✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें।
ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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शिव ने उन्हें छोड़ दिया. दोनों को आशीर्वाद भी दिया कि अब वह इस गुफा में हमेशा शिव - पार्वती की तरह निवास करेंगे. इसी वजह से वो कबूतरों का जोड़ा वहां अब भी रहता है. हिंदू पौराणिक कथाओं में कबूतरों को देवताओं का दूत माना जाता है. उन्हें अक्सर भगवान विष्णु और भगवान शिव से जोड़ा जाता है.

*हर साल गुफा में तैयार होती है बर्फ की विशाल शिवलिंग*

वैसे ये पवित्र गुफा हर जाड़े में ऐसा शिवलिंग बर्फ से तैयार करती है, जिसका कोई जोड़ नहीं. इसे देखने के लिए हजारों लोग दूर दूर से यहां आते हैं. ये शिवलिंग बिल्कुल प्रकृति द्वारा तैयार होता है और धीरे धीरे बर्फ जब पिघलती है तो इस हिमानी शिव लिंग का भी लोप हो जाता है. इस गुफा की लंबाई (भीतर की ओर गहराई) 19 मीटर और चौड़ाई 16 मीटर है. गुफा 11 मीटर ऊंची है.

क्यों मुस्लिम गड़रिये को भी मिलता है गुफा का चढ़ावा
अमरनाथ गुफा का सबसे पहले पता सोलहवीं शदी की शुरुआत में एक मुसलमान गडरिए को चला था. आज भी चौथाई चढ़ावा उस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है. हैरानी की बात यह है कि अमरनाथ गुफा एक नहीं है बल्कि अमरावती नदी के पथ पर आगे बढ़ते समय और भी कई छोटी-बड़ी गुफाएं दिखती हैं, जो सभी बर्फ से ढकी हैं.
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*क्षमा उन पुष्पों के समान है जो कुचले जाने के बाद भी खुशबू देना बंद नहीं करती, अगर बात ज़रूरी है तो इंसान को भूल जाओ और अगर इंसान ज़रूरी है तो बात को भूल जाओ, जीवन में विचार और व्यवहार दोनों बहुत महत्व रखते हैं कभी विचार से व्यवहार बदल जाता है तो कभी व्यवहार से विचार बदल जाता है, हमारा व्यवहार कई बार हमारे ज्ञान से अधिक अच्छा साबित होता है क्योंकि जीवन में जब विषम परिस्थितियां आती हैं तब ज्ञान हार सकता है परन्तु व्यवहार से हमेशा जीत होने की संभावना रहती हैं।*
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पुरुषार्थ

जो व्यक्ति पुरुषार्थ करता रहता है वह व्यक्ति एक न एक दिन अपने जीवन में अवश्य ही सफलता प्राप्त करके ही रहता है आपने देखा होगा छोटी सी चींटी होती है वह पहाड़ के ऊपर चढ़ने का प्रयास करती है कितनी बार है ऊपर चढ़ती है कितनी बार है नीचे गिरती है फिर भी क्या कभी वह हिम्मत हारती है नहीं बिल्कुल भी नहीं हारती है जिसका परिणाम नहीं सामने आता है वह एक दिन पहाड़ पर विजय यात्रा संपन्न करके ही रहती है

जब चींटी पुरुषार्थ के द्वारा अपनी यात्रा को सफलता के साथ पूरी कर सकती है फिर बना हम क्यों नहीं कर सकते हैं थोड़ी सी कठिनाई आती है मायूस होकर बैठ जाती है इससे हमारे को कुछ भी उपलब्धि हासिल होने वाली नहीं है

समस्या हमेशा ही हमारे को संघर्ष की ओर आगे बढ़ाने वाली होती है वह हमेशा हमारे को प्रेरणा देती है तुम संघर्ष करती जो तुम्हारे भीतर के अंदर अपने आप ही एक ऐसी ज्योति प्रकट होगी जो तुम्हारे को मंजिल पर पहुंच कर प्रकाशवान बनाने वाली बन जाएगी

आज से अपने आप को इतना ज्यादा सशक्त और शक्तिशाली बनाने का प्रयास कर दे चाहे कुछ भी हो जाए जीवन के अंदर एक नहीं हजारों हजारों समस्या भी आ जाए तो भी हम कभी भी अपने कदमों को पीछे हटने का प्रयास नहीं करेंगे अभी तो और ज्यादा मजबूती के साथ आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे अंधकार के बादल है वह अपने आप ही दूर होकर रहेंगे प्रकाश का सूर्य है वह अपने आप ही पूरे भूमंडल को प्रकाशित करना प्रारंभ कर देगा तो फिर भला हम क्यों अपने आप को असहाय महसूस कर रहे हैं नहीं अब समय आ गया है हम पुरुषार्थ शक्ति को जागृत करके अपने आप को पुरस्कृत करने का प्रयास करना प्रारंभ कर दे,
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*जीवन निवृत्ति*

*मनुष्य जीवन बनाने के चक्कर में जीना ही भूल गया है। किसी वस्तु को किसी विशेष अवसर के लिए बचाकर नही रखना है क्योंकि हमारे जीवन का हर दिन एक विशेष दिन है। दूसरों के व्यवहार को बदलने के विपरीत अपने विचारों को बदलना आवश्यक है।*

*क्योंकि दूसरों के व्यवहार को बदलना हमारे अधिकार में नहीं है लेकिन अपने विचारों को बदलना हमारे अधिकार में है, और ये भी संभव है कि हमारे विचारों के बदलते ही दूसरों का व्यवहार स्वतः ही बदल जाए।*

*जीवन में यह समझना है, पांच प्रहर कर्म किया, तीन प्रहर सोए, एको प्रहर न हरि भजे, तो मुक्ति कहाँ से होय!*

*पृथ्वी पर बहुत ही तीर्थ स्थान हैं, सब तीर्थों की यात्रा मनुष्य नहीं कर सकता है, संपूर्ण नदियों में जाकर मनुष्य स्नान नहीं कर सकता है, मगर जहाँ कीर्तन होता है, हरि की कथा होती है, सत्संग होता है, वहाँ संपूर्ण तीर्थ विद्यमान होते हैं। इसलिए कहा है - अन्न का कण और सत्संग का क्षण कभी नहीं गंवाना चाहिए।*
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"संसार में जड़ वस्तुओं का मूल्य कम होता है और चेतन वस्तुओं का अधिक।" यदि आपके घर में स्कूटर कार खाना पीना वस्त्र मकान आदि सब जड़ पदार्थ पूरी मात्रा में हैं। "परंतु परिवार में माता-पिता भाई-बहन पति-पत्नी आदि चेतन व्यक्ति नहीं हैं, तो आपको ये धन संपत्ति आदि जड़ पदार्थ उतना सुख नहीं दे पाएंगे, जितना कि माता-पिता आदि चेतनों से या उनकी उपस्थिति में आपको इन जड़ पदार्थों से सुख मिलेगा।"
इससे यह सिद्ध हुआ कि "जड़ पदार्थों से उतना सुख नहीं मिलता, जितना चेतन व्यक्तियों से।" "अतः जड़ पदार्थों का मूल्य कम है, और चेतनों का अधिक। इस बात को अच्छी तरह से समझना चाहिए।"
जैसे माता-पिता आदि चेतन व्यक्ति बच्चों को फल मिठाई भोजन वस्त्र खिलौने कपड़े आदि वस्तुएं देते हैं, वे वस्तुएं जड़ पदार्थ हैं। उनका भी अपना मूल्य है। तभी बच्चे उन वस्तुओं को प्राप्त करके प्रसन्न हो जाते हैं। "परंतु वे बच्चे यह बात नहीं समझते कि इन वस्तुओं को देने वाले जो चेतन आत्मा रूप माता-पिता हैं, उनका मूल्य, इन भोजन वस्त्र खिलौने आदि जड़ पदार्थों की तुलना में अधिक है। ऐसा न समझने के कारण वे माता-पिता आदि चेतन आत्माओं को अधिक महत्व नहीं देते, उनकी सेवा नहीं करते, उनका उपकार नहीं मानते। यह अच्छी बात नहीं है।" "उचित बात तो यह है कि भौतिक पदार्थों से अधिक अपने माता-पिता गुरुजनों आदि चेतन व्यक्तियों का मूल्य अधिक समझना चाहिए, उनके साथ रहना चाहिए, उनकी सेवा करनी चाहिए, उनका आशीर्वाद लेना चाहिए, तभी आपका जीवन सफल होगा।"
"इसी प्रकार से संसार के लोग धन संपत्ति पुत्र परिवार मकान मोटर गाड़ी आदि अनेक भौतिक सुविधाओं को प्राप्त करके भी, इन सुविधाओं का मूल्य अधिक समझते हैं, और इनके देने वाले चेतन परमात्मा का मूल्य कम समझते हैं, या नहीं समझते हैं।" "जबकि इन भौतिक पदार्थों और सुविधाओं से अधिक मूल्य, इन सब पदार्थों को देने वाले ईश्वर का है।"
"इसलिए ईश्वर का मूल्य अधिक मानकर उसके साथ उचित व्यवहार करना चाहिए, और ईश्वर के अनुशासन में रहते हुए उससे और अधिक लाभ उठाना चाहिए। इसी में बुद्धिमत्ता और जीवन की सफलता है।"
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*मृत्यु और अमरता*

मृत्यु और मरने के बारे में बहुत चर्चा और बहस होती है, और हम में से अधिकांश लोग अंत से बहुत डरते हैं। क्या यह दर्दनाक होगा? क्या अंत अचानक और शांतिपूर्ण होगा या हिंसक? क्या मैं अस्पताल में बीमार, जीवन रक्षक प्रणाली के साथ जीऊँगा? क्या मैं अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को पूरा कर पाऊँगा? मेरे जाने के बाद मेरे प्रियजनों का क्या होगा? इस डर ने एक पूरे उद्योग को जन्म दिया है जो एंटी-एजिंग और दीर्घायु उत्पादों और प्रथाओं को बेचता है, जिनमें से कुछ की कीमत कुछ भी नहीं है और अन्य बहुत महंगे हैं। तो क्या होता है? क्या जीवनशैली में बदलाव करके जीवन को लम्बा करने का मतलब यह है कि हम अब डर में नहीं रहते?*

हकीकत में, हममें से ज़्यादातर लोग जीने से उतने ही डरते हैं, जितने मौत से। क्या होगा अगर मैं लंबे समय तक जीऊँ, कमज़ोर और विकलांग हो जाऊँ, और क्या होगा अगर मैं अपने भरण-पोषण और रोज़मर्रा के कामों के लिए पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाऊँ? क्या होगा अगर मैं लंबे समय तक जीऊँ लेकिन मेरे जीवन की गुणवत्ता बहुत खराब हो? जीने के इस तरह के डर को एपीरोफोबिया कहा जाता है, "अस्तित्व के तीव्र डर की विशेषता, जो अक्सर अनंत जीवन के बारे में अस्तित्वगत भय से जुड़ा होता है... चिंता विकारों से जुड़ा होता है।"*

जब आप जीवन के अर्थ और उद्देश्य तथा वास्तविकता की प्रकृति के बारे में सोचते हैं, तो आप अस्तित्वगत पीड़ा में होते हैं। लंबी उम्र जीने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि आप जीवन के निरंतर भय में जीते हैं। आप हर दिन हज़ारों बार मरते हैं। जो लोग मृत्यु के भय में जीते हैं, उनके भय को थानाटोफोबिया कहा जाता है - आपको घबराहट के दौरे पड़ सकते हैं, यह सोचकर कि आप कैसे और कब मर सकते हैं, आपके मरने के बाद क्या हो सकता है, मृत्यु के बाद क्या है वगैरह।*

दोनों ही फ़ोबिया में अंतर्निहित प्रमुख कारक लंबे समय तक जीने की अनिश्चितता और मृत्यु के बाद क्या होगा, इस रहस्य या अनिश्चितता को लेकर निरंतर चिंता है। जीवन और मृत्यु दोनों में दर्द और पीड़ा शामिल हो सकती है - कुछ के लिए कम, दूसरों के लिए ज़्यादा।*

आज बहुत से लोग लंबी उम्र के पीछे पागल हैं; अपनी उम्र बढ़ाने के लिए।*

विशेषज्ञों का कहना है कि लंबी उम्र के बजाय अच्छे स्वास्थ्य को लक्ष्य बनाना अधिक व्यावहारिक होगा, क्योंकि इससे गतिशीलता कम हो सकती है और बीमारियाँ बढ़ सकती हैं। एपीरोफोबिया से पीड़ित लोग सोचते हैं कि क्या वे अपने बच्चों पर बोझ बन जाएँगे।*

हिंदू पौराणिक कथाओं में ऐसे उदाहरण हैं, जहाँ लोग अमरता का वरदान पाने के लिए तपस्या करते हैं या फिर चिरंजीवी कहलाते हैं, जो कलियुग के अंत तक जीवित रहते हैं। आठ अमर देवता हनुमान, अश्वत्थामा, परशुराम, महाबली, व्यास, विभीषण, कृपा और मार्कंडेय हैं।*

ग्रीक पौराणिक कथाओं में, देवी सेलेना, जो एक खूबसूरत चरवाहे एंडीमियन से पहली नज़र में प्यार कर बैठी थी, ने ज़ीउस से उसे अमरता का वरदान देने के लिए कहा। ज़ीउस ने उसकी इच्छा पूरी कर दी, लेकिन एंडीमियन को हमेशा की तरह सुंदर और होठों पर मुस्कान के साथ सोते रहने दिया। कहा जाता है कि क्रिया योग गुरु महावतार बाबाजी पिछले 5,000 वर्षों से जीवित हैं। हिमालय में ध्यान करने वाले साधकों द्वारा वर्षों से बाबाजी के शारीरिक दर्शन की सूचना दी गई है।*

माना जाता है कि चिरंजीवियों के आठ नामों के साथ एक श्लोक का जाप करने से व्यक्ति को लंबी आयु, बीमारी से मुक्ति और कम से कम सौ साल तक जीने की प्राप्ति होती है। जीवन के अमृत की खोज हजारों सालों से जारी है। लेकिन, अमर होना एक उपहार है या अभिशाप? इस पर अभी भी बहस जारी है।*
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एक धीमी मौत (a slow death)

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आपः

करते नहीं कोई यात्रा,
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
करते नहीं किसी की तारीफ़।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आपः

मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,
नहीं करने देते मदद अपनी और
न ही करते हैं मदद दूसरों की।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं. अगर आपः

बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज वाले रास्तों पे,
नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,
नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग,
या आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आपः

नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को,
और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को,
वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें,
और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को।

नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को,
जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
अगर आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,

अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,
अगर आप नहीं देते हों इजाजत खुद को,
अपने जीवन में कम से कम एक बार,
किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की।

तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं..

By मार्था मेडेइरोस
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*प्रसंग -*
*आगे चले बहुरि रघुराया।*
*रिष्यमूक पर्वत नियराया।।*

*संसार और समुद्र*

*समुद्र कभी शांत नहीं रहता, उथल-पुथल मची ही रहती है। कभी लहरें आकाश छूती हुई दिखाई देती हैं, कभी लहरें पाताल में जाती हुई दिखाई देती हैं। उथल-पुथल बराबर मची रहती है और संसार में भी उथल-पुथल मची रहती है। कभी ऊपर कभी नीचे, कब कौन नीचे वाला ऊपर हो जाय, कब ऊपर वाला नीचे हो जाय।*

*एक सज्जन मिले, बड़े विनोदी स्वभाव के। उन्होंने कहा कि महाराज! हम आपको दो पंक्तियों की कविता सुनाते हैं। तो हमने कहा -- दो पंक्तियों की? सुनाओ, दोहा तो सुना है हमने। बोले -- तब दो पंक्तियों की कविता सुनो, और पंक्ति बदली नहीं है, बस शब्द इधर के उधर किए हैं। तो हमको भी आश्चर्य हुआ, लेकिन उसने ऐसी बात कही कि देखो उसने दो पंक्तियों में क्या बात कह दी? बोला --*

*कैसे कैसे ऐसे वैसे हो गये।*
*ऐसे वैसे कैसे कैसे हो गये।।*

*यही मचा रहता है।*

*मसकहि करहिं विरंचि प्रभु।*
*अजहि मसक ते हीन।*

*यह सब भगवान की लीला है।*

*तू शाहों को गदा कर दे,*
*गदा को बादशाह कर दे।*
*घटाने और बढ़ाने में,*
*इशारा तेरा काफ़ी है।।*

*यह उथल-पुथल मची रहती है। भक्त के जीवन में भी होता है। भक्त क्या सोचता है?*

*ऊपर उड़े या नीचे आवे।*
*रे मन मेरे क्यों घबरावे।।*
*वही गिरावे वही उठावे।*
*श्रीहरि खेल रहे तेरे संग, डोरी राम जी के हाथ।*
*यह जीवन एक पतंग, डोरी राम जी के हाथ।।*

*उथल-पुथल मची ही रहती है।*

*इस संसार की गतिविधियों पर,*
*नहीं अधिकार किसी का है।*
*जिसको हम परमात्मा कहते,*
*यह सब खेल उसी का है।।*

*निर्धन धनी धनी हो निर्धन,*
*ज्ञानी मूढ़ मूरख ज्ञानी।*
*सब कुछ अदल बदल देने में,*
*कोई नहीं उसकी सानी।।*

*समझदार भी समझ सके ना,*
*ऐसा अजब तरीका है।*
*जिसको हम परमात्मा कहते,*
*यह सब खेल उसी का है।।*

*समुद्र में भी उथल-पुथल, कभी लहरें ऊंचे कभी नीचे और संसार में भी उथल-पुथल। अच्छा एक और बात है, यह समुद्र की उथल-पुथल का सम्बन्ध चन्द्रमा से है। चन्द्रमा के हिसाब से उथल-पुथल रहती है। चन्द्र पूर्ण हो जाय तो समुद्र में ज्वार आ जाता है, चन्द्र घटने लगता है तो समुद्र में भाटा आने लगता है, घटने लगता है।*

*संसार की उथल-पुथल का सम्बन्ध मन से है। मन से देवता, चन्द्रमा मनसो जात:। मनयो मनुष्याणां कारणं बंद्य मोक्षयो। विचार करके देखो प्यारे जगत बना है मन से। इसलिए भी संसार समुद्र है।*

*अच्छा एक और बात है।••• क्या? •• समुद्र के साथ एक समस्या है। •••क्या? ••• इसका जल इतना सुन्दर दिखाई देता है, श्यामल नील वर्ण, स्वच्छ, लेकिन समुद्र का जल दिखने में जितना सुन्दर है, स्वाद में वैसा नहीं है। दिखता सुंदर है, इसलिए बार-बार धोखा होता है कि शायद स्वाद में भी वैसा ही हो। सुन्दर देखकर जैसे ही पान करने की चेष्टा करते हैं तो इतना खारा है कि मुख में रखना मुश्किल है।*

*दिखने में सुंदर पर स्वाद में वैसा नहीं है और संसार भी ऐसा ही है। जैसा दिखने में है, अनुभव में वैसा नहीं है। इसलिए संसार समुद्र कहा गया। उनसे पूछो जो विचारे सांसारिक जीवन जी रहे हैं।*
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कौरवों की सभा मे
श्रीकृष्ण का विराट रूप🕉️

‘दो न्याय अगर तो आधा दो,
पर,इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका,
आशीष समाज की ले न सका,
उलटे,हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य,साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ,हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख,गगन मुझमें लय है,
यह देख,पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव,जग,क्षर-अक्षर,
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित,सर,सिन्धु मन्द्र।

शत कोटि विष्णु,ब्रह्मा,महेश,
शत कोटि जिष्णु,जलपति,धनेश,
शत कोटि रुद्र,शत कोटि काल,
शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

‘भूलोक,अतल,पाताल देख,
गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि-सृजन,
यह देख,महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान,इसमें कहाँ तू है।

‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख,
पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,
मेरा स्वरूप विकराल देख।
सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।

‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,
साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,
हँसने लगती है सृष्टि उधर!
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,
छा जाता चारों ओर मरण।

‘बाँधने मुझे तो आया है,
जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,
पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?

‘हित-वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,
विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।

‘भाई पर भाई टूटेंगे,
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।’

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,
चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे,
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित,निर्भय,
दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!
#राष्ट्रकवि_श्रीरामधारी_सिंह
"#दिनकर"

जयश्रीराम
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🕉️ शतहस्त समाहर सहस्त्रहस्त सं किर।
कृतस्य कार्यस्य चेह स्फातिं समावह।।
(अथर्ववेद)
भावार्थ: अपने अध्यवसाय और दूसरों से सलाह लेकर हे मनुष्यों! सैकडों हाथों से खूब धन कमाओं और हजारों हाथों से उसे उत्तम कार्यों में प्रसारित करो। इससे सदैव तुम्हारी उन्नति बनी रहेगी।
संदेश: धनोपार्जन की महत्ता को वेद ने भी स्वीकार किया है। मनुष्य केवल अपने दो हाथों से एकाकी ही कार्य न करें वरन समाज के अन्य वर्गों का भी सहयोग लेकर सैकडों हाथों से कमाए। उसे अपनी सारी प्रतिभा, क्षमता और पुरूषार्थ अधिकाधिक धन कमाने में लगाना चाहिए।
किसलिए यह सब करें? क्या स्वयं अपने उपभोग के लिए? नहीं! संसार में जो भी धन संपत्ति है वह सब प्रजापति की है, परमपिता परमेश्वर की है। हमारे अध्यवसाय और पुरूषार्थ से जो हमें प्राप्त होती है वह भी उस भगवान की है। उसी ने कृपापूर्वक हमें उसका टृस्टी नियुक्त किया है। अपनी उचित आवश्यकताओं की पूर्ति के अतिरिक्त हमें अधिक लेने का कोई अधिकार नहीं है। वह सब धन हमें पुनः समाज में वापस पहुंचा देना चाहिए। हजार हाथों से उसे लोकहित के उत्तम कार्यों में व्यय कर देना चाहिए। कमाया हुआ धन तो थोडे समय तक ही हमें लाभ देता है पर दान देने से जो यश प्राप्त होता है वह जन्म जन्मांतरो तक सुख प्रदान करने में समर्थ होता है। जिस प्रकार खेत में बोने से एक दाना हजार दानों के रूप में हमें प्राप्त होता है उसी प्रकार शुभ कार्यों हेतु दिया गया दान असंख्य गुना बढकर हमें यश व सौभाग्य प्रदान करता है।
शास्त्रों में धन के प्रयोग के बारे में स्पष्ट रूप से कहा है 'धर्माय यशसेऽर्थाय आत्मने स्वजनाय च'। जो धन ईमानदारी से कमाया है उसके पांच भाग कर दो- धर्म के लिए, यश के लिए, अर्थ के लिए, स्वयं के लिए और स्वजनों के लिए। सबसे पहले धर्म का भाग निकालना होता है। धर्म के लिए दान का अर्थ है- गुप्तदान। किसी को पता भी न चले और शुभ कार्य के लिए उचित पात्र को दे दें। यश के लिए दान का अर्थ है अस्पताल बनबाना, धर्मशाला बनबाना, छात्रवृति देना, पेड़ लगवाना आदि। दुर्घटना या दैवी विपदा में लोगों की जी जान से सहायता करना। तीसरा भाग अर्थ के लिए है अर्थात अर्थोपार्जन में, धन को बढाने में उसे काम धंधे में लगाना, व्यापार में, खेती बाडी में लगाना। चौथा भाग स्वयं अपने लिए व पांचवा भाग स्वजन संबंधियों के लिए है। इसी से रोटी कपडा और मकान की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करें और सुख सुविधाओं के सरंजाम भी जुटाएं।
इस प्रकार शास्त्रों ने दान को सर्वाधिक महत्व प्रदान किया है। इसी से परमेश्वर के अनुदान वरदान की हम पर सतत वर्षा होती रहती है। दान से सभी प्राणी वश में हो जाते हैं और शत्रुता का भी नाश हो जाता है। धन, ज्ञान, शक्ति, प्रसन्नता जो भी संभव हो दूसरों में बांटते रहो। मनुष्य के पास देने को कितना कुछ है- प्रेम का सागर है, हंसी के फूल हैं। इन्हे भी बांटो, स्वयं खिलो और दूसरों को भी खिलाते चलो।
मनुष्य को ईमानदारी और पुरूषार्थ से यथासंभव कमाना चाहिए और सत्कर्मो में उसका उपयोग करना चाहिए।
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कहानी का समय

*मृत्यु सत्य है*


जीवन में एक ही वस्तु बहुमूल्य है और वो है जीवन के प्रति जागरूकता। जागरूक व्यक्ति जीवन को सहज ढंग से जी पाता है और वक्त आने पर मृत्यु का भी स्वागत करता है।

एक चतुर व्यक्ति को काल से बहुत डर लगता था, और वह सोचता था कि मेरी किसी भी क्षण मृत्यु हो सकती है। वह क्या करे?

एक दिन उसे चतुराई सूझी और काल को ही अपना मित्र बना लिया। उसने अपने मित्र काल से कहा- मित्र, तुम किसी को भी नहीं छोड़ते हो, किसी दिन मुझे भी गाल में धर लोगो!

काल ने कहा- ये मृत्यु लोक है. जो आया है उसे मरना ही है; सृष्टि का यह शाश्वत नियम है, इसलिए मैं मजबूर हूं, पर तुम मित्र हो इसलिए मैं जितनी सहायता कर सकता हूं करूंगा ही, मुझसे क्या आशा रखते हो, साफ-साफ कहो।

व्यक्ति ने कहा- मित्र मैं इतना ही चाहता हूं कि आप मुझे अपने लोक ले जाने के लिए आने से कुछ दिन पहले एक पत्र अवश्य लिख देना ताकि मैं अपने बाल-बच्चों को कारोबार की सभी बातें अच्छी तरह से समझा दूं और स्वयं भी भगवान भजन में लग जाऊं।

काल ने प्रेम से कहा- यह कौन सी बड़ी बात है, मैं एक नहीं आपको चार पत्र भेज दूंगा, चिंता मत करो चारों पत्रों के बीच समय भी अच्छा खासा दूंगा ताकि तुम सचेत होकर काम निपटा लो।

वह व्यक्ति बड़ा ही प्रसन्न हुआ। सोचने लगा कि आज से मेरे मन से काल का भय भी निकल गया, मैं जाने से पूर्व अपने सभी कार्य पूर्ण करके जाऊंगा तो देवता भी मेरा स्वागत करेंगे।

दिन बीतते गये आखिर मृत्यु की घड़ी आ पहुंची *काल* अपने दूतों सहित उसके समीप आकर बोला- "मित्र अब समय पूरा हुआ मेरे साथ चलिए मैं सत्यता और दृढ़तापूर्वक अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए एक क्षण भी तुम्हें और यहां नहीं छोड़ूंगा।"

उस व्यक्ति के माथे पर बल पड़ गए, भृकुटी तन गयी और कहने लगा- "धिक्कार है तुम्हारे जैसे मित्रों पर! मेरे साथ विश्वासघात करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती"? "तुमने मुझे वचन दिया था कि आने से पहले पत्र लिखूंगा। परंतु तुम तो बिना किसी सूचना के अचानक दूतों सहित मेरे ऊपर चढ़ आए। मित्रता तो दूर रही तुमने अपने वचनों को भी नहीं निभाया।

काल हंसा और बोला- "मित्र इतना झूठ तो न बोलो। मैंने आपको एक नहीं चार पत्र भेजे आपने एक भी उत्तर नहीं दिया।

उस व्यक्ति ने चौंककर पूछा– "कौन से पत्र? कोई प्रमाण है? मुझे पत्र प्राप्त होने की कोई डाक रसीद आपके पास है तो दिखाओ।"

काल ने कहा– मित्र, घबराओ नहीं, मेरे चारों पत्र इस समय आपके पास मौजूद हैं।

मेरा पहला पत्र आपके सिर पर चढ़कर बोला, आपके काले सुन्दर बाल, उन्हें सफ़ेद कर दिया और यह भी कहा कि सावधान हो जाओ, जो करना है कर डालो। लेकिन आपने बनावटी रंग लगा कर आपने अपने बालों को फिर से काला कर लिया और पुनः जवान बनने के सपनों में खो गए आज तक मेरे श्वेत अक्षर आपके सिर पर लिखे हुए हैं।

कुछ दिन बाद मैंने दूसरा पत्र आपके नेत्रों के प्रति भेजा. नेत्रों की ज्योति मंद होने लगी। फिर भी आंखों पर मोटे शीशे चढ़ा कर आप जगत को देखने का प्रयत्न करने लगे, दो मिनट भी संसार की ओर से आंखे बंद करके, ज्योतिस्वरूप प्रभु का ध्यान मन में नहीं किया।

इतने पर भी सावधान नहीं हुए तो मुझे आपकी दीनदशा पर बहुत तरस आया और मित्रता के नाते मैंने *तीसरा पत्र* भी भेजा।

इस पत्र ने आपके दांतो को छुआ, हिलाया और तोड़ दिया। आपने इस पत्र का भी जवाब न दिया बल्कि नकली दांत लगवाये और जबरदस्ती संसार के भौतिक पदार्थों का स्वाद लेने लगे।

मुझे बहुत दुःख हुआ कि मैं सदा इसके भले की सोचता हूँ और यह हर बार एक नया, बनावटी रास्ता अपनाने को तैयार रहता है।

अपने *अन्तिम पत्र* के रूप में मैंने रोग- क्लेश तथा पीड़ाओं को भेजा परन्तु आपने अहंकार वश सब अनसुना कर दिया।

वह व्यक्ति काल के भेजे हुए इन पत्रों को सुन कर फूट-फूट कर रोने लगा और अपने विपरीत कर्मों पर पश्चाताप करने लगा। उसने स्वीकार किया कि मैंने बेसुधी में शुभ चेतावनी भरे इन पत्रों को नहीं पढ़ा। मैं सदा यही सोचता रहा कि कल से भगवान का भजन करूंगा, अपनी कमाई अच्छे शुभ कार्यो में लगाऊंगा, पर वह कल ही नहीं आया।

काल ने कहा– "आज तक तुमने जो कुछ भी किया, राग-रंग, स्वार्थ और भोगों के लिए जान-बूझकर ईश्वरीय नियमों को तोड़कर तुमने कर्म किये"।

उस व्यक्ति को जब कोई मार्ग दिखाई नहीं दिया तो उसने काल को करोड़ों की सम्पत्ति का लोभ दिखाया। काल ने हंसकर कहा- "मित्र यह मेरे लिए धूल से अधिक कुछ भी नहीं है। धन-दौलत, शोहरत, सत्ता ये सब लोभ संसारी लोगों को वश में कर सकता है मुझे नहीं"।

काल ने उत्तर दिया- यदि तुम मुझे लुभाना ही चाहते थे तो सच्चाई और शुभ कर्मों का धन संग्रह करते यह ऐसा धन है जिसके आगे मैं विवश हो सकता था, अपने निर्णय पर पुनर्विचार को बाध्य हो सकता था पर तुम्हारे पास तो यह धन धेले भर का भी नहीं है। तुम्हारे ये सारे रूपए-पैसे, जमीन-जायदाद, तिजोरी में जमा धन-संपत्ति सब यहीं छूट जाएगा,
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मेरे साथ तुम भी उसी प्रकार निर्वस्त्र जाओगे जैसे कोई भिखारी की आत्मा जाती है।

काल ने जब मनुष्य की एक भी बात नहीं सुनी तो वह हाय-हाय करके रोने लगा। सभी सम्बन्धियों को पुकारा परन्तु काल ने उसके प्राण पकड़ लिए और चल पड़ा अपने गन्तव्य की ओर।

*शिक्षा:-*
एक ही सत्य है, जो अटल है वह है कि हम एक दिन मरेेंगे जरूर, हम जीवन में कितनी दौलत जमा करेंगे, कितनी शोहरत पाएंगे, कैसी संतान होगी यह सब अनिश्चित होता है, समय के गर्भ में छुपा होता है। परंतु हम मरेंगे एक दिन बस यही एक ही बात जन्म के साथ ही तय हो जाती है। समय के साथ उम्र की निशानियों को देख कर तो कम से कम हमें प्रभु परमेश्वर की याद में रहने का अभ्यास करना चाहिए। इसमें तो हर एक को चाहे छोटा हो या बड़ा सब को प्रभु परमेश्वर की याद में रहकर ही कर्म करने चाहियें।
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।। नमो राघवाय ।।

राम त्वमेव भुवनानि विधाय तेषां
संरक्षणाय सुरमानुषतिर्यगादीन्।
देहान् बिभर्षि न च देहगुणैर्विलिप्तस्-
त्वत्तो बिभेत्यखिलमोहकरी च माया।।

भावार्थ-
हे राम ! इन सम्पूर्ण भुवनों की रचना करके आप ही इनकी रक्षा के लिए देवता, मनुष्य और तिर्यगादि योनियों में शरीर धारण करते हैं, तथापि देह के गुणों से आप लिप्त नहीं होते। सम्पूर्ण संसार को मोहित करने वाली माया भी आपसे सदा डरती रहती है।
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🕉️ अस्मभ्यं तद्वसो दानाय राधः समर्थयस्व बहु ते वसव्यम्
इन्द्र यच्चित्रं श्रवस्या अनु द्यून्बृहद्वदेम विदथे सुवीराः।।
( ऋग्वेद )
भावार्थ: न्याय और परिश्रम की कमाई ही मनुष्य को सुख देती, फलती-फूलती और मन को प्रसन्न रखती है। इससे आत्मा निर्मल व पवित्र रहता है, पौरूष बढता है और सत्कर्मों की प्रेरणा मिलती है। चोरी, छल व कपट से कमाया हुआ धन सदैव दुख देता है।
संदेश: जीवन में धन के महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता। एक निश्चित सीमा के अंदर वह मनुष्य और समाज के विकास के लिए आवश्यक है, पर सीमा का अतिक्रमण होने पर वह 'अर्थ' से 'अनर्थ' बन जाता है और विकास के स्थान पर विनाश का, शोषण और संघर्ष का कारण बनता है। धन जब तक धर्म की सीमा में रहता है उसे 'अर्थ' कहते हैं और अधर्म के क्षेत्र में पहुंचते ही वह 'अनर्थ' बन जाता है।
यह सत्य है कि आज हम भौतिक विकास के जिस स्तर पर हैं वह अद्वितीय है और उसका प्रमुख आधार धन ही है। आजकल धन का जितना महत्व है पहले कभी भी नहीं था। प्राचीनकाल में अध्यात्मवाद को ही प्राथमिकता दी जाती थी और अर्थोपार्जन दूसरे नंबर पर रहता था। आज तो बिल्कुल ही उल्टा चल रहा है। लोग धन कमाने के पीछे बुरी तरह से पागल हो रहे हैं और अध्यात्म को भूल गए हैं। पूजा पाठ का ढोंग या दिखावा करने तक का समय नहीं मिलता, वास्तविक उपासना या साधना की तो बात ही छोड़ दें। भौतिकवाद ही समाज का जीवन दर्शन बन गया है।
अध्यात्म और भौतिकता दोनों ही समाज के लिए आवश्यक हैं और दोनों में उचित सामंजस्य व संतुलन भी होना चाहिए। प्राचीनकाल में कुछ लोग अध्यात्म को ही सर्वस्व मानते थे। अध्यात्म की एक पक्षीय प्रगति से समाज को कभी भी कोई हानि नहीं हुई। केवल मनुष्य कुछ भौतिक सुविधाओं के उपयोग से ही वंचित रहा। आज भौतिकता के एकांगी विकास से हित के स्थान पर अहित ही अधिक हुआ है‌। समाज में जो भी अव्यवस्था और अराजकता है उसके मूल में अर्थ प्रधान दृष्टिकोण ही है। चोरी, डकैती, बेईमानी, झूठ, फरेब, आदि के द्वारा कमाया हुआ धन मनुष्य को हर प्रकार से बरबाद ही करता है। सर्वप्रथम तो मानसिक शांति समाप्त हो जाती है। अनीति व अन्याय से प्राप्त की हुई लक्ष्मी उसके जीवन रस को चूस लेती है।
वर्तमान अर्थव्यवस्था
नीति-अनीति में भेद नहीं करती और वैध-अवैध किसी भी प्रकार से धन संग्रह पर ही बल देती है। यही सभी सांसारिक विपत्तियों का मूल कारण है। न तो हम भौतिक प्रगति की उपेक्षा कर सकते हैं और न ही आध्यात्मिकता को नकार सकते हैं। दोनों को मिलाकर एक समन्वित दृष्टिकोण पैदा करना पडेगा। नैतिक और अनैतिक अर्थ-स्त्रोतों में स्पष्ट विभेद करना होगा। अवैध रूप से कमाए हुए धन की निंदा-भर्त्सना करनी होगी और न्याय मार्ग की सराहना।
उचित रूप से परिश्रमपूर्वक अर्जित धन मनुष्य को सुख, शांति व संतोष प्रदान करता है, उसके आत्मबल को बढाता है, आत्मा को शुद्ध, पवित्र और निर्मल बनाता है। इसी से समाज में दिव्य वातावरण बनता है।
( विस्तृत जानकारी के लिए आप सब चाणक्य की पुस्तक 'अर्थशास्त्र' का अध्ययन करें )
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"गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः,
क्षेमाय नैर्गुण्यमथो मनःस्यात्"
विषयासक्त मन जीव को सांसारिक संकट मे फँसाता है और वही मन विषय रहित होने पर जीव को शान्तिमय मोक्ष की प्राप्ति कराता है, मनुष्य का मन जो विषयासक्त हो जाए तो वह सांसारिक दुःखदाता बन जाता है, वही मन विषयासक्त होने के बदले यदि ईश्वर भजन में लीन हो जाय तो मोक्षदाता बन जाता है, विषयों का चिंतन करता हुआ मन उसमें फँस जाता है, तो उसका बंधन आत्मा अपने में मान लेती है , स्वयं पर आरोपित कर लेती है,यह सब मन की दुष्टता है। अतः मन को परमात्मा मे स्थिर करना चाहिए, महात्मा जड़भरत जी सिन्धु देश के राजा रहूगण से कहते हैं -
हे राजन ! तुम मुझसे पूछते हो कि मै कौन हूँ ?
किन्तु तुम स्वयं से पूछो कि तुम कौन हो ?
तुम शुद्ध आत्मा हो, जाग्रत , स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं का साक्षी आत्मा है। ज्ञानी जन जगत को सत्य नहीं मानते, संसार को वे मनः कल्पित मानते हैं। जगत स्वप्न जैसा है, जिस प्रकार स्वप्न मिथ्या होने पर भी मनुष्य को रुलाता है, उसी प्रकार जगत भी मनुष्य को - जीव को रुलाता है, जैसे एक मनुष्य सो जाने पर स्वप्न देखता है कि एक भयानक शेर हमला करने वाला है, तो वह मनुष्य डर जाता है कि शेर मुझे खा जायेगा, ऐसा सोचकर वह चिल्लाने और रोने लगता है, तब किसी के जगाने पर वह देखता है कि वह तो सपना था और सपने के शेर से ही वह डर गया था, किन्तु स्वप्न असत्य है , यह मनुष्य की समझ में कब आता है, केवल तब कि जब वह जाग जाता है, कौन सा व्यक्ति जागा हुआ है, विषयों से जिसका मन हट गया है, छूट गया है , वही जागा हुआ है, तुलसी दास ने भी कहा है -
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी।
परमारथी प्रपंच बियोगी॥
जानिअ तबहिं जीव जग जागा।
जब सब बिषय बिलास बिरागा॥
इस जगत् रूपी रात्रि में योगी लोग जागते हैं, जो परमार्थी हैं और प्रपंच (मायिक जगत) से छूटे हुए हैं, जगत् में जीव को जागा हुआ तभी जानना चाहिए, जब सम्पूर्ण भोग- विलासों से वैराग्य हो जाए।
ये सब मन के खेल हैं,मन को शुद्ध करने हेतु संत समागम करना चाहिए, महापुरुषों की सेवा से ब्रह्म की प्राप्ति होती है "महत्यादरजोऽभिषेकम्" बिना सत्संग के ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती--
"बिनु सतसंग बिबेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
सतसंगत मुद मंगल मूला।
सोई फल सिधि सब साधन फूला॥
सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्री रामजी की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता नहीं। सत्संगति आनंद और कल्याण की जड़ है। सत्संग की सिद्धि (प्राप्ति) ही फल है और सब साधन तो फूल है, अपने स्वरुप का परिपूर्ण ज्ञान ही एक सत्य वस्तु है ।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।
अनेन वेद्यं सच्चस्त्रमिति वेदांतादिमः॥
ब्रह्म यथार्थ है, ब्रह्माण्ड मिथ्या है (इसे यथार्थ या असत्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता)। जीव ही ब्रह्म है और भिन्न नहीं इसे सही शास्त्र के रूप में समझना चाहिए, यह वेदांत द्वारा घोषित किया गया है।
एक ब्रह्म ही सत्य है, ब्रह्म सत्यस्वरुप, भेद रहित परिपूर्ण आत्मस्वरुप है,विद्वतजन उसका भगवान वासुदेव , कृष्ण , दामोदर , नारायण , गोविन्द , राम , आदि नामो से वर्णन करते हैं , अन्यथा जगत तो मिथ्या है, आत्मा का विवेकरुपी धन एक एक इन्द्रिय लूट लेती है, कोई सन्त मिलने पर संसार रुपी वन से बाहर निकालते हैं।
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सूर्य स्तोत्र

प्रात: स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं-
रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषी।
सामानि यस्य किरणा: प्रभवादिहेतुं
ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यचिन्त्यरूपम्।।

प्रातर्नमामि तरणिं तनुवाऽमनोभि
ब्रह्मेन्द्रपूर्वकसुरैनतमर्चितं च।
वृष्टि प्रमोचन विनिग्रह हेतुभूतं
त्रैलोक्य पालनपरंत्रिगुणात्मकं च।।

प्रातर्भजामि सवितारमनन्तशक्तिं
पापौघशत्रुभयरोगहरं परं चं।
तं सर्वलोककनाकात्मककालमूर्ति
गोकण्ठबंधन विमोचनमादिदेवम्।।

ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्ने:।
आप्रा धावाप्रथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्र्व।।

सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मत्योन योषामभ्येति पश्र्वात्।
यत्रा नरो देवयन्तो युगानि वितन्वते प्रति भद्राय भद्रम्।।
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ज्योतिष शास्त्र या वैदिक ज्योतिष का उद्गम और इतिहास :-

भारतीय ज्योतिष को "वेद" की आंखें माना जाता है... प्राचीन शास्त्रों की।
यह ज्ञान ग्रहों की चाल को पृथ्वी पर घटने वाली घटनाओं से जोड़ता है।
यह कनेक्टिविटी शक्ति मानवता के लिए अज्ञात थी जब तक ऋषियों ने इसे लिखित रूप में नहीं लाया।

प्राचीन ऋषियों ने ऋग्वेद, चतुर्वेद संहिता, वैदिक अनुष्ठान विधि या मार्गदर्शिका, कला, चिकित्सा विज्ञान और ज्योतिष पर ग्रंथों की रचना की।
कहा जा सकता है कि भारतीय ज्योतिष का अभ्यास ऋग्वेद के समय से शुरू हुआ और इसका उद्गम 6500 ईसा पूर्व माना जाता है।
भारतीय ऋषियों ने ज्योतिष को तीन भागों में विभाजित किया है:

1) गणितीय ज्योतिष या गणित ज्योतिष
2) व्यवहारिक ज्योतिष या फलित ज्योतिष
3) ज्योतिष संहिता

महाभारत के प्राचीन भारतीय महाकाव्य में वर्णित कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद, युधिष्ठिर, बड़े पांडव, और अन्य स्वर्गारोहण के लिए यात्रा पर निकले और उसी समय से "कालिकाल" ... एक युग का रूप शुरू हुआ जिसमें हम वर्तमान में हैं।

ऋषि पराशर :-
ऋषि पराशर का जन्म कुरुक्षेत्र युद्ध से कुछ वर्ष पहले हुआ माना जाता है, लगभग 3000 ईसा पूर्व।
उनके पुत्र वेदव्यास ने महाभारत की रचना की, जो संभवतः 3041 से 3101 ईसा पूर्व के बीच हुई।
ज्योतिष शास्त्र की पहली पुस्तक "बृहद्पाराशरी होरा" ऋषि पराशर द्वारा लिखी गई है।
यह पुस्तक लागू ज्योतिष या फलित ज्योतिष पर आधारित है। उन्होंने दो अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ भी लिखे: "लघु पाराशरी होरा" और "पाराशर संहिता"।

ऋषि गर्ग :-
गर्ग ऋषि पराशर के समकालीन थे और उनकी "गर्ग संहिता" ज्योतिष विद्या पर एक प्रसिद्ध और प्रामाणिक ग्रंथ है।

जैमिनी :-
जैमिनी सूत्र जैनिमि द्वारा लिखे गए, जिनमें "कारकांश" के प्रसिद्ध सिद्धांत शामिल हैं।
समुद्रिक विद्या ... ज्योतिष का एक अंग भी ऋषि पराशर के काल का है।
महाभारत में गणित ज्योतिष, फलित ज्योतिष, शाकुन ज्योतिष का उल्लेख मिलता है, जो ज्योतिष के मुख्य शाखाएं थीं।

वराहमिहिर :-
हस्तरेखा विज्ञान का विश्लेषण वराहमिहिर के समय तक नहीं था, जिन्होंने "बृहज्जातक ग्रन्थ" लिखा। यह पुस्तक लागू ज्योतिष पर आधारित थी।
वे प्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य के दरबार के मुख्य ज्योतिषी थे।
उनकी "तीशखंड ज्योतिष" बहुत प्रसिद्ध थी, साथ ही उन्होंने "पंच सिद्धांतिका" (गणित ज्योतिष) और "बृहद संहिता" लिखी, जिसमें देश और समय से संबंधित ज्योतिषीय नियम बताए गए।

कालिदास :-
संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवि और लेखक कालिदास ने भी तीन लागू ज्योतिष की पुस्तकें लिखीं:
1) पूर्वकालामृत
2) उत्तरकालामृत
3) ज्योतिर्विद्यावर्णन
ग्रीस का भारतीय ज्योतिष पर प्रभाव :-
ग्रीस के सम्राट सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया और इसके प्रभाव से भारतीय ज्योतिष में कई ग्रीक शब्द जैसे द्रेक्कना, मेषुर, क्रियो आदि का उपयोग देखने को मिलता है। विवाह के शुभ समय के निर्धारण के लिए "सुताहिबुकयोग" संस्कृत और रोमन भाषा पर आधारित था।
यह ज्ञान पहली बार "पुंथि" नामक विशेष प्रकार की पुस्तक में लिखा गया।

आर्यभट्ट :-
आर्यभट्ट का जन्म कुशुमपुर (आज का पटना) में 469 ईस्वी में हुआ।
उनके समय में ज्योतिष ने एक महान आकार लिया।
उनकी पृथ्वी की गति पर आधारित पुस्तक "भट्टतंत्र" के नाम से प्रसिद्ध थी।
वे ज्योतिष पर अनुसंधान में महान थे और अपने कार्य को उच्चतम स्तर तक ले गए।

भास्कराचार्य :-
भास्कराचार्य आर्यभट्ट के बाद जन्मे और ज्योतिष के क्षेत्र में अनुसंधान कार्य किए। उन्होंने ज्ञान को व्यापक रूप दिया।
उस समय प्राप्त ज्ञान पर कई पुस्तकें लिखी गईं, लेकिन जब महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण किया तो वे सब नष्ट हो गईं... रचनाएँ, उन्नति और प्रतिभाएं।
फिर भारत मुस्लिम शासकों के अधीन आ गया और ज्योतिष के अनुसंधान और अभ्यास में कोई प्रगति नहीं हुई।
ब्रिटिश काल में कई पुस्तकें पुनः खोजी गईं और अंग्रेजी में अनूदित हुईं, लेकिन उस समय भी कोई मौलिक कार्य नहीं हुआ।

अन्य प्रसिद्ध लेखक और पुस्तकें :-
"फालदीपीका" लेखक मोंटेस्वर।
वे 1600 ईस्वी में जन्मे और उन्होंने अपने गहन ज्ञान को ज्योतिष शास्त्र में साझा किया।
इस पुस्तक में 24 अध्याय हैं और अनेक संस्कृत श्लोक सम्मिलित हैं।
"भावार्थरत्नाकर" लेखक रानानुज जिन्होंने विभिन्न योगों का विवरण दिया और लग्नों के फल विश्लेषण किए।
कुल 15 अध्याय हैं।
उनका प्रसिद्ध सिद्धांत "भावपति भावना" ज्योतिष में नया विचार था।
"सर्वार्थ चिंतामणि" ... लेखक वेंकटेशर्मा, मुख्यतः पराशर के सिद्धांत पर आधारित।
दशा विचार या समय का विश्लेषण यहां विस्तार से वर्णित है।
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और सूची जारी है...
भारतीय ज्योतिष पर क्षेत्रीय भाषाओं में अनगिनत पुस्तकें लिखी गई हैं।
हरिहर मजूमदार ने बंगाली में ज्योतिष को समझने के लिए एक बहुत प्रामाणिक पुस्तक लिखी।
बी. वी. रमन की पुस्तकें अंग्रेजी में उपलब्ध हैं और जो कोई ज्योतिष का कुछ ज्ञान रखता है, वे उनकी पुस्तकों का अनुसरण कर सकता है।
ज्योतिष एक विशाल विषय है जिसे सीखने में पर्याप्त समय लगता है।
मूल ग्रंथ भी बाद में संपादनों के साथ संकलित किए गए, इसलिए कई बार संस्करणों में अंतर होता है और कई सिद्धांत बाद में जोड़े गए।
इसलिए गहराई से ज्ञान गुरुकुल की विद्या से प्राप्त किया जा सकता है, जो शिक्षकों से मिलता है और पुस्तकों द्वारा समर्थित होता है।
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कहानी का समय

*एक आदमी अपने सुअर के साथ नाव में यात्रा कर रहा था।*

*उस नाव में अन्य यात्रियों के साथ एक दार्शनिक भी था।*

*सुअर ने पहले कभी नाव में यात्रा नहीं की थी, इसलिए वह सहज महसूस नहीं कर रहा था।*

*ऊपर और नीचे जा रहा था, किसी को चैन से बैठने नहीं दे रहा था।*

*नाविक इससे परेशान था और चिंतित था कि यात्रियों की दहशत के कारण नाव डूब जाएगी।*

*अगर सुअर शांत नहीं हुआ तो वह नाव को डुबो देगा।*

*वह आदमी स्थिति से परेशान था, लेकिन सुअर को शांत करने का कोई उपाय नहीं खोज सका।*

*दार्शनिक ने यह सब देखा और मदद करने का फैसला किया।*

*उसने कहा: "यदि आप अनुमति दें, तो मैं इस सुअर को घर की बिल्ली की तरह शांत कर सकता हूँ।"*

*वह आदमी तुरंत राजी हो गया।*

*दार्शनिक ने दो यात्रियों की मदद से सुअर को उठाया और नदी में फेंक दिया।*

*सुअर ने तैरते रहने के लिए ज़ोर-ज़ोर से तैरना शुरू कर दिया।*

*यह अब मर रहा था और अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहा था।*

*कुछ समय बाद, दार्शनिक ने सुअर को वापस नाव में खींच लिया।*

*सुअर चुप था और एक कोने में जाकर बैठ गया।*

*सुअर के बदले हुए व्यवहार से वह आदमी और सभी यात्री हैरान रह गए।*

*उस आदमी ने दार्शनिक से पूछा: "पहले तो यह ऊपर और नीचे कूद रहा था। अब यह पालतू बिल्ली की तरह बैठा है। क्यों?"*

*दार्शनिक ने कहा: "बिना स्वाद चखे किसी को दूसरे के दुर्भाग्य का एहसास नहीं होता है। जब मैंने इस सुअर को पानी में फेंक दिया, तो यह पानी की शक्ति और नाव की उपयोगिता को समझ गया।"*
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निर्भीकता से सत्य के पक्ष में खड़े रहना ही स्वाभिमान है। स्वाभिमान का अर्थ अपनी बात पर अड़े रहना नहीं अपितु सत्य के साथ खड़े रहना है। दूसरों को नीचा दिखाते हुए अपनी बात को सही सिद्ध करने का प्रयास करना यह स्वाभिमानी का लक्षण नहीं।

दूसरों की बात को यथायोग्य सम्मान देते हुए किसी भी दबाव में ना आकर सत्य पर अडिग रहना यही स्वाभिमान है। अभिमानी वह है जो अपने अहंकार के पोषण के लिए दूसरों को कष्ट देना पसंद करता है और स्वाभिमानी वह है जो सत्य के रक्षण के लिए स्वयं कष्टों का वरण कर लेता है।

अभिमान झुकना पसंद नहीं करता लेकिन स्वाभिमान गलत के आगे झुकने नहीं देता है। मैं जो कह रहा हूँ वही सत्य है, यह अभिमानी का लक्षण है और जो सत्य होगा उसे मैं स्वीकार कर लूँगा बस यही स्वाभिमानी होने का लक्षण है।
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