*_एक बार कबीर दास जी हरि भजन करते हुए एक गली से निकल रहे थे कि उनके आगे कुछ स्त्रियां जा रही थी उसी में से एक स्त्री की शादी तय हुई थी और अपने ससुरालवालों की तरफ से भेजा गया नथनी की तारीफ वह लडकी कर रही थी।नथनी ऐसी है नथनी वैसी है खास मेरे लिए उन्होंने भेजी है।बार बार नथनी की ही बात कर रही थी।_*
*_उसके पीछे चल रहे कबीरदासजी के कानों में सारी बात पड रही थी।तेजी से कदम बढाकर कबीरदासजी उस लडकी से आगे आकर कहा।_*
*_नथनी दीनी यार, वो चिंतन बारम्बार।_*
*_नाक दीनी करतार, उनको दिया बिसार।।_*
*_सोचो यदि नाक ही ना होती तो नथनी कहां पहनती यही जीवन में हम भी करते हैं।भौतिक वस्तुओं का तो हमें ज्ञान रहता है परंतु जिस परमात्मा ने यह दुर्लभ मनुष्य देह दी और इस देह से सम्बंधित सारी वस्तुएं रिश्ते नाते दिये उसी को याद करने के लिए हमारे पास समय नहीं होता।_*
*_उसके पीछे चल रहे कबीरदासजी के कानों में सारी बात पड रही थी।तेजी से कदम बढाकर कबीरदासजी उस लडकी से आगे आकर कहा।_*
*_नथनी दीनी यार, वो चिंतन बारम्बार।_*
*_नाक दीनी करतार, उनको दिया बिसार।।_*
*_सोचो यदि नाक ही ना होती तो नथनी कहां पहनती यही जीवन में हम भी करते हैं।भौतिक वस्तुओं का तो हमें ज्ञान रहता है परंतु जिस परमात्मा ने यह दुर्लभ मनुष्य देह दी और इस देह से सम्बंधित सारी वस्तुएं रिश्ते नाते दिये उसी को याद करने के लिए हमारे पास समय नहीं होता।_*
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छठपर्व शंका समाधान
==============
लोकपर्व छठ या सूर्यषष्ठी पूजा का फैलाव देश-विदेश के उन भागों में भी हो गया है, जहां बिहार-झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग जाकर बस गए हैं। इसके बावजूद, देश की बहुत बड़ी आबादी इस पूजा की मौलिक बातों से अनजान है। इतना ही नहीं, जिन लोगों के घर में यह व्रत होता है, उनके मन में भी इसे लेकर कई सवाल उठते हैं।
1. छठ या सूर्यषष्ठी व्रत में किन देवी-देवताओं की पूजा की जाती है?
इस व्रत में सूर्य देवता की पूजा की जाती है, जो प्रत्यक्ष दिखते हैं और सभी प्राणियों के जीवन के आधार हैं... सूर्य के साथ-साथ षष्ठी देवी या छठ मैया की भी पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, षष्ठी माता संतानों की रक्षा करती हैं और उन्हें स्वस्थ और दीघार्यु बनाती हैं। इस अवसर पर सूर्यदेव की पत्नी उषा और प्रत्युषा को भी अर्घ्य देकर प्रसन्न किया जाता है। छठ व्रत में सूर्यदेव और षष्ठी देवी दोनों की पूजा साथ-साथ की जाती है। इस तरह ये पूजा अपने-आप में बेहद खास है।
2. सूर्य से तो सभी परिचित हैं, लेकिन छठ मैया कौन-सी देवी हैं?
सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी के एक प्रमुख अंश को देवसेना कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक प्रचलित नाम षष्ठी है।
षष्ठी देवी को ब्रह्मा की मानसपुत्री भी कहा गया है। पुराणों में इन देवी का एक नाम कात्यायनी भी है। इनकी पूजा नवरात्र में षष्ठी तिथि को होती है। षष्ठी देवी को ही स्थानीय बोली में छठ मैया कहा गया है, जो नि:संतानों को संतान देती हैं और सभी बालकों की रक्षा करती हैं।
3. षष्ठी देवी की पूजा की शुरुआत कैसे हुई? पुराण की कथा क्या है?
प्रथम मनु स्वायम्भुव के पुत्र राजा प्रियव्रत को कोई संतान नहीं थी, इसके कारण वह दुखी रहते थे। महर्षि कश्यप ने राजा से पुत्रेष्टि यज्ञ कराने को कहा. राजा ने यज्ञ कराया, जिसके बाद उनकी महारानी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन दुर्योग से वह शिशु मरा पैदा हुआ था। राजा का दुख देखकर एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। उन्होंने उस मृत बालक को जीवित कर दिया। देवी की इस कृपा से राजा बहुत खुश हुए. उन्होंने षष्ठी देवी की स्तुति की। तभी से यह पूजा संपन्न की जा रही है।
4. आध्यात्मिक ग्रंथों में सूर्य की पूजा का प्रसंग कहां-कहां मिलता है?
शास्त्रों में भगवान सूर्य को गुरु भी कहा गया है। पवनपुत्र हनुमान ने सूर्य से ही शिक्षा पाई थी। श्रीराम ने आदित्यहृदयस्तोत्र का पाठ कर सूर्य देवता को प्रसन्न करने के बाद ही रावण को अंतिम बाण मारा था और उस पर विजय पाई थी।
श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग हो गया था, तब उन्होंने सूर्य की उपासना करके ही रोग से मुक्ति पाई थी...सूर्य की पूजा वैदिक काल से काफी पहले से होती आई है।
5. सनातन धर्म के अनेक देवी-देवताओं के बीच सूर्य का क्या स्थान है?
सूर्य की गिनती उन 5 प्रमुख देवी-देवताओं में की जाती है, जिनकी पूजा सबसे पहले करने का विधान है। पंचदेव में सूर्य के अलाव अन्य 4 हैं: गणेश, दुर्गा, शिव, विष्णु. (मत्स्य पुराण)
6. सूर्य की पूजा से क्या-क्या फल मिलते हैं? पुराण का क्या मत है?
भगवान सूर्य सभी पर उपकार करने वाले, अत्यंत दयालु हैं। वे उपासक को आयु, आरोग्य, धन-धान्य, संतान, तेज, कांति, यश, वैभव और सौभाग्य देते हैं। वे सभी को चेतना देते हैं।
सूर्य की उपासना करने से मनुष्य को सभी तरह के रोगों से छुटकारा मिल जाता है। जो सूर्य की उपासना करते हैं, वे दरिद्र, दुखी, शोकग्रस्त और अंधे नहीं होते।
सूर्य को ब्रह्म का ही तेज बताया है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों पुरुषार्थों को देने वाले हैं, साथ ही पूरे संसार की रक्षा करने वाले हैं।
7. इस पूजा में लोग पवित्र नदी और तालाबों आदि के किनारे क्यों जमा होते हैं?
सूर्य की पूजा में उन्हें जल से अर्घ्य देने का विधान है। पवित्र नदियों के जल से सूर्य को अर्घ्य देने और स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। हालांकि यह पूजा किसी भी साफ-सुथरी जगह पर की जा सकती है।
8. छठ में नदी-तालाबों पर भीड़ बहुत बढ़ जाती है। भीड़ से बचते हुए व्रत करने का क्या तरीका हो सकता है?
इस भीड़ से बचने के लिए हाल के दशकों में घर में ही छठ करने का चलन तेजी से बढ़ा है। 'मन चंगा, तो कठौती में गंगा' की कहावत यहां भी गौर करने लायक है। कई लोग घर के आंगन या छतों पर भी छठ व्रत करते हैं। व्रत करने वालों की सुविधा को ध्यान में रखकर ऐसा किया जाता है।
9. ज्यादातर महिलाएं ही छठ पूजा क्यों करती हैं?
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लोकपर्व छठ या सूर्यषष्ठी पूजा का फैलाव देश-विदेश के उन भागों में भी हो गया है, जहां बिहार-झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग जाकर बस गए हैं। इसके बावजूद, देश की बहुत बड़ी आबादी इस पूजा की मौलिक बातों से अनजान है। इतना ही नहीं, जिन लोगों के घर में यह व्रत होता है, उनके मन में भी इसे लेकर कई सवाल उठते हैं।
1. छठ या सूर्यषष्ठी व्रत में किन देवी-देवताओं की पूजा की जाती है?
इस व्रत में सूर्य देवता की पूजा की जाती है, जो प्रत्यक्ष दिखते हैं और सभी प्राणियों के जीवन के आधार हैं... सूर्य के साथ-साथ षष्ठी देवी या छठ मैया की भी पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, षष्ठी माता संतानों की रक्षा करती हैं और उन्हें स्वस्थ और दीघार्यु बनाती हैं। इस अवसर पर सूर्यदेव की पत्नी उषा और प्रत्युषा को भी अर्घ्य देकर प्रसन्न किया जाता है। छठ व्रत में सूर्यदेव और षष्ठी देवी दोनों की पूजा साथ-साथ की जाती है। इस तरह ये पूजा अपने-आप में बेहद खास है।
2. सूर्य से तो सभी परिचित हैं, लेकिन छठ मैया कौन-सी देवी हैं?
सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी के एक प्रमुख अंश को देवसेना कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक प्रचलित नाम षष्ठी है।
षष्ठी देवी को ब्रह्मा की मानसपुत्री भी कहा गया है। पुराणों में इन देवी का एक नाम कात्यायनी भी है। इनकी पूजा नवरात्र में षष्ठी तिथि को होती है। षष्ठी देवी को ही स्थानीय बोली में छठ मैया कहा गया है, जो नि:संतानों को संतान देती हैं और सभी बालकों की रक्षा करती हैं।
3. षष्ठी देवी की पूजा की शुरुआत कैसे हुई? पुराण की कथा क्या है?
प्रथम मनु स्वायम्भुव के पुत्र राजा प्रियव्रत को कोई संतान नहीं थी, इसके कारण वह दुखी रहते थे। महर्षि कश्यप ने राजा से पुत्रेष्टि यज्ञ कराने को कहा. राजा ने यज्ञ कराया, जिसके बाद उनकी महारानी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन दुर्योग से वह शिशु मरा पैदा हुआ था। राजा का दुख देखकर एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। उन्होंने उस मृत बालक को जीवित कर दिया। देवी की इस कृपा से राजा बहुत खुश हुए. उन्होंने षष्ठी देवी की स्तुति की। तभी से यह पूजा संपन्न की जा रही है।
4. आध्यात्मिक ग्रंथों में सूर्य की पूजा का प्रसंग कहां-कहां मिलता है?
शास्त्रों में भगवान सूर्य को गुरु भी कहा गया है। पवनपुत्र हनुमान ने सूर्य से ही शिक्षा पाई थी। श्रीराम ने आदित्यहृदयस्तोत्र का पाठ कर सूर्य देवता को प्रसन्न करने के बाद ही रावण को अंतिम बाण मारा था और उस पर विजय पाई थी।
श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग हो गया था, तब उन्होंने सूर्य की उपासना करके ही रोग से मुक्ति पाई थी...सूर्य की पूजा वैदिक काल से काफी पहले से होती आई है।
5. सनातन धर्म के अनेक देवी-देवताओं के बीच सूर्य का क्या स्थान है?
सूर्य की गिनती उन 5 प्रमुख देवी-देवताओं में की जाती है, जिनकी पूजा सबसे पहले करने का विधान है। पंचदेव में सूर्य के अलाव अन्य 4 हैं: गणेश, दुर्गा, शिव, विष्णु. (मत्स्य पुराण)
6. सूर्य की पूजा से क्या-क्या फल मिलते हैं? पुराण का क्या मत है?
भगवान सूर्य सभी पर उपकार करने वाले, अत्यंत दयालु हैं। वे उपासक को आयु, आरोग्य, धन-धान्य, संतान, तेज, कांति, यश, वैभव और सौभाग्य देते हैं। वे सभी को चेतना देते हैं।
सूर्य की उपासना करने से मनुष्य को सभी तरह के रोगों से छुटकारा मिल जाता है। जो सूर्य की उपासना करते हैं, वे दरिद्र, दुखी, शोकग्रस्त और अंधे नहीं होते।
सूर्य को ब्रह्म का ही तेज बताया है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों पुरुषार्थों को देने वाले हैं, साथ ही पूरे संसार की रक्षा करने वाले हैं।
7. इस पूजा में लोग पवित्र नदी और तालाबों आदि के किनारे क्यों जमा होते हैं?
सूर्य की पूजा में उन्हें जल से अर्घ्य देने का विधान है। पवित्र नदियों के जल से सूर्य को अर्घ्य देने और स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। हालांकि यह पूजा किसी भी साफ-सुथरी जगह पर की जा सकती है।
8. छठ में नदी-तालाबों पर भीड़ बहुत बढ़ जाती है। भीड़ से बचते हुए व्रत करने का क्या तरीका हो सकता है?
इस भीड़ से बचने के लिए हाल के दशकों में घर में ही छठ करने का चलन तेजी से बढ़ा है। 'मन चंगा, तो कठौती में गंगा' की कहावत यहां भी गौर करने लायक है। कई लोग घर के आंगन या छतों पर भी छठ व्रत करते हैं। व्रत करने वालों की सुविधा को ध्यान में रखकर ऐसा किया जाता है।
9. ज्यादातर महिलाएं ही छठ पूजा क्यों करती हैं?
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ऐसा देखा जाता है कि महिलाएं अनेक कष्ट सहकर पूरे परिवार के कल्याण की न केवल कामना करती हैं, बल्कि इसके लिए तरह-तरह के यत्न करने में पुरुषों से आगे रहती हैं। इसे महिलाओं के त्याग-तप की भावना से जोड़कर देखा जा सकता है।
छठ पूजा कोई भी कर सकता है, चाहे वह महिला हो या पुरुष। पर इतना जरूर है कि महिलाएं संतान की कामना से या संतान के स्वास्थ्य और उनके दीघार्यु होने के लिए यह पूजा अधिक बढ़-चढ़कर और पूरी श्रद्धा से करती हैं।
10. क्या यह पूजा किसी भी सामाजिक वर्ग या जाति के लोग कर सकते हैं?
सूर्य सभी प्राणियों पर समान रूप से कृपा करते हैं। वे किसी तरह का भेदभाव नहीं करते। इस पूजा में वर्ण या जाति के आधार पर भेद नहीं है। इस पूजा के प्रति समाज के हर वर्ग-जाति में गहरी श्रद्धा देखी जाती है। हर कोई मिल-जुलकर, साथ-साथ इसमें शामिल होता है। हर जाति-धर्म के लोग इस पूजा को कर सकते हैं।
11. क्या इस पूजा में कोई सामाजिक संदेश भी छिपा हुआ है?
सूर्यषष्ठी व्रत में लोग उगते हुए सूर्य की भी पूजा करते हैं, डूबते हुए सूर्य की भी उतनी ही श्रद्धा से पूजा करते हैं। इसमें कई तरह के संकेत छिपे हैं। ये पूरी दुनिया में भारत की आध्यात्मिक श्रेष्ठता को दिखाता है।
इस पूजा में जातियों के आधार पर कहीं कोई भेदभाव नहीं है, समाज में सभी को बराबरी का दर्जा दिया गया है। सूर्य देवता को बांस के बने जिस सूप और डाले में रखकर प्रसाद अर्पित किया जाता है, उसे सामाजिक रूप से अत्यंत पिछड़ी जाति के लोग बनाते हैं। इससे सामाजिक संदेश एकदम स्पष्ट है।
12. बिहार से छठ पूजा का विशेष संबंध क्यों है?
सूर्य की पूजा के साथ-साथ षष्ठी देवी की पूजा की अनूठी परंपरा बिहार के इस सबसे बड़े लोकपर्व में देखी जाती है। यही बात इस पूजा के मामले में प्रदेश को खास बनाती है। बिहार में सूर्य पूजा सदियों से प्रचलित है। सूर्य पुराण में यहां के देव मंदिरों की महिमा का वर्णन मिलता है। यहां सूर्यपुत्र कर्ण की जन्मस्थली भी है। अत: स्वाभाविक रूप से इस प्रदेश के लोगों की आस्था सूर्य देवता में ज्यादा है।
13. बिहार के देव सूर्य मंदिर की खासियत क्या है?
सबसे बड़ी खासियत यह है कि मंदिर का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर है, जबकि आम तौर पर सूर्य मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर होता है। मान्यता है कि यहां के विशेष सूर्य मंदिर का निर्माण देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने किया था। स्थापत्य और वास्तुकला कला के दृष्टिकोण से यहां के सूर्य मंदिर बेजोड़ हैं।
14. कार्तिक महीने के अलावा यह पूजा साल में कब की जाती है?
कार्तिक के अलावा छठ व्रत चैत्र शुक्ल पक्ष में चतुर्थी से लेकर सप्तमी तक किया जाता है। इसे आम बोलचाल में चैती छठ कहते हैं।
15. इस पूजा में कुछ लोग जमीन पर बार-बार लेटकर, कष्ट सहते हुए घाट की ओर क्यों जाते हैं?
आम बोलचाल की भाषा में इसे ‘कष्टी देना’ कहते हैं। ज्यादातर मामलों में ऐसा तब होता है, जब किसी ने इस तरह की कोई मन्नत मानी हो।
16. 4 दिनों तक चलने वाली छठ पूजा में किस-किस दिन क्या-क्या होता है?
कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को व्रत की शुरुआत 'नहाय-खाय' के साथ होती है। इस दिन व्रत करने वाले और घर के सारे लोग चावल-दाल और कद्दू से बने व्यंजन प्रसाद के तौर पर ग्रहण करते हैं। वास्तव में ये अगले 3 दिनों तक चलने वाली पूजा की शारीरिक और मानसिक तैयारी है।
दूसरे दिन, कार्तिक शुक्ल पंचमी को शाम में मुख्य पूजा होती है. इसे ‘खरना’ कहा जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस या गुड़ में बनी खीर चढ़ाई जाती है। कई घरों में चावल का पिट्ठा भी बनाया जाता है। लोग उन घरों में जाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिन घरों में पूजा होती है।
तीसरे दिन, कार्तिक शुक्ल षष्ठी की शाम को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती के साथ-साथ सारे लोग डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
चौथे दिन, कार्तिक शुक्ल सप्तमी को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पारण के साथ व्रत की समाप्ति होती है।
छठ पूजा कोई भी कर सकता है, चाहे वह महिला हो या पुरुष। पर इतना जरूर है कि महिलाएं संतान की कामना से या संतान के स्वास्थ्य और उनके दीघार्यु होने के लिए यह पूजा अधिक बढ़-चढ़कर और पूरी श्रद्धा से करती हैं।
10. क्या यह पूजा किसी भी सामाजिक वर्ग या जाति के लोग कर सकते हैं?
सूर्य सभी प्राणियों पर समान रूप से कृपा करते हैं। वे किसी तरह का भेदभाव नहीं करते। इस पूजा में वर्ण या जाति के आधार पर भेद नहीं है। इस पूजा के प्रति समाज के हर वर्ग-जाति में गहरी श्रद्धा देखी जाती है। हर कोई मिल-जुलकर, साथ-साथ इसमें शामिल होता है। हर जाति-धर्म के लोग इस पूजा को कर सकते हैं।
11. क्या इस पूजा में कोई सामाजिक संदेश भी छिपा हुआ है?
सूर्यषष्ठी व्रत में लोग उगते हुए सूर्य की भी पूजा करते हैं, डूबते हुए सूर्य की भी उतनी ही श्रद्धा से पूजा करते हैं। इसमें कई तरह के संकेत छिपे हैं। ये पूरी दुनिया में भारत की आध्यात्मिक श्रेष्ठता को दिखाता है।
इस पूजा में जातियों के आधार पर कहीं कोई भेदभाव नहीं है, समाज में सभी को बराबरी का दर्जा दिया गया है। सूर्य देवता को बांस के बने जिस सूप और डाले में रखकर प्रसाद अर्पित किया जाता है, उसे सामाजिक रूप से अत्यंत पिछड़ी जाति के लोग बनाते हैं। इससे सामाजिक संदेश एकदम स्पष्ट है।
12. बिहार से छठ पूजा का विशेष संबंध क्यों है?
सूर्य की पूजा के साथ-साथ षष्ठी देवी की पूजा की अनूठी परंपरा बिहार के इस सबसे बड़े लोकपर्व में देखी जाती है। यही बात इस पूजा के मामले में प्रदेश को खास बनाती है। बिहार में सूर्य पूजा सदियों से प्रचलित है। सूर्य पुराण में यहां के देव मंदिरों की महिमा का वर्णन मिलता है। यहां सूर्यपुत्र कर्ण की जन्मस्थली भी है। अत: स्वाभाविक रूप से इस प्रदेश के लोगों की आस्था सूर्य देवता में ज्यादा है।
13. बिहार के देव सूर्य मंदिर की खासियत क्या है?
सबसे बड़ी खासियत यह है कि मंदिर का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर है, जबकि आम तौर पर सूर्य मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर होता है। मान्यता है कि यहां के विशेष सूर्य मंदिर का निर्माण देवताओं के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने किया था। स्थापत्य और वास्तुकला कला के दृष्टिकोण से यहां के सूर्य मंदिर बेजोड़ हैं।
14. कार्तिक महीने के अलावा यह पूजा साल में कब की जाती है?
कार्तिक के अलावा छठ व्रत चैत्र शुक्ल पक्ष में चतुर्थी से लेकर सप्तमी तक किया जाता है। इसे आम बोलचाल में चैती छठ कहते हैं।
15. इस पूजा में कुछ लोग जमीन पर बार-बार लेटकर, कष्ट सहते हुए घाट की ओर क्यों जाते हैं?
आम बोलचाल की भाषा में इसे ‘कष्टी देना’ कहते हैं। ज्यादातर मामलों में ऐसा तब होता है, जब किसी ने इस तरह की कोई मन्नत मानी हो।
16. 4 दिनों तक चलने वाली छठ पूजा में किस-किस दिन क्या-क्या होता है?
कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को व्रत की शुरुआत 'नहाय-खाय' के साथ होती है। इस दिन व्रत करने वाले और घर के सारे लोग चावल-दाल और कद्दू से बने व्यंजन प्रसाद के तौर पर ग्रहण करते हैं। वास्तव में ये अगले 3 दिनों तक चलने वाली पूजा की शारीरिक और मानसिक तैयारी है।
दूसरे दिन, कार्तिक शुक्ल पंचमी को शाम में मुख्य पूजा होती है. इसे ‘खरना’ कहा जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस या गुड़ में बनी खीर चढ़ाई जाती है। कई घरों में चावल का पिट्ठा भी बनाया जाता है। लोग उन घरों में जाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिन घरों में पूजा होती है।
तीसरे दिन, कार्तिक शुक्ल षष्ठी की शाम को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती के साथ-साथ सारे लोग डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
चौथे दिन, कार्तिक शुक्ल सप्तमी को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पारण के साथ व्रत की समाप्ति होती है।
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* नवंबर महीने केशुभाशुभ मुहूर्त*
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*_विवाह मुहूर्त_*
विवाह मुहूर्त
17 जुलाई से 15 नवम्बर 2024 ई.सन् तक हरिशयन का दोष है इसलिए इन दिनों शुभ विवाह नहीं है। विवाह मुहूर्त
16, 17, 18, 22, 23, 25, 26, 28, 29
मुंडन मुहूर्त
कोई मुहूर्त नहीं है
गृह प्रवेश मुहूर्त
13, 16, 18, 25
नामकरण मुहूर्त
13, 17, 18, 20, 21, 25, 27, 28
अन्नप्राशन मुहूर्त
11, 13, 14, 20, 25, 28, 29
कर्णवेध मुहूर्त
09, 13, 14, 20, 21, 27
विद्यारम्भ मुहूर्त
17, 20, 21, 24, 27
उपनयन/जनेऊ मुहूर्त
11, 13, 17, 20
वाहन खरीद मुहूर्त
13, 18, 20, 21, 25, 28
प्रॉपर्टी खरीद मुहूर्त
11, 19, 20, 30
सर्वार्थ सिद्धि योग
09, 12, 14, 16, 18, 21, 24
अमृत सिद्धि योग
16, 18, 21
पंचक
समय शुरू - शनिवार, 9 नवंबर (11:28 PM) - गुरूवार, 14 नवंबर (03:11 AM) समाप्त समय
(09, 10, 11, 12, 13, 14)
भद्रा
भद्रा (विष्टि करण) - नवंबर
समय शुरू - समाप्त समय
शुक्रवार, 8 नवंबर (11:58 PM) - शनिवार, 9 नवंबर (11:27 AM)
मंगलवार, 12 नवंबर (05:30 AM) - मंगलवार, 12 नवंबर (04:06 PM)
शुक्रवार, 15 नवंबर (06:21 AM) - शुक्रवार, 15 नवंबर (04:39 PM)
सोमवार, 18 नवंबर (07:58 AM) - सोमवार, 18 नवंबर (06:57 PM)
गुरूवार, 21 नवंबर (05:05 PM) - शुक्रवार, 22 नवंबर (05:32 AM)
सोमवार, 25 नवंबर (11:41 AM) - मंगलवार, 26 नवंबर (01:04 AM)
शुक्रवार, 29 नवंबर (08:42 AM) - शुक्रवार, 29 नवंबर (09:40 PM)
👇
*_विवाह मुहूर्त_*
विवाह मुहूर्त
17 जुलाई से 15 नवम्बर 2024 ई.सन् तक हरिशयन का दोष है इसलिए इन दिनों शुभ विवाह नहीं है। विवाह मुहूर्त
16, 17, 18, 22, 23, 25, 26, 28, 29
मुंडन मुहूर्त
कोई मुहूर्त नहीं है
गृह प्रवेश मुहूर्त
13, 16, 18, 25
नामकरण मुहूर्त
13, 17, 18, 20, 21, 25, 27, 28
अन्नप्राशन मुहूर्त
11, 13, 14, 20, 25, 28, 29
कर्णवेध मुहूर्त
09, 13, 14, 20, 21, 27
विद्यारम्भ मुहूर्त
17, 20, 21, 24, 27
उपनयन/जनेऊ मुहूर्त
11, 13, 17, 20
वाहन खरीद मुहूर्त
13, 18, 20, 21, 25, 28
प्रॉपर्टी खरीद मुहूर्त
11, 19, 20, 30
सर्वार्थ सिद्धि योग
09, 12, 14, 16, 18, 21, 24
अमृत सिद्धि योग
16, 18, 21
पंचक
समय शुरू - शनिवार, 9 नवंबर (11:28 PM) - गुरूवार, 14 नवंबर (03:11 AM) समाप्त समय
(09, 10, 11, 12, 13, 14)
भद्रा
भद्रा (विष्टि करण) - नवंबर
समय शुरू - समाप्त समय
शुक्रवार, 8 नवंबर (11:58 PM) - शनिवार, 9 नवंबर (11:27 AM)
मंगलवार, 12 नवंबर (05:30 AM) - मंगलवार, 12 नवंबर (04:06 PM)
शुक्रवार, 15 नवंबर (06:21 AM) - शुक्रवार, 15 नवंबर (04:39 PM)
सोमवार, 18 नवंबर (07:58 AM) - सोमवार, 18 नवंबर (06:57 PM)
गुरूवार, 21 नवंबर (05:05 PM) - शुक्रवार, 22 नवंबर (05:32 AM)
सोमवार, 25 नवंबर (11:41 AM) - मंगलवार, 26 नवंबर (01:04 AM)
शुक्रवार, 29 नवंबर (08:42 AM) - शुक्रवार, 29 नवंबर (09:40 PM)
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*तुलसी विवाह के दिन है भद्रा और पंचक, जानें भगवान शालिग्राम से तुलसी विवाह कराने के नियम, विधि*
*इस साल तुलसी विवाह 12 नवंबर मंगलवार को है. तुलसी विवाह के दिन भद्रा है, जिसका वास स्थान पृथ्वी है. उस दिन भद्रा सुबह से शाम तक है, वहीं पंचक भी पूरे दिन रहेगा. इस बार तुलसी विवाह वाले दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग बन रहे हैं. भगवान शालिग्रामा से माता तुलसी का विवाह सर्वार्थ सिद्धि योग में ही होगा. उस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 07:52 बजे से अगले दिन सुबह 05:40 बजे तक है. तुलसी विवाह कराने से परिवार में सुख, समृद्धि और शांति आती है, वैवाहिक जीवन खुशहाल होता है. विवाह में होने वाली देरी या अड़चन दूर होती है और जल्द शादी के योग बनते हैं. यदि आप इस साल अपने घर पर तुलसी विवाह कराना चाहते हैं तो आपको शुभ मुहूर्त और नियम के बारे में जानना चाहिए. आपको इस बारे में विस्तार से बताते हैं।*
*तुलसी विवाह 2024 भद्रा काल*
इस साल तुलसी विवाह के दिन भद्रा का प्रारंभ सुबह 6 बजकर 42 मिनट से हो रहा है, जो शाम को 4 बजकर 4 मिनट तक है. उसके बाद भद्रा का समापन हो जाएगा. जो लोग तुलसी विवाह कराना चाहते हैं, उनको भद्रा से डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि तुलसी विवाह के समय से पहले ही भद्रा का समापन हो जा रहा है. तुलसी विवाह कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को होता है.
*तुलसी विवाह 2024 मुहूर्त*
*कार्तिक शुक्ल द्वादशी तिथि का प्रारंभ:-* 12 नवंबर, मंगलवार, शाम 4:04 बजे से
*कार्तिक शुक्ल द्वादशी तिथि का समापन:-* 13 नवंबर, बुधवार, दोपहर 1:01 बजे पर
*तुलसी विवाह का शुभ मुहूर्त:-* शाम 5:29 बजे से शाम 7:53 बजे तक
*तुलसी विवाह के नियम और विधि*
1. तुलसी विवाह के शुभ मुहूर्त से पूर्व परिवार के सभी सदस्य उस प्रकार से तैयार हों, जिस तरह से आप शादी समारोह में शामिल होने के लिए पारंपरिक कपड़े पहनते हैं.
2. उसके बाद पूजा स्थान, आंगन या छत पर तुलसी विवाह के लिए मंडप तैयार करें. तुलसी विवाह के लिए गन्ने का मंडप बनाएं और उसे फूलों से सजाएं.
3. उसके बाद आम की लकड़ी के बने पटरे या पटिया पर गमले में लगा तुलसी का पौधा रखें. अब आप तुलसी जी को अक्षत्, फूल, माला, हल्दी, सिंदूर, सोलह श्रृंगार की वस्तुएं, लाल साड़ी या चुनरी, नैवेद्य अर्पित करें.
4. फिर गमले में भगवान शालिग्राम को रखें. उनको तिल, हल्दी, पीले फूल, दूध, नैवेद्य आदि चढ़ाएं. दोनों को बेर, मूली, साग, आंवला आदि भी चढ़ाते हैं.
5. तुलसी विवाह के समय मंगलाष्टक का पाठ करें. माता तुलसी की आरती करें. उसके बाद 11 बार तुलसी परिक्रमा करें.
6. माता तुलसी और भगवान शालिग्राम से सुख, समृद्धि का आशीर्वाद लें. सबसे अंत में आप तुलसी विवाह का प्रसाद वितरण करें.
*#हरिऊँ*
🙏🏻🙏🏻🙏🏻
*इस साल तुलसी विवाह 12 नवंबर मंगलवार को है. तुलसी विवाह के दिन भद्रा है, जिसका वास स्थान पृथ्वी है. उस दिन भद्रा सुबह से शाम तक है, वहीं पंचक भी पूरे दिन रहेगा. इस बार तुलसी विवाह वाले दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग बन रहे हैं. भगवान शालिग्रामा से माता तुलसी का विवाह सर्वार्थ सिद्धि योग में ही होगा. उस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 07:52 बजे से अगले दिन सुबह 05:40 बजे तक है. तुलसी विवाह कराने से परिवार में सुख, समृद्धि और शांति आती है, वैवाहिक जीवन खुशहाल होता है. विवाह में होने वाली देरी या अड़चन दूर होती है और जल्द शादी के योग बनते हैं. यदि आप इस साल अपने घर पर तुलसी विवाह कराना चाहते हैं तो आपको शुभ मुहूर्त और नियम के बारे में जानना चाहिए. आपको इस बारे में विस्तार से बताते हैं।*
*तुलसी विवाह 2024 भद्रा काल*
इस साल तुलसी विवाह के दिन भद्रा का प्रारंभ सुबह 6 बजकर 42 मिनट से हो रहा है, जो शाम को 4 बजकर 4 मिनट तक है. उसके बाद भद्रा का समापन हो जाएगा. जो लोग तुलसी विवाह कराना चाहते हैं, उनको भद्रा से डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि तुलसी विवाह के समय से पहले ही भद्रा का समापन हो जा रहा है. तुलसी विवाह कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को होता है.
*तुलसी विवाह 2024 मुहूर्त*
*कार्तिक शुक्ल द्वादशी तिथि का प्रारंभ:-* 12 नवंबर, मंगलवार, शाम 4:04 बजे से
*कार्तिक शुक्ल द्वादशी तिथि का समापन:-* 13 नवंबर, बुधवार, दोपहर 1:01 बजे पर
*तुलसी विवाह का शुभ मुहूर्त:-* शाम 5:29 बजे से शाम 7:53 बजे तक
*तुलसी विवाह के नियम और विधि*
1. तुलसी विवाह के शुभ मुहूर्त से पूर्व परिवार के सभी सदस्य उस प्रकार से तैयार हों, जिस तरह से आप शादी समारोह में शामिल होने के लिए पारंपरिक कपड़े पहनते हैं.
2. उसके बाद पूजा स्थान, आंगन या छत पर तुलसी विवाह के लिए मंडप तैयार करें. तुलसी विवाह के लिए गन्ने का मंडप बनाएं और उसे फूलों से सजाएं.
3. उसके बाद आम की लकड़ी के बने पटरे या पटिया पर गमले में लगा तुलसी का पौधा रखें. अब आप तुलसी जी को अक्षत्, फूल, माला, हल्दी, सिंदूर, सोलह श्रृंगार की वस्तुएं, लाल साड़ी या चुनरी, नैवेद्य अर्पित करें.
4. फिर गमले में भगवान शालिग्राम को रखें. उनको तिल, हल्दी, पीले फूल, दूध, नैवेद्य आदि चढ़ाएं. दोनों को बेर, मूली, साग, आंवला आदि भी चढ़ाते हैं.
5. तुलसी विवाह के समय मंगलाष्टक का पाठ करें. माता तुलसी की आरती करें. उसके बाद 11 बार तुलसी परिक्रमा करें.
6. माता तुलसी और भगवान शालिग्राम से सुख, समृद्धि का आशीर्वाद लें. सबसे अंत में आप तुलसी विवाह का प्रसाद वितरण करें.
*#हरिऊँ*
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विज्ञान भैरव तंत्र से ली गई एक अद्भुत विधि
।।विज्ञान भैरव आग्रह और पूर्वाग्रह को जला देने को कहता है।।
तीसरी धारा से स्वयम् को अर्थात"गुप्त-सरस्वती" को संतृप्त कर देती हैं!!
क्रमद्वादशकं सम्यग् द्वादशाक्षरभेदितम् ।
स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या मुक्त्वा मुक्त्वान्तत: शिव: ।।30।।
शिवार्णवी कालिकान्तरी चूड़ामड़ी में एक अद्भुत सा श्लोक है--
"इडापिड़्गलयोर्मध्ये सुषुम्णा या भवेत्खलुः।
षट्स्थानेषु च षट्शक्तिं षट्पद्मं योगिनो विदुः।।"
दक्षिण नासिकास्थ इडा और वाम नासिकास्थ पिड़्गला इन्हीं दोनों के मध्य यदि प्रयत्न करने से कदाचित्"सुषुम्ना"नाडी स्थित हो जाये!!और जागृत होकर आप एक बार उसकी गतिविधियों को देख सकें!!
तो यहीं पर"पद्माकार"ऊपर के छहों चक्र एक दूसरे से संलग्न हैं!!तभी तो कहते हैं कि--
"न योगो नभसः पृष्ठे न भूमौ न रसाते।"
"भैरवी-सीद्धि"न योग से होती है न वह नभ,भूमि या फिर रसातल में ही स्थित है,वह तो सुषुम्ना में स्थित है!!अब आप ध्यान दें सखियों-साधनार्थ अनुलोम तथा विलोम के क्रम में--(रू.या.तं.32/6)-----
"चतुस्त्रीशत्संख्याघटितकवलं चासनमिह।
प्रबुद्धं देहस्य क्षयमरणशड़्काविरहितम्।।"
चौंसठ योगिनी,भैरव या भैरवी कही गयी हैं!!और योग तथा संयोग के भी चौंसठ ही आसन भी कहे गये हैं,और तो और चौंसठ ही मुद्रायें भी बतायी गयी हैं!! एक गुप्त रहस्यात्मक वैदिक संस्कारजन्य कथन भी है कि इसका षोडषांस--षोडसी कन्या या कुमार ही"नारीत्व या नरत्व"की सीमारेखा को प्राप्त भी होते हैं!! और इससे भी ज्यादा रहस्य की बात यह है कि"इडा,सूर्य-स्वर, गड़्गा,प्राण-वायु ही"पुरूष,शिव या फिर भैरव कहे गये हैं!!
पिंड़्ग्ला,यमुना,चन्द्र या फिर अपान-वायु ही"शिवा, सूरता अथवा भैरवी कही गयी हैं, और दूर्गम्य दूर्लभ ज्ञान तो यही है कि-"सुषुम्ना, समान-वायु,सरस्वती ही"अर्धनारिनाटकेश्वरी या लौकिक रूप से त्याज्या"पुँश्चली,निपूती,विधवा-पति-भक्षिका या फिर धूमावती कही गयी हैं!!
"कबिरा खड़ा बाजार में,लिये लुवाठी हांथ।
जो घर जारै आपना,सो हो ले मेरे साथ।।"
अब क्रिया
आपको करना यह है कि प्रथम तो आठ पलों तक दक्षिण नासिका से स्वास लेते हुवे आठ पलों तक कुम्भक करते हुवे और फिर आठ ही पलों तक वाम-नासिका से रेचन करना है!! और पुनश्च वाम नासिका से स्वास लेते हुवे आठ पलों तक कुम्भक करते हुवे और फिर आठ ही पलों तक दक्षिण-नासिका से रेचन करना है!! और इसी प्रक्रिया को चौंसठ बार करना है,ऐसा आठ बार करें और विशेष रूप से ध्यान रक्खें कि इस पूरी प्रक्रिया के अंतर्गत आपकी दृष्टि और ध्यान"नासिकाग्र"पर ही होना चाहिये!!
●तदोपरांत ऐसे ही सोलह-सोलह पलों तक बार-बार पूरक-कुम्भक और रेचक करें,और वह भी चौंसठ बार करें!!
●ऐसे ही बत्तीस पलों तक बार-बार पूरक-कुम्भक और रेचक करें,और वह भी चौंसठ बार करें!!
●ऐसे ही अणतालीस पलों तक बार-बार पूरक-कुम्भक और रेचक करें,और वह भी चौंसठ बार करें!!
●ऐसे ही चौंसठ पलों तक बार-बार पूरक-कुम्भक और रेचक करें,और वह भी चौंसठ बार करें!!
यह भी स्मरण रक्खें कि ढाई पल =एक मिनट होता है,अर्थात चौबिस मिनट=60 पल होते हैं!!और उपरोक्त दी हुयी इन संख्याओं का उतना ही गहन सम्बंध है जितना कि यह ध्यान रखने का प्रयास करना कि रक्तचाप-80/120 ही रहे अन्यथा खतरे की घंटी बज सकती है!!
इस प्रक्रिया में कई मास का समय लग सकता है, यहां धैर्य अनिवार्य है!!और अद्भुत तथा अलौकिक अनुभूतियाँ क्रमशः होती ही चली जायेंगी,इसी भ्रूमध्य चक्र में वृत्ताकार ज्योति आपको अवस्यमेव ही नासिकाग्र पर अंतः रूप से दृष्टिगोचर--"होगी ही"--और यही है भ्रूमध्य चक्र के जागृत हो जाने की सामान्य सी सरलतम् विधि!!
विज्ञान भैरव तंत्र हमारे आग्रह और पूर्वाग्रह को जलाने की बात करता है,ये अद्भुत ग्रंथ 112 ध्यान विधियां के द्वारा, आप जहां हैं, वहीं पर, जिस तल पर खड़े हैं, उसी तल पर चेतना की गहराई में उतरने का मार्ग हैं, ये विधियां स्पष्ट करती हैं कि देह का उपयोग करके देह के पार आप जा सकती हैं,कल्पना का उपयोग करके जो कल्पना से भी परे है, उसे जाना जा सकता हैं!!
विचारों का उपयोग कर के निर्विचार और मन को अपना मित्र बनाकर मन को भी विसर्जित करना कुछ विधियां श्वासों पर आधारित हैं, कुछ विधियां देह पर आधारित हैं| कुछ विधियां आपकी कल्पनाओं का उपयोग भी करना सिखाती हैं!!
।।विज्ञान भैरव आग्रह और पूर्वाग्रह को जला देने को कहता है।।
तीसरी धारा से स्वयम् को अर्थात"गुप्त-सरस्वती" को संतृप्त कर देती हैं!!
क्रमद्वादशकं सम्यग् द्वादशाक्षरभेदितम् ।
स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या मुक्त्वा मुक्त्वान्तत: शिव: ।।30।।
शिवार्णवी कालिकान्तरी चूड़ामड़ी में एक अद्भुत सा श्लोक है--
"इडापिड़्गलयोर्मध्ये सुषुम्णा या भवेत्खलुः।
षट्स्थानेषु च षट्शक्तिं षट्पद्मं योगिनो विदुः।।"
दक्षिण नासिकास्थ इडा और वाम नासिकास्थ पिड़्गला इन्हीं दोनों के मध्य यदि प्रयत्न करने से कदाचित्"सुषुम्ना"नाडी स्थित हो जाये!!और जागृत होकर आप एक बार उसकी गतिविधियों को देख सकें!!
तो यहीं पर"पद्माकार"ऊपर के छहों चक्र एक दूसरे से संलग्न हैं!!तभी तो कहते हैं कि--
"न योगो नभसः पृष्ठे न भूमौ न रसाते।"
"भैरवी-सीद्धि"न योग से होती है न वह नभ,भूमि या फिर रसातल में ही स्थित है,वह तो सुषुम्ना में स्थित है!!अब आप ध्यान दें सखियों-साधनार्थ अनुलोम तथा विलोम के क्रम में--(रू.या.तं.32/6)-----
"चतुस्त्रीशत्संख्याघटितकवलं चासनमिह।
प्रबुद्धं देहस्य क्षयमरणशड़्काविरहितम्।।"
चौंसठ योगिनी,भैरव या भैरवी कही गयी हैं!!और योग तथा संयोग के भी चौंसठ ही आसन भी कहे गये हैं,और तो और चौंसठ ही मुद्रायें भी बतायी गयी हैं!! एक गुप्त रहस्यात्मक वैदिक संस्कारजन्य कथन भी है कि इसका षोडषांस--षोडसी कन्या या कुमार ही"नारीत्व या नरत्व"की सीमारेखा को प्राप्त भी होते हैं!! और इससे भी ज्यादा रहस्य की बात यह है कि"इडा,सूर्य-स्वर, गड़्गा,प्राण-वायु ही"पुरूष,शिव या फिर भैरव कहे गये हैं!!
पिंड़्ग्ला,यमुना,चन्द्र या फिर अपान-वायु ही"शिवा, सूरता अथवा भैरवी कही गयी हैं, और दूर्गम्य दूर्लभ ज्ञान तो यही है कि-"सुषुम्ना, समान-वायु,सरस्वती ही"अर्धनारिनाटकेश्वरी या लौकिक रूप से त्याज्या"पुँश्चली,निपूती,विधवा-पति-भक्षिका या फिर धूमावती कही गयी हैं!!
"कबिरा खड़ा बाजार में,लिये लुवाठी हांथ।
जो घर जारै आपना,सो हो ले मेरे साथ।।"
अब क्रिया
आपको करना यह है कि प्रथम तो आठ पलों तक दक्षिण नासिका से स्वास लेते हुवे आठ पलों तक कुम्भक करते हुवे और फिर आठ ही पलों तक वाम-नासिका से रेचन करना है!! और पुनश्च वाम नासिका से स्वास लेते हुवे आठ पलों तक कुम्भक करते हुवे और फिर आठ ही पलों तक दक्षिण-नासिका से रेचन करना है!! और इसी प्रक्रिया को चौंसठ बार करना है,ऐसा आठ बार करें और विशेष रूप से ध्यान रक्खें कि इस पूरी प्रक्रिया के अंतर्गत आपकी दृष्टि और ध्यान"नासिकाग्र"पर ही होना चाहिये!!
●तदोपरांत ऐसे ही सोलह-सोलह पलों तक बार-बार पूरक-कुम्भक और रेचक करें,और वह भी चौंसठ बार करें!!
●ऐसे ही बत्तीस पलों तक बार-बार पूरक-कुम्भक और रेचक करें,और वह भी चौंसठ बार करें!!
●ऐसे ही अणतालीस पलों तक बार-बार पूरक-कुम्भक और रेचक करें,और वह भी चौंसठ बार करें!!
●ऐसे ही चौंसठ पलों तक बार-बार पूरक-कुम्भक और रेचक करें,और वह भी चौंसठ बार करें!!
यह भी स्मरण रक्खें कि ढाई पल =एक मिनट होता है,अर्थात चौबिस मिनट=60 पल होते हैं!!और उपरोक्त दी हुयी इन संख्याओं का उतना ही गहन सम्बंध है जितना कि यह ध्यान रखने का प्रयास करना कि रक्तचाप-80/120 ही रहे अन्यथा खतरे की घंटी बज सकती है!!
इस प्रक्रिया में कई मास का समय लग सकता है, यहां धैर्य अनिवार्य है!!और अद्भुत तथा अलौकिक अनुभूतियाँ क्रमशः होती ही चली जायेंगी,इसी भ्रूमध्य चक्र में वृत्ताकार ज्योति आपको अवस्यमेव ही नासिकाग्र पर अंतः रूप से दृष्टिगोचर--"होगी ही"--और यही है भ्रूमध्य चक्र के जागृत हो जाने की सामान्य सी सरलतम् विधि!!
विज्ञान भैरव तंत्र हमारे आग्रह और पूर्वाग्रह को जलाने की बात करता है,ये अद्भुत ग्रंथ 112 ध्यान विधियां के द्वारा, आप जहां हैं, वहीं पर, जिस तल पर खड़े हैं, उसी तल पर चेतना की गहराई में उतरने का मार्ग हैं, ये विधियां स्पष्ट करती हैं कि देह का उपयोग करके देह के पार आप जा सकती हैं,कल्पना का उपयोग करके जो कल्पना से भी परे है, उसे जाना जा सकता हैं!!
विचारों का उपयोग कर के निर्विचार और मन को अपना मित्र बनाकर मन को भी विसर्जित करना कुछ विधियां श्वासों पर आधारित हैं, कुछ विधियां देह पर आधारित हैं| कुछ विधियां आपकी कल्पनाओं का उपयोग भी करना सिखाती हैं!!
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सुंदरकांड में प्रभुश्रीराम एवं समुद्र का ज्ञानवर्धक संवाद
रामजी सुग्रीव और बिभीषणजी से पूछते हैं कि अब इस गहरे समुद्र को किस प्रकार पार किया जाय?
विभीषणजी कहते हैं- हे रघुनाथजी! सुनिए यद्यपि आप का एक बाण ही करोडों समुद्रों को सोख सकता है। तथापि नीति ऐसी कही गयी है कि पहले समुद्र से प्रार्थना की जाए।
समुद्र आपके कुल में बडे हैं, वे विचार कर उपाय बतला देंगे। इस प्रकार सेना बिना परिश्रम के समुद्र के पार उतर जाएगी। रामजी को यह बात अच्छी लगी और कहा यही ठीक है। परन्तु यह परामर्श लक्ष्मणजी को अच्छी नहीं लगी लक्ष्मणजी कहते हैं हे नाथ! दैव का क्या भरोसा! मन में क्रोध कीजिए और समुद्र को सुखा डालीए। यह दैव तो कायर के मन का एक आधार है। आलसी लोग ही दैव दैव पुकारा करते हैं।
भगवान राम हँस कर कहते हैं कि ऐसा ही करेंगे, मन में धीरज रखो। ऐसा समझाकर पहले समुद्र को प्रणाम करते हैं और समुंद्र से विनय करते हैं तीन दिन बीत जाते है।
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥
भावार्थ:-इधर तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्री रामजी क्रोध सहित बोले- बिना भय के प्रीति नहीं होती!॥
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति। सहज कृपन सन सुंदर नीति॥
भावार्थ:-हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूँ। मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूस से सुंदर नीति (उदारता का उपदेश),॥
* ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥
भावार्थ:-ममता में फँसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शम (शांति) की बात और कामी से भगवान् की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसर में बीज बोने से होता है (अर्थात् ऊसर में बीज बोने की भाँति यह सब व्यर्थ जाता है)॥
* अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥
भावार्थ:-ऐसा कहकर श्री रघुनाथजी ने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मणजी के मन को बहुत अच्छा लगा। प्रभु ने भयानक (अग्नि) बाण संधान किया, जिससे समुद्र के हृदय के अंदर अग्नि की ज्वाला उठी॥
* मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥
भावार्थ:-मगर, साँप तथा मछलियों के समूह व्याकुल हो गए। जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना, तब सोने के थाल में अनेक मणियों (रत्नों) को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप में आया॥
* काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥
भावार्थ:-(काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) हे गरुड़जी! सुनिए, चाहे कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, पर केला तो काटने पर ही फलता है। नीच विनय से नहीं मानता, वह डाँटने पर ही झुकता है (रास्ते पर आता है)॥
* सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥
भावार्थ:-समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर कहा- हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिए। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है॥
* तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥
भावार्थ:-आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिए उत्पन्न किया है, सब ग्रंथों ने यही गाया है। जिसके लिए स्वामी की जैसी आज्ञा है, वह उसी प्रकार से रहने में सुख पाता है॥
* प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥
भावार्थ:-प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा (दंड) दी, किंतु मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी ही बनाई हुई है। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री- ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं॥
* प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥
भावार्थ:-प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जाएगी, इसमें मेरी बड़ाई नहीं है (मेरी मर्यादा नहीं रहेगी)। तथापि प्रभु की आज्ञा अपेल है (अर्थात् आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं हो सकता) ऐसा वेद गाते हैं। अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूँ॥
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥
भावार्थ:-समुद्र के अत्यंत विनीत वचन सुनकर कृपालु श्री रामजी ने मुस्कुराकर कहा- हे तात! जिस प्रकार वानरों की सेना पार उतर जाए, वह उपाय बताओ॥
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥
रामजी सुग्रीव और बिभीषणजी से पूछते हैं कि अब इस गहरे समुद्र को किस प्रकार पार किया जाय?
विभीषणजी कहते हैं- हे रघुनाथजी! सुनिए यद्यपि आप का एक बाण ही करोडों समुद्रों को सोख सकता है। तथापि नीति ऐसी कही गयी है कि पहले समुद्र से प्रार्थना की जाए।
समुद्र आपके कुल में बडे हैं, वे विचार कर उपाय बतला देंगे। इस प्रकार सेना बिना परिश्रम के समुद्र के पार उतर जाएगी। रामजी को यह बात अच्छी लगी और कहा यही ठीक है। परन्तु यह परामर्श लक्ष्मणजी को अच्छी नहीं लगी लक्ष्मणजी कहते हैं हे नाथ! दैव का क्या भरोसा! मन में क्रोध कीजिए और समुद्र को सुखा डालीए। यह दैव तो कायर के मन का एक आधार है। आलसी लोग ही दैव दैव पुकारा करते हैं।
भगवान राम हँस कर कहते हैं कि ऐसा ही करेंगे, मन में धीरज रखो। ऐसा समझाकर पहले समुद्र को प्रणाम करते हैं और समुंद्र से विनय करते हैं तीन दिन बीत जाते है।
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥
भावार्थ:-इधर तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्री रामजी क्रोध सहित बोले- बिना भय के प्रीति नहीं होती!॥
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति। सहज कृपन सन सुंदर नीति॥
भावार्थ:-हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूँ। मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूस से सुंदर नीति (उदारता का उपदेश),॥
* ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥
भावार्थ:-ममता में फँसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शम (शांति) की बात और कामी से भगवान् की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसर में बीज बोने से होता है (अर्थात् ऊसर में बीज बोने की भाँति यह सब व्यर्थ जाता है)॥
* अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥
भावार्थ:-ऐसा कहकर श्री रघुनाथजी ने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मणजी के मन को बहुत अच्छा लगा। प्रभु ने भयानक (अग्नि) बाण संधान किया, जिससे समुद्र के हृदय के अंदर अग्नि की ज्वाला उठी॥
* मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥
भावार्थ:-मगर, साँप तथा मछलियों के समूह व्याकुल हो गए। जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना, तब सोने के थाल में अनेक मणियों (रत्नों) को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप में आया॥
* काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥
भावार्थ:-(काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) हे गरुड़जी! सुनिए, चाहे कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, पर केला तो काटने पर ही फलता है। नीच विनय से नहीं मानता, वह डाँटने पर ही झुकता है (रास्ते पर आता है)॥
* सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥
भावार्थ:-समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर कहा- हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिए। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है॥
* तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥
भावार्थ:-आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिए उत्पन्न किया है, सब ग्रंथों ने यही गाया है। जिसके लिए स्वामी की जैसी आज्ञा है, वह उसी प्रकार से रहने में सुख पाता है॥
* प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥
भावार्थ:-प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा (दंड) दी, किंतु मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी ही बनाई हुई है। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री- ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं॥
* प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥
भावार्थ:-प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जाएगी, इसमें मेरी बड़ाई नहीं है (मेरी मर्यादा नहीं रहेगी)। तथापि प्रभु की आज्ञा अपेल है (अर्थात् आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं हो सकता) ऐसा वेद गाते हैं। अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूँ॥
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥
भावार्थ:-समुद्र के अत्यंत विनीत वचन सुनकर कृपालु श्री रामजी ने मुस्कुराकर कहा- हे तात! जिस प्रकार वानरों की सेना पार उतर जाए, वह उपाय बताओ॥
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥
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भावार्थ:-(समुद्र ने कहा)) हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपन में ऋषि से आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श कर लेने से ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जाएँगे॥
* मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥
भावार्थ:-मैं भी प्रभु की प्रभुता को हृदय में धारण कर अपने बल के अनुसार (जहाँ तक मुझसे बन पड़ेगा) सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्र को बँधाइए, जिससे तीनों लोकों में आपका सुंदर यश गाया जाए॥
* एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥
भावार्थ:-इस बाण से मेरे उत्तर तट पर रहने वाले पाप के राशि दुष्ट मनुष्यों का वध कीजिए। कृपालु और रणधीर श्री रामजी ने समुद्र के मन की पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया (अर्थात् बाण से उन दुष्टों का वध कर दिया)॥
* देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥
भावार्थ:-श्री रामजी का भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुखी हो गया। उसने उन दुष्टों का सारा चरित्र प्रभु को कह सुनाया। फिर चरणों की वंदना करके समुद्र चला गया॥
* निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥
भावार्थ:-समुद्र अपने घर चला गया, श्री रघुनाथजी को यह मत (उसका परामर्श ) अच्छा लगा। यह चरित्र कलियुग के पापों को हरने वाला है, इसे तुलसीदास ने अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है। श्री रघुनाथजी के गुण समूह सुख के धाम, संदेह का नाश करने वाले और विषाद का दमन करने वाले हैं। अरे मूर्ख मन! तू संसार का सब आशा-भरोसा त्यागकर निरंतर इन्हें गा और सुन।
* सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥
भावार्थ:-श्री रघुनाथजी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों का देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य साधन) के ही भवसागर को तर जाएँगे॥
* मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥
भावार्थ:-मैं भी प्रभु की प्रभुता को हृदय में धारण कर अपने बल के अनुसार (जहाँ तक मुझसे बन पड़ेगा) सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्र को बँधाइए, जिससे तीनों लोकों में आपका सुंदर यश गाया जाए॥
* एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥
भावार्थ:-इस बाण से मेरे उत्तर तट पर रहने वाले पाप के राशि दुष्ट मनुष्यों का वध कीजिए। कृपालु और रणधीर श्री रामजी ने समुद्र के मन की पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया (अर्थात् बाण से उन दुष्टों का वध कर दिया)॥
* देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥
भावार्थ:-श्री रामजी का भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुखी हो गया। उसने उन दुष्टों का सारा चरित्र प्रभु को कह सुनाया। फिर चरणों की वंदना करके समुद्र चला गया॥
* निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥
भावार्थ:-समुद्र अपने घर चला गया, श्री रघुनाथजी को यह मत (उसका परामर्श ) अच्छा लगा। यह चरित्र कलियुग के पापों को हरने वाला है, इसे तुलसीदास ने अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है। श्री रघुनाथजी के गुण समूह सुख के धाम, संदेह का नाश करने वाले और विषाद का दमन करने वाले हैं। अरे मूर्ख मन! तू संसार का सब आशा-भरोसा त्यागकर निरंतर इन्हें गा और सुन।
* सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥
भावार्थ:-श्री रघुनाथजी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों का देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य साधन) के ही भवसागर को तर जाएँगे॥
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*कबीर ये जग आंधरा, जैसे अंधी गाय बछरा था सो मरि गया, वो भी चाम चटाय।*
*अर्थ- कबीर के मुताविक यह संसार अंधा-अविवेकी है जैसे कि एक अंधी गाय। उसका वछड़ा मर चुका है पर उसे हीं बार-बार चाट रहा है। आदमी भी नश्वर शरीर में मन लगाता है।*
*कबीर देखि परखि ले, परखि के मुख खोल साधु असाधु जानि ले, सुनि मुख का बोल।*
*अर्थ- कबीर कहते हैं कि देख-समझ कर हीं अपना मुँह खोलना चाहिये कुछ बोलना चाहिये। व्यक्ति के साधु या असाधु की जाँच उस के वचन सुन कर हीं की जा सकती है।*
*काया माहि कबीर है, ज्यों *पहुपम मे बास कई जाने कोई जौहरी, कई जाने कोई दास।*
*अर्थ- कबीर के अनुसार इसी शरीर में प्रभु का वास है जैसे फूल में सुगंध का बास है। इस तथ्य को कोई पारखी या जौहरी जानता है अथवा कोई प्रभु का भक्त या दास।*
*अर्थ- कबीर के मुताविक यह संसार अंधा-अविवेकी है जैसे कि एक अंधी गाय। उसका वछड़ा मर चुका है पर उसे हीं बार-बार चाट रहा है। आदमी भी नश्वर शरीर में मन लगाता है।*
*कबीर देखि परखि ले, परखि के मुख खोल साधु असाधु जानि ले, सुनि मुख का बोल।*
*अर्थ- कबीर कहते हैं कि देख-समझ कर हीं अपना मुँह खोलना चाहिये कुछ बोलना चाहिये। व्यक्ति के साधु या असाधु की जाँच उस के वचन सुन कर हीं की जा सकती है।*
*काया माहि कबीर है, ज्यों *पहुपम मे बास कई जाने कोई जौहरी, कई जाने कोई दास।*
*अर्थ- कबीर के अनुसार इसी शरीर में प्रभु का वास है जैसे फूल में सुगंध का बास है। इस तथ्य को कोई पारखी या जौहरी जानता है अथवा कोई प्रभु का भक्त या दास।*
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कुलदेवी और देवता एक गहन अध्ययन
भारत में कई समाज या जाति के कुलदेवी और देवता होते हैं। इसके अलावा पितृदेव भी होते हैं। भारतीय लोग हजारों वर्षों से अपने कुलदेवी और देवता की पूजा करते आ रहे हैं। कुलदेवी और देवता को पूजने के पीछे एक गहरा रहस्य है, जो बहुत कम लोग जानते होंगे। आओ जानते हैं कि सभी के कुलदेवी-देवता अलग क्यों होते हैं और उन्हें क्यों पूजना जरूरी होता है?*
*जन्म, विवाह आदि मांगलिक कार्यों में कुलदेवी या देवताओं के स्थान पर जाकर उनकी पूजा की जाती है या उनके नाम से स्तुति की जाती है। इसके अलावा एक ऐसा भी दिन होता है जबकि संबंधित कुल के लोग अपने देवी और देवता के स्थान पर इकट्ठा होते हैं। जिन लोगों को अपने कुलदेवी और देवता के बारे में नहीं मालूम है या जो भूल गए हैं, वे अपने कुल की शाखा और जड़ों से कट गए हैं।*
सवाल यह है कि कुल देवता और कुलदेवी सभी के अलग-अलग क्यों होते हैं? इसका उत्तर यह है कि कुल अलग है, तो स्वाभाविक है कि कुलदेवी-देवता भी-अलग अलग ही होंगे। दरअसल, हजारों वर्षों से अपने कुल को संगठित करने और उसके इतिहास को संरक्षित करने के लिए ही कुलदेवी और देवताओं को एक निश्चित स्थान पर नियुक्त किया जाता था। वह स्थान उस वंश या कुल के लोगों का मूल स्थान होता था।
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मान लो कोई व्यक्ति गुजरात में रहता है लेकिन उसके कुलदेवी और देवता राजस्थान के किसी स्थान पर हैं। यदि उस व्यक्ति को यह मालूम है कि मेरे कुलदेवी और देवता उक्त स्थान पर हैं, तो वह वहां जाकर अपने कुल के लोगों से मिल सकता है। वहां हजारों लोग किसी खास दिन इकट्ठा होते हैं। इसका मतलब है कि वे हजारों लोग आप ही के कुल के हैं। हालांकि कुछ स्थान इतने प्रसिद्ध हो गए हैं कि वहां दूसरे कुल के लोग भी दर्शन करने आते हैं।
उदाहरणार्थ आपके परदादा के परदादा ने किसी दौर में कहीं से किसी भी कारणवश पलायन करके जब किसी दूसरी जगह रैन-बसेरा बसाया होगा तो निश्चित ही उन्होंने वहां पर एक छोटा सा मंदिर बनाया होगा, जहां पर आपके कुलदेवी और देवता की मूर्तियां रखी होंगी। सभी उस मंदिर से जुड़े रहकर यह जानते थे कि हमारे कुल का मूल क्या है?
यह उस दौर की बात है, जब लोगों को आक्रांताओं से बचने के लिए एक शहर से दूसरे शहर या एक राज्य से दूसरे राज्य में पलायन करना होता था। ऐसे में वे अपने साथ अपने कुल और जाति के लोगों को संगठित और बचाए रखने के लिए वे एक जगह ऐसा मंदिर बनाते थे, जहां पर कि उनके कुल के बिखरे हुए लोग इकट्टा हो सकें।
पहले यह होता था कि मंदिर से जुड़े व्यक्ति के पास एक बड़ी-सी पोथी होती थी जिसमें वह उन लोगों के नाम, पते और गोत्र दर्ज करता था, जो आकर दर्ज करवाते थे। इस तरह एक ही कुल के लोगों का एक डाटा तैयार हो जाता था। यह कार्य वैसा ही था, जैसा कि गंगा किनारे बैठा तीर्थ पुरोहित या पंडे आपके कुल और गोत्र का नाम दर्ज करते हैं। आपको अपने परदादा के परदादा का नाम नहीं मालूम होगा लेकिन उन तीर्थ पुरोहित के पास आपके पूर्वजों के नाम लिखे होते हैं।
इसी तरह कुलदेवी और देवता आपको आपके पूर्वजों से ही नहीं जोड़ते बल्कि वह वर्तमान में जिंदा आपके कुल खानदान के हजारों अनजान लोगों से भी मिलने का जरिया भी बनते हैं। इसीलिए कुलदेवी और कुल देवता को पूजने का महत्व है। इससे आप अपने वंशवृक्ष से जुड़े रहते हैं और यदि यह सत्य है कि आत्मा होती है और पूर्वज होते हैं, तो वे भी आपको कहीं से देख रहे होते हैं। उन्हें यह देखकर अच्छा लगता है और वे आपको ढेर सारे आशीर्वाद देते हैं।
#
अब फिर से समझें कि प्रत्येक हिन्दू परिवार किसी न किसी देवी, देवता या ऋषि के वंशज से संबंधित है। उसके गोत्र से यह पता चलता है कि वह किस वंश से संबधित है। मान लीजिए किसी व्यक्ति का गोत्र भारद्वाज है तो वह भारद्वाज ऋषि की संतान है। कालांतर में भारद्वाज के कुल में ही आगे चलकर कोई व्यक्ति हुआ और उसने अपने नाम से कुल चलाया, तो उस कुल को उस नाम से लोग जानने लगे। इस तरह हमें भारद्वाज गोत्र के लोग सभी जाति और समाज में मिल जाएंगे।
हर जाति वर्ग, किसी न किसी ऋषि की संतान है और उन मूल ऋषि से उत्पन्न संतान के लिए वे ऋषि या ऋषि पत्नी कुलदेव व कुलदेवी के रूप में पूज्य हैं। इसके अलावा किसी कुल के पूर्वजों के खानदान के वरिष्ठों ने अपने लिए उपयुक्त कुल देवता अथवा कुलदेवी का चुनाव कर उन्हें पूजित करना शुरू किया और उसके लिए एक निश्चित जगह एक मंदिर बनवाया ताकि एक आध्यात्मिक और पारलौकिक शक्ति से उनका कुल जुड़ा रहे और वहां से उसकी रक्षा होती रहे।
कुलदेवी या देवता कुल या वंश के रक्षक देवी-देवता होते हैं। ये घर-परिवार या वंश-परंपरा के प्रथम पूज्य तथा मूल अधिकारी देव होते हैं। इनकी गणना हमारे घर के बुजुर्ग सदस्यों जैसी होती है। अत: प्रत्येक कार्य में इन्हें याद करना जरूरी होता है। इनका प्रभाव इतना महत्वपूर्ण होता है कि यदि ये रुष्ट हो जाएं तो
भारत में कई समाज या जाति के कुलदेवी और देवता होते हैं। इसके अलावा पितृदेव भी होते हैं। भारतीय लोग हजारों वर्षों से अपने कुलदेवी और देवता की पूजा करते आ रहे हैं। कुलदेवी और देवता को पूजने के पीछे एक गहरा रहस्य है, जो बहुत कम लोग जानते होंगे। आओ जानते हैं कि सभी के कुलदेवी-देवता अलग क्यों होते हैं और उन्हें क्यों पूजना जरूरी होता है?*
*जन्म, विवाह आदि मांगलिक कार्यों में कुलदेवी या देवताओं के स्थान पर जाकर उनकी पूजा की जाती है या उनके नाम से स्तुति की जाती है। इसके अलावा एक ऐसा भी दिन होता है जबकि संबंधित कुल के लोग अपने देवी और देवता के स्थान पर इकट्ठा होते हैं। जिन लोगों को अपने कुलदेवी और देवता के बारे में नहीं मालूम है या जो भूल गए हैं, वे अपने कुल की शाखा और जड़ों से कट गए हैं।*
सवाल यह है कि कुल देवता और कुलदेवी सभी के अलग-अलग क्यों होते हैं? इसका उत्तर यह है कि कुल अलग है, तो स्वाभाविक है कि कुलदेवी-देवता भी-अलग अलग ही होंगे। दरअसल, हजारों वर्षों से अपने कुल को संगठित करने और उसके इतिहास को संरक्षित करने के लिए ही कुलदेवी और देवताओं को एक निश्चित स्थान पर नियुक्त किया जाता था। वह स्थान उस वंश या कुल के लोगों का मूल स्थान होता था।
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मान लो कोई व्यक्ति गुजरात में रहता है लेकिन उसके कुलदेवी और देवता राजस्थान के किसी स्थान पर हैं। यदि उस व्यक्ति को यह मालूम है कि मेरे कुलदेवी और देवता उक्त स्थान पर हैं, तो वह वहां जाकर अपने कुल के लोगों से मिल सकता है। वहां हजारों लोग किसी खास दिन इकट्ठा होते हैं। इसका मतलब है कि वे हजारों लोग आप ही के कुल के हैं। हालांकि कुछ स्थान इतने प्रसिद्ध हो गए हैं कि वहां दूसरे कुल के लोग भी दर्शन करने आते हैं।
उदाहरणार्थ आपके परदादा के परदादा ने किसी दौर में कहीं से किसी भी कारणवश पलायन करके जब किसी दूसरी जगह रैन-बसेरा बसाया होगा तो निश्चित ही उन्होंने वहां पर एक छोटा सा मंदिर बनाया होगा, जहां पर आपके कुलदेवी और देवता की मूर्तियां रखी होंगी। सभी उस मंदिर से जुड़े रहकर यह जानते थे कि हमारे कुल का मूल क्या है?
यह उस दौर की बात है, जब लोगों को आक्रांताओं से बचने के लिए एक शहर से दूसरे शहर या एक राज्य से दूसरे राज्य में पलायन करना होता था। ऐसे में वे अपने साथ अपने कुल और जाति के लोगों को संगठित और बचाए रखने के लिए वे एक जगह ऐसा मंदिर बनाते थे, जहां पर कि उनके कुल के बिखरे हुए लोग इकट्टा हो सकें।
पहले यह होता था कि मंदिर से जुड़े व्यक्ति के पास एक बड़ी-सी पोथी होती थी जिसमें वह उन लोगों के नाम, पते और गोत्र दर्ज करता था, जो आकर दर्ज करवाते थे। इस तरह एक ही कुल के लोगों का एक डाटा तैयार हो जाता था। यह कार्य वैसा ही था, जैसा कि गंगा किनारे बैठा तीर्थ पुरोहित या पंडे आपके कुल और गोत्र का नाम दर्ज करते हैं। आपको अपने परदादा के परदादा का नाम नहीं मालूम होगा लेकिन उन तीर्थ पुरोहित के पास आपके पूर्वजों के नाम लिखे होते हैं।
इसी तरह कुलदेवी और देवता आपको आपके पूर्वजों से ही नहीं जोड़ते बल्कि वह वर्तमान में जिंदा आपके कुल खानदान के हजारों अनजान लोगों से भी मिलने का जरिया भी बनते हैं। इसीलिए कुलदेवी और कुल देवता को पूजने का महत्व है। इससे आप अपने वंशवृक्ष से जुड़े रहते हैं और यदि यह सत्य है कि आत्मा होती है और पूर्वज होते हैं, तो वे भी आपको कहीं से देख रहे होते हैं। उन्हें यह देखकर अच्छा लगता है और वे आपको ढेर सारे आशीर्वाद देते हैं।
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अब फिर से समझें कि प्रत्येक हिन्दू परिवार किसी न किसी देवी, देवता या ऋषि के वंशज से संबंधित है। उसके गोत्र से यह पता चलता है कि वह किस वंश से संबधित है। मान लीजिए किसी व्यक्ति का गोत्र भारद्वाज है तो वह भारद्वाज ऋषि की संतान है। कालांतर में भारद्वाज के कुल में ही आगे चलकर कोई व्यक्ति हुआ और उसने अपने नाम से कुल चलाया, तो उस कुल को उस नाम से लोग जानने लगे। इस तरह हमें भारद्वाज गोत्र के लोग सभी जाति और समाज में मिल जाएंगे।
हर जाति वर्ग, किसी न किसी ऋषि की संतान है और उन मूल ऋषि से उत्पन्न संतान के लिए वे ऋषि या ऋषि पत्नी कुलदेव व कुलदेवी के रूप में पूज्य हैं। इसके अलावा किसी कुल के पूर्वजों के खानदान के वरिष्ठों ने अपने लिए उपयुक्त कुल देवता अथवा कुलदेवी का चुनाव कर उन्हें पूजित करना शुरू किया और उसके लिए एक निश्चित जगह एक मंदिर बनवाया ताकि एक आध्यात्मिक और पारलौकिक शक्ति से उनका कुल जुड़ा रहे और वहां से उसकी रक्षा होती रहे।
कुलदेवी या देवता कुल या वंश के रक्षक देवी-देवता होते हैं। ये घर-परिवार या वंश-परंपरा के प्रथम पूज्य तथा मूल अधिकारी देव होते हैं। इनकी गणना हमारे घर के बुजुर्ग सदस्यों जैसी होती है। अत: प्रत्येक कार्य में इन्हें याद करना जरूरी होता है। इनका प्रभाव इतना महत्वपूर्ण होता है कि यदि ये रुष्ट हो जाएं तो
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हनुमानजी के अलावा अन्य कोई देवी या देवता इनके दुष्प्रभाव या हानि को कम नहीं कर सकता या रोक नहीं लगा सकता। इसे यूं समझें कि यदि घर का मुखिया पिताजी या माताजी आपसे नाराज हों, तो पड़ोस के या बाहर का कोई भी आपके भले के लिए आपके घर में प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि वे 'बाहरी' होते हैं। गीता में इस संबंध में विस्तार से उल्लेख मिलता है कि कुल का नाश कैसा होता है?
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ऐसे अनेक परिवार हैं जिन्हें अपने कुलदेवी या देवता के बारे में कुछ भी नहीं मालूम है। ऐसा इसलिए कि उन्होंने कुलदेवी या देवताओं के स्थान पर जाना ही नहीं छोड़ा बल्कि उनकी पूजा भी बंद कर दी है। लेकिन उनके पूर्वज और उनके देवता उन्हें बराबर देख रहे होते हैं। यदि किसी को अपने कुलदेवी और देवताओं के बारे में नहीं मालूम है, तो उन्हें अपने बड़े-बुजुर्गों, रिश्तेदारों या पंडितों से पूछकर इसकी जानकारी लेना चाहिए। यह जानने की कोशिश करना चाहिए कि झडूला, मुंडन संकार आपके गोत्र परंपरानुसार कहां होता है या 'जात' कहां दी जाती है। यह भी कि विवाह के बाद एक अंतिम फेरा (5, 6, 7वां) कहां होता है?
कहते हैं कि कालांतर में परिवारों के एक स्थान से दूसरे स्थानों पर स्थानांतरित होने, धर्म परिवर्तन करने, आक्रांताओं के भय से विस्थापित होने, जानकार व्यक्ति के असमय मृत होने, संस्कारों का क्षय होने, विजातीयता पनपने, पाश्चात्य मानसिकता के पनपने और नए विचारों के संतों की संगत के ज्ञानभ्रम में उलझकर लोग अपने कुल खानदान के कुलदेवी और देवताओं को भूलकर अपने वंश का इतिहास भी भूल गए हैं। खासकर यह प्रवृत्ति शहरों में देखने को ज्यादा मिलती है।
ऐसा भी देखने में आया है कि कुल देवी-देवता की पूजा छोड़ने के बाद कुछ वर्षों तक तो कोई खास परिवर्तन नहीं होता, लेकिन जब देवताओं का सुरक्षा चक्र हटता है तो परिवार में घटनाओं और दुर्घटनाओं का दौर शुरू हो जाता है, उन्नति रुकने लगती है, गृहकलह, उपद्रव व अशांति आदि शुरू हो जाती हैं। आगे वंश नहीं चल पाता है। पिताद्रोही होकर व्यक्ति अपने वंश को नष्ट कर लेता है!
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ऐसे अनेक परिवार हैं जिन्हें अपने कुलदेवी या देवता के बारे में कुछ भी नहीं मालूम है। ऐसा इसलिए कि उन्होंने कुलदेवी या देवताओं के स्थान पर जाना ही नहीं छोड़ा बल्कि उनकी पूजा भी बंद कर दी है। लेकिन उनके पूर्वज और उनके देवता उन्हें बराबर देख रहे होते हैं। यदि किसी को अपने कुलदेवी और देवताओं के बारे में नहीं मालूम है, तो उन्हें अपने बड़े-बुजुर्गों, रिश्तेदारों या पंडितों से पूछकर इसकी जानकारी लेना चाहिए। यह जानने की कोशिश करना चाहिए कि झडूला, मुंडन संकार आपके गोत्र परंपरानुसार कहां होता है या 'जात' कहां दी जाती है। यह भी कि विवाह के बाद एक अंतिम फेरा (5, 6, 7वां) कहां होता है?
कहते हैं कि कालांतर में परिवारों के एक स्थान से दूसरे स्थानों पर स्थानांतरित होने, धर्म परिवर्तन करने, आक्रांताओं के भय से विस्थापित होने, जानकार व्यक्ति के असमय मृत होने, संस्कारों का क्षय होने, विजातीयता पनपने, पाश्चात्य मानसिकता के पनपने और नए विचारों के संतों की संगत के ज्ञानभ्रम में उलझकर लोग अपने कुल खानदान के कुलदेवी और देवताओं को भूलकर अपने वंश का इतिहास भी भूल गए हैं। खासकर यह प्रवृत्ति शहरों में देखने को ज्यादा मिलती है।
ऐसा भी देखने में आया है कि कुल देवी-देवता की पूजा छोड़ने के बाद कुछ वर्षों तक तो कोई खास परिवर्तन नहीं होता, लेकिन जब देवताओं का सुरक्षा चक्र हटता है तो परिवार में घटनाओं और दुर्घटनाओं का दौर शुरू हो जाता है, उन्नति रुकने लगती है, गृहकलह, उपद्रव व अशांति आदि शुरू हो जाती हैं। आगे वंश नहीं चल पाता है। पिताद्रोही होकर व्यक्ति अपने वंश को नष्ट कर लेता है!
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_यदि तुम चाहो तो- इससे अपनी पुत्री का विवाह कर सकते हो। वापस आने पर मैं भी उसे अपने राज्य के पांच गांव इनाम में दे दूंगा।"_
_राजा भानुप्रताप को लगा कि यह सचमुच में योग्य व्यक्ति है, उसने अपनी पुत्री व पत्नी से सलाह करके- पुत्री का विवाह टीकम से कर दिया- और चलते समय ढेरों हीरे- जवाहारात देकर विदा किया।_
_उधर,आलसी दयाल थका-हारा अपनी कुटिया में पहुंचा- और जाकर सो गया।_
_दो दिन सोता रहा- फिर सुबह उठकर पेड़ों में पानी देने लगा।_
_सुबह जब राजा अपने बाग में घूमने निकले- तो दयाल से पत्र के बारे में पूछा।_
_दयाल ने डरते-डरते सारी राजा को बता दी।_
_राजा को बहुत क्रोध आया- और साथ ही ज्योतिषी की भविष्य- वाणी भी याद आई।_
_परंतु राजा ने सोचा कि कहीं भूल-चूक भी हो सकती है।_
_अत: वह एक बार फिर प्रयत्न करके देखेगा- कि दयाल को धनी किस प्रकार बनाया जाए....?_
_तीन-चार दिन पश्चात् दयाल राजा का गुस्सा कम करने की इच्छा से खेत से बड़े-बड़े तरबूज तोड़कर लाया।_
_और बोला: "सरकार, इस बार फसल बहुत अच्छी हुई है। देखिए, खेत में कितने बड़े-बड़े तरबूज हुए हैं।_
_राजा खुश हो गया- उसने चुपचाप अपने मंत्री को इशारा कर दिया। मंत्री एक बड़ा तरबूज लेकर अंदर चला गया- और उसे अंदर से खोखला कर उसमें हीरे-जवाहारात भरवाकर ज्यों का त्यों चिपकाकर ले आया।_
_राजा ने दयाल से कहा: "हम आज तुमसे बहुत खुश हुए हैं। तुम्हें इनाम में यह तरबूज देते हैं ।"_
_सुनकर दयाल का चेहरा फिर लटक गया । वह सोचने लगा कि राजा ने इनाम दिया भी तो क्या ? वह बड़े उदास मन से तरबूज लेकर जा रहा था, तभी उसका परिचित लोटन मिल गया । वह बोला - "क्यों भाई, इतने उदास होकर तरबूज लिए कहां चले जा रहे हो ?"_
_दयाल बोला - "क्या करूं, बात ही कुछ ऐसी है। आज राजा मुझसे खुश हो गए, पर इनाम में दिया यह तरबूज-भला तरबूज भी इनाम में देने की चीज है.... ?_
_मैं किसे खिलाऊंगा इतना बड़ा तरबूज ?"_
_लोटन बोला - "निराश क्यों होते हो भाई, इनाम तो इनाम ही है। मुझे ऐसा इनाम मिलता- तो मेरे बच्चे खुश हो जाते।"_
_"फिर ठीक है,तुम्हीं ले लो यह तरबूज।"_
_और दयाल तरबूज देकर कुटिया पर आ गया।_
_अगले दिन राजा ने दयाल का फिर वही फटा हाल देखा तो पूछा:_
_"क्यों,तरबूज खाया नहीं........?"_
_दयाल ने सारी बात चुपचाप बता दी। राजा को दयाल पर बड़ा क्रोध आया...? पर कर क्या सकता था।_
_अगले दिन- दयाल ने लोटन को बड़े अच्छे- अच्छे कपड़े पहने बग्घी में जाते देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।_
_दयाल ने अचानक धनी बनने का राज लोटन से पूछा- तो उसने तरबूज का किस्सा बता दिया।_
_सुनकर दयाल हाथ मलकर रह गया। तभी उसने देखा कि किसी राजा की बारात - सी आ रही है । उसने पास जाकर पता किया तो पता लगा कि कोई राजा अपनी दुल्हन को ब्याह कर ला रहा था। ज्यों ही उसने राजा का चेहरा देखा तो उसके हाथों के तोते उड़ गए।_
_उसने देखा,राजसवारी पर टीकम बैठा था।_
_अगले दिन टीकम से मिलने पर उसे पत्र की सच्चाई पता लगी,परंतु अब वह कर ही क्या सकता था....?_
_राजा ने भी किस्मत के आगे हार मान ली -और सोचने लगा -
_राजा भी गरीब को अमीर नहीं बना सकता, यदि उसकी भाग्य में गरीब रहना लिखा है।' अब राजा ने ज्योतिषी भद्रशील को बहुत ढ़ुंढ़वाया,पर उनका कहीं पता न लगा।_
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_*।।हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम रा
_राजा भानुप्रताप को लगा कि यह सचमुच में योग्य व्यक्ति है, उसने अपनी पुत्री व पत्नी से सलाह करके- पुत्री का विवाह टीकम से कर दिया- और चलते समय ढेरों हीरे- जवाहारात देकर विदा किया।_
_उधर,आलसी दयाल थका-हारा अपनी कुटिया में पहुंचा- और जाकर सो गया।_
_दो दिन सोता रहा- फिर सुबह उठकर पेड़ों में पानी देने लगा।_
_सुबह जब राजा अपने बाग में घूमने निकले- तो दयाल से पत्र के बारे में पूछा।_
_दयाल ने डरते-डरते सारी राजा को बता दी।_
_राजा को बहुत क्रोध आया- और साथ ही ज्योतिषी की भविष्य- वाणी भी याद आई।_
_परंतु राजा ने सोचा कि कहीं भूल-चूक भी हो सकती है।_
_अत: वह एक बार फिर प्रयत्न करके देखेगा- कि दयाल को धनी किस प्रकार बनाया जाए....?_
_तीन-चार दिन पश्चात् दयाल राजा का गुस्सा कम करने की इच्छा से खेत से बड़े-बड़े तरबूज तोड़कर लाया।_
_और बोला: "सरकार, इस बार फसल बहुत अच्छी हुई है। देखिए, खेत में कितने बड़े-बड़े तरबूज हुए हैं।_
_राजा खुश हो गया- उसने चुपचाप अपने मंत्री को इशारा कर दिया। मंत्री एक बड़ा तरबूज लेकर अंदर चला गया- और उसे अंदर से खोखला कर उसमें हीरे-जवाहारात भरवाकर ज्यों का त्यों चिपकाकर ले आया।_
_राजा ने दयाल से कहा: "हम आज तुमसे बहुत खुश हुए हैं। तुम्हें इनाम में यह तरबूज देते हैं ।"_
_सुनकर दयाल का चेहरा फिर लटक गया । वह सोचने लगा कि राजा ने इनाम दिया भी तो क्या ? वह बड़े उदास मन से तरबूज लेकर जा रहा था, तभी उसका परिचित लोटन मिल गया । वह बोला - "क्यों भाई, इतने उदास होकर तरबूज लिए कहां चले जा रहे हो ?"_
_दयाल बोला - "क्या करूं, बात ही कुछ ऐसी है। आज राजा मुझसे खुश हो गए, पर इनाम में दिया यह तरबूज-भला तरबूज भी इनाम में देने की चीज है.... ?_
_मैं किसे खिलाऊंगा इतना बड़ा तरबूज ?"_
_लोटन बोला - "निराश क्यों होते हो भाई, इनाम तो इनाम ही है। मुझे ऐसा इनाम मिलता- तो मेरे बच्चे खुश हो जाते।"_
_"फिर ठीक है,तुम्हीं ले लो यह तरबूज।"_
_और दयाल तरबूज देकर कुटिया पर आ गया।_
_अगले दिन राजा ने दयाल का फिर वही फटा हाल देखा तो पूछा:_
_"क्यों,तरबूज खाया नहीं........?"_
_दयाल ने सारी बात चुपचाप बता दी। राजा को दयाल पर बड़ा क्रोध आया...? पर कर क्या सकता था।_
_अगले दिन- दयाल ने लोटन को बड़े अच्छे- अच्छे कपड़े पहने बग्घी में जाते देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।_
_दयाल ने अचानक धनी बनने का राज लोटन से पूछा- तो उसने तरबूज का किस्सा बता दिया।_
_सुनकर दयाल हाथ मलकर रह गया। तभी उसने देखा कि किसी राजा की बारात - सी आ रही है । उसने पास जाकर पता किया तो पता लगा कि कोई राजा अपनी दुल्हन को ब्याह कर ला रहा था। ज्यों ही उसने राजा का चेहरा देखा तो उसके हाथों के तोते उड़ गए।_
_उसने देखा,राजसवारी पर टीकम बैठा था।_
_अगले दिन टीकम से मिलने पर उसे पत्र की सच्चाई पता लगी,परंतु अब वह कर ही क्या सकता था....?_
_राजा ने भी किस्मत के आगे हार मान ली -और सोचने लगा -
_राजा भी गरीब को अमीर नहीं बना सकता, यदि उसकी भाग्य में गरीब रहना लिखा है।' अब राजा ने ज्योतिषी भद्रशील को बहुत ढ़ुंढ़वाया,पर उनका कहीं पता न लगा।_
*_
_*।।हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम रा
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कहानी का समय
भाग्य में नहीं है
भाग्य से ऊंचा कर्म है इस कर्म से ही भाग्य बनता है,और जो भाग्य "(प्रारब्ध)" बनता है उसे उसका फल भोगना ही पड़ता है।
चंदन नगर का राजा चंदन सिंह बहुत ही पराक्रमी एवं शक्तिशाली था। उसका राज्य भी धन-धान्य से पूर्ण था।_
राजा की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी।_
एक बार चंदन नगर में एक ज्योतिषी पधारे। उनका नाम था- "भद्रशील " उनके बारे में विख्यात था- कि वह बहुत ही पहुंचे हुए ज्यातिषी हैं- और किसी के भी भविष्य के बारे में सही-सही बता सकते हैं। वह नगर के बाहर एक छोटी कुटिया में ठहरे थे।_
_उनकी इच्छा हुई कि वह भी राजा के दर्शन करें।_
_उन्होंने राजा से मिलने की इच्छा व्यक्त की- तो राजा से मिलने की अनुमति- उन्हें सहर्ष ही मिल गई।_
_राज दरबार में राजा ने उनका हार्दिक स्वागत किया।_
_चलते समय राजा ने ज्योतिषी को कुछ हीरे- जवाहरात देकर विदा करना चाहा,परंतु ज्योतिषी ने यह कह कर मना कर दिया- कि वह सिर्फ अपने भाग्य का खाते हैं।_
_राजा की दी हुई दौलत से वह अमीर नहीं बन सकते।_
_राजा ने पूछा: "इससे क्या तात्पर्य है- आपका गुरुदेव.....?"_
_"कोई भी व्यक्ति अपनी किस्मत और मेहनत से गरीब या अमीर होता है।_
_यदि राजा भी किसी को अमीर बनाना चाहे- तो नहीं बना सकता।_
_राजा की दौलत भी उसके हाथ से निकल जाएगी।"_
_यह सुनकर राजा को क्रोध आ गया।_
_"गुरुदेव ! आप किसी का हाथ देखकर यह बताइए- कि उसकी किस्मत में अमीर बनना लिखा है या गरीब!_
_मैं उसको उलटकर दिखा दूंगा-" राजा बोले।_
_"ठीक है,आप ही किसी व्यक्ति को बुलाइए, मैं बताता हूं उसका भविष्य और भाग्य।"_
_ज्योतिषी ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया।_
_राजा ने अपने मंत्री को चुपचाप कुछ आदेश दिया- और कुछ ही क्षणों में एक सजा- धजा नौजवान ज्योतिषी के सामने हाजिर था।_
_ज्योतिषी भद्रशील ने ध्यान से उस व्यक्ति का माथा देखा- फिर हाथ देखकर कहा - "यह व्यक्ति गरीबी में जन्मा है और जिन्दगी भर गरीब ही रहेगा।_
_इसे खेतों और पेड़ों के बीच कुटिया में रहने की आदत है- और वहीं रहेगा ।"_
_राजा चंदन सिंह सुनकर हैरत में पड़ गया, बोला - "आप ठीक कहते हैं,यह सजा-धजा नौजवान महल के राजसी वस्त्र पहनकर आया है!_
_परंतु वास्तव में यह महल के बागों की देखभाल करने वाला गरीब माली है।_
_परंतु गुरुदेव एक वर्ष के भीतर मैं इसे अमीर बना दूंगा।_
_यह जिन्दगी भर गरीब नहीं रह सकता।"_
_राजा का घमंड देखकर ज्योतिषी ने कहा: "ठीक है,आप स्वयं प्रयत्न कर लीजिए,अब मुझे आज्ञा दीजिए।"_
_और ज्योतिषी "भद्रशील " चंदन नगर से चले गए।_
_राजा ने अगले दिन माली दयाल को बुलाकर एक पत्र दिया -और साथ में यात्रा करने के लिए कुछ धन दिया।_
_फिर उससे कहा: "यहां से सौ कोस दूर बालीपुर में मेरे परम मित्र भानुप्रताप रहते हैं, वहां जाओ- और यह पत्र उन्हें दे आओ।"_
_सुनकर दयाल का चेहरा लटक गया। वह पत्र लेकर अपनी कुटिया में आ गया,और सोचने लगा - यहां तो पेड़ों की थोड़ी-बहुत देखभाल करके दिन भर आराम करता हूं। अब इतनी गर्मी में इतनी दूर जाना पड़ेगा।_
_परंतु राजा की आज्ञा थी, इसलिए अगले दिन सुबह तड़के वह चंदन नगर से पत्र लेकर निकल गया।_
_दो गांव पार करते- करते वह बहुत थक चुका था- और धूप चढ़ने लगी थी। इस कारण उसे भूख और प्यास भी जोर की लगी थी। वह उस गांव में बाजार से भोजन लेकर एक पेड़ के नीचे खाने बैठ गया। अभी आधा भोजन ही कर पाया था कि उसका एक अन्य मित्र,जो खेती ही करता था, मिल गया।_
_दयाल ने अपनी परेशानी अपने मित्र टीकम को बताई।_
_सुनकर टीकम हंसने लगा,और बोला:_
_"इसमें परेशानी की क्या बात है.....? राजा के काम से जाओगे,खूब आवभगत होगी।_
_तुम्हारी जगह मैं होता तो खुशी-खुशी जाता।"_
_यह सुनकर दयाल का चेहरा खुशी से खिल उठा, "तो ठीक है भैया टीकम! तुम ही यह पत्र लेकर चले जाओ,मैं एक दिन यहीं आराम करके वापस चला जाऊंगा।"_
_टीकम ने खुशी-खुशी वह पत्र ले लिया- और दो दिन में बाली नगर पहुंच गया।_
_वहां का राजा भानुप्रताप था। टीकम आसानी से भानुप्रताप के दरवाजे तक पहुंच गया- और सूचना भिजवाई कि चंदन नगर के राजा का दूत आया है।_
_उसे तुरंत अंदर बुलाया गया ।_
_टीकम की खूब आव भगत हुई। दरबार में मंत्रियों के साथ उसे बिठाया। गया जब उसने पत्र दिया- तो भानुप्रताप ने पत्र खोला। पत्र में लिखा था "प्रिय मित्र!, यह बहुत योग्य एवं मेहनती व्यक्ति है। इसे अपने राज्य में इसकी इच्छानुसार चार सौ एकड़ जमीन दे दो- और उसका मालिक बना दो- यह मेरे पुत्र समान है।
इसके आगे की कहानी पहले ही भेज दी गई है
भाग्य में नहीं है
भाग्य से ऊंचा कर्म है इस कर्म से ही भाग्य बनता है,और जो भाग्य "(प्रारब्ध)" बनता है उसे उसका फल भोगना ही पड़ता है।
चंदन नगर का राजा चंदन सिंह बहुत ही पराक्रमी एवं शक्तिशाली था। उसका राज्य भी धन-धान्य से पूर्ण था।_
राजा की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी।_
एक बार चंदन नगर में एक ज्योतिषी पधारे। उनका नाम था- "भद्रशील " उनके बारे में विख्यात था- कि वह बहुत ही पहुंचे हुए ज्यातिषी हैं- और किसी के भी भविष्य के बारे में सही-सही बता सकते हैं। वह नगर के बाहर एक छोटी कुटिया में ठहरे थे।_
_उनकी इच्छा हुई कि वह भी राजा के दर्शन करें।_
_उन्होंने राजा से मिलने की इच्छा व्यक्त की- तो राजा से मिलने की अनुमति- उन्हें सहर्ष ही मिल गई।_
_राज दरबार में राजा ने उनका हार्दिक स्वागत किया।_
_चलते समय राजा ने ज्योतिषी को कुछ हीरे- जवाहरात देकर विदा करना चाहा,परंतु ज्योतिषी ने यह कह कर मना कर दिया- कि वह सिर्फ अपने भाग्य का खाते हैं।_
_राजा की दी हुई दौलत से वह अमीर नहीं बन सकते।_
_राजा ने पूछा: "इससे क्या तात्पर्य है- आपका गुरुदेव.....?"_
_"कोई भी व्यक्ति अपनी किस्मत और मेहनत से गरीब या अमीर होता है।_
_यदि राजा भी किसी को अमीर बनाना चाहे- तो नहीं बना सकता।_
_राजा की दौलत भी उसके हाथ से निकल जाएगी।"_
_यह सुनकर राजा को क्रोध आ गया।_
_"गुरुदेव ! आप किसी का हाथ देखकर यह बताइए- कि उसकी किस्मत में अमीर बनना लिखा है या गरीब!_
_मैं उसको उलटकर दिखा दूंगा-" राजा बोले।_
_"ठीक है,आप ही किसी व्यक्ति को बुलाइए, मैं बताता हूं उसका भविष्य और भाग्य।"_
_ज्योतिषी ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया।_
_राजा ने अपने मंत्री को चुपचाप कुछ आदेश दिया- और कुछ ही क्षणों में एक सजा- धजा नौजवान ज्योतिषी के सामने हाजिर था।_
_ज्योतिषी भद्रशील ने ध्यान से उस व्यक्ति का माथा देखा- फिर हाथ देखकर कहा - "यह व्यक्ति गरीबी में जन्मा है और जिन्दगी भर गरीब ही रहेगा।_
_इसे खेतों और पेड़ों के बीच कुटिया में रहने की आदत है- और वहीं रहेगा ।"_
_राजा चंदन सिंह सुनकर हैरत में पड़ गया, बोला - "आप ठीक कहते हैं,यह सजा-धजा नौजवान महल के राजसी वस्त्र पहनकर आया है!_
_परंतु वास्तव में यह महल के बागों की देखभाल करने वाला गरीब माली है।_
_परंतु गुरुदेव एक वर्ष के भीतर मैं इसे अमीर बना दूंगा।_
_यह जिन्दगी भर गरीब नहीं रह सकता।"_
_राजा का घमंड देखकर ज्योतिषी ने कहा: "ठीक है,आप स्वयं प्रयत्न कर लीजिए,अब मुझे आज्ञा दीजिए।"_
_और ज्योतिषी "भद्रशील " चंदन नगर से चले गए।_
_राजा ने अगले दिन माली दयाल को बुलाकर एक पत्र दिया -और साथ में यात्रा करने के लिए कुछ धन दिया।_
_फिर उससे कहा: "यहां से सौ कोस दूर बालीपुर में मेरे परम मित्र भानुप्रताप रहते हैं, वहां जाओ- और यह पत्र उन्हें दे आओ।"_
_सुनकर दयाल का चेहरा लटक गया। वह पत्र लेकर अपनी कुटिया में आ गया,और सोचने लगा - यहां तो पेड़ों की थोड़ी-बहुत देखभाल करके दिन भर आराम करता हूं। अब इतनी गर्मी में इतनी दूर जाना पड़ेगा।_
_परंतु राजा की आज्ञा थी, इसलिए अगले दिन सुबह तड़के वह चंदन नगर से पत्र लेकर निकल गया।_
_दो गांव पार करते- करते वह बहुत थक चुका था- और धूप चढ़ने लगी थी। इस कारण उसे भूख और प्यास भी जोर की लगी थी। वह उस गांव में बाजार से भोजन लेकर एक पेड़ के नीचे खाने बैठ गया। अभी आधा भोजन ही कर पाया था कि उसका एक अन्य मित्र,जो खेती ही करता था, मिल गया।_
_दयाल ने अपनी परेशानी अपने मित्र टीकम को बताई।_
_सुनकर टीकम हंसने लगा,और बोला:_
_"इसमें परेशानी की क्या बात है.....? राजा के काम से जाओगे,खूब आवभगत होगी।_
_तुम्हारी जगह मैं होता तो खुशी-खुशी जाता।"_
_यह सुनकर दयाल का चेहरा खुशी से खिल उठा, "तो ठीक है भैया टीकम! तुम ही यह पत्र लेकर चले जाओ,मैं एक दिन यहीं आराम करके वापस चला जाऊंगा।"_
_टीकम ने खुशी-खुशी वह पत्र ले लिया- और दो दिन में बाली नगर पहुंच गया।_
_वहां का राजा भानुप्रताप था। टीकम आसानी से भानुप्रताप के दरवाजे तक पहुंच गया- और सूचना भिजवाई कि चंदन नगर के राजा का दूत आया है।_
_उसे तुरंत अंदर बुलाया गया ।_
_टीकम की खूब आव भगत हुई। दरबार में मंत्रियों के साथ उसे बिठाया। गया जब उसने पत्र दिया- तो भानुप्रताप ने पत्र खोला। पत्र में लिखा था "प्रिय मित्र!, यह बहुत योग्य एवं मेहनती व्यक्ति है। इसे अपने राज्य में इसकी इच्छानुसार चार सौ एकड़ जमीन दे दो- और उसका मालिक बना दो- यह मेरे पुत्र समान है।
इसके आगे की कहानी पहले ही भेज दी गई है
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कहानी का समय
*आत्मसम्मान*
उस दिन ट्रेन लेट होकर रात्रि 12 बजे पहुँची।
बाहर एक
वृद्ध रिक्शावाला ही दिखा जिसे कई
यात्री जान बूझकर
छोड़ गए थे। एक बार मेरे मन में भी आया, इससे
चलना पाप
होगा,फिर मजबूरी में उसी को बुलाया, वह
भी बिना कुछ पूछे
चल दिया।
कुछ दूर चलने के बाद ओवरब्रिज की चढ़ाई थी, तब
जाकर पता चला, उसका एक ही हाथ था। मैंने
सहानुभूतिवश पूछा, ‘‘एक
हाथ से रिक्शा चलाने में बहुत
ही परेशानी होती होगी?’’
‘‘बिल्कुल नहीं बाबूजी, शुरू में कुछ दिन हुई थी।’’
रात के सन्नाटे में वह एक ही हाथ से
रिक्शा खींचते हुए पसीने–
पसीने हो रहा था । मैंने पूछा, ‘एक हाथ
की क्या कहानी है?’’
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद वह बोला, ‘‘गाँव में
खेत के बँटवारे में रंजिश हो गई, वे लोग दबंग और
अपराधी स्वभाव के थे,
मुकदमा उठाने के लिए दबाव डालने लगे।’’
वह कुछ गम्भीर हो गया और आगे की बात बताने से
कतराने
लगा, किन्तु मेरी उत्सुकता के आगे वह विवश
हो गया और
बताया, ‘‘एक रात जब मैं खलिहान में सो रहा था,
जान मारने
की नीयत से मुझ पर वार किया गया। संयोग से
वह गड़ासा गर्दन पर गिरने के बजाए हाथ पर
गिरा और वह कट
गया।’’
‘‘क्या दिन की मजदूरी से काम नहीं चलता जो इस
उम्र में रात
में रिक्शा चला रहे हो?’’ मुझे उस पर दया आई।
‘‘रात्रि में भीड़ कम होती है जिससे
रिक्शा चलाने में
आसानी होती है।’’ उसने धीरे से कहा।
उसकी विवशता समझकर घर पर मैंने पाँच रूपए के
बजाए दस रुपए
दिए। सीढि़याँ चढ़कर
दरवाजा खुलवा ही रहा था कि वह
भी हाँफते हुए पहुँचा और पाँच रुपए का नोट वापस
करते हुए
बोला, ‘‘आपने ज्यादा दे दिया था।’’
‘‘आपकी अवस्था देखकर और रात की मेहनत सोचकर
कोई
अधिक नहीं है, मैं खुशी से दे रहा हूँ।’’ उसने जवाब
दिया,
*‘‘मेरी प्रतिज्ञा है एक हाथ के रहते हुए भी दया की भीख नहीं लूँगा, तन ही बूढ़ा हुआ है मन नहीं।’’*
मुझे लगा पाँच रुपए अधिक देकर मैंने उसका अपमान
कर दिया है।
*आत्मसम्मान एक सफल सुखी जीवन का आधारभूत तत्व है। व्यक्ति आत्मसम्मान के अभाव में सफल तो हो सकता है, बाह्य उपलब्धियों भरा जीवन भी सकता है, किंतु वह अंदर से भी सुखी, संतुष्ट और संतृप्त होगा, यह संभव नहीं है।*
*आत्मसम्मान*
उस दिन ट्रेन लेट होकर रात्रि 12 बजे पहुँची।
बाहर एक
वृद्ध रिक्शावाला ही दिखा जिसे कई
यात्री जान बूझकर
छोड़ गए थे। एक बार मेरे मन में भी आया, इससे
चलना पाप
होगा,फिर मजबूरी में उसी को बुलाया, वह
भी बिना कुछ पूछे
चल दिया।
कुछ दूर चलने के बाद ओवरब्रिज की चढ़ाई थी, तब
जाकर पता चला, उसका एक ही हाथ था। मैंने
सहानुभूतिवश पूछा, ‘‘एक
हाथ से रिक्शा चलाने में बहुत
ही परेशानी होती होगी?’’
‘‘बिल्कुल नहीं बाबूजी, शुरू में कुछ दिन हुई थी।’’
रात के सन्नाटे में वह एक ही हाथ से
रिक्शा खींचते हुए पसीने–
पसीने हो रहा था । मैंने पूछा, ‘एक हाथ
की क्या कहानी है?’’
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद वह बोला, ‘‘गाँव में
खेत के बँटवारे में रंजिश हो गई, वे लोग दबंग और
अपराधी स्वभाव के थे,
मुकदमा उठाने के लिए दबाव डालने लगे।’’
वह कुछ गम्भीर हो गया और आगे की बात बताने से
कतराने
लगा, किन्तु मेरी उत्सुकता के आगे वह विवश
हो गया और
बताया, ‘‘एक रात जब मैं खलिहान में सो रहा था,
जान मारने
की नीयत से मुझ पर वार किया गया। संयोग से
वह गड़ासा गर्दन पर गिरने के बजाए हाथ पर
गिरा और वह कट
गया।’’
‘‘क्या दिन की मजदूरी से काम नहीं चलता जो इस
उम्र में रात
में रिक्शा चला रहे हो?’’ मुझे उस पर दया आई।
‘‘रात्रि में भीड़ कम होती है जिससे
रिक्शा चलाने में
आसानी होती है।’’ उसने धीरे से कहा।
उसकी विवशता समझकर घर पर मैंने पाँच रूपए के
बजाए दस रुपए
दिए। सीढि़याँ चढ़कर
दरवाजा खुलवा ही रहा था कि वह
भी हाँफते हुए पहुँचा और पाँच रुपए का नोट वापस
करते हुए
बोला, ‘‘आपने ज्यादा दे दिया था।’’
‘‘आपकी अवस्था देखकर और रात की मेहनत सोचकर
कोई
अधिक नहीं है, मैं खुशी से दे रहा हूँ।’’ उसने जवाब
दिया,
*‘‘मेरी प्रतिज्ञा है एक हाथ के रहते हुए भी दया की भीख नहीं लूँगा, तन ही बूढ़ा हुआ है मन नहीं।’’*
मुझे लगा पाँच रुपए अधिक देकर मैंने उसका अपमान
कर दिया है।
*आत्मसम्मान एक सफल सुखी जीवन का आधारभूत तत्व है। व्यक्ति आत्मसम्मान के अभाव में सफल तो हो सकता है, बाह्य उपलब्धियों भरा जीवन भी सकता है, किंतु वह अंदर से भी सुखी, संतुष्ट और संतृप्त होगा, यह संभव नहीं है।*
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प्रबुद्ध मानस
प्रवृत्त मन से ऊपर दूसरा मन है, जिसे 'प्रबुद्ध मानस' कहना चाहिए। इस पुस्तक को पढ़ते समय तुम उसी मन का उपयोग कर रहे हो। इसका काम सोचना, विचारना, विवेचना करना, तुलना करना, कल्पना, तर्क तथा निर्णय आदि करना है। हाजिर जबावी, बुद्घिमत्ता, चतुरता, अनुभव, स्थिति का परीक्षण यह सब प्रबुद्घ मन द्वारा होते हैं। याद रखो जैसे प्रवृत्त मानस 'अहम्' नहीं है उसी प्रकार प्रबुद्घ मानस भी वह नहीं है। कुछ देर विचार करके तुम इसे आसानी के साथ 'अहम्' से अलग कर सकते हो। इस छोटी-सी पुस्तक में बुद्घि के गुण धर्मों का विवेचन नहीं हो सकता, जिन्हें इस विषय का अधिक ज्ञान प्राप्त करना हो, वे मनोविज्ञान के उत्तमोत्तम ग्रन्थों का मनन करें। इस समय इतना काफी है कि तुम अनुभव कर लो कि प्रबुद्घ मन भी एक आच्छादन है न कि 'अहम्'।
तीसरे सर्वोच्च मन का नाम 'अध्यात्म मानस' है। इसका विकास अधिकांश लोगों में नहीं हुआ होता। मेरा विचार है कि तुम में यह कुछ-कुछ विकसने लगा है, क्योंकि इस पुस्तक को मन लगाकर पढ़ रहे हो और इसमें वर्णित विषय की ओर आकर्षित हो रहे हो। मन के इस विभाग को हम लोग उच्चतम विभाग मानते हैं और आध्यात्मिकता, आत्म-प्रेरणा, ईश्वरीय सन्देश, प्रतिभा आदि के रूप में जानते हैं। उच्च भावनाएँ मन के इसी भाग में उत्पन्न होकर चेतना में गति करती हैं। प्रेम, सहानुभूति, दया, करुणा, न्याय, निष्ठा, उदारता, धर्म प्रवृत्ति, सत्य, पवित्रता, आत्मीयता आदि सब भावनाएँ इसी मन से आती हैं। ईश्वरीय भक्ति इसी मन में उदय होती है। गूढ़ तत्त्वों का रहस्य इसी के द्वारा जाना जाता है। इस पाठ में जिस विशुद्घ 'अहम्' की अनुभूति के शिक्षण का हम प्रयत्न कर रहे हैं, वह इसी 'अध्यात्म मानस' के चेतना क्षेत्र से प्राप्त हो सकेगी। परन्तु भूलिए मत, मन का यह सर्वोच्च भाग भी केवल उपकरण ही है। 'अहम्' यह भी नहीं है।
तुम्हें यह भ्रम न करना चाहिए कि हम किसी मन की निन्दा और किसी की स्तुति करते हैं और भार या बाधक सिद्घ करते हैं। बात ऐसी नहीं है। हम सोचते तो यह हैं कि मन की सहायता से ही तुम अपनी वास्तविक सत्ता और आत्म-ज्ञान के निकट पहुँचे हो और आगे भी बहुत दूर तक उसकी सहायता से अपना मानसिक विकास कर सकोगे इसलिए मन का प्रत्येक विभाग अपने स्थान पर बहुत अच्छा है, बशर्ते कि उसका ठीक उपयोग किया जाय।
साधारण लोग अब तक मन के निम्न भागों को ही उपयोग में लाते हैं, उनके मानस-लोक में अभी ऐसे असंख्य गुप्त प्रकट स्थान हैं जिनकी स्वप्न में भी कल्पना नहीं की जा सकी है अतएव मन को कोसने के स्थान पर आचार्य लोग दीक्षितों को सदैव यह उपदेश देते हैं कि उस गुप्त शक्ति को त्याज्य न ठहराकर ठीक प्रकार से क्रियाशील बनाओ।
यह शिक्षा जो तुम्हें दी जा रही है मन के द्वारा ही क्रिया रूप में आ सकती है और उसी के द्वारा समझने, धारण करने एवं सफल होने का कार्य हो सकता है इसलिए हम सीधे तुम्हारे मन से बात कर रहे हैं, उसी से निवेदन कर रहे हैं कि महोदय! अपनी उच्च कक्षा से आने वाले ज्ञान को ग्रहण कीजिए और उसके लिए अपना द्वार खोल दीजिए। हम आपकी बुद्घि से प्रार्थना करते हैं-भगवती! अपना ध्यान उस महातत्त्व की ओर लगाइए और सत्य के अनुभवी, अपने आध्यात्मिक मन द्वारा आने वाली दैवी चेतनाओं में कम बाधा दीजिए।
प्रवृत्त मन से ऊपर दूसरा मन है, जिसे 'प्रबुद्ध मानस' कहना चाहिए। इस पुस्तक को पढ़ते समय तुम उसी मन का उपयोग कर रहे हो। इसका काम सोचना, विचारना, विवेचना करना, तुलना करना, कल्पना, तर्क तथा निर्णय आदि करना है। हाजिर जबावी, बुद्घिमत्ता, चतुरता, अनुभव, स्थिति का परीक्षण यह सब प्रबुद्घ मन द्वारा होते हैं। याद रखो जैसे प्रवृत्त मानस 'अहम्' नहीं है उसी प्रकार प्रबुद्घ मानस भी वह नहीं है। कुछ देर विचार करके तुम इसे आसानी के साथ 'अहम्' से अलग कर सकते हो। इस छोटी-सी पुस्तक में बुद्घि के गुण धर्मों का विवेचन नहीं हो सकता, जिन्हें इस विषय का अधिक ज्ञान प्राप्त करना हो, वे मनोविज्ञान के उत्तमोत्तम ग्रन्थों का मनन करें। इस समय इतना काफी है कि तुम अनुभव कर लो कि प्रबुद्घ मन भी एक आच्छादन है न कि 'अहम्'।
तीसरे सर्वोच्च मन का नाम 'अध्यात्म मानस' है। इसका विकास अधिकांश लोगों में नहीं हुआ होता। मेरा विचार है कि तुम में यह कुछ-कुछ विकसने लगा है, क्योंकि इस पुस्तक को मन लगाकर पढ़ रहे हो और इसमें वर्णित विषय की ओर आकर्षित हो रहे हो। मन के इस विभाग को हम लोग उच्चतम विभाग मानते हैं और आध्यात्मिकता, आत्म-प्रेरणा, ईश्वरीय सन्देश, प्रतिभा आदि के रूप में जानते हैं। उच्च भावनाएँ मन के इसी भाग में उत्पन्न होकर चेतना में गति करती हैं। प्रेम, सहानुभूति, दया, करुणा, न्याय, निष्ठा, उदारता, धर्म प्रवृत्ति, सत्य, पवित्रता, आत्मीयता आदि सब भावनाएँ इसी मन से आती हैं। ईश्वरीय भक्ति इसी मन में उदय होती है। गूढ़ तत्त्वों का रहस्य इसी के द्वारा जाना जाता है। इस पाठ में जिस विशुद्घ 'अहम्' की अनुभूति के शिक्षण का हम प्रयत्न कर रहे हैं, वह इसी 'अध्यात्म मानस' के चेतना क्षेत्र से प्राप्त हो सकेगी। परन्तु भूलिए मत, मन का यह सर्वोच्च भाग भी केवल उपकरण ही है। 'अहम्' यह भी नहीं है।
तुम्हें यह भ्रम न करना चाहिए कि हम किसी मन की निन्दा और किसी की स्तुति करते हैं और भार या बाधक सिद्घ करते हैं। बात ऐसी नहीं है। हम सोचते तो यह हैं कि मन की सहायता से ही तुम अपनी वास्तविक सत्ता और आत्म-ज्ञान के निकट पहुँचे हो और आगे भी बहुत दूर तक उसकी सहायता से अपना मानसिक विकास कर सकोगे इसलिए मन का प्रत्येक विभाग अपने स्थान पर बहुत अच्छा है, बशर्ते कि उसका ठीक उपयोग किया जाय।
साधारण लोग अब तक मन के निम्न भागों को ही उपयोग में लाते हैं, उनके मानस-लोक में अभी ऐसे असंख्य गुप्त प्रकट स्थान हैं जिनकी स्वप्न में भी कल्पना नहीं की जा सकी है अतएव मन को कोसने के स्थान पर आचार्य लोग दीक्षितों को सदैव यह उपदेश देते हैं कि उस गुप्त शक्ति को त्याज्य न ठहराकर ठीक प्रकार से क्रियाशील बनाओ।
यह शिक्षा जो तुम्हें दी जा रही है मन के द्वारा ही क्रिया रूप में आ सकती है और उसी के द्वारा समझने, धारण करने एवं सफल होने का कार्य हो सकता है इसलिए हम सीधे तुम्हारे मन से बात कर रहे हैं, उसी से निवेदन कर रहे हैं कि महोदय! अपनी उच्च कक्षा से आने वाले ज्ञान को ग्रहण कीजिए और उसके लिए अपना द्वार खोल दीजिए। हम आपकी बुद्घि से प्रार्थना करते हैं-भगवती! अपना ध्यान उस महातत्त्व की ओर लगाइए और सत्य के अनुभवी, अपने आध्यात्मिक मन द्वारा आने वाली दैवी चेतनाओं में कम बाधा दीजिए।
👍5❤1
🕉️।।श्रीहरिः।।
*ज्ञान के दीप जले*
*जैसे बालक माँ की गोद में जाता है, ऐसे ही हमें भगवान् की शरण होना है | यह शरणागति अत्यन्त सुगम है | माँ की गोद में जाने में क्या कठिनता ? मुख्य बात है – मालिक का स्वीकार करना | भगवान् ने तो हमें अपने शरण में स्वीकार कर रखा है – ‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस, उतर. ८६/२) | केवल अपनी तरफ से हमें ‘हाँ’ कहनी है | कारण कि भगवान् से विमुख हम ही हुए हैं | ‘हे नाथ ! मैं आपके शरण हूँ’ – ऐसा कहकर शरण हो जायँ | शरण होने में जाति, वर्ण, आश्रम, गोत्र आदि नहीं देखा जाता | भक्त अच्युतगोत्र हो जाता है | भगवान् के साथ जीवमात्र का नित्य-सम्बन्ध है |*
*ज्ञान के दीप जले*
*जैसे बालक माँ की गोद में जाता है, ऐसे ही हमें भगवान् की शरण होना है | यह शरणागति अत्यन्त सुगम है | माँ की गोद में जाने में क्या कठिनता ? मुख्य बात है – मालिक का स्वीकार करना | भगवान् ने तो हमें अपने शरण में स्वीकार कर रखा है – ‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस, उतर. ८६/२) | केवल अपनी तरफ से हमें ‘हाँ’ कहनी है | कारण कि भगवान् से विमुख हम ही हुए हैं | ‘हे नाथ ! मैं आपके शरण हूँ’ – ऐसा कहकर शरण हो जायँ | शरण होने में जाति, वर्ण, आश्रम, गोत्र आदि नहीं देखा जाता | भक्त अच्युतगोत्र हो जाता है | भगवान् के साथ जीवमात्र का नित्य-सम्बन्ध है |*
👍4
*स्वप्न शास्त्र: अच्छा समय आने से पहले सपने में दिखाई देती हैं ये पांच*
हिंदू धर्म में स्वप्न शास्त्र को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। यह एक ऐसी विद्या है, जिसके माध्यम से सभी सपनों के अर्थ का पता चलता है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार हर व्यक्ति सोते समय किसी न किसी सपने को जरूर देखता है। आमतौर पर ये सपने रोजमर्रा की गतिविधियों से जुड़े होते है। लेकिन कई बार ये सपने भविष्य में मिलने वाले लाभ, बुरे समय का समापन या अन्य कई चीजों से जुड़े होते हैं। स्वप्न शास्त्र के मुताबिक अगर सपने में बारिश देखी जाए, तो यह बहुत शुभ होता है। इसका अर्थ है कि जल्द ही आपके जीवन में कुछ अच्छा होने वाला है। साथ ही शुभ समाचार की प्राप्ति भी होगी। ऐसे ही कई अन्य सपनों का उल्लेख स्वप्न शास्त्र में किया गया है, जिसका अर्थ भविष्य में मिलने वाले लाभ से जुड़ा होता है। आइए इसके बारे में जानते हैं।*
*१. चंद्रमा का दिखना*
स्वप्न शास्त्र के अनुसार यदि आप सपने में चंद्रमा देखते हैं, तो यह बहुत शुभ होता है। इसका अर्थ है कि आपके परिवार में सब कुछ ठीक होने वाला है। इतना ही नहीं जल्द ही घर में खुशहाली आने वाली है।
*२. नाखून काटना*
माना जाता है कि अगर सपने में स्वयं को नाखून काटते हुए देखा जाए, तो यह अच्छा संकेत होता है। इसका अर्थ है कि जल्द ही आपको कर्ज से छुटकारा मिलने वाला है और आपकी आर्थिक स्थित भी मजबूत होने वाली है।
*३. पक्षी की तरह उड़ना*
स्वप्न शास्त्र के मुताबिक अगर सपने में खुद को पक्षी की तरह उड़ता हुआ देखा जाए, तो यह बहुत लाभकारी होता है। इसे अच्छे समय आने का संकेत माना जाता है। इसका अर्थ है कि जल्द ही आपके जीवन की समस्याएं खत्म होने वाली है।
*४. नदी का दिखना*
आमतौर पर सपने में नदी को देखा जाता है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह खुशखबरी मिलने का संकेत होता है। इस सपने का अर्थ है कि जल्द ही आपको किसी शुभ समाचार की प्राप्ति होने वाली है।
*५. बगीचा देखना*
सपने में बगीचा देखना बेहद भी लाभकारी होता है। इसका अर्थ है कि जल्द ही आपकी आर्थिक स्थिति में सुधार होने वाला है। इतना ही नहीं लाभ की प्राप्ति भी संभव है।
हिंदू धर्म में स्वप्न शास्त्र को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। यह एक ऐसी विद्या है, जिसके माध्यम से सभी सपनों के अर्थ का पता चलता है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार हर व्यक्ति सोते समय किसी न किसी सपने को जरूर देखता है। आमतौर पर ये सपने रोजमर्रा की गतिविधियों से जुड़े होते है। लेकिन कई बार ये सपने भविष्य में मिलने वाले लाभ, बुरे समय का समापन या अन्य कई चीजों से जुड़े होते हैं। स्वप्न शास्त्र के मुताबिक अगर सपने में बारिश देखी जाए, तो यह बहुत शुभ होता है। इसका अर्थ है कि जल्द ही आपके जीवन में कुछ अच्छा होने वाला है। साथ ही शुभ समाचार की प्राप्ति भी होगी। ऐसे ही कई अन्य सपनों का उल्लेख स्वप्न शास्त्र में किया गया है, जिसका अर्थ भविष्य में मिलने वाले लाभ से जुड़ा होता है। आइए इसके बारे में जानते हैं।*
*१. चंद्रमा का दिखना*
स्वप्न शास्त्र के अनुसार यदि आप सपने में चंद्रमा देखते हैं, तो यह बहुत शुभ होता है। इसका अर्थ है कि आपके परिवार में सब कुछ ठीक होने वाला है। इतना ही नहीं जल्द ही घर में खुशहाली आने वाली है।
*२. नाखून काटना*
माना जाता है कि अगर सपने में स्वयं को नाखून काटते हुए देखा जाए, तो यह अच्छा संकेत होता है। इसका अर्थ है कि जल्द ही आपको कर्ज से छुटकारा मिलने वाला है और आपकी आर्थिक स्थित भी मजबूत होने वाली है।
*३. पक्षी की तरह उड़ना*
स्वप्न शास्त्र के मुताबिक अगर सपने में खुद को पक्षी की तरह उड़ता हुआ देखा जाए, तो यह बहुत लाभकारी होता है। इसे अच्छे समय आने का संकेत माना जाता है। इसका अर्थ है कि जल्द ही आपके जीवन की समस्याएं खत्म होने वाली है।
*४. नदी का दिखना*
आमतौर पर सपने में नदी को देखा जाता है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह खुशखबरी मिलने का संकेत होता है। इस सपने का अर्थ है कि जल्द ही आपको किसी शुभ समाचार की प्राप्ति होने वाली है।
*५. बगीचा देखना*
सपने में बगीचा देखना बेहद भी लाभकारी होता है। इसका अर्थ है कि जल्द ही आपकी आर्थिक स्थिति में सुधार होने वाला है। इतना ही नहीं लाभ की प्राप्ति भी संभव है।
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समुद्रशास्त्र
शरीर के यह अंग बताते हैं कि आप धनवान और महान बनेंगे
समुद्रशास्त्र में बताया गया है कि शरीर के कुछ अंगों की बनावट को देखकर यह जाना जा सकता है कि व्यक्ति खूब धनवान और महान व्यक्ति होगा। शरीर के कुछ अंगों को देखकर यह भी जाना जा सकता है कि व्यक्ति सरकारी क्षेत्र में बड़ा अधिकारी या प्रशासक हो सकता है।
हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार जिस व्यक्ति की तर्जनी उंगली यानी अंगूठे के बाद वाली उंगली बीच वाली उंगली से बड़ी हो तो व्यक्ति प्रशासक बनता है। ऎसा व्यक्ति सामान्य स्थिति में कभी नहीं रहता। सामान्य परिवार में जन्म लेने पर भी महान व्यक्ति बनता है। इसके उदाहरण हैं नेपोलियन और लिंकन।
हथेली की सबसे छोटी उंगली जिसे कनिष्ठा उंगली कहते हैं यह अगर लंबी हो और अनामिका उंगली के उपरी पोर तक पहुंच जाए तो बड़ा ही सौभाग्यशाली होता है। जिकी कनिष्ठा उंगली ऎसी होती है वह बहुत ही बुद्धिमान और कुशल प्रशासक होते हैं। ऎसे व्यक्ति जीवन में खूब धन और प्रशंसा प्राप्त करते हैं। जिनकी कनिष्ठा उंगली छोटी होती है वह जीवन में बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं कर पाते हैं।
जिस व्यक्ति के मस्तिष्क पर चन्द्रमा का चिन्ह बनता है वह बहुत ही भाग्यशाली होते हैं। ऎसे व्यक्ति बहुत ही बुद्धिमान होते हैं। पढ़ने लिखने में यह काफी होशियार होते हैं। यह अपने ज्ञान और विद्या से जीवन में सम्मान और धनवान बनते हैं।
समुद्रशास्त्र के अनुसार जिस व्यक्ति की भुजाएं लंबी होती हैं और हाथ घुटने तक पहुंच जाती है वह महान व्यक्ति होता है। ऎसा व्यक्ति जीवन में बड़ी उपलब्धियां हासिल करता है और समाज में पूजनीय होता है। इसका उदाहरण महात्मा गांधी हैं।
शरीर के यह अंग बताते हैं कि आप धनवान और महान बनेंगे
समुद्रशास्त्र में बताया गया है कि शरीर के कुछ अंगों की बनावट को देखकर यह जाना जा सकता है कि व्यक्ति खूब धनवान और महान व्यक्ति होगा। शरीर के कुछ अंगों को देखकर यह भी जाना जा सकता है कि व्यक्ति सरकारी क्षेत्र में बड़ा अधिकारी या प्रशासक हो सकता है।
हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार जिस व्यक्ति की तर्जनी उंगली यानी अंगूठे के बाद वाली उंगली बीच वाली उंगली से बड़ी हो तो व्यक्ति प्रशासक बनता है। ऎसा व्यक्ति सामान्य स्थिति में कभी नहीं रहता। सामान्य परिवार में जन्म लेने पर भी महान व्यक्ति बनता है। इसके उदाहरण हैं नेपोलियन और लिंकन।
हथेली की सबसे छोटी उंगली जिसे कनिष्ठा उंगली कहते हैं यह अगर लंबी हो और अनामिका उंगली के उपरी पोर तक पहुंच जाए तो बड़ा ही सौभाग्यशाली होता है। जिकी कनिष्ठा उंगली ऎसी होती है वह बहुत ही बुद्धिमान और कुशल प्रशासक होते हैं। ऎसे व्यक्ति जीवन में खूब धन और प्रशंसा प्राप्त करते हैं। जिनकी कनिष्ठा उंगली छोटी होती है वह जीवन में बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं कर पाते हैं।
जिस व्यक्ति के मस्तिष्क पर चन्द्रमा का चिन्ह बनता है वह बहुत ही भाग्यशाली होते हैं। ऎसे व्यक्ति बहुत ही बुद्धिमान होते हैं। पढ़ने लिखने में यह काफी होशियार होते हैं। यह अपने ज्ञान और विद्या से जीवन में सम्मान और धनवान बनते हैं।
समुद्रशास्त्र के अनुसार जिस व्यक्ति की भुजाएं लंबी होती हैं और हाथ घुटने तक पहुंच जाती है वह महान व्यक्ति होता है। ऎसा व्यक्ति जीवन में बड़ी उपलब्धियां हासिल करता है और समाज में पूजनीय होता है। इसका उदाहरण महात्मा गांधी हैं।
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ज्योतिष शास्त्र में सोना, चांदी, तांबा या लोहा किस पाए में हुआ है आपका जन्म
क्या होते हैं पाये और कौन सा पाया माना जाता है शुभ?
=============================
कुछ लोगों ने अपने बड़े बुजुर्ग या पंडितों से पैरों के तांबे, चांदी, सोने या लोहे के होने की बात सुनी होगी। इसका मतलब आपकी कुंडली से है। कुंडली में लग्न से चंद्रमा किस भाव में है उससे पाये का पता चलता है। मनुष्य की कुंडली में 12 भाव होते हैं जिन्हें चार भागों में बांटा गया है। प्रत्येक भाव को पाया, पाद या पैर कहते हैं। ये चार पाये हैं सोने का पाया, चांदी का पाया, तांबे का पाया और लोहे का पाया। इन्हीं पायों में से एक पाया किसी ना किसी व्यक्ति का होता है।
चांदी का पाया
===========
जिस व्यक्ति के जन्म के समय चंद्रमा दूसरे, पांचवे और नौवें घर में हो तो ऐसे लोगों का जन्म चांदी के पाए में माना जाता है। इस पाए में जन्म लेने वाले लोग काफी भाग्यशाली होते हैं। कहा जाता है ऐसे लोग अपने साथ-साथ घरवालों के लिए भी काफी लकी साबित होते हैं। इनके घर में जन्म लेते ही परिवार का मान-सम्मान बढ़ने लगता है और परिवार के लोगों की तरक्की होती है।
तांबे का पाया
==========
इसे पाये को दूसरे नंबर का श्रेष्ठ माना गया है। जब किसी बालक के जन्म के समय चंद्रमा तीसरे, सांतवे और दसवें भाग में हो तब उसे तांबे का पाया माना जाता है। इस पाये में जन्मा बच्चा पिता के लिए काफी भाग्यशाली होता है। इसके घर में आने से घर की सुख सुविधा में वृद्धि होने लगती है।
सोने का पाया
==========
जन्म लग्न से चंद्रमा यदि पहले, छठे और ग्यारहवें भाव में हो तो उसे सोने का पाया कहा जाता है। इस पाये में जन्म लेने वाले लोगों को सुख-सुविधा बड़ी ही कठिनाईयों से मिलती है। ऐसे लोग रोग की चपेट में भी बहुत जल्दी आ जाते हैं। इन लोगों के लिए सोने का दान करना अच्छा माना गया है।
लोहे का पाया
==========
इस पाये को इतना अच्छा नहीं माना गया है। जब चंद्रमा चौथे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो ऐसे बच्चे का जन्म लोहे के पाये में माना जाता है। ऐसे लोगों के जीवन में काफी संघर्ष होता है। पारिवार में कोई ना कोई परेशानी आने लगती है। खासकर पिता के लिए ऐसे लोग काफी कष्टदायक साबित होते हैं।
क्या होते हैं पाये और कौन सा पाया माना जाता है शुभ?
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कुछ लोगों ने अपने बड़े बुजुर्ग या पंडितों से पैरों के तांबे, चांदी, सोने या लोहे के होने की बात सुनी होगी। इसका मतलब आपकी कुंडली से है। कुंडली में लग्न से चंद्रमा किस भाव में है उससे पाये का पता चलता है। मनुष्य की कुंडली में 12 भाव होते हैं जिन्हें चार भागों में बांटा गया है। प्रत्येक भाव को पाया, पाद या पैर कहते हैं। ये चार पाये हैं सोने का पाया, चांदी का पाया, तांबे का पाया और लोहे का पाया। इन्हीं पायों में से एक पाया किसी ना किसी व्यक्ति का होता है।
चांदी का पाया
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जिस व्यक्ति के जन्म के समय चंद्रमा दूसरे, पांचवे और नौवें घर में हो तो ऐसे लोगों का जन्म चांदी के पाए में माना जाता है। इस पाए में जन्म लेने वाले लोग काफी भाग्यशाली होते हैं। कहा जाता है ऐसे लोग अपने साथ-साथ घरवालों के लिए भी काफी लकी साबित होते हैं। इनके घर में जन्म लेते ही परिवार का मान-सम्मान बढ़ने लगता है और परिवार के लोगों की तरक्की होती है।
तांबे का पाया
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इसे पाये को दूसरे नंबर का श्रेष्ठ माना गया है। जब किसी बालक के जन्म के समय चंद्रमा तीसरे, सांतवे और दसवें भाग में हो तब उसे तांबे का पाया माना जाता है। इस पाये में जन्मा बच्चा पिता के लिए काफी भाग्यशाली होता है। इसके घर में आने से घर की सुख सुविधा में वृद्धि होने लगती है।
सोने का पाया
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जन्म लग्न से चंद्रमा यदि पहले, छठे और ग्यारहवें भाव में हो तो उसे सोने का पाया कहा जाता है। इस पाये में जन्म लेने वाले लोगों को सुख-सुविधा बड़ी ही कठिनाईयों से मिलती है। ऐसे लोग रोग की चपेट में भी बहुत जल्दी आ जाते हैं। इन लोगों के लिए सोने का दान करना अच्छा माना गया है।
लोहे का पाया
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इस पाये को इतना अच्छा नहीं माना गया है। जब चंद्रमा चौथे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो ऐसे बच्चे का जन्म लोहे के पाये में माना जाता है। ऐसे लोगों के जीवन में काफी संघर्ष होता है। पारिवार में कोई ना कोई परेशानी आने लगती है। खासकर पिता के लिए ऐसे लोग काफी कष्टदायक साबित होते हैं।
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*🛕आने वाले कुछ व्रत त्यौहार*
7 दिसंबर चंपा षष्ठी,पंचक, दिवपुष्कर योग,
8 दिसंबर भानु सप्तमी
11 दिसंबर गीता जयंती, मोक्षदा एकादशी
13 दिसम्बर प्रदोष व्रत
14 दिसम्बर दत्तात्रय जयंती
15 दिसम्बर धनु संक्रांति,मार्गशीर्ष पूर्णिमा, अंवाधान
16 दिसम्बर इष्टि
18 दिसम्बर अखुरथ संकष्टी चतुर्थी ।।
7 दिसंबर चंपा षष्ठी,पंचक, दिवपुष्कर योग,
8 दिसंबर भानु सप्तमी
11 दिसंबर गीता जयंती, मोक्षदा एकादशी
13 दिसम्बर प्रदोष व्रत
14 दिसम्बर दत्तात्रय जयंती
15 दिसम्बर धनु संक्रांति,मार्गशीर्ष पूर्णिमा, अंवाधान
16 दिसम्बर इष्टि
18 दिसम्बर अखुरथ संकष्टी चतुर्थी ।।
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