✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें।
ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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मुख से जैसे ही ॐ का उच्चारण किया जाता है, तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश का ध्यान हो जाता है। भगवान के संपूर्ण स्वरूप का ध्यान करना है, तो ॐ का उच्चारण कीजिए।

वैदिक रुद्री में रुद्र की समस्त संहारक शक्तियों का वर्णन मिलता है। यह सत्य है कि भगवान शिव की संहारक शक्ति में ही संसार का कल्याण है। यदि शिव में संहारक शक्ति न हो, तो असंख्य जीवात्माओं के धर्म-अधर्म के अनुसार समय पर और तत्वों के क्रमपूर्वक संहार कौन करे। शिव की इसी शक्ति के कारण ही ब्रह्मा और विष्णु महत्व वाले हुए।

संहारक शक्ति के बिना निर्माण और पालन का क्या महत्व? संहारक शक्ति के कारण ही शिवजी की अन्य देवताओं की अपेक्षा अधिक पूजा होती है। पूर्णतः सच है कि शिवजी के संहार में ही संसार का कल्याण है।

शिव मंदिर में कुछ प्रतीक प्रायः देखने को मिलते हैं- नन्दी, कछुआ, गणेश, हनुमान, जलधारा एवं सर्प। प्रत्येक शिव मंदिर में पहले नन्दी के दर्शन होते हैं। यह भगवान शिव का वाहन है। जैसे महादेव का वाहन नन्दी है, वैसे ही हमारी आत्मा का वाहन शरीर है। शिव से आत्मा का बोध होता है और नन्दी से शरीर का। जैसे नन्दी की दृष्टि सदा शिव की ओर होती है, वैसे ही हमारे शरीर का लक्ष्य भी हमारी आत्मा हो।

शिव का अर्थ है कल्याण। सभी के कल्याण की भावना मन में हो, सदैव सभी की मंगलकामना करे, तो जीव शिव बन जाता है। वस्तुतः अपनी आत्मा में शिव को प्रकट करना ही शिव पूजा का लक्ष्य है।

आत्मा में शिव प्रकट हो जाए, इसके लिए सबसे पहले आत्मा के वाहन शरीर को उपयोगी बनाना होगा। जैसे नन्दी की दृष्टि शिव की ओर होती है, वैसे ही हमारा शरीर भी सदैव आत्मदर्शन के लिए प्रयत्न करता रहे। शरीर के स्वस्थ एवं आत्मदर्शन के लिए यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि का आश्रय लेना चाहिए। नन्दी के प्रतीक के द्वारा यही संदेश दिया जाता है।
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अपना भला, अपनों का भला और जग का भला यह तीनों स्थितियाँ मानव मन की विकास यात्रा को दर्शाती हैं — स्वार्थ से परमार्थ तक की यात्रा। आइए इन्हें एक-एक कर विवेचित करें:

1. जो केवल अपना भला चाहते हैं: (स्वार्थ केंद्रित अवस्था)

यह स्थिति मनुष्य की प्रारंभिक मानसिक अवस्था को दर्शाती है। इसमें व्यक्ति का ध्यान मुख्यतः अपनी सुख-सुविधा, सुरक्षा और सफलता पर रहता है।
यह अवस्था आवश्यक भी होती है क्योंकि जीवन का आरंभ आत्मरक्षा और आत्मविकास से ही होता है।
परंतु यदि व्यक्ति केवल अपने भले तक सीमित रह जाए, तो वह स्वार्थी या अहंकारी भी हो सकता है।
इसका दायरा सीमित होता है और आत्मकेन्द्रित जीवन अंततः अकेलापन या असंतोष भी दे सकता है।

2. जो अपनों का भला चाहते हैं: (सामाजिक/संकीर्ण परमार्थ की अवस्था)
यह स्थिति पहले से उन्नत है। इसमें व्यक्ति अपने परिवार, मित्रों, जाति, धर्म, देश आदि के कल्याण की भावना रखता है।
इसमें अपनत्व जुड़ता है, और सेवा, त्याग जैसे गुण उभरते हैं।
यह अवस्था समाज के निर्माण और संरचना के लिए अत्यंत आवश्यक है।
परंतु यह भी सीमित परमार्थ है, क्योंकि "अपनों" की परिभाषा प्रायः सीमित ही होती है। इसमें "पराए" अभी भी बाहर ही रहते हैं।

3. जो सबका भला चाहते हैं: (विराट परमार्थ/अहं-शून्यता की अवस्था)
यह अवस्था आध्यात्मिक उन्नयन की चरम अवस्था मानी जाती है।
इसमें व्यक्ति की दृष्टि संकीर्ण नहीं, वसुधैव कुटुम्बकम् की हो जाती है।
यह अवस्था आत्मा के अनुभव से आती है, जब व्यक्ति सबको एक ही आत्मा का अंश मानने लगता है।
ऐसे व्यक्ति में न स्वार्थ रहता है, न पक्षपात — केवल करुणा, प्रेम और सेवा भाव।
यह स्थिति संतों, महापुरुषों, और ईश्वरावतारों में पाई जाती है, जो किसी विशेष के लिए नहीं, समस्त जगत के लिए कार्य करते हैं

यह तीनों अवस्थाएं एक क्रमशः उन्नत होती हुई चेतना की अवस्था को दर्शाती हैं:
स्व-हित → स्वजन-हित → सर्व-हित।
मनुष्य की यात्रा इन अवस्थाओं से होकर ही पूर्णता की ओर बढ़ती है।
जहाँ पहली दो अवस्थाएं मानव स्वभाव के अंग हैं, वहीं तीसरी अवस्था मानव धर्म का सार है।
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कहानी का समय

गरीब का झोपड़ा


गरीब आदमी की झोपड़ी पर एक रात बहुत जोर की वर्षा हो रही थी। साधु था; छोटी सी झोपड़ी थी। स्वयं और उसकी पत्नी, दोनों सोए थे। आधी रात किसी ने द्वार पर दस्तक दी। साधु ने अपनी पत्नी से कहा: उठ, द्वार खोल दे। पत्नी द्वार के करीब सो रही थी।

पत्नी ने कहा: इस आधी रात में जगह कहां है कोई अगर शरण मांगेगा तो तुम मना न कर सकोगे । वर्षा जोर की हो रही है। कोई शरण मांगने के लिए ही द्वार आया होगा । जगह कहां है? उस साधु ने कहा: जगह? दो के सोने के लायक काफी है, तीन के बैठने के लायक काफी होगी। तू दरवाजा खोल!

लेकिन द्वार आए आदमी को वापिस तो नहीं लौटाना है। दरवाजा खोला। कोई शरण ही मांग रहा था; भटक गया था और वर्षा मूसलाधार थी। तीनों बैठकर गपशप करने लगे। सोने लायक तो जगह न थी । थोड़ी देर बाद किसी और आदमी ने दस्तक दी फिर साधु ने अपनी पत्नी से कहा: खोल। पत्नी ने कहा: अब करोगे क्या, जगह कहां है? अगर किसी ने शरण मांगी?

उस साधु ने कहा अभी बैठने लायक जगह है फिर खड़े रहेंगे मगर दरवाजा खोल। फिर दरवाजा खोला। फिर कोई आ गया। अब वे खड़े होकर बातचीत करने लगे। इतना छोटा झोपड़ा और तब अंततः एक गधे ने आकर जोर से आवाज की दरवाजे को हिलाया। साधु ने कहा: दरवाजा खोलो।

पत्नी ने कहा: अब तुम पागल हुए हो, यह गधा है, आदमी भी नहीं साधु ने कहा: हमने आदमियों के कारण दरवाजा नहीं खोला था, अपने हृदय के कारण खोला था। हमें गधे और आदमी में क्या फर्क हमने मेहमानों के लिए दरवाजा खोला था। उसने भी आवाज दी है। उसने भी द्वार हिलाया है। उसने अपना काम पूरा कर दिया, अब हमें अपना काम पूरा करना है। दरवाजा खोलो!

उसकी औरत ने कहा: अब तो खड़े होने की भी जगह नहीं है साधु ने कहा: अभी हम जरा आराम से खड़े हैं, फिर सटकर खड़े हो जाएंगे और याद रख एक बात कि यह कोई अमीर का महल नहीं है कि जिसमें जगह की कमी हो! यह गरीब का झोपड़ा है, इसमें खूब जगह है!

यह कहानी मैंने पढ़ी, तो मैं हैरान हुआ। उसने कहा: यह कोई अमीर का महल नहीं है जिसमें जगह न हो। यह गरीब का झोपड़ा है, इसमें खूब जगह है जगह महलों में और झोपड़ों में नहीं होती, जगह हृदयों में होती है। अक्सर तुम पाओगे, गरीब कंजूस नहीं होता।

कंजूस होने योग्य उसके पास कुछ है ही नहीं। पकड़े तो पकड़े क्या? जैसे जैसे आदमी अमीर होता है, वैसे वैसे कंजूस होने लगता है; क्योंकि जैसे जैसे पकड़ने को होता है, वैसे वैसे पकड़ने का मोह बढ़ता है, लोभ बढ़ता है।
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*"बुद्धिमान" वह है जिसे अपने दूरवर्ती स्वार्थ का ज्ञान है और बीज बोकर फसल उगाने जैसी नीति अपनाता है।* अदूरदर्शी तात्कालिक लाभ देखते हैं। उसी को प्रधानता देते हैं और अपनी गतिविधियों के लिए उत्साह प्रदर्शित करने एवं प्रयास करने में इसी आधार पर कदम बढ़ाते हैं। अन्यान्य जीव जन्तुओं में इतनी ही कमी होती है कि वे जो भी सोचते या करते हैं उसमें तात्कालिक लाभ ही प्रधान होता है, क्योंकि प्रत्यक्ष की परिधि इतनी ही छोटी है। *वे लोभ को ही प्रधानता देते हैं। कुछ छोड़ना पड़े तो उसका एक ही कारण होता है - भय।* जिन्हें बलिष्ठता की दृष्टि में दुर्बल पाया जाय उसी पर आक्रमण कर दौड़ना यही उनका व्यवसाय होता है। *बलिष्ठों से जूझने में "पराक्रम" तो है। "अहंकार" की पूर्ति भी होती है। पर इसे वे इसलिए छोड़ देते हैं कि जोखिम उठाना स्वीकार नहीं होता।* युद्ध में परास्त होने वाला या अपनी हार भांपने वाला पशु किसी प्रकार जान बचाने के लिए भागने का प्रयत्नकरता है।
👉 *किन्तु मानवी विशेषता इससे कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी होती है। उसे अपने गौरव का भान होता है।* इसलिए सरलतापूर्वक उठाये जाने वाले लाभ की भी अनीति की आत्म-प्रताड़ना सहने के लिए तैयार नहीं होगा। *अनेकों समर्थों ने हाथ आये लाभदायक अवसरों का इसलिए परित्याग कर दिया कि उनकी मौलिक विशेषता-"न्यायशीलता" ने ऐसा करने से रोका, फलतः हानि सहकर भी "नीति" की रक्षा की।*
👉 *"बुद्धि" से एक सीढ़ी ऊंची मनःस्थितिको "विवेक" कहते हैं।* बुद्धि की सीमा इतनी ही है कि लाभ भी कमा लें और दुष्परिणाम भी न भुगतें। *उसकी मर्यादा इतनी ही है कि "निन्दा" और "प्रताड़ना" सामने लाने वाले स्वार्थ की अतिशयता तक कदम न बढ़ायें। "लाभ" उठाता रहे और "अनीति" से बचता रहे। ऐसे लोगों को "चतुर" कहते हैं।* ऐसे लोग सम्पन्नता और सफलता तो अर्जित करते हैं, पर उसकी कीमत इस सीमा तक नहीं चुकाते कि अप्रामाणिक ठहराये जावें और अपयश के भागी बनें।
👉 *"विवेक" सबसे ऊंची स्थिति है।* उसमें व्यक्तित्व को भौतिक वातावरण से, चिन्तन क्षेत्र की बुद्धिमता से ऊंचा उठाकर वहां ले जाया जाता है जहां समूह मन का अधिपत्य है । *जिस प्रकार "ब्रह्माण्ड" के अनेक घटक होने पर भी एक ब्रह्माण्डीय "व्यवस्था" और "चेतना" काम करती है, उसी प्रकार प्राणि मन से ऊंचा उठकर उसका एक सामूहिक स्वरूप भी है, जिसे "परब्रह्म" या "परमात्मा" कहते हैं ।* जिस प्रकार पृथ्वी ब्रह्माण्ड का एक छोटा घटक है *उसी प्रकार व्यक्ति का "मन" जिसमें "बुद्धि" और "विवेक" भी सम्मिलित ब्रह्म चेतना का एक अंग या अंश है ।* शासन में जिस प्रकार समस्त प्रजा जनों के स्वार्थों का समावेश होता है, *उसी प्रक्रार ब्रह्माण्डव्यापी मनस् का लघु अंश व्यक्ति का "विवेकशील" "मन" भी है, जो अपनी निज की सीमा में सीमित न रहकर इस समस्त विश्व के स्वार्थ और हित का समन्वय सोचता है।* जिसकी दृष्टि इस केन्द्र पर केन्द्रीभूत होती है कि प्राणी छोटी परिधि से बाहर निकल कर विराट् की सुव्यवस्था में अपना योगदान दे ।
👉 *इस स्तर की चेतना में पहुंचा हुआ "अहम्" "मैं" न रहकर "हम" हो जाता है। यह "हम", इतना बड़ा होता है जिसमें "चेतन" ही नहीं समग्र जड़ भी समा सके। तब "स्वार्थ" की परिभाषा "परमार्थ" हो जाती है। चिन्तन "समष्टिगत" हो जाता है और हित साधन की परिधि में सबकुछ समा जाता है।*
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श्रीपदमा लक्ष्मी स्तोत्रम्"

— ५४ श्लोकों में रचित एक सुंदर स्तोत्र, जो सौंदर्य, ऐश्वर्य, गृहलक्ष्मी, सौभाग्य सुख-शांति और धन-समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी पदमा लक्ष्मी को समर्पित है। प्रत्येक श्लोक पद्मा लक्ष्मी के सौम्य, शुभ्र और कमलवत स्वरूप का वर्णन करता है:
इसके पाठ से जीवन की सभी भौतिक कामनाएं पूरी होती है
सुख समृद्धि मिलती है।

ॐ ह्रीं श्रीं क्षीं पद्मायै नमः।
ॐ महापद्मायै च विद्महे पद्मकोषधिष्ठायै धीमहि
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥

🍁१
पद्मालयां पद्महस्तां पद्माक्षीं पद्मवासिनीम्।
पद्मरूपां पद्मगन्धां वन्दे पद्मां शुभप्रदाम्॥

अर्थ
जो पद्म (कमल) में निवास करती हैं, कमल के समान नेत्रों वाली हैं, हाथों में कमल धारण करती हैं — उन पद्मा लक्ष्मी को मैं प्रणाम करता हूँ, जो सौंदर्य और शुभता की दात्री हैं।

🍁२.
शुभ्रवर्णां च सुश्रोणिं पद्मरागविभूषिताम्।
सर्वाभरणसंयुक्तां वन्दे पद्मां मनोरमाम्॥

अर्थ
जो उज्ज्वल वर्ण वाली हैं, कमनीय कटीवाली हैं, रत्नों से सुशोभित हैं और सम्पूर्ण आभूषणों से अलंकृत हैं — उन मनोहर पद्मा देवी को प्रणाम।

🍁३.
कान्तारूपां च सौम्यां च श्रीपद्मां विश्वपूजिताम्।
सर्वलोकहितार्थाय नमामि पद्मसन्निभाम्॥

अर्थ
जो सौंदर्यमयी, सौम्यस्वरूपा और सम्पूर्ण लोकों द्वारा पूजित हैं — पद्मसदृश तेज वाली उन श्रीपद्मा देवी को मैं प्रणाम करता हूँ।

🍁४
.पद्मगर्भा पद्मनाभप्रिया च पद्मवासिनी।
पद्ममालाधरा नित्यं पद्मा लक्ष्मी नमोऽस्तु ते॥

अर्थ
जो कमल की नाभि में उत्पन्न हैं, विष्णु की प्रिय हैं, कमल पर निवास करती हैं, कमलमालाधारिणी हैं — हे पद्मा लक्ष्मी! आपको मेरा नित्य प्रणाम।

🍁५.
पद्मालया पद्ममुखी पद्मनाभस्य शारदा।
पद्मपद्मे शुभं देहि मे गृहे धनसमृद्धिताम्॥

अर्थ
हे कमल सदृश मुखवाली, पद्मनाभ की प्रिया, कमल निवासिनी देवी! मुझे मेरे गृह में शुभता और धन-समृद्धि प्रदान कीजिए।

🍁६
श्रीपद्मिनीं शशाङ्काभां शुभ्रवस्त्रां मनोहराम्।
कमलासनसंस्थां तां वन्दे पद्मां शिवप्रदाम्॥

अर्थ
मैं शुभ्र वस्त्रधारी, चंद्रमा जैसी उज्ज्वल, मनोहर रूपवाली, कमलासन पर विराजमान और कल्याणकारी पद्मा देवी को नमन करता हूं

🍁७
पद्माक्षीं पद्महस्तां च पद्मगन्धानुलेपनाम्।
सर्वसौभाग्यजननीं वन्दे श्रीपद्मवासिनीम्॥

अर्थ
कमल-नयना, हाथों में कमल धारण करने वाली, जिनके शरीर में कमल-सुगंधित लेप है, ऐसी सम्पूर्ण सौभाग्य की जननी श्रीपद्मा को मैं प्रणाम करता हूं

🍁८
शान्तां सौम्यामृदुहसितां शरणागतवत्सलाम्।
हरिणीं स्वर्णवर्णाभां लक्ष्मीं पद्मां नमाम्यहम्॥

अर्थ
जो शांत, सौम्य, मृदु मुस्कान वाली, शरणागत भक्तों पर करुणा बरसाने वाली, हरिणी जैसी कोमल चाल वाली और स्वर्णवर्णा लक्ष्मी हैं — ऐसी पद्मा को मैं प्रणाम करता हूँ।

🍁९
पद्ममालाविभूषाढ्यां पद्मरागविभूषिताम्।
पद्मासनां पद्मनाभप्रियामम्बां नमोऽस्तु ते॥

अर्थ
कमलमाला से सुशोभित, पद्मराग रत्नों से अलंकृत, कमलासन पर विराजमान, पद्मनाभ विष्णु की प्रिया देवी पद्मा को मेरा बारंबार नमस्कार है।

🍁१०
भक्तानुकम्पिनीं नित्यां विशालवदनाम्बिकाम्।
करुणारसपूर्णाक्षीं वन्दे पद्मां विलासिनीम्॥

अर्थ
जो भक्तों पर सदा करुणा बरसाने वाली, नित्य स्थायी, विशाल मुखवाली, करुणा से भरी दृष्टि वाली, और सौंदर्य की प्रतीक हैं — ऐसी पद्मा को प्रणाम है।

🍁११
मृणालमृदुलांगिं च मधुरस्वरभाषिणीम्।
शारदामिव सुज्ञेयां वन्दे पद्मां विशालधीम्॥

अर्थ
जिनके अंग मृणाल की तरह कोमल हैं, जो मधुर स्वर में बोलती हैं, जो सरस्वती के समान ज्ञानमयी हैं — ऐसी विशाल बुद्धिवाली पद्मा देवी को मैं वंदन करता हूँ।

🍁१२
या लक्ष्मीः श्रीहरेः हृद्ये नित्यं पद्मनिभा स्थिता।
सा पद्मा मे सदा भूयात् कृपया मम मङ्गले॥

अर्थ
जो कमलवत रूपवाली लक्ष्मी श्रीहरि के हृदय में नित्य निवास करती हैं — वे पद्मा देवी मेरी कृपा से मंगलदायिनी बनकर सदा उपस्थित रहें।

🍁१३
सर्वार्थदां शुभां दान्तां दीपवर्णां दिवाकराम्।
प्रसन्नवदनामिन्दुमुखीं वन्दे सदा पद्मकाम्॥

अर्थ
जो सभी प्रयोजन पूर्ण करती हैं, शुभदायिनी हैं, संयमिनी हैं, दीप की ज्योति जैसी दीप्तिमयी हैं, प्रसन्न मुखवाली और चंद्रमुखी हैं — मैं सदा उन्हें प्रणाम करता हूँ।

🍁१४
धनदां धर्मसम्पन्नां कीर्तिपुष्टिविवर्धिनीम्।
विजयप्रदां वरदां च वन्दे पद्मां महेश्वरीम्॥

अर्थ
धन देने वाली, धर्म से परिपूर्ण, कीर्ति और पुष्टि बढ़ाने वाली, विजय और वरदान प्रदान करने वाली महेश्वरी पद्मा को मैं नमस्कार करता हूँ।

🍁१५
या गृहेषु सदा तिष्ठेत् भक्त्या स्तुत्या समर्चिता।
सा मे वसतु नित्यं हि पद्मा लक्ष्मीः प्रसन्नता॥

अर्थ
जो भक्तिभाव, स्तुति और पूजा के साथ घरों में सदा निवास करती हैं — वही प्रसन्न मुद्रा वाली पद्मा लक्ष्मी मेरे घर में सदा निवास करें।

🍁१६
यस्यां सदा निवसति सुखसमृद्धिरव्यया।
तां नमामि श्रीपद्मां धर्मकामार्थदायिनीम्॥
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अर्थ
जिस देवी के निवास से नित्य सुख और अविनाशी समृद्धि बनी रहती है — धर्म, काम और अर्थ प्रदान करने वाली उस श्रीपद्मा को मैं नमस्कार करता हूँ।

🍁१८
नवपद्मोपमा देवी नवग्रहाधिपार्चिता।
सप्तर्षिपूजिता भक्त्या वन्दे पद्मां वरप्रदाम्॥

अर्थ
जो नवपद्म जैसी सुंदर हैं, नवग्रहों द्वारा पूजित हैं, सप्तर्षियों द्वारा आदरपूर्वक वंदिता हैं — उन वर देने वाली पद्मा देवी को मैं प्रणाम करता हूँ।

🍁१९
चन्द्रकान्तिमयी देवी चन्द्रकलाभूषिता।
चिन्मात्रस्वरूपा नित्यं वन्दे पद्मां जगद्गुरुम्॥

अर्थ
चंद्रकांति से युक्त, चंद्रकलाओं से अलंकृत, केवल चैतन्यस्वरूपा, नित्य, और जगद्गुरु स्वरूपा पद्मा देवी को मैं नमन करता हूँ।

🍁२०
सर्वविद्याप्रदात्रीं च सौन्दर्यगुणवर्धिनीम्।
मोहिनीं मातरं शुभ्रां पद्मां लक्ष्मीं नमोऽस्तु ते॥

अर्थ
जो सभी विद्याओं की दात्री हैं, सौंदर्य और गुणों को बढ़ाने वाली हैं, मोहिनी स्वरूपा शुभ्र माता लक्ष्मी पद्मा को मैं नमस्कार करता हूँ।

🍁२१
या वसुंधरया पूर्णा या धनाढ्या समुज्झ्वला।
या दात्री सर्वसम्पत्तेः तां वन्दे पद्ममालिनीम्॥

अर्थ
जो सम्पूर्ण पृथ्वी को परिपूर्ण करती हैं, अत्यंत धनाढ्य और उज्ज्वल स्वरूपा हैं, समस्त ऐश्वर्य की दात्री पद्ममाला धारण करने वाली देवी को मैं प्रणाम करता हूँ।

🍁२२
सिन्दूरारुणवर्णाभां सर्वाभरणभूषिताम्।
कमलासनवासिनीं तां वन्दे श्रीपद्मरूपिणीम्॥

अर्थ
सिन्दूर के समान अरुण वर्ण वाली, समस्त आभूषणों से विभूषित, कमलासन पर विराजमान, श्रीपद्मा रूपिणी देवी को मैं नमन करता हूँ।

🍁२३
या यज्ञफलदा देवी या भक्तिप्रदायिनी।
या बुद्धिधनदात्री च सा मे पद्मा स्थिता सदा॥

अर्थ
जो यज्ञों का फल देती हैं, भक्तिभाव प्रदान करती हैं, बुद्धि और धन की दात्री हैं — वही पद्मा देवी मेरे समीप सदा स्थित रहें।

🍁२४
शुभदां शान्तिदां त्वां हि सर्वमङ्गलमङ्गलाम्।
याच्ञेऽहं करुणां त्वत्तः सदा श्रीपद्मरूपिणि॥

अर्थ
हे शुभदायिनी, शांतिदायिनी, समस्त मंगलों की जननी पद्मा! मैं आपसे सदा करुणा की याचना करता हूं।

🍁२५
त्वं मातरिन्दिरा नित्यं त्वं वाणी त्वं सरस्वती।
त्वं च कालत्रये दात्री लक्ष्मीः पद्मा नमोऽस्तु ते॥

अर्थ
हे माता इन्दिरा! आप नित्य विद्या की स्वरूपा वाणी हैं, आप ही सरस्वती हैं, तीनों कालों में देने वाली लक्ष्मी पद्मा को मैं नमन करता हूँ।

🍁२६
त्वया हीनं गृहमिदं शून्यमिव विभाति हि।
त्वदागमात्सदा तत्र सर्वलक्ष्म्यः प्रतिष्ठिताः॥

अर्थ
आपके बिना यह गृह जैसे शून्य प्रतीत होता है। आपके आगमन से वहाँ सभी प्रकार की लक्ष्मियाँ प्रतिष्ठित हो जाती हैं।

🍁२७
त्वं कामिनी त्वं कल्याणी त्वं कान्तिः परमेश्वरी।
त्वं मूलप्रकृतिः देवी लक्ष्मीः पद्मे नमोऽस्तु ते॥

अर्थ:
आप ही सृष्टि की आद्य शक्ति कामिनी हैं, आप ही कल्याणमयी देवी हैं, आप ही सौंदर्य और दिव्य तेज की अधिष्ठात्री हैं। आप ही मूल प्रकृति हैं — हे लक्ष्मी पद्मे! आपको बारंबार नमस्कार।

🍁२८
मङ्गलायै शुभायै च महादेव्यै दयार्णवाम्।
पतिव्रतायै पुण्यायै वन्दे पद्मां परां शुभाम्॥

अर्थ:
जो समस्त मङ्गल की मूल हैं, जो स्वयं शुभता की अधिष्ठात्री हैं, जो महान देवी हैं, दया की समुद्र समान हैं, पतिव्रता स्वरूपा हैं और पुण्यमयी हैं — ऐसी परम शुभा पद्मा देवी को मैं प्रणाम करता हूँ।

🍁२९
अष्टलक्ष्मीस्वरूपां च नवदुर्गां महेश्वरीम्।
त्रिगुणां त्रिकलाज्ञां तां वन्दे पद्मां जगन्मयीम्॥

अर्थ:
जो अष्टलक्ष्मी स्वरूपा हैं, नवदुर्गा के रूप में पूज्य हैं, महेश्वरी रूप में सर्वशक्ति सम्पन्न हैं, जो तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) से युक्त हैं और त्रिकाल को जानने वाली हैं — उस जगन्मयी पद्मा को मैं वंदन करता हूँ।

🍁३०
योगिनीनां वरा देवी ध्यानवेद्याऽखिलेश्वरी।
कुण्डलिन्याः सदा शक्तिः सेव्यां पद्मां नमाम्यहम्॥

अर्थ:
जो समस्त योगिनियों में श्रेष्ठ हैं, ध्यान द्वारा जानने योग्य हैं, समस्त ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री हैं, कुण्डलिनी शक्ति के रूप में सदा विराजमान हैं — उस साधना योग्य पद्मा देवी को मैं नमन करता हूँ।

🍁३१
तुलसीवनमध्यस्था पीताम्बरधरा शुभा।
हरिप्रिया हरिः स्वायं या मध्ये सेवते सदा॥

अर्थ:
जो तुलसी वन के मध्य में विराजमान हैं, पीतांबर धारण किए हुए शुभरूपा हैं, जो भगवान हरि की अत्यंत प्रिय हैं और स्वयं श्रीहरि जिनकी सेवा करते हैं — वे लक्ष्मी स्वरूपा पद्मा सदा वंदनीय हैं।

🍁३२
भृगुपुत्र्या सुरश्रेष्ठा वरदा भक्तवत्सला।
वेदमाता धर्मधारिणी पद्मा लक्ष्मी नमोऽस्तु ते॥

अर्थ:
जो भृगु ऋषि की पुत्री हैं, समस्त देवों में श्रेष्ठ हैं, वर देने वाली हैं, भक्तों पर सदा दया करने वाली हैं, जो वेदमाता हैं और धर्म की धारिणी हैं — उस पद्मा लक्ष्मी को मेरा प्रणाम।

🍁३३
कर्पूरगौरां कल्याणीं कमलासनसन्निभाम्।
चतुर्भुजां च सौम्यां तां वन्दे पद्मां सनातनीम्॥
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अर्थ:
जो कर्पूर के समान गौरवर्णा हैं, कल्याणदायिनी हैं, कमलासन पर विराजमान हैं, चतुर्भुजा हैं और अत्यंत सौम्य स्वरूपा हैं — उन सनातन स्वरूपा पद्मा देवी को मैं प्रणाम करता हूँ।

🍁३४
स्वर्णसिंहासनारूढां चन्द्रहासविलोकिनीम्।
रत्नदीपप्रभाभासां वन्दे पद्मां मनोहराम्॥

अर्थ:
जो स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं, जिनकी दृष्टि चंद्रमा की मुस्कान जैसी है, जो रत्नों से प्रकाशित दीपों के समान प्रकाशमान हैं — उन मनोहर पद्मा देवी को मैं नमन करता हूँ।

🍁३५
मन्दस्मितां सुमधुरां सिंधुकन्याप्रभामिव।
महामायां महाविद्यां वन्दे पद्मां शुभप्रदाम्॥

अर्थ:
जो मंद मुस्कान से शोभित हैं, मधुरता की मूर्ति हैं, जिनकी आभा सिंधुकन्या (समुद्रजन्मा) के समान दीप्तिमयी है, जो महा माया और महा विद्या स्वरूपा हैं — उन शुभदायिनी पद्मा को मैं प्रणाम करता हूँ।

🍁३६
श्रीसुक्तवेद्यां सर्वज्ञां देवपत्नीसुपूजिताम्।
महाश्रीं शाश्वतीं देवीं वन्दे पद्मां सुरार्चिताम्॥

अर्थ:
जो श्रीसूक्त में वर्णित हैं, सर्वज्ञ हैं, जिनकी सभी देवपत्नियाँ भक्तिपूर्वक पूजा करती हैं, जो महाश्री हैं, शाश्वत देवी हैं — उन सुरों द्वारा पूजित पद्मा लक्ष्मी को मैं वंदन करता हूँ।

🍁३७
श्रीसुक्तवेद्यां सर्वज्ञां शक्तित्रयस्वरूपिणीम्।
देवपत्नीसुपूज्यां तां वन्दे पद्मां महेश्वरीम्॥

अर्थ:
जो श्रीसूक्त में वर्णित हैं, सर्वज्ञ हैं, त्रिगुणात्मिका शक्ति स्वरूपा हैं, सभी देवपत्नियों द्वारा पूजिता हैं — उन महेश्वरी पद्मा देवी को मैं नमस्कार करता हूँ।

🍁३८
पञ्चतत्त्वस्वरूपां च नादबिन्दुकलामयीम्।
ब्रह्मरन्ध्रस्थितां देवीं वन्दे पद्मां परात्पराम्॥

अर्थ:
जो पंचतत्त्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) की स्वरूपा हैं, नाद, बिन्दु और कला से युक्त हैं, ब्रह्मरंध्र में स्थित दिव्य शक्ति हैं — उस परम परात्परा पद्मा देवी को मैं प्रणाम करता हूँ।

🍁३९
त्रैलोक्यजननीं देवीं नारायणपरिग्रहीम्।
वैकुण्ठवासिनीं लक्ष्मीं वन्दे पद्मां सदा शुभाम्॥

अर्थ:
जो तीनों लोकों की जननी हैं, नारायण की अर्धांगिनी हैं, वैकुण्ठ में वास करती हैं — उन सदा शुभा लक्ष्मी पद्मा को मैं प्रणाम करता हूँ।

🍁४०
सिद्धिलक्ष्मीं क्षमालक्ष्मीं तुष्टिं पुष्टिं धृतिं शिवाम्।
ईश्वरीं ब्रह्मविद्यां च वन्दे पद्मां सनातनीम्॥

अर्थ:
जो सिद्धि, क्षमा, संतोष, पुष्टि, धैर्य और शुभता की देवी हैं; जो ईश्वरी और ब्रह्मविद्या की मूर्त हैं — उन सनातन स्वरूपा पद्मा को मैं प्रणाम करता हूँ।

🍁४१
मञ्जुलानां शुभानां च सरसां वरदायिनीम्।
कान्तिं श्रीं चारुमाधुरीं वन्दे पद्मां महेश्वरीम्॥

अर्थ:
जो मनोहर, शुभ और सरस गुणों से संपन्न हैं; जो वरदायिनी हैं, कांति और श्री की अधिष्ठात्री हैं, चारु माधुरी की मूर्ति हैं — उन महेश्वरी पद्मा को मैं प्रणाम करता हूँ।

🍁४२
हरिप्रिया हरिवल्लभा हरिवेश्मनिवासिनी।
हरिकान्तिसमालिप्ता वन्दे पद्मां हरिप्रियम्॥

अर्थ:
जो भगवान हरि की प्रिया, उनकी अर्धांगिनी हैं, जो हरि के धाम में निवास करती हैं और जिनका रूप हरिकांति में समाहित है — उन हरिप्रिया पद्मा को मैं वंदन करता हूँ।

🍁४३
यत्र वासः पद्मायाः सदा भक्तिप्रपूजिते।
तत्र श्रीर्बहुजा रम्या नित्यं स्थाति विमलदृशा॥

अर्थ:
जहाँ पद्मा देवी का वास होता है और उन्हें भक्ति से पूजा जाता है, वहाँ सौंदर्य और ऐश्वर्य से परिपूर्ण लक्ष्मी देवी सदा निर्मल दृष्टि से निवास करती हैं।

🍁४४
नमस्ते पद्मरूपायै नमस्ते सर्वमङ्गले।
नमस्ते श्रीधरप्रिये नमस्ते भक्तवत्सले॥

अर्थ:
हे पद्मा रूपिणी! आपको बारंबार नमस्कार। हे सर्वमंगलदायिनी! हे श्रीधर की प्रिया! हे भक्तवत्सला! आपको कोटि नमस्कार।

🍁४५
नमस्ते करुणारूपे नमस्ते शुभमङ्गले।
नमस्ते सर्वदात्रीणि नमस्ते पुण्यवर्धिनि॥

अर्थ:
हे करुणामयी देवी! हे मंगलमयी! हे सब कुछ देने वाली! हे पुण्य की वृद्धि करने वाली देवी! आपको नमस्कार है।

🍁४६
त्वमेव सम्पदां मूलं त्वमेव सुखसागरम्।
त्वमेव हृदि संवीक्षा त्वं मे स्यान्ममावलम्बनम्॥

अर्थ:
आप ही सम्पूर्ण सम्पदाओं की मूल हैं, आप ही सुख का सागर हैं, आप ही मेरे हृदय में स्थित दिव्यता हैं — आप ही मेरा आधार बनें।

🍁४७
गृहं यत्र त्वया युक्तं सदा श्रीसंपदन्वितम्।
न तत्र दरिद्रता कदा लक्ष्मि पद्मे नमोऽस्तु ते॥

अर्थ:
जिस घर में आप विद्यमान होती हैं, वह सदा समृद्ध और सुखद होता है। उस स्थान पर दरिद्रता कभी नहीं रहती — हे लक्ष्मी पद्मे! आपको नमन है।

🍁४८
नमस्ते पद्महस्ते च नमस्ते शुभदायिनि।
नमस्ते सर्वतेजस्विनि नमस्ते भक्तवत्सले॥

अर्थ:
हे पद्महस्तिनी देवी! आपको नमस्कार। हे शुभदायिनी, हे सर्वतेजस्विनी, हे भक्तवत्सला! आपको प्रणाम है।

🍁४९
वस त्वं मम गृहे नित्यं लक्ष्मिरूपेण सुन्दरि।
मम सर्वाभिलाषं च पूर्णं कुरु नमोऽस्तु ते॥
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अर्थ:
हे सुन्दरी लक्ष्मीरूपिणी देवी! आप मेरे घर में नित्य निवास करें, और मेरे समस्त शुभ अभिलाषाओं को पूर्ण करें — आपको बारंबार नमस्कार।

🍁५०

विद्यां ददातु मे लक्ष्मीः कीर्तिं पुष्टिं समृद्धिताम्।
भोगं मोक्षं च मे देहि नमस्ते चन्द्रसुन्दरी॥

अर्थ:
हे लक्ष्मी! मुझे विद्या, कीर्ति, पुष्टि और समृद्धि प्रदान करें। मुझे भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करें — हे चंद्रमुखी देवी! आपको नमस्कार है।

🍁५१

त्वं पतिव्रतानां माता त्वं कुलधर्मप्रवर्तिनी।
त्वं श्रीर्बुद्धिः स्मृतिर्वाणी त्वं मे सर्वं नमोऽस्तु ते॥

अर्थ:
आप पतिव्रता स्त्रियों की माता हैं, आप कुलधर्म की प्रवर्तिका हैं, आप ही श्री, बुद्धि, स्मृति और वाणी हैं — आप ही मेरी सम्पूर्ण शक्ति हैं, आपको नमस्कार।

👉फलश्रुति

🍁५२
धन्यं यः पठति स्तोत्रं भक्त्या नित्यं समाहितः।
स सर्वसम्पदं लभते लक्ष्मीपद्माप्रसादतः॥

अर्थ:
जो व्यक्ति भक्ति और एकाग्रता से इस स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, वह श्रीपद्मा लक्ष्मी की कृपा से सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्राप्त करता है।

🍁५३
स्तोत्रमेतत् पद्मायाः श्रद्धया यः पठेन्नरः।
स गृहे लक्ष्मीवासो स्यात् सर्वसंपत्समन्वितः।।

अर्थ
जो पुरुष श्रद्धापूर्वक इस श्रीपद्मा लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करता है, उसके घर में लक्ष्मी सदा निवास करती हैं और वह सम्पूर्ण समृद्धियों से युक्त हो जाता है।

🍁५४

इति स्तोत्रं पद्मायाः शुभं सम्पत्तिकारकम्।
यः पठेत् स भक्तिमान् पुरुषः स्यात्सर्वसिद्धिदः॥

अर्थ
इस प्रकार यह शुभ और सम्पत्ति देने वाला श्रीपद्मा स्तोत्र पूर्ण होता है। जो श्रद्धावान भक्त इसका पाठ करता है, वह सर्वसिद्धियों को प्राप्त करता है।
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कहानी का समय

*ईश्वर में विश्वास*

_एक सन्त कुएं पर स्वयं को लटका कर ध्यान किया करते थे और कहते थे, जिस दिन यह जंजीर टूटेगी, मुझे ईश्वर के दर्शन हो जाएंगे।_

_उनसे पूरा गांव प्रभावित था। सभी उनकी भक्ति, उनके तप की तारीफें करते थे। एक व्यक्ति के मन में इच्छा हुई कि मैं भी ईश्वर दर्शन करूँ।_

_वह रस्सी से पैर को बांधकर कुएं में लटक गया और कृष्ण जी का ध्यान करने लगा।_

_जब रस्सी टूटी, उसे कृष्ण ने अपनी गोद में उठा लिया और दर्शन भी दिए।_

_तब व्यक्ति ने पूछा- आप इतनी जल्दी मुझे दर्शन देने क्यों चले आये, जबकि वे संत महात्मा तो वर्षों से आपको बुला रहे हैं।_

_कृष्ण बोले, वो कुएं पर लटकते जरूर हैं, किंतु पैर को लोहे की जंजीर से बांधकर। उसे मुझसे ज्यादा जंजीर पर विश्वास है।_

_तुझे खुद से ज्यादा मुझ पर विश्वास है, इसलिए मैं आ गया।_

_आवश्यक नहीं कि दर्शन में वर्षों लगें। आपकी शरणागति आपको ईश्वर के दर्शन अवश्य कराएगी और शीघ्र ही कराएगी।_

_प्रश्न केवल इतना है आप उन पर कितना विश्वास करते हैं।_

_ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं। शरीररूपी यंत्र पर चढ़े हुए सब प्राणियों को,वे अपनी माया से घुमाते रहते हैं,इसे सदैव याद रखें और बुद्धि में धारण करने के साथ व्यवहार में भी धारण करें..!!
*जय श्री कृष्ण*
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_मन और माया का खेल_

विषयों की इच्छा,, उसका भोग करने की इच्छा,, उसको ग्रहण करने की इच्छा जिस पर हम आकर्षित हो जाते हैं, यह इच्छा जहां उत्पन्न होती है जिसको होती है वह मन है,,,

लेकिन इच्छा उत्पन्न हो क्यों रही है, इसका कारण है उसका भ्रम,,, मन अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए जहां प्रयत्न करती है जहां-जहां उनकी आसक्ति हो जाती है ! जहां से वह अपने अंदर ग्रहण करती है! वह सब माया है! स्वयं को सुखी करने के लिए जहां भटकती रहती है! जहां विचरण करती है वह माया है!

जो आपको भ्रमित कर रही है आकर्षित कर रही है वह माया है और जो आकर्षित हो रहा है वह मन है!,, जैसे सामने अप्सरा खड़ी है,,,, वह कौन है? माया जो तुम्हें भ्रमित करने के लिए भेजी गई है लेकिन फंसना नहीं है जो आकर्षित होकर फस जाता है वह मन है जो उस पर आकर्षित हो रहा वह मन है! माया का स्वरूप सबके लिए एक समान है लेकिन किसका मन उसमें आकर्षित होगा और किसका नहीं यह उस स्वयं पर निर्भर करता है! अगर आत्मज्ञान, तत्वज्ञान उनका मजबूत है तो वह इस माया को भी परास्त कर सकता है! और बड़े-बड़े ऋषि मुनियों ने किया है! माया को देखते ही झट से समझ गए कि हमें फसाया जा रहा है फंसना नहीं है तो वह जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो गए!
माया की चाल बाजी को जो नहीं समझ पाए वह जन्म मृत्यु के बंधन में फंसे हुए हैं और फंसे रहेंगे! माया हमें अपनी जाल में कैसे फंसाती है पहले तो इसको जानना होगा! जो माया को जान लेता है वह माया अधिपति ब्रह्म को जानकर माया से मुक्त हो जाता है! और वह ब्रह्म स्वरूप हो जाता है! वेद कहते हैं!

ऐसे ही उस अप्सरा की तरह यह संपूर्ण जगत एक माया है! जो प्रतिपल जीव को फसाने में लगी है! जो उनको प्रभावित करती है वह माया,,, लेकिन जिसको प्रभावित होता है,, जिनका प्रभाव जिस पर पड़ता है,, वह मन है! माया का प्रभाव मन, बुद्धि, चित, अहंकार इन चारों पर ही पड़ता है! क्योंकि यही 4 माया का स्वरूप है!

इस संपूर्ण माया से अलग-अलग चीज उठाकर जीव अलग-अलग चीजों में आकर्षित होती है, वह उसके मन पर निर्भर करता है!

माया का काम है जीव को भ्रमित करना,,, उसको आकर्षित करना और अपने जाल में उसको फसाना,,,,, लेकिन मन अपनी अज्ञानता वश उसमें फिसल जाता है! यह नहीं देख पाता कि यह स्थाई नहीं है, हमें ठगी जा रही है!

उस प्रचंड आकर्षण के वेग के प्रबल होने के कारण जीव स्वयं को भूल जाती है नहीं जान पाती मैं कौन हूं? यह भूलकर संसार में भ्रमित हो जाती है! हम स्वयं आत्म स्वरूप हैं ना हमारा कोई बंधन है ना हमें किसी सुख की आवश्यकता है हम स्वयं आनंद स्वरूप हैं उसको नहीं जान पाती! और उसमें लटक जाती है!
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कहानी का समय

स्वविवेक


आज हर कोई सलाह देने में तत्पर रहता है, लेकिन हर सलाह आपके लिए उपयुक्त हो यह ज़रूरी नहीं। इसलिए जरूरी है कि आप हर सुझाव को विवेकपूर्ण ढंग से परखें। सलाह सुनें जरूर, पर अंतिम निर्णय अपनी बुद्धि और अनुभव से लें, तभी आप सही दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।
एक तपती गर्मी का दिन था। जंगल में एक लकड़बग्घा प्यास से बेहाल इधर-उधर भटक रहा था। सूरज सिर पर तप रहा था और उसकी जीभ प्यास से सूख चुकी थी। वो पानी की तलाश में बेतहाशा दौड़ता फिर रहा था।
काफी देर भटकने के बाद उसकी नज़र दूर एक नदी पर पड़ी। नदी का जल दूर से थोड़ा कम लग रहा था, लेकिन प्यास इतनी तेज थी कि उसने दौड़ते हुए जाकर तुरंत पानी पी लिया। ठंडे पानी ने उसकी प्यास बुझा दी और उसके चेहरे पर तृप्ति की चमक आ गई।
अब उसने सोचा – "जब पानी पी ही लिया है, तो क्यों न थोड़ा नहा लिया जाए! गर्मी भी कम होगी और शरीर भी तरोताज़ा हो जाएगा।" लेकिन नदी की गहराई उसे नहीं मालूम थी। संकोच हुआ।
तभी उसकी नज़र एक ऊँट पर पड़ी, जो नदी किनारे बैठा था। लकड़बग्घा उसके पास गया और बोला –
“ताऊ, क्या नदी में पानी ज़्यादा गहरा है? क्या मैं नहा सकता हूँ, डूब तो नहीं जाऊँगा?”
ऊँट ने मुस्कुराते हुए कहा – “अरे बच्चे, घुटनों भर पानी है। मैं अभी-अभी नहा कर आया हूँ। जा, तू भी मस्ती से नहा ले।”
ऊँट की बात पर भरोसा कर लकड़बग्घा बेझिझक नदी में कूद पड़ा। लेकिन जैसे ही वह बीच धारा में पहुँचा, उसके पैरों के नीचे की ज़मीन खिसक गई। नदी की गहराई उसके अंदाज़ से कहीं अधिक थी! वह डूबने लगा, हाथ-पैर मारने लगा। कभी सिर बाहर निकालता तो कभी पानी में समा जाता। किसी तरह अपनी जान बचाकर वह बाहर निकला।
साँसें संभालते हुए, गुस्से में उसने ऊँट से कहा – “कमीने! तूने कहा था पानी घुटनों तक है! मैं तो मर ही गया था डूबकर!”
ऊँट ने शांत स्वर में उत्तर दिया – “बच्चे, मैंने झूठ नहीं कहा। पानी तो सच में मेरे घुटनों तक ही है… अब तू छोटा है, तुझे मेरी बात समझ नहीं आई तो मैं क्या करूँ?”
लकड़बग्घा कुछ बोल न सका। उसे अपनी गलती का एहसास हो गया — उसने बिना अपनी समझ लगाए, सिर्फ ऊँट की बात पर भरोसा कर लिया था।
> सीख: हर व्यक्ति अपने अनुभव और दृष्टिकोण के आधार पर ही सलाह देता है। जो एक के लिए सही है, जरूरी नहीं कि वो सबके लिए भी ठीक हो। ऊँट की बात उसके कद के अनुसार सही थी, लेकिन लकड़बग्घे ने बिना सोचे-समझे उसे अपनी सच्चाई मान लिया।
> 👉 इसलिए ज़िंदगी में सिर्फ दूसरों की बातों या अनुभवों के आधार पर फ़ैसले मत लो। 👉 हर परिस्थिति में अपना स्वविवेक इस्तेमाल करना सीखो। 👉 नहीं तो दूसरों की सलाह मानकर कहीं ऐसा न हो कि "डूब जाए"— जैसे लकड़बग्घा!
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*जिस प्रकार कर्म जीवन का स्वभाव है। उसी प्रकार कर्म फल का भोग भी जीवन की अनिवार्यता है।। मनुष्य जिस प्रकार के कर्म करता है। उस प्रकार का फल उसे न चाहते हुए भी देर-सबेर अवश्य भोगना ही पड़ता है।। जाने-अनजाने मनुष्य से अनेक पाप कर्म बन ही जाते हैं। मनुष्य द्वारा जाने-अनजाने किये जाने वाले उन्हीं पाप कर्मों के फल स्वरूप उसके कर्म फल का भी निर्धारण किया जाता है।। और उन पाप कर्मों के आधार पर ही उसके दण्ड का भी निर्धारण होता है। उन पाप कर्मों के फल से बचने के लिए शास्त्रों ने जो विधान निश्चित किया गया है, उसी को प्रायश्चित कर्म कहा गया है।। सरल अर्थों में मनुष्य का अपराध बोध ही उसका प्रायश्चित कहलाता है। दैन्य भाव से प्रभु चरणों की शरणागति एवं प्रभु के मंगलमय नामों का दृढ़ाश्रय लेते हुए जान बूझकर आगे कोई पाप कर्म न बने, इस बात का दृढ़ संकल्प ही, मनुष्य का सबसे बड़ा प्रायश्चित है_*
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त्रिपुरभैरवी स्तोत्र

स्तुत्याऽनया त्वां त्रिपुरे स्तोष्येऽभीष्ट फलाप्तये।
यया व्रजन्ति तां लक्षमीं मनुजाः सुर पूजिताम्।।१
ब्रह्मादयः स्तुतिशतैरपि सूक्ष्मरूपां।
जानन्ति नैव जगदादिमनादिमूर्त्तिम्।
तस्माद्वयं कुचनतां नवकुंकुमाभां।
स्थूलां स्तुमः सकलवांगमयमातृभूताम्।।२
सद्यः समुद्यतसहस्त्रदिवाकराभां।
विद्याक्षसूत्रवरदाभयचिन्हहस्ताम्।
नेत्रोत्पलैस्त्रिभिरलंकृतवऋपद्मां।
त्वां हारभाररुचिरां त्रिपुरे भजामः।।३
सिन्दूरपूररुचिरं कुचभारनम्रं।
जन्मान्तरेषु कृतपुण्यफलैकगम्यम्।
अन्योन्यभेदकलहाकुलमानसास्ते।
जानन्तिं किं जडधियस्तव रूप् मम्ब।।४
स्थूलां वदन्ति मुनयः श्रुतयो गृणन्ति।
सूक्ष्मां वदन्ति वचसामधिवासमन्ये।
त्वां मूलमाहुस्परे वचसामधिवासमन्ये।
मन्यामहे वयमपारकृपाम्बुराशिम्।।५
चन्द्रावतंसकलितां शरदिन्दुशुभ्रां।
पंचाशदक्षरमयीं हृदि भावयन्ति।
त्वां पुस्तकं जपवटीममृताढद्यकुम्भं।
व्याख्यांच हस्तकमलैर्द्दधतीं त्रिनेत्राम्।।६
शम्भुस्त्वमद्रितनया कलितार्द्धभागो।
विष्णुस्त्वमन्यकमलापरिबद्धदेहः।
पद्मोद्भवस्त्वमसि वागाधिवासभूमिः।
येषां क्रियाश्च जगति त्रिपुरे त्वमेव।।७
आकुंच्य वायुमवजित्य च वैरिषट्क।
मालोक्य निश्चलधियो निजनासिकाग्रम्।
ध्यायन्ति मूघि्र्न कलितेन्दुकलावतंसं।
तद्रुपमम्ब कृति तस्तरुणार्कमित्रम्।।८
त्वं प्राप्य मन्मथरिपोर्वपुरर्द्धभागं।
सृष्टिं करोषि जगतामिति वेदवादः।
सत्यं तदद्रितनये जगदेकमात्।
र्नोचेदशेषजगतः स्थितिरेव न स्यात्।।९
पूजां विधाय कुसुमैः सुरपादपानां।
पीठे तवाम्ब कनकाचलगह्वरेषु।
गायन्ति सिद्धिवनिताः सह किन्नरीभि।
रास्वादितामृतरसारुणपद्मनेत्रा।।१०
विद्युद्विलासवपुषं श्रियमुद्वहन्तीं।
यान्तीं स्ववासभवनाच्छिवराजधानीम्।
सौन्दर्यराशिकमलानि विकाशयन्तीं।
देवीं भजे हृदि परामृतसिक्तगात्राम्।।११
आनन्दजन्मभवनं भवनं श्रुतीनां।
चैतन्यमात्रतनुमम्ब तवाश्रयामि।
ब्रह्मेशविष्णुभिरुपासितपादपद्मां।
सौभाग्यजन्मवसतीं त्रिपुरे यथावत्।।१२
सर्व्वार्थभावि भुवनं सृजतीन्दुरूपा।
या तद्बिर्भितत्त पुरनर्कतनुः स्वशक्त्त्या।
ब्रह्मात्मिका हरति तत् सकलं युगान्ते।
तां शारदां मनसि जातु न विस्मरामि।।१३
नारायणीति नरकार्णवतारिणीति।
गौरीति खेदशमनीति सरस्वतीति।
ज्ञानप्रदेति नयनत्रयभूषितेति।
त्वामद्रिराजतनये विबुधा वदन्ति।।१४
ये स्तुवन्ति जगन्माता श्लोकैर्द्वादशभिः क्रमात्।
त्वामनुप्राप्य वाक्सिद्धिं प्राप्नुयुस्ते परां गतिम्।।१५

।।इति।।
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साधन भक्ति ( साधना ) करने से जीव के अंत:करण चातुष्ट ( मन बुद्धि चित्त अहंकार ) की शूद्धि होती है, अंत:करण शूद्ध होते हीं देहाभिमान समाप्त हो जाता है , तत्पश्चात गुरू द्वारा स्वरूप शक्ति से उसे सिद्धा भक्ति ( भगवान कि असली सेवा ) मिलती है , जीव को एक नया दिव्य भाव देह मिलता है, गुरू उसके स्थूल ज्ञान ईंद्रियों तथा मन बुद्धि को दिव्य बना देता है , जिससे वो भगवान के वास्तविक स्वरूप को देख सकता है , उनके लीला को प्रत्यक्ष देख सकता है , उनकी वाणी को प्रत्यक्ष सुन सकता है, उन्हें छू सकता है , उनका आलिंगन कर सकता है, उनकी सेवा कर सकता है , उनके नित्य लीला में शामिल हो सकता है । इसलिए अंत:करण की शूद्धि के लिए , देहाभिमान को मिटाने के लिए रूपध्यान साधना परमावश्यक है ।
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पूजा में अवश्य ही होनी चाहिए ये सामग्री

घर में सुख शांत‌ि और समृद्ध‌ि के ल‌िए सभी लोग घर में पूजा स्थान बनाते हैं ज‌िसे पूजा घर कहा जाता है। पूजा घर में सही विधि से पूजा करने के लिए कई वस्तुएं अत्यंत आवश्यक होती है।

पूजा से सम्बंधित नियम
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1. आचमनी – छोटे से ताम्बे के लोटे में जल भरकर उसमें तुलसी डालकर हमेशा पूजा स्थल पर रखा जाता है। यह जल आचमन का जल कहलाता है। इस जल को तीन बार ग्रहण किया जता है। इससे पूजा का दोगुना फल मिलता है।

2. पंचामृत – दूध, दही, शहद, घी व शुद्ध जल के मिश्रण को पंचामृत कहते हैं। कुछ विद्वान दूध, दही, मधु, घी और गन्ने के रस से बने द्रव्य को पंचामृत कहते हैं। इस सम्मिश्रण में रोग निवारण के गुण होते हैं।

3. चन्दन – चंदन शीतलता का प्रतीक है। इसकी सुगंध से मन के नकारात्मक विचार खत्म होते हैं। चंदन को मूर्ति के सिंगार में उपयोग किया जाता है। माथे पर चंदन लगाने से दिमागी शांति बनी रहती है।

4. अक्षत – चावल को अक्षत भी कहा जाता है। भगवान को अक्षत अर्पित करने का अर्थ है कि हम अपने वैभव का उपयोग अपने लिए नहीं, बल्कि मानव की सेवा के लिए करेंगे।

5. फूल – देवी या देवता की मूर्ति के सामने फूल अर्पित किए जाते है। यह सुंदरता का अहसास जगाने के लिए है। इसका अर्थ है कि हम भीतर और बाहर से सुंदर बनें।

6. प्रसाद – प्रसाद में मिठास यानि मधुरता होती है। फल, मेवे और मिठाई के रूप में पंचामृत के साथ नैवेध चढ़ाया जाता है। माना जाता है कि इससे घर में लक्ष्मी बनी रहती है।

7. रोली – कुमकुम या रोली हल्दी मिलाकर बनाया जाता है। इसे गंध के रूप में देवताओं को चढ़ाया जाता है। यह आरोग्य को बढ़ाने वाला माना गया है।

8. धूप – सुगंध से मन में सकारात्मक विचारों का जन्म होता है। इससे घर का वातावरण शुद्ध और सुगन्धित बनता है। यही कारण है कि भगवान का पूजन धूप के बिना अधूरा माना गया है। गूगल वाली धूप भी मान्य है ।

9. दीपक – पारम्परिक दीपक मिट्टी का ही होता है। इसमें पांच तत्व हैं मिट्टी, आकाश, जल, अग्नि और वायु। कहते है कि इन पांच तत्वों से ही सृष्टि का निर्माण हुआ है। इसलिए हर हिन्दू अनुष्ठान में पंचतत्वों की उपस्तिथि अनिवार्य होती है।

10. गरुड़ घंटी – जिन स्थानों पर घंटी बजने की आवाज़ नियमित आती है, वहां का वातावरण हमेशा शुद्ध और पवित्र बना रहता है। इससे नकारात्मक शक्तियां हटती है। इसलिए घर के पूजा स्थान पर गरुड़ घंटी रखी जाती है।
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मिश्रित सामग्री वाले तिलक

वैष्णव व सनातन परंपरा में मिश्रित सामग्री से बनाए गए, तिलकों का विशेष स्थान होता है। ये तिलक केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक, मानसिक, और शरीर पर सूक्ष्म प्रभाव डालने वाले माने जाते हैं। मिश्रित सामग्री का अर्थ है कि, तिलक लगाने हेतु दो या दो से अधिक पवित्र द्रव्यों या औषधीय पदार्थों का संयोग किया गया हो।
1- मिश्रित सामग्री वाले तिलकों के प्रमुख प्रकार ------
तिलक का नाम/ उपयोग की गई सामग्री/ प्रमुख परंपरा तिलक का आकार/ लाभ व उद्देश्य -------
(1) गोपीचंदन + तुलसी तिलक/ गोपीचंदन, तुलसी रस या तुलसी पत्र चूर्ण/ वैष्णव (मध्व, गौड़ीय) ऊर्ध्वपुंड्र/ पवित्रता, भक्ति, वात-पित्त शमन।
(2) भस्म + चंदन तिलक/ विभूति (त्रिपुंड्र) + चंदन/ दत्तात्रेय, शैव-वैष्णव संयुक्त/ त्रिपुंड्र या ऊर्ध्वपुंड्र/ शिव-नारायण संयुक्त भाव, मन-शीतलता।
(3) गाय के गोबर की राख + गोमूत्र + चंदन/ पंचगव्य में से तीन तत्व/ ग्रामीण सनातनी/ ऊर्ध्वपुंड्र या गोल बिंदी/ रोगनाशक, शुद्धिकारक, कर्मपवित्रता।
(4) लाल चंदन + केसर तिलक/ रक्त चंदन, केसर/ शक्ति उपासना, लक्ष्मी पूजन/ गोल या त्रिकोण बिंदी/ आकर्षण, तेज, यश, उन्नति।
(5) हल्दी + चूना (शुभ्र तिलक)/ हल्दी, चुना (गेरुआ/सिंदूरी रंग)/ ग्रामीण वैष्णव या रामानुजीय/ ऊर्ध्वपुंड्र/ उग्र दोष शमन, रोगनाशक, वज्र-भावना।
(6) श्वेत चंदन + कस्तूरी या केसर/ शीतल चंदन + सुगंधित तैल/ श्रीसम्प्रदाय या कुलदेवी उपासना/ ऊर्ध्वपुंड्र या गोल/ मानसिक शांति, आकर्षण, ध्यान शक्ति।
(7) अष्ठगंध मिश्रण तिलक/ चंदन, कपूर, अगर, गंधक आदि 8 द्रव्य/ पूजाविधि में विशिष्ट तिलक गोल या त्रिकोण या रेखा/ सप्तधातु शुद्धि, ध्यानयोग, शक्ति-वृद्धि।
(8) मिट्टी + चंदन तिलक/ नदी/तीर्थ की मिट्टी + चंदन/ भक्ति मार्गी परंपरा रेखीय या गोल/ तीर्थ-स्पर्श का प्रभाव, स्थिरता।
2- मिश्रण तिलकों के सामान्य लाभ --------
(1) शरीर पर औषधीय प्रभाव – जैसे तुलसी व गोमूत्र जीवाणुनाशक हैं, चंदन शीतलकारी है।
(2) मन को शांत व स्थिर करना – सुगंध, शीतलता और संतुलन से ध्यान में सहायता।
(3) आभामंडल की रक्षा – तिलक शरीर के सूक्ष्म केंद्रों (चक्रों) को संतुलित करता है।
(4) धार्मिक व आत्मिक शक्ति का संचार – हर मिश्रण के पीछे विशेष देवता व तत्त्व की शक्ति होती है।
(5) शुभ व आत्मविश्वास का संचार – विशेषकर केसर, लाल चंदन और कस्तूरी जैसे तिलक।
3- विशेष ध्यान योग्य बातें ------
(1) तिलक लगाने से पहले, हाथ व माथा स्वच्छ होना चाहिए।
(2) तिलक में प्रयुक्त द्रव्य शुद्ध, सात्त्विक और औषधीय गुणों वाले हों।
(3) तिलक लगाते समय मन्त्र (जैसे " ऊर्ध्वपुण्ड्रं धारयामि विष्णोर्घ्राणाय नमः " ) बोलना चाहिए।
(4) भिन्न अवसरों (पूजन, यात्रा, यज्ञ, उपवास, युद्ध) के अनुसार तिलक मिश्रण बदल सकते हैं।
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“ अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।
जनम-जनम रति राम पद यह बरदानु न आन॥ “

( मुझे न अर्थ की रुचि (इच्छा) है, न धर्म की, न काम की और न मैं मोक्ष ही चाहता हूँ । जन्म-जन्म में मेरा राम के चरणों में प्रेम हो, बस, यही वरदान माँगता हूँ, दूसरा कुछ नहीं )
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जीव

"शिव-गीता" में श्रीराम जी के इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए भगवान् शंकर कहते हैं ------

"राम ! मैं सत्य-ज्ञानस्वरूप , अनन्त-परमानन्दस्वरूप हूँ ।

व्यक्त - अव्यक्त का कारण , नित्य - विशुद्ध - सर्वात्मा - निर्लेप - सर्वधर्म रहित - मन से अग्राह्य हूँ , किन्तु ऐसा होने पर भी अविद्या अथवा अन्तःकरण से मिलकर शरीर में रहता हूँ ।

५ कर्मेन्द्रियां , ५ ज्ञानेन्द्रियां तथा अन्तःकरण चतुष्टय से मिलकर मैं जीव-भाव को प्राप्त हुआ हूँ ।

मैं अत्यन्त निर्मल होने पर भी मलिन रूप से प्रतीत होता हूं , जिस प्रकार दर्पण मलिन होने पर मुख भी मलिन दिखता है , उसी प्रकार अन्तःकरण रूपी दर्पण में मलिनता के कारण आत्मा मलिन प्रतीत होता है ।

वह शरीर में कहां रहती है ? इसको कहता हूं ---

सुनो ! हृदयरूपी कमल में एक अधोमुखी सूक्ष्म छिद्र है , उसके दहराकाश में , यानी ह्रदय में स्थित आकाश में ।

अब सगुण - ब्रह्म के उपासकों के क्रममुक्ति तथा नाड़ियों के विस्तार को बताते हुए शंकर जी कहते हैं ----

कदम्ब - पुष्प में विद्यमान केसर के समान नाड़ियां हृदय से निकल कर सारे शरीर में फैली है , इन नाड़ियों में से अत्यन्त सूक्ष्मतम हिता नाम की नाड़ी है ।

योगियों ने बहत्तर हजार नाड़ियां बताई है , वे सब नाड़ियां हृदय - कमल से निकल कर वैसे ही फैलता है , जैसे सूर्यमण्डल से निकली सूर्य की किरणें फैलती है ।

इनमें १०१ मुख्य नाड़ियां हैं ।

जैसे नदियों में जल भरा रहता है , वैसे ही इन नाड़ियों में कर्मफल रूपी जल भरा रहता है , इनमें से एक नाड़ी सीधी ब्रह्मरन्ध्र तक गई है ।

प्रत्येक इन्द्रिय से १० - १० नाड़ियां निकल कर विषयोन्मुखी होती हैं , ये नाड़ियां आनन्द-प्राप्ति का कारण है तथा स्वप्न आदि का फल भोगने के लिए है ।

उनमें से एक सुषुम्ना नाम की नाड़ी है , उसमें चित्तवृत्ति को समाहित करने वाला योगी मुक्ति प्राप्त करता है , दोनों की उपाधि से युक्त चैतन्य को विद्वान् जीव कहते हैं ।

अब यहां शंका होती है कि यदि सुषुम्ना के निर्गमन से ही मोक्ष होता है तो ज्ञान से मुक्ति का प्रतिपादन करने वाली श्रुतियां तथा स्मृतियां निरर्थक हो जाएंगी , क्योंकि "ज्ञानादेव कैवल्यम् प्राप्यते येन मुच्यते" अर्थात् ज्ञान से ही कैवल्य मुक्ति प्राप्त होती है , जिससे जीव का जन्म - मरण का बन्धन टूट जाता है ।

तो इसका उत्तर देते हुए कहा है कि कामादि दोष से रहित अन्तःकरण ही ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ है ।

जीव - दशा में मुक्ति नहीं होती , किन्तु सुषुम्ना के ब्रह्मरन्ध्र में कुण्डलिनी के जाग्रत होने से जीव को ब्रह्मादि लोकों की प्राप्ति (गौण-मुक्ति) होती है , मुख्य कैवल्य मुक्ति नहीं , अतः ज्ञान से मुक्ति का प्रतिपादन करने वाली श्रुति-स्मृति से विरोध नहीं है ।

जैसे अदृश्य होने पर भी सूर्य-चन्द्र-ग्रहण पर राहु का दर्शन होता है , प्रथम नहीं ; वैसे सवव्यापी आत्मा होने पर भी सूक्ष्म-शरीर में दिखता है ।

जैसे घट-दर्शन से घटाकाश का दर्शन होता है तथा घट को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने से घटाकाश जाता हुआ प्रतीत होता है , वैसे ही सूक्ष्म शरीर के चले जाने पर आत्मा जाता हुआ प्रतीत होता है ।

इस विषय को समझने के लिए वेदान्त की प्रक्रिया समझ लेनी चाहिए , एक चैतन्य के होने पर भी उपाधि भेद से चैतन्य अनेक है , किन्तु प्रधान रूप से तीन प्रकार का है ------

१ -- प्रमाता-चैतन्य == "प्रकर्षेण ज्ञाता इति प्रमाता" -- अर्थात् अन्तःकरण से मिला चैतन्य , जानने वाला चैतन्य प्रमाता-चैतन्य है ।

२ -- प्रमाण-चैतन्य == अन्तःकरण की वृत्ति में विद्यमान चैतन्य प्रमाण-चैतन्य है ।

३ -- विषय-चैतन्य == अन्तःकरण से निकल कर आंखादि इन्द्रियों से मिलकर जब चैतन्य जिस इन्द्रिय से सबन्धित होकर देखता है , सुनता है --- इन्द्रियों से निकल कर विषयों तक पहुँचने वाली अन्तःकरण की वृत्ति विषय-चैतन्य है ।

जब समान देश-काल में वृत्यवछिन्न चैतन्येन्द्रियों द्वारा विषय के पास जाकर विषय को व्याप्त करके चैतन्याकार होते हैं , तब घटादि पदार्थों का ज्ञान होता है --- इस प्रकार वेदान्त की प्रक्रिया है ।

प्रमाण अनेकों है == प्रत्यक्ष - अनुमान - अर्थापत्ति आदि

इनमें अनुमान प्रमाण से जैसे पर्वत पर धुआं देखकर अनुमान होता है कि वहाँ अग्नि है ।

"धूमत्वात्" -- धूम-युक्त होने से , जहां-जहां धुआं है , वहां-वहां आग है ।

जैसे स्वप्न का जगत् मिथ्या होने पर भी प्रतीत होता है , ऐसे ही जाग्रत भी तुरीया में मिथ्या प्रतीत होता है , स्वप्न का जगत् स्वप्न व स्वप्न के साक्षी तैजस का वासना मात्र है ।

जिस प्रकार दिन का थका हुआ पक्षी रात्रि में अपने पंखों को समेट कर विश्राम करता है , उसी प्रकार जाग्रत में तथा स्वप्न में थका हुआ जीव-रूपी पक्षी भी अपनी वृत्ति रूपी पंखों को समेट कर सुषुप्ति में विश्राम करता है ।
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गाढ़ - सुषुप्ति अविद्या की वृत्ति से होती है , उसमें अनुभव करता है ---- "मैं सुख से सोया था , कुछ भी नही जाना ।"

राम ! स्वयंप्रकाश देहातीत आत्मा का स्वरूप मैंने तुम्हारे सामने कहा , वह तीन गुण , तीनों शरीरों से परे , शुद्ध सच्चिदानंद स्वरूप है , वही हम दोनों में अभेद रूप से है ।
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वैराग्य का महत्व

कल्याणकी इच्छा करनेवाले पुरुषको वैराग्य साधनकी परम आवश्यकता है। वैराग्य हुए बिना आत्माका उद्धार कभी नहीं हो सकता। सच्चे वैराग्यसे सांसारिक भोग पदार्थोंके प्रति उपरमता उत्पन्न होती है। उपरामतासे परमेश्वरके स्वरूपका यथार्थ ध्यान होता है। ध्यानसे परमात्माके स्वरूपका वास्तविक ज्ञान होता है और ज्ञानसे उद्धार होता है। जो लोग ज्ञान सम्पादनपूर्वक मुक्ति प्राप्त करनेमें वैराग्य और उपरामताकी कोई आवश्यकता नहीं समझते, उनकी मुक्ति वास्तवमें मुक्ति न होकर केवल भ्रम ही होता है। वैराग्य-उपरामतारहित ज्ञान वास्तविक ज्ञान नहीं , वह केवल वाचिक और शास्त्रीय ज्ञान है जिसका फल मुक्ति नहीं प्रत्युत और भी कठिन बन्धन है। इसीलिये श्रुति कहती है-

अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः॥
……………….( ईश म० ९ )

‘जो अविद्याकी उपासना करते हैं वे अन्धकारमें प्रवेश करते हैं, और जो अविद्यामें रत हैं वे उससे भी अधिक अन्धकारमें प्रवेश करते हैं।’ ऐसा वाचिक ज्ञानी निर्भय होकर विषय भोगोंमें प्रवृत्त हो जाता है, उसके मन कोई पाप भी नहीं रह जाता, इसीसे वह विषयरूपी दलदलमें फंसकर पतित हो जात है-ऐसे ही लोगोंके लिये यह उक्ति प्रसिद्ध है-

ब्रह्मज्ञान जान्यो नहीं, कर्म दिये छिटकाय।
तुलसी ऐसी आतमा, सहज नरकमहं जाय॥

वास्तवमें ज्ञानके नामपर महा अज्ञान ग्रहण कर लिया जात है। अतएव यदि यथार्थ कल्याणकी इच्छा हो तो साधकको सच्चा दृढ़ वैराग्य उपार्जन करना चाहिये। किसी स्वांग विशेषका नाम वैराग्य नहीं है। किसी कारणवश या मूढ़तासे स्त्री पुत्र परिवार धनादिका त्याग कर देना, कपड़े रंग लेना, सिर मुंडवालेना, जटा बढ़ाना या अन्य बाह्य चिन्होंका धारण करना वैराग्य नहीं कहलता। मनसे विषयों रमण करते रहना और ऊपरसे स्वांग बना लेना तो मिथ्याचार-दम्भ है। भगवान्‌ कहते हैं-

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य या आस्ते मनसा स्मरन्‌।
इन्द्रियार्थान्‌ विमूढ़ात्मा मिथ्ठ्याचारः स उच्यते॥

………….( गीता ३ । ६ )

‘जो मूढ़बुद्धि पुरुष कर्मेन्द्रियोंको हठसे रोककर इन्द्रियोंके भोगोंको मनसे चिन्तन करता रहता है वह मिथ्याचारी अर्थात्‌ दम्भी कहा जाता है।’

सम्प्रति दम्भ का बहुत विस्तार हो रहा है, कोई लोगोंको ठगने के लिये दिखलौआ मौन धारण करता है, कोई आसन लगाकर बैठता है, कोई विभूति रमाता है, कोई केश बढ़ाता है, कोई धूनी तपता है, ‘उदरनिमित्तं बहुकृतवेषम्‌।’

इनमेंसे कोई सा भी वैराग्य नहीं है। मेरे इस कथनका यह अभिप्राय नहीं कि, मैं स्त्री पुत्र कुटुम्ब धन शिखा सूत्रादि तथा कर्मोंके स्वरूपसे त्याग करनेको बुरा समझता हूं। न यही समझना चाहिये कि मौन धारण करना, आसन लगाना, विभूति रमान, केश बढ़ाना या मुंड़वाना आदि कार्य अशास्त्रीय और निन्दनीय हैं। न मेरा यही कथन है कि घरबार त्यागकर इन चिन्होंके धारण करनेवाले सभी लोग पाखण्डी हैं। उपर्युक्त कथन किसीकी निन्दा या किसीपर भी घृणा करनेके लिये नहीं समझना चाहिये। मेरा अभिप्राय यहां उन लोगोंसे है जो वैराग्यके नामपर पूजा पाने, और लोगों पर अनधिकार रोब जमाकर उन्हें ठगनेके लिये नाना भांतिके स्वांग सजते हैं। जो साधक संयमके लिये, अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये, साधन बढ़नेके लिये ऐसा करते हैं उनकी कोई निन्दा नहीं है। भगवान्‌ ने भी मिथ्याचारी उन्हींको बतलाया है जो बाहरसे संयमका स्वांग सजकर मन ही मन विषयोंका मनन करते रहते हैं। जो पुरुष चित्तकी वृत्तियोंको भगवच्चिन्तनमें नियुक्तकर सच्ची वैराग्य-वृत्तिसे बाह्याभ्यन्तर त्याग करते हैं उनकी तो सभी शास्त्रों ने प्रशंसा की है।
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