✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें।
ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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निर्भीकता से सत्य के पक्ष में खड़े रहना ही स्वाभिमान है। स्वाभिमान का अर्थ अपनी बात पर अड़े रहना नहीं अपितु सत्य के साथ खड़े रहना है। दूसरों को नीचा दिखाते हुए अपनी बात को सही सिद्ध करने का प्रयास करना यह स्वाभिमानी का लक्षण नहीं।

दूसरों की बात को यथायोग्य सम्मान देते हुए किसी भी दबाव में ना आकर सत्य पर अडिग रहना यही स्वाभिमान है। अभिमानी वह है जो अपने अहंकार के पोषण के लिए दूसरों को कष्ट देना पसंद करता है और स्वाभिमानी वह है जो सत्य के रक्षण के लिए स्वयं कष्टों का वरण कर लेता है।

अभिमान झुकना पसंद नहीं करता लेकिन स्वाभिमान गलत के आगे झुकने नहीं देता है। मैं जो कह रहा हूँ वही सत्य है, यह अभिमानी का लक्षण है और जो सत्य होगा उसे मैं स्वीकार कर लूँगा बस यही स्वाभिमानी होने का लक्षण है।
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यच्च किञ्चित् जगत् सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा।
अंतर्बाहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः।।
(नारायण सूक्त)

यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड जो कुछ भी है, देखा या सुना गया है- इस सब में, अंदर और बाहर से समान रूप से व्याप्त, सर्वोच्च शाश्वत दिव्य सत्ता नारायण है।

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपंरूपं प्रतिरूपो बहिश्च।।

वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च।।

सूर्यो यथासर्वलोकस्य चक्षु-
र्न लिप्यतेचाक्षुषैर्बाह्यदोषैः।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा
न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः।।
(कठोपनिषत- २ / ५)

जिस प्रकार समग्र ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही अग्नि अन्य विविध आधारभूत वस्तु के रूपों को धारण किए हुए रहता है, ठीक उसी प्रकार सभी प्राणियों का अन्तरात्मा पब्रह्मरूप एक होने पर भी तरह-तरह के रूपों को धारण करके प्रविष्ट होता है। इतना ही नहीं, उनके बाहर भी भिन्न-भिन्न रूपों में वह रहता है। जिस प्रकार एकल ब्रह्माण्ड में एक ही वायु अपने अव्यक्त रूप से व्याप्त है, फिर भी भिन्न-भिन्न व्यक्त वस्तुओं के संयोग से उन-उन वस्तुओं के अनुरूप गति और शक्तिसम्पन्न दिखाई देता है, ठीक उसी प्रकार इन समस्त प्राणियों का अन्तर्यामी परमेश्वर तो एक ही है, तथापि उन प्राणियों के सम्बन्ध से भिन्न-भिन्न गति और शक्तिवाला दिखाई पड़ता है। इतना ही नहीं, वह प्राणियों (वस्तुओं) के बाहर भी अनन्त (असीम) विविध रूपों में भी रहता है। जैसे सूर्य समग्र लोक का नेत्र है, फिर भी नेत्र सम्बन्धी बाह्य दोषों से सूर्य लिप्त नहीं होता। उसी तरह सर्व प्राणियों का अन्तरात्मा तो एक ही है, फिर भी वह संसार के दुःखों से लिप्त नहीं होता, किन्तु उनसे वह बाहर ही रहता है।
अर्थात परमात्मा सबके भीतर रहकर भी संसार के दोषों से लिप्त नहीं, वह संसार की सभी चर अचर वस्तुओं में होने के अलावा भी जो शेष बचता है वह यही श्रीपति नारायण हैं। यही पुरुष सूक्त के स्पृत्वाSत्यतिष्ठद्द्शाङ्गुलम् का अर्थ है।

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा
एकं रूपं बहुधा यः करोति।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्-
तेषा सुख शाश्वतं नेतरेषाम्।।

सदैव सभी के अन्तरात्मा के रूप में स्थित, अद्वितीय, सभी प्राणियों को अपने वश में रखनेवाला वही सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपने एक ही रूप को लीला से अनेक प्रकार का बना देता है, ऐसे परमात्मा को जो ज्ञानी पुरुष अपने भीतर अवस्थित देखते हैं, उन्हीं को शाश्वत आनन्द प्राप्त होता है, दूसरों को नहीं।
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हम सब जानते हैं कि इस जीवन को आखिर एक दिन खत्म हो जाना है फिर हम क्यों इन झूठे रंग तमाशों में झूठ की शानौ शौकत में अपना कीमती समय बरबाद करते हैं? सन्तो ने हमारे एक स्वांस का मोल तीन लोक का मोल से भी ऊपर लगाया है लेकिन हमें अपने इन स्वांसो की कीमत का अन्दाजा तक नहीं। जिस दिन हमारा आखरी समय आता है तब हमे इसकी कीमत का अन्दाजा होता है लेकिन तब तक सब खत्म हो चुका होता है हम इस मानुष जन्म की जीती बाजी भी हार चुके होते हैं। यह मानुष चोला हमें परमात्मा से मिलाप करने के लिए मिला था आवागमन से मुक्त होने के लिए मिला था लेकिन अफसोस हमने इसे दुनिया की शानौ शौकत झूठे रंग तमाशों व और ऐशो इशरत मे गवां दिया। खुशनसीब हैं वे लोग जो जीते-जी इस सच्चाई को जान गये हैं और 'पूर्ण गुरू' की शरण मे पुहँचकर 'नाम' की कमाई मे लग गये वे आज नहीं तो कल इस भवसागर से पार हो ही जायेंगे।
सोचने की बात यह है कि जो भोजन खा पीकर हम संतुष्ट और प्रसन्न होते हैं स्वस्थ रहते हैं जो वस्त्र हमारे शरीर की शोभा बनते हैं मौसम के प्रहार से हमारी रक्षा करते हैं और अन्य सुख सुविधाएं जो हम दिनरात भोगते हैं वह सब कुछ परमेश्वर का ही दिया हुआ है यह जानते हुए भी उस परमात्मा को भुलाए रखना कहां तक उचित है? अगर हमारी दृष्टि में ये नश्वर चीजें बटोरना ही सबसे बड़ी प्राप्ति है तो यह हमारी नादानी है ये नश्वर चीजें बटोरना तो अमूल्य मनुष्य-जन्म को बर्बाद कर लेना है। 'प्रभु' से सांसारिक पदार्थ मांगना नासमझी है क्योंकि हमारे हित के लिए हमारी जरूरतें उसे पहले ही मालूम होती हैं और वह उन्हें अपने-आप जन्म के समय हमारे प्रारब्ध में लिखकर पूरी कर देता है।
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ईश्वर को नहीं खोजना है, उसमें खो जाना है
ईश्वर की यात्रा बड़ी अजीब है। यह यात्रा वही करता है; वही कर सकता है, जो सब यात्रा छोड़ देता है। इतना शांत हो जाता है कि उसे कहीं भी नहीं पहुंचना है
एक फकीर था। एक पहाड़ी के किनारे चुपचाप बैठा रहता, सोया रहता। एक युवक सत्य की, ईश्वर की खोज में पहाड़ पर गया था। उसने उस फकीर से पूछा कि आप चुपचाप यहां क्यों बैठे हैं? ईश्वर को नहीं खोजना है? उस फकीर ने कहा, जब तक खोजता था, तब तक नहीं मिला। फिर मैं ऊब गया और मैंने वह खोज छोड़ दी और जिस दिन मैंने सब खोज छोड़ दी, मैं हैरान हो गया। मैं तो उसमें मौजूद ही था। खोज रहा था, इसलिए दिखाई नहीं पड़ रहा था।
कई बार खोजने का तनाव ही खोजने में बाधा बन जाता है। कई बार हम जिस चीज को खोजते हैं, खोजने के कारण ही उसको नहीं उपलब्ध हो पाते हैं।
कभी खयाल किया आपने--किसी आदमी का नाम खो गया है आपके मन में और आप खोजने को लगे हुए हैं। खोजते हैं और परेशान हो जाते हैं, सिर ठोंक लेते हैं कि बिलकुल जबान तक आता है, लेकिन आता नहीं। पता नहीं चलता, कहां गया, कैसे खो गया! मालूम है मुझे! यह भी मालूम है कि मुझे मालूम है। भीतर आता है, पर न मालूम कहां अटक जाता है। फिर आप खोज छोड़ देते हैं। फिर आप अपनी बगिया में गङ्ढा खोद रहे हैं,या अपने बच्चे से गपशप कर रहे हैं और एकदम आप हैरान हो जाते हैं, वह नाम मौजूद हो गया, वह आ गया है। और तब आप समझ भी नहीं पाते कि यह कैसे आ गया
आप खोजते थे--खोजने के तनाव की वजह से मन अशांत हो गया। अशांत होने की वजह से उसे रास्ता नहीं मिलता था आने का। वह अटका रह गया पीछे। आप शांत हो जाओ तो वह आ जाए। आप अशांत हो तो वह आए कहां से, द्वार कहां मिले, रास्ता कहां मिले
भीतर ईश्वर निरंतर आप तक आने की कोशिश कर रहा है। लेकिन आप? आप इतने व्यस्त हैं कि आपकी इस व्यस्तता में बाधा देने जैसी अशिष्टता ईश्वर न करेगा। वह आपको परेशान नहीं करेगा। जब आप शांत हो जाएं तो वह आ जाएगा आप उन्हें खोजने की परेशानी मत मोल लो आप उन में खो जाओ। वह उन मेहमानों में से नहीं है कि आप कुछ भी कर रहे हों और वह आ जाए। जब देखेगा कि आप तैयार हैं, तो वह तो हमेशा मौजूद है। भीतर कोई हमारे रास्ता खोज रहा है। लेकिन हम इतने, सतह पर इतने व्यस्त हैं, इतनी लहरों से भरे हैं कि उसे रास्ता नहीं मिलता है। कृपा करें रास्ता दें
आपको ईश्वर को नहीं खोजना है-- आपको ही खोज रहा है। आप इतनी ही कृपा करें कि रास्ता दे दें। आप बीच में न खड़े हों अपने और परमात्मा के, तो सारी बात हल हो जाती है।'
जब आप सब भूलकर सहजावस्था को प्राप्त होते हैं वह आ गया होता है लेकिन फिर जैसे ही याद आया,खोजना शुरु किया वह गायब।यह सहजावस्था तभी संभव है जब हम अपने होने की गहराई में उतरें।इसके लिये यह ध्यान है-विचार तो आते रहते हैं।उनका पीछा नहीं करना है,उनमें नहीं डूबना है।जैसे ही कोई विचार आये,खुद से पूछें-यह विचार किस पर निर्भर है?मेरे होने पर।मेरा होना कहां है?असीम गहराई में।विचार का पीछा करने वाला खुद से उखडकर,उच्चाटित होकर सतह पर रहता है-संघर्ष शील अहंबुद्धि के रुप में जबकि असीम गहराई में अपने होनेपन का अनुभव करने वाला सहज और स्वस्थ होने लगता है।
तब सागर का होना ही लहर का होना है यह सच प्रकट होने लगता है।सतह पर लहरों के भेद हैं,गहराई में अकेले सागर का ही साम्राज्य है।
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मानवशरीर भगवान्‌की कृपासे मिला है और केवल भगवान्‌की प्राप्तिसे लिये मिला है । इसलिये सब काम छोड़कर भगवान्‌में लग जाना चाहिये । जिनकी उम्र ज्यादा हो गयी है, उनको तो भगवान्‌में लगना ही है, जिनकी उम्र छोटी है, उनको भी सच्चे हृदयसे भगवान्‌में लगना है । संसारका सब काम कर देना है, पर अपना असली ध्येय, लक्ष्य, उद्देश्य केवल परमात्माकी प्राप्ति ही रखना है ।

वास्तवमें सत्ता एक परमात्माकी ही है । संसारकी तरफ आप ध्यान दें तो यह सब मिटनेवाला है और निरन्तर मिट रहा है । आप अपनी तरफ देखें कि जब आप अपनी माँके पेटसे पैदा हुये, उस समय शरीरकी कैसी अवस्था थी और आज कैसी अवस्था है । संसार निरन्तर बदलनेवाला है और परमात्मा निरन्तर रहनेवाले है । संसार रहनेवाला है ही नहीं और परमात्मा बदलनेवाले है ही नहीं । वे परमात्मा हमारे हैं और हम परमात्माके हैं‒इसमें दृढ़ता होनी चाहिये । जैसे छोटा बालक कहता है कि माँ मेरी है । उससे कोई पूछे कि माँ तेरी क्यों है, तो इसका उत्तर उसके पास नहीं है । उसके मनमें यह शंका ही पैदा नहीं होती कि माँ मेरी क्यों है ? माँ मेरी है, बस, इसमें उसको कोई सन्देह नहीं होता । इसी तरह आप भी सन्देह मत करो और यह बात दृढ़तासे मान लो कि भगवान्‌ मेरे हैं । भगवान्‌के सिवाय और कोई मेरा नहीं है; क्योंकि वह सब छूटनेवाला है । जिनके प्रति आप बहुत सावधान रहते हैं, वे रुपये, जमीन, मकान आदि सब छूट जायँगे । उनकी यादतक नहीं रहेगी । अगर याद रहनेकी रीति हो तो बतायें कि इस जन्मसे पहले आप कहाँ थे ? आपके माँ-बाप, स्त्री-पुत्र कौन थे ? आपका घर कौन-सा था ? जैसे पहले जन्मकी याद नहीं है, ऐसे ही इस जन्मकी भी याद नहीं रहेगी । जिसकी यादतक नहीं रहेगी, उसके लिये आप अकारण परेशान हो रहे हो ! यह सबके अनुभवकी बात है कि हमारा कोई नहीं है । सब मिले हैं और बिछुड़ जायँगे । इसलिये ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’‒ऐसा मानकर मस्त हो जाओ । संसारका काम तो बिगड़ रहा है तो बिगड़ने दो । वह तो बिगड़नेवाला ही है । सुधर जाय तो भी बिगड़ेगा, परन्तु पीछे बहुत बढ़िया हो जायगा । दुनिया सब-की-सब चली जाय तो परवाह नहीं है । मैं और भगवान्‌‒इन दोके सिवाय और कोई नहीं है । मैं केवल भगवान्‌का हूँ और केवल भगवान्‌ मेरे हैं‒इसके सिवाय और किसी बातकी तरफ देखो ही मत, विचार ही मत करो ।

एक परमात्मा ही सब जगह परिपूर्ण हैं । उनके सिवाय और कोई है नहीं, कोई हुआ नहीं, कोई होगा नहीं, कोई हो सकता नहीं । वे परमात्मा ही मेरे हैं‒ऐसा मानकर मस्त हो जाओ, प्रसन्न हो जाओ । हम अच्छे हैं कि मन्दे है, इसकी फ़िक्र मत करो । जैसे भरतजी महाराज चित्रकूट जाते हुए माँ कैकेयीकी तरफ देखते हैं तो उनके पैर पीछे पड़ते हैं, और जब अपनी तरफ देखते हैं तो खड़े रहते हैं, पर जब रघुनाथजी महाराजकी तरफ देखते हैं तो दौड़ पड़ते हैं‒

जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ ।
तब पथ परत उताइल पाउ ॥

(मानस, अयोध्याकाण्ड २३४/३)

ऐसे ही आप अपनी करनीकी तरफ मत देखो, अपने पापोंकी तरफ मत देखो, केवल भगवान्‌की तरफ देखो ।
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याज्ञवल्क्य ने अपने असीम ज्ञान से समझाया कि भौतिक संपदा आनंदमय जीवन तो दे सकती है, लेकिन अमरता नहीं। हैरान मैत्रेयी ने सवाल उठाया कि ऐसी चीज रखने का क्या मतलब है जो शाश्वत जीवन देने में असमर्थ हो।

याज्ञवल्क्य ने उनकी गहरी जिज्ञासा को पहचानते हुए सच्चे प्रेम का सार और परम आत्मा की प्रकृति को उजागर किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी रिश्तों में - पति और पत्नी, पिता और पुत्र, मित्र और मित्र - यह एक आत्मा है जिसे वास्तव में प्यार किया जाता है। जब कोई इस सार्वभौमिक आत्मा को महसूस करता है तो व्यक्तिगत पहचान समाप्त हो जाती है।

एक रूपकात्मक सादृश्य में, याज्ञवल्क्य ने समझाया कि जिस तरह नमक पानी में घुल जाता है, उसी तरह पृथक आत्मा शुद्ध चेतना के सागर में विलीन हो जाती है। शरीर के साथ भौतिक पहचान अलगाव पैदा करती है, लेकिन जब यह पहचान विलीन हो जाती है, तो व्यक्ति अनंत और अमर चेतना के साथ आत्मा की एकता का एहसास करता है।

संस्कृत वाक्य “अहं त्वयि स्निह्यामि अहं त्वयि स्निह्यामि” (“मैं तुममें प्रेम पाता हूँ”) में पाए जाने वाले प्रेम के दर्शन के संदर्भ में, याज्ञवल्क्य की शिक्षाएँ इस बात पर ज़ोर देती हैं कि सच्चा प्रेम व्यक्तिगत पहचान से परे होता है और सार्वभौमिक आत्म की पहचान तक विस्तृत होता है। प्रेम, अपने शुद्धतम रूप में, अपने और दूसरों के भीतर दिव्य सार की स्वीकृति है।

संस्कृत में प्रेम को दर्शाने वाले कुछ शब्द इस प्रकार हैं:

अनुराग: एक गहरा और स्थायी लगाव या स्नेह जो समय के साथ बना रहता है।

प्रणय प्रणय: प्रणय प्रेम या स्नेह के एक गहन और पूर्ण रूप को संदर्भित करता है जो प्रेमी और प्रेमिका को उनकी प्रगतिशील यात्रा में आगे बढ़ाता है।

स्नेह स्नेहा: यह रिश्तों को सहज बनाने के बारे में है, एक प्रेमपूर्ण, पोषण बंधन के विचार पर जोर देता है जो बातचीत में गर्मजोशी और सहजता को बढ़ावा देता है।

प्रीति प्रीति: किसी गहरे संबंध या प्रेम से उत्पन्न संतुष्टि या प्रसन्नता की भावना।

प्रेम प्रेम: प्रेम का एक गहरा और निस्वार्थ रूप जो दिल को भर देता है और आत्मा को संतुष्ट करता है। इसे अक्सर आध्यात्मिक या दिव्य प्रेम से जोड़ा जाता है जो सांसारिकता से परे होता है।

वल्लभ्य वल्लभ्य: प्रिय या प्रिय होने का गुण, पारस्परिक और पोषित संबंध को दर्शाता है। यह किसी के स्नेह में चुने जाने या पसंदीदा होने की भावना का सुझाव देता है।

इनमें से प्रत्येक शब्द प्रेम के एक अनूठे पहलू को समेटे हुए है, स्थायी लगाव (अनुराग) से लेकर तीव्र जुनून (प्रणय), स्नेह (स्नेह), संतुष्ट आनंद (प्रीति), गहन और निस्वार्थ प्रेम (प्रेमा), पोषित या प्रिय व्यक्ति (वल्लभ्य) होने तक।

इन शब्दों की जड़ें मानवीय भावनाओं और रिश्तों के सूक्ष्म पहलुओं को व्यक्त करने में संस्कृत भाषा की गहराई और समृद्धि की अंतर्दृष्टि प्रदान करती हैं।

अहं त्वयि स्निह्यामि
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क्रीड़ा प्राचीन भारत के खेल

खेल और खेल हमेशा से ही मानव संस्कृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं, मनोरंजन, सामुदायिक बंधन और यहां तक ​​कि आध्यात्मिक अभिव्यक्ति के स्रोत के रूप में काम करते हैं। प्राचीन भारत में, खेलों का समाज में एक आवश्यक स्थान था, जो शिक्षा और दैनिक जीवन में एकीकृत था। लोकप्रिय धारणा के विपरीत, पोलो, टेनिस, फुटबॉल और क्रिकेट जैसे खेल आधुनिक आविष्कार नहीं हैं; प्राचीन भारत में खेलों की एक समृद्ध परंपरा थी जो न केवल मनोरंजन करती थी बल्कि शारीरिक फिटनेस और सामाजिक सामंजस्य बनाए रखने में भी मदद करती थी।
हरिवंश, वर्णरत्नाकर, मानसोल्लास और कई अन्य प्राचीन भारतीय ग्रंथों में सैकड़ों खेलों का विस्तृत वर्णन है, जो बीते युगों में खेले जाने वाले खेलों की गहराई और विविधता को दर्शाता है। इन ग्रंथों से पता चलता है कि खेल न केवल मनोरंजन का एक स्रोत थे, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सवों का एक महत्वपूर्ण पहलू भी थे। श्रीमद्भागवतम्, भगवान कृष्ण के जीवन का वर्णन करने वाला एक महाकाव्य है, जिसमें खेलों और खेलों के कई उदाहरण शामिल हैं, जो बताते हैं कि प्राचीन भारतीय समाज में वे कैसे प्रचलन में थे।
प्राचीन भारत में खेलों के प्रकारों को बेहतर ढंग से समझने के लिए हम उन्हें चार समूहों में वर्गीकृत कर सकते हैं:
मनोरंजन के लिए खेले जाने वाले खेल : ये खेल मुख्य रूप से मनोरंजन के लिए होते थे और इनमें बोर्ड गेम, पासा गेम और परिवार और दोस्तों द्वारा खेले जाने वाले अन्य खेल शामिल होते थे। इनका उद्देश्य खिलाड़ियों को हल्के-फुल्के अंदाज में शामिल करना था, जिससे अक्सर सौहार्द और सामाजिक मेलजोल बढ़ता था।
दर्शकों के मनोरंजन के लिए खेल : इस श्रेणी में दर्शकों के मनोरंजन के लिए बनाए गए खेल और गतिविधियाँ शामिल हैं। रथ दौड़, कुश्ती और तीरंदाजी प्रतियोगिताएँ जैसे कार्यक्रम लोकप्रिय थे, जिनमें बड़ी भीड़ जुटती थी और एथलेटिक कौशल का प्रदर्शन होता था।
धार्मिक महत्व वाले खेल : कई खेल और खेल धार्मिक त्योहारों और अनुष्ठानों से जुड़े थे। ये खेल धार्मिक समारोहों का अभिन्न अंग थे, जहाँ प्रतिभागी देवताओं के सम्मान में या शुभ अवसरों पर खेलते थे।
अस्पष्ट वर्गीकरण वाले मिश्रित खेल : इस श्रेणी में वे खेल शामिल हैं जो अन्य तीन समूहों में ठीक से फिट नहीं होते हैं। इन खेलों में मौज-मस्ती, प्रतिस्पर्धा या अनुष्ठान संबंधी महत्व के तत्व हो सकते हैं, जो अक्सर पारंपरिक भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को मिलाते हैं।
इस नज़रिए से, प्राचीन भारतीय खेल एक जटिल और बहुआयामी परंपरा के रूप में उभर कर सामने आते हैं, जो उस समय के मूल्यों, विश्वासों और सामाजिक गतिशीलता को दर्शाते हैं। बचपन के चंचल खेलों से लेकर त्योहारों के भव्य तमाशे तक, इन खेलों ने प्राचीन भारतीय समाज की रचनात्मकता और विविधता को प्रदर्शित किया। इन खेलों को समझने से हमें भारत के इतिहास और संस्कृति पर एक अनूठा नज़रिया मिलता है, जो हमें याद दिलाता है कि प्रतिस्पर्धा की भावना और खेल का आनंद कालातीत है।
यहां पचास प्राचीन भारतीय खेलों की सूची दी गई है जो भारत भर के विभिन्न क्षेत्रों में सामान्यतः खेले जाते थे:
कृत्रिम वृषभ-क्रीड़ा - कृत्रिम बैल खेल
इस खेल में बच्चे लड़ाई का अनुकरण करने के लिए बैल जैसा कपड़ा या शेर जैसी खाल पहनते थे और आवाजें निकालते थे। इसे 'कृत्रिम बैल खेल' कहा जाता था। इसमें जानवरों और पक्षियों की आवाजों की नकल करना शामिल था।
2. निलयन-क्रीड़ा - छिपने का खेल
इसके दो प्रकार हैं:
A. एक में एक बच्चा छिपता है और दूसरा बच्चा उसे ढूंढता है। कुछ चोर बनकर खेलते हैं, जबकि अन्य गार्ड बनकर खेलते हैं।
बी. दूसरे में, बच्चों को तीन समूहों में विभाजित किया जाता है: पशु चराने वाले, पशु चोर, और बकरी या भेड़ का अभिनय करने वाले। बकरी को चोर ले जाते हैं, और चरवाहों को उन्हें ढूंढना होता है। इस खेल का उल्लेख श्रीमद्भागवतम् में मिलता है, जिसे कृष्ण ने 'वत्स-हरण' के दौरान खेला था।
3. मर्कटोटप्लवन-क्रीडा - बंदर कूद खेल
इस खेल में बच्चे पेड़ों पर चढ़ते हैं और बंदरों की तरह शाखाओं के बीच उछलते हैं। इसका उल्लेख श्रीमद्भागवतम् में भी मिलता है।
4. शिक्यादि-मोशन-क्रीडा - वस्तु चोरी खेल
इसमें गेंद जैसी कोई वस्तु किसी के पास घुमाई जाती है और कोई उसे वापस लेने की कोशिश करता है। जब मालिक उसे वापस मांगता है, तो उसे वह वस्तु दे दी जाती है।
5. अहम्हमिका-स्पर्श-क्रीडा - टच-मी-फर्स्ट स्पोर्ट
इस खेल में बच्चे यह देखने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं कि कौन दूसरे बच्चे को पहले छू सकता है।
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6. ब्राह्मण-क्रीड़ा - झूलने वाला खेल
बच्चे एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे-पीछे झूलते हैं, साथ-साथ बैठते और खड़े होते हैं।
7. गर्तादिलङ्घन-क्रीडा - लंबी कूद खेल
इस खेल में यह परीक्षण किया जाता है कि कोई व्यक्ति एक निश्चित दूरी में कितनी दूर तक छलांग लगा सकता है।
8. बिल्वादिप्रक्षेपण-क्रीड़ा - वस्तु फेंकने का खेल
इस खेल में बिल्व फल या गेंद जैसी वस्तुओं को इस प्रकार फेंका जाता है कि वे हवा में टकराती हैं।
9. अस्पृश्यत्व-क्रीडा - अछूत खेल
इस खेल में एक बच्चा दूसरे को छूने की कोशिश करता है जबकि दूसरा बच्चा छूने से बचता है।
10. उत्सवबंध-क्रीड़ा - आंखों पर पट्टी बांधकर खेल
इस खेल के तीन प्रकार हैं:
उत्तर: यहां, बच्चे को आंखों पर पट्टी बांधकर यह अनुमान लगाना होता है कि पीछे कौन है।
B. इसमें आंखों पर पट्टी बांधे बच्चों को छिपे हुए अन्य लोगों को ढूंढना होता है।
C. यहां, आंखों पर पट्टी बांधे बच्चों को दूसरों को उन्हें छूने की कोशिश करते हुए पकड़ना होगा।
11. स्पन्दनदोलिका-क्रीड़ा - झूलने का खेल
इस खेल में खिलाड़ी दो या तीन झूलों पर चढ़ते हैं और झूलते हुए एक से दूसरे झूले पर जाते रहते हैं।
12. नृप-क्रीड़ा - राजा खेल
इस खेल में एक व्यक्ति को राजा बनाया जाता है तथा अन्य लोग मंत्री या सलाहकार जैसी भूमिका निभाते हैं।
13. हरिण-क्रीड़ा - हिरण खेल
इसमें हिरण की तरह कूदना शामिल है, जिसमें प्रतिभागी ऊंची या अधिक दूरी तक छलांग लगाकर एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते हैं।
14. देव-दैत्य-क्रीड़ा - देव-दानव खेल
इस खेल में कुछ लोग भगवान की भूमिका निभाते हैं जबकि कुछ लोग राक्षस की भूमिका निभाते हैं। वे शिव की कहानियों में वर्णित धूल या अन्य तत्वों का उपयोग करके खेलते हैं।
15. वाह्य-वाहक-क्रीड़ा - वाहक खेल
इस खेल में विजेता हारने वाले के कंधों पर सवार होता है।
16. जल-क्रीड़ा - जल क्रीड़ा
इसके दो प्रकार हैं:
A. एक प्रकार में, प्रतिभागी पेड़ों से पानी में कूदते हैं और एक दूसरे पर पानी छिड़कते हैं।
B. दूसरे प्रकार का वर्णन, जिसमें प्रायः पुरुष और महिलाएं दोनों सम्मिलित होते हैं, भारवि, माघ और कालिदास जैसे कवियों की रचनाओं में मिलता है।
17. कन्दुक-क्रीड़ा - गेंद खेल
इस खेल के दो प्रकार हैं:
A. एक प्रकार में, एक गेंद को ऊपर फेंका जाता है, और दूसरा व्यक्ति उसे पकड़ने की कोशिश करता है। अगर वे असफल हो जाते हैं, तो फेंकने वाला व्यक्ति उनके कंधों पर चढ़ जाता है।
B. दूसरे प्रकार में, खिलाड़ी गेंद को दीवार पर उछालते हैं और जमीन पर गिरने से पहले उसे पकड़ लेते हैं।
18. वनभोजन-क्रीड़ा - वन भोज खेल
इसमें जंगल में जाकर खेलना और वहीं 'बाटी' जैसे व्यंजन पकाना शामिल है। यह वैसा ही है जैसा आजकल पिकनिक के नाम से जाना जाता है।
19. नृत्य-क्रीड़ा - नृत्य खेल
इस खेल में कुछ लोग नाचते हैं जबकि कुछ ताली बजाते हैं। इसे लड़के और लड़कियां एक साथ या अलग-अलग खेल सकते हैं।
20. रास-क्रीड़ा - रास खेल
यह रेतीले मैदान में कृष्ण की लीलाओं का पुनः मंचन है, जो आधुनिक रामलीला जैसा है। गुजरात का गरबा नृत्य कुछ-कुछ इसी से मिलता-जुलता है।
21. नियुद्ध-क्रीड़ा - मुट्ठ मारने का खेल
इसमें मुक्का-लड़ाई या कुश्ती शामिल है। महाभारत में इसी खेल में जरासंध और भीम ने लड़ाई लड़ी थी।
22. चालसिक्य-क्रीडा - चालबाज़ी का खेल
इसमें प्रतिभागी खुशी से गाते-बजाते हैं, मानो होली के दिन हों। इसका वर्णन हरिवंश और अन्य पुराणों में मिलता है।
23. अक्षर-क्रीडा - पासा खेल
पासों का यह खेल महाभारत युद्ध का कारण बना। इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी निषेधों के साथ किया गया है।
24. मृगया-क्रीड़ा - शिकार खेल
यह खेल, जिसे 'आखेत' के नाम से भी जाना जाता था, राजाओं के बीच लोकप्रिय था, जिसमें शिकार और शिकार पकड़ना शामिल था।
25. पक्षिघात-क्रीड़ा - पक्षी-शिकार खेल
इस खेल में बाज़ की तरह पक्षियों को पकड़ना शामिल है।
26. मत्स्य-क्रीड़ा - मछली पकड़ने का खेल
इस खेल में राजकुमार नाव पर बैठकर मछली पकड़ना सीखते हैं।
27. चतुरंग-क्रीडा - चतुरंग खेल
इसे ही अब शतरंज, चेकर्स या इसी तरह के बोर्ड गेम के नाम से जाना जाता है। ब्रिटिश विद्वान विल्सन ने इस खेल पर व्यापक शोध किया और भविष्य पुराण जैसे प्राचीन भारतीय ग्रंथों में इसके संदर्भ पाए, जिससे इसकी भारतीय उत्पत्ति की पुष्टि होती है। चतुरंग के खेल को समर्पित कई ग्रंथ हैं।
28. शालभंजिका-क्रीड़ा - कठपुतली खेल
इसे “कठपुतली खेल” या “गुड़िया खेल” के नाम से जाना जाता है।
29. लटोदवा-क्रीडा - बेल विवाह खेल
इसमें पेड़ों और लताओं की देखभाल करना और फिर उनका विवाह करवाना शामिल है, जैसा कि शकुंतला ने किया था। तुलसी विवाह एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में किया जाता है।
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30. वीटा-क्रीड़ा - छड़ी और गेंद का खेल
यह महाभारत में वर्णित एक खेल है, जिसमें एक छड़ी को दूसरी छड़ी से मारा जाता है।
31. कनकश्रृंगकोण-क्रीडा - गोल्डन हॉर्न कोन गेम
यह पानी की बंदूक से पानी छिड़कने का खेल है।
32. आमलकमुष्ट्यादि-क्रीडा - अमला-मुट्ठी खेल
इस खेल में एक व्यक्ति अपनी मुट्ठी में कुछ पकड़ता है और दूसरे लोग अनुमान लगाते हैं कि वह क्या है। अगर उनका अनुमान गलत हो या वे जवाब न दें, तो विजेता उन्हें मुट्ठी से मार सकता है।
33. पुशरप्लाव-क्रीडा - मेंढक-कूद खेल
इसमें मेंढक की तरह उछलकर चलना शामिल है।
34. नाट्य-क्रीड़ा - नाटक खेल
इस खेल में नाटक या स्किट का प्रदर्शन शामिल है।
35. अलात्चक्र-क्रीड़ा - फायर व्हील स्पोर्ट
इस खेल में एक पटाखा जलाना और उसे घुमाकर पैटर्न बनाना शामिल है। इसका इस्तेमाल कभी-कभी प्रकाश से डिज़ाइन बनाने के लिए किया जाता है।
36. जल-क्रीड़ा - जल भोज खेल
इसमें जल में बैठकर भोजन करना शामिल है, जैसा कि दुर्योधन ने जल क्रीड़ा की कला जानकर किया था।
37. नौ-क्रीडा - नौसेना खेल
इसमें नाव की सवारी शामिल है, जैसा कि दशहरा के दौरान वाराणसी में आम है।
38. वनविहार-क्रीड़ा - वन मनोरंजन खेल
इसमें फूल इकट्ठा करना, माला बनाना और जंगल में कई अन्य गतिविधियों का आनंद लेना शामिल है। इसमें बिना किसी सामग्री के खाना पकाना और अन्य संबंधित गतिविधियाँ शामिल हैं। इसे 'पुष्पवाच्य' खेल के रूप में भी जाना जाता है।
39. गदा-क्रीड़ा - गदा खेल
इसमें गदा का उपयोग करके नकली युद्ध करना शामिल है। इसी तरह, धनुष खेल और अन्य खेल भी हैं।
40. अशोकपादप्रहार-क्रीड़ा - वृक्ष-छिद्रण खेल
इस खेल में खिलाड़ी एक पेड़ को सजाते हैं और फिर उसे लात मारते हैं या उसके साथ कुछ और करते हैं। कालिदास ने भी इस खेल का वर्णन किया है।
41. चित्र-क्रीड़ा - कला खेल
इसमें चित्रकारी, रेखांकन और कहानियों से संबंधित दृश्यों का निर्माण करना शामिल है, जैसे यक्षों के साथ एक दृश्य का चित्रण करना।
42. काव्यविनोद-क्रीड़ा - काव्य खेल
इसमें विभिन्न कविता खेल बनाना शामिल है, जैसे पहेलियाँ, मीट्रिक पहेलियाँ और अन्य। आधुनिक पहेलियाँ इसी से मिलती जुलती हैं।
43. वाजिवाह्य-क्रीड़ा - घोड़े का खेल
इसमें घोड़े की सवारी करते हुए पोलो जैसा खेल खेला जाता है। तुलसीदास ने अपनी गीतावली में इसका उल्लेख किया है।
44. करिवाह्य-क्रीडा - हाथी खेल
यह एक ऐसा खेल है जिसमें प्रतिभागी हाथी की सवारी करते हैं और गेंद खेलते हैं।
45. मृगवाह्य-क्रीडा - पशु दौड़ खेल
इसमें हिरणों या बारहसिंगों द्वारा खींची जाने वाली गाड़ियों पर दौड़ शामिल होती है, जिसमें प्रतिभागी एक-दूसरे को छूने का प्रयास करते हैं।
46. ​​गोप-क्रीड़ा - चरवाहे का खेल
यह रासलीला खेल का एक भाग है।
47. घट-क्रीड़ा - जग खेल
इस खेल में प्रतिभागी चलते समय अपने सिर पर कई जगों को संतुलित करते हैं, कभी-कभी अंगारों या बांस के ऊपर भी चलते हैं।
48. विवाह-क्रीड़ा - विवाह खेल
जब दूल्हा शादी के लिए जाता है, तो महिलाएं ऐसा खेल खेलती हैं जैसे वे दूल्हा या दुल्हन हों, और इसे 'खोरिया' कहा जाता है।
49. हल्लीश-क्रीडा - गोलाकार या रिंग गेम
इस खेल में प्रतिभागी एक घेरे में बैठते हैं, एक लड़की और एक लड़का बारी-बारी से मंडला आकार बनाते हैं। इस खेल का वर्णन हरिवंश में भी विस्तार से किया गया है।
50. गानकुर्दन-क्रीड़ा - गायन और कूदने का खेल
यहां कुछ प्रतिभागी गाते हैं जबकि अन्य कूदते या छलांग लगाते हैं।
ये खेल और खेल सिर्फ़ मनोरंजन ही नहीं थे; इनमें अक्सर सांस्कृतिक, आध्यात्मिक या सामाजिक महत्व भी होता था। गुल्ली-डंडा, कनकश्रृंग-कोना-क्रीड़ा और गणकुर्दन-क्रीड़ा जैसे खेल समुदायों को एक साथ लाते थे, सौहार्द और परंपरा को बढ़ावा देते थे। ये प्राचीन खेल भारतीय संस्कृति की समृद्ध और विविध विरासत को दर्शाते हैं, जो अतीत की रचनात्मकता और जीवंतता को दर्शाते हैं। ये पारंपरिक खेल ऐतिहासिक जड़ों और परस्पर जुड़ाव को उजागर करते हैं जिसने कई पीढ़ियों से भारतीय समाज को महत्वपूर्ण रूप से आकार दिया है।
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जो बीत गई सो बात गई 

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उसपर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुरझायी कितनी वल्लरियाँ
जो मुरझायी फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठतें हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई

मृदु मिटटी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर 
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई 

- हरिवंश राय बच्चन 
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किसे कहते हैं सत्संग?

सतसंगत मुद मंगल मूला।
सोई फल सिधि सब साधन फूला॥

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥

हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर (दूसरे पलड़े पर रखे हुए) उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण) मात्र के सत्संग से होता है॥

हमारे देश क पौराणिक और धार्मिक कथा साहित्य बढ़ा समृद्धिशाली हैं, ऋषि- मुनियों ने भारतीय ज्ञान, नीति,सत्य प्रेम न्याय संयम धर्म तथा उच्च कोटि के नैतिक सिद्धांतों को जनता तक पोहचाने के लिए बढे ही मनो वैज्ञानिक ढंग से अनेक प्रकार की धार्मिक कथाओं की रचना की हैं।

इनमें दुष्ट प्रवृत्तियों की हमेशा हार दिखाकर उन्हें छोड़ने की प्रेंडा दी गई हैं,इस प्रकार ये कथाएं हमें पापबुध्धि से छुड़ाती हैं।

हमारी नैतिक बुध्धि को जगाती हैं जिससे मनुष्य सब्य, सुसंस्कृत और पवित्र बनता हैं भगवान की कथा को भव-भेषज, सांसारिक कष्ट पीड़ाओं और पतन से मुक्ति दिलाने वाली ओषधि कहा जाता हैं,इसलिए कथा सुनने तथा सत्संग का बोहोत महत्त्व होता हैं।

वेद व्ययास जी ने भगवत की रचना इसलिए की ताकि लोग कथा के दुवारा ईश्वर के आदर्श रूप को समझें और उसको अपनाकर जीवनलाभ उठाये।

भगवान की कथा को आधिभौतिक आदिदैविक एवं आधात्मिक तापों को काटने वाली कहा गया हैं यानि इनका प्रभाव मृत्तु के बाद ही नहीं जीवन में भी दिखाई देने लगता हैं. सांसारिक सफलताओं से लेकर पारलौकिक उपलब्धियों तक उसकी गति बनी रहने से जीवन की दिशा ही बदल जाती हैं।

पाप और पूण्य का सही स्वरूप भगवत गीता से समझ आता हैं,इसे अपने हर पापों का छय तथा पुण्यों की वृद्धि की जा सकती हैं,व्यक्ति अपने बंधनो को छोड़ने और तोड़ने में सफल हो जाता हैं,तथा मुक्ति का अधिकारी बन जाता हैं,इससे अलावा कथा सुनने से जीवन की समसयाओं कुंठाओं विडम्बनाओं का समाधान आसानी से मिल जाता हैं।

आत्मानुशासन पांच में कहा गया हैं की जो बुध्धिमान हो जिसने समस्त शास्त्रों का रहस्य प्राप्त किया हो लोक मर्यादा जिसके प्रकट हुई हो कांतिमान हो, उपशमि हो, प्रश्न करने से पहले ही जिसने उत्तर जाना हो,बाहूल्यता से प्रश्नों को सहने वाला हो, प्रभु हो, दूसरे की तथा दूसरे के द्वारा अपनी निंदारहित गूढ़ से दूसरे के मन को हरने वाला हो गुण निधान हो जिसके वचन स्पष्ट और मधुर हों सभा का ऐसा नायक धर्मकथा कहें।

स्कन्दपुराण में सूतजी कहते हैं- श्री मद्भागवत का जो श्रवण करता हैं,वह अवस्य ही भगवान के दर्शन करता हैं. किन्तु कथा का श्रवण, पाठन, श्रद्धाभक्ति, आस्था के साथ-साथ विधिपूर्वक होना चाहिए अन्यथा सफल की प्राप्ति नहीं होती।

श्रीमद्भागवत जी में लिखा हैं की जहाँ भगवत कथा की अमृतमयी सरिता नहीं बहती, जहाँ उसके कहने वाले भक्त, साधुजन निवास नहीं करते, वह चाहें ब्र्म्हलोक ही कियों ना हो, उसका उसका सेवन नहीं करना चाहिए।

धर्मिककथा, प्रवचन आदि का महात्म केवल उसके सुनने मात्र तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि उनपर स्रद्धपूर्वक मनन ,चिंतन और आचरण करने में हैं।

श्रद्धा के लिए मात्र जगदिखाने के लिए कथा आदि सुनने का कोई फल नहीं मिलता. एक बार किसी भक्त ने नारद ने पूछा- भगवान की कथा के प्रभाव से लोगों के अंदर भाव और वैराग्य के भव जागने और पुष्ट होने चाहिए।

वह क्यों नहीं होते, नारद ने कहा- ब्राम्हण लोग केवल अन्न, धनादि के लोभवश घर-घर एवं जन-जन को भगवतकथा सुनाने लगे हैं।

इसलिए भगवत का प्रभाव चला गया हैं. वीतराग शुकदेवजी के मुहं से राजा परीक्षित ने भगवत पुराण की कथा सुनकर मुक्ति प्राप्त की और स्वर्ग चले गए।

सुकदेव ने परमार्थभाव से कथा कही थी और परीक्षित ने उसे आत्मकलियांड के लिए पूर्ण श्रद्धाभाव से सुनकर आत्मा में उत्तर लिया था इसलिए उन्हें मोछ मिला।

सत्संग के विषय में कहा जाता हैं की भगवान की कथाएँ कहने वाले और सुनने वाले दोनों का ही मन और शरीर दिव्य एवं तेजमय होता चला जाता हैं. इसी तरह कथा सुनने से पाप कट जाते है और प्रभु कृपा सुलभ होकर परमांनद की अनुभूति होती हैं।

भय विपत्ति रोग दरिद्रता में सांत्वना उत्साह और प्रेणा की प्राप्ति होती हैं मन और आत्मा की चिकित्साह पुनरुद्धार प्राणसंचार की अद्भुत शक्तियां मिलती हैं. विपत्ति में धैर्य, आवेस में विवेक व् कलिआण चिंतन में मदत प्राप्त होती हैं।
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नया मनुष्य ज्यादा लॉजिकल, ज्यादा रैशनल, ज्यादा ईमानदार,ज्यादा साइंटिफिक, ज्यादा मैथेमेटिकल है, बिना सबूत किसी में विश्वास करने वाला नहीं है... इसलिए उनके लिए ध्यान ही एक मार्ग है...और उनके लिए गुर्जिएफ सिस्टम और उनका ध्यान बड़ा उपयोगी हो सकता है...
अयोध्या का अर्थ है- "जहाँ युद्ध न हो", अर्थात ऐसा स्थान जहाँ कोई संघर्ष, कोई द्वंद्व न हो !
श्रीराम का जन्म अयोध्या में हुआ, यह एक गहरी आध्यात्मिक प्रतीकात्मकता है !
जब मन में कोई द्वंद्व नहीं होता, कोई अंतर्द्वद्ध, कोई उलझन नहीं होती, तब मन अयोध्या बन जाता है!
उस अवस्था में आत्मा की ज्योति, चेतना की दिव्यता प्रकट होती है !
श्रीराम उसी दिव्यता के प्रतीक हैं!
जब मन अयोध्या हो जाता है, तब राम का जन्म होता है
जो हमारे सभी पूज्यनीय हैं आज हम जिनकी पूजा करते हैं उनको भी ध्यान करना पड़ता था जंगलो में हमें अपने घर में में बैठाकर ध्यान करना है केवल ध्यान वो मार्ग है जिससे कोई
भी परम सत्य को प्राप्त कर सकता है
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कहानी का समय

"'वास्तविक मूल्य'''

बहुत समय पहले की बात है। उपरमालिया गाँव में एक बूढ़ा व्यक्ति रहता था। उसके दो बेटे थे। बूढ़ा वस्तुओं के उपयोग के मामले में कंजूस था और उन्हें बचा-बचा कर उपयोग किया करता था।

उसके पास एक पुराना चांदी का पात्र था। वह उसकी सबसे मूल्यवान वस्तु थी। उसने उसे संभालकर संदूक में बंद कर रखता था। उसने सोच रखा था कि सही अवसर आने पर ही उसका उपयोग करेगा।

एक दिन उसके यहाँ एक संत आये। जब उन्हें भोजन परोसा जाने लगा, तो एक क्षण को बूढ़े व्यक्ति के मन में विचार आया कि क्यों न संत को चांदी के पात्र में भोजन परोसूं? किंतु अगले ही क्षण उसने सोचा कि मेरा चांदी का पात्र बहुत कीमती है। गाँव-गाँव भटकने वाले इस संत के लिए उसे क्या निकालना? जब कोई राजसी व्यक्ति मेरे घर पधारेगा, तब यह पात्र निकालूंगा। यह सोचकर उसने पात्र नहीं निकाला।

कुछ दिनों बाद उसके घर राजा का मंत्री भोजन करने आया। उस समय भी बूढ़े व्यक्ति ने सोचा कि चांदी का पात्र निकाल लूं। किंतु फिर उसे लगा कि ये तो राजा का मंत्री है। जब राजा स्वयं मेरे घर भोजन करने पधारेंगे, तब अपना कीमती पात्र निकालूंगा।

कुछ दिनों के बाद स्वयं राजा उसके घर भोजन के लिए पधारे। राजा उसी समय पड़ोसी राज्य से युद्ध हार गए थे और उनके राज्य के कुछ हिस्से पर पड़ोसी राजा ने कब्जा कर लिया था। भोजन परोसते समय बूढ़े व्यक्ति ने सोचा कि अभी-अभी हुई पराजय से राजा का गौरव कम हो गया है। मेरे पात्र में किसी गौरवशाली व्यक्ति को ही भोजन करना चाहिए। इसलिए उसने चांदी का पात्र नहीं निकाला।

इस तरह उसका पात्र बिना उपयोग के पड़ा रहा। एक दिन बूढ़े व्यक्ति की मृत्यु हो गई।

उसकी मृत्यु के बाद उसके बेटे ने उसका संदूक खोला। उसमें उसे काला पड़ चुका चांदी का पात्र मिला। उसने वह पात्र अपनी पत्नी को दिखाया और पूछा, “इसका क्या करें?”

पत्नी ने काले पड़ चुके पात्र को देखा और मुँह बनाते हुए बोली, “अरे इसका क्या करना है। कितना गंदा पात्र है। इसे कुत्ते को भोजन देने के लिए निकाल लो।”

उस दिन के बाद से घर का पालतू कुत्ता उस चांदी के पात्र में भोजन करने लगा। जिस पात्र को बूढ़े व्यक्ति ने जीवन भर किसी विशेष व्यक्ति के लिए संभालकर रखा, अंततः उसकी ये गत हुई।

बन्धुओ किसी वस्तु का मूल्य तभी है, जब वह उपयोग में लाई जा सके। बिना उपयोग के बेकार पड़ी कीमती वस्तुओं का भी कोई मूल्य नहीं। इसलिए यदि आपके पास कोई वस्तु है, तो यथा समय उसका उपयोग कर लें।
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*"आत्मिक कल्याण" आवश्यक होने के साथ-साथ थोड़ा "कठिन" भी है।* कठिन इसलिए कि मनुष्य प्रायः जन्म-जन्म के संस्कार अपने साथ लाता है। वे संस्कार प्रायः भौतिक अथवा शारीरिक ही होते हैं। इसका प्रमाण यह है कि जब मनुष्य का देहाभिमान नष्ट हो जाता है, तो वह मुक्त हो जाता है। उसे शरीर धारण करने की लाचारी नहीं रहती। *चूँकि सभी मनुष्यों की अभिव्यक्ति शरीर में हुई, इसलिए यह सिद्ध है कि उसमें अभी शारीरिक संस्कार बने हुए हैं।* पूर्व संस्कारों पर विजय पाकर इन्हें आधुनिक रूप में मोड़ लेना, या यों कह लिया जाए कि *"शारीरिक संस्कारों" का "आत्मिक संस्कारों" से स्थानापन्न कर लेना सहज नहीं होता। संस्कार बड़े प्रबल व शक्तिशाली होते हैं।* इन दैहिक संस्कारों को बदलने का सरल-सा उपाय यह है कि जिस प्रकार सांसारिक कार्यों और शारीरिक आवश्यकताओं की चिंता की जाती है, उसी प्रकार आत्म-कल्याण की चिंता की जाए। *जिस प्रकार सांसारिक सफलताओं के लिए निर्धारित एवं सुनियोजित कार्यक्रम बनाकर प्रयत्न तथा पुरुषार्थ किया जाता है, उसी प्रकार मनोयोगपूर्वक आध्यात्मिक कार्यक्रम बनाए और प्रयत्नपूर्वक पूरे किए जाते रहें।* इस प्रकार यदि मनुष्य अपने दृष्टिकोण के साथ-साथ पुरुषार्थ की धारा बदल डालें, तो निश्चय ही उसके संस्कार परिवर्तित हो जाएँगे और वह शरीर की ओर से मुड़कर आत्मा की ओर चल पड़ेगा।
👉 *"संस्कार" बदलने का प्रयत्न करने के साथ-साथ यह भी देखते चलना आवश्यक है कि संस्कारों में अपेक्षित परिवर्तन घटित हो भी रहा है या नहीं।* इसकी पहचान यह है कि जब आप देखें कि *"आत्म-कल्याण" के कार्यक्रमों की सफलता के लिए वैसी ही चिंता रहती है, जैसी कि "घर-गृहस्थी" के कार्यों और आर्थिक योजनाओ को सफल बनाने की, तब समझ लें कि संस्कारों में परिवर्तन प्रारंभहो गया है।* यदि भौतिक सफलता की चिंता की तरह आध्यात्मिक सफलता की चिंता नहीं होती, तो समझ लेना चाहिए कि उस दिशा में उचित प्रगति नहीं हो रही है। *आप जो कुछ भी "आध्यात्मिक" प्रयत्न कर रहे हैं, वह सब यों ही एक बेगार अथवा मनोरंजन के लिए कर रहे हैं। उसमें आपका पूरा-पूरा मानसिक योग नहीं है और आपने उत्तरदायित्व के रूप में उक्त प्रयत्न का मूल्यांकन नहीं किया है।*
👉 *संस्कारों में परिवर्तन लाने के लिए इस प्रकार के हलके-फुलके दिखाऊ प्रयत्न करने से काम न चलेगा, इस कर्तव्य को जीवनलक्ष्य के उत्तरदायित्व की भावना से करना होगा।* बहुत से लोग आवेश में आकर जोश-खरोश के साथ संस्कार बदल डालने में सहसा जुट पड़ते हैं। इस प्रकार का असात्त्विक प्रयत्न भी वांछित सफलता संपादित करने में कृतकृत्य न होगा। ज्वार की तरह उठा हुआ कोई भी जोश कुछ ही दिनों में ठंडा पड जाता है। संस्कारों में वांछित परिवर्तन लाने के लिए *सात्विकी निष्ठा"* के साथ *आध्यात्मिक कार्यक्रम"* अपनाकर और उत्तरदायित्व के साथ उन्हें पूरा करना होगा । *"प्रगति" यदि कम भी है, लेकिन गति में एक "दृढ़ता" है, तो चिंता की कोई बात नहीं है । कभी न कभी वह काम पूरा हो ही जाएगा ।*
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गुरु और शिष्य

यदि सम्पूर्ण भारतीय शास्त्रों का मंथन किया जाए तो प्रारम्भ से लगातार आज तक भारतीय दर्शन ,भारतीय ज्ञान,भारतीय चिंतन ,और भारतीय विचारधारा को स्पष्ट करने के लिए एक-एक करके एक सौ आठ उपनिषदों की रचना हुई I

जब वेदो के भाष्य ,वेदो के अर्थ ,समझ से परे हो गए ,तब ऋषियों ने उपनिषदों की रचना की ,जब ज्ञान और चिंतन लोगो की समझ से परे हो गया ,तब उन्होंने उपनिषदों की रचना करके लोगो को समझाने की प्रक्रिया प्रारम्भ की I

"उपनिषद का अर्थ हैं ,"उप " + "निषद" ,पास में आना और नजदीक बैठ जाना ,यहाँ पास में आना और नजदीक बैठ जाने का तात्पर्य गुरु के समीप जाना और गुरु के समीप बैठने की क्रिया से हैं I"

जो गुरु के समीप बैठता हैं ,जो गुरु से कुछ सीखता हैं ,जो गुरु का चिंतन करता हैं ,और अपनी जिज्ञासाओं का समाधान करता हैं ,अपने मन की जटिल ग्रंथियों को खोलने का प्रयास करता हैं ,ऐसी क्रिया करने वाले को उपनिषद कहते हैं ,क्योकि उपनिषद केवल कागज के टुकड़े नहीं हैं उपनिषद इबारते नहीं हैं ,उपनिषद केवल पंक्तिया भी नहीं हैं I

उस समय शिष्य अपने जीवन का मूल ध्येय ,मर्म यह समझाता था ,कि मेरे जीवन में पूर्णता तभी प्राप्त हो सकती हैं ,जब मैं गुरु के पास जाऊ ,योग्य गुरु के पास बैठु ,और उनसे शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करू I मगर उपनिषद का एक और तात्पर्य हैं ,गुरु के पास बैठना ही उपनिषद नहीं हैं।

"उपनिषद का मतलब हैं नजदीक जाना ,हम प्रयत्न करे की गुरु की भावनाओ के अनुरूप बने ,हम प्रयत्न करे की गुरु के चरणों में विसर्जित हो गुरु के और नजदीक जाए,और इतना अधिक नजदीक चले जाए कि गुरु के ह्रदय से एकाकार हो जाए ,हम्मे और गुरु में किसी भी प्रकार का अंतर न रहे ,इसको "उपनिषद" कहते हैं I"

हम्मे और गुरु में कोई भेद न रहे ,उनकी विचारधारा और हमारी विचारधारा ,उनकी भावभूमि और हमारी भावभूमि ,उनका चिंतन और हमारा चिंतन ,एक हो जाए I

और उपनिषद का प्रारंभिक तत्व भी यही हैं। त्वं प्राण मम प्राण ,त्वं देह मम देह त्वं ज्ञान मम ज्ञान ,त्वं चिंतन मम चिंतन।

तुम्हारा सारा ज्ञान ,तुम्हारी जो कुछ भी भाव सरणी हैं वह मेरी बन जाए और मैं अपने आप में बिलकुल समाप्त हो जाऊ ,मेरा कुछ अस्तित्व ही नहीं रहे मैं अपने आपको आपके चरणों में विसर्जित कर दू ,और विसर्जित करके बहुत कुछ प्राप्त कर सकूं,इस स्थिति को उपनिषद कहते हैं I

ऋषियों ने कई उपनिषदों की रचना की , ईशावास्योपनिषद, केनोपनिषद,कठोपनिषद, प्रश्नोपनिषद, मुण्डकोपनिषद, माण्डूकयोपनिषद, तैत्तिरीय उपनिषद, ऐतरेयोपनिषद, छान्दोग्योपनिषद, बृहदारण्यकोपनिषद और एक एक करके एक सौ आठ उपनिषदों की रचना होती गयी I

जहाँ ज्ञान की गुत्थी को सूत्र में समझने की व्याख्या सही ढंग से नहीं हो पाती तो उस सूत्र को विस्तार से स्पष्ट करने के लिए उपनिषद की आवश्यकता पड़ी ,एक सूत्र को लिया और उसको विस्तार से विवेचित किया और उसे उपनिषद बनाया I

उपनिषद का तात्पर्य हैं ,कि हम उस सूक्ति को गहराई के साथ समझ सके,अपने ह्रदय के अंदर उतार सके, पूर्णता के साथ चिंतन,मनन कर सके

इन एक सौ आठ उपनिषदों का ऋषियों ने अध्यन ,मनन करने के बाद यह स्पष्ट किया की यद्द्पि प्रत्येक उपनिषद अपने आप में एक अलग विद्या ले कर बैठा हैं ,क्योकि उसमे अलग-अलग ज्ञान हैं ,अलग-अलग चिंतन हैं और प्रत्येक उपनिषद अपने आप में पूर्ण हैं, ज्ञान के क्षेत्र में अ द्वितीय हैं ,परन्तु इन सब उपनिषदों में जो सर्वश्रेष्ठ और अ द्वितीय उपनिषद हैं ,उसे शिष्योपनिषद कहा गया हैं I

शिष्योपनिषद .....यहाँ पर शिष्य को समझने की जरुरत होगी , उपनिषद और शिष्य में कोई अंतर ही नहीं हैं,दोनों का शब्दार्थ एक हैं ! शिष्य का अर्थ हैं नजदीक होना ,गुरु के नजदीक पहुंचना और ऐसी स्थिति तक पहुंच जाना कि गुरु के ह्रदय में एकाकार हो सके ...उसे शिष्य कहते हैं I

शिष्य का तात्पर्य किसी देह से नहीं ,शिष्य का तात्पर्य खड़े हो कर हाथ जोड़ने से नहीं हैं,शिष्य का तात्पर्य कोई दीक्षा लेने से भी नहीं ,यह तो केवल एक भाव हैं I पूर्णता और शिष्य तो ,तभी प्राप्त होती हैं जब हम दीक्षा ले और दीक्षा ले कर ,अपने आप को पूर्ण रूप से गुरु के चरणों में विसर्जित करके गुरु के ह्रदय से एकाकार हो जाए ,तब हमारी शिष्यता प्रारम्भ होती हैं।

“जहाँ शिष्यता नहीं वह उपनिषद भी नहीं हैं ,क्योकि उपनिषद का तात्पर्य भी गुरु के नजदीक जाना और उनके ह्रदय से एकाकार होकर ज्ञान प्राप्त करना हैं ,इस दृष्टि से देखा जाए तो उपनिषद और शिष्य दोनों में समान धर्मिता हैंI”

दोनों का एक ही लक्ष्य हैं ,एक ही चिंतन हैं ,एक ही भावना हैं I दोनों इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं उस महासागर में से हमें कुछ बुँदे प्राप्त हो जाय जो ज्ञान का अथाह समुद्र हैं ,उसमे हम अवगाहन करके अपने-आप को पवित्र और दिव्य बना दे और इसलिए शास्त्रकारों ने ,महर्षियों ने ,योगियों ने वो चाहे किसी भी धर्म,और सम्प्रदाय के रहे हो
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,शैव या वैष्णव ,या ब्राम्ही सम्प्रदाय ,या अघोर सम्प्रदाय जितने भी प्रकार के संप्रदाय बने उन सारे सम्प्रदायों में सभी योगियों,और सन्यासियों, चिन्तको और विचारको ने इस बात को स्वीकार किया ,जब तक हम "शिष्योपनिषद" को समझेंगे नहीं ,जब तक उसको अपने ह्रदय में उतारेंगे नहीं ,तब तक अन्य उपनिषद पढ़ना ही व्यर्थ हैं ,तब तक जीवित रहना ही व्यर्थ हैं ,तब तक जीवन में आगे बढ़ने की क्रिया ही संभव नहीं हैं I

और सबने एक स्वर से स्वीकार किया कि "शिष्योपनिषद" प्रत्येक व्यक्ति का प्रारंभिक हेतु हैं ,और जीवन का अंतिम हेतु भी हैं I अन्य कोई उपनिषद पढ़े या न पढ़े ,अन्य उपनिषद की चर्चा करे या न करे,अन्य उपनिषद का मर्म समझे या न समझे यह कोई जरुरी नहीं हैं ,क्योकि यदि हम सहीं ढंग से "शिष्योपनिषद" समझ लेते हैं ,तो अन्य उपनिषद अपने आप ही हमारे ह्रदय में उतर जाएंगे ,तो अन्य उपनिषद अपने आप में हमारी समझ में आ जायेंगे।

उनके लिए प्रयत्न करने की जरुरत नहीं हैं,क्योकि जब हम गुरु को अपने ह्रदय में उतार लेंगे तो गुरु का जितना भी अथाह ज्ञान हैं,उससे हम सम्पृक्त हो जाएंगे,और वह ज्ञान हमें अपने आप ही प्राप्त हो जायेगा I

हो सकता हैं आज के इस भौतिकतामय वातावरण में ऋषियों की यह वाणी थोड़ी अटपटी लगे ,आज के स्वार्थमय युग में यह लगे की गुरु ने अपनी प्रशंसा ज्यादा कर दी हैं ,मगर ऐसा नहीं हैंI

यदि हमें गंगा में स्नान करना हैं तो हमें हरिद्वार जाना ही पड़ेगाऔर नदी में छलांग लगनी ही पड़ेगी I यदि हमें मानसरोवर की उस पवित्र झील में अवगाहन करना हैं तो हमें मानसरोवर की यात्रा करनी ही होगी I

“और यदि ज्ञान में पूर्णता प्राप्त करनी हैं तो हमें गुरु के समीप जाना ही पड़ेगा ,गुरु से एकाकार होना ही होगा I

यदि हमें जीवन में उस पूर्ण सत्य के दर्शन करने हैं ,उस पूर्णत्व के दर्शन करने हैं ,यदि हमें पूर्ण मद: पूर्ण मिदं ,बनना हैं तो फिर हमें शिष्य की परिभाषा समझनी होगी ,तब हमें गुरु के समीप जाना होगा ,क्योकि सारा ज्ञान पोथियों में लिखा नहीं हैं ,और यदि ज्ञान पोथियों में लिखा हुआ हैं भी,तो पुस्तके उस ज्ञान का विवेचन नहीं कर सकती ,उसे ह्रदय में नहीं उतार सकती ,उसे ह्रदय में उतारने के लिए गुरु की आवश्यकता हैं I

क्योकि गुरु ही समझा सकते हैं,की पंक्ति का, इस धारणा का इस तत्व का अर्थ क्या है

यदि हमें शंकराचार्य को समझना हैं तो शंकरचार्य के ग्रन्थ हमें नहीं समझा सकते I शंकर भाष्य हमें पूर्ण ज्ञान ,पूर्ण चिंतन ,नहीं दे सकता ,इसके लिए गुरु की जरुरत हैं I

पर कैसे गुरु की जरुरत है ?

वह गुरु जो अपने ज्ञान के बल से,अपनी साधना के बल से अपने अंदर शंकरचार्य को उतार सके ,और जब उतार सके तो शंकराचार्य उसके शरीर में ,उसके ह्रदय में ,उतर कर ,उस मूल भावना को स्पष्ट कर सके ,जो शंकराचार्य उस शंकर भाष्य में कहना चाहते थे ,और तब गुरु ,उस मूल चिंतन को अपने शिष्य को दे सकेगा ,और ऐसा करने से ही मूल चिंतन की परिधि ,एक सरणी ,एक रास्ता बनता हैं -शंकराचार्य से यह मूल ज्ञान गुरु के ह्रदय में उतरा ,और गुरु के ह्रदय से वह ज्ञान शिष्य के ह्रदय में ज्यों का त्यों उतरा,उसमे किसी भी प्रकार का बनावट,भेद या अंतर नहीं आया I

"यह गुरु के लिए एक कठिन क्रिया हैं I यह क्रिया तभी कर सकता हैं जब वह अपने आप में योग्य हो ,अपने आपमें श्रेष्ठ हो ,अपने आप में अद्वितीय हो

मैं अपने इस प्रवचन में उस अद्वितीय और महत्वपूर्ण शिष्योपनिषद के कुछ श्लोको को आपने सामने उद्धत कर रहा हूं ,जो की शिष्योपनिषद का मंथन हैं,सारभूत चिंतन हैं I और आज मैं उन श्लोको का आपके सामने स्पष्ट करूँगा ,जिससे ज्ञात हो सके की यह उपनिषद हमारे जीवन में पूर्णता प्राप्ति के लिए कितना अधिक आवश्यक हैं I

यदि हमें पूर्ण होना हैं ,यदि हमें सही अर्थो में साधक बनना हैं ,यदि हम सही अर्थो में पूर्णता की ओर अग्रसर होना चाहते हैं ,और यदि हम एक बूँद से समुद्र में परिवर्तित होना चाहते हैं ,तो यह जरुरी हैं की हम इन श्लोको को समझे ,इसे अपने ह्रदय में उतारे,और उसके अर्थ,मूल चिंतन को अपने शरीर में रचा-पचा सके I

ऐसा होने पर ही ,इस युग में और इस जीवन में सब कुछ प्राप्त कर सकेंगे जो हमारे जीवन का लक्ष्य हैं,जो हमारे जीवन का ध्येय हैं ,जो हमारे जीवन का उद्देश्य हैं I

-और हमारे जीवन का लक्ष्य यहीं हैं की हम एक सामान्य मनुष्य की तरह जिन्दा नहीं रहे I

इसलिए इन सारे श्लोकों को पढ़े,सुने,अपने ह्रदय में उतारे और फिर चिंतन करे कि क्या हम श्लोक के अनुरूप बन सकते हैं ?
क्या श्लोक में जो भावनाये दी हैं वैसे हम हैं ?
नित्य रात्रि सोते समय यदि शिष्य इन श्लोको को सुनकर ,आँख बंद करके मनन करता हैं ,कि इन श्लोको में शिष्य की जो भावनाए दी हुए हैं क्या उसके अनुरूप मैं हूँ ?यदि नहीं हूँ तो अभी मैं शिष्य नहीं बन सका हूं,अभी मुझमे न्यूनता हैं I
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और अभी मुझमे न्यूनता हैं तो गुरु ज्ञान कैसे देंगे ,यदि मेरी झोली फटी हुई तो गुरु देंगे तो वह निकल जायेगा ,फिर तो दोष मेरा ही हैं ,फिर मेरी पात्रता में न्यूनता हैं,और जो अपनी न्यूनता को समझने की कोशिश करता हैं ,वह न्यूनताओ को हटा भी सकता हैं , वही सफल हो पाता हैं I

इसलिए यह जरुरी हैं कि हम इन श्लोको के अर्थ को,इन श्लोको के मर्म को चिंतन को समझे ,और इसके अनुरूप बनने की कोशिश करे I

और हम बन सकते हैं,ऐसा बनना ही हमारे जीवन ला लक्ष्य हैं,ऐसा बनने से ही हमारे जीवन में पूर्णता प्राप्त हो सकती हैं ,और यदि ऐसा नहीं बन सके तो फिर हम कायर हैं,बुदजिल हैं, फिर हम शिष्य नहीं बन सकते फिर हम शिष्य बनने का गौरव भी नहीं मिल सकता I

मैं कुछ महत्वपूर्ण श्लोको को स्पष्ट कर रहा हूं जो हमारे ऋषियों ने कहा हैं जो हमारे पूरे शास्त्रों के मंथन ने कहा हैं ,यदि उस युग में यह वाणी सत्य है थी,यदि शंकराचार्य ने इस उपनिषद को अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया ,और कहा"शिष्योपनिषद" को एक धार्मिक ग्रन्थ की तरह अपने जीवन में उतारना चाहिए ,तभी हम गईं में पूर्णता प्राप्त कर सकेंगे I

और उस समय यह वाणी सत्य थी तो तो आज के युग में भी यह वाणी सत्य हैं ! युग नहीं बदले,मनुष्य बदल गया हैं ,इन बदले हुए मनुष्यो में से ,हमें उन उन मनुष्यो को छाटना होगा ,जो अपने आप में नवीनता को ले कर ,आगे बढ़ रहे हैं ,जो ज्योति स्तम्भ हैं,जो दीप स्तम्भ हैं ,जो सही अर्थो में शिष्य बनने का गौरव प्राप्त करने के सक्षम हैं I

और यदि समाज की भीड़ में पचास शिष्य भी निकल आए तो यह पृथ्वी वापिस सुखी और सफल हो जाएगी ,यदि हमें सौ शिष्य भी पृथ्वी तल पर मिल सकें ,तो यह देश,यह विश्व यह ब्रम्हांड वापिस उन्नत ,सुखी ,ज्ञानवान,चेतना युक्त ,और अद्वितीय बन सकेगा

इसलिए मैं उन ऋषियों की वाणी को,इन श्लोको के माध्यम से स्पष्ट कर रहा हूँ

शिष्योंSवतंसं परमचतुन्यं ,गुरुवै गृहित्वं मम भाव नेत्रम I
चिन्त्यम विचिन्त्यं हृदयं सदान्ये देहोत्भवा पुण्य वदंसदैव II

शिष्य का तात्पर्य हैं ,निरंतर अनुकूल बनने की प्रक्रिया की और अग्रसर होना ,शिष्य एक-एक क्षण इस बात के लिए सचेष्ट रहे और प्रयत्नशील रहे की गुरु ने अनुरूप बनना हैं ,गुरु में जो गरिमा हैं,गुरु में जो ज्ञान हैं,गुरु में जो पवित्रता हैं ,गुरु में दिव्यता हैं ,और गुरु में जो गुण हैं ,उन गुणों के अनुरूप मुझे बनना हैं ,आगे बढ़ना हैं ,सफलता प्राप्त करनी हैं I

यदि शिष्य को गुरु में कुछ अवगुण दिखते हैं ,तो वह उनकी लीला हैं ,हम नहीं समझ सकते हैं,क्योकि यदि गुरु को ही समझ लेंगे तो हम शिष्य रहे ही कहाँ ?
फिर तो हम स्वयं गुरु ही बन गए ,गुरु किस समय क्या कर रहे हैं ,उसके पीछे जरूर कोई हेतु हैं ,जिसको हम समझ नहीं पा रहे हैं ,इसलिए हमारी बुध्दि पर ऐसा पर्दा पढ़ जाता है की हम हम उनके अवगुण को समझने की कोशिश करने लग जाते हैं I

हो सकता हैं की वह उनकी कोई क्रिया हो ,
हो सकता हैं की वह उनकी कोई साधना पद्धति हो ,
हो सकता है की वह उनका कोई चिंतन हो ,
हो सकता है वह कोई विशेष क्रिया करना चाह रहे हो ,
और उसके लिए ,किसी पात्र को ,किसी स्थान को किसी चिंतन की आवश्यकता हो ,गुरु ज्यादा समझ सकते है,हमें उनके चिन्तनो को समझने की जरुरत नहीं,उनकी गहराई में जाने की जरुरत नहीं I हमें तो उनके समीप जाना हैं,उनके अनुरूप बनना हैं I

और इस श्लोक में स्पष्ट किया है की जो गुरु आज्ञा दे,उन आज्ञाओ का हम पालन करे ,आज्ञा का पालन करना और एकमात्र आज्ञा का पालन करना ही शिष्य का परम कर्तव्य होता है

यदि हमें तर्क-वितर्क किया तो शिष्यता की भावभूमि से एकदम परे हट जाते हैं ,जब गुरु कोई शब्द कहता हैं तो बहुत सोच-समझ कर कहता है ,क्योकि उसका कोई भी शब्द अपने आप में मिथ्या नहीं होता ,क्योकि उन्होंने जिस शब्द का प्रयोग किया हैं ,वह शब्द तो अपने आप में शक्ति का आधारभूत हैं ,व्यर्थ में उस शक्ति का अपव्यय वे नहीं करते ,क्योकि गुरु बहुत ऊंचाई पर स्थिति हैं ,और हम उन ऊंचाई तक अभी नहीं पहुंचे हैं I

वह समुद्र हैं,और हम केवल बूँद,और बूँद होकर हम यह समझे कि हमने समुद्र को समझ लिया हैं ,उससे ज्यादा मूढ़ता और न्यूनता कुछ नहीं हो सकती ,एक बूँद कभी भी समुद्र को नहीं समझ सकती I

हम उस समुद्र को समझने की कोशिश कर रहे हैं तो हमें समुद्र को समझने ले लिए ,उन बूँद को विशाल परिधि में समुद्र बनाना होगा ,इसलिए समुद्र जो भी आज्ञा दे,बूँद को पालन करना जरुरी हैं I यदि बूँद समुद्र बनना ही चाहे तो फिर बूँद को विसर्जित हो कर समुद्र से एकाकार होना होगा ,और यदि वह अपना अस्तित्व मिटा देती हैं तो वह समुद्र का एक भाग बन जाती हैं फिर उसको भी समुद्र कहते हैं,फिर उसको समुद्र देवता कहते हैं I
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इसलिए बिना तर्क-वितर्क किए गुरु ने आज्ञा दी और हमने पालन किया बस केवल इतना ही लक्ष्य ,एक ही मार्ग हो ,के हमें आज्ञा दे और हम उसका पालन करे I यदि वापस पलट कर जवाब दिया ,तो उसी क्षण से शिष्यता की न्यूनता प्रारम्भ हो गई ,उसी समय से मनुष्यता से भी नीचे गिर गए ,फिर हम न मनुष्य रहे ,न शिष्य रहेI

और इस श्लोक में शिष्य के उन पांच चिन्तनो को स्पष्ट किया हैं ,कि एक शिष्य को गुरु के नजदीक जाने के लिए ,प्रारंभिक इन पांच तथ्यों पर निरंतर अमल करना ही चाहिए ,हर क्षण ये बिंदु शिष्य के सामने उपस्थित होने ही चाहिए I

पहला -गुरु उठे ,उससे पहले उठ जाये ,जितने बजे गुरु उठे ,हम उससे पहले उठ कर तैयार हो जाय ,स्नान करके ,पूजा करके ,जो कुछ हमारे दैनिक क्रिया-कलाप है ,उनको संपन्न करके जब खड़े हो ,तब गुरु के उठने की क्रिया हो ,उससे पहले ही सारी क्रियाये पूरी हो जनि चाहिए I वह शिष्य तो हो ही नहीं सकता ,जो गुरु के उठने के साथ ऊठे या उसके बाद उठे I

दूसरा - गुरु सोये ,उसके बाद सोये ,जितने समय गुरु सोये उनके चरण स्पर्श करके ,उसके बाद ही शिष्य सोने जाये

तीसरा - हर समय दिन को या रात्रि को सतर्क रहे,थोड़ो सी भी गुरु की आवाज आ जाने पर उठ कर खड़ा हो जाये ,तैयार हो जाय,आलस्य छोड़कर उनकी आज्ञा का पालन के लिए तैयार रहे ,सतर्क रहे ऐसा नहीं हो कि गुरु आवाज देता रहें और तुम गहरी नींद में सोते ही रहो ,यह तो शिष्य का लक्षण हैं ही नहीं ,यह तो शिष्य का चिंतन नहीं है I

चौथा - शिष्य के लिए जरुरी हैं की निरंतर साधना रत रहे ,और प्रत्येक क्षण इस बात का प्रयत्न करता रहे ,कि मुझे साधना क्षेत्र में अग्रसर होना हैं I

पांचवा - गुरु की आज्ञा का बिना ना-नुनच किये ,बिना तर्क-वितर्क किये ,पालन करे ,और केवल पालन ही करे I

-ये पांचो तत्व लेकर आगे बढ़े ,तब शिष्य का पहली सीढ़ी पर पाव टिकता हैं

हम नित्य मंथन करे ,विचार करे ,की क्या हम ऐसा कर रहे हैं ?

यदि नहीं कर रहे है तो,फिर यह हमारी न्यूनता हैं ,हमारी गलती हैं ,और इस श्लोक में यह स्पष्ट किया हैं गुरु के प्रति हमारे जो कर्तव्य हैं ,जो गुरु ने हमें काम सौपे है,उन कामो को बिना हिचकिचाहट पूरा करे I

यह अलग बात हैं कि उन्होंने हमें क्या सौपा हैं ?

यह तो वे ही जाने ,क्योकि हो सकता है कि हम ज्ञान के क्षेत्र में बहुत महान हो और हमें रसोई बनाने का काम सौंप दिया हो ,यह हो सकता हैं हम दर्शन के क्षत्र में बहुत अच्छे जानकर हो परन्तु हमें सफाई करने का काम सौंप दिया हो I

मगर यदि उन्होंने ऐसा काम सौंपा हैं ,तो इसके पीछे उनका कोई हेतु होगा जरूर उनका कोई नियमन होगा ,तभी मुझे ऐसा काम सौंपा है ,ऐसा शिष्य चिंतन करता ही रहे, और जो भी काम वे सौंपे ,उसे करने में आलस्य नहीं रखते हुए कार्य को समय पर संपन्न करके उनके चरणों में समर्पित कर दे,

"यह शिष्य का लक्षण है , शिष्य का चिंतन हैं , यह शिष्य का विचार हैं ,और ऐसी क्रिया होने पर शिष्यता की पगडण्डी पर आगे बढ़ने में
अग्रसर होता है

दीर्घोSवतंसं वदतं च नित्यं ,पूर्वो मैदान्ये परिपूर्ण रूपं I
ज्ञान सतां पूर्ण सदैव रूपं, शिष्यों वदान्यै वदतं वदैवं II

शिष्य शब्द बना हैं आज्ञा पालन से ,और शिष्य शब्द बना हैं निरंतर उनकी सेवा करने से I और सेवा और आज्ञा ये दो साधन हैं,जिसके माध्यम से शिष्य आगे की ओर अग्रसर होता हुआ पूर्णता को प्राप्त करता हैं ,जो सेवा नहीं कर सकता वह समर्पण भी नहीं कर सकता ,और जहाँ समर्पण नहीं हैं वहां शिष्यता भी नहीं हैं I

इसलिए शिष्यता के तीनो शब्द अपने आप में एकार्थी हैं ! सेवा,समर्पण और शिष्यता तीनों का एक ही अर्थ हैं ,जहाँ सेवा हैं ,वहां समर्पण हैं ,जहाँ समर्पण हैं वहां शिष्यता हैं ,और जब यह तीनों का समन्वय होता हैं ,जहाँ तीनो तत्व एक साथ मिल जाते है,तब शिष्य आगे की बढ़ने के लिए अग्रसर होता हैं ,तब समझना चाहिए कि मैं आगे की ओर बढ़ रहा हूँ I

सही समय पर उनकी सेवा करना जरुरी हैं ,और निरंतर जैसे चकोर ,चाँद को ताकता रहता हैं ,उसी प्रकार से निरंतर हमारी आँखे उनके चरणों की ओर ही टिकी रहें I

अभी मैंने श्लोक की व्याख्या करते हुए ,स्पष्ट किया कि गुरु की सेवा करना शिष्य का पहला कर्तव्य हैं ,और यह आगे बढ़ने की एक क्रिया है ,और आगे निरंतर आगे बढ़कर समर्पण की भावना में परिवर्तित हो जाती हैं I

क्योकि छाया की तरह गुरु के साथ रहना ,और उनकी सेवा में रत रहना उनकी प्रसन्न करने का हर क्षण मन में भाव रखना समर्पण है I

हर क्षण यहीं चिंतन रहे ,चाहे हम पास हो या दूर हो ,उनसे हजार किलोमीटर दूर हो ,पर हमारा चिंतन ,हर समय गुरु के चरणों में रहे
हर क्षण ऐसा प्रयत्न हो ,कि कोई तरीका हो और हम गुरु से बातचीत कर सके ,उनसे आज्ञा प्राप्त कर सके ,उनको कहें की आप हमें कोई आज्ञा दीजिये ,जिससे मैं उस काम को कर सकू I
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और यदि उन्होंने कोई काम सौपा हैं तो ,सारे कार्य को छोड़ कर उस कार्य को पहले संपन्न करे ,बिना किसी प्रकार का विचार किये ,ऐसी क्रिया को समर्पण कहा जाता हैं ,समर्पण का अर्थ हैं अपने आप को पूर्णता के साथ विसर्जित कर देने की क्रिया I

जो कुछ हम है,हमारी बुद्धि ,हमारी भावना,हमारे विचार ,हमारा चिंतन,हमारी देह,हमारे प्राण ,सब कुछ उनके चरणों में समर्पित करते हुए केवल इसी बात के लिए प्रयत्नशील रहे कि वे आज्ञा दे,और हम पालन करे इस बात का विचार किये बिना कि वह क्यों और क्या आज्ञा दे रहे हैं ?

और जब सेवा और समर्पण में शिष्य पारंगतता प्राप्त करता हैं,जब वह पूर्ण रूप से सेवामय बन जाता हैं ,जब वह पूर्ण रूप से समर्पणमय बन जाता हैं ,तो अपने आप साधना का उदय उसके प्राणो में होने लगता हैं I

उसके लिए फिर, मंत्र-जप जरुरी नहीं हैं,क्योकि सेवा ही मंत्र जप हैं,समर्पण ही अपने आप में पूरी साधना है,साधना करने के लिए ,काली का मंत्र-जप या लक्ष्मी का मंत्र-जप करना आवश्यक हैं ही नहीं I

इस लिए इस श्लोक के तीसरे चरण में ,यह कहा गया हैं की निरंतर उस गुरु मंत्र का जो गुरु ने मंत्र दिया है,उसको अपने होठो पर अंकित कर दे, हर क्षण वह गुरु मंत्र हमारे होठो से निकलता ही रहे ,,चौबीस घंटे नींद में भी अगर हमारे होठो से गुरु मंत्र निकलता हैं तो समझना चाहिए कि हमारे अंदर समर्पण की भावना आई हैं ,और ऐसा चिंतन,ऐसी क्रिया यदि साधक करता हैं ,तो फिर अन्य साधनाओ को करने की उसको जरुरत हैं ही नहीं !
क्योकि उन साधनाओ के करने के बाद ,भी क्या प्राप्त हो जायेगा ,वे साधनाये ,वे देवी-देवता तो अपने आप में गुरु में समाहित हैं I

गुरुब्रम्हा,गुरुविष्णु ,गुरुदेवो महेश्वर :
गुरु साक्षात् परब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नमः

वे तो साक्षात् पूर्ण ब्रम्ह हैं,! और जहाँ पूर्ण ब्रम्ह हैं ,वहां समस्त देवी-देवता स्थापित हैं , सैकड़ों देवी-देवताओ की हम कब तक साधना करेंगे ?इसकी अपेक्षा हम केवल गुरु को ही स्मरण कर ले ,हम केवल गुरु के प्रति ही समर्पित हो जाय ,हम केवल गुरु की साधना ही कर ले तो ,उन सभी देवी-देवताओ की साधना अपने आप ही हो जाती हैं I

ऐसी स्थिति तब प्राप्त होती हैं ,तब सही अर्थो में वह शिष्य बनने की क्रिया प्रारम्भ करता हैं I

और यह जीवन का सौभाग्य हैं,कि हम किसी के शिष्य हैं,
और यह जीवन का सौभाग हैंकि कोई हमारा गुरु हैं
यह हमारा सौभाग्य हैं कि,हमारे सिर पर किसी का हाथ है
यह हमारा सौभाग्य हैं की हमारे होठों से गुरु शब्द उच्चरित होता हैं,
यह हमारा सौभाग्य हैं कि हम गुरु के चरणों में बैठे हैं ,उनकी आज्ञाओ का पालन किया हैं,,मैंने अपने जीवन में उनकी सेवा की हैं ,उनको प्रसन्न करने का प्रयास किया हैं ,और उनसे वह दिव्यता ,वह तेजस्विता ,प्राप्त की हैं,जिसकी वजह से जीवन में पूर्णता और श्रेष्ठता प्राप्त होती हैं I

दिव्यो वदन्तं भवनित्यरुपं,चिन्त्यं विचिन्त्यं भवतां सदेवं
तापत्रयमपूर्ण मदैव रूपं,गुरुवै वदनयं गुरुवै वदनयं

जीवन के सारे सम्बन्ध स्वार्थ से युक्त हैं,यदि हमारी पत्नी हैं तो स्वार्थ की वजह से हमारी पत्नी बन सकी हैं,या हम उसके पति बने हैं तो स्वार्थ है ,यह स्वार्थ है की वह मेरे घर में रहे ,यह उसका भी स्वार्थ है कि मुझे पति मिले और यह स्वार्थ है की मेरे संतान उत्पन्न हो

और जिस क्षण पति नहीं रहता पत्नी के न तो प्राण निकलते है ,न ही वो मृत्यु को प्राप्त होती हैं I
चार -पांच दिन ,महीने ,दो महीने रो ले लेती हैं और वापिस उसका जीवन का क्रिया कलाप वैसा चलने लगता हैं ,जैसा पति के समय था,

यदि किसी की पत्नी की मृत्यु हो जाती है तो भी यही सब होता हैं ,हा,तुरंत दूसरी शादी की बात जरूर प्रारम्भ हो जाती हैं I

इसका तात्पर्य यह हुआ कि केवल स्वार्थ के आधार पर वह सम्बन्ध था ,पति और पत्नी का सम्बन्ध,पुत्र के सम्बन्ध ,पौत्र के सम्बन्ध ,भाइयो के सम्बन्ध , केवल स्वार्थ पर आधारित होते हैं I

यदि हम कमा कर देते हैं तो पिता हमारी प्रशंसा करता है ,और यदि हम कमा कर नहीं देते तो तो पिता हमें गालिया भी देता हैं ,हम अच्छे या बुरे नहीं होते ,बल्कि हमारा कमाना और नहीं कमाना की स्थिति अच्छी और बुरी होती है,नहीं कमा रहे हैं तो ख़राब हो गए ,और कमा कर दे रहे है तो सपूत और बुद्धिमान हो गए ,इसलिए कि पिता और पुत्र का सम्बन्ध स्वार्थ पर आधारित था I

पूरे समाज के संबंध स्वार्थ पर आधारित हैं ,चाहे मित्र हो ,पड़ोसी हो ,या रिश्ते -नाते वाला हो ,या चाहे कोई भी हो ,

“#मगर एक सम्बन्ध हमारा ऐसा भी हैं जिसमे कोई स्वार्थ नहीं हैं ,वह गुरु शिष्य सम्बन्ध है ,क्योकि गुरु बिलकुल अलग तत्व हैं ,और एक अलग तत्व होने के बावजूद भी हम उनसे जरुरत से ज्यादा प्रेम करते हैं ,और वह भी हमें उतना ही प्रेम करता हैं ,और स्नेह और अभय प्रदान करता हैं I”
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#इसलिए ये सम्बन्ध मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होते ,मृत्यु के बाद भी गुरु बिलकुल हमारे संपर्क में रहता है ,उस समय तक जब तक हम अन्य लोको में विचरण करते हुए ,वापिस जन्म नहीं ले लें ,वापस सयाने नहीं हो जाए, और वापस हम अपने गुरु के चरणों तक नहीं पहुंच जाये I

इसलिए उनका ऋण तो अपने आप में अद्वितीय ऋण हैं ,जिसको हम उतार ही नहीं सकते ,और जो गुरु से सम्बन्ध नहीं रख सकता ,जो गुरु को प्रसन्न नहीं कर सकता वह संसार के किसी को भी प्रसन्न नहीं कर सकता ,वह तो अपने आप को भी प्रसन्न नहीं कर सकता ,वह देवताओ को भी प्रसन्न नहीं कर सकता I

#जो गुरु-मंत्र का सही ढंग से जप नहीं कर सकता ,वक साधना के मंत्र-जप कैसे करेगा ?
ये तो संभव ही नहीं हैं

इसलिए तो इन क्षण भंगुर सम्बन्धो को ,क्योकि कोई हमारा भाई हैं तो तब तक है जब तक हम जीवित है ,जहाँ हम मृत्यु को प्राप्त हुए ,तो हमारा सम्बन्ध समाप्त हो जाता हैं I
हमारा पिता से सम्बन्ध समाप्त हो जाता हैं ,पिता के समाप्त होने पर हम कहते हैं की जल्दी से जल्दी इस लाश को ले जाओ और श्मशान में जला दो ,इसे ज्यादा देर तक रखना ठीक नहीं हैं I

..........अरे जो तुम्हारा पिता था ,जीवन भर उसने तुमको पाला ,बड़ा किया तुम्हे कमा कर दिया तुम्हे सुख प्रदान किया ,और मृत्यु के घंटे- दो घंटे बाद ही तुम उसे जलने की कोशिश करने में लग जाते हो ,कितना स्वार्थमय सम्बन्ध हैं I

#और आप लोगो के साथ भी यही होने वाला हैं ,आपको केवल १ दिन जिस आपका श्राद्ध होगा उस दिन ही याद किया जायेगा ,बस कहा जायेगा लो बाबूजी २ चमच्च घी पी लो और खाना खालो .....बस I

और जैसा मैंने बताया कि गुरु और शिष्य का सम्बन्ध स्वार्थमय नहीं होता मृत्यु के बाद भी गुरु तत्व उसके साथ रहता हैं ,बराबर गुरु उसके प्राण तत्व पर ध्यान रखता हैं I

गुरु प्रयत्नशील रहता हैं कि मेरा शिष्य वापस जन्म ले ,जन्म ले ले और वापस मेरे चरणों में पहुंच जाय ,इस पूरी प्रक्रिया तक गुरु और शिष्य के सम्बन्धो को संसार का ,ब्रम्हांड का अद्वितीय सम्बन्ध कहा गया हैं ,और इसके लिए जीवन में जरुरी हैं ,हम दौड़ कर हुलस करके गुरु के पास पहुंचे I

इस प्रकार से उल्लसित होते हुए जाय ,जिस प्रकार से एक बछड़ा दौड़ कर गाय के पास पहुंच जाता हैं ,अपनी माँ के पास पहुंचने में उस बछड़े को कितनी ख़ुशी होती हैं ,कितना आनंद होता हैं ,ठीक इसी उछल-कूद के साथ हम गुरु चरणों के पास पहुंचे ,यदि गुरु ने आवाज दी है तो ,और यदि गुरु ने आवाज नहीं दी है तो भी हमारा कर्तव्य हैं कि हम उनके चरणों में पहुंचने का प्रयत्न करे I

उनके चरणों को कातर दृष्टि से देखे ,हम खड़े रहे ,उनकी आज्ञा को प्राप्त करे ,और उनकी आज्ञा पालन करे ,उनकी आज्ञा अपने आप में आज्ञा नहीं है ,यह हमारे जीवन के लिए सौभाग्य की बात हैं ,कि हजारो-हजारो शिष्यों में से ,हमें ही काम सौपा I

यह हमारा शरीर एक मुट्ठी भर राख से ज्यादा मूलयवान नहीं हैं ,हम चाहे इसपर कितना ही गर्व करे ,घमंड करे ,इसमें कुछ नहीं हैं,!और सही अर्थो में देखा जाय जो जीवित रहते इसमें लार,थूक,मल ,मूत्र ,रक्त,मज्जा ,के अलावा और इस शरीर में हैं ही क्या ?

फिर भी गुरु ने अपने प्राणो से इस शरीर को पवित्र किया ,हमारे शरीर को स्पर्श किया हैं,हमें गुरु गुरु-दीक्षा प्रदान की हैं ,और हमारे कार्यो का उपयोग करना शुरू किया हैं ,हमें अपने पास बुलाया हैं और हमें कार्य सौपा हैं ,जो शिष्य प्रसन्नता के अतिरेक में उनके चरणों में पहुंच जाता हैं,वह सही अर्थो में शिष्य है I

और उनके चरणों में इस प्रकार बैठ जाय जिस प्रकार से जब चिड़िआ दाना लेने के लिए बाहर जाती हैं और जब अपने घोंसले में वापस लौटती हैं ,तब चिड़िया का बच्चा किस प्रकार से हुमस करके उसके पंखो के नीचे छिप जाता हैं ,उसके सीने से चिपक जाता हैं ,अपनी माँ के सीने से चिपक कर वह बिलकुल निर्भयता अनुभव करने लग जाता हैं I

उसी प्रकार से हम गुरु के चरणों से लिपट जाय ,अपने-आप को सुरक्षित कर ले, और उनके चरणों में एकाकार हो जाय I

जिस प्रकार से एक बेल ,पेड़ के चारो तरफ लिपट कर एकाकार हो जाती हैं उसी प्रकार से हम अपने हाथो को बेल बना करके गुरु के चरणों से लिपट जाय ,,और अगर ऐसी स्थिति हमारे जीवन की हैं, और बनती हैं ,तो हम शिष्य हैं ,और यह शिष्यता की एक श्रेष्ठता हैं I

यह जरुरी नहीं की गुरु आपको बुलाये ,?
यह जरुरी नहीं की गुरु आपको आज्ञा दे,?
यह जरुरी नहीं की गुरु आपको आवाज दे?
यह जरुरी नहीं की गुरु आपको कार्य सौपे ?

मगर यह जरुरी है की हम जाए,उनकी आज्ञा के लिए प्रतीक्षारत रहे ,और जिस दिन वे आज्ञा दे, वह दिन हमारे लिए ,उत्सवमय बन जाए,क्योकि उस दिन उन्होंने आज्ञा दी और हमने काम किया ,ऐसी स्थिति तब बनती हैं,जब शिष्यता और समर्पण की स्थिति बनती हैं,तब सही अर्थो में समझ सकते हैं कि हम शिष्य हैं I
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