भारत के हृदय में बसे एक हलचल भरे गांव की कल्पना कीजिए, जहां जीवन सामूहिकता, कर्तव्य और सम्मान के धागों से बुने चित्रपट में प्रकट होता है। वह गांव कई अलग अलग परिवारों से मिलकर बना होता है फिर भी सब आपस में एक जुड़ाव महसूस करते हैं अगर
किसी परिवार में बच्चा पैदा होता है, वह एक ऐसी दुनिया में डूब जाता है, जहाँ परिवार की ज़रूरतें अक्सर व्यक्तिगत इच्छाओं से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं माता-पिता उस बच्चे के सांस्कृतिक मूल्यों को विकसित करते हैं, बच्चे को अन्योन्याश्रितता, सद्भाव और सामंजस्य का महत्व सिखाते हैं...
परिवार समाज की आधारशिला है, और हर सदस्य इसकी अखंडता को बनाए रखने में अपनी भूमिका समझता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वह सीखता है कि उसके कार्य न केवल खुद पर बल्कि उसके परिवार और वहां पर बसे सभी पर प्रभाव डालते हैं सामाजिक भूमिकाओं और कर्तव्यों पर यह जोर बच्चे के नैतिक दिशा-निर्देश को आकार देता है, वह अपनी जिम्मेदारियों को समझता है तथा वह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बजाय परिवार की भलाई को प्राथमिकता देता है।
किसी परिवार में बच्चा पैदा होता है, वह एक ऐसी दुनिया में डूब जाता है, जहाँ परिवार की ज़रूरतें अक्सर व्यक्तिगत इच्छाओं से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं माता-पिता उस बच्चे के सांस्कृतिक मूल्यों को विकसित करते हैं, बच्चे को अन्योन्याश्रितता, सद्भाव और सामंजस्य का महत्व सिखाते हैं...
परिवार समाज की आधारशिला है, और हर सदस्य इसकी अखंडता को बनाए रखने में अपनी भूमिका समझता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वह सीखता है कि उसके कार्य न केवल खुद पर बल्कि उसके परिवार और वहां पर बसे सभी पर प्रभाव डालते हैं सामाजिक भूमिकाओं और कर्तव्यों पर यह जोर बच्चे के नैतिक दिशा-निर्देश को आकार देता है, वह अपनी जिम्मेदारियों को समझता है तथा वह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बजाय परिवार की भलाई को प्राथमिकता देता है।
👍8
कहानी का समय
प्रेम कभी नहीं मरता
*सुबह सूर्योदय हुआ ही था कि, एक वयोवृद्ध सज्जन डॉक्टर के दरवाजे पर आकर घंटी बजाने लगे।*
*"इतने सुबह-सुबह कौन आ गया ?"*
कहते हुए डॉक्टर की पत्नी ने दरवाजा खोला।
वृद्ध को देखते ही डॉक्टर की पत्नी ने कहा,
*"दादा आज इतनी सुबह ? क्या परेशानी हो गयी आपको ??"*
वयोवृद्ध ने कहा, *"मेरे अंगूठे के टांके कटवाने आया हूं बेटा, डॉक्टर साहब के पास। मुझे 8:30 बजे दूसरी जगह पहुंचना होता है, इसीलिए जल्दी आया।*
*सॉरी डॉक्टर साहब।"*
डाक्टर के पड़ोस वाले मोहल्ले में ही वयोवृद्ध का निवास था, जब भी जरूरत पड़ती वह डॉक्टर के पास आ जाते थे। इसलिए डाक्टर उनसे परिचित था। उसने कमरे से बाहर आकर कहा, *"कोई बात नहीं दादा।बैठो। बताओ आप का अंगूठा।*
डॉक्टर ने पूरे ध्यान से अंगूठे के टांके खोले, और कहा कि, *"दादा बहुत बढ़िया है। आपका घाव भर गया है ।फिर भी मैं पट्टी लगा देता हूं कि, कहीं पर चोट न पहुंचे।"*
डाक्टर तो बहुत होते हैं परंतु, यह डॉक्टर बहुत हमदर्दी रखने वाले, आदमी का खयाल रखने वाले और दयालु थे।
डॉक्टर ने पट्टी लगाकर के पूछा, *"दादा आपको कहां पहुंचना पड़ता है 8:30 बजे। आपको देर हो गई हो तो मैं चलकर आपको छोड़ आता हूं।"*
वृद्ध ने कहा कि, *"नहीं-नहीं डॉक्टर साहब, अभी तो मैं घर जाऊंगा, नाश्ता तैयार करूंगा, फिर निकलूंगा, और बराबर 9:00 बजे पहुंच जाऊंगा।"*
उन्होंने डॉक्टर का आभार माना और जाने के लिए खड़े हुए।
बिल लेकर के उपचार करने वाले तो बहुत डॉक्टर होते हैं, परंतु *दिल से उपचार करने वाले कम होते हैं।*
दादा खड़े हुए तभी डॉक्टर की पत्नी ने आकर कहा कि, *"दादा आज नाश्ता यहीं कर लो।"*
वृद्ध ने कहा कि, *"ना बेन !*
*मैं तो यहां नाश्ता कर लेता, परंतु उसको नाश्ता कौन कराएगा ?"*
डॉक्टर ने पूछा, *"किसको नाश्ता कराना है ?"*
तब वृद्ध ने कहा कि, *"मेरी पत्नी को।"*
*"तो वह कहां रहती है ? और 9:00 बजे आपको उसके यहां, कहां पहुंचना होता है ?"* दोनों ने पूछा।
वृद्ध ने कहा, *"डॉक्टर साहब वह तो मेरे बिना रहती ही नहीं थी, परंतु अब। वह अस्वस्थ है, तो नर्सिंग होम में हीै है।"*
डॉक्टर ने पूछा, *"क्यों, उनको क्या तकलीफ है ?"*
वृद्ध व्यक्ति ने कहा, *"मेरी पत्नी को अल्जाइमर हो गया है, उसकी याददाश्त चली गई है।*
*पिछले 5 साल से। वह मेरे को पहचानती नहीं है। मैं नर्सिंग होम में जाता हूं, उसको नाश्ता खिलाता हूं, तो वह फटी आंख से शून्य नेत्रों से मुझे देखती है। मैं उसके लिए अनजाना हो गया हूं।*
ऐसा कहते-कहते वृद्ध की आंखों में आंसू आ गए।
डॉक्टर और उसकी पत्नी की आंखें भी गीली हो गई !
याद रखें,
*प्रेम निस्वार्थ होता है, प्रेम सबके पास होता है परंतु, एक-पक्षिय प्रेम ! यह दुर्लभ होता है। पर होता है जरूर !*
कबीर ने लिखा है...
*प्रेम न बाड़ी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय।*
बाजार में नहीं मिलता है यह।
डॉक्टर और उसकी पत्नी ने कहा,
*"दादा 5 साल से आप रोज नर्सिंग होम में उनको नाश्ता करने जाते हो ? आप इतने वृद्ध।*
*आप थकते नहीं हो, ऊबते नहीं हो ?"*
उन्होंने कहा कि, *"मैं तीन बार जाता हूं !*
*डॉक्टर साहब उसने जिंदगी में मेरी बहुत सेवा की और आज मैं उसके सहारे जिंदगी जी रहा हूं। उसको देखता हूं तो मेरा मन भर आता है। मैं उसके पास बैठता हूं तो मुझमें शक्ति आ जाती है। अगर वह न होती तो अभी तक मैं भी बिस्तर पकड़ लिया होता, लेकिन उसको ठीक करना है, उसकी संभाल करना है, इसलिए मुझमें रोज ताकत आ जाती है। उसके कारण ही मुझमें इतनी फुर्ती है। सुबह उठता हूं तो तैयार होकर के काम में लग जाता हूं। यह भाव रहता है कि, उसको मिलने जाना है, उसके साथ नाश्ता करना है, उसको नाश्ता कराना है।*
*उसके साथ नाश्ता करने का आनंद ही अलग है। मैं अपने हाथ से उसको नाश्ता खिलाता हूं !"*
डॉक्टर ने कहा, *"दादा एक बात पूछूं !"*
*"पूछो ना डॉक्टर साहब।"*
डॉक्टर ने कहा, *"दादा, वह तो आपको पहचानती नहीं, न तो आपके सामने बोलती है, न हंसती है, तो भी तुम मिलने जाते हो !"*
तब उस समय वृद्ध ने जो शब्द कहे, वह शब्द दुनियाँ में सबसे अधिक हृदयस्पर्शी और मार्मिक हैं।
वृद्ध बोले, *"डॉक्टर साहब, वह नहीं जानती कि मैं कौन हूं, पर मैं तो जानता हूं ना कि वह कौन है !"*
और इतना कहते कहते हैं वृद्ध की आंखों से पानी की धारा बहने लगी।
डॉक्टर और उनकी पत्नी की आंखें भी भर आईं।
कहानी तो पूरी होगी परंतु, *पारिवारिक जीवन में स्वार्थ अभिशाप है, और प्रेम आशीर्वाद है।*
प्रेम कम होता है, तभी परिवार टूटता है।
*अपने घर में अपने माता पिता को प्रेम करना।*
जो लोग यह कहते हैं अपने पिता के लिए कि, *"साठी, बुद्धि न्हाटी !"*
उन्हें नहीं पता है कि माता पिता का प्रेम निस्वार्थ होता है वह केवल अपने बच्चों का भला ही चाहते हैं ।
प्रेम कभी नहीं मरता
*सुबह सूर्योदय हुआ ही था कि, एक वयोवृद्ध सज्जन डॉक्टर के दरवाजे पर आकर घंटी बजाने लगे।*
*"इतने सुबह-सुबह कौन आ गया ?"*
कहते हुए डॉक्टर की पत्नी ने दरवाजा खोला।
वृद्ध को देखते ही डॉक्टर की पत्नी ने कहा,
*"दादा आज इतनी सुबह ? क्या परेशानी हो गयी आपको ??"*
वयोवृद्ध ने कहा, *"मेरे अंगूठे के टांके कटवाने आया हूं बेटा, डॉक्टर साहब के पास। मुझे 8:30 बजे दूसरी जगह पहुंचना होता है, इसीलिए जल्दी आया।*
*सॉरी डॉक्टर साहब।"*
डाक्टर के पड़ोस वाले मोहल्ले में ही वयोवृद्ध का निवास था, जब भी जरूरत पड़ती वह डॉक्टर के पास आ जाते थे। इसलिए डाक्टर उनसे परिचित था। उसने कमरे से बाहर आकर कहा, *"कोई बात नहीं दादा।बैठो। बताओ आप का अंगूठा।*
डॉक्टर ने पूरे ध्यान से अंगूठे के टांके खोले, और कहा कि, *"दादा बहुत बढ़िया है। आपका घाव भर गया है ।फिर भी मैं पट्टी लगा देता हूं कि, कहीं पर चोट न पहुंचे।"*
डाक्टर तो बहुत होते हैं परंतु, यह डॉक्टर बहुत हमदर्दी रखने वाले, आदमी का खयाल रखने वाले और दयालु थे।
डॉक्टर ने पट्टी लगाकर के पूछा, *"दादा आपको कहां पहुंचना पड़ता है 8:30 बजे। आपको देर हो गई हो तो मैं चलकर आपको छोड़ आता हूं।"*
वृद्ध ने कहा कि, *"नहीं-नहीं डॉक्टर साहब, अभी तो मैं घर जाऊंगा, नाश्ता तैयार करूंगा, फिर निकलूंगा, और बराबर 9:00 बजे पहुंच जाऊंगा।"*
उन्होंने डॉक्टर का आभार माना और जाने के लिए खड़े हुए।
बिल लेकर के उपचार करने वाले तो बहुत डॉक्टर होते हैं, परंतु *दिल से उपचार करने वाले कम होते हैं।*
दादा खड़े हुए तभी डॉक्टर की पत्नी ने आकर कहा कि, *"दादा आज नाश्ता यहीं कर लो।"*
वृद्ध ने कहा कि, *"ना बेन !*
*मैं तो यहां नाश्ता कर लेता, परंतु उसको नाश्ता कौन कराएगा ?"*
डॉक्टर ने पूछा, *"किसको नाश्ता कराना है ?"*
तब वृद्ध ने कहा कि, *"मेरी पत्नी को।"*
*"तो वह कहां रहती है ? और 9:00 बजे आपको उसके यहां, कहां पहुंचना होता है ?"* दोनों ने पूछा।
वृद्ध ने कहा, *"डॉक्टर साहब वह तो मेरे बिना रहती ही नहीं थी, परंतु अब। वह अस्वस्थ है, तो नर्सिंग होम में हीै है।"*
डॉक्टर ने पूछा, *"क्यों, उनको क्या तकलीफ है ?"*
वृद्ध व्यक्ति ने कहा, *"मेरी पत्नी को अल्जाइमर हो गया है, उसकी याददाश्त चली गई है।*
*पिछले 5 साल से। वह मेरे को पहचानती नहीं है। मैं नर्सिंग होम में जाता हूं, उसको नाश्ता खिलाता हूं, तो वह फटी आंख से शून्य नेत्रों से मुझे देखती है। मैं उसके लिए अनजाना हो गया हूं।*
ऐसा कहते-कहते वृद्ध की आंखों में आंसू आ गए।
डॉक्टर और उसकी पत्नी की आंखें भी गीली हो गई !
याद रखें,
*प्रेम निस्वार्थ होता है, प्रेम सबके पास होता है परंतु, एक-पक्षिय प्रेम ! यह दुर्लभ होता है। पर होता है जरूर !*
कबीर ने लिखा है...
*प्रेम न बाड़ी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय।*
बाजार में नहीं मिलता है यह।
डॉक्टर और उसकी पत्नी ने कहा,
*"दादा 5 साल से आप रोज नर्सिंग होम में उनको नाश्ता करने जाते हो ? आप इतने वृद्ध।*
*आप थकते नहीं हो, ऊबते नहीं हो ?"*
उन्होंने कहा कि, *"मैं तीन बार जाता हूं !*
*डॉक्टर साहब उसने जिंदगी में मेरी बहुत सेवा की और आज मैं उसके सहारे जिंदगी जी रहा हूं। उसको देखता हूं तो मेरा मन भर आता है। मैं उसके पास बैठता हूं तो मुझमें शक्ति आ जाती है। अगर वह न होती तो अभी तक मैं भी बिस्तर पकड़ लिया होता, लेकिन उसको ठीक करना है, उसकी संभाल करना है, इसलिए मुझमें रोज ताकत आ जाती है। उसके कारण ही मुझमें इतनी फुर्ती है। सुबह उठता हूं तो तैयार होकर के काम में लग जाता हूं। यह भाव रहता है कि, उसको मिलने जाना है, उसके साथ नाश्ता करना है, उसको नाश्ता कराना है।*
*उसके साथ नाश्ता करने का आनंद ही अलग है। मैं अपने हाथ से उसको नाश्ता खिलाता हूं !"*
डॉक्टर ने कहा, *"दादा एक बात पूछूं !"*
*"पूछो ना डॉक्टर साहब।"*
डॉक्टर ने कहा, *"दादा, वह तो आपको पहचानती नहीं, न तो आपके सामने बोलती है, न हंसती है, तो भी तुम मिलने जाते हो !"*
तब उस समय वृद्ध ने जो शब्द कहे, वह शब्द दुनियाँ में सबसे अधिक हृदयस्पर्शी और मार्मिक हैं।
वृद्ध बोले, *"डॉक्टर साहब, वह नहीं जानती कि मैं कौन हूं, पर मैं तो जानता हूं ना कि वह कौन है !"*
और इतना कहते कहते हैं वृद्ध की आंखों से पानी की धारा बहने लगी।
डॉक्टर और उनकी पत्नी की आंखें भी भर आईं।
कहानी तो पूरी होगी परंतु, *पारिवारिक जीवन में स्वार्थ अभिशाप है, और प्रेम आशीर्वाद है।*
प्रेम कम होता है, तभी परिवार टूटता है।
*अपने घर में अपने माता पिता को प्रेम करना।*
जो लोग यह कहते हैं अपने पिता के लिए कि, *"साठी, बुद्धि न्हाटी !"*
उन्हें नहीं पता है कि माता पिता का प्रेम निस्वार्थ होता है वह केवल अपने बच्चों का भला ही चाहते हैं ।
👍11❤2🥰2
🕉️शम्भु स्तुति - नमामि शम्भुं पुरुषं पुराणं
लंका प्रवेश के समय भगवान श्री राम ने रामेश्वरम में स्वयं शिवलिंग की स्थापना के साथ भगवान शिव का आह्वान किया था। शम्भु स्तुति को भगवान राम द्वारा रचित कहा जाता है, इस शम्भु स्तुति का उल्लेख ब्रह्म पुराण से लिया गया है।
नमामि शम्भुं पुरुषं पुराणं
नमामि सर्वज्ञमपारभावम् ।
नमामि रुद्रं प्रभुमक्षयं तं
नमामि शर्वं शिरसा नमामि ॥१॥
नमामि देवं परमव्ययंतं
उमापतिं लोकगुरुं नमामि ।
नमामि दारिद्रविदारणं तं
नमामि रोगापहरं नमामि ॥२॥
नमामि कल्याणमचिन्त्यरूपं
नमामि विश्वोद्ध्वबीजरूपम् ।
नमामि विश्वस्थितिकारणं तं
नमामि संहारकरं नमामि ॥३॥
नमामि गौरीप्रियमव्ययं तं
नमामि नित्यंक्षरमक्षरं तम् ।
नमामि चिद्रूपममेयभावं
त्रिलोचनं तं शिरसा नमामि ॥४॥
नमामि कारुण्यकरं भवस्या
भयंकरं वापि सदा नमामि ।
नमामि दातारमभीप्सितानां
नमामि सोमेशमुमेशमादौ ॥५॥
नमामि वेदत्रयलोचनं तं
नमामि मूर्तित्रयवर्जितं तम् ।
नमामि पुण्यं सदसद्व्यातीतं
नमामि तं पापहरं नमामि ॥६॥
नमामि विश्वस्य हिते रतं तं
नमामि रूपापि बहुनि धत्ते ।
यो विश्वगोप्ता सदसत्प्रणेता
नमामि तं विश्वपतिं नमामि ॥७॥
यज्ञेश्वरं सम्प्रति हव्यकव्यं
तथागतिं लोकसदाशिवो यः ।
आराधितो यश्च ददाति सर्वं
नमामि दानप्रियमिष्टदेवम् ॥८॥
नमामि सोमेश्वरंस्वतन्त्रं
उमापतिं तं विजयं नमामि ।
नमामि विघ्नेश्वरनन्दिनाथं
पुत्रप्रियं तं शिरसा नमामि ॥९॥
नमामि देवं भवदुःखशोक
विनाशनं चन्द्रधरं नमामि ।
नमामि गंगाधरमीशमीड्यं
उमाधवं देववरं नमामि ॥१०॥
नमाम्यजादीशपुरन्दरादि
सुरासुरैरर्चितपादपद्मम् ।
नमामि देवीमुखवादनानां
ईक्षार्थमक्षित्रितयं य ऐच्छत् ॥११॥
पंचामृतैर्गन्धसुधूपदीपैः
विचित्रपुष्पैर्विविधैश्च मन्त्रैः ।
अन्नप्रकारैः सकलोपचारैः
सम्पूजितं सोममहं नमामि ॥१२॥
॥ इति श्रीब्रह्ममहापुराणे शम्भुस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
लंका प्रवेश के समय भगवान श्री राम ने रामेश्वरम में स्वयं शिवलिंग की स्थापना के साथ भगवान शिव का आह्वान किया था। शम्भु स्तुति को भगवान राम द्वारा रचित कहा जाता है, इस शम्भु स्तुति का उल्लेख ब्रह्म पुराण से लिया गया है।
नमामि शम्भुं पुरुषं पुराणं
नमामि सर्वज्ञमपारभावम् ।
नमामि रुद्रं प्रभुमक्षयं तं
नमामि शर्वं शिरसा नमामि ॥१॥
नमामि देवं परमव्ययंतं
उमापतिं लोकगुरुं नमामि ।
नमामि दारिद्रविदारणं तं
नमामि रोगापहरं नमामि ॥२॥
नमामि कल्याणमचिन्त्यरूपं
नमामि विश्वोद्ध्वबीजरूपम् ।
नमामि विश्वस्थितिकारणं तं
नमामि संहारकरं नमामि ॥३॥
नमामि गौरीप्रियमव्ययं तं
नमामि नित्यंक्षरमक्षरं तम् ।
नमामि चिद्रूपममेयभावं
त्रिलोचनं तं शिरसा नमामि ॥४॥
नमामि कारुण्यकरं भवस्या
भयंकरं वापि सदा नमामि ।
नमामि दातारमभीप्सितानां
नमामि सोमेशमुमेशमादौ ॥५॥
नमामि वेदत्रयलोचनं तं
नमामि मूर्तित्रयवर्जितं तम् ।
नमामि पुण्यं सदसद्व्यातीतं
नमामि तं पापहरं नमामि ॥६॥
नमामि विश्वस्य हिते रतं तं
नमामि रूपापि बहुनि धत्ते ।
यो विश्वगोप्ता सदसत्प्रणेता
नमामि तं विश्वपतिं नमामि ॥७॥
यज्ञेश्वरं सम्प्रति हव्यकव्यं
तथागतिं लोकसदाशिवो यः ।
आराधितो यश्च ददाति सर्वं
नमामि दानप्रियमिष्टदेवम् ॥८॥
नमामि सोमेश्वरंस्वतन्त्रं
उमापतिं तं विजयं नमामि ।
नमामि विघ्नेश्वरनन्दिनाथं
पुत्रप्रियं तं शिरसा नमामि ॥९॥
नमामि देवं भवदुःखशोक
विनाशनं चन्द्रधरं नमामि ।
नमामि गंगाधरमीशमीड्यं
उमाधवं देववरं नमामि ॥१०॥
नमाम्यजादीशपुरन्दरादि
सुरासुरैरर्चितपादपद्मम् ।
नमामि देवीमुखवादनानां
ईक्षार्थमक्षित्रितयं य ऐच्छत् ॥११॥
पंचामृतैर्गन्धसुधूपदीपैः
विचित्रपुष्पैर्विविधैश्च मन्त्रैः ।
अन्नप्रकारैः सकलोपचारैः
सम्पूजितं सोममहं नमामि ॥१२॥
॥ इति श्रीब्रह्ममहापुराणे शम्भुस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
❤10👍4👏1
कहानी का समय
मनुष्य अनुभव से कुछ भी नहीं सीखता
(
एक आदमी के घर में एक अंधेरी रात एक चोर घुस गया। उसकी पत्नी की नींद खुली और उसने अपने पति को कहा, मालूम होता है घर में कोई चोर घुस गया है। उस पति ने अपने बिस्तर पर से ही पड़े-पड़े पूछा, कौन है? उस चोर ने कहा, कोई भी नहीं। वह पति वापस सो गया। रात चोरी हो गई। सुबह उसकी पत्नी ने कहा कि चोरी हो गई और मैंने आपको कहा था! तो पति ने कहा, मैंने पूछा था, अपने ही कानों से सुना कि कोई भी नहीं है, इसलिए मैं वापस सो गया।
ऐसे घर में चोरी दुबारा होगी। स्वाभाविक है। जिस घर में चोर की कही गई बात..कि कोई भी नहीं है..मान ली गई हो, उस घर में चोरी दुबारा हो, यह बिल्कुल ही अनिवार्य है। पंद्रह-बीस दिन बाद चोर वापस घुसा। पत्नी ने कहा, अब पूछने की जरूरत नहीं है, सीधा चोर को पकड़ ही लें।
उस आदमी ने उठ कर चोर को पकड़ लिया और उसे पुलिस थाने की तरफ ले चला। आधे रास्ते पर उस चोर ने कहा, माफ करिए, लेकिन मैं अपने जूते आपके घर भूल आया हूं। तो उस आदमी ने कहा कि बड़े नासमझ हो! अब मैं वापस इतनी दूर लौट कर नहीं जाऊंगा। तो मैं यहीं रुकता हूं, तुम वापस चले जाओ और अपने जूते ले आओ। वह आदमी वहीं रुक गया, चोर वापस गया, लौटने का तो कोई सवाल नहीं था, वह लौटा नहीं।
महीने भर बाद फिर वह चोर उस आदमी के घर में घुसा। अब की बार उस आदमी ने उसे फिर पकड़ लिया और कहा कि मैं थाने ले चलता हूं, अब अपनी कोई चीज यहां भूल मत जाना, अपने साथ ले लो, पिछली बार तुम धोखा देकर भाग गए थे। उस आदमी ने कहा कि नहीं, मैं कुछ भी नहीं भूल रहा हूं।
आधे रास्ते पर जाकर उसने कहा कि लेकिन माफ करिए, मेरे समझने में गलती हो गई, मैं अपना कंबल आपके घर ही छोड़ आया हूं। उस आदमी ने कहा, तुम बड़े नासमझ मालूम पड़ते हो! अब मैं पुरानी भूल नहीं कर सकता। अब तुम यहां रुको और मैं तुम्हारा कंबल लेने घर जाता हूं।
इस आदमी पर हमें हंसी आती है, लेकिन सारे आदमी इसी भांति के आदमी हैं।
मनुष्य अनुभव से कुछ भी नहीं सीखता
(
Man Learns Nothing From Experience)एक आदमी के घर में एक अंधेरी रात एक चोर घुस गया। उसकी पत्नी की नींद खुली और उसने अपने पति को कहा, मालूम होता है घर में कोई चोर घुस गया है। उस पति ने अपने बिस्तर पर से ही पड़े-पड़े पूछा, कौन है? उस चोर ने कहा, कोई भी नहीं। वह पति वापस सो गया। रात चोरी हो गई। सुबह उसकी पत्नी ने कहा कि चोरी हो गई और मैंने आपको कहा था! तो पति ने कहा, मैंने पूछा था, अपने ही कानों से सुना कि कोई भी नहीं है, इसलिए मैं वापस सो गया।
ऐसे घर में चोरी दुबारा होगी। स्वाभाविक है। जिस घर में चोर की कही गई बात..कि कोई भी नहीं है..मान ली गई हो, उस घर में चोरी दुबारा हो, यह बिल्कुल ही अनिवार्य है। पंद्रह-बीस दिन बाद चोर वापस घुसा। पत्नी ने कहा, अब पूछने की जरूरत नहीं है, सीधा चोर को पकड़ ही लें।
उस आदमी ने उठ कर चोर को पकड़ लिया और उसे पुलिस थाने की तरफ ले चला। आधे रास्ते पर उस चोर ने कहा, माफ करिए, लेकिन मैं अपने जूते आपके घर भूल आया हूं। तो उस आदमी ने कहा कि बड़े नासमझ हो! अब मैं वापस इतनी दूर लौट कर नहीं जाऊंगा। तो मैं यहीं रुकता हूं, तुम वापस चले जाओ और अपने जूते ले आओ। वह आदमी वहीं रुक गया, चोर वापस गया, लौटने का तो कोई सवाल नहीं था, वह लौटा नहीं।
महीने भर बाद फिर वह चोर उस आदमी के घर में घुसा। अब की बार उस आदमी ने उसे फिर पकड़ लिया और कहा कि मैं थाने ले चलता हूं, अब अपनी कोई चीज यहां भूल मत जाना, अपने साथ ले लो, पिछली बार तुम धोखा देकर भाग गए थे। उस आदमी ने कहा कि नहीं, मैं कुछ भी नहीं भूल रहा हूं।
आधे रास्ते पर जाकर उसने कहा कि लेकिन माफ करिए, मेरे समझने में गलती हो गई, मैं अपना कंबल आपके घर ही छोड़ आया हूं। उस आदमी ने कहा, तुम बड़े नासमझ मालूम पड़ते हो! अब मैं पुरानी भूल नहीं कर सकता। अब तुम यहां रुको और मैं तुम्हारा कंबल लेने घर जाता हूं।
इस आदमी पर हमें हंसी आती है, लेकिन सारे आदमी इसी भांति के आदमी हैं।
👍10❤1
*अनुभव* की एक खराबी है, कि जितने अनुभवी व्यक्ति होता हैं, उनके पास नया समाधान कभी नहीं होता। छोटे बच्चे से तो नया समाधान मिल भी जाये, बूढ़े से नया समाधान नहीं मिल सकता। उसका अनुभव मजबूत हो चुका होता है। वह अपने अनुभव को ही दोहराये चला जाता है। वह कहता है, मैं जानता हूं, जीया हूं, बहुत अनुभव किये हैं; यह उसका सारा निचोड़ है। उसका मस्तिष्क पुराना, जरा-जीर्ण हो जाता है, बासा हो जाता है। ऐसा आदमी ध्यान में नहीं जा सकता, ध्यान में जाने के लिए एक नया ,पुराने अनुभव और धारणा से मुक्त मस्तिष्क चाहिए तभी ध्यान में प्रवेश संभव होगा।
👍11😁2❤1🔥1😱1
*भगवान् प्रारब्धसे मिलनेवाली कर्मजनित अनित्य वस्तु नहीं हैं; वे तो नित्य हैं और केवल चाहसे ही मिलते हैं।*
*हम यदि भगवान्को भजते भी हैं तो अनित्य भोगसुखोंके लिये ही।*
*जबतक भोग-विलास, धन-सम्पत्ति रहती है, मनकी चाह सफल होती रहती है, तबतक भगवान् बहुत अच्छे हैं - दयालु हैं। जरा भी त्रुटि हुई कि फिर या तो भगवान्को कोसते हैं या उनके अस्तित्वपर ही संदेह करने लगते हैं।*
*दूसरोंके विलासमय जीवनको देखते हैं तो ललचाते हैं- भगवान्का भजन करनेपर भी हम उससे वंचित क्यों हैं ? इसके लिये भगवान्की कृपापर, उनकी सत्तापर अविश्वास करने लगते हैं।*
*जरा गहराईसे विचार कर देखिये-हम भगवान्को चाहते हैं या भोगोंको। ठीक दिखायी देगा- हम भगवान्को नहीं चाहते, भोगोंको चाहते हैं। फिर हम भगवान्को कैसे पायें !*
*अवश्य ही भगवान् बड़े दयालु हैं; हम जब क्षणिक तथा दुःखपरिणामी भोगोंको पाकर होश-हवास खो बैठते हैं, तब भगवान् विपत्ति-वरदान भेजते हैं। जोरकी चोट करते हैं और फिर उस चोटमें उनका स्पर्श प्राप्त होनेपर हमारे होश ठिकाने आते हैं।*
*हम यदि भगवान्को भजते भी हैं तो अनित्य भोगसुखोंके लिये ही।*
*जबतक भोग-विलास, धन-सम्पत्ति रहती है, मनकी चाह सफल होती रहती है, तबतक भगवान् बहुत अच्छे हैं - दयालु हैं। जरा भी त्रुटि हुई कि फिर या तो भगवान्को कोसते हैं या उनके अस्तित्वपर ही संदेह करने लगते हैं।*
*दूसरोंके विलासमय जीवनको देखते हैं तो ललचाते हैं- भगवान्का भजन करनेपर भी हम उससे वंचित क्यों हैं ? इसके लिये भगवान्की कृपापर, उनकी सत्तापर अविश्वास करने लगते हैं।*
*जरा गहराईसे विचार कर देखिये-हम भगवान्को चाहते हैं या भोगोंको। ठीक दिखायी देगा- हम भगवान्को नहीं चाहते, भोगोंको चाहते हैं। फिर हम भगवान्को कैसे पायें !*
*अवश्य ही भगवान् बड़े दयालु हैं; हम जब क्षणिक तथा दुःखपरिणामी भोगोंको पाकर होश-हवास खो बैठते हैं, तब भगवान् विपत्ति-वरदान भेजते हैं। जोरकी चोट करते हैं और फिर उस चोटमें उनका स्पर्श प्राप्त होनेपर हमारे होश ठिकाने आते हैं।*
👍9❤2
जो आशायें मानव को पराधीनता में आबद्ध करती हैं, उनका त्याग अत्यन्त आवश्यक है। पर वह तभी सम्भव होगा, जब वास्तविक माँग की उत्कट लालसा उत्तरोत्तर बढ़ती रहे। वास्तविक माँग वही है, जिसकी पूर्ति स्वाधीनतापूर्वक हो सकती है। स्वाधीनता की प्राप्ति भी स्वाधीनतापूर्वक ही होती है। यदि मानव उन सभी प्रवृत्तियों का अन्त कर दे, जो पराधीनता से सम्पादित होती हैं, तो बड़ी ही सुगमतापूर्वक उस उपाय की प्राप्ति हो जाती है, जिससे मानव स्वाधीनतापूर्वक स्वाधीनता प्राप्त कर सकता है! भगवान ने संसार को अपूर्ण बनाया ही इसलिए है कि आप करने की शक्ति सेवा में लगाकर करने के राग से मुक्त हो जाएँ। पूर्ण भगवान ने मानव को विश्वास का तत्व देकर बनाया ही इसलिए है कि आप उनसे अपनापन कर सके। और भगवान ने मानव को विवेक दिया ही इसलिए है कि वो अचाह होकर स्वाधीन हो जाएं अर्थात न सेवा के बदले में संसार से कुछ चाहे और न प्रियता के बदले में प्रभु से कुछ मांगे। सेवक को और प्रेमी को कुछ मांगने का अधिकार नहीं है। सेव्य/प्रेमास्पद के रस के आदान प्रदान में अस्तित्व का खो जाना ही जीवन है।
👍8👎1
मां मनसा देवी
अगर हमारे शास्त्रीय कला रूपों का निर्मम विनाश बुनियादी स्तर पर सांस्कृतिक विनाश है, तो हिंदू लोकगीतों का विघटन कहीं अधिक व्यापक विनाश है। वास्तव में, भारतवर्ष की शास्त्रीय और लोक परंपराओं के बीच कोई विरोध या द्वंद्व नहीं है। लेकिन यह एक और दिन की कहानी है।
व्यापक अर्थ में, हिंदू लोककथाएँ वह हैं, जिनसे इतिहास और पुराणों को स्थानीयकृत किया गया, अनुकूलित किया गया, पुनःप्रयोजन किया गया और कई मामलों में, उन्होंने अपना स्वतंत्र जीवन अपनाया। जिस तरह भारतवर्ष यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों का सबसे बड़ा वैश्विक भंडार है, उसी तरह यह लोककथाओं का दुनिया का सबसे बड़ा खजाना भी है। जिस तरह भारतवर्ष की बोली और भोजन किसी भी क्षेत्र में लगभग 90 किलोमीटर के बाद बदल जाता है, उसी तरह हिंदू लोककथाओं का एक अटूट भंडार है, उदाहरण के लिए, 50 किलोमीटर के औसत क्षेत्र में स्थित गांवों के समूहों में मापा जाता है।
पिछले पचहत्तर सालों में हिंदू लोकगीतों की जीवंत परंपरा को कई तरह की चालों के ज़रिए नष्ट किया गया है, जिनमें से सबसे प्रमुख है उपेक्षा। इस उपेक्षा का एक प्रमुख कारण "आधुनिकता" की गलत धारणा है - एक शापित औपनिवेशिक दासता जो हमारे नीति निर्माताओं और शिक्षाविदों के दिमाग को जकड़े हुए है। दूसरा तत्व मिशनरी धर्मांतरण की महामारी है जो भारत को संदिग्ध स्वतंत्रता मिलने के बाद फैल गई । जब एक देहाती हिंदू धर्मांतरित होता है, तो वह न केवल अपने देवताओं को खो देता है, बल्कि भूत-पूजक बन जाता है। इस नुकसान की भयावहता इसलिए और भी बढ़ जाती है क्योंकि वह अपने पूर्व देवताओं से जुड़ी हर चीज़ को खो देता है, जिसमें हज़ारों साल पुरानी लोककथाएँ भी शामिल हैं। हिंदू लोककथाएँ मिलना दुर्लभ है, जिसमें दैवीयता न जुड़ी हो।
कम से कम अंग्रेजों के पास हिंदू लोककथाओं को संरक्षित करने की समझ थी, उनके संरक्षण प्रयासों को शुरू करके और उन्हें वित्तपोषित करके। जेएफ फ्लीट और आरसी टेम्पल जैसे नौकरशाहों ने सक्रिय रूप से नटेसा शास्त्री जैसे हिंदू विद्वानों की तलाश की, जिन्होंने दक्षिणी भारत में लोककथाओं जैसी विश्वकोशीय कृतियाँ लिखीं। एचएम इलियट जैसे अन्य लोगों ने उस
विशाल क्षेत्र में रहने वाली जातियों द्वारा आयोजित उत्तर पश्चिमी भारत की लोककथाओं के विशाल संग्रह प्रकाशित किए।
“स्वतंत्रता” के बाद भी लोककथाओं को संरक्षित करने के लिए इसी तरह के प्रयास किए गए हैं, लेकिन वे मुख्य रूप से मृत प्राणियों को खोदकर निकालने और फिर उनका “अध्ययन” करने की प्रकृति के हैं। मुहावरों, कहावतों और कहावतों की तरह, हिंदू लोककथाएँ सनातन सभ्यता और सामाजिक सातत्य का जीवंत प्रमाण प्रदान करती हैं।
धर्म डिस्पैच के अभिलेखागार में खोजबीन करते समय हमें एक अनमोल रत्न की कहानी मिली। एक सदी पहले तक, यह हुगली-भागीरथी के ग्रामीण इलाकों में बेहद लोकप्रिय थी। अन्य बातों के अलावा, यह लोककथा जाहिर तौर पर केले की पवित्रता से जुड़ी हुई थी - तना, पेड़, फल, पत्ते... शाश्वत कदलीफलम के बारे में सब कुछ। इस पवित्रता को बढ़ाने के लिए मनसा देवी नामक नागों के देवी का आह्वान किया गया था।
आगे के लेख में मनसा देवी के बारे में विस्तार से जानते हैं
माँ मनसा देवी
भारतीय पौराणिक कथाओं में अनेक देवताओं की चर्चा की गई है, तथा प्रत्येक को एक विशिष्ट स्तर की दिव्यता और जिम्मेदारियाँ सौंपी गई हैं। हिंदू धर्म में देवी-देवताओं, अर्ध-देवताओं और अर्ध-देवताओं, अर्ध-दिव्य जातियों और पौराणिक प्राणियों के बारे में बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि भारतीय पौराणिक कथाओं में लगभग तीन सौ तीस करोड़ दिव्य प्राणी हैं। उनमें से कुछ अत्यंत प्रसिद्ध हैं जैसे भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, देवी सरस्वती, देवी लक्ष्मी, देवी पार्वती इत्यादि। लेकिन ऐसे कई 'कम' ज्ञात देवता हैं जिनकी कहानियाँ सुनाई और सुनी जानी चाहिए। उनमें से एक अविश्वसनीय देवी मनसा हैं।
मनसा देवी कौन हैं?
बंगाल, उत्तराखंड, झारखंड और भारत के अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रमुख रूप से पूजी जाने वाली मनसा देवी को सांपों की देवी के रूप में जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि देवी मनसा ही वह हैं जिनका पृथ्वी पर सभी सांपों पर अधिकार है। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि यदि आप उनकी पूजा करते हैं तो सांप के काटने से आप ठीक हो सकते हैं। भक्त प्रजनन क्षमता के साथ-साथ समृद्धि के लिए भी देवी मनसा से प्रार्थना करते हैं।
देवी मनसा वासुकी (नागों के राजा) की बहन और ऋषि जरात्कारु की पत्नी हैं। उन्हें ऋषि अस्तिका की मां भी माना जाता है। उन्हें विषहरा (जहर का नाश करने वाली), पद्मावती और नित्या (शाश्वत) भी कहा जाता है। वह 'विनाश' के साथ-साथ 'पुनर्जन्म' दोनों का प्रतिनिधित्व करने के लिए जानी जाती हैं, लगभग उसी तरह जैसे एक सांप
अगर हमारे शास्त्रीय कला रूपों का निर्मम विनाश बुनियादी स्तर पर सांस्कृतिक विनाश है, तो हिंदू लोकगीतों का विघटन कहीं अधिक व्यापक विनाश है। वास्तव में, भारतवर्ष की शास्त्रीय और लोक परंपराओं के बीच कोई विरोध या द्वंद्व नहीं है। लेकिन यह एक और दिन की कहानी है।
व्यापक अर्थ में, हिंदू लोककथाएँ वह हैं, जिनसे इतिहास और पुराणों को स्थानीयकृत किया गया, अनुकूलित किया गया, पुनःप्रयोजन किया गया और कई मामलों में, उन्होंने अपना स्वतंत्र जीवन अपनाया। जिस तरह भारतवर्ष यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों का सबसे बड़ा वैश्विक भंडार है, उसी तरह यह लोककथाओं का दुनिया का सबसे बड़ा खजाना भी है। जिस तरह भारतवर्ष की बोली और भोजन किसी भी क्षेत्र में लगभग 90 किलोमीटर के बाद बदल जाता है, उसी तरह हिंदू लोककथाओं का एक अटूट भंडार है, उदाहरण के लिए, 50 किलोमीटर के औसत क्षेत्र में स्थित गांवों के समूहों में मापा जाता है।
पिछले पचहत्तर सालों में हिंदू लोकगीतों की जीवंत परंपरा को कई तरह की चालों के ज़रिए नष्ट किया गया है, जिनमें से सबसे प्रमुख है उपेक्षा। इस उपेक्षा का एक प्रमुख कारण "आधुनिकता" की गलत धारणा है - एक शापित औपनिवेशिक दासता जो हमारे नीति निर्माताओं और शिक्षाविदों के दिमाग को जकड़े हुए है। दूसरा तत्व मिशनरी धर्मांतरण की महामारी है जो भारत को संदिग्ध स्वतंत्रता मिलने के बाद फैल गई । जब एक देहाती हिंदू धर्मांतरित होता है, तो वह न केवल अपने देवताओं को खो देता है, बल्कि भूत-पूजक बन जाता है। इस नुकसान की भयावहता इसलिए और भी बढ़ जाती है क्योंकि वह अपने पूर्व देवताओं से जुड़ी हर चीज़ को खो देता है, जिसमें हज़ारों साल पुरानी लोककथाएँ भी शामिल हैं। हिंदू लोककथाएँ मिलना दुर्लभ है, जिसमें दैवीयता न जुड़ी हो।
कम से कम अंग्रेजों के पास हिंदू लोककथाओं को संरक्षित करने की समझ थी, उनके संरक्षण प्रयासों को शुरू करके और उन्हें वित्तपोषित करके। जेएफ फ्लीट और आरसी टेम्पल जैसे नौकरशाहों ने सक्रिय रूप से नटेसा शास्त्री जैसे हिंदू विद्वानों की तलाश की, जिन्होंने दक्षिणी भारत में लोककथाओं जैसी विश्वकोशीय कृतियाँ लिखीं। एचएम इलियट जैसे अन्य लोगों ने उस
विशाल क्षेत्र में रहने वाली जातियों द्वारा आयोजित उत्तर पश्चिमी भारत की लोककथाओं के विशाल संग्रह प्रकाशित किए।
“स्वतंत्रता” के बाद भी लोककथाओं को संरक्षित करने के लिए इसी तरह के प्रयास किए गए हैं, लेकिन वे मुख्य रूप से मृत प्राणियों को खोदकर निकालने और फिर उनका “अध्ययन” करने की प्रकृति के हैं। मुहावरों, कहावतों और कहावतों की तरह, हिंदू लोककथाएँ सनातन सभ्यता और सामाजिक सातत्य का जीवंत प्रमाण प्रदान करती हैं।
धर्म डिस्पैच के अभिलेखागार में खोजबीन करते समय हमें एक अनमोल रत्न की कहानी मिली। एक सदी पहले तक, यह हुगली-भागीरथी के ग्रामीण इलाकों में बेहद लोकप्रिय थी। अन्य बातों के अलावा, यह लोककथा जाहिर तौर पर केले की पवित्रता से जुड़ी हुई थी - तना, पेड़, फल, पत्ते... शाश्वत कदलीफलम के बारे में सब कुछ। इस पवित्रता को बढ़ाने के लिए मनसा देवी नामक नागों के देवी का आह्वान किया गया था।
आगे के लेख में मनसा देवी के बारे में विस्तार से जानते हैं
माँ मनसा देवी
भारतीय पौराणिक कथाओं में अनेक देवताओं की चर्चा की गई है, तथा प्रत्येक को एक विशिष्ट स्तर की दिव्यता और जिम्मेदारियाँ सौंपी गई हैं। हिंदू धर्म में देवी-देवताओं, अर्ध-देवताओं और अर्ध-देवताओं, अर्ध-दिव्य जातियों और पौराणिक प्राणियों के बारे में बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि भारतीय पौराणिक कथाओं में लगभग तीन सौ तीस करोड़ दिव्य प्राणी हैं। उनमें से कुछ अत्यंत प्रसिद्ध हैं जैसे भगवान शिव, भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, देवी सरस्वती, देवी लक्ष्मी, देवी पार्वती इत्यादि। लेकिन ऐसे कई 'कम' ज्ञात देवता हैं जिनकी कहानियाँ सुनाई और सुनी जानी चाहिए। उनमें से एक अविश्वसनीय देवी मनसा हैं।
मनसा देवी कौन हैं?
बंगाल, उत्तराखंड, झारखंड और भारत के अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रमुख रूप से पूजी जाने वाली मनसा देवी को सांपों की देवी के रूप में जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि देवी मनसा ही वह हैं जिनका पृथ्वी पर सभी सांपों पर अधिकार है। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि यदि आप उनकी पूजा करते हैं तो सांप के काटने से आप ठीक हो सकते हैं। भक्त प्रजनन क्षमता के साथ-साथ समृद्धि के लिए भी देवी मनसा से प्रार्थना करते हैं।
देवी मनसा वासुकी (नागों के राजा) की बहन और ऋषि जरात्कारु की पत्नी हैं। उन्हें ऋषि अस्तिका की मां भी माना जाता है। उन्हें विषहरा (जहर का नाश करने वाली), पद्मावती और नित्या (शाश्वत) भी कहा जाता है। वह 'विनाश' के साथ-साथ 'पुनर्जन्म' दोनों का प्रतिनिधित्व करने के लिए जानी जाती हैं, लगभग उसी तरह जैसे एक सांप
👍5❤1
अपनी त्वचा को त्याग देता है और पुनर्जन्म लेता है जबकि कुछ लोग मानते हैं कि उनके पिता ऋषि कश्यप हैं, अन्य लोग भगवान शिव को उनके पिता मानते हैं। अपने मिश्रित माता-पिता के कारण, मनसा देवी को पूर्ण देवत्व से वंचित कर दिया गया था। यही कारण है कि उनका अंतिम लक्ष्य एक देवी के रूप में अपनी शक्ति को पूरी तरह से स्थापित करना और वफादार मानव उपासक प्राप्त करना था।
हिंदू धर्मग्रंथों में देवी मनसा की उत्पत्ति
मनसा देवी को शुरू में आदिवासी देवी के रूप में देखा जाता था। मनसा को निचली जाति द्वारा हिंदू देवताओं में शामिल किया गया था। इसके बाद, देवी मनसा को उच्च जाति द्वारा स्वीकार किया गया। अब उन्हें आदिवासी देवी के बजाय हिंदू देवी माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि मनसा दक्षिण भारत में एक गैर-वैदिक और गैर-आर्यन देवी के रूप में उभरीं और कन्नड़ लोक नाग-देवी से जुड़ी हैं।
उनका उल्लेख कई हिंदू धर्मग्रंथों और ग्रंथों में मिलता है। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार, देवी मनसा को ऋषि कश्यप की मन से जन्मी पुत्री माना जाता है। यही कारण है कि उनका नाम 'मनसा' रखा गया है क्योंकि इसका अर्थ है - मन में गर्भ धारण करना - मानस। इसका अर्थ है मन में जन्म लेना। नाम का अर्थ 'इच्छा' भी है। उन्हें ऐसी देवी के रूप में जाना जाता है जो सच्चे भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरा करती हैं। अपने गोरे रंग और अपार आकर्षण के कारण, मनसा देवी एक अनोखी देवी हैं जो भूमिगत दुनिया में, विशेष रूप से साँपों और पाताल लोक की अन्य प्रजातियों में और पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रह्मलोक में भी बहुत प्रसिद्ध हैं।
देवी मनसा देवी का उल्लेख मंगल-काव्य में किया गया है। मनसमंगल काव्य (मंगल काव्यों में सबसे प्राचीन) के अनुसार, यह पता चलता है कि कैसे साँप देवी मनसा ने एक शिव भक्त को अपना उपासक बनाकर बंगाल में अपनी पूजा का आधार बनाया। वह एक गैर-आर्य देवी थीं, जिनके बारे में माना जाता है कि वे बंगाल में द्रविड़ों के साथ प्रकट हुई थीं, जिन्होंने उनसे इस उम्मीद में प्रार्थना की थी कि वे उन्हें साँपों से बचाएँगी। हिंदू महाकाव्य महाभारत में, देवी मनसा को मूल रूप से ऋषि कश्यप और सभी नागों की माँ कद्रू की बेटी के रूप में स्वीकार किया गया था।
14वीं शताब्दी तक, मनसा देवी को प्रजनन और विवाह संस्कार की देवी के रूप में मान्यता दी गई थी और उन्हें भगवान शिव से जुड़े शैव पंथ में शामिल कर लिया गया था। कई मिथकों में उनकी प्रशंसा करते हुए उन्हें शिव के जीवन को बचाने वाली देवी के रूप में वर्णित किया गया है, जिन्होंने विष पी लिया था और उन्हें 'विष दूर करने वाली' के रूप में सम्मानित किया गया है। उनकी प्रसिद्धि बढ़ी और दक्षिण भारत में फैल गई। ऐसी कई कहानियाँ हैं जो मनसा के जन्म का श्रेय शिव को देती हैं और अंततः शैव धर्म ने इस देवी को मुख्यधारा के हिंदू धर्म की ब्राह्मणवादी परंपरा में शामिल कर लिया।
हिंदू प्रतिमाशास्त्र में देवी मनसा
देवी मनसा की छवि का प्रतीकात्मक विश्लेषण दर्शाता है कि उनकी मूर्ति काले बेसाल्ट से बनाई गई है। सात फन वाली और दो भुजाओं वाली देवी को एक घड़े के ऊपर रखे दो पंखुड़ियों वाले कमल पर ललितासन मुद्रा में बैठे हुए दर्शाया गया है, जिसमें से दो साँप निकलते हुए दिखाई देते हैं।
मनसा देवी को विभिन्न आभूषणों से सुसज्जित दिखाया गया है, जिनमें से सर्प-कुचबंध बेहद लोकप्रिय है। यह साँपों से बना एक वक्ष-बंध है। साथ ही, देवी को अपने बाएँ हाथ में आठ फन वाला साँप पकड़े हुए दिखाया गया है। उनका दाहिना हाथ वरद मुद्रा में दिखाया गया है, जिसमें एक फल है। उनके साथ दोनों ओर एक बैठी हुई क्षीण आकृति और एक मुकुटधारी पुरुष है, जिन्हें पुराणों के अनुसार क्रमशः उनके पति और पुत्र, जरात्कारु और अस्तिका के रूप में पहचाना जाता है।
अन्य स्थानों पर, देवी मनसा की मूर्ति को एक सुंदर महिला के रूप में चित्रित किया गया है, जिसका शरीर साँपों से सजा हुआ है और उसे कमल पर बैठे या साँप पर खड़े दिखाया गया है। उन्हें आम तौर पर सात नागों की छत्रछाया में देखा जाता है, जिसके बगल में एक हंस होता है। उन्हें आम तौर पर 'एक आँख वाली देवी' के रूप में देखा जाता है और कभी-कभी उनकी गोद में उनके बेटे अस्तिका को भी दिखाया जाता है। उनकी एक आँख इस मान्यता के कारण है कि उनकी सौतेली माँ चंडी ने ईर्ष्या के आवेश में उनकी एक आँख जला दी थी।
देवी मनसा से जुड़ी पौराणिक कथा
पुराणों
माना जाता है कि देवी मनसा के जन्म का उल्लेख करने वाले पहले ग्रंथ पुराणों में हैं। वे कहते हैं कि ऋषि कश्यप उनके पिता हैं। जब सांपों और सरीसृपों ने पृथ्वी पर उत्पात मचाया था, तब कश्यप ने अपने मन (मन) से मनसा को उत्पन्न किया था। भगवान ब्रह्मा (सृजक) ने उन्हें सांपों और सरीसृपों की अधिष्ठात्री देवी बनाया।
हिंदू धर्मग्रंथों में देवी मनसा की उत्पत्ति
मनसा देवी को शुरू में आदिवासी देवी के रूप में देखा जाता था। मनसा को निचली जाति द्वारा हिंदू देवताओं में शामिल किया गया था। इसके बाद, देवी मनसा को उच्च जाति द्वारा स्वीकार किया गया। अब उन्हें आदिवासी देवी के बजाय हिंदू देवी माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि मनसा दक्षिण भारत में एक गैर-वैदिक और गैर-आर्यन देवी के रूप में उभरीं और कन्नड़ लोक नाग-देवी से जुड़ी हैं।
उनका उल्लेख कई हिंदू धर्मग्रंथों और ग्रंथों में मिलता है। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार, देवी मनसा को ऋषि कश्यप की मन से जन्मी पुत्री माना जाता है। यही कारण है कि उनका नाम 'मनसा' रखा गया है क्योंकि इसका अर्थ है - मन में गर्भ धारण करना - मानस। इसका अर्थ है मन में जन्म लेना। नाम का अर्थ 'इच्छा' भी है। उन्हें ऐसी देवी के रूप में जाना जाता है जो सच्चे भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरा करती हैं। अपने गोरे रंग और अपार आकर्षण के कारण, मनसा देवी एक अनोखी देवी हैं जो भूमिगत दुनिया में, विशेष रूप से साँपों और पाताल लोक की अन्य प्रजातियों में और पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रह्मलोक में भी बहुत प्रसिद्ध हैं।
देवी मनसा देवी का उल्लेख मंगल-काव्य में किया गया है। मनसमंगल काव्य (मंगल काव्यों में सबसे प्राचीन) के अनुसार, यह पता चलता है कि कैसे साँप देवी मनसा ने एक शिव भक्त को अपना उपासक बनाकर बंगाल में अपनी पूजा का आधार बनाया। वह एक गैर-आर्य देवी थीं, जिनके बारे में माना जाता है कि वे बंगाल में द्रविड़ों के साथ प्रकट हुई थीं, जिन्होंने उनसे इस उम्मीद में प्रार्थना की थी कि वे उन्हें साँपों से बचाएँगी। हिंदू महाकाव्य महाभारत में, देवी मनसा को मूल रूप से ऋषि कश्यप और सभी नागों की माँ कद्रू की बेटी के रूप में स्वीकार किया गया था।
14वीं शताब्दी तक, मनसा देवी को प्रजनन और विवाह संस्कार की देवी के रूप में मान्यता दी गई थी और उन्हें भगवान शिव से जुड़े शैव पंथ में शामिल कर लिया गया था। कई मिथकों में उनकी प्रशंसा करते हुए उन्हें शिव के जीवन को बचाने वाली देवी के रूप में वर्णित किया गया है, जिन्होंने विष पी लिया था और उन्हें 'विष दूर करने वाली' के रूप में सम्मानित किया गया है। उनकी प्रसिद्धि बढ़ी और दक्षिण भारत में फैल गई। ऐसी कई कहानियाँ हैं जो मनसा के जन्म का श्रेय शिव को देती हैं और अंततः शैव धर्म ने इस देवी को मुख्यधारा के हिंदू धर्म की ब्राह्मणवादी परंपरा में शामिल कर लिया।
हिंदू प्रतिमाशास्त्र में देवी मनसा
देवी मनसा की छवि का प्रतीकात्मक विश्लेषण दर्शाता है कि उनकी मूर्ति काले बेसाल्ट से बनाई गई है। सात फन वाली और दो भुजाओं वाली देवी को एक घड़े के ऊपर रखे दो पंखुड़ियों वाले कमल पर ललितासन मुद्रा में बैठे हुए दर्शाया गया है, जिसमें से दो साँप निकलते हुए दिखाई देते हैं।
मनसा देवी को विभिन्न आभूषणों से सुसज्जित दिखाया गया है, जिनमें से सर्प-कुचबंध बेहद लोकप्रिय है। यह साँपों से बना एक वक्ष-बंध है। साथ ही, देवी को अपने बाएँ हाथ में आठ फन वाला साँप पकड़े हुए दिखाया गया है। उनका दाहिना हाथ वरद मुद्रा में दिखाया गया है, जिसमें एक फल है। उनके साथ दोनों ओर एक बैठी हुई क्षीण आकृति और एक मुकुटधारी पुरुष है, जिन्हें पुराणों के अनुसार क्रमशः उनके पति और पुत्र, जरात्कारु और अस्तिका के रूप में पहचाना जाता है।
अन्य स्थानों पर, देवी मनसा की मूर्ति को एक सुंदर महिला के रूप में चित्रित किया गया है, जिसका शरीर साँपों से सजा हुआ है और उसे कमल पर बैठे या साँप पर खड़े दिखाया गया है। उन्हें आम तौर पर सात नागों की छत्रछाया में देखा जाता है, जिसके बगल में एक हंस होता है। उन्हें आम तौर पर 'एक आँख वाली देवी' के रूप में देखा जाता है और कभी-कभी उनकी गोद में उनके बेटे अस्तिका को भी दिखाया जाता है। उनकी एक आँख इस मान्यता के कारण है कि उनकी सौतेली माँ चंडी ने ईर्ष्या के आवेश में उनकी एक आँख जला दी थी।
देवी मनसा से जुड़ी पौराणिक कथा
पुराणों
माना जाता है कि देवी मनसा के जन्म का उल्लेख करने वाले पहले ग्रंथ पुराणों में हैं। वे कहते हैं कि ऋषि कश्यप उनके पिता हैं। जब सांपों और सरीसृपों ने पृथ्वी पर उत्पात मचाया था, तब कश्यप ने अपने मन (मन) से मनसा को उत्पन्न किया था। भगवान ब्रह्मा (सृजक) ने उन्हें सांपों और सरीसृपों की अधिष्ठात्री देवी बनाया।
ऋषि जरत्कारु ने इस शर्त पर मनसा से विवाह किया कि यदि वह किसी भी तरह से उनकी अवज्ञा करेगी तो वे उसे त्याग देंगे। एक दिन, जरत्कारु इस बात से परेशान थे कि मनसा ने उन्हें सुबह बहुत देर से जगाया। उनकी सुबह की प्रार्थना के लिए बहुत देर हो चुकी थी। वह इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने उन्हें छोड़ दिया। हिंदू देवताओं द्वारा पुनर्विचार करने के अनुरोध के बाद, ऋषि जरत्कारु देवी मनसा के पास लौट आए और उन्होंने उनके बेटे - अस्तिका को जन्म दिया।
महाभारत
महाभारत में मानसा के विवाह के बारे में बताया गया है। ऋषि जरात्कारु ने कठोर तपस्या की और विवाह से दूर रहने का फैसला किया। एक दिन, वे एक पेड़ से उलटे लटके हुए पुरुषों के एक समूह पर ठोकर खा गए। माना जाता है कि ये लोग उनके पूर्वज थे। वे दुःख और पीड़ा के लिए किस्मत में थे क्योंकि उनके बच्चों ने उनका अंतिम संस्कार नहीं किया था। इसलिए, उन्होंने जरात्कारु को विवाह करने और एक पुत्र पैदा करने की सलाह दी जो अनुष्ठान करके उन्हें उन दुर्भाग्य से मुक्ति दिला सके। वासुकी (नागों के राजा) ने अपनी बहन मानसा का हाथ ऋषि जरात्कारु को दे दिया। देवी मानसा ने उनके पुत्र, अस्तिका को जन्म दिया, जिसने उनके पूर्वजों को मुक्त किया। अस्तिका ने नाग जाति को तब भी नष्ट होने से बचाया जब राजा जनमेजय ने उन्हें अपने यज्ञ में अग्नि की आहुति देकर उन्हें खत्म करने का फैसला किया।
दंतकथा
इस कथा में, देवी मनसा को भगवान शिव की पुत्री माना जाता है। उनकी सौतेली माँ पार्वती उन्हें पसंद नहीं करती थीं, इसलिए उन्होंने शिव की एक अन्य पुत्री, जिसका नाम नेता था, के साथ धरती पर रहने का फैसला किया। अपने माता-पिता के बारे में कोई पुष्टि न होने के कारण, मनसा देवी को कभी भी एक प्रीमियम देवी का दर्जा नहीं मिला। मनसा देवी के रूप में पूजी जाने की इच्छा रखती थी और जानती थी कि अगर उसे बंगाल के चंपक नगर के एक अमीर और शक्तिशाली व्यापारी राजकुमार - चांद सौदागर - की भक्ति मिल जाए तो वह अपना सपना पूरा कर सकती है। वह एक विधुर था जिसके छह बेटे थे और वह उनके प्रति बेहद देखभाल और प्यार करता था। मनसा ने उसे मनाने की पूरी कोशिश की लेकिन चूँकि वह भगवान शिव का कट्टर भक्त था, इसलिए वह साँपों की देवी के प्रति अपनी निष्ठा नहीं बदलने वाला था।
एक बार, मनसा एक सुंदर युवती का वेश धारण करके चांद के सामने प्रकट हुई। वह उसकी सुंदरता से इतना मोहित हो गया कि उसने उससे शादी करने के लिए कहा। लेकिन महिला ने जोर देकर कहा कि वह शादी से पहले उसे जादुई शक्तियाँ (भगवान शिव द्वारा दी गई) प्रदान करे। बाद में, मनसा अपने मूल स्वरूप में प्रकट हुईं और एक बार फिर चंद से उनकी पूजा करने के लिए कहा, लेकिन उसने उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह उन्हें एक निम्न देवी मानता था।
एक बार ऐसा हुआ कि चंद व्यापार करने अपने छः बेटों के साथ बाहर गया लेकिन आते समाज उनकी जहाज पानी में डूबने लगी तब उसने मनसा देवी से प्रार्थना की और कहा कि अगर आप हमें इस तूफ़ान से बचा लेती हैं तो मैं आपकी पूजा करूंगा मनसा देवी ने अपनी शक्ति का प्रयोग करके उन सबको बचा लीं लेकिन फिर भी उसने मनसा देवी की पूजा नहीं की वह अपनी
कंजूसी पर अड़ा रहा। फिर उसने उसे धमकाया। चांद अविचल रहा। तब मनसा देवी ने उसे अपना भयानक रूप दिखाया और गरजते हुए कहा, "मैं तुम्हारे सभी छः बेटों को मार डालूंगी!" चांद सौदागर ने उसका मजाक उड़ाया। क्रोध से उबलती हुई, मनसा देवी ने उसे एक भयानक रूप दिया और गायब हो गई।
अगले ही दिन मनसा देवी ने अपने बच्चों - साँपों को आदेश दिया कि वे चाँद सौदागर के सभी बेटों को एक-एक करके डसें। और ऐसा ही हुआ। छह हफ़्तों के दौरान चाँद सौदागर के छह बच्चों को डसकर मार दिया गया। हालाँकि, इस सिलसिलेवार त्रासदी से भी धनी बूढ़े कंजूस का दिल नहीं पिघला।
इसके बाद, चंद ने फिर से शादी की और लखिंदर नाम का एक बेटा पैदा हुआ।
मनसा देवी ने अपना आखिरी दांव खेला। एक शाम, चांद सौदागर ने देवी से एक भविष्यवाणी सुनी: तुम्हारा बेटा, लखिंदर अपनी शादी की रात को सांप के काटने से मर जाएगा। अपने छह बेटों की मौत के बाद, चांद को कुछ समझ आ गई थी। लेकिन मनसा देवी के अनुरोध और धमकी को स्वीकार करने के बजाय, उसने अपने जीवित बेटे को बचाने के लिए सावधानी बरतने का फैसला किया। उसने एक लोहे का कमरा बनवाया जिसमें लखिंदर अपनी शादी की रात मनाएगा। चांद सौदागर को लगा कि वह कमरा पूरी तरह से सांपों से सुरक्षित है।
इसके तीन महीने बाद, लखींदर की शादी बेनलो नाम की युवती से हुई, जो अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर थी। शादी की रात, लखींदर और उसकी दुल्हन लोहे के कमरे में सोने चले गए। बेनलो को पहले से ही देवी के अपने पति पर श्राप के बारे में पता था। डरी हुई और सतर्क, उसने अपने पति को श्राप से बचाने के लिए पूरी रात जागने की कोशिश की। हालाँकि, चौदह लोकों की कोई भी ताकत मनसा
महाभारत
महाभारत में मानसा के विवाह के बारे में बताया गया है। ऋषि जरात्कारु ने कठोर तपस्या की और विवाह से दूर रहने का फैसला किया। एक दिन, वे एक पेड़ से उलटे लटके हुए पुरुषों के एक समूह पर ठोकर खा गए। माना जाता है कि ये लोग उनके पूर्वज थे। वे दुःख और पीड़ा के लिए किस्मत में थे क्योंकि उनके बच्चों ने उनका अंतिम संस्कार नहीं किया था। इसलिए, उन्होंने जरात्कारु को विवाह करने और एक पुत्र पैदा करने की सलाह दी जो अनुष्ठान करके उन्हें उन दुर्भाग्य से मुक्ति दिला सके। वासुकी (नागों के राजा) ने अपनी बहन मानसा का हाथ ऋषि जरात्कारु को दे दिया। देवी मानसा ने उनके पुत्र, अस्तिका को जन्म दिया, जिसने उनके पूर्वजों को मुक्त किया। अस्तिका ने नाग जाति को तब भी नष्ट होने से बचाया जब राजा जनमेजय ने उन्हें अपने यज्ञ में अग्नि की आहुति देकर उन्हें खत्म करने का फैसला किया।
दंतकथा
इस कथा में, देवी मनसा को भगवान शिव की पुत्री माना जाता है। उनकी सौतेली माँ पार्वती उन्हें पसंद नहीं करती थीं, इसलिए उन्होंने शिव की एक अन्य पुत्री, जिसका नाम नेता था, के साथ धरती पर रहने का फैसला किया। अपने माता-पिता के बारे में कोई पुष्टि न होने के कारण, मनसा देवी को कभी भी एक प्रीमियम देवी का दर्जा नहीं मिला। मनसा देवी के रूप में पूजी जाने की इच्छा रखती थी और जानती थी कि अगर उसे बंगाल के चंपक नगर के एक अमीर और शक्तिशाली व्यापारी राजकुमार - चांद सौदागर - की भक्ति मिल जाए तो वह अपना सपना पूरा कर सकती है। वह एक विधुर था जिसके छह बेटे थे और वह उनके प्रति बेहद देखभाल और प्यार करता था। मनसा ने उसे मनाने की पूरी कोशिश की लेकिन चूँकि वह भगवान शिव का कट्टर भक्त था, इसलिए वह साँपों की देवी के प्रति अपनी निष्ठा नहीं बदलने वाला था।
एक बार, मनसा एक सुंदर युवती का वेश धारण करके चांद के सामने प्रकट हुई। वह उसकी सुंदरता से इतना मोहित हो गया कि उसने उससे शादी करने के लिए कहा। लेकिन महिला ने जोर देकर कहा कि वह शादी से पहले उसे जादुई शक्तियाँ (भगवान शिव द्वारा दी गई) प्रदान करे। बाद में, मनसा अपने मूल स्वरूप में प्रकट हुईं और एक बार फिर चंद से उनकी पूजा करने के लिए कहा, लेकिन उसने उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह उन्हें एक निम्न देवी मानता था।
एक बार ऐसा हुआ कि चंद व्यापार करने अपने छः बेटों के साथ बाहर गया लेकिन आते समाज उनकी जहाज पानी में डूबने लगी तब उसने मनसा देवी से प्रार्थना की और कहा कि अगर आप हमें इस तूफ़ान से बचा लेती हैं तो मैं आपकी पूजा करूंगा मनसा देवी ने अपनी शक्ति का प्रयोग करके उन सबको बचा लीं लेकिन फिर भी उसने मनसा देवी की पूजा नहीं की वह अपनी
कंजूसी पर अड़ा रहा। फिर उसने उसे धमकाया। चांद अविचल रहा। तब मनसा देवी ने उसे अपना भयानक रूप दिखाया और गरजते हुए कहा, "मैं तुम्हारे सभी छः बेटों को मार डालूंगी!" चांद सौदागर ने उसका मजाक उड़ाया। क्रोध से उबलती हुई, मनसा देवी ने उसे एक भयानक रूप दिया और गायब हो गई।
अगले ही दिन मनसा देवी ने अपने बच्चों - साँपों को आदेश दिया कि वे चाँद सौदागर के सभी बेटों को एक-एक करके डसें। और ऐसा ही हुआ। छह हफ़्तों के दौरान चाँद सौदागर के छह बच्चों को डसकर मार दिया गया। हालाँकि, इस सिलसिलेवार त्रासदी से भी धनी बूढ़े कंजूस का दिल नहीं पिघला।
इसके बाद, चंद ने फिर से शादी की और लखिंदर नाम का एक बेटा पैदा हुआ।
मनसा देवी ने अपना आखिरी दांव खेला। एक शाम, चांद सौदागर ने देवी से एक भविष्यवाणी सुनी: तुम्हारा बेटा, लखिंदर अपनी शादी की रात को सांप के काटने से मर जाएगा। अपने छह बेटों की मौत के बाद, चांद को कुछ समझ आ गई थी। लेकिन मनसा देवी के अनुरोध और धमकी को स्वीकार करने के बजाय, उसने अपने जीवित बेटे को बचाने के लिए सावधानी बरतने का फैसला किया। उसने एक लोहे का कमरा बनवाया जिसमें लखिंदर अपनी शादी की रात मनाएगा। चांद सौदागर को लगा कि वह कमरा पूरी तरह से सांपों से सुरक्षित है।
इसके तीन महीने बाद, लखींदर की शादी बेनलो नाम की युवती से हुई, जो अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर थी। शादी की रात, लखींदर और उसकी दुल्हन लोहे के कमरे में सोने चले गए। बेनलो को पहले से ही देवी के अपने पति पर श्राप के बारे में पता था। डरी हुई और सतर्क, उसने अपने पति को श्राप से बचाने के लिए पूरी रात जागने की कोशिश की। हालाँकि, चौदह लोकों की कोई भी ताकत मनसा
👍7
देवी के क्रोध को रोक नहीं सकी। लखींदर को एक साँप ने काट लिया और भोर होने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई।
बेचारी विधवा दुखी थी लेकिन सावित्री की तरह उसने भी अपने पति को वापस लाने का संकल्प लिया। उसने केले के बाग में बड़ी श्रद्धा से प्रार्थना की और फिर केले के तनों से एक बेड़ा बनाया। इसके बाद, उसने अपने पति की राख को उस पर रखा और नदी में नीचे, नीचे, नीचे, नीचे तैरती रही, जब तक कि वह हुगली के मुहाने के पास कहीं मनसा देवी से नहीं मिल गई।
मनसा देवी, जो खुद एक माँ थी, जब उसने बेनलो की अपने पति के प्रति भक्ति और उसकी अच्छाई पर विश्वास देखा तो वह पिघल गई। अपनी आँखों में आँसू भरकर उसने वादा किया कि वह लखिंदर को तभी जीवित करेगी जब उसका बुरा ससुर उसकी पूजा करेगा। बेनलो ने उसे आश्वासन दिया और घर लौटकर अपने ससुर के पैरों में गिर पड़ी और आँखों में आँसू भरकर उससे साँपों की रानी-देवी मनसा देवी की पूजा करने की विनती की।
अब तक चाँद सौदागर को एहसास हो चुका था कि उसकी अड़ियल मूर्खता की वजह से उसे क्या कीमत चुकानी पड़ी है। वह काफी हद तक विनम्र हो चुका था, लेकिन उसके पिछले अहंकार के कुछ अंश अभी भी बचे हुए थे। उसने मनसा देवी की इच्छानुसार पूजा करने की सहमति दे दी। हालाँकि, वह यह पूजा अपने बाएँ हाथ से करेगा, दाएँ हाथ से नहीं। यह बिलकुल अपमानजनक था। मनसा देवी फिर से क्रोधित हो गईं, लेकिन उन्हें कोई और उपाय नहीं सूझा। उन्हें भी एहसास हुआ कि या तो उन्हें बाएँ हाथ की पूजा स्वीकार करनी चाहिए या फिर पूजा ही छोड़ देनी चाहिए। और इसलिए, वह समझौते के लिए सहमत हो गईं, और जब वह चाँद सौदागर के भरपूर चढ़ावे से पूरी तरह संतुष्ट हो गईं, तो उन्होंने उसके सभी सात बेटों को जीवनदान दिया, और उसके बाद से मनसा देवी और चाँद सौदागर के बीच हमेशा शांति और सद्भाव बना रहा।
लोककथा के अनुसार पृथ्वीलोक पर पहली बार माता मनसा विषहरी की पूजा हुई, जो चंद्रधर सौदागर ने की. वहीं सांप के काटने के बाद मौत होने पर बिहुला अपने पति का शव गंगा नदी में मंजूषा पर लेकर गई थी और छह महीने बाद बाला वापस जिंदा लौट आया. कहा जाता है तभी से यह मान्यता प्रचलन में आ गई कि सांप के डसने के बाद शव को जलाना नहीं चाहिए बल्कि उसे गंगा नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए. ताकि माता गंगा और मनसा विषहरी की कृपा से व्यक्ति का विष खत्म हो जाता है और वह जिंदा लौट कर चला आता है.
देवी मनसा के बारे में
ऐसा माना जाता है कि देवी मनसा ने ही भगवान शिव की जान बचाई थी जब उन्हें समुद्र मंथन के दौरान विष दिया जा रहा था। भगवान शिव ने घातक विष हलाहल को पी लिया था, अन्यथा इससे पूरा ब्रह्मांड नष्ट हो जाता। विष पीते समय भगवान शिव का गला नीला पड़ गया था, लेकिन मनसा ने इसे उनके शरीर में आगे बढ़ने से रोक दिया, जिससे भगवान शिव पूरी तरह से विष से बच गए।
मनसा देवी की पूजा सबसे ज़्यादा बरसात के मौसम में की जाती है। इस समय आपको पानी भर जाने के कारण सांप अपने बिलों से बाहर निकलते हुए दिखेंगे। इस मौसम में सांपों द्वारा काटे जाने की संभावना बढ़ जाती है।
देवी मनसा को समर्पित त्यौहार
झापान मेला यह त्यौहार वासुकी (नागों के राजा) की बहन मनसा देवी के सम्मान में मनाया जाता है, और माना जाता है कि वह ऋषि कश्यप की मन से उत्पन्न पुत्री हैं। देवी मनसा को एक दयालु देवी माना जाता है जो प्रचुर वर्षा और फसल के लिए आशीर्वाद देती हैं। पश्चिम बंगाल में रहने वाले आदिवासी समुदाय झापान मेला मनाते हैं, जो एक प्रकार का साँप उत्सव है।
नाग पंचमी इस शुभ दिन पर, भक्त दूध चढ़ाकर मंदिरों में जीवित साँपों या नागों की छवियों की पूजा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पवित्र दिन पर साँपों की पूजा करने से पापों से मुक्ति मिलती है। नागों या साँपों से प्रार्थना करने की यह गहरी सांस्कृतिक परंपरा श्रावण माह में चंद्र पखवाड़े के पांचवें दिन पड़ती है।
देवी मनसा की पूजा कैसे करें (मनसा देवी पूजा विधि)
देवी मनसा की पूजा करने के लिए आप घर पर ही मनसा देवी अष्टांग पूजा कर सकते हैं। पूजा से संबंधित समारोह आषाढ़ और श्रावण के महीने में सभी पखवाड़े के पांचवें दिन या पंचमी के दिन होते हैं। भारत में कुछ खास जगहों पर पूजा और अनुष्ठान एक महीने तक चलते हैं और देवी मनसा को खुश करने के लिए कई समारोह आयोजित किए जाते हैं।
मनसा देवी की पूजा करने के दूसरे तरीके भी हैं। आम तौर पर उनकी पूजा बिना किसी छवि के की जाती है। आप देवता की पूजा करने के लिए पेड़ की टहनी या मिट्टी के साँप की छवि या मिट्टी के बर्तन का उपयोग कर सकते हैं। लेकिन कुछ मामलों में, देवी मनसा की छवियों का भी उपयोग किया जाता है। मनसा देवी की पूजा आमतौर पर बरसात के मौसम में की जाती है जब साँप सबसे अधिक सक्रिय होते हैं।
बेचारी विधवा दुखी थी लेकिन सावित्री की तरह उसने भी अपने पति को वापस लाने का संकल्प लिया। उसने केले के बाग में बड़ी श्रद्धा से प्रार्थना की और फिर केले के तनों से एक बेड़ा बनाया। इसके बाद, उसने अपने पति की राख को उस पर रखा और नदी में नीचे, नीचे, नीचे, नीचे तैरती रही, जब तक कि वह हुगली के मुहाने के पास कहीं मनसा देवी से नहीं मिल गई।
मनसा देवी, जो खुद एक माँ थी, जब उसने बेनलो की अपने पति के प्रति भक्ति और उसकी अच्छाई पर विश्वास देखा तो वह पिघल गई। अपनी आँखों में आँसू भरकर उसने वादा किया कि वह लखिंदर को तभी जीवित करेगी जब उसका बुरा ससुर उसकी पूजा करेगा। बेनलो ने उसे आश्वासन दिया और घर लौटकर अपने ससुर के पैरों में गिर पड़ी और आँखों में आँसू भरकर उससे साँपों की रानी-देवी मनसा देवी की पूजा करने की विनती की।
अब तक चाँद सौदागर को एहसास हो चुका था कि उसकी अड़ियल मूर्खता की वजह से उसे क्या कीमत चुकानी पड़ी है। वह काफी हद तक विनम्र हो चुका था, लेकिन उसके पिछले अहंकार के कुछ अंश अभी भी बचे हुए थे। उसने मनसा देवी की इच्छानुसार पूजा करने की सहमति दे दी। हालाँकि, वह यह पूजा अपने बाएँ हाथ से करेगा, दाएँ हाथ से नहीं। यह बिलकुल अपमानजनक था। मनसा देवी फिर से क्रोधित हो गईं, लेकिन उन्हें कोई और उपाय नहीं सूझा। उन्हें भी एहसास हुआ कि या तो उन्हें बाएँ हाथ की पूजा स्वीकार करनी चाहिए या फिर पूजा ही छोड़ देनी चाहिए। और इसलिए, वह समझौते के लिए सहमत हो गईं, और जब वह चाँद सौदागर के भरपूर चढ़ावे से पूरी तरह संतुष्ट हो गईं, तो उन्होंने उसके सभी सात बेटों को जीवनदान दिया, और उसके बाद से मनसा देवी और चाँद सौदागर के बीच हमेशा शांति और सद्भाव बना रहा।
लोककथा के अनुसार पृथ्वीलोक पर पहली बार माता मनसा विषहरी की पूजा हुई, जो चंद्रधर सौदागर ने की. वहीं सांप के काटने के बाद मौत होने पर बिहुला अपने पति का शव गंगा नदी में मंजूषा पर लेकर गई थी और छह महीने बाद बाला वापस जिंदा लौट आया. कहा जाता है तभी से यह मान्यता प्रचलन में आ गई कि सांप के डसने के बाद शव को जलाना नहीं चाहिए बल्कि उसे गंगा नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए. ताकि माता गंगा और मनसा विषहरी की कृपा से व्यक्ति का विष खत्म हो जाता है और वह जिंदा लौट कर चला आता है.
देवी मनसा के बारे में
ऐसा माना जाता है कि देवी मनसा ने ही भगवान शिव की जान बचाई थी जब उन्हें समुद्र मंथन के दौरान विष दिया जा रहा था। भगवान शिव ने घातक विष हलाहल को पी लिया था, अन्यथा इससे पूरा ब्रह्मांड नष्ट हो जाता। विष पीते समय भगवान शिव का गला नीला पड़ गया था, लेकिन मनसा ने इसे उनके शरीर में आगे बढ़ने से रोक दिया, जिससे भगवान शिव पूरी तरह से विष से बच गए।
मनसा देवी की पूजा सबसे ज़्यादा बरसात के मौसम में की जाती है। इस समय आपको पानी भर जाने के कारण सांप अपने बिलों से बाहर निकलते हुए दिखेंगे। इस मौसम में सांपों द्वारा काटे जाने की संभावना बढ़ जाती है।
देवी मनसा को समर्पित त्यौहार
झापान मेला यह त्यौहार वासुकी (नागों के राजा) की बहन मनसा देवी के सम्मान में मनाया जाता है, और माना जाता है कि वह ऋषि कश्यप की मन से उत्पन्न पुत्री हैं। देवी मनसा को एक दयालु देवी माना जाता है जो प्रचुर वर्षा और फसल के लिए आशीर्वाद देती हैं। पश्चिम बंगाल में रहने वाले आदिवासी समुदाय झापान मेला मनाते हैं, जो एक प्रकार का साँप उत्सव है।
नाग पंचमी इस शुभ दिन पर, भक्त दूध चढ़ाकर मंदिरों में जीवित साँपों या नागों की छवियों की पूजा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पवित्र दिन पर साँपों की पूजा करने से पापों से मुक्ति मिलती है। नागों या साँपों से प्रार्थना करने की यह गहरी सांस्कृतिक परंपरा श्रावण माह में चंद्र पखवाड़े के पांचवें दिन पड़ती है।
देवी मनसा की पूजा कैसे करें (मनसा देवी पूजा विधि)
देवी मनसा की पूजा करने के लिए आप घर पर ही मनसा देवी अष्टांग पूजा कर सकते हैं। पूजा से संबंधित समारोह आषाढ़ और श्रावण के महीने में सभी पखवाड़े के पांचवें दिन या पंचमी के दिन होते हैं। भारत में कुछ खास जगहों पर पूजा और अनुष्ठान एक महीने तक चलते हैं और देवी मनसा को खुश करने के लिए कई समारोह आयोजित किए जाते हैं।
मनसा देवी की पूजा करने के दूसरे तरीके भी हैं। आम तौर पर उनकी पूजा बिना किसी छवि के की जाती है। आप देवता की पूजा करने के लिए पेड़ की टहनी या मिट्टी के साँप की छवि या मिट्टी के बर्तन का उपयोग कर सकते हैं। लेकिन कुछ मामलों में, देवी मनसा की छवियों का भी उपयोग किया जाता है। मनसा देवी की पूजा आमतौर पर बरसात के मौसम में की जाती है जब साँप सबसे अधिक सक्रिय होते हैं।
👍3
देवी मनसा की पूजा के लाभ
देवी मनसा सर्पदंश तथा चेचक और चेचक जैसे संक्रामक रोगों से सुरक्षा तथा उपचार प्रदान करती हैं।
निःसंतान दम्पति संतान प्राप्ति की आशा में मनसा देवी मंदिर आते हैं।
यदि आप पंचमी तिथि पर मनसा देवी की पूजा करते हैं, तो आपको नाम और प्रसिद्धि मिलेगी।
देवी मनसा सर्प श्राप का निवारण करने के साथ-साथ कालसर्प, नाग दोष आदि दोषों का भी निवारण करती हैं।
मनसा देवी आपको सांप के बुरे सपने से छुटकारा दिलाने में मदद करती हैं, सांपों के डर को खत्म करती हैं और शरीर से सभी प्रकार के जहर को निकालती हैं।
देवी मनसा सर्पदंश तथा चेचक और चेचक जैसे संक्रामक रोगों से सुरक्षा तथा उपचार प्रदान करती हैं।
निःसंतान दम्पति संतान प्राप्ति की आशा में मनसा देवी मंदिर आते हैं।
यदि आप पंचमी तिथि पर मनसा देवी की पूजा करते हैं, तो आपको नाम और प्रसिद्धि मिलेगी।
देवी मनसा सर्प श्राप का निवारण करने के साथ-साथ कालसर्प, नाग दोष आदि दोषों का भी निवारण करती हैं।
मनसा देवी आपको सांप के बुरे सपने से छुटकारा दिलाने में मदद करती हैं, सांपों के डर को खत्म करती हैं और शरीर से सभी प्रकार के जहर को निकालती हैं।
👍6🙏2❤1
*संसार में 4 तरह के लोग :*
*(1) अँधेरे से अँधेरे की ओर:*
ऐसा व्यक्ति जिसके जीवन में अँध:कार है। यानि गरीबी है, परेशानी है, व्याकुलता है। फिर भी वह क्रोध जगाता है, द्वेष जगाता है। तथा अपने दुःख का जिम्मेदार दुसरो को ठहराता है, और मन ही मन दुसरो को गाली देता है। दुःख को भुलाने के लिए नशापान करता है।
ऐसा व्यक्ति आज तो दुखी है ही, लेकिन आगे के लिये भी दुःख के बीज ही बो रहा है।
यानि अँधेरे से अँधेरे की तरफ बढ़ रहा है।
*(2) अँधेरे से प्रकाश की ओर:*
ऐसे व्यक्ति के जीवन में अँधेरा तो है, लेकिन भीतर प्रज्ञा जाग रही है। वो ये सोचता है, की यह जो कुछ भी मेरे साथ हो रहा है, वो किसी पूर्व दुष्कर्म के कारन हो रहा है, किसी दूसरे को क्या दोष दूँ? ये तो बेचारे माध्यम बन गए है।
तो अपना वर्तमान कर्म सुधारता है, ओरो के प्रति मैत्री, करुणा, सद्भावना जगाता है।
किसी के प्रति क्रोध नही, द्वेष नही।
तो आगे के लिये उसका जीवन प्रकाश ही प्रकाश है।
*(3) प्रकाश से अँधेरे की ओर:*
ऐसा व्यक्ति प्रकाश में है,
यानि धन है, प्रतिष्ठा है,
पर अहंकार है, सबसे घृणा करता है।
देखो मै कितना बुद्धिमान हूँ, कितना मेहनती, ऐसा मानता है।
तो दुःख के बीज बो रहा है।
भविष्य में अँधेरा ही अँधेरा होगा।
*(4) प्रकाश से प्रकाश की ओर:*
ऐसा व्यक्ति प्रकाश में है,
पर साथ साथ प्रज्ञा भी है। वो ये सोचता की यह जो कुछ प्राप्त हुआ किसी पूर्व पुण्यकर्म से हुआ।
सदा रहने वाला नही।
तो लोगो की सेवा करता है, उनमे सामर्थ्य के अनुसार सहर्ष बाँटता है।
ओरो के प्रति मंगल कामना करता है।
तो उसका आगे आने वाला जीवन प्रकाश ही प्रकाश होगा।
*(1) अँधेरे से अँधेरे की ओर:*
ऐसा व्यक्ति जिसके जीवन में अँध:कार है। यानि गरीबी है, परेशानी है, व्याकुलता है। फिर भी वह क्रोध जगाता है, द्वेष जगाता है। तथा अपने दुःख का जिम्मेदार दुसरो को ठहराता है, और मन ही मन दुसरो को गाली देता है। दुःख को भुलाने के लिए नशापान करता है।
ऐसा व्यक्ति आज तो दुखी है ही, लेकिन आगे के लिये भी दुःख के बीज ही बो रहा है।
यानि अँधेरे से अँधेरे की तरफ बढ़ रहा है।
*(2) अँधेरे से प्रकाश की ओर:*
ऐसे व्यक्ति के जीवन में अँधेरा तो है, लेकिन भीतर प्रज्ञा जाग रही है। वो ये सोचता है, की यह जो कुछ भी मेरे साथ हो रहा है, वो किसी पूर्व दुष्कर्म के कारन हो रहा है, किसी दूसरे को क्या दोष दूँ? ये तो बेचारे माध्यम बन गए है।
तो अपना वर्तमान कर्म सुधारता है, ओरो के प्रति मैत्री, करुणा, सद्भावना जगाता है।
किसी के प्रति क्रोध नही, द्वेष नही।
तो आगे के लिये उसका जीवन प्रकाश ही प्रकाश है।
*(3) प्रकाश से अँधेरे की ओर:*
ऐसा व्यक्ति प्रकाश में है,
यानि धन है, प्रतिष्ठा है,
पर अहंकार है, सबसे घृणा करता है।
देखो मै कितना बुद्धिमान हूँ, कितना मेहनती, ऐसा मानता है।
तो दुःख के बीज बो रहा है।
भविष्य में अँधेरा ही अँधेरा होगा।
*(4) प्रकाश से प्रकाश की ओर:*
ऐसा व्यक्ति प्रकाश में है,
पर साथ साथ प्रज्ञा भी है। वो ये सोचता की यह जो कुछ प्राप्त हुआ किसी पूर्व पुण्यकर्म से हुआ।
सदा रहने वाला नही।
तो लोगो की सेवा करता है, उनमे सामर्थ्य के अनुसार सहर्ष बाँटता है।
ओरो के प्रति मंगल कामना करता है।
तो उसका आगे आने वाला जीवन प्रकाश ही प्रकाश होगा।
👍11🔥1
*"सत्य" एक है तो भी उसका प्रयोग करने की विधियाँ बदलती रहती हैं।* शरीर की ऋतु-प्रभावों से रक्षा करनी चाहिए। यह एक सचाई है, पर इसका व्यावहारिक रूप समय-समय पर बदलता रहता है। जाड़े के दिनों में जिन कपड़ों की आवश्यकता थी, उनका गरमी के दिनों में कोई उपयोग नहीं है। इसलिए पोशाक में परिवर्तन करना जरूरी है। *यह आक्षेप करना उचित न होगा कि पैगंबरों ने अपनी बात को ईश्वर की बाणी क्यों कहा ?* यदि उनके संदेश ही ईश्वर की वाणी थे तो अनेक धर्मों के पैगंबर मतभेद क्यों रखते हैं? इनमें से एक को सच्चा माना जाए तो बाकी सब झूठा ठहरते हैं। *तथ्य बात यह है कि सभी पैगंबरों की वाणी में "ईश्वरीय संदेश" था। उन्होंने जो कुछ कहा "अंतरात्मा की पुकार" के आधार पर ईश्वर की आकाशवाणी के संकेत पर कहा।* समयानुसार प्रथाएँ बदलती हैं जैसे कि ऋतुओं के अनुसार पोशाक बदलती है। *एक व्यक्ति दिसंबर के महीने में यह शिक्षा देता है कि ऊनी कोट और स्वेटर पहनो तो उसकी शिक्षा तथ्य से, धर्मतत्त्व से परिपूर्ण है। किंतु यदि दूसरा व्यक्ति जून के महीने में यह कहता है कि अब ऊनी कोट को रूई के लिहाफ की कोई जरूरत नहीं है, बल्कि पतले कपड़े पहनने चाहिए तो वह भी झूठा नहीं है।*
👉 कई बार सांप्रदायिक और सामाजिक रीति-रिवाजों एवं अन्य मान्यताओं के संबंध में आपके सामने बड़ी पेचीदा गुत्थी उपस्थित हो सकती है। *विभिन्न धर्मों के पूजनीय अवतार और धर्मग्रंथ एक दूसरे से विपरीत उपदेश देते प्रतीत होते हैं। ऐसी दशा में बड़ा मतिभ्रम होता है कि किसे मानें और किसे न मानें ?* इस गुत्थी को सुलझाने के लिए आपको यह बात हृदयंगम कर लेनी चाहिए कि *अवतारों का आगमन और ग्रंथों का निर्माण समय की आवश्यकता को पूरी करने के लिए होता है।* कोई पुराने नियम जब समय से पीछे हो जाने के कारण अनुपयोगी हो जाते हैं तो उनमें सुधार करने के लिए नए-नए सुधारक, नए अवतार प्रकट होते हैं। देश, काल और व्यक्तियों की भिन्नता के कारण उनके उपदेश भी अलग-अलग होते हैं। *देश, काल और पात्र के अनुसार "वेद" एक से चार हुए, "कुरान" में संशोधन हुआ, "बाइबिल" तो अनेक अवतारों की उक्तियों का संग्रह है। जब वैदिकी ब्रह्मोपासना आवश्यकता से अधिक बढ़ी तो "भौतिकवादी वाम मार्ग" की आवश्यकता हुई, जब वाममार्गी "हिंसा" की अति हुई तो भगवान बुद्ध, महावीर ने "अहिंसा" का मार्ग चलाया; जब "अहिंसा" का रोड़ा मानव जीवन के मार्ग में बाधा देने लगा तो शंकराचार्य ने उसका खंडन करके "वेदांत" का प्रतिपादन किया।* इसी प्रकार समस्त विश्व में धार्मिक और सामाजिक अंतर होते रहे हैं। *सांप्रदायिक नियम और व्यवस्थाओं का अस्तित्व समयानुसार परिवर्तन की धुरी पर घूम रहा है।* देश, काल और पात्र के भेद से इनमें परिवर्तन होता है और होना चाहिए। *एक नियम, एक समय के लिए उत्तम है तो वही कालांतर में हानिप्रद हो सकता है।* गरमी की रातों में लोग नंगे बदन सोते हैं। पर वही नियम सरदी की रातों में पालन किया जाएगा, तो उसका बड़ा घातक परिणाम होगा।
👉 कई बार सांप्रदायिक और सामाजिक रीति-रिवाजों एवं अन्य मान्यताओं के संबंध में आपके सामने बड़ी पेचीदा गुत्थी उपस्थित हो सकती है। *विभिन्न धर्मों के पूजनीय अवतार और धर्मग्रंथ एक दूसरे से विपरीत उपदेश देते प्रतीत होते हैं। ऐसी दशा में बड़ा मतिभ्रम होता है कि किसे मानें और किसे न मानें ?* इस गुत्थी को सुलझाने के लिए आपको यह बात हृदयंगम कर लेनी चाहिए कि *अवतारों का आगमन और ग्रंथों का निर्माण समय की आवश्यकता को पूरी करने के लिए होता है।* कोई पुराने नियम जब समय से पीछे हो जाने के कारण अनुपयोगी हो जाते हैं तो उनमें सुधार करने के लिए नए-नए सुधारक, नए अवतार प्रकट होते हैं। देश, काल और व्यक्तियों की भिन्नता के कारण उनके उपदेश भी अलग-अलग होते हैं। *देश, काल और पात्र के अनुसार "वेद" एक से चार हुए, "कुरान" में संशोधन हुआ, "बाइबिल" तो अनेक अवतारों की उक्तियों का संग्रह है। जब वैदिकी ब्रह्मोपासना आवश्यकता से अधिक बढ़ी तो "भौतिकवादी वाम मार्ग" की आवश्यकता हुई, जब वाममार्गी "हिंसा" की अति हुई तो भगवान बुद्ध, महावीर ने "अहिंसा" का मार्ग चलाया; जब "अहिंसा" का रोड़ा मानव जीवन के मार्ग में बाधा देने लगा तो शंकराचार्य ने उसका खंडन करके "वेदांत" का प्रतिपादन किया।* इसी प्रकार समस्त विश्व में धार्मिक और सामाजिक अंतर होते रहे हैं। *सांप्रदायिक नियम और व्यवस्थाओं का अस्तित्व समयानुसार परिवर्तन की धुरी पर घूम रहा है।* देश, काल और पात्र के भेद से इनमें परिवर्तन होता है और होना चाहिए। *एक नियम, एक समय के लिए उत्तम है तो वही कालांतर में हानिप्रद हो सकता है।* गरमी की रातों में लोग नंगे बदन सोते हैं। पर वही नियम सरदी की रातों में पालन किया जाएगा, तो उसका बड़ा घातक परिणाम होगा।
👍3
उन्नत खेचरी मुद्रा
उन्नत खेचरी मुद्रा में जीभ के निचले हिस्से को मुंह के निचले हिस्से से जोड़ने वाले ऊतक के निचले हिस्से को काटना शामिल है। एक बार पूरा हो जाने पर, जीभ को पूरी तरह से लंबा किया जा सकता है और उवुला के पीछे नाक गुहा के अंदर रखा जा सकता है ऐसा करने से ग्रसनी पर दबाव पड़ता है, जो ललना को उत्तेजित करता है और अमृत को सौर जाल में गिरने से रोकता है। एक बार जब अमृत को खेचरी मुद्रा के साथ पकड़ लिया जाता है, तो इसके उपचारात्मक प्रभाव सामने आने लगते हैं। उन्नत खेचरी मुद्रा विधि का अभ्यास किसी योग्य गुरु की मदद से सबसे अच्छा किया जाता है।
जब कोई व्यक्ति पूर्ण और स्थायी कुंडलिनी जागरण से गुजरता है, तो कुंडलिनी ऊर्जा का थैलेमस में मुक्त प्रवाह होता है। यहाँ से, कुंडलिनी आज्ञा, सहस्रार और बिंदु चक्र की ओर बहती है। जब बिंदु चक्र आध्यात्मिक परिवर्तन की प्रक्रिया में शामिल हो जाता है, तो यह अमृत को ललना चक्र तक स्रावित करता है, जिसे फिर विशुद्धि द्वारा शुद्ध किया जाता है और इसके सबसे परिष्कृत रूप में परिवर्तित किया जाता है। यह अमृत फिर प्रकाश के पूरे शरीर में वितरित किया जाता है, बहत्तर हज़ार नाड़ियों को पोषण देता है और चेतना का विस्तार करता है। परिणामस्वरूप, जागृत व्यक्ति में औसत से ज़्यादा जीवन शक्ति होने लगती है, और उनकी उम्र बढ़ने की प्रक्रिया काफ़ी धीमी हो जाती है। वे लंबे समय तक बिना भोजन और पानी के रह सकते हैं, क्योंकि वे इन नई ऊर्जाओं की गति से अंदर से पोषित महसूस करते हैं अमृत सीधे ज्ञानोदय की प्रक्रिया में शामिल है लेकिन इसका वास्तविक उद्देश्य कुंडलिनी पथ को बनाए रखने में भूमिका निभाना है। रूपांतरित अमृत कुंडलिनी सर्किट को पोषण देता है, और यह भोजन से प्राप्त होने वाली प्रकाश ऊर्जा पर निर्भर करता है। यह व्यक्ति को उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को स्थगित करने और अपने भौतिक शरीर के स्वास्थ्य को लम्बा करने के लिए आवश्यक भावनात्मक शांति प्रदान करता है। इस भावनात्मक शांति को निर्वाण की स्थिति के रूप में सबसे अच्छा वर्णित किया जाता है जो योगी के वांछित लक्ष्यों में से एक है। तनाव उम्र बढ़ने के प्रमुख कारकों में से एक है। मन को तटस्थ रखकर और अमृत का उपयोग करके प्रकाश के शरीर को पोषित करने से दीर्घायु प्राप्त की जा सकती है।
खेचरी मुद्रा का एक और रूप खोजा गया है
जीभ को नीचे की ओर मोड़ने और उसे पीछे धकेलने से भी ललना चक्र पर दबाव पड़ता है, जो कुंडलिनी के पथ को पोषित करने की प्रक्रिया में सहायता करता है। इसे सही तरीके से करने के लिए, आपको जीभ की नोक को जीभ के मध्य भाग के नीचे स्थित श्लेष्म झिल्ली की एक तह है जो इसे आपके मुंह में स्थिर करने और इसकी गतिविधियों को स्थिर करने में मदद करती है।
उन्नत खेचरी मुद्रा में जीभ के निचले हिस्से को मुंह के निचले हिस्से से जोड़ने वाले ऊतक के निचले हिस्से को काटना शामिल है। एक बार पूरा हो जाने पर, जीभ को पूरी तरह से लंबा किया जा सकता है और उवुला के पीछे नाक गुहा के अंदर रखा जा सकता है ऐसा करने से ग्रसनी पर दबाव पड़ता है, जो ललना को उत्तेजित करता है और अमृत को सौर जाल में गिरने से रोकता है। एक बार जब अमृत को खेचरी मुद्रा के साथ पकड़ लिया जाता है, तो इसके उपचारात्मक प्रभाव सामने आने लगते हैं। उन्नत खेचरी मुद्रा विधि का अभ्यास किसी योग्य गुरु की मदद से सबसे अच्छा किया जाता है।
जब कोई व्यक्ति पूर्ण और स्थायी कुंडलिनी जागरण से गुजरता है, तो कुंडलिनी ऊर्जा का थैलेमस में मुक्त प्रवाह होता है। यहाँ से, कुंडलिनी आज्ञा, सहस्रार और बिंदु चक्र की ओर बहती है। जब बिंदु चक्र आध्यात्मिक परिवर्तन की प्रक्रिया में शामिल हो जाता है, तो यह अमृत को ललना चक्र तक स्रावित करता है, जिसे फिर विशुद्धि द्वारा शुद्ध किया जाता है और इसके सबसे परिष्कृत रूप में परिवर्तित किया जाता है। यह अमृत फिर प्रकाश के पूरे शरीर में वितरित किया जाता है, बहत्तर हज़ार नाड़ियों को पोषण देता है और चेतना का विस्तार करता है। परिणामस्वरूप, जागृत व्यक्ति में औसत से ज़्यादा जीवन शक्ति होने लगती है, और उनकी उम्र बढ़ने की प्रक्रिया काफ़ी धीमी हो जाती है। वे लंबे समय तक बिना भोजन और पानी के रह सकते हैं, क्योंकि वे इन नई ऊर्जाओं की गति से अंदर से पोषित महसूस करते हैं अमृत सीधे ज्ञानोदय की प्रक्रिया में शामिल है लेकिन इसका वास्तविक उद्देश्य कुंडलिनी पथ को बनाए रखने में भूमिका निभाना है। रूपांतरित अमृत कुंडलिनी सर्किट को पोषण देता है, और यह भोजन से प्राप्त होने वाली प्रकाश ऊर्जा पर निर्भर करता है। यह व्यक्ति को उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को स्थगित करने और अपने भौतिक शरीर के स्वास्थ्य को लम्बा करने के लिए आवश्यक भावनात्मक शांति प्रदान करता है। इस भावनात्मक शांति को निर्वाण की स्थिति के रूप में सबसे अच्छा वर्णित किया जाता है जो योगी के वांछित लक्ष्यों में से एक है। तनाव उम्र बढ़ने के प्रमुख कारकों में से एक है। मन को तटस्थ रखकर और अमृत का उपयोग करके प्रकाश के शरीर को पोषित करने से दीर्घायु प्राप्त की जा सकती है।
खेचरी मुद्रा का एक और रूप खोजा गया है
जीभ को नीचे की ओर मोड़ने और उसे पीछे धकेलने से भी ललना चक्र पर दबाव पड़ता है, जो कुंडलिनी के पथ को पोषित करने की प्रक्रिया में सहायता करता है। इसे सही तरीके से करने के लिए, आपको जीभ की नोक को जीभ के मध्य भाग के नीचे स्थित श्लेष्म झिल्ली की एक तह है जो इसे आपके मुंह में स्थिर करने और इसकी गतिविधियों को स्थिर करने में मदद करती है।
👍11
*पहले गण आते है,भक्त आते है,पुत्र आते है तभी जाकर सनातन माता पिता का दर्शन होता है।*
भैरव प्रसन्न होगे तभीकाली या शक्ति का दर्शन होगा।पुष्पदंत शिव गण ही था जो श्राप के कारण मनुष्य योनि मे आया था,उसने अदभूत शिव भक्ति की परन्तु शिव दर्शन नही हो रहा था,तब गणेश स्तोत्र की रचना की और श्री गणेश दर्शन दिये उसके बाद ही शिव प्रसन्न हुए तभी दर्शन हो पाया।ये ही होता है,पहले हनुमान जी आते है बाद मे सीताराम जी आते है।
श्री राम सीता वियोग मे भटक रहे थे की हनुमान आ गये,भरत वियोग मे तड़प रहे थे की हनुमान जी आ गये।माँ सीता करुण विलाप कर रही थी की हनुमान जी आ गये।विभीषण व्याकुल थे की हनुमान जी आ गये।सुग्रीव बाली के भय से त्राही त्राही कर रहे थे की हनुमान जी आ गये और इस युग मे तुलसी बाबा तड़प रहे थे की हनुमान जी आ गये,मै स्वयं अंतिम जीवन को समाप्त करने जा रहा था की हनुमान जी आ गये।आज करोड़ो भक्त रोते है तो पहले हनुमान या कोई पुत्र भक्त संत आ ही जाते है।
पहले हनुमान,गणेश,भैरव,योगनी,मातृका,गण आते है उपासक को देखते है,जाँचते है,परखते है तभी शिव या जगदम्बा या श्री विष्णु का दर्शन होता है,कृपा होता है।सीताराम इस ब्रह्माण्ड के परम तत्व है।वही शिवशक्ति सनातन माता पिता परम ब्रह्म है,सभी एक ही है यही तो परम सत्य है।श्री राम के पीछे सीता खड़ी है और आगे आगे हनुमान जी चलते है।शिव के पीछे माता बग्ला चलती है वही आगे आगे काली चलती है।हनुमान अवतरण सनातन धर्म की रक्षा,भक्तो की रक्षा और राम कथा के लिए ही हुआ है।राम के लिए ये कुछ भी कर सकते है।
जब सहस्त्र रावण से युद्ध हो रहा था तो सारी सेना को एक ही बाण मे अपने अपने देश,घर पहुँचा देने वाला सहस्त्र रावण जानता था की शिव अंशात्मक हनुमान भी यहा है,तो मै राम को कैसे परास्त करुँगा।हनुमान जी राम की लीला समझ रहे थे,की यहाँ सीता लीला होने जा रही थी,अब मुझे राम के आगे से हटना पड़ेगा,अब परम शक्ति सीता राम के आगे कालीका रुप धारण करेगी। यह गोपनीय रहस्य है,जो मैंने लिख दिया ,शिवशक्ति लीला में शिव के आगे काली का महा तांडव होगा।सहस्त्र रावण ने बाण मारा राम मुर्छित हो गये ,यह देख सीता रथ से कुद कर काली रुप धारण कर क्षण मात्र में ही सहस्त्र रावण का बध कर दी।
सहस्त्र रावण लंका के रावण से हजारों गुणा अधिक बलशाली था। सीता ने काली रुप धारण किया ,क्यों,कारण जब परम ब्रह्म क्रिया रहित होकर तटस्थ हो जाता है तो शक्ति ही सभी क्रिया करती है,यँहा राम को परास्त ,निस्तेज देख काली उग्र होकर विनाश करने लगी तो उनके उग्रता को रोकने के लिए ,शिव को ,उनके रास्ते में निस्तेज ,तटस्थ लेट जाना पड़ा,तभी काली की दृष्टि अपने प्रियतम शिव पर गई और काली का क्रोध जाता रहा,यही तो लीला है,काली ही जगत की मूल शक्ति है।
सभी कहीं न कही झुकते है किसी न किसी का ध्यान करते है,परन्तु काली स्वतंत्र महाशक्ति है ये शिव की प्रियतमा है।जब पार्वती से विवाह हुआ,शिव जी,पार्वती को प्रसन्न करने का कई प्रयास करते है,वही पार्वती कितने उग्र तप से शिव को मोह रही है वही काली नृत्य करती है शिव को रिझाने के लिए,कौन है यह काली,जो सीता से काली बन गई।वही काली कभी कृष्ण बन गये।वाह!क्या लीला है।जब सती ने शिव को रोकने के लिए जब दश रुप धारण किया तो प्रथम रुप काली का ही था।
सती ने आत्म दाह करने से पूर्व दश रुप प्रकट कर दश महाविद्या कहलायी,जिसमे प्रथम १.काली २.तारा ३.श्री महात्रिपुर सुन्दरी ४.भुवनेश्वरी ५.छिन्नमस्तिका ६.भैरवी ७.धूमावती ८.बगलामुखी ९.मातंगी १०.श्री कमला के नाम से विख्यात हुई,यही जब हिमालय पुत्री पार्वती बन शिव बल्लभा बनी तो ये ही नव दुर्गा रुप धारण करके जगत मे विख्यात हुई।यह ही महाविद्या तत्व है।एक पर शून्य दश निराकार,निर्गूण सभी एक ही है।एक जोड़ नौ यानि दश हो जाता है,यह ही पूर्ण रहस्य है,इसपर कभी लिखूँगा।
बिना शक्ति कृपा संसार मे कुछ नही हो सकता,शक्ति के भय से इस ब्रह्माण्ड मे सभी आसुरी प्रवृति वाले थर थर काँपते है,शक्ति का इशारा है,घोषणा है कि शिव की तरफ,राम की तरफ,कृष्ण की ओर भक्त, सज्जन,संतो की ओर टेढ़ी नजर से भी देखोगे तो सिर मुण्डन कर दूँगी,इस जगत मे रहना है तो अपने कर्मो को सही मार्ग पर ले जा,शिव,राम,हरि,सता समझ ये सभी एक ही है।विष्णु मोहिनी रुप बना कर भागते तो शिव सुध बुध खोकर अपनी प्रेममयी लीला का विस्तार किये तो ही हनुमान जी हमारे बीच आ पाये।
विष्णु श्याम वर्ण है,वह नारी रुप धारण किये वही काली विष्णु की योगनिद्रा है।कृष्ण के रास मंडल मे शिव भी नारी रुप धारण करते है वही सीता काली रुप धारण करती है।यह सभी परम कृपालु और इनकी यह गोपनीय रहस्य है।जब हम सत्य पथ पर चलेंगे तो पहले गुरु,गणेश, हनुमान.भैरव पहले इनकी कृपा चाहिए तभी
भैरव प्रसन्न होगे तभीकाली या शक्ति का दर्शन होगा।पुष्पदंत शिव गण ही था जो श्राप के कारण मनुष्य योनि मे आया था,उसने अदभूत शिव भक्ति की परन्तु शिव दर्शन नही हो रहा था,तब गणेश स्तोत्र की रचना की और श्री गणेश दर्शन दिये उसके बाद ही शिव प्रसन्न हुए तभी दर्शन हो पाया।ये ही होता है,पहले हनुमान जी आते है बाद मे सीताराम जी आते है।
श्री राम सीता वियोग मे भटक रहे थे की हनुमान आ गये,भरत वियोग मे तड़प रहे थे की हनुमान जी आ गये।माँ सीता करुण विलाप कर रही थी की हनुमान जी आ गये।विभीषण व्याकुल थे की हनुमान जी आ गये।सुग्रीव बाली के भय से त्राही त्राही कर रहे थे की हनुमान जी आ गये और इस युग मे तुलसी बाबा तड़प रहे थे की हनुमान जी आ गये,मै स्वयं अंतिम जीवन को समाप्त करने जा रहा था की हनुमान जी आ गये।आज करोड़ो भक्त रोते है तो पहले हनुमान या कोई पुत्र भक्त संत आ ही जाते है।
पहले हनुमान,गणेश,भैरव,योगनी,मातृका,गण आते है उपासक को देखते है,जाँचते है,परखते है तभी शिव या जगदम्बा या श्री विष्णु का दर्शन होता है,कृपा होता है।सीताराम इस ब्रह्माण्ड के परम तत्व है।वही शिवशक्ति सनातन माता पिता परम ब्रह्म है,सभी एक ही है यही तो परम सत्य है।श्री राम के पीछे सीता खड़ी है और आगे आगे हनुमान जी चलते है।शिव के पीछे माता बग्ला चलती है वही आगे आगे काली चलती है।हनुमान अवतरण सनातन धर्म की रक्षा,भक्तो की रक्षा और राम कथा के लिए ही हुआ है।राम के लिए ये कुछ भी कर सकते है।
जब सहस्त्र रावण से युद्ध हो रहा था तो सारी सेना को एक ही बाण मे अपने अपने देश,घर पहुँचा देने वाला सहस्त्र रावण जानता था की शिव अंशात्मक हनुमान भी यहा है,तो मै राम को कैसे परास्त करुँगा।हनुमान जी राम की लीला समझ रहे थे,की यहाँ सीता लीला होने जा रही थी,अब मुझे राम के आगे से हटना पड़ेगा,अब परम शक्ति सीता राम के आगे कालीका रुप धारण करेगी। यह गोपनीय रहस्य है,जो मैंने लिख दिया ,शिवशक्ति लीला में शिव के आगे काली का महा तांडव होगा।सहस्त्र रावण ने बाण मारा राम मुर्छित हो गये ,यह देख सीता रथ से कुद कर काली रुप धारण कर क्षण मात्र में ही सहस्त्र रावण का बध कर दी।
सहस्त्र रावण लंका के रावण से हजारों गुणा अधिक बलशाली था। सीता ने काली रुप धारण किया ,क्यों,कारण जब परम ब्रह्म क्रिया रहित होकर तटस्थ हो जाता है तो शक्ति ही सभी क्रिया करती है,यँहा राम को परास्त ,निस्तेज देख काली उग्र होकर विनाश करने लगी तो उनके उग्रता को रोकने के लिए ,शिव को ,उनके रास्ते में निस्तेज ,तटस्थ लेट जाना पड़ा,तभी काली की दृष्टि अपने प्रियतम शिव पर गई और काली का क्रोध जाता रहा,यही तो लीला है,काली ही जगत की मूल शक्ति है।
सभी कहीं न कही झुकते है किसी न किसी का ध्यान करते है,परन्तु काली स्वतंत्र महाशक्ति है ये शिव की प्रियतमा है।जब पार्वती से विवाह हुआ,शिव जी,पार्वती को प्रसन्न करने का कई प्रयास करते है,वही पार्वती कितने उग्र तप से शिव को मोह रही है वही काली नृत्य करती है शिव को रिझाने के लिए,कौन है यह काली,जो सीता से काली बन गई।वही काली कभी कृष्ण बन गये।वाह!क्या लीला है।जब सती ने शिव को रोकने के लिए जब दश रुप धारण किया तो प्रथम रुप काली का ही था।
सती ने आत्म दाह करने से पूर्व दश रुप प्रकट कर दश महाविद्या कहलायी,जिसमे प्रथम १.काली २.तारा ३.श्री महात्रिपुर सुन्दरी ४.भुवनेश्वरी ५.छिन्नमस्तिका ६.भैरवी ७.धूमावती ८.बगलामुखी ९.मातंगी १०.श्री कमला के नाम से विख्यात हुई,यही जब हिमालय पुत्री पार्वती बन शिव बल्लभा बनी तो ये ही नव दुर्गा रुप धारण करके जगत मे विख्यात हुई।यह ही महाविद्या तत्व है।एक पर शून्य दश निराकार,निर्गूण सभी एक ही है।एक जोड़ नौ यानि दश हो जाता है,यह ही पूर्ण रहस्य है,इसपर कभी लिखूँगा।
बिना शक्ति कृपा संसार मे कुछ नही हो सकता,शक्ति के भय से इस ब्रह्माण्ड मे सभी आसुरी प्रवृति वाले थर थर काँपते है,शक्ति का इशारा है,घोषणा है कि शिव की तरफ,राम की तरफ,कृष्ण की ओर भक्त, सज्जन,संतो की ओर टेढ़ी नजर से भी देखोगे तो सिर मुण्डन कर दूँगी,इस जगत मे रहना है तो अपने कर्मो को सही मार्ग पर ले जा,शिव,राम,हरि,सता समझ ये सभी एक ही है।विष्णु मोहिनी रुप बना कर भागते तो शिव सुध बुध खोकर अपनी प्रेममयी लीला का विस्तार किये तो ही हनुमान जी हमारे बीच आ पाये।
विष्णु श्याम वर्ण है,वह नारी रुप धारण किये वही काली विष्णु की योगनिद्रा है।कृष्ण के रास मंडल मे शिव भी नारी रुप धारण करते है वही सीता काली रुप धारण करती है।यह सभी परम कृपालु और इनकी यह गोपनीय रहस्य है।जब हम सत्य पथ पर चलेंगे तो पहले गुरु,गणेश, हनुमान.भैरव पहले इनकी कृपा चाहिए तभी
👍4❤1🙏1
सदगुरु,शिव,जगदम्बा,हरि पूर्ण कृपा करेंगे,तभी हमे मोक्ष,ज्ञान तथा ब्रह्म की प्राप्ती होंगी।हम जैसे भी जी रहे है,कोई बात नही परन्तु हमारी चेतना हमे हमेशा उस दिव्य विचारों से अपने कर्मो को सत्य पथ पर ले जाने हेतु हमे हमेशा पथ प्रदर्शक की तरह प्रयत्नशील रखे ये ही हमारा धर्म होना चाहिए।
👍4
हनुमान जी की भूख इतनी प्रबल है कि जब वे अशोक वाटिका में श्री सीता जी के पास गए तब उन्होंने यह नही कहा कि मुझे भूख लगी है , अपितु कहा कि -
" सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा।"
अति भूख भी नहीं ,अपितु अतिसय भूख शब्द का प्रयोग किया । माँ ने पूछा - यह भूख के साथ अतिशय का क्या अर्थ? तो हनुमान जी ने कहा माँ! सत्य तो यह है कि मैं जन्मजात भूखा हूँ ।
इस संदर्भ में बडी प्रसिद्ध कथा है, जब हनुमान जी का जन्म हुआ तो लाल लाल सूर्य दिखाई पडा और हनुमान जी ने उसको फल समझकर खा लिया। प्रश्न यह है कि क्या सचमुच हनुमानजी इतने नासमझ थे कि उन्होंने सूर्य को फल समझ लिया ? और जिस पर्वत पर हनुमान जी थे क्या उसके आसपास फलों के वृक्ष नहीं थे ?
यद्यपि पर्वत पर तो अनेकानेक फल युक्त वृक्ष थे और यदि उनका फल तोड़ना चाहते तो यह बात ठीक होती । पर इसके स्थान प्रेस सूर्य रूपी फल को खाने के लिए उन्हें कितनी लम्बी छलाँग क्यों लगाना पड़ी ? यदि विचार करके देखें तो हमें स्पष्ट प्रतीत होगा कि जिसने एक छलाँग लगाकर सूर्य को मुँह में धारण कर लिया हो वे हनुमान जी कितने विलक्षण हैं और उनकी भूख कोई साधारण नहीं है।
इतना ही नहीं फल खाने पर इंद्र ने वज्र से उन पर प्रहार भी कर दिया , तथा हनुमान जी को मूर्छित होना पडा। पर जब बाद में पवन देवता के द्वारा प्राण - वायु की गति रुकने लगी तो फिर सारे देवताओं ने क्षमा- याचना की तथा हनुमान जी को वरदान दिये । हनुमानजी द्वारा इस प्रकार कार्य करने का तात्पर्य क्या है?इस पर थोड़ा विचार कर लिया जाय।
वस्तुत: श्री हनुमानजी ने किसी भ्रम के कारण सूर्य को फल नहीं समझा था।' फल' के बारे में हम पढ़ते ही हैं अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष से चार फल माने जाते हैं । हनुमानजी यदि चाहते तो उन्हें 'अर्थ 'का फल उन्हें सरलता से प्राप्त हो जाता । काम तथा धर्म का फल भी वे प्राप्त कर लेते । परन्तु पास वाले फलों की ओर हनुमान जी मे हाथ नहीं बढ़ाया , इसका अर्थ है कि उन्हे ज्ञान की भूख है, प्रकाश की भूख है। संसार की वस्तुओं की भूख उनके जीवन में नहीं है , वे तो केवल चरम फल के लिए छलाँग लगाते हैं।
श्री हनुमानजी सचमुच छलाँग लगाना जानते हैं। उनकी प्रत्येक छलाँग अनोखी है। जब उनकी पहली छलाँग तो सूर्य तक पहुंच गए। दूसरी छलाँग लंका की दिशा में लगाई तो श्री सीताजी तक पहुंच गये। तीसरी छलॉंग में लक्ष्मण जी के लिए दवा लेने द्रोणाचल पर्वत पर पहुंच गए और चौथी छलॉंग लगी तो लंका से सीधे अयोध्या पहुंच गये।
हमारे लिए तो सीढी से चढ़ना ही उपादेय है । व्यक्ति यदि यह सोचे कि मुझे अर्थ, धर्म तथा काम का फल नहीं चाहिए , मुझे तो केवल मोक्ष चाहिये यह उचित नहीं हैं ।साधारण व्यक्ति श्री हनुमान जी का अनुसरण करके छलाँग तो लगा दे , पर अगर छलॉंग सही न लगी तो वह नीचे भी गिर जाएगा।
इसलिये हनुमान जी की भूख मानें," सुमति- छुधा" अर्थात् ज्ञान तथा प्रकाश की भूख।
हनुमान जी ने सूर्य को मुख में धारण कर लिया इसका भी अर्थ दूसरा था।हमारे पुराणों में कथा आती है कि ठीक उसी समय सूर्य ग्रहण लगने वाला था । समय पाकर ग्रहण लगता है और सूर्य का प्रकाश छिप जाता है ।इसका अर्थ है कि सूर्य के साथ भी राहु की समस्या है । यह राह मात्सर्य तथा ईर्ष्या वृत्ति का परिचायक है ।
वर्णन आता है कि राहु का रंग है काला और सूर्य का उज्वल। राहु यह चेष्टा करता है कि भले ही हम ज्ञान (सूर्य) को सदा के लिए न मिटा सकें पर थोड़े समय के लिए इसे ग्रस कर अंधेरा तो अवश्य फैला सकते हैं ।
हनुमान जी के जन्म के समय जब राहु सूर्य की ओर बढ रहा था उसी समय हनुमान जी छलाँग लगाकर पहुँचे और उन्होंने सूर्य को मुँह मे धारण कर लिया । लोगों को लगा कि उन्होंने सूर्य को खा लिया पर विवेकी व्यक्ति समझ गये कि खा नहीं लिया अपितु राहु के द्वारा खाए जाने से सूर्य को बचा लिया , क्योंकि हनुमान जी अगर मुख में न लेते तो राहु मुख में ले लेता।
श्री हनुमान जी ज्ञान का फल मुख में धारण करते हैं , इसका सीधा सा तात्पर्य है कि जब वेदमंत्रों तथा श्लोकों का पाठ किया जाएगा तो मुख से ही तो किया जाएगा। इसलिये कहा जा सकता है कि मुख का जितना बढिया उपयोग करना श्री हनुमान जी जानते हैं , दूसरा भला क्या जानेगा।जिन्होंने जन्म लेते ही सूर्य को मुख मे धारण कर लिया।
जब दूसरी छलाँग लगाने लगे तो उस समय भगवान श्रीराम ने मुद्रिका दी और प्रभु - मुद्रिका लेते ही--
" प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं"
उसे मुख में धारण कर लेते है।इसका अभिप्राय क्या है कि सूर्य को भी मुख में धारण करते हैं और ' राम -नाम' को भी मुख में धारण कर लेते है। तात्पर्य यह है कि हनुमान जी महाराज ज्ञान (सूर्य) और भक्ति( रामनाम अंकित मुद्रिका) दोनों को मुख मे धारण करते है। मुख का इससे अच्छा सदुपयोग और क्या हो सकता है।।
जय हनुमान
" सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा।"
अति भूख भी नहीं ,अपितु अतिसय भूख शब्द का प्रयोग किया । माँ ने पूछा - यह भूख के साथ अतिशय का क्या अर्थ? तो हनुमान जी ने कहा माँ! सत्य तो यह है कि मैं जन्मजात भूखा हूँ ।
इस संदर्भ में बडी प्रसिद्ध कथा है, जब हनुमान जी का जन्म हुआ तो लाल लाल सूर्य दिखाई पडा और हनुमान जी ने उसको फल समझकर खा लिया। प्रश्न यह है कि क्या सचमुच हनुमानजी इतने नासमझ थे कि उन्होंने सूर्य को फल समझ लिया ? और जिस पर्वत पर हनुमान जी थे क्या उसके आसपास फलों के वृक्ष नहीं थे ?
यद्यपि पर्वत पर तो अनेकानेक फल युक्त वृक्ष थे और यदि उनका फल तोड़ना चाहते तो यह बात ठीक होती । पर इसके स्थान प्रेस सूर्य रूपी फल को खाने के लिए उन्हें कितनी लम्बी छलाँग क्यों लगाना पड़ी ? यदि विचार करके देखें तो हमें स्पष्ट प्रतीत होगा कि जिसने एक छलाँग लगाकर सूर्य को मुँह में धारण कर लिया हो वे हनुमान जी कितने विलक्षण हैं और उनकी भूख कोई साधारण नहीं है।
इतना ही नहीं फल खाने पर इंद्र ने वज्र से उन पर प्रहार भी कर दिया , तथा हनुमान जी को मूर्छित होना पडा। पर जब बाद में पवन देवता के द्वारा प्राण - वायु की गति रुकने लगी तो फिर सारे देवताओं ने क्षमा- याचना की तथा हनुमान जी को वरदान दिये । हनुमानजी द्वारा इस प्रकार कार्य करने का तात्पर्य क्या है?इस पर थोड़ा विचार कर लिया जाय।
वस्तुत: श्री हनुमानजी ने किसी भ्रम के कारण सूर्य को फल नहीं समझा था।' फल' के बारे में हम पढ़ते ही हैं अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष से चार फल माने जाते हैं । हनुमानजी यदि चाहते तो उन्हें 'अर्थ 'का फल उन्हें सरलता से प्राप्त हो जाता । काम तथा धर्म का फल भी वे प्राप्त कर लेते । परन्तु पास वाले फलों की ओर हनुमान जी मे हाथ नहीं बढ़ाया , इसका अर्थ है कि उन्हे ज्ञान की भूख है, प्रकाश की भूख है। संसार की वस्तुओं की भूख उनके जीवन में नहीं है , वे तो केवल चरम फल के लिए छलाँग लगाते हैं।
श्री हनुमानजी सचमुच छलाँग लगाना जानते हैं। उनकी प्रत्येक छलाँग अनोखी है। जब उनकी पहली छलाँग तो सूर्य तक पहुंच गए। दूसरी छलाँग लंका की दिशा में लगाई तो श्री सीताजी तक पहुंच गये। तीसरी छलॉंग में लक्ष्मण जी के लिए दवा लेने द्रोणाचल पर्वत पर पहुंच गए और चौथी छलॉंग लगी तो लंका से सीधे अयोध्या पहुंच गये।
हमारे लिए तो सीढी से चढ़ना ही उपादेय है । व्यक्ति यदि यह सोचे कि मुझे अर्थ, धर्म तथा काम का फल नहीं चाहिए , मुझे तो केवल मोक्ष चाहिये यह उचित नहीं हैं ।साधारण व्यक्ति श्री हनुमान जी का अनुसरण करके छलाँग तो लगा दे , पर अगर छलॉंग सही न लगी तो वह नीचे भी गिर जाएगा।
इसलिये हनुमान जी की भूख मानें," सुमति- छुधा" अर्थात् ज्ञान तथा प्रकाश की भूख।
हनुमान जी ने सूर्य को मुख में धारण कर लिया इसका भी अर्थ दूसरा था।हमारे पुराणों में कथा आती है कि ठीक उसी समय सूर्य ग्रहण लगने वाला था । समय पाकर ग्रहण लगता है और सूर्य का प्रकाश छिप जाता है ।इसका अर्थ है कि सूर्य के साथ भी राहु की समस्या है । यह राह मात्सर्य तथा ईर्ष्या वृत्ति का परिचायक है ।
वर्णन आता है कि राहु का रंग है काला और सूर्य का उज्वल। राहु यह चेष्टा करता है कि भले ही हम ज्ञान (सूर्य) को सदा के लिए न मिटा सकें पर थोड़े समय के लिए इसे ग्रस कर अंधेरा तो अवश्य फैला सकते हैं ।
हनुमान जी के जन्म के समय जब राहु सूर्य की ओर बढ रहा था उसी समय हनुमान जी छलाँग लगाकर पहुँचे और उन्होंने सूर्य को मुँह मे धारण कर लिया । लोगों को लगा कि उन्होंने सूर्य को खा लिया पर विवेकी व्यक्ति समझ गये कि खा नहीं लिया अपितु राहु के द्वारा खाए जाने से सूर्य को बचा लिया , क्योंकि हनुमान जी अगर मुख में न लेते तो राहु मुख में ले लेता।
श्री हनुमान जी ज्ञान का फल मुख में धारण करते हैं , इसका सीधा सा तात्पर्य है कि जब वेदमंत्रों तथा श्लोकों का पाठ किया जाएगा तो मुख से ही तो किया जाएगा। इसलिये कहा जा सकता है कि मुख का जितना बढिया उपयोग करना श्री हनुमान जी जानते हैं , दूसरा भला क्या जानेगा।जिन्होंने जन्म लेते ही सूर्य को मुख मे धारण कर लिया।
जब दूसरी छलाँग लगाने लगे तो उस समय भगवान श्रीराम ने मुद्रिका दी और प्रभु - मुद्रिका लेते ही--
" प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं"
उसे मुख में धारण कर लेते है।इसका अभिप्राय क्या है कि सूर्य को भी मुख में धारण करते हैं और ' राम -नाम' को भी मुख में धारण कर लेते है। तात्पर्य यह है कि हनुमान जी महाराज ज्ञान (सूर्य) और भक्ति( रामनाम अंकित मुद्रिका) दोनों को मुख मे धारण करते है। मुख का इससे अच्छा सदुपयोग और क्या हो सकता है।।
जय हनुमान
❤17👍8🔥1