षांसि भीषय भीषय,
अशेष-भूतानि विद्रावय विद्रावय, कूष्माण्ड-वेताल-मारीच-
गण-ब्रह्म-राक्षस-गणान् संत्रासय संत्रासय, सर्व-रोगादि-
महा-भयान्ममाभयं कुरु कुरु, वित्रस्तं मामाश्वासयाश्वासय,
नरक-महा-भयान्मामुद्धरोद्धर, सञ्जीवय सञ्जीवय, क्षुत्-
तृषा-ईर्ष्यादि-विकारेभ्यो मामाप्याययाप्यायय दुःखातुरं
मामानन्दयानन्दय शिवकवचेन मामाच्छादयाच्छादय।
मृत्युञ्जय त्र्यंबक सदाशिव ! नमस्ते नमस्ते, शं ह्रीं ॐ
ह्रों। ॐ अघोरेभ्यो थघोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सवेॅभ्यःसवॅ सवेॅभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्र रूपेभ्यः।
*जय शिव ओंकारा *
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*शिव कवचम् :
अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्।।
अर्थात्:
जो भगवान् शंकर संतजनों को मोक्ष प्रदान करने के लिए अवन्तिकापुरी उज्जैन में अवतार धारण किए हैं, अकाल मृत्यु से बचने के लिए उन देवों के भी देव महाकाल नाम से विख्यात महादेव जी को मैं नमस्कार करता हूँ । नमस्कार करता हूँ ।
।। अमोघ शिव कवच ।।
शिव कवच अत्यंत दुर्लभ परन्तु चमत्कारिक है, इसका प्रभाव अमोघ है। बड़ी से बड़ी मुसीबतों को समाप्त करने में सिद्धहस्त यह शिव कवच परम-कल्याणकारी है।
अथः विनियोग:
अस्य श्री शिव कवच स्त्रोत्र मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषि:, अनुष्टुप छंद:, श्री सदाशिव रुद्रो देवता, ह्रीं शक्ति:, रं कीलकम, श्रीं ह्रीं क्लीं बीजं, श्री सदाशिव प्रीत्यर्थे शिवकवच स्त्रोत्र जपे विनियोग:।
अथः न्यास: ( पहले सभी मंत्रो को बोलकर क्रम से करन्यास करे , तदुपरांत इन्ही मंत्रो से अंगन्यास करे )
अथः करन्यास:
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
ह्रां सर्वशक्तिधाम्ने इशानात्मने अन्गुष्ठाभ्याम नम:।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
नं रिं नित्यतृप्तिधाम्ने तत्पुरुषातमने तर्जनीभ्याम नम:।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
मं रूं अनादिशक्तिधाम्ने अधोरात्मने मध्यमाभ्याम नम:।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
शिं रैं स्वतंत्रशक्तिधाम्ने वामदेवात्मने अनामिकाभ्याम नम:।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
वां रौं अलुप्तशक्तिधाम्ने सद्योजातात्मने कनिष्ठिकाभ्याम नम:।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
यं र: अनादिशक्तिधाम्ने सर्वात्मने करतल करपृष्ठाभ्याम नम:।
अथः अंगन्यास:
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
ह्रां सर्वशक्तिधाम्ने इशानात्मने हृदयाय नम:।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
नं रिं नित्यतृप्तिधाम्ने तत्पुरुषातमने शिरसे स्वाहा।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
मं रूं अनादिशक्तिधाम्ने अधोरात्मने शिखायै वषट।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
शिं रैं स्वतंत्रशक्तिधाम्ने वामदेवात्मने नेत्रत्रयाय वौषट।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
वां रौं अलुप्तशक्तिधाम्ने सद्योजातात्मने कवचाय हुम।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
यं र: अनादिशक्तिधाम्ने सर्वात्मने अस्त्राय फट।
अथ दिग्बन्धन:
ॐ भूर्भुव: स्व:।
ध्यानम् :
कर्पुरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि।।
श्री शिव कवचम् :
ॐ नमो भगवते सदा-शिवाय। त्र्यम्बक सदा-शिव।
नमस्ते-नमस्ते। ॐ ह्रीं ह्लीं लूं अः एं ऐं महा-घोरेशाय नमः।
ह्रीं ॐ ह्रौं शं नमो भगवते सदा-शिवाय।
सकल-तत्त्वात्मकाय, आनन्द-सन्दोहाय, सर्व-मन्त्र-
स्वरूपाय, सर्व-यंत्राधिष्ठिताय, सर्व-तंत्र-प्रेरकाय, सर्व-
तत्त्व-विदूराय,सर्-तत्त्वाधिष्ठिताय, ब्रह्म-रुद्रावतारिणे,
नील-कण्ठाय, पार्वती-मनोहर-प्रियाय, महा-रुद्राय, सोम-
सूर्याग्नि-लोचनाय, भस्मोद्-धूलित-विग्रहाय, अष्ट-गन्धादि-
गन्धोप-शोभिताय, शेषाधिप-मुकुट-भूषिताय, महा-मणि-मुकुट-
धारणाय, सर्पालंकाराय, माणिक्य-भूषणाय, सृष्टि-स्थिति-
प्रलय-काल-रौद्रावताराय, दक्षाध्वर-ध्वंसकाय, महा-काल-
भेदनाय, महा-कालाधि-कालोग्र-रुपाय, मूलाधारैक-निलयाय ।
तत्त्वातीताय, गंगा-धराय, महा-प्रपात-विष-भेदनाय, महा-
प्रलयान्त-नृत्याधिष्ठिताय, सर्व-देवाधि-देवाय, षडाश्रयाय,
सकल-वेदान्त-साराय, त्रि-वर्ग-साधनायानन्त-कोटि-
ब्रह्माण्ड-नायकायानन्त-वासुकि-तक्षक-कर्कोट-शङ्ख-
कुलिक-पद्म-महा-पद्मेत्यष्ट-महा-नाग-कुल-भूषणाय, प्रणव-
स्वरूपाय । ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः, हां हीं हूं हैं हौं हः ।
चिदाकाशायाकाश-दिक्स्वरूपाय, ग्रह-नक्षत्रादि-सर्व-
प्रपञ्च-मालिने, सकलाय, कलङ्क-रहिताय, सकल-लोकैक-
कर्त्रे, सकल-लोकैक-भर्त्रे, सकल-लोकैक-संहर्त्रे, सकल-
लोकैक-गुरवे, सकल-लोकैक-साक्षिणे, सकल-निगम-गुह्याय,
सकल-वेदान्त-पारगाय, सकल-लोकैक-वर-प्रदाय, सकल-
लोकैक-सर्वदाय, शर्मदाय, सकल-लोकैक-शंकराय ।
शशाङ्क-शेखराय, शाश्वत-निजावासाय, निराभासाय,
निराभयाय, निर्मलाय, निर्लोभाय, निर्मदाय, निश्चिन्ताय,
निरहङ्काराय, निरंकुशाय, निष्कलंकाय, निर्गुणाय,
निष्कामाय, निरुपप्लवाय, निरवद्याय, निरन्तराय,
निष्कारणाय, निरातङ्काय, निष्प्रपंचाय, निःसङ्गाय,
निर्द्वन्द्वाय, निराधाराय, नीरागाय, निष्क्रोधाय, निर्मलाय,
निष्पापाय, निर्भयाय, निर्विकल्पाय, निर्भेदाय, निष्क्रियाय,
निस्तुलाय, निःसंशयाय, निरञ्जनाय, निरुपम-विभवाय, नित्य-
शुद्ध-बुद्धि-परिपूर्ण-सच्चिदानन्दाद्वयाय, ॐ हसौं ॐ
हसौः ह्रीम सौं क्षमलक्लीं क्षमलइस्फ्रिं ऐं
क्लीं सौः क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः ।
अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्।।
अर्थात्:
जो भगवान् शंकर संतजनों को मोक्ष प्रदान करने के लिए अवन्तिकापुरी उज्जैन में अवतार धारण किए हैं, अकाल मृत्यु से बचने के लिए उन देवों के भी देव महाकाल नाम से विख्यात महादेव जी को मैं नमस्कार करता हूँ । नमस्कार करता हूँ ।
।। अमोघ शिव कवच ।।
शिव कवच अत्यंत दुर्लभ परन्तु चमत्कारिक है, इसका प्रभाव अमोघ है। बड़ी से बड़ी मुसीबतों को समाप्त करने में सिद्धहस्त यह शिव कवच परम-कल्याणकारी है।
अथः विनियोग:
अस्य श्री शिव कवच स्त्रोत्र मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषि:, अनुष्टुप छंद:, श्री सदाशिव रुद्रो देवता, ह्रीं शक्ति:, रं कीलकम, श्रीं ह्रीं क्लीं बीजं, श्री सदाशिव प्रीत्यर्थे शिवकवच स्त्रोत्र जपे विनियोग:।
अथः न्यास: ( पहले सभी मंत्रो को बोलकर क्रम से करन्यास करे , तदुपरांत इन्ही मंत्रो से अंगन्यास करे )
अथः करन्यास:
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
ह्रां सर्वशक्तिधाम्ने इशानात्मने अन्गुष्ठाभ्याम नम:।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
नं रिं नित्यतृप्तिधाम्ने तत्पुरुषातमने तर्जनीभ्याम नम:।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
मं रूं अनादिशक्तिधाम्ने अधोरात्मने मध्यमाभ्याम नम:।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
शिं रैं स्वतंत्रशक्तिधाम्ने वामदेवात्मने अनामिकाभ्याम नम:।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
वां रौं अलुप्तशक्तिधाम्ने सद्योजातात्मने कनिष्ठिकाभ्याम नम:।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
यं र: अनादिशक्तिधाम्ने सर्वात्मने करतल करपृष्ठाभ्याम नम:।
अथः अंगन्यास:
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
ह्रां सर्वशक्तिधाम्ने इशानात्मने हृदयाय नम:।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
नं रिं नित्यतृप्तिधाम्ने तत्पुरुषातमने शिरसे स्वाहा।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
मं रूं अनादिशक्तिधाम्ने अधोरात्मने शिखायै वषट।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
शिं रैं स्वतंत्रशक्तिधाम्ने वामदेवात्मने नेत्रत्रयाय वौषट।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
वां रौं अलुप्तशक्तिधाम्ने सद्योजातात्मने कवचाय हुम।
ॐ नमो भगवते ज्वलज्वालामालिने ॐ
यं र: अनादिशक्तिधाम्ने सर्वात्मने अस्त्राय फट।
अथ दिग्बन्धन:
ॐ भूर्भुव: स्व:।
ध्यानम् :
कर्पुरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि।।
श्री शिव कवचम् :
ॐ नमो भगवते सदा-शिवाय। त्र्यम्बक सदा-शिव।
नमस्ते-नमस्ते। ॐ ह्रीं ह्लीं लूं अः एं ऐं महा-घोरेशाय नमः।
ह्रीं ॐ ह्रौं शं नमो भगवते सदा-शिवाय।
सकल-तत्त्वात्मकाय, आनन्द-सन्दोहाय, सर्व-मन्त्र-
स्वरूपाय, सर्व-यंत्राधिष्ठिताय, सर्व-तंत्र-प्रेरकाय, सर्व-
तत्त्व-विदूराय,सर्-तत्त्वाधिष्ठिताय, ब्रह्म-रुद्रावतारिणे,
नील-कण्ठाय, पार्वती-मनोहर-प्रियाय, महा-रुद्राय, सोम-
सूर्याग्नि-लोचनाय, भस्मोद्-धूलित-विग्रहाय, अष्ट-गन्धादि-
गन्धोप-शोभिताय, शेषाधिप-मुकुट-भूषिताय, महा-मणि-मुकुट-
धारणाय, सर्पालंकाराय, माणिक्य-भूषणाय, सृष्टि-स्थिति-
प्रलय-काल-रौद्रावताराय, दक्षाध्वर-ध्वंसकाय, महा-काल-
भेदनाय, महा-कालाधि-कालोग्र-रुपाय, मूलाधारैक-निलयाय ।
तत्त्वातीताय, गंगा-धराय, महा-प्रपात-विष-भेदनाय, महा-
प्रलयान्त-नृत्याधिष्ठिताय, सर्व-देवाधि-देवाय, षडाश्रयाय,
सकल-वेदान्त-साराय, त्रि-वर्ग-साधनायानन्त-कोटि-
ब्रह्माण्ड-नायकायानन्त-वासुकि-तक्षक-कर्कोट-शङ्ख-
कुलिक-पद्म-महा-पद्मेत्यष्ट-महा-नाग-कुल-भूषणाय, प्रणव-
स्वरूपाय । ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः, हां हीं हूं हैं हौं हः ।
चिदाकाशायाकाश-दिक्स्वरूपाय, ग्रह-नक्षत्रादि-सर्व-
प्रपञ्च-मालिने, सकलाय, कलङ्क-रहिताय, सकल-लोकैक-
कर्त्रे, सकल-लोकैक-भर्त्रे, सकल-लोकैक-संहर्त्रे, सकल-
लोकैक-गुरवे, सकल-लोकैक-साक्षिणे, सकल-निगम-गुह्याय,
सकल-वेदान्त-पारगाय, सकल-लोकैक-वर-प्रदाय, सकल-
लोकैक-सर्वदाय, शर्मदाय, सकल-लोकैक-शंकराय ।
शशाङ्क-शेखराय, शाश्वत-निजावासाय, निराभासाय,
निराभयाय, निर्मलाय, निर्लोभाय, निर्मदाय, निश्चिन्ताय,
निरहङ्काराय, निरंकुशाय, निष्कलंकाय, निर्गुणाय,
निष्कामाय, निरुपप्लवाय, निरवद्याय, निरन्तराय,
निष्कारणाय, निरातङ्काय, निष्प्रपंचाय, निःसङ्गाय,
निर्द्वन्द्वाय, निराधाराय, नीरागाय, निष्क्रोधाय, निर्मलाय,
निष्पापाय, निर्भयाय, निर्विकल्पाय, निर्भेदाय, निष्क्रियाय,
निस्तुलाय, निःसंशयाय, निरञ्जनाय, निरुपम-विभवाय, नित्य-
शुद्ध-बुद्धि-परिपूर्ण-सच्चिदानन्दाद्वयाय, ॐ हसौं ॐ
हसौः ह्रीम सौं क्षमलक्लीं क्षमलइस्फ्रिं ऐं
क्लीं सौः क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः ।
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ॐ शं शनैश्चराय नम:
प्रात: नमन 🙇🏻♂️ स्नेह वंदन
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥
कहत पुष्कर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥
भावार्थ: शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष को जल देता है व दिया जलाता है उसे बहुत सुख मिलता है।
प्रभु शनिदेव का दास पुष्कर भी कहता है कि भगवान शनि के सुमिरन सुख की प्राप्ति होती है व अज्ञानता का अंधेरा मिटकर ज्ञान का प्रकाश होने लगता है।।
🌻शुभ सूर्योदय 🌞 शुभ शनिवार 🌻
प्रात: नमन 🙇🏻♂️ स्नेह वंदन
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥
कहत पुष्कर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥
भावार्थ: शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष को जल देता है व दिया जलाता है उसे बहुत सुख मिलता है।
प्रभु शनिदेव का दास पुष्कर भी कहता है कि भगवान शनि के सुमिरन सुख की प्राप्ति होती है व अज्ञानता का अंधेरा मिटकर ज्ञान का प्रकाश होने लगता है।।
🌻शुभ सूर्योदय 🌞 शुभ शनिवार 🌻
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कहानी का समय
*एक प्रश्न जिसके उत्तर देने में ८ पीढ़ियाँ असफल रही और आखिर क्या था सही जवाब कक्षीवान एवं प्रियमेघ की कथा:---*
पौराणिक काल में एक विद्वान ऋषि कक्षीवान हुए जो हर प्रकार के शास्त्र और वेद में निपुर्ण थे। एक बार वे ऋषि प्रियमेध से मिलने गए जो उनके सामान ही विद्वान और सभी शास्त्रों के ज्ञाता थे। दोनों सहपाठी भी थे और जब भी वे दोनों मिलते तो दोनों के बीच एक लम्बा शास्त्रार्थ होता था जिसमे कभी कक्षीवान तो कभी प्रियमेघ विजय होते थे।
उस दिन भी ऋषि कक्षीवान ने प्रियमेध से शास्त्रार्थ में एक प्रश्न पूछा कि ऐसी कौन सी चीज है जिसे यदि जलाये तो उस से ताप तो उत्पन्न हो किन्तु तनिक भी प्रकाश ना फैले?
प्रियमेध ने बहुत सोच-विचार किया परन्तु वे इस पहेली के उत्तर दे पाने असमर्थ रहे। उन्होंने उसका उत्तर बाद में देने की बात कही पर उत्तर ढूढ़ने के उधेड़बुन में उनकी जिंदगी बीत गयी। चाहे कैसा भी पदार्थ हो पर जलाने पर वो थोड़ा प्रकाश तो करता ही है।
जब प्रियमेध ऋषि का अंत समय नजदीक आया तो उन्होंने कक्षीवान ऋषि को संदेश भेजा की मैं आपकी पहेली का उत्तर ढूंढ पाने में असमर्थ रहा किन्तु मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे वंश में ऐसा विद्वान जरूर जन्म लेगा जो आपके इस प्रश्न का उत्तर दे पायेगा। किन्तु तुम मुझे वचन दो कि जब तक कोई मेरे कुल का विद्वान तुम्हारे प्रश्न का उत्तर ना दे दे, तुम इस पृथ्वी को छोड़ कर नहीं जाओगे।
ऐसा कहकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। कक्षीवान को उनकी मृत्यु का बड़ा दुःख हुआ किन्तु उससे भी अधिक दुःख उन्हें इस बात का हुआ कि उनके प्रश्न के कारण प्रियमेघ ने असंतोष में प्राण त्यागे।
प्रियमेघ की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र ने इस प्रश्न के उत्तर का दायित्व लिया किन्तु वो भी वह इस प्रश्न का उत्तर ढूढ़ पाने में असमर्थ रहा और एक दिन उसकी भी मृत्यु हो गयी। इसी प्रकार एक के बाद एक प्रियमेघ की आठ पीढ़ियाँ कक्षीवान के उस प्रश्न के उत्तर को ढूढ़ने के प्रयास में काल के गाल में समा गयीं।
कक्षीवान अपने पहेली का हल पाने के लिए जिन्दा रहे। कक्षीवान को वरदान स्वरुप देवराज इंद्र से एक थैली मिली थी जो नेवले के चमड़े से बनी थी। उसमे चावल के दानें भरे थे और उन्हें वरदान था कि जब तक चावल के दानें समाप्त ना हो जाएँ, वे जीवित रहेंगे।
प्रत्येक वर्ष वे उसमे से एक दाना निकालकर फेक देते थे और अपने प्रश्न के उत्तर के लिए जिए जा रहे थे।
प्रियमेघ की नवीं पीढ़ी में साकमश्व नाम का बालक पैदा हुआ जो बचपन से ही बहुत विद्वान था। बालपन में ही उसने असंख्य शास्त्राथों में भाग लिया था और सदैव विजय रहा था। साकमश्व जब बड़ा हुआ तो उसे एक बात चुभने लगी की एक पहेली का उत्तर उसकी पूरी ८ पीढ़िया देने में असमर्थ रही हैं और ऋषि कक्षीवान अपने प्रश्न का उत्तर पाने के लिए ही जीवित हैं।
उसने निश्चय किया की वह इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ कर अपने परिवार के कलंक को मिटाएगा और ऋषि कक्षीवान को इस जीवन चक्र से मुक्त करवाएगा। एक दिन वो इस प्रश्न के विषय में सोच रहा था कि उसे सामवेद का एक श्लोक याद आया और वो भाव-विभोर होकर उसे मधुर स्वर में गाने लगा। इसी के साथ ही उसे अपने प्रश्न का उत्तर भी मिल गया।
वह तुरंत कक्षीवान के आश्रम की ओर भागा और वहाँ पहुँच कर उन्हें प्रणाम किया। कक्षीवान उसे देखते ही जान गए की उन्हें आज उनके प्रश्न का उत्तर मिल जायेगा। साकमश्व ने कहा कि हे गुरुदेव, जो मनुष्य ऋग्वेद की ऋचा के बाद सामवेद का साम का भी गायन करता हो वो गायन उस अग्नि के सामान होता है जिससे ताप भी उत्पन्न होता है और प्रकाश भी।
किन्तु जो मनुष्य केवल ऋग्वेद की ऋचा गाता है, सामवेद का साम नही, वह गायन साक्षात अग्नि के समान ही है किन्तु ये वो अग्नि है जिससे ताप तो उत्पन्न होता है किन्तु प्रकाश नहीं।
साकमश्व का उत्तर सुनकर कक्षीवान की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने भरे स्वर में कहा कि "हे पुत्र! तुम धन्य हो। मेरे द्वारा अनजाने में पूछे गए एक प्रश्न ने मेरे प्रिय मित्र प्रियमेघ को मुझसे छीन लिया। ये नहीं, उसकी अनेक पीढ़ियों को भी मैं अपने सामने काल के गाल में समाते देखता रहा।
किन्तु आज तुमने इस प्रश्न का उत्तर देकर ना केवल अपने पूर्वजों का कल्याण किया बल्कि मुझे भी इस जीवन रूपी चक्र से मुक्त कर दिया।" ऐसा कह कर उन्होंने साकमश्व को अपनी थैली दी और कहा कि वो बचे हुए चावल के दाने बिखरा दे ताकि वे परलोक गमन कर सकें।
उनकी आज्ञा पाकर साकमश्व ने सारे चावल के दानों को पृथ्वी पर फेंक दिया और फिर कक्षीवान ने अपने शरीर का त्याग कर दिया।
*एक प्रश्न जिसके उत्तर देने में ८ पीढ़ियाँ असफल रही और आखिर क्या था सही जवाब कक्षीवान एवं प्रियमेघ की कथा:---*
पौराणिक काल में एक विद्वान ऋषि कक्षीवान हुए जो हर प्रकार के शास्त्र और वेद में निपुर्ण थे। एक बार वे ऋषि प्रियमेध से मिलने गए जो उनके सामान ही विद्वान और सभी शास्त्रों के ज्ञाता थे। दोनों सहपाठी भी थे और जब भी वे दोनों मिलते तो दोनों के बीच एक लम्बा शास्त्रार्थ होता था जिसमे कभी कक्षीवान तो कभी प्रियमेघ विजय होते थे।
उस दिन भी ऋषि कक्षीवान ने प्रियमेध से शास्त्रार्थ में एक प्रश्न पूछा कि ऐसी कौन सी चीज है जिसे यदि जलाये तो उस से ताप तो उत्पन्न हो किन्तु तनिक भी प्रकाश ना फैले?
प्रियमेध ने बहुत सोच-विचार किया परन्तु वे इस पहेली के उत्तर दे पाने असमर्थ रहे। उन्होंने उसका उत्तर बाद में देने की बात कही पर उत्तर ढूढ़ने के उधेड़बुन में उनकी जिंदगी बीत गयी। चाहे कैसा भी पदार्थ हो पर जलाने पर वो थोड़ा प्रकाश तो करता ही है।
जब प्रियमेध ऋषि का अंत समय नजदीक आया तो उन्होंने कक्षीवान ऋषि को संदेश भेजा की मैं आपकी पहेली का उत्तर ढूंढ पाने में असमर्थ रहा किन्तु मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे वंश में ऐसा विद्वान जरूर जन्म लेगा जो आपके इस प्रश्न का उत्तर दे पायेगा। किन्तु तुम मुझे वचन दो कि जब तक कोई मेरे कुल का विद्वान तुम्हारे प्रश्न का उत्तर ना दे दे, तुम इस पृथ्वी को छोड़ कर नहीं जाओगे।
ऐसा कहकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। कक्षीवान को उनकी मृत्यु का बड़ा दुःख हुआ किन्तु उससे भी अधिक दुःख उन्हें इस बात का हुआ कि उनके प्रश्न के कारण प्रियमेघ ने असंतोष में प्राण त्यागे।
प्रियमेघ की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र ने इस प्रश्न के उत्तर का दायित्व लिया किन्तु वो भी वह इस प्रश्न का उत्तर ढूढ़ पाने में असमर्थ रहा और एक दिन उसकी भी मृत्यु हो गयी। इसी प्रकार एक के बाद एक प्रियमेघ की आठ पीढ़ियाँ कक्षीवान के उस प्रश्न के उत्तर को ढूढ़ने के प्रयास में काल के गाल में समा गयीं।
कक्षीवान अपने पहेली का हल पाने के लिए जिन्दा रहे। कक्षीवान को वरदान स्वरुप देवराज इंद्र से एक थैली मिली थी जो नेवले के चमड़े से बनी थी। उसमे चावल के दानें भरे थे और उन्हें वरदान था कि जब तक चावल के दानें समाप्त ना हो जाएँ, वे जीवित रहेंगे।
प्रत्येक वर्ष वे उसमे से एक दाना निकालकर फेक देते थे और अपने प्रश्न के उत्तर के लिए जिए जा रहे थे।
प्रियमेघ की नवीं पीढ़ी में साकमश्व नाम का बालक पैदा हुआ जो बचपन से ही बहुत विद्वान था। बालपन में ही उसने असंख्य शास्त्राथों में भाग लिया था और सदैव विजय रहा था। साकमश्व जब बड़ा हुआ तो उसे एक बात चुभने लगी की एक पहेली का उत्तर उसकी पूरी ८ पीढ़िया देने में असमर्थ रही हैं और ऋषि कक्षीवान अपने प्रश्न का उत्तर पाने के लिए ही जीवित हैं।
उसने निश्चय किया की वह इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ कर अपने परिवार के कलंक को मिटाएगा और ऋषि कक्षीवान को इस जीवन चक्र से मुक्त करवाएगा। एक दिन वो इस प्रश्न के विषय में सोच रहा था कि उसे सामवेद का एक श्लोक याद आया और वो भाव-विभोर होकर उसे मधुर स्वर में गाने लगा। इसी के साथ ही उसे अपने प्रश्न का उत्तर भी मिल गया।
वह तुरंत कक्षीवान के आश्रम की ओर भागा और वहाँ पहुँच कर उन्हें प्रणाम किया। कक्षीवान उसे देखते ही जान गए की उन्हें आज उनके प्रश्न का उत्तर मिल जायेगा। साकमश्व ने कहा कि हे गुरुदेव, जो मनुष्य ऋग्वेद की ऋचा के बाद सामवेद का साम का भी गायन करता हो वो गायन उस अग्नि के सामान होता है जिससे ताप भी उत्पन्न होता है और प्रकाश भी।
किन्तु जो मनुष्य केवल ऋग्वेद की ऋचा गाता है, सामवेद का साम नही, वह गायन साक्षात अग्नि के समान ही है किन्तु ये वो अग्नि है जिससे ताप तो उत्पन्न होता है किन्तु प्रकाश नहीं।
साकमश्व का उत्तर सुनकर कक्षीवान की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने भरे स्वर में कहा कि "हे पुत्र! तुम धन्य हो। मेरे द्वारा अनजाने में पूछे गए एक प्रश्न ने मेरे प्रिय मित्र प्रियमेघ को मुझसे छीन लिया। ये नहीं, उसकी अनेक पीढ़ियों को भी मैं अपने सामने काल के गाल में समाते देखता रहा।
किन्तु आज तुमने इस प्रश्न का उत्तर देकर ना केवल अपने पूर्वजों का कल्याण किया बल्कि मुझे भी इस जीवन रूपी चक्र से मुक्त कर दिया।" ऐसा कह कर उन्होंने साकमश्व को अपनी थैली दी और कहा कि वो बचे हुए चावल के दाने बिखरा दे ताकि वे परलोक गमन कर सकें।
उनकी आज्ञा पाकर साकमश्व ने सारे चावल के दानों को पृथ्वी पर फेंक दिया और फिर कक्षीवान ने अपने शरीर का त्याग कर दिया।
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अनन्य भक्ति के साधन
1.प्रार्थना -
प्रातः काल आँख खुलने पर "कर दर्शन करते हुए भगवान की प्रार्थना करना चाहिए---
कराग्रे वसते लक्ष्मी ,करमूले सरस्वती ।
करमध्ये तु गोविन्दः ,प्रभाते कर दर्शनम् ।।
मेरे हाथ के अग्रभाग में भगवती लक्ष्मी का निवास है। मध्य भाग में विद्यादात्री सरस्वती और मूल भाग में भगवान विष्णु का निवास है। अतः प्रभातकाल में मैं इनका दर्शन करता हूं। इस श्लोक में धन की देवी लक्ष्मी, विद्या की देवी सरस्वती और अपार शक्ति के दाता, सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु की स्तुति की गई है, ताकि जीवन में धन, विद्या और भगवत कृपा की प्राप्ति हो सके।
हथेलियों के दर्शन का मूल भाव यही है कि हम अपने कर्म पर विश्वास करें। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि ऐसे कर्म करें जिससे जीवन में धन, सुख और ज्ञान प्राप्त कर सकें। हमारे हाथों से कोई बुरा काम न हो एवं दूसरों की मदद के लिए हमेशा हाथ आगे बढ़ें।
कर दर्शन का दूसरा पहलू यह भी है कि हमारी वृतियां भगवत चिंतन की ओर प्रवृत हों ऐसा करने से शुद्ध सात्विक कार्य करने की प्रेरणा मिलती हैं, साथ ही पराश्रित न रहकर अपनी मेहनत से जीविका कमाने की भावना भी पैदा होती है।
परन्तु आजकल प्रभात में कप दर्शन होने लगा ।
प्रातः काल उठकर कर दर्शन करते हुए मन में विचार करना चाहिए कि आज मै इन हाथो से सत्कर्म ही करुँगा ताकि परमात्मा मेरे घर पधारने की कृपा करें,हाथ क्रिया शक्ति का प्रतीक है, भगवान से प्रार्थना करना चाहिए कि जिस प्रकार आपने अर्जुन का रथ हाँका था उसी प्रकार आप मेरे जीवन रथ के सारथी बनें, फिर नवग्रहों का ध्यान करना चाहिए---
"ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥
ब्रह्मा, मुरारी, तीनों लोकों के संहारक, भानु, चंद्रमा, भूमि और बुध के पुत्र, गुरु (शुक्र), शनि, राहु और केतु, ये सभी मेरी सुबह को शुभ बनाएं।
तब नासिका के पास हाथ ले जाकर देखना चाहिए यदि दायाँ स्वर चल रहा हो दायाँ पैर , बायाँ स्वर चल रहा हो तो बायाँ पैर धरती पर रखे , पैर रखने से पूर्व प्रार्थना करें ---
"समुद्र वसने देवि, पर्वतस्तनमण्डले।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे।।"
(हे धरती माता) हे देवी, समुद्र को अपने वस्त्र और पर्वतों को अपनी छाती मानती हो,हे भगवान विष्णु की पत्नी, आपको नमस्कार है; कृपया (पृथ्वी पर, जो आपका पवित्र शरीर है) मेरे चरणों का स्पर्श क्षमा करें।
माता पिता एवं गुरुजनों को प्रणाम करके नित्य क्रिया से (शौचादि )पहले बोले----
"उत्तिष्ठन्तु सुरा: सर्वेयक्षगन्धर्व किन्नरा।
पिशाचा गुह्यकाश्चैव मलमूत्र करोम्यहं।।"
निवृत्त होकर दातुन करते समय प्रार्थना करें ......
"हे जिह्वे रस सारज्ञे, सर्वदा मधुरप्रिये,
नारायणाख्य पीयूषम् पिव जिह्वे निरन्तरं।
"आयुर्बलं यशो वर्च: प्रजा पशुवसूनि च,
ब्रह्म प्रज्ञाम् च मेधाम् च त्वम् नो देहि वनस्पते।।"
2.सेवा पूजा -
स्नान से पूर्व जल मे गंगादि का आवाहन करने हेतु इस मंत्र को पढ़ना चाहिए--
"गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु।।"
फिर निम्न मंत्रो को बोलते हुए स्नान करना चाहिए--
"अतिनीलघनश्यामं नालिनायतलोचनम्।
स्मरामि पुण्डरीकाक्षं तेन स्नातो भवाम्यहम्।।
स्नानादि से निवृत्त होकर एकान्त मे भगवान की सेवा पूजा करने के लिए मानसिक शुद्धि के लिए निम्न मन्त्रों द्वारा अपने ऊपर छल छिड़के ..... ..
"ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा।
य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतर: शुचिः।।".
निम्न मंत्रो को पढ़ते हुए शिखा बन्धन करें .......
"चिद्रूपिणि ! महामाये ! दिव्यतेज:समन्विते।
तिष्ठ देवि ! शिखामध्ये तेजो वृद्धिम् कुरुष्व मे।।
चन्दन लगाये---
"चन्दनस्य महत्पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् ।
आपदां हरते नित्यं लक्ष्मी तिष्ठति सर्वदा।।"
3 .स्तुति -
भगवान की स्तुति करना चाहिए
" शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं,
विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्णँ शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिर्भिध्यानगम्यं,
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।"
हे नाथ आपने जब अजामिल जैसे पापी का उद्धार कर दिया तो फिर आप मेरी ओर क्यो नहीं देखते ?
4.कीर्तन -
स्तुति के बाद एकान्त में बैठकर प्रभु के नाम
का कीर्तन करना चाहिए---
"श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव"
अपना कामकाज करते समय भी प्रभु का स्मरण करते रहना चाहिए।
5. कथा श्रवण -
प्रभु के प्यारे संतो का समागम करके उनके श्रीमुख से कथा श्रवण करना चाहिए,हो सके तो रोज कथा सुनें, यदि नही सुन सकते समयाभाव में, तो रामायण , भागवत की कथा का वाचन करते हुए प्रेम पूर्वक उसका पाठ करना चाहिए।
1.प्रार्थना -
प्रातः काल आँख खुलने पर "कर दर्शन करते हुए भगवान की प्रार्थना करना चाहिए---
कराग्रे वसते लक्ष्मी ,करमूले सरस्वती ।
करमध्ये तु गोविन्दः ,प्रभाते कर दर्शनम् ।।
मेरे हाथ के अग्रभाग में भगवती लक्ष्मी का निवास है। मध्य भाग में विद्यादात्री सरस्वती और मूल भाग में भगवान विष्णु का निवास है। अतः प्रभातकाल में मैं इनका दर्शन करता हूं। इस श्लोक में धन की देवी लक्ष्मी, विद्या की देवी सरस्वती और अपार शक्ति के दाता, सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु की स्तुति की गई है, ताकि जीवन में धन, विद्या और भगवत कृपा की प्राप्ति हो सके।
हथेलियों के दर्शन का मूल भाव यही है कि हम अपने कर्म पर विश्वास करें। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि ऐसे कर्म करें जिससे जीवन में धन, सुख और ज्ञान प्राप्त कर सकें। हमारे हाथों से कोई बुरा काम न हो एवं दूसरों की मदद के लिए हमेशा हाथ आगे बढ़ें।
कर दर्शन का दूसरा पहलू यह भी है कि हमारी वृतियां भगवत चिंतन की ओर प्रवृत हों ऐसा करने से शुद्ध सात्विक कार्य करने की प्रेरणा मिलती हैं, साथ ही पराश्रित न रहकर अपनी मेहनत से जीविका कमाने की भावना भी पैदा होती है।
परन्तु आजकल प्रभात में कप दर्शन होने लगा ।
प्रातः काल उठकर कर दर्शन करते हुए मन में विचार करना चाहिए कि आज मै इन हाथो से सत्कर्म ही करुँगा ताकि परमात्मा मेरे घर पधारने की कृपा करें,हाथ क्रिया शक्ति का प्रतीक है, भगवान से प्रार्थना करना चाहिए कि जिस प्रकार आपने अर्जुन का रथ हाँका था उसी प्रकार आप मेरे जीवन रथ के सारथी बनें, फिर नवग्रहों का ध्यान करना चाहिए---
"ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥
ब्रह्मा, मुरारी, तीनों लोकों के संहारक, भानु, चंद्रमा, भूमि और बुध के पुत्र, गुरु (शुक्र), शनि, राहु और केतु, ये सभी मेरी सुबह को शुभ बनाएं।
तब नासिका के पास हाथ ले जाकर देखना चाहिए यदि दायाँ स्वर चल रहा हो दायाँ पैर , बायाँ स्वर चल रहा हो तो बायाँ पैर धरती पर रखे , पैर रखने से पूर्व प्रार्थना करें ---
"समुद्र वसने देवि, पर्वतस्तनमण्डले।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे।।"
(हे धरती माता) हे देवी, समुद्र को अपने वस्त्र और पर्वतों को अपनी छाती मानती हो,हे भगवान विष्णु की पत्नी, आपको नमस्कार है; कृपया (पृथ्वी पर, जो आपका पवित्र शरीर है) मेरे चरणों का स्पर्श क्षमा करें।
माता पिता एवं गुरुजनों को प्रणाम करके नित्य क्रिया से (शौचादि )पहले बोले----
"उत्तिष्ठन्तु सुरा: सर्वेयक्षगन्धर्व किन्नरा।
पिशाचा गुह्यकाश्चैव मलमूत्र करोम्यहं।।"
निवृत्त होकर दातुन करते समय प्रार्थना करें ......
"हे जिह्वे रस सारज्ञे, सर्वदा मधुरप्रिये,
नारायणाख्य पीयूषम् पिव जिह्वे निरन्तरं।
"आयुर्बलं यशो वर्च: प्रजा पशुवसूनि च,
ब्रह्म प्रज्ञाम् च मेधाम् च त्वम् नो देहि वनस्पते।।"
2.सेवा पूजा -
स्नान से पूर्व जल मे गंगादि का आवाहन करने हेतु इस मंत्र को पढ़ना चाहिए--
"गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु।।"
फिर निम्न मंत्रो को बोलते हुए स्नान करना चाहिए--
"अतिनीलघनश्यामं नालिनायतलोचनम्।
स्मरामि पुण्डरीकाक्षं तेन स्नातो भवाम्यहम्।।
स्नानादि से निवृत्त होकर एकान्त मे भगवान की सेवा पूजा करने के लिए मानसिक शुद्धि के लिए निम्न मन्त्रों द्वारा अपने ऊपर छल छिड़के ..... ..
"ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा।
य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतर: शुचिः।।".
निम्न मंत्रो को पढ़ते हुए शिखा बन्धन करें .......
"चिद्रूपिणि ! महामाये ! दिव्यतेज:समन्विते।
तिष्ठ देवि ! शिखामध्ये तेजो वृद्धिम् कुरुष्व मे।।
चन्दन लगाये---
"चन्दनस्य महत्पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् ।
आपदां हरते नित्यं लक्ष्मी तिष्ठति सर्वदा।।"
3 .स्तुति -
भगवान की स्तुति करना चाहिए
" शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं,
विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्णँ शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिर्भिध्यानगम्यं,
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।"
हे नाथ आपने जब अजामिल जैसे पापी का उद्धार कर दिया तो फिर आप मेरी ओर क्यो नहीं देखते ?
4.कीर्तन -
स्तुति के बाद एकान्त में बैठकर प्रभु के नाम
का कीर्तन करना चाहिए---
"श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव"
अपना कामकाज करते समय भी प्रभु का स्मरण करते रहना चाहिए।
5. कथा श्रवण -
प्रभु के प्यारे संतो का समागम करके उनके श्रीमुख से कथा श्रवण करना चाहिए,हो सके तो रोज कथा सुनें, यदि नही सुन सकते समयाभाव में, तो रामायण , भागवत की कथा का वाचन करते हुए प्रेम पूर्वक उसका पाठ करना चाहिए।
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6.स्मरण -
समस्त कर्मो का समर्पण - रात को सोने से पहले किये हुए
कर्मो का विचार करना चाहिए कि, क्या प्रभु को पसन्द आएँ ऐसे कर्म मेरे हाथ से आज हुए है, यदि अन्दर से नकारात्मक उत्तर मिले , तो मान लेना चाहिए कि वह दिन जीते हुएनही मरते हुए निकल गया।
अतः क्षमा प्रार्थना करना चाहिए---
"अपराध सहस्राणि क्रियन्ते अर्हनिशं मया ।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर ।।
यदि कोई पाप हो जाय तो प्रायश्चित करना चाहिए और किए हुए
सभी कर्म को परमात्मा को अर्पित करना चाहिए--
"अनेन कर्मणा श्रीलक्ष्मीनारायण प्रीयतां न मम्"
समस्त कर्मो का समर्पण - रात को सोने से पहले किये हुए
कर्मो का विचार करना चाहिए कि, क्या प्रभु को पसन्द आएँ ऐसे कर्म मेरे हाथ से आज हुए है, यदि अन्दर से नकारात्मक उत्तर मिले , तो मान लेना चाहिए कि वह दिन जीते हुएनही मरते हुए निकल गया।
अतः क्षमा प्रार्थना करना चाहिए---
"अपराध सहस्राणि क्रियन्ते अर्हनिशं मया ।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर ।।
यदि कोई पाप हो जाय तो प्रायश्चित करना चाहिए और किए हुए
सभी कर्म को परमात्मा को अर्पित करना चाहिए--
"अनेन कर्मणा श्रीलक्ष्मीनारायण प्रीयतां न मम्"
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*ॐ श्री हनुमतये नम:*
*गोष्पदीकृत वारीशम मशकीकृत राक्षसं*
*रामायण महामालारत्नम वन्देअनिलात्मजं*
*अंजना नंदनंवीरं जानकी शोक नाशनम्*
*कपीशम क्षहन्तारं वंदे लंका भयंकरं*
*उल्लंध्य सिंधो सलिलं सलीलं*
*य:शोक वन्हिं जनकात्मजाया:*
*आदाय तेनैव ददाह लंका*
*नमामि तं प्रांजलिराजयेनेयम्*
*गोष्पदीकृत वारीशम मशकीकृत राक्षसं*
*रामायण महामालारत्नम वन्देअनिलात्मजं*
*अंजना नंदनंवीरं जानकी शोक नाशनम्*
*कपीशम क्षहन्तारं वंदे लंका भयंकरं*
*उल्लंध्य सिंधो सलिलं सलीलं*
*य:शोक वन्हिं जनकात्मजाया:*
*आदाय तेनैव ददाह लंका*
*नमामि तं प्रांजलिराजयेनेयम्*
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श्रीराम समर्पणम्
श्रीरामः शरणं समस्तजगतां रामं विना का गती,
रामेण प्रतिहन्यते कलिमलं रामाय कार्य नमः।
रामात् त्रस्यति कालभीमभुजगो रामस्य सर्व वशे,
रामे भक्तिखंडिता भवतु में राम त्वमेवाश्रयः।।
श्रीरामचन्द्रजी इस समस्त संसार को शरण देने वाले है। श्रीराम कलयुग के सभी दोष को नष्ट कर देते है। अतः श्रीरामचन्द्र जी को नमस्कार करना चाहिए। श्रीराम से कालरूपी भयंकर सर्प भी डरता है। इस जगत में जो कुछ है, सबकुछ श्रीरामचन्द्रजी के वश में है। श्रीराम में मेरी भक्ति बनी रहे, श्रीराम आप ही इस समस्त संसार के आधार है। चित्रकूट में रहने वाले भगवती लक्ष्मी (सीता) के आनंदनिकेतन और भक्तों को अभय देने वाले परमानंद स्वरुप श्रीरामचन्द्र जी को नमस्कार करता हूँ। ब्रह्मा विष्णु महेश जिनके अंशमात्र है, उन परमशुद्ध सच्चिदानंद परमात्मन श्रीरामचन्द्र को मैं नमस्कार करता हूँ, तथा उनके चिंतन में ही मन लगाता हूं।
श्रीरामः शरणं समस्तजगतां रामं विना का गती,
रामेण प्रतिहन्यते कलिमलं रामाय कार्य नमः।
रामात् त्रस्यति कालभीमभुजगो रामस्य सर्व वशे,
रामे भक्तिखंडिता भवतु में राम त्वमेवाश्रयः।।
श्रीरामचन्द्रजी इस समस्त संसार को शरण देने वाले है। श्रीराम कलयुग के सभी दोष को नष्ट कर देते है। अतः श्रीरामचन्द्र जी को नमस्कार करना चाहिए। श्रीराम से कालरूपी भयंकर सर्प भी डरता है। इस जगत में जो कुछ है, सबकुछ श्रीरामचन्द्रजी के वश में है। श्रीराम में मेरी भक्ति बनी रहे, श्रीराम आप ही इस समस्त संसार के आधार है। चित्रकूट में रहने वाले भगवती लक्ष्मी (सीता) के आनंदनिकेतन और भक्तों को अभय देने वाले परमानंद स्वरुप श्रीरामचन्द्र जी को नमस्कार करता हूँ। ब्रह्मा विष्णु महेश जिनके अंशमात्र है, उन परमशुद्ध सच्चिदानंद परमात्मन श्रीरामचन्द्र को मैं नमस्कार करता हूँ, तथा उनके चिंतन में ही मन लगाता हूं।
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