✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें।
ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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आप सभी को रक्षाबंधन पर्व की
हार्दिक शुभकामनाएं

Happy rakshabandhan
to all of you
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*आने वाले कुछ व्रत त्यौहार*

23 अगस्त यानि कल पंचक जारी,गण्डमूल,सर्वार्थसिद्धि योग,
24 अगस्त बलराम जयंती,पंचक जारी,गण्डमूल,
रवियोग, रांधण छठ
25 अगस्त भानु सप्तमी
26 अगस्त कृष्णजन्माष्टमी,मथुरा
27 अगस्त दही हाण्डी,कृष्णजन्माष्टमी वृन्दावन
29 अगस्त अजा एकादशी
31 अगस्त प्रदोष व्रत
'आध्यात्मिक साधना' की विवेचना

अध्यात्म शब्द

सबसे पहले यह प्रश्न उठता है कि यह आध्यात्म है या अध्यात्म इस ग़लत जानकारी का मूल कारण है 'आध्यात्मिक' शब्द। आध्यात्मिक शब्द के चलते कुछ लोगों को लगता है कि यह आध्यात्म से बना होगा - आध्यात्म में - इक जोड़ा तो हुआ आध्यात्मिक, जैसे व्यापार में इक जोड़ा तो हुआ व्यापारिक लेकिन संस्कृत व्याकरण के नियम के अनुसार जब किसी अकारांत संज्ञा शब्द के अंत में -इक लगाकर विशेषण बनाया जाता है तो 'अ' से शुरू होने वाले शब्दों में 'अ' का 'आ' हो जाता है। इस नियम के ढेरों उदाहरण जिनका हम हर दिन इस्तेमाल करते हैं। कुछ उदाहरण देखें
धर्म से धार्मिक
तर्क से तार्किक
संसार से सांसारिक
लेकिन अध्यात्म से आध्यात्मिक के साथ-साथ अध्यात्मिक भी होता है। कम-से- कम संस्कृत में तो होता ही है। आप्टे के संस्कृत शब्दकोश में दोनों हैं और दोनों का एक ही अर्थ है
अध्यात्मिक और आध्यात्मिक शब्दों की रचना प्रक्रिया

अध्यात्म+इक=आध्यात्मिक (ऊपर बताए गए नियमानुसार प्रारंभिक 'अ' का 'आ' हो गया)।
अधि+आत्मिक(आत्म+इक) = अध्यात्मिक (अधि और आत्मिक में यण संधि से धि में उपस्थित इ का य् हो गया)।
कुछ और उदाहरण जैसे- त्रिमास+इक=त्रैमासिक ('इ' से शुरू होने वाले शब्दों के अंत में -इक लगाने पर शुरुआती 'इ' का 'ऐ' हो जाता है) । त्रि+मासिक (मास+इक) = त्रिमासिक (मासिक से पहले त्रि उपसर्ग लगा हुआ है जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होगा) अब बात आती है इनसे उत्पन्न होने वाली भ्रम की जैसे धर्म एक शब्द है, इसलिए उसमें कोई भ्रम नहीं है - धर्म से धार्मिक। इच्छा भी एक शब्द है सो उसमें भी इच्छा से ऐच्छिक बनाने में कोई दुविधा नहीं है । लेकिन बहुत सारे शब्द उपसर्ग लगने से या दो शब्दों के मेल से बने हैं। उन्हीं में दुविधा होती है कि -इक लगाने पर स्वर परिवर्तन का नियम पहले शब्द (या उपसर्ग) पर लगेगा या बाद वाले शब्द पर। ऊपर वाले ही उदाहरण देखिए
संविधान यह सम्+विधान से मिलकर बना है। अगर पहले हिस्से में परिवर्तन करते हैं तो परिणाम निकलेगा - साम्+विधानिक=सांविधानिक। दूसरे हिस्से में परिवर्तन करते हैं तो बनता है सम्+वैधानिक=संवैधानिक

अब प्रश्न यह कि जब ऐसे शब्दों के दो रूप बन सकते हैं तो इस्तेमाल कौनसा करें। जवाब - जो चला, सो भला । चूँकि आध्यात्मिक, प्रशासनिक और संवैधानिक शब्द बहुत अधिक चलते हैं, सो उन्हीं का इस्तेमाल किया जाए तो सही होगा।

अब बात करते हैं अध्यात्म शब्द पर आत्म शब्द में अधि उपसर्ग लगाकर बना है अधि + आत्म = अध्यात्म
शब्दार्थ लें तो आत्मा को ऊपर ले जाना अध्यात्म है। दूसरे शब्दों में आत्मा का उत्थान करना अध्यात्म है।

आत्मा का उत्थान क्या है

आत्मा का उत्थान तब होता है जब वह सर्वोच्च सर्वशक्तियुक्त परमेश्वर के स्वरूप से जुड़ जाती है, उसमें पावन हो जाती है इसके भी की प्रकार हैं जैसे सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य, साम्य और सायुज्य

यहीं से शुरूआत होती है आध्यात्मिकता
आत्मा के उत्थान का रास्ता बहुत लम्बा है, जिसे तय करने के लिए प्राणी को पहले समुचित ज्ञान हासिल करना होता है और फिर उस ज्ञान पर आचरण करना होता है। यह समुचित यथार्थ ज्ञान प्राणी को विभिन्न स्रोतों से अपने अनेक जन्मों के अनुभवों के आधार पर होता है, जो उसके संस्कारों के रूप में जुड़ता जाता है और आचरण में उतरता जाता है। इस सम्बंध में प्राणी को योनि चक्र में मिलने वाली मनुष्य योनियाँ महत्वपूर्ण हैं, जिनमें प्राणी को यह अवसर मिलता है कि वह अपने पिछले कर्मफलों (प्रारब्ध) को भोगकर समाप्त कर सकता है और नए कर्म निष्काम भाव से परमेश्वर की आज्ञाओं और वचनों के अनुसार करके कर्मफलों और सांसारिक इच्छाओं से शून्य हो सकता है। क्योंकि कर्मफल-शून्य होना और इच्छा रहित होना ही तो वांछित आचरण का परिणाम है और आत्मा का उत्थान है।

उपरोक्त समुचित ज्ञान को आध्यात्मिक ज्ञान कहते हैं, जिसे सही रूप में समझने और आचरण में उतारने के लिए कई मनुष्य जन्मों अर्थात् युग-युगांतरों का समय भी लग सकता है। परंतु यदि गाड़ी सही मार्ग पर आगे बढ़ती रहे तो निश्चित तौर पर कभी न कभी गंतव्य पर पहुँच ही जाती है।

हमारे धर्म ग्रंथों में वस्तुतः गाड़ी को सही मार्ग पर चलायमान रखने के लिए मार्ग दर्शन किया जाता है। परमेश्वर स्वयं अवतार लेकर या किसी निमित्त के माध्यम से मनुष्यों तक ज्ञान पहुँचाने का प्रयोजन करते हैं।

आध्यात्मिक ज्ञान के लिए कई मार्ग हैं किसी एक मार्ग का चयन करना आवश्यक होता है।
आध्यात्मिक प्रगति हेतु मार्ग:

१. ज्ञान मार्ग: ज्ञान मार्ग आध्यात्मिक प्रगति के लिए मार्ग माना जाता है। यह वेदांत (मतलब, अध्यात्म विद्या), उपनिषद (मतलब, ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिए गुरु के पास जाकर बैठना), ज्ञानी गुरु के संदेशों, और स्वयं के मध्यम से आत्म-ज्ञान प्राप्ति पर आधारित है।
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२. भक्ति मार्ग: भक्ति मार्ग में आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त करने के लिए प्रेम, श्रद्धा, और भगवान के प्रति आत्म-समर्पण की आवश्यकता होती है। यह कीर्तन, पूजा, ध्यान, और सेवा के माध्यम से भगवान का साथ अनुभव करने पर आधारित है।

३. कर्म मार्ग: कर्म मार्ग आध्यात्मिक प्रगति को कर्मयोग, सेवा, और समर्पण के माध्यम से प्राप्त करने पर आधारित है। यह निष्काम कर्म और नैतिकता की महत्वपूर्णता पर जोर देता है।

४. राजयोग मार्ग: राजयोग मार्ग आध्यात्मिक प्रगति में मन को वश में करना, धारणा, ध्यान, और समाधि की महत्वपूर्णता को स्थापित करता है। यह मन की शांति और आंतरिक समरसता (मतलब,सभी को अपने समान समझना) के लिए अभ्यास करने पर जोर देता है।

५. सेवा मार्ग: सेवा मार्ग में आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त करने के लिए समाज सेवा, निःस्वार्थ सेवा, और मानवीय सेवा की महत्वपूर्णता होती है। यह अन्यों की मदद, सहायता, और सेवा करके स्वयं का विकास करने पर जोर देता है।

६. गुरु मार्ग: गुरु मार्ग में आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त करने के लिए गुरु के मार्गदर्शन, शिक्षा, और संबंध की महत्वपूर्णता होती है। यह गुरु के द्वारा प्राप्त ज्ञान, सत्संग, और आदर्शों के  अनुसरण पर आधारित है।

७. तंत्र मार्ग: इस मार्ग में आध्यात्मिक प्रगति हेतु सांसारिक वस्तुओं को त्यागने के स्थान पर उसी का उपभोग करते हुए ईश्वर तक पहुंचना होता है कुछ लोग इसे कमल का मार्ग भी कहते हैं क्योंकि यह मार्ग कीचड़ में से कमल खिलने के समान है।

फिर भी अज्ञान के चलते हम मार्ग से अक्सर भटक जाते हैं। अज्ञान और अन्यथा ज्ञान में पड़ने का मुख्य कारण जीव के साथ अनादि काल से जुड़ी अविद्या है।

अविद्या का छेदन परमेश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता। परमेश्वर द्वारा अविद्या छेदन का सुपात्र बनने के लिए पुनः वही बात आती है कि हम समुचित ज्ञान हासिल करें और फिर उस पर आचरण भी करें, जो हमें अज्ञान और अन्यथा ज्ञान के चंगुल में पड़ने से बचाएगा। जब तक ज्ञान आचरण में नहीं उतरता, वह अक्षरों, शब्दों, शास्त्रों और शास्त्रार्थों की विषय वस्तु बना रहता है, चाहे उसे जानने वाला व्यक्ति स्वयं को कितना भी ज्ञानी क्यों न समझे। आत्मा का उत्थान तो निष्काम आचरण से ही हो सकता है।

उपरोक्त चर्चा के अतिरिक्त इस विषय पर मैं गीता के आठवें अध्याय के तीसरे श्लोक में आए इन शब्दों की भी चर्चा करना चाहूँगा जिसमें भगवान श्री कृष्ण ने अध्यात्म शब्द का उल्लेख किया है:-

स्वभावोSध्यात्ममुच्यते

स्वभावः + अध्यात्मम् + उच्यते

जिसके अनुसार स्वभाव को अध्यात्म कहा गया है।

स्व + भाव = स्वभाव

अर्थात् अपने वर्तमान शरीर से पृथक स्वयं के भाव या यथार्थ को जानना।

मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ और मुझे अंततः कहाँ और कैसे जाना है?

अध्यात्म यही तो समझाता है कि तेरे होने का जो कारण है, उसी कारणों के अंतिम कारण में तुम्हें अंततः विलीन हो जाना है। वह कारणों का कारण सर्वशक्तियुक्त परमेश्वर है।

आध्यात्मिक पथ पर की प्रक्रिया
अलग-अलग लोगों के लिए आध्यात्मिक प्रक्रिया का अलग-अलग मतलब होता है। बहुत सारे लोगों को लगता है कि आध्यात्मिक प्रक्रिया का मतलब हमेशा प्रेममय होना, हमेशा मुस्कुराते रहना और हमेशा शिष्टता से व धीरे चलना है। जबकि कुछ लोग आध्यात्मिकता को एक तरह की अक्षमता मानते हैं। इसके बारे में एक और सामान्य अवधारणा है कि आध्यात्मिकता का मतलब अच्छा होना होता है। कुछ लोगों को लगता है कि आध्यात्मिकता का मतलब कुछ निरंकुशता भरे काम करने से है, मसलन - धूम्रपान करना, पागलपन या दीवानगी भरा काम और गैरजिम्मेदार दिखना। जबकि कुछ लोगों के लिए आध्यात्मिक होने का मतलब प्रसन्न होना, शांतिमय होना और आनंदमय होना है। आध्यात्मिक होने का मतलब ये सब कुछ नहीं है। आध्यात्मिक होने का मतलब है कि आपका अस्तित्व आत्मा के रूप में हो, और शरीर के रूप में कम हो।



आध्यात्मिक प्रगति में उत्पन्न
बाधाएं (विघ्न) और उनके उपाय
          
  जिस प्रकार मनुष्य को आध्यात्मिक पथ पर चलने के लिए सभी साधनों का क्रम अनुसार ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है।  ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक के मार्ग में आने वाली बाधाओं का भी ज्ञान प्राप्त करना जरूरी है। बाधाओं का ज्ञान प्राप्त करके पुन: उनको दूर करने के लिए उपायों का पत्ता लगाना चाहिए।

  हठप्रदीपिका के अनुसार बाधक तत्व:- 

शरीर में जड़ता
अगर आपको लगता है कि आपके शरीर में कुछ अकड़ या जड़ता है तो आप सुबह हठ योग करके इस पर काम कर सकते हैं। शरीर एक ऐसी मशीन है, जो इस्तेमाल के साथ बेहतर होती जाती है। शरीर में अकड़ व जड़ता एक तरह से मृत्यु के निशानी है, क्योंकि मरने के बाद शरीर में एक कड़ापन आ जाता है। अगर आपके शरीर में लचीलापन नहीं है, अकड़ है, तो इसका मतलब एक तरह से मरने के बाद की स्थिति आपके शरीर में धीरे-धीरे आ रही है। हठ योग उसे आपके भीतर आने नहीं देता है। जब आप जीवित हों तो आपको पूरी तरह
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से जीवंत रहना चाहिए। जीवंत होने का मतलब है कि आप अपने भीतर उस कड़ेपन या जड़ता को न आने दें। जहां तक हो सके आपका शरीर, मन और ऊर्जा तरल बनी रहनी चाहिए। केवल तभी आप जिंदगी को गहराई से समझ पाएंगे।

और भी हैं जैसे
अत्याहार: प्रयासश्च प्रजल्पो नियमाग्रह:।
जनसंएरच लौल्य च षड्भिर्योगो विनश्चति।।

  अर्थात्‌- अधिक भोजन, अधिक श्रम, अधिक बोलना, नियम-पालन में आग्रह, अधिक लोक सम्पर्क तथा मन की चंचलता, यह छ: योग को नष्ट करने वाले तत्व है अर्थात्‌ योग मार्ग में प्रगति के लिए बाधक है।

  पतंजलि ने भी इस मार्ग में  बाधाओं का वर्णन किया है।
आध्यात्मिक पथ पर आने वाली बाधाएँ

व्याधि:- व्याधि अर्थात रोग लग जाना अगर आपके भीतर कोई शारीरिक रोग है तो हो सकता है कि आपको थोड़ी ज्यादा मेहनत करनी पड़े। उसकी वजह है कि अगर शरीर ही समस्या बन जाए तो वह समस्या ही आपके जीवन का पूरा फोकस अपने पर बनाए रखती है। उदाहरण के तौर पर, मान लीजिए आपको दमा का दौरा पड़ा है, जहां आप सांस भी नहीं ले पा रहे। उस समय में बस आप सांस लेना चाहेंगे, तब कोई और चीज आपके लिए मायने ही नहीं रखेगी।
जब शरीर का पर्याप्त ख्याल नहीं रखा जाता तो यह आपका पूरा ध्यान अपनी ओर खींचेगा। आपके पास जो भी होगा, वह सब उस शरीर को ठीक बनाए रखने में लगेगा। यह शरीर की प्रकृति है। शरीर को अच्छा रखने का मतलब सुंदर लगना औरों के सामने इसे रखकर खुद पर इतराना नहीं है। असली मुद्दा है कि यह शरीर आपके जीवन में एक अवरोध नहीं बनना चाहिए। दरअसल, यह शरीर एक आधार या नींव बनना चाहिए। अगर शरीर ही बाधा बन जाए तो फिर इंसान के लिए आगे बढ़ना मुश्किल होता है। हालांकि आप तब भी आध्यात्मिक हो सकते हैं, लेकिन इसमें बहुत ज्यादा मेहनत लगती है। लेकिन ये भी सच है कि, जब एक बार आपको यह अहसास हो जाता है कि यह शरीर आपको कभी भी तकलीफ दे सकता है तो आपके भीतर शरीर से ऊपर उठने की चाहत और भी गहराने लगती है

आपका मन

इस रास्ते में मुख्य अवरोध आपका मन भी हो सकता है बुद्धि या प्रज्ञा का यह स्तर अपेक्षाकृत हमारे लिए भी नया है दिक्कत यह है कि आपके पास एक ऐसी प्रज्ञा है, जिसे संभालने के लिए आपके पास पर्याप्त स्थायी आधार नहीं है। इसीलिए योग की जरूरत होती है, ताकि वो आपके लिए एक स्थायी आधार तैयार कर सके जिससे आपकी प्रज्ञा जैसा आप चाहें, आपके लिए काम कर सके

कर्म

कर्म का मतलब अपने जीवन का जिम्मा लेना है।
आपके जीवन में अभी जो कुछ भी घट रहा है उन सबके पीछे का कारण आपके द्वारा किया गया कर्म ही है इसलिए हमें इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है ताकि आपका कर्म आपकी प्रगति में सहयोग करे।

आलस्य
कुछ लोगों के मन में साधना करने का इरादा तो होता है, लेकिन अंततः वे आलस के शिकार हो जाते हैं। हर व्यक्ति के भीतर एक जैसी तीव्रता नहीं होती, लेकिन जो होना चाहिए, वह होना ही चाहिए अगर आप इस तरह का संकल्प लेकर चलेंगे तो आप अपने अंदर जागरूकता महसूस करेंगे
जो योगी दिन में चैबीसों घंटे ध्यान करना चाहते हैं, वे अपने साथ बिच्छू रखते हैं और जगे रहने के लिए वे उनसे डंक मरवाते हैं। इसी तरह के प्रभाव के लिए कुछ योगी अपनी कोई उंगली काट लेंगे और उस पर नींबू बांध देंगे।

दूसरों की राय
कुछ लोगों के लिए सबसे बड़ा अवरोध अपने बारे में लोगों की राय या अपने उपहास का डर है। सबसे पहली बात, क्या दूसरे लोगों की वाकई इस बात में दिलचस्पी है कि आप क्या करते हैं
जब आप समझ जाते हैं कि आपका जीवन आपका बनाया हुआ है तो आप अपनी किस्मत अपने हाथ में ले सकते हैं लेकिन अगर आप ही अपनी जिदंगी अपने हाथ में लेने को तैयार नहीं तो फिर ईश्वर भी आपकी जिंदगी अपने हाथों में क्यों लें खैर, अगर लेते भी हैं तो यह काम नहीं करेगी। अगर आपने अपनी जिंदगी को अपने हाथों में लिया हुआ है, लेकिन आप वह सब नहीं कर पा रहे हैं जो आपको करना चाहिए, तब वह इस मामले में आपकी मदद कर सकते हैं

ठंडे जानें का डर
उसके बाद यहां बहुुत सारे ऐसे लोग हैं, जो हमेशा खुद को बचा कर रखने की कोशिश करते हैं, जिन्हें यह डर होता है कि कोई उनका फायदा उठा सकता है। उन्हें फायदा उठाने दीजिए। क्योंकि यह आपके आनंदमय जीवन में सहयोगी होगा ऐसा इसलिए है क्योंकि जीवन आस्तिकता का चरम रूप है यहां ना का कोई स्थान नहीं है
जीवन को ‘हां’ कहिए। एक ‘हां’ से आप कुछ नहीं खोएंगे। लेकिन, एक ‘ना’ से आप जरूर खोएंगे। ‘ना’ एक बंद दरवाजा है। किसी भी वजह से दरवाजे को बंद मत रखिए। यह बेहद छोटा जीवन है, इसमें दरवाजे को बंद करने, फिर खोलने का वक्त नहीं है।
केवल भौतिक शरीर को सुरक्षा या बचाव की जरूरत होती है। और कभी कभी कुछ चीजें संभव नहीं होतीं। अन्यथा तो हर चीज ‘हां’ है
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संतुलन की कमी
सबसे बड़ी बात कि आपको अपने लिए एक स्थायी आधार तैयार करना चाहिए। जीवन में सबसेे महत्वपूर्ण चीज संतुलन बनाना है। अगर संतुलन नहीं होगा तो आपका शरीर और आपका मन आपके खिलाफ काम करेंगे। एक स्थायी आधार का मतलब एक ऐसे शरीर व मन से है, जो आपसे निर्देश लेता हो। आपको अपने भीतर सही तरह के रसायन तैयार करने का कौशल आना चाहिए। यह आपके स्वास्थ्य और आपके कल्याण के लिए जरूरी है। स्वयं को संभालने का कौशल आपमें होना चाहिए। इसीलिए योग है। योग के आसान से झुकाव या मुड़ाव आपके शरीर की मांसपेशियों के कसरत के लिए नहीं है, बल्कि यह आपके भीतर की बुनियाद को बदलने के लिए हैं अगर आप जीवन की सवारी का मजा लेना चाहते हैं तो आपको संतुलन की जरूरत है। हर व्यक्ति को इसके लिए काम करना चाहिए।

   स्त्यान आध्यात्मिक पथ पर चलने  के लिए उपयोग किये जाने वाले साधनों में "विश्वास न रखना" स्त्यान कहलाता है। यदि साधनों में प्रवृत्ति (इच्छा और विश्वास से भरपूर वृत्ति)नहीं होगी तो मनुष्य अपने मन को स्थिर नही कर सकता। और बिना मन को स्थिर किए कोई योगी नही बन सकता।

धैर्य रखें और बीज को अंकुरित होने दें

आध्यात्मिक राह पर शुरु में हमें यह चिंता नहीं करनी चाहिए कि हम आगे बढ़ रहे हैं या पीछे लौट रहे हैं, क्योंकि आपकी तार्किक बुद्धि और उसके नतीजे आपको काफी दिग्भ्रमित करते रहेंगे। शुरू में जब सुबह आप अपनी क्रिया करने बैठेंगे तो आपके पैर आपसे कहेंगे कि आप पीछे की ओर जा रहे हैं। इसी तरह से हो सकता है कि शायद आपका परिवार भी आपसे कहे कि इस मूर्खतापूर्ण काम को बंद कर दो।
यहां तक कि अपने भीतर चरम तक पहुंचा इंसान भी खुद का मूल्यांकन करने के लिए कुछ वक्त लेता है। हो सकता है कि वो यह मूल्यांकन सामान्य तरीके से न करे, लेकिन कई और तरीकों से करता है।इसलिए शुरुआती दौर में कोई भी नतीजा निकालने की कोशिश मत कीजिए। किसी भी आध्यात्मिक प्रक्रिया को शुरू करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका यह है कि उसे एक खास समय तक बिना किसी शर्त के पूरी निष्ठा व प्रतिबद्धता के साथ किया जाए। इस दौरान आपको किसी तरह की तथाकथित आध्यात्मिक प्रगति का महसूस होना जरूरी नहीं है। शुरू में बस सहज रूप से पूरी प्रतिबद्धता के साथ छह महीने तक क्रिया का अभ्यास कीजिए। उसके बाद आप अपने जीवन का मूल्यांकन कीजिए कि आपका जीवन कितना शांतिपूर्ण, आनंदभरा और स्थिर हुआ है
आमतौर पर भारतीय परंपरा में किसी भी आध्यात्मिक प्रक्रिया को शुरू करने के लिए जिस समर्पण व प्रतिबद्धता की उम्मीद की जाती थी, वह बारह साल की होती थी। आप बारह साल तक बिना किसी उम्मीद के किसी मंत्र का जाप करते हैं, फिर देखते हैं कि आपके साथ क्या हो रहा है। यहां तक कि आज भी भारत में कई पंथ या संप्रदाय इस मार्ग का अनुसरण करते हैं। इसमें एक गुरु अपने शिष्य को एक मंत्र देता है और शिष्य बारह सालों तक उसका अभ्यास करता है और उसके बाद वह अपनी प्रगति के मूल्यांकन के लिए वापस आता है। लेकिन आज लोगों में धैर्य बिल्कुल नहीं हैं। यहां तक कि अगर हम सिर्फ बारह दिनों की प्रतिबद्धता भी मांगें तो लोगों को उसमें भी कई समस्याएं हैं। इसमें भी लोगों की शिकायत होती है कि यह अवधि बहुत लंबी है।
इस चीज को समझाने के गौतम बुद्ध के अपने तरीके थे। अगर उनके पास कोई आता था तो दो साल तक तो वह उसे कोई शिक्षा नहीं देते थे, कुछ नहीं सिखाते या बताते थे और न ही कोई आध्यात्मिकता की बात करते थे। दो साल तक वे उस व्यक्ति को यूं ही मंडराने या भटकने देते थे। अगर आप दो साल तक इंतजार कर सकते थे तो आप में एक खास तरह का गुण आ जाता था और आपके साथ कुछ हो सकता था। और जब वह आपको दीक्षित करते थे तो तब आपके साथ एक बहुत बड़ी चीज घटित होती थी। लेकिन आज लोगों के लिए इंतजार करना अपने आप में एक तरह का संघर्ष हो चुका है, क्योंकि आधुनिक मन बेहद अधीर हो चुका है इसलिए तो आज कल हर जगह लिखा होता है
एक सप्ताह योग, ध्यान कार्यक्रम, एक महीने ध्यान करने का चमत्कार इत्यादि ऐसे फालतू लेख और कार्यक्रम चलते हैं जो आध्यात्मिक प्रक्रिया के आधार को ही चुनौती दे रहे हैं
फिर भी यही कहूंगा कि किसी तरह की जल्दबाजी मत दिखाइए। सिर्फ अपने अभ्यास व साधना पर टिके रहें और फिर कुछ अंतराल पर अपना आकलन करें और देखें आपके अंदर क्या अनोखा घटित हुआ

आध्यात्मिकता का विकास

सबसे पहले, आपको अपनी प्राथमिकताएं तय करनी होंगी। यह मत सोचिए कि आप किस तरह की चीजें चाहते हैं; बस यह देखिए कि आप कैसे बनना चाहते हैं और उसके लिए काम कीजिए। आपकी योग्यता, आपकी क्षमता और आप जिस स्थिति में हैं, उसके अनुसार चीजें अपने आप व्यवस्थित हो जाएंगी। यह सोचने के बजाय कि किस तरह के घर में रहना है, क्या करना है, बस यह कहिए कि "मैं आध्यात्मिक रूप से केंद्रित रहना चाहता हूं और मैं आनंदपूर्वक और अच्छे से जीना चाहता हूं।" बाकी चीजें अपने आप उसके आसपास व्यवस्थित हो जाएंगी। हो सकता है कि आप हर दिन दस
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मील पैदल चलें और उसका आनंद लें या हो सकता है कि आप बड़ी कार चलाएं या हो सकता है कि आप साइकिल चलाएं - यह महत्वपूर्ण बात नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि आप अपने जीवन को आनंदपूर्वक जी रहे हैं, इसके हर पल का आनंद ले रहे हैं। क्या यह सबसे महत्वपूर्ण बात नहीं है? बाकी चीजें केवल व्यवस्थाएं हैं। लेकिन जब लोगों को अपने भीतर खुशहाली का कोई अहसास नहीं होता, तो उनके खुशहाल होने का एकमात्र तरीका किसी और से बेहतर होना होता है।

किसी से बेहतर होने की चाहत एक बीमारी है - यह खुशहाली नहीं है। इस बीमारी ने दुनिया को बहुत बुरी तरह जकड़ लिया है। लोग बहुत सी चीजों के मालिक बनना चाहते हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि कोई और उन्हें नहीं पा सकता

मान लीजिए मैं आपको दुनिया का सबसे बड़ा हीरा देता हूं, अगर आप एक इंसान होते और इसे देखते तो यह सिर्फ एक पत्थर होता। बाजार में ही इसे इतनी बड़ी चीज बनाया जाता है। सड़क पर मिलने वाला एक साधारण ग्रेनाइट पत्थर, अगर आप ध्यान से देखें तो एक अलग तरीके से उतना ही सुंदर है। लेकिन ग्रेनाइट पत्थर बहुत ज्यादा हैं, इसलिए आप इसे नहीं उठाएंगे। धरती पर कुछ हीरे हैं और हर किसी के पास वे नहीं हो सकते, इसलिए आप इसे अपने गले में या नाक पर या कानों में लटकाते हैं। इसलिए नहीं कि यह सुंदर है - ऐसी चीजों पर विश्वास न करें।

जीवन के बारे में गलत विचारों ने मानव जीवन को विषाक्त कर दिया है। किसी से बेहतर बनने की कोशिश में कितने ही लोगों ने खुद को बर्बाद कर लिया है! इस धरती पर कितने ही लोगों ने किसी और से थोड़ा बेहतर दिखने की कोशिश में अपना जीवन बर्बाद कर दिया है! किसी और से बेहतर दिखने की कोशिश में अपना जीवन बर्बाद मत करो। यह जीवन की बहुत बड़ी बर्बादी है, क्योंकि अगर आप किसी से बेहतर बनने के बारे में सोचते रहेंगे तो आप कभी भी अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुँच पाएँगे क्योंकि सामने वाला घसीटते हुए चल रहा है जबकि आप अपने अंदर उड़ने की क्षमता लिए हुए हैं
अंततः आध्यात्मिक साधना आपके अंदर सोयी हुई क्षमताओं को जगाने के लिए है आपको बस अपने जीवन में इसे शामिल करना है।
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पितृ पक्ष 2024-श्राद्ध
कौन सी तिथि कब ?

18 सितम्बर (बुधवार ) पूर्णिमा प्रतिपदा श्राद्ध

*19 सितम्बर (गुरुवार ) द्वितीया श्राद्ध*

20 सितम्बर (शुक्रवार ) तृतीया श्राद्ध

*2 1 सितम्बर (शनिवार ) चतुर्थी श्राद्ध*

22 सितम्बर (रविवार ) पंचमी श्राद्ध

*23 सितम्बर (सोमवार ) षष्ठी श्राद्ध*

24 सितम्बर (मंगलवार ) सप्तमी श्राद्ध

*25 सितम्बर (बुधवार ) अष्टमी श्राद्ध*

26 सितम्बर (गुरुवार) नवमी श्राद्ध

*27 सितम्बर (शुक्रवार ) दशमी श्राद्ध*

28 सितम्बर (शनिवार ) एकादशी श्राद्ध,

*29 सितम्बर (रविवार) द्वादशी श्राद्ध*

30 सितम्बर (सोमवार) त्रयोदशी श्राद्ध

*1 अक्टूबर 2024 मंगलवार चतुर्दशी श्राद्ध*

2 अक्टूबर (बुधवार ) सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या श्राद्ध

पितृदेवों को नमन🙇🙇
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कहानी का समय

- 'ज्योतिष का गणित'

किसी जमाने में पं. विष्णुदत्त शास्त्री ज्योतिष के प्रकांड विद्वान हुआ करते थे.......
उनकी पहली संतान का जन्म होने वाला था,
पंडित जी ने दाई से कह रखा था कि जैसे ही बालक का जन्म हो,
एक नींबू प्रसूति कक्ष से बाहर लुढ़का देना.....
बालक का जन्म हुआ... लेकिन बालक रोया नहीं।
तो दाई ने हल्की सी चपत उसके तलवों में दी, पीठ को मला और अंततः बालक रोने लगा.....
दाई ने नींबू बाहर लुढ़का दिया....
और बच्चे की नाल आदि काटने की प्रक्रिया में व्यस्त हो गई.....
नींबु जब बाहर आया उसी पल की गणना की गयी....
उधर पंडित जी ने गणना की तो पाया कि
बालक कि कुंडली में "पितृहंता योग" है,
अर्थात उनके ही पुत्र के हाथों उनकी ही मृत्यु का योग।
पंडित जी शोक में डूब गए और पुत्र को इस लांछन से बचाने के लिए बिना कुछ बताए घर छोड़कर चले गए.....
सोलह साल बीते...
बालक अपने पिता के विषय में पूछता, लेकिन बेचारी पंडिताइन उसके जन्म की घटना के विषय में सब कुछ बताकर चुप हो जाती। क्योंकि उसे इससे ज्यादा कुछ नहीं पता था।

अस्तु !! पंडित जी का बेटा अपने पिता के पग चिन्हों पर चलते हुये प्रकांड ज्योतिषी बना...!
उसी बरस राज्य में वर्षा नहीं हुई...
राजा ने डौंडी पिटवाई कि जो भी वर्षा के विषय में सही भविष्यवाणी करेगा उसे मुंह मांगा इनाम मिलेगा। लेकिन गलत साबित हुई तो उसे मृत्युदंड मिलेगा !
बालक ने गणना की और निकल पड़ा।
लेकिन जब वह राजदरबार में पहुंचा तो देखा एक वृद्ध ज्योतिषी पहले ही आसन जमाये बैठे हैं।
राजन आज संध्याकाल में ठीक चार बजे वर्षा होगी"
वृद्ध ज्योतिषी ने कहा।

बालक ने अपनी गणना से मिलान किया,,
और आगे आकर बोला,,
"महाराज मैं भी कुछ कहना चाहूंगा"

राजा ने अनुमति दे दी,,
"राजन वर्षा आज ही होगी,,
लेकिन चार बजे नहीं,,
बल्कि चार बजने के कुछ पलों के बाद होगी"
वृद्ध ज्योतिषी का मुँह अपमान से लाल हो गया,,

इस पर वृद्ध ज्योतिषी ने दूसरी भविष्यवाणी भी कर डाली, "महाराज वर्षा के साथ ओले भी गिरेंगे,, और... ओले पचास ग्राम के होंगे"

पर बालक ने फिर गणना की,,
"महाराज ओले गिरेंगे,,
लेकिन कोई भी ओला पैंतालीस से अडतालीस ग्राम से ज्यादा का नहीं होगा"

अब बात ठन चुकी थी,,
लोग बड़ी उत्सुकता से शाम का
इंतजार करने लगे !!

साढ़े तीन तक आसमान पर बादल का एक कतरा भी नहीं था,,लेकिन अगले बीस मिनट में क्षितिज से मानो बादलों की सेना उमड़ पड़ी, अंधेरा सा छा गया।

बिजली कड़कने लगी... लेकिन चार बजने पर भी पानी की एक बूंद नहीं गिरी।
लेकिन जैसे ही चार बजकर दो मिनट हुए,, मूसलाधार वर्षा होने लगी।

वृद्ध ज्योतिषी ने सिर झुका लिया,,

आधे घण्टे की बारिश के बाद
ओले गिरने शुरू हुए, राजा ने ओले मंगवाकर तुलवाये,, कोई भी ओला पचास ग्राम का नहीं निकला।
शर्त के अनुसार वृद्ध ज्योतिषी को सैनिकों ने गिरफ्तार कर लिया,,

और राजा ने बालक से इनाम मांगने को कहा !
"महाराज,, इन्हें छोड़ दिया जाये"
बालक ने कहा !

राजा के संकेत पर वृद्ध ज्योतिषी को मुक्त कर दिया गया !
"बजाय धन संपत्ति मांगने के तुम इस
अपरिचित वृद्ध को क्यों मुक्त करवा रहे हो ?"

बालक ने सिर झुका लिया,,
और कुछ क्षणों बाद सिर उठाया,,
तो उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे,,

"क्योंकि ये सोलह साल पहले मुझे छोड़कर गये मेरे पिता श्री विष्णुदत्त शास्त्री हैं"

वृद्ध ज्योतिषी चौंक पड़ा,,दोनों महल के बाहर चुपचाप आये,,
अंततः पिता का वात्सल्य
छलक पड़ा,,
और फफक कर रोते हुए बालक को गले लगा लिया,,

"आखिर तुझे कैसे पता लगा,,
कि मैं ही तेरा पिता विष्णुदत्त हूँ"

"क्योंकि आप आज भी गणना तो सही करते हैं,,
लेकिन कॉमन सेंस का प्रयोग नहीं करते"
बालक ने आंसुओं के मध्य मुस्कुराते हुए कहा,,
"मतलब" ??  पिता हैरान था !

"वर्षा का योग चार बजे का ही था,,
लेकिन वर्षा की बूंदों को पृथ्वी की सतह तक आने में कुछ समय लगेगा कि नहीं ???"

"ओले पचास ग्राम के ही बने थे,,
लेकिन धरती तक आते-आते कुछ पिघलेंगे कि नहीं ???"
और..."
"दाई माँ बालक को जन्म लेते ही
नींबू थोड़े फेंक देगी,,

उसे भी कुछ समय बालक को
संभालने में लगेगा कि नहीं ???

और उस समय में ग्रहसंयोग
बदल भी तो सकते हैं..??

और... “पितृहंता योग”
“पितृरक्षक योग” में भी
तो बदल सकता है न ???
पंडितजी के समक्ष जीवन भर की त्रुटियों की श्रंखला जीवित हो उठी,,
और वह समझ गए,,
कि केवल दो शब्दों के गुण के
अभाव के कारण वह जीवन भर
पीड़ित रहे और वह था -
'कॉमन  सेंस'...
और यही कॉमन सेंस है जो हमें हमारे जीवन में सहायक होता है।
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*सुक्ष्म_मन_का_जागरण*

जागरूक अवस्था में मनुष्य जो विचार करता हैं, जो सोचता है, कल्पनाएं करता है वह मन के द्वारा ही करता है। नींद में मनुष्य जो स्वप्न देखता है वह सूक्ष्म मन से देखता है। सुक्ष्म मन के तरंग काल्पनिक विचार बनकर, एक चलचित्र की भाती दिमाग पर छाप छोडते है, यही स्वप्न बन जाता है। सूक्ष्म मन को सूक्ष्म शरीर भी कहते हैं। इसीलिए जागृत अवस्था मे स्थूल शरीर के विचारों का संचालन मन से और सूक्ष्म शरीर के विचारों का संचालक सूक्ष्म मन से स्वप्न मे होता है। इन से अलावा तीसरा कारण शरीर का कारण मन भी होता है। जागृत अवस्था मे मनुष्य के शरीर में यह तीनों मन कार्य करते हैं। लेकिन ज्यादातर स्थुल मन ही कार्यरत रहता है, दूसरे दो मन का व्यक्ति को पता नहीं चलता और सारी उम्र इसी स्थुल सरीर के मन के विचारो के भ्रमजाल के अधीन ही मनुष्य जीवन बिताता है।

इसी के साथ तीन अवस्थाएं भी होती है। इनमें पहली जागृत दूसरी स्वप्न और तीसरी सुषुप्ति। इनके बारे में कभी और चर्चा करेंगे।

मनुष्य के मन की शक्ति असाधारण है। इस का पता मनुष्य को नही होता। अगर मनुष्य अपने मन को वश मे कर, सकारात्मक दिशा की ओर मोड़ ले तो इस विश्व में वह सब कुछ हासिल कर सकता है। ब्रह्मांड के बहुत सारे रहस्यो से अवगत हो जाता है। लेकिन दुविधा इस बात की है की जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य अपने मन का गुलाम बन कर रह जाता है। कोई वीरला पुरुष ही अपने मन को वश करके अपनी इच्छा अनुरूप कार्य करने में सक्षम होता है। मनुष्य जब जागृत अवस्था में होता है तब उनका मन भी जागृत रहता है। जहां-जहां उनकी नजर घूमती रहती है,जो कुछ देखता है ऊनके अनुरूप विचार प्रकट होता रहता है। उन विचार के वशीभूत होकर कार्य के लिए प्रेरित होता रहता है। बस इसी दौडधाम मे लगा रहता है।

आज मैं आपको बताऊंगा कि सूक्ष्म मन को कैसे अनुभव किया जाए। यह विषय उन लोगों के लिए है जो आध्यात्मिक जीवन में अभी शुरुआत की है अगर आप मंत्र जाप या ध्यान करते है तो सूक्ष्म मन की अनुभूति आपको तुरंत ही समझ में आ जाएगी।
पहले शांत और अच्छे कमरे का चुनाव कीजिए फिर आसन पर ध्यान की मुद्रा में बैठ जाइए। पहले लंबी श्वास के साथ प्राणायाम कीजिए फिर अपना मन अपने भीतर आती-जाती स्वास पर केंद्रित कीजिए। आप अनुभव कीजिए कि अपनी श्वास नासिक द्वारा से होकर मूलाधार चक्र तक जा कर बाहर आ रही है। फिर मूलाधार चक्र पर थोड़ी देर ध्यान केंद्रित करते हुए ऊपर की ओर आते रहे बाद में अपने भूमध्य में ध्यान केंद्रित कीजिए। थोड़ी देर इधर ठहरने के बाद अब आप बिल्कुल शांत हो गए हैं। अब अपने मस्तिक के अलावा दूसरे शरीर को बिल्कुल भूल जाइए। ऐसा महसूस कीजिए कि जहां पर मस्तिक में आपका ध्यान केंद्रित है, इतना ही आपका अस्तित्व है। अब महसुस किजिए की आपकी श्वास नासिक का से अपने मस्तिष्क में समा रही है और बाहर आ रही है।

इदर ध्यान दे की अब, आपका ध्यान सिर्फ मस्तक में ही है दूसरे शरीर का आपको भान नहीं होना चाहिए।

अब आपका मस्तिक थोड़ा सा भारी लगेगा। इधर आप शांत जरूर है लेकिन विचार आपका पीछा नहीं छोड़ेंगे। इसलिए आप किसी एक छोटे से विचार पर एकाग्र होते हुए उनको बार-बार रिपीट करते रहिए, ताकि दूसरा विचार ना आ पाए।( गुरुमंत्र या कोई अन्य मंत्रजाप कर सकते है। (किसी भी साधना या मंत्र की सिद्ध इधर यही अवस्था मे होती है।) अब आपको नींद आने लगेगी। अगर नींद आ गई तो आपके स्थुल शरीर का मन भी अस्त हो जाएगा, दूसरी तरफ तुरंत सूक्ष्म मन का उदय हो जाएगा। और जो विचार आप बार-बार पकड़ कर बैठे थे, वही विचार आगे बढ कर स्वप्न बन जाएगा। कुछ सेकंड बाद फिर आप जाग जाओगे, और तुरंत स्वप्न तुट जाएगा। तब आप को भान होगा की जरा सी नींद आ गई थी। अब आप फिर से मन को एकाग्र कीजिए, हो सकता है फिर से नींद की जपकी और स्वप्न आ जाएगा।

ईधर आप को बता दु कि, नींद मे जो स्वप्न आया वह सूक्ष्म मन का उदय था। लेकिन वह स्वप्न आपकी इच्छा अनुसार नही था। क्योकि नींद मे हमारी बुद्धि और चेतना काम नही करती। वह मन के साथ सुसुप्त हो जाती है।

तो यह नींद की पहली क्षण हीं सूक्ष्म मन की छोटी सी रेखा है। अगर थोड़ा सा आगे चले गए तो नींद में जाओगे और पीछे रह गए तो जागृत पाओगे। लेकिन हमें इधर कोशिश यह करनी है कि ना तो हम नींद में चले जाए और ना हीं हम जागृत रह पाए। हमें जागृत और नींद की संधि वाली क्षण पर ठहरना है। और इसी संधि वाली रेखा पर जागृत होकर ठहरना ही चौथी अवस्था बन जाती है, वह अवस्था है तुरिया अवस्था।
नाही नींद मे होते है और नाही जागृति मे । बिल्कुल बिचमे।
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मित्रों...मेरी बात लंबी होती जा रही है लेकिन मैं प्रयास करता हूं कि मेरी बात आप समझ सके।
तो कुल मिलाकर सारी बात का तात्पर्य यही है कि चाहे हम ध्यान में बैठकर या पलंग पर सोकर,नींद और जागृत की संधि के मुख्य बिंदु पर रुक जाना सीखना है। इधर आपको सूक्ष्म मन का चमत्कारी अनुभव होना शुरू हो जाएंगा। जिस विचार को आप पकड़ कर बैठे थे अगर वह विचार आपका कोई प्रश्न है तो उनका सही जवाब आपको इधर मिल जाएगा। आप ईधर ऐक ऐसी स्वप्नील अवस्था मे होगे जो आपकी ईच्छा अनुसार होगी,आनंद दायक होगी। आप को पता भी नही चलेगा की आप नींद मे थे या जागृत?? लेकिन यह पल अद्भुत ओर आनंदित लगेगी।

यह सूक्ष्म मन ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से जुड़ा हुआ रहता है और यह कभी किसी को झूठी सलाह नहीं देता। इस मन मे पूर्व जीवन का डेटा समाहीत रहता है। अगर कोई व्यक्ति तंत्र क्रिया से,भूत प्रेत से बाधित है वह सभी एनर्जी ईसी मन से जुडी रहती है। ओर इसलिए ऐसे बाधाग्रसित लोग जब सोते है तो नींद आने के कुछ ही क्षण बाद डरकर जाग जाते है। ऊनको पडछाई या गलत एनर्जी का भान होता है। यही नकारात्मक एनर्जी मनुष्य के होरामंडल मे कुछ काले धब्बे बना देती है। सतत मंत्र जाप तथा किसी दिव्य स्थान तथा पीपल की परिक्रमा शुक्ष्म मन की नकारात्मक एनर्जी को शुद्ध करता है। यह सनातन धर्म की वैज्ञानिक बात हमे समजना चाहिए।

कुछ लोग इसी सूक्ष्म मन की आवाज को आत्मा की आवाज भी कहते हैं। यह जागृत अवस्था में समय-समय पर महसूस किया जा सकता है लेकिन प्रैक्टिस की जरूरत होती है। किसी प्रश्न का सही जवाब चाहिए तो इस अवस्था से जाना जा सकता है। आगे जाकर आप अपने स्थूल शरीर से बाहर भी निकल सकोगे, फिर सूक्ष्म मन की यात्रा भी कर सकोगे। सूक्ष्म मन में कदम रखते ही साधक को कभी कबार डरावने अनुभव भी होते हैं। अगर साधक की होरा मंडल में सकारात्मक ऊर्जा है तो डर नहीं लगेगा,अगर नकारात्मकता ऊर्जा है तो पहले उनको डर अवश्य लगेगा जो उपरोक्त बात कर चुके है। लेकिन, अपने आप पर कंट्रोल रखते हुए डरना नहीं चाहिए। इधर वाइब्रेशन और झटका भी लगता है। ब्रह्मांड की ध्वनि और बम विस्फोट जैसे गेबी आवाज भी सुनाई देते हैं। अपने भूतकाल के जीवन की झांकी के चलचित्र और आवाज भी सुनाई देती है। कोई अटपटी भाषा भी सुनाई देती है। यह आध्यात्मिक की पहली अवस्था है, इनसे ज्यादा कुछ नहीं यह सिर्फ शुरुआत ही है। अभी तो बहुत आगे जाना है।

आज के लिए इतना ही।
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दूध को तपाने से मलाई और घी निकलता है। धातुओं को तपाने से वे बहुमूल्य भस्म और रसायन बनती हैं। सामान्य अन्न तपाये जाने पर स्वादिष्ट आहार बनता है, मिट्टी को तपाने से पत्थर बनती है। कच्चा लोहा पकाने पर ही फौलाद बनता है। स्वर्ण की आभा अग्नि संस्कार से ही निखरती है। खारी और भारी समुद्र जल तपने के उपराँत मीठा और हलका बादल बनकर आकाशगामी होता और तृषित भूमि की तृप्ति करता है। हिमालय पर जमी बरफ तपने पर ही गंगा-यमुना का सम्मान पाती है, तपता हुआ सूर्य अपनी आत्मा और ऊष्मा से समस्त विश्व में प्राण वर्षा करता है और ग्रह परिवार को अपने साथ बाँध रहने में समर्थ है।
यदि यह सब तपने के लिये तैयार न हों, कच्चे और शिथिल ही बने रहें तो उनमें प्रखरता उत्पन्न न होगी ऐसी ही कच्ची कमजोर स्थिति में पड़े रहेंगे। दबी हुई समर्थता को उभारने के लिए तप एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। वह कष्ट साध्य तो है पर उसके द्वारा होने वाले लाभों को देखते हुए महत्ता इतनी बड़ी है कि उसे घाटे का सौदा नहीं कह सकते हैं। व्यायामशाला में किया हुआ तप पहलवान बनाता है। पाठशाला में तप करने वाला विद्वान बनता है। खेत का तपस्वी सुसम्पन्न कृषक बनता है। पत्थर को प्रतिमा, कागज को चित्र बना देने की क्षमता मूर्तिकार के, चित्रकार के तप में ही सन्निहित है।
लौकिक जीवन में पग-पग पर कठोर श्रम, पुरुषार्थ, साहस, मनोयोग की महत्ता स्पष्ट है। अध्यात्म क्षेत्र में भी यही तथ्य काम करता है। तपस्वी शक्तिशाली बनते हैं और उस तप साधित शक्ति के आधार पर वे भौतिक सिद्धियों से सम्पन्न बनते हैं। इतिहास के महामानवों, ऋषियों, तत्वदर्शियों, देवदूतों की महत्ता उसके तप के कारण ही प्रकाशवान हुई है। देवताओं के वरदान केवल तपस्वियों के लिये सुरक्षित रहते हैं। केवल याचना प्रार्थना से किसी का कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं हुआ है। पुराणों का प्रत्येक पृष्ठ तप साधना के द्वारा उपलब्ध विभूतियों की महत्ता प्रतिपादित करता है धर्म-शास्त्रों में तपश्चर्या का महात्म्य ही विभिन्न प्रकारों और प्रकरणों में गाया गया है।
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🕉️ब्रह्मसूत्र भारतीय वेदांत का प्रमुख शास्त्र है जिसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने की। यह एक अद्वितीय शास्त्र है जिसमें ब्रह्म को जीवन में अनुभव करने के उपाय हैं। परमात्मा सबके भीतर उतना ही मौजूद है जितना बुद्ध, कबीर, नानक आदि ब्रह्म ज्ञानी महापुरुषों के किंतु बिना जिज्ञासा के उसकी प्राप्ति की यात्रा शुरू नहीं होती

ब्रह्म सूत्र 4.4.1 - 4.4.4, ब्रह्मसूत्र में कहा गया है कि मुक्त आत्मा ब्रह्म की प्रकृति की होती है, आंतरिक शक्ति और ज्ञान से युक्त होती है, बुराई से मुक्त होती है, शोक से मुक्त होती है, पीड़ा से मुक्त होती है, आनंद में होती है और "ऐसे लोगों के लिए सभी लोकों में स्वतंत्रता होती है"।
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भक्त

जैसे इस संसारमें अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष - ये चार प्रकार के पुरुषार्थ होते हैं, वैसे ही इस संसारमें अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी - ये चार प्रकार के भक्त भी होते हैं। अर्थात् -
राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृति चारिउ अनघ उदारा।।
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करनेवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी - ऐसे चार प्रकारके भक्तजन मुझको भजते हैं।। गीता ७/१६।।
१. अर्थार्थी - सांसारिक पदार्थों, धनादिकी चाहसे भजनेवाले।
२. आर्त - संकटकी निवृत्ति-(निवारण-) के लिये भजनेवाले।
३. जिज्ञासु - मेरेको (भगवान् को) यथार्थरूपसे जाननेकी इच्छासे भजनेवाले।
४. ज्ञानी - भगवान् को तत्त्वसे जानकर स्वाभाविक ही प्रेमसे भजनेवाले।
सांसारिक पदार्थों, धनादिकी प्राप्ति अपने शास्त्रविहित कर्त्तव्यकर्मों से प्राप्त कर लेने को ही 'अर्थ' रूप पुरुषार्थ सिद्ध कर लेना कहते हैं, अर्थात् -
साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।।
[लौकिक सिद्धियोंके चाहनेवाले अर्थार्थी] साधक लौ लगाकर नामका जप करते हैं और अणिमादिक [आठों] सिद्धियोंको पाकर सिद्ध हो जाते हैं।।
यह 'अर्थ' सिद्ध कर लेना केवल पुरुषार्थ तो है, लेकिन परम अर्थ अर्थात् परमार्थ सिद्ध कर लेना नहीं है; क्योंकि लक्ष्मणजी निषादराज गुह को समझाते हुए कहते हैं -
धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू।।
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं।।
धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँतक व्यवहार हैं जो देखने, सुनने और मनके अंदर विचारनेमें आते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) ही है। परमार्थतः ये नहीं हैं।। यह सब परमार्थ सिद्ध कर लेना इसीलिये ही नहीं है; क्योंकि ये सभी कुछ तो ऐसे ही हैं, जैसे कि -
सपनें होइ भिखारि नृप रंकु नाकपति होइ।
जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ।।
जैसे स्वप्नमें राजा भिखारी हो जाय या कंगाल स्वर्गका स्वामी इन्द्र हो जाय, तो जागनेपर लाभ या हानि कुछ भी नहीं है; वैसे ही इस दृश्य-प्रपञ्चको हृदयसे देखना चाहिये।। भगवान् श्रीकृष्णजी भी कहते हैं कि -
न मां दुष्कृतिनो मूढ़ाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः।।
मायाके द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है ऐसे आसुर-स्वभावको धारण किये हुए, मनुष्योंमें नीच, दूषित कर्म करनेवाले मूढ़लोग मुझको नहीं भजते।। गीता ७/१५।।
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*भगवान के मंदिर के प्रवेशद्वार के बाहर एक कच्छप क्यों होता है?

कछुआ एक सत्व गुण का प्रतीक है
कछुआ ने भगवान विष्णु के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। इसलीये, कछुए की गर्दन हमेशा नीचे झुकी रहती है। उनका ध्यान हमेशा देवता के चरणों पर रहता है
कुछ मंदिरों में कछुए की गर्दन उठी हुई प्रतीत होती है। गर्दन उठाने का अर्थ है कुंडलिनी जागृत करना।
आध्यात्मिक उत्थान की इच्छा जगाने के लिए कछुआ मंदिर में हमेशा के लिए रहता है।

कछुए के लक्षण:

एक कछुए के 6 अंग होते हैं (4 पैर 1 मुंह 1 पूंछ = 6) और एक इंसान के 6 दुश्मन होते हैं

काम, क्रोध, वासना, लालच, प्रलोभन और ईर्षा !

भक्त को यह सब छोड़ कर मंदिर में आना चाहिए, जैसे कछुआ यह सब छोड़ कर सर झुकाये होता है।

जिस तरह से एक कछुआ अपने बच्चे को प्यार देकर प्यार को बढ़ाता है, उसी तरहा भगवान की हम पर एक प्यारभरी नजर होनी चाहिए, ऐसी भावना है।

जिस तरह एक कछुआ अपने सभी इंद्रियों को अपनी इच्छानुसार सिकोड़ सकता है, उसी तरह एक भक्त के लिए भी संयम बरतना और मंदिर में भगवान के सामने जाते समय अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना महत्वपूर्ण है। कछुआ हमें सिखाता है कि इंद्रियों को काबू मे रखे बिना प्रभु की भक्ति संभव नहीं है।

इसका उल्लेख गीता में भी है

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।। जिस प्रकार कछुआ विविध अंगों को अपने भीतर सिकोड़ लेता है उसी प्रकार, जब यह योगी इन्द्रियों को विषयों से पूर्णतया अपने भीतर लौटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थितप्रज्ञ मानी जाती है।
कछुए को नमस्कार करने और मंदिर परिसर में प्रवेश करने का अर्थ है :

मंदिर में प्रवेश करते वक्त कछुए का अभिवादन किया जाता है। उसे नमस्कार करनेके बाद ही मंदिर मे प्रवेश किया जाता है। इसका मतलब यह है कि भगवान की सच्ची कृपा कछुए के गुणों का अनुमोदन करने के बाद ही होती है।

नमोस्तुते
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*खण्डन अथवा मण्डन....??*

*वर्तमान समय में लोगों को किसी दुसरे के विचारो का खंडन करने में अत्यधिक आनंद आने लगा है.*

*लेकिन खण्डन में सुख लेने वाले, ये कब समझेंगे कि खण्डन मजे लेने अथवा देने के लिए नहीं अपितु सोद्देश्य होता है ना कि निरुद्देश्य*

*यथा अनाज का खण्डन हुआ तो दलिया, पुनः दलिये का खण्डन हुआ तो आटा और इस आटे में जल आदि मिला रोटी रूपी मण्डन के लिए,,,,अनाज का खण्डन इतनी बार किया जाता है ।*

*बस यही द्रष्टान्त ज्यों का त्यों समस्त विचार धाराओं पर भी लागू होता है जो भी विकृत हो चुकी हैं।*

*विकृति की निवृत्ति के लिए खण्डन अत्यावश्यक है किन्तु खण्डन कर्त्ता की योग्यता खण्डन का उद्देश्य मण्डन अर्थात सुधार, इतनी तो अवश्य ही होनी चाहिए....*

*जब दृष्टि ऐसी रहेगी तो निश्चित ही दृष्टिकोण भी उत्तम रहेगा खण्डन कर्त्ता का स्वयं भी और श्रोताओं का भी ।*

*"खण्डन" अपमानित करने, नीचा दिखाने, पराजित करने अथवा स्वयं को परमात्मा सिद्ध करने के लिए नहीं अपितु बोध के लिए है,सुप्त अवस्था से जाग्रत होने और करने के लिए है.....*

*स्वयं सुखी होकर अन्यों को भी सुख पहुंचाने के लिए है....बात बात पर तानें मारकर, उलाहने देकर, दूसरे को हेय, अत्यन्त निकृष्ट मानकर उसका शोषण करने, हतोत्साहित करने, खिल्ली उडाकर उन्हें गुलाम बनाने अथवा उस पर अपना प्रभाव जमाने के लिए है ही नहीं ।*

*बडे स्नेह भाव से युक्त हो, विनम्रता पूर्वक सभी सुपात्रों के समक्ष सत्य व असत्य को विश्लेषित करते हुए प्रस्तुत करके सभी को पूरी स्वतन्त्रता से स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार देना ही अग्रजों, आचार्यों, विद्वानों, माता-पिता सहित समस्त सज्जनों का कर्तव्य है ।*

*अध्यात्म पथ में बलात् नहीं अपितु सहज होकर अन्यों को भी सहजता का उपदेश आचरण पूर्वक वाणी आदि के माध्यम से किया जाता है.......*

*वो तो बेचारे पहले ही बहुत कष्ट में हैं, दुःख में हैं, परमात्मा के न्याय की मार से सन्तप्त हैं, बहुतेरे क्लेशों से घिरे हुए हैं तब भी उन पर क्या करुणा आदि करते हुए उन्हें प्रीति पूर्वक तनिक भर सम्मान से सहयोग नहीं किया जा सकता...??*

*यही है खण्डन कि उनके दुःखों, क्लेशों, कष्टों, अविद्यान्धकार का खण्डन किया जाये और सुख, सहजता, सन्तुष्टि, तृप्ति रूपी मण्डन से आच्छादित किया जाये ।*

जय श्री हरि विष्णु
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कबीर के वचन

''संतों शब्दई शब्द बखाना ।शब्द फांस फँसा सब कोई ।

शब्द नहीं पहचाना ।प्रथमहिं ब्रह्म स्वं इच्छा ते ।

पाँचै शब्द उचारा ।सोहं निरंजन रंरकार शक्ति और ॐकारा ।

पाँचों तत्व प्रकृति । तीनों गुण उपजाया ।

लोक द्वीप चारों खान । चौरासी लख बनाया।

शब्दइ काल कलंदर कहिये । शब्दइ भर्म भुलाया ।

पाँच शब्द की आशा में । सर्वस मूल गंवाया ।

शब्दइ ब्रह्म प्रकाश मेंट के । बैठे मूंदे द्वारा

शब्दइ निरगुण शब्दइ सरगुण । शब्दइ वेद पुकारा ।

शुद्ध ब्रह्म काया के भीतर । बैठ करे स्थाना ?

ज्ञानी योगी पंडित औ । सिद्ध शब्द में उरझाना ।

पाँचइ शब्द पाँच हैं मुद्रा ।काया व्यास देव ताहि पहिचाना ।

चांद सूर्य तिहि जाना । सोहं शब्द अगोचरी मुद्रा ।

भंवर गुफा स्थाना । बीच ठिकाना ।
जो जिहसक आराधन करता । सो तिहि करत बखाना ।

शब्द निरंजन चांचरी मुद्रा । है नैनन के माँही ।

ताको जाने गोरख योगी । महा तेज तप माँही ।

शब्द ॐकार भूचरी मुद्रा । त्रिकुटी है स्थाना।

शुकदेव मुनी ताहि पहिचाना । सुन अनहद को काना ।

शब्द रंरकार खेचरी मुद्रा । दसवें द्वार ठिकाना।

ब्रह्मा विष्णु महेश आदि लो । रंरकार पहिचाना ।

शक्ति शब्द ध्यान उनमुनी मुद्रा । बसे आकाश सनेही ।

झिलमिल झिलमिल जोत दिखावे । जाने जनक विदेही ।
पाँच शब्द पाँच हैं मुद्रा । सो निश्चय कर जाना ।

आगे पुरुष पुरान निःअक्षर । तिनकी खबर न जाना ?

नौ नाथ चौरासी सिद्धि लो । पाँच शब्द में अटके

मुद्रा साध रहे घट भीतर । फिर औंधे मुख लटके।

पाँच शब्द पाँच है मुद्रा ।लोक द्वीप यम जाला ।

कहैं कबीर अक्षर के आगे। निःअक्षर का उजियाला ।
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आप सभी को धनतरेस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं..❤️