✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें।
ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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कहानी का समय

आखिर सुख किसको है

*बहुत ही रोचक और हृदय मै ज्ञान उत्पन्न करने वाली कहानी सभी पढ़े और अपने परिवार मै किसी एक को चर्चा करे इस कहानी का*

*एक भिखारी किसी किसान के घर भीख माँगने गया। किसान की स्त्री घर में थी, उसने चने की रोटी बना रखी थी।किसान जब घर आया,उसने अपने बच्चों का मुख चूमा,स्त्री ने उनके हाथ पैर धुलाये,उसके बाद वह रोटी खाने बैठ गया।स्त्री ने एक मुट्ठी चना भिखारी को डाल दिया,भिखारी चना लेकर चल दिया।*

*रास्ते में भिखारी सोचने लगा:- “हमारा भी कोई जीवन है? दिन भर कुत्ते की तरह माँगते फिरते हैं। फिर स्वयं बनाना पड़ता है। इस किसान को देखो कैसा सुन्दर घर है। घर में स्त्री हैं, बच्चे हैं, अपने आप अन्न पैदा करता है। बच्चों के साथ प्रेम से भोजन करता है। वास्तव में सुखी तो यह किसान है।*

*इधर वह किसान रोटी खाते-खाते अपनी स्त्री से कहने लगा:-“नीला बैल बहुत बुड्ढा हो गया है,अब वह किसी तरह काम नहीं देता, यदि कही से कुछ रुपयों का इन्तजाम हो जाये,तो इस साल का काम चले। साधोराम महाजन के पास जाऊँगा,वह ब्याज पर दे देगा।”भोजन करके वह साधोराम महाजन के पास गया।बहुत देर चिरौरी बिनती करने पर 1रु.सैकड़ा सूद पर साधों ने रुपये देना स्वीकार किया। एक लोहे की तिजोरी में से साधोराम ने एक थैली निकाली।और गिनकर रुपये क*

*रुपये लेकर किसान अपने घर को चला,वह रास्ते में सोचने लगा-”हम भी कोई आदमी हैं, घर में 5 रु.भी नकद नहीं।कितनी चिरौरी विनती करने पर उसने रुपये दिये है।साधो कितना धनी है,उस पर सैकड़ों रुपये है“वास्तव में सुखी तो यह साधो राम ही है।साधोराम छोटी सी दुकान करता था,वह एक बड़ी दुकान से कपड़े ले आता था।और उसे बेचता था।*

*दूसरे दिन साधोराम कपड़े लेने गया,वहाँ सेठ पृथ्वीचन्द की दुकान से कपड़ा लिया।वह वहाँ बैठा ही था,कि इतनी देर में कई तार आए कोई बम्बई का था।कोई कलकत्ते का, किसी में लिखा था 5 लाख मुनाफा हुआ,किसी में एक लाख का।साधो महाजन यह सब देखता रहा,कपड़ा लेकर वह चला आया।रास्ते में सोचने लगा“हम भी कोई आदमी हैं,सौ दो सौ जुड़ गये महाजन कहलाने लगे। पृथ्वीचन्द कैसे हैं,एक दिन में लाखों का फायदा “वास्तव में सुखी तो यह है,उधर पृथ्वीचन्द बैठा ही था, कि इतने ही में तार आया कि 5 लाख का घाटा हुआ। वह बड़ी चिन्ता में था,कि नौकर ने कहा:-आज लाट साहब की रायबहादुर सेठ के यहाँ दावत है। आपको जाना है,मोटर तैयार है।” पृथ्वीचन्द मोटर पर चढ़ कर रायबहादुर की कोठी पर चला गया।वहाँ सोने चाँदी की कुर्सियाँ पड़ी थी, रायबहादुर जी से* *कलक्टर-कमिश्नर हाथ मिला रहे थे। बड़े-बड़े सेठ खड़े थे।वहाँ पृथ्वी चन्द सेठ को कौन पूछता,वे भी एक कुर्सी पर जाकर बैठ गया।लाट साहब आये,राय बहादुर से हाथ मिलाया,उनके साथ चाय पी और चले गये।*

*पृथ्वी चन्द अपनी मोटर में लौट रहें थे,रास्ते में सोचते आते है, हम भी कोई सेठ है 5 लाख के घाटे से ही घबड़ा गये।राय बहादुर का कैसा ठाठ है, लाट साहब उनसे हाथ मिलाते हैं।“वास्तव में सुखी तो ये ही है।”*

*अब इधर लाट साहब के चले जाने पर रायबहदुर के सिर में दर्द हो गया,बड़े-बड़े डॉक्टर आये एक कमरे वे पड़े थे।कई तार घाटे के एक साथ आ गये थे।उनकी भी चिन्ता थी,कारोबार की भी बात याद आ गई। वे चिन्ता में पड़े थे,तभी खिड़की से उन्होंने झाँक कर नीचे देखा,एक भिखारी हाथ में एक डंडा लिये अपनी मस्ती में जा रहा था। राय बहदुर ने उसे देखा और बोले:-”वास्तव में तो सुखी यही है,इसे न तो घाटे की चिन्ता न मुनाफे की फिक्र, इसे लाट साहब को पार्टी भी नहीं देनी पड़ती सुखी तो यही है।”*

*शिक्षा*

*इस कहानी से हमें यह पता चलता है, कि हम एक दूसरे को सुखी समझते हैं।पर वास्तव में सुखी कौन है, इसे तो वही जानता है।जिसे आन्तरिक शान्ति है।जिसे आन्तरिक सुकून है, आप चाहे भिखारी हो चाहे करोड़पति हो। लेकिन आप के मन में जब तक शांति नहीं है तब तक आपको सुकून नहीं मिल सकता।*
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तुम यहाँ जिस घरको अपना घर कहते हो, वह तुम्हारा घर नहीं है, रेलके डिब्बेके समान यात्रामें बैठनेका स्थान है या रास्तेमें विश्रामके लिये किसी धर्मशालामें कुछ समयके लिये ठहरनेका स्थान है। तुम्हारा जीवन-यापन तथा तुम्हारी सारी क्रियाएँ चलना है। यदि तुम अपने लक्ष्यको—भगवान् को कभी न भुलते हुए सदा निर्लेप तथा सावधान रहकर भगवान् की ओर चलते रहोगे तो यह मानव-शरीर तुम्हें निश्चय ही वहाँ पहुँचानेमें समर्थ होगा; पर यदि तुमने यात्राको स्थायी निवास मान लिया, रास्तेमें ठहरनेके स्थानरूप इस घरको अपना घर मान लिया, किसीमें ममता जोड़ ली और किसीसे द्वेष कर लिया और यदि इंद्रियोंके भोगोंमें अटककर इधर-उधर भटक गये तो तुम्हारे मानव-जीवनका उद्देश्य तो पूरा होगा ही नहीं, बल्कि उलटे मार्गपर चलकर तुम भगवान् से और भी दूर पहुँच जाओगे।
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तिलक

कोई भी अच्‍छे कर्म करते समय यदि ललाट पर तिलक नहीं लगा हो तो वे सब निष्फल होते हैं।

सौभाग्यवान स्त्री के सिर की बिंदिया और साधु की भक्ति उसका तिलक होता है। तिलक के बगैर साधु की पहचान मुमकिन नहीं। यह जब उसके माथे पर सजता है तो तेजस्विता कई गुना बढ़ जाती है।

'सत्यं, शौचं, होमस्तीर्थ, देवादिपूजनम।
तस्य व्यर्थमिदं सर्वं यस्तिपुण्ड्रे न धारयेत।।
'स्नानं, दान, तपो होमो देवतांपित्रकर्म च।
तत्सर्वं निष्फलं याक्ति ललाटे तिलकं बिना।।
'ललाटे तिलकं कृत्वा संध्याकर्म समाचरेत।
अकृत्वा भालतिलकं तस्य कर्म निरर्थकम।।

अर्थात् : - मनुष्य मात्र के समस्त शुभ कर्म दान, सत्य, वचन, संयम, जप, होम, तीर्थ, कर्म, देव कर्म, पितृ कर्म, संध्यादि संस्कार कर्म, विवाहादि कर्म करते समय यदि ललाट पर तिलक नहीं लगा हो तो वे सब निष्फल होते हैं।

कृष्ण का तिलक से गहरा है नाता
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''कस्तूरी तिलकं ललाट पटले वक्ष:स्थले कौस्तुभं।
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणु: करे कंकणं।।

अर्थात् : - कृष्ण के मस्तक पर कस्तूरी तिलक, वक्ष पर देदीप्यमान कौस्तुभ मणि नाक में सुंदर मोती, हाथ में बांसुरी और कलाई में कंगन धारण करने वाले कृष्ण आप मनमोहन हैं।

होता है आज्ञा चक्र जागृत
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मस्तक के मध्य भाग में जहां तिलक लगाया जाता है, वहां आज्ञाचक्र होता है। इस पर अनामिका (हाथ की तीसरी अंगुली) से तिलक लगाने से आज्ञाचक्र जागृत होता है। इससे व्यक्ति की एकाग्रता बढ़ती व ऊर्जा का संचरण होता है। इसमें अन्य सामग्री मिलाकर त्वचा रोगों से बचाव के उपाय भी किए जाते हैं।

इनसे तिलक हैं शुभ
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कुंकुम, चंदन, रक्त चंदन, केसर, त्रिगंध, अष्टगंध, गोपी चंदन, मृत्तिका, भस्म, गंगाजल, कस्तूरी व अन्य सुगंधित पदार्थ

तिलक हैं साधु की पहचान
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शैव साधु : - भस्म तिलक
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शैव संप्रदाय के साधु भस्म के तिलक व त्रिपुंड लगाते हैं। कई संन्यासी पूरे शरीर पर भस्म लगाते हैं। भाव : पंच तत्वों से बने भौतिक शरीर को भस्म समझकर शरीर का मोह त्याग कर परमात्मा की साधना में लगाना।

शाक्त साधु : - कुंकुम तिलक
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शाक्त संप्रदाय में कुंकुम तिलक की बिंदी या लंबा तिलक लगाने का विधान है। कुंकुम का वर्ण रक्त (लाल) है, जो अग्नि के वर्ण जैसा है। भाव : शरीर को अग्नि (तप) में समर्पित कर सिर्फ उसकी शक्ति (जलने की शक्ति) से मोह आदि विकारों को जलाकर निर्मल मन या शक्ति से महाशक्ति में लीन होना।
वैष्णव साधु : गोपी चंदन- वैष्णव संप्रदाय के साधु मस्तक पर लंबा गोपी चंदन का तिलक लगाते हैं। भाव : माया (दुनियावी प्रपंच) को मिट्टी में मिलाकर भगवत् कृपा के लिए उपासना करना।

अनामिका से करें तिलक
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तिलक हमेशा सीधे हाथ की अनामिका अंगुली से नीचे से ऊपर की ओर तिलक किया जाना चाहिए। अनामिका के तार सीधे हृदय से जुड़े होते हैं, इसलिए दिल स्वागत करने का भी यह संकेत है। मस्तक के अतिरिक्त दोनों कान के निचले हिस्से में, दोनों भुजाओं पर और कंठ व सीने के मध्य भाग में भी लगा सकते हैं।

पंचवटी में भगवान राम ने साधुओं को लगाया था तिलक
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भगवान राम जब वन में गए थे तो उन्होंने युवराज का वेश त्याग कर साधु वेश अपनाकर सिर पर तिलक लगाया था। तभी उन्हें वन में चार साधु आते दिखे, जिनके सिर पर तिलक नहीं था। रामजी ने उनका अभिवादन कर तिलक लगाया। पहले आने वाले साधु को 'लालश्री (कुंकुम) तिलक लगाया। दूसरे को चंदन की 'शुकुलश्री लगाई और तीसरे को श्रीकृष्ण की 'काली बिंदी लगाई। यह काली बिंदी हवन की आग से लगाई जाती है।

नाभि व पीठ पर भी लगाते हैं तिलक
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तिलक सिर्फ मस्तक पर ही नहीं लगाया जाता। साधु-महात्मा पूरे शरीर पर तिलक लगाते हैं। सिर पर तिलक रामजी का, बांह पर लगने वाला क्षत्रियों का, नाभि पर तिलक वैश्यों का तिलक कहलाता है। सिर के मध्य में तिलक को ब्रह्मांड तिलक कहते हैं। पीठ पर लगने वाला तिलक शनिचर का कहलाता है।
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विश्वास का जन्म सदैव हृदय से ही होता है। बुद्धि की प्रधानता जीवन में अविश्वास का एक प्रमुख कारण है क्योंकि बुद्धि तर्क प्रधान होती है और वह सदैव नयें-नयें तर्कों को जन्म देती रहती है। बुद्धिमान होना बहुत अच्छी बात है, लेकिन हृदयवान होना उससे भी बड़ी बात और जीवन की अनिवार्यता है।

मानव जीवन में जितना भी आंतरिक सुख है, वह बुद्धि के कारण नहीं अपितु हृदय के ही कारण है। बुद्धि केवल स्वयं का हित सोचती है, लेकिन हृदय द्वारा सर्व मंगल की कामना की जाती है। हमारी सनातन परम्परा में "सर्वे भवन्तु सुखिनः" की कामना ही हमारे मनीषियों के उदार हृदय को दर्शाती है।

जहाँ हृदय है वहाँ विश्वास है, जहाँ विश्वास है वहाँ आत्मीयता है, जहाँ आत्मीयता है वहाँ सर्व मंगल की कामना है और जहाँ सर्व मंगल की कामना है, वहीं ईश्वर की निकटता का मार्ग भी है। जीवन बुद्धि प्रधान नहीं, हृदय प्रधान होना चाहिए।
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शरभोपनिषत् :---

सर्वं सन्त्यज्य मुनयो यद्भजन्त्यात्मरूपतः ।
तच्छारभं त्रिपाद्ब्रह्म स्वमात्रमवशिष्यते ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्वदेवाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अथ हैनं पैप्पलादो ब्रह्माणमुवाच भो भगवन्
ब्रह्मविष्णुरुद्राणां मध्ये को वा अधिकतरो ध्येयः
स्यात्तत्त्वमेव नो ब्रूहीति ।
तस्मै स होवाच पितामहश्च
हे पैप्पलाद शृणु वाक्यमेतत् ।
बहूनि पुण्यानि कृतानि येन
तेनैव लभ्यः परमेश्वरोऽसौ ।
यस्याङ्गजोऽहं हरिरिन्द्रमुख्या
मोहान्न जानन्ति सुरेन्द्रमुख्याः ॥ १ ॥

प्रभुं वरेण्यं पितरं महेशं
यो ब्रह्माणं विदधाति तस्मै ।
वेदांश्च सर्वान्प्रहिणोति चाग्र्यं
तं वै प्रभुं पितरं देवतानाम् ॥ २ ॥

ममापि विष्णोर्जनकं देवमीड्यं
योऽन्तकाले सर्वलोकान्संजहार ॥ ३ ॥

स एकः श्रेष्ठश्च सर्वशास्ता स एव वरिष्ठश्च ।
यो घोरं वेषमास्थाय शरभाख्यं महेश्वरः ।
नृसिंहं लोकहन्तारं संजघान महाबलः ॥ ४ ॥

हरिं हरन्तं पादाभ्यामनुयान्ति सुरेश्वराः ।
मावधीः पुरुषं विष्णुं विक्रमस्व महानसि ॥ ५ ॥

कृपया भगवान्विष्णुं विददार नखैः खरैः ।
चर्माम्बरो महावीरो वीरभद्रो बभूव ह ॥ ६ ॥

स एको रुद्रो ध्येयः सर्वेषां सर्वसिद्धये ।
यो ब्रह्मणः पञ्चवक्रहन्ता
तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ७ ॥

यो विस्फुलिङ्गेन ललाटजेन सर्वं जगद्भस्मसात्संकरोति ।
पुनश्च सृष्ट्वा पुनरप्यरक्षदेवं स्वतन्त्रं प्रकटीकरोति ।
तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ८ ॥

यो वामपादेन जघान कालं घोरं पपेऽथो हालहलं दहन्तम् ।
तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ९ ॥

यो वामपादार्चितविष्णुनेत्रस्तस्मै ददौ चक्रमतीव हृष्टः ।
तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ १० ॥

यो दक्षयज्ञे सुरसङ्घान्विजित्य
विष्णुं बबन्धोरगपाशेन वीरः ।
तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ११ ॥

यो लीलयैव त्रिपुरं ददाह
विष्णुं कविं सोमसूर्याग्निनेत्रः ।
सर्वे देवाः पशुतामवापुः
स्वयं तस्मात्पशुपतिर्बभूव ।
तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ १२ ॥

यो मत्स्यकूर्मादिवराहसिंहा-
न्विष्णुं क्रमन्तं वामनमादिविष्णुम् ।
विविक्लवं पीड्यमानं सुरेशं
भस्मीचकार मन्मथं यमं च ।
तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ १३ ॥

एवं प्रकारेण बहुधा प्रतुष्ट्वा
क्षमापयामासुर्नीलकण्ठं महेश्वरम् ।
तापत्रयसमुद्भूतजन्ममृत्युजरादिभिः ।
नाविधानि दुःखानि जहार परमेश्वरः ॥१४ ॥

एवं मन्त्रैः प्रार्थ्यमान आत्मा वै सर्वदेहिनाम् ।
शङ्करो भगवानाद्यो ररक्ष सकलाः प्रजाः ॥ १५ ॥

यत्पादाम्भोरुहद्वन्द्वं मृग्यते विष्णुना सह ।
स्तुत्वा स्तुत्यं महेशानमवाङ्मनसगोचरम् ॥ १६ ॥

भक्त्या नम्रतनोर्विष्णोः प्रसादमकरोद्विभुः ।
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कदाचनेति ॥ १७ ॥

अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्मास्यजन्तोर्निहितो गुहायाम् ।
तमक्रतुं पश्यति वीतशोको
धातुःप्रसादान्महिमानमीशम् ॥ १८ ॥

वसिष्ठवैयासकिवामदेव-
विरिञ्चिमुख्यैर्हृदि भाव्यमानः ।
सनत्सुजातादिसनातनाद्यै-
रीड्यो महेशो भगवानादिदेवः ॥ १९ ॥

सत्यो नित्यः सर्वसाक्षी महेशो
नित्यानन्दो निर्विकल्पो निराख्यः ।
अचिन्त्यशक्तिर्भगवान्गिरीशः
स्वाविद्यया कल्पितमानभूमिः ॥ २० ॥

अतिमोहकरी माया मम विष्णोश्च सुव्रत ।
तस्य पादाम्बुजध्यानाद्दुस्तरा सुतरा भवेत् ॥ २१ ॥

विष्णुर्विश्वजगद्योनिः स्वांशभूतैः स्वकैः सह ।
ममांशसंभवो भूत्वा पालयत्यखिलं जगत् ॥ २२ ॥

विनाशं कालतो याति ततोऽन्यत्सकलं मृषा ।
ॐ तस्मै महाग्रासाय महादेवाय शूलिने ।
महेश्वराय मृडाय तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ २३ ॥

एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतायनेकशः ।
त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ २४ ॥

चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चमिरेव च ।
हूयते च पुनर्द्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥ २५ ॥

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २६ ॥

शरा जीवास्तदङ्गेषु भाति नित्यं हरिः स्वयम् ।
ब्रह्मैव शरभः साक्षान्मोक्षदोऽयं महामुने ॥ २७ ॥

मायावशादेव देवा मोहिता ममतादिभिः ।
तस्य माहात्म्यलेशांशं वक्तुं केनाप्य शक्यते ॥ २८ ॥

परात्परतरं ब्रह्म यत्परात्परतो हरिः ।
परात्परतरो हीशस्तस्मात्तुल्योऽधिको न हि ॥ २९ ॥

एक एव शिवो नित्यस्ततोऽन्यत्सकलं मृषा ।
तस्मात्सर्वान्परित्यज्य ध्येयान्विष्ण्वादिकान्सुरान् ॥ ३० ॥

शिव एव सदा ध्येयः सर्वसंसारमोचकः ।
तस्मै महाग्रासाय महेश्वराय नमः ॥ ३१ ॥

पैप्पलादं महाशास्त्रं न देयं यस्य कस्यचित् ।
नास्तिकाय कृतघ्नाय दुर्वृत्ताय दुरात्मने ॥ ३२ ॥

दांभिकाय नृशंसाय शठायानृतभाषिणे ।
सुव्रताय सुभक्ताय सुवृत्ताय सुशीलिने ॥ ३३ ॥

गुरुभक्ताय दान्ताय शान्ताय ऋजुचेतसे ।
शिवभक्ताय दातव्यं ब्रह्मकर्मोक्तधीमते ॥ ३४ ॥
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स्वभक्तायैव दातव्यमकृतघ्नाय सुव्रतम् ।
न दातव्यं सदा गोप्यं यत्नेनैव द्विजोत्तम ॥ ३५ ॥

एतत्पैप्पलादं महाशास्त्रं योऽधीते श्रावयेद्द्विजः
स जन्ममरणेभ्यो मुक्तो भवति ।
यो जानीते सोऽमृतत्वं
च गच्छति ।
गर्भवासाद्विमुक्तो भवति ।
सुरापानात्पूतो
भवति ।
स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति ।
ब्रह्महत्यात्पूतो
भवति ।
गुरुतल्पगमनात्पूतो भवति ।
स सर्वान्वेदानधीतो
भवति ।
स सर्वान्देवान्ध्यातो भवति ।
स समस्तमहापातको-
पपातकात्पूतो भवति ।
तस्मादविमुक्तमाश्रितो भवति ।
स सततं शिवप्रियो भवति ।
स शिवसायुज्यमेति ।
न स
पुनरावर्तते न स पुनरावर्तते ।
ब्रह्मैव भवति ।
इत्याह
भगवान्ब्रह्मेत्युपनिषत् ॥

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इति शरभोपनिषत्समाप्ता ॥
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तुलसीदास ने रामायण का नाम राम चरित मानस रखा है। उनके साधना का शोधग्रन्थ है यह मानस। रामचरित मानस का मतलब है- राम के चरित मन से। देखिये, राम त्रेता में हुए , आज नहीं हैं। जब वे थे उन्होंने सबका कल्याण किया। आज श्रीराम नहीं है तो कौन कल्याण करेगा? अब जो श्रीराम आज भी है वही हमारा कल्याण कर सकते है। राम का देश-काल अबाधित रूप आत्मा का है। जो परात्पर आत्मा सब में रम रहा है।

राम ब्रह्म चिनमय अविनाशी।
सर्व रहित सब उर पुरबासी।।

ऐसा जो परमात्मा राम घट-घट में बैठे है वह कल्याण स्वरूप है, उससे भेंट हो तो कल्याण हो।

"अवध सरिस मोहि प्रिय नहिं सोऊ।
यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।"

शरीर ही अवध है। दस इन्द्रियों में अनुगत चेतन का प्रतिबिम्ब दशरथ है। भक्ति कौशल्या है, कर्म कैकेयी, सुमति सुमित्रा, ज्ञान रूपी राम, भाव भरत, विवेक लक्ष्मण, सत्य शत्रुघ्न है। फिर विश्वास रूपी विश्वामित्र के आने पर तर्क रूपी ताड़का को मारकर आगे जनकपुर में सीता को वरण करते हैं। मोह रावण है, क्रोध कुम्भकर्ण, लोभ नारान्तक, काम मेघनाद और मन के सारे विकार राक्षस हैं। वैराग्य रूपी हनुमान, सुरति सुग्रीव, अनुराग अंगद, यम-नियम नल-नील आदि वानरी सेना के द्वारा मोह रावण का कुटुम्ब सहित विनाश करके जीव रूपी विभीषण का कल्याण करते हैं, उसे राजा बना देते हैं। तो यह सब असली रामायण अपने अंदर की है। बाहर के कथानकों में तुलसीदास ने अपने भीतर की साधना-प्रक्रिया को अभिव्यक्त किया है, मानस की अनुभूतियों को राम-चरित के साथ जोड़कर कहा है। सभी ऋषियों ने , संतों ने इसी प्रकार अपने अनुभव कहे हैं।
वस्तुतः असली साधन-सत्संग अपने अंतःकरण का है, बाहर का नहीं। मन के विचार को सकरात्मक बनाने के लिए ही धर्म का मर्म है हम सब अपने जागृत आचरण विचरण व्यवहार को सही दिशा निर्देश दे सके।
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एक मार्मिक बात है कि असर शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि पर पड़ता है, आप पर नहीं | जिस जाति की वस्तु है, उसी जाति पर उसका असर पड़ता है, आप पर नहीं पड़ता, क्योंकि आपकी जाति अलग है | शरीर-संसार जड़ है, आप चेतन हो | जड़ का असर चेतन पर कैसे पड़ेगा ? जड़ का असर तो जड़ (शरीर) – पर ही पड़ेगा | यह सच्ची बात है | इसको अभी मान लो तो अभी काम हो गया ! आँखों के कारण देखने का असर पड़ता है | कानों के कारण सुनने का असर पड़ता है | तात्पर्य है कि असर सजातीय वस्तु पर पड़ता है | अत: कितना ही असर पड़े, उसको आप सच्चा मत मानो | आपके स्वरूप पर असर नहीं पड़ता | स्वरूप बिलकुल निर्लेप है – असंगो ह्ययं पुरुष:’ (बृहदा. ४/३/१५) | मन-बुद्धि पर असर पड़ता है तो पड़ता रहे | मन-बुद्धि हमारे नहीं हैं | ये उसी धातु के हैं, जिस धातु की वस्तु का असर पड़ता है |
प्रश्न – फिर सुखी और दु:खी स्वयं क्यों होता है ?
उतर – मन-बुद्धि को अपना मानने से ही स्वयं सुखी-दु:खी होता है | मन-बुद्धि अपने नहीं हैं, प्रत्युत प्रकृति के अंश हैं | आप परमात्मा के अंश हो | मन-बुद्धि पर असर पड़ने से आप सुखी-दु:खी होते हो तो यह गलती की बात है | वास्तव में आप सुखी-दु:खी नहीं होते, प्रत्युत ज्यों के त्यों रहते हो | विचार करें, अगर आपके ऊपर सुख-दु:ख का असर पड़ जाय तो आप अपरिवर्तनशील और एकरस नहीं रहेंगे | आप पर असर पड़ता नहीं है, प्रत्युत आप अपने पर असर मान लेते हैं | कारण कि आपने मन-बुद्धि को अपने मान रखा है, जो आपके कभी नही हैं | मन-बुद्धि प्रकृति के हैं और प्रकृति का असर प्रकृति पर ही पड़ेगा |
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ज्ञान और प्रेम

एक परमात्मा का अंश है और एक प्रकृति का अंश है! तो शरीर, मन व इंद्रियां यह सब प्रकृति का अंश है। और स्वयं परमात्मा का अंश है! ममैवांशो जीवलोके- साक्षात परमात्मा का अंश है जैसे हम मां-बाप के हैं, ऐसे नहीं है। यह चेतन है, यह प्रकृति का नहीं है । स्थूल, सूक्ष्म, कारणशरीर यह सब प्रकृति का है! क्रिया होती है स्थूलशरीर से, सूक्ष्मशरीर से चिंतन होता है और कारणशरीर में समाधि होती है। समाधि में भी दो अवस्था होती हैं, एक समाधि एक व्युत्थान! समाधि वास्तव में कारणशरीर में होती है। कई महात्माओं ने समाधि को जीवन्मुक्त अवस्था बताई है। जबकि जीवन्मुक्त अवस्था में शरीर से संबंध नहीं होता। पर समाधि में व्युत्थान होता है। तो यह समाधि है! शरीर से संबंध-विच्छेद हो जाए तब सहजावस्था होती है। जड़ता से संबंध-विच्छेद होता है, अभी भी अलग है, पर अनुभव नहीं है! जड़ चीज अलग है, चेतन अलग है। पीछे अलग होगा, तो पहले भी अलग है! अन्य शरीरों में (कुत्ते, गधे आदि में) "मैं" शरीर से अलग है, पर यह ज्ञान नहीं है। ऐसे ही मनुष्य शरीर में भी यह ज्ञान नहीं हो रहा, पर जब हो जाता है, तो अलग अनुभव करता है!
एक नई बात है कि साधक शरीर नहीं होता। संसार का काम तो शरीर की मुख्यता से होता है और परमात्मा की तरफ चलते हैं तो स्थूलशरीर से ऊंचा उठ जाता है। स्थूलशरीर से अलग मानता है। जीव है, वह कारण शरीर के साथ मिला हुआ होता है! तो परमात्मा की तरफ चले तो यह मान्यता चाहिए कि मैं शरीर से अलग हूं मानना चाहिए कि मैं शरीर से अलग हूं! मैं स्थूल-शरीरधारी नहीं हूं! यह मान लेना चाहिए! मैं सूक्ष्म-शरीरधारी नहीं हूं! यह बात आज ही बताई है! कर्मयोग, ज्ञानयोग साधन हैं और भक्तियोग साध्य है, ये सब नहीं बताते, ज्ञानयोग को ही मुख्य मानते हैं। ज्ञानयोग से, कर्मयोग से कल्याण तो हो जाता है, पर परमात्मा के साथ (भक्तियोग में) प्रेम होता है! द्वैत, अद्वैत, अचिंत्याभेद इनके कारण मतभेद रहता है! यह सूक्ष्मभेद है, यह मुक्ति में बाधक नहीं होता, पर मतभेद रहता है! जब मतभेद भी अंत में मिट जाता है, तो भक्ति होती है, प्रेम हो जाता है। तो पहले कर्मयोग किया जाए, फिर ज्ञानयोग और भक्तियोग आरंभ से किया जाए! एक साधन-भक्ति होती है और एक साध्य-भक्ति होती है नवधा-भक्ति साधन-भक्ति है! श्रवणम्, कीर्तनम, आत्म-निवेदनम ये नवधाभक्ति है इसके बाद प्रेमलक्षणा भक्ति होती है। प्रेम भगवान भी चाहते हैं और भक्त भी चाहता है! प्रेम में भगवान भक्त के इष्ट होते हैं, भक्त भगवान के इष्ट होते हैं! भगवान कृष्ण के इष्ट श्री राधाजी हैं। श्री राधाजी के इष्ट भगवान् श्रीकृष्ण हैं। यहां स्त्री-पुरुष का भेद नहीं है। शुद्ध प्रेम ही प्रेम है! भगवान ही अपने शरीर से दो हो गए भगवान् और श्री राधाजी! ज्ञान से पहले का द्वैत वो बंधनकारक है और ज्ञान के बाद भेद सुंदर है! एक कथा आती है राधाजी गोपियों से कहती हैं कि तुम बड़ी धन्य हो जो भगवान को देखा, मैंने तो देखा ही नहीं। तो गोपियां सोचती हैं ये छुपा रही हैं। तो एक बार भगवान कृष्ण यमुना के किनारे खड़े थे, तो राधाजी ने भगवान को देखा और उनकी दृष्टि कुंडल पर गई । तो कुंडल को ही देखती रही और शरीर की तरफ दृष्टि गई ही नहीं। गोपियों ने देखा कि राधाजी देख रही हैं। तो फिर राधाजी से कहती हैं कि आज तो कृष्ण भगवान के दर्शन हो गए तो कहती हैं कि मैंने देखा ही नहीं। तो बात क्या थी कि उनकी दृष्टि कुंडल तक ही गई, तो वहीं आकृष्ट हो गई। वहां ही इतनी तृप्ति थी कि उनकी दृष्टि आगे गई ही नहीं! हनुमानजी महाराज की दास्य भक्ति है। माधुर्य में तीनों होते हैं - दास्य, सख्य, वात्सल्य! माधुर्यरस को सर्वोपरि माना है! तो भक्ति में पहले से ही प्रेम होता है। दास्य भक्त को भगवान् के चरणों से प्रेम होता है । माधुर्य में प्रेम होता है आंखों से । सख्य में बराबर होता है। तो ऐसी बात है शास्त्रों की! तो आज एक नई बात बताई कि भक्त होता है, भगवान की तरफ चलने वाला वो शरीर नहीं होता है, शरीर से अलग होता है।
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अन्त:करण में, मन में भगवान् का प्रेमस्वरूप इस प्रकार प्रविष्ट हो रहा है | भगवान् मानो गड़ गये, अब किसी तरह हट नहीं सकते | सारी बातें मन से ही हो रही हैं, अब भगवान् छिप गये | उनके विरह में व्याकुल होकर मानो प्रार्थना कर रहा हूँ कि आप दर्शन क्यों नहीं देते ? आपके वियोग में मैं कैसे रह सकूँगा ? इस प्रकार वियोग से भावित होकर संयोग के लिये लालायित होना यह उनका स्मरण है | फिर भगवान् से प्रेम की बातें करनी हैं | वह परस्पर में गुह्य्भाष्ण है | छिपी हुई गोपनीय बातें जो भगवान् के साथ ही हो सकती हैं | वार्तालाप में दोनों परस्पर बोलते हैं | ऐसी गोपनीय है, संसार से छिपी हुई है | यह गुह्यभाषण है | इससे चित में जो प्रसन्नता, शान्ति मिलती है उसी का नाम संतोष है | ऐसा करने से शीघ्र ही प्रेम का प्रादुर्भाव होकर भगवान् की प्राप्ति हो जाती है | वास्तव में वहीँ भगवान् प्रकट हो जाते हैं |
भगवान् का दिव्य विग्रह है उससे स्वाभाविक ही मनुष्य पर प्रभाव पड़ता है | भगवान् की लीला का प्रभाव अच्छा पड़ता है | उनके नेत्रों की छटा का अच्छा प्रभाव पड़ता है | भगवान् की वाणी, उपदेश, आदेश का अच्छा प्रभाव पड़ता है |
इस प्रकार के भाव से मनुष्य मुग्ध हो जाता है, उसको बड़ी भारी शान्ति मिलती है | उनके गुणों का प्रभाव पड़ता है | शरीर, नेत्र, वाणी, क्रिया, भाव इन पाँच चीजों का प्रभाव पड़ता है | इसी तरह पाँच बातें महात्माओं के विषय में है | फिर यह बात आती है कि इस प्रकार का प्रभाव प्रत्यक्ष होने पर अधिक पड़ता है या मानसिक का | यदि कहो मानसिक का पड़ता है तो मिलन की क्या आवश्यकता है ? यदि प्रत्यक्ष का पड़ता है तो मानसिक की इतनी महिमा क्यों है ?
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।। श्रीहरिविष्णु- स्तोत्र ।।
(हिंदीअर्थ सहित)

जगत के पालनहार भगवान श्रीहरिविष्णु को समर्पित इस स्तोत्र की रचना श्री आचार्य ब्रह्मानंद के द्वारा की गई है। इस स्तोत्र को भगवान श्रीहरि विष्णु की उपासना के लिए सबसे शक्तिशाली मंत्र कहा गया है। श्री हरि स्तोत्र के नियमित पाठ करने से भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी का भी आशीर्वाद मिल जाता है।

श्रीहरि स्तोत्र भगवान विष्णु के बारे में बताता है, उनके आकार, प्रकार, उनके स्वरूप, उनके पालक गुण और रक्षात्मक रूप को सामने रखता है। भगवान हरि का यह अष्टक जो कि मुरारी के कंठ की माला के समान है, जो भी इसे सच्चे मन से पढ़ता है वह वैकुण्ठ लोक को प्राप्त होता है। वह दुख, शोक, जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।

।। श्रीहरिविष्णुस्तोत्र ।।
(हिंदीअर्थ सहित)

जगज्जाल-पालं चलत्कण्ठ-मालं, शरच्चन्द्रभालं महादैत्य-कालं।
नभो-नीलकायं दुरावार-मायं, सुपद्मा-सहायम् भजेऽहं भजेऽहं।।

सदाम्भोधि-वासं गलत्पुष्प-हासं, जगत्सन्निवासं शतादित्य-भासं।
गदाचक्र-शस्त्रं लसत्पीत-वस्त्रं, हसच्चारु-वक्त्रं भजेऽहं भजेऽहं।।

रमाकण्ठ-हारं श्रुतिव्रात-सारं, जलान्त-र्विहारं धराभार-हारं।
चिदानन्द-रूपं मनोज्ञ-स्वरूपं, ध्रुतानेक-रूपं भजेऽहं भजेऽहं।।

जराजन्म-हीनं परानन्द-पीनं, समाधान-लीनं सदैवा-नवीनं।
जगज्जन्म-हेतुं सुरानीक-केतुं, त्रिलोकै-कसेतुं भजेऽहं भजेऽहं।।

कृताम्नाय-गानं खगाधीश-यानं, विमुक्ते-र्निदानं हराराति-मानं।
स्वभक्तानु-कूलं जगद्व्रुक्ष-मूलं, निरस्तार्त-शूलं भजेऽहं भजेऽहं।।

समस्ताम-रेशं द्विरेफाभ-केशं, जगद्विम्ब-लेशं ह्रुदाकाश-देशं।
सदा दिव्य-देहं विमुक्ता-खिलेहं, सुवैकुण्ठ-गेहं भजेऽहं भजेऽहं।।

सुरालि-बलिष्ठं त्रिलोकी-वरिष्ठं, गुरूणां गरिष्ठं स्वरूपै-कनिष्ठं।
सदा युद्ध-धीरं महावीर-वीरं, महाम्भोधि-तीरं भजेऽहं भजेऽहं।।

रमावाम-भागं तलानग्र-नागं, कृताधीन-यागं गताराग-रागं।
मुनीन्द्रैः सुगीतं सुरैः संपरीतं, गुणौधैर-तीतं भजेऽहं भजेऽहं।।

फलश्रुति-
इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तं, पठेदष्टकं कण्ठ-हारम् मुरारे:।
स विष्णोर्वि-शोकं ध्रुवं याति लोकं, जराजन्म-शोकं पुनर्विन्दते नो।।

भावार्थ-
जो समस्त जगत के रक्षक हैं, जो गले में चमकता हार पहने हुए है, जिनका मस्तक शरद ऋतु में चमकते चन्द्रमा की तरह है और जो महादैत्यों के काल हैं। आकाश के समान जिनका रंग नीला है, जो अजय मायावी शक्तियों के स्वामी हैं, देवी लक्ष्मी जिनकी साथी हैं उन भगवान विष्णु को मैं बारंबार भजता हूँ।

जो सदा समुद्र में वास करते हैं, जिनकी मुस्कान खिले हुए पुष्प की भांति है, जिनका वास पूरे जगत में है, जो सौ सूर्यों के समान प्रतीत होते हैं। जो गदा, चक्र और शस्त्र अपने हाथों में धारण करते हैं, जो पीले वस्त्रों में सुशोभित हैं और जिनके सुंदर चेहरे पर प्यारी मुस्कान हैं, उन भगवान विष्णु को मैं बारंबार भजता हूँ।

जिनके गले के हार में देवी लक्ष्मी का चिन्ह बना हुआ है, जो वेद वाणी के सार हैं, जो जल में विहार करते हैं और पृथ्वी के भार को धारण करते हैं। जिनका सदा आनंदमय रूप रहता है और मन को आकर्षित करता है, जिन्होंने अनेकों रूप धारण किये हैं, उन भगवान विष्णु को मैं बारम्बार भजता हूँ।

जो जन्म और मृत्यु से मुक्त हैं, जो परमानन्द से भरे हुए हैं, जिनका मन हमेशा स्थिर और शांत रहता है, जो हमेशा नूतन प्रतीत होते हैं। जो इस जगत के जन्म के कारक हैं। जो देवताओं की सेना के रक्षक हैं और जो तीनों लोकों के बीच सेतु हैं। उन भगवान विष्णु को मैं बारंबार भजता हूँ।

जो वेदों के गायक हैं। पक्षीराज गरुड़ की जो सवारी करते हैं। जो मुक्तिदाता हैं और शत्रुओं का जो मान हारते हैं। जो भक्तों के प्रिय हैं, जो जगत रूपी वृक्ष की जड़ हैं और जो सभी दुखों को निरस्त कर देते हैं। मैं उन भगवान विष्णु को बारम्बार भजता हूँ।

जो सभी देवताओं के स्वामी हैं, काली मधुमक्खी के समान जिनके केश का रंग है, पृथ्वी जिनके शरीर का हिस्सा है और जिनका शरीर आकाश के समान स्पष्ट है। जिनका शरीर सदा दिव्य है, जो संसार के बंधनों से मुक्त हैं, बैकुंठ जिनका निवास है, मैं उन भगवान विष्णु को बारम्बार भजता हूँ।।

जो देवताओं में सबसे बलशाली हैं, त्रिलोकों में सबसे श्रेष्ठ हैं, जिनका एक ही स्वरूप है, जो युद्ध में सदा विजय हैं, जो वीरों में वीर हैं, जो सागर के किनारे पर वास करते हैं, उन भगवान विष्णु को मैं बारंबार भजता हूँ।

जिनके बाईं ओर लक्ष्मी विराजित होती हैं। जो शेषनाग पर विराजित हैं। जो राग-रंग से मुक्त हैं। ऋषि-मुनि जिनके गीत गाते हैं। देवता जिनकी सेवा करते हैं और जो गुणों से परे हैं। मैं उन भगवान विष्णु को बारम्बार भजता हूँ।

भगवान हरि का यह अष्टक जो कि मुरारी के कंठ की माला के समान है,जो भी इसे सच्चे मन से पढ़ता है वह वैकुण्ठ लोक को प्राप्त होता है। वह दुख, शोक, जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।
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।। इति श्रीपरमहंसस्वामि ब्रह्मानंद विरचितं श्रीहरि स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।
एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा।।
ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना।।
जो परमेश्वर एक हैं, जिनके कोई इच्छा नहीं है, जिनका कोई रूप और नाम नहीं है, जो अजन्मा, सच्चिदानन्द और परमधाम हैं और जो सबमें व्यापक एवं विश्वरूप हैं, उन्हीं भगवान् ने दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकारकी लीला की है।।
जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ।
सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ।।
अस रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहन जन सुखकारी।।
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्।।
वह चराचर सब भूतोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है तथा अति समीपमें और दूरमें भी स्थित वही है।।
ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता।।
अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता।।
निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा।।
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।।
मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी।।
सो तैं ताहि तोह नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा।।
लेकिन -
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।
बहुत जन्मोंके अन्तके जन्ममें तत्त्वज्ञानको प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही है - इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।। अर्थात् -
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जानै दृढ़ सेवा।।
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।।
भगवान् कहते हैं - हे पार्थ! उस पुरुषका न तो इस लोकमें नाश होता है और न परलोकमें ही। क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धारके लिये अर्थात् भगवत्प्राप्तिके लिये कर्म करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता।।
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।‌।
योगपुरुष पुण्यवानोंके लोकोंको अर्थात् उत्तम लोकोंको प्राप्त होकर, उनमें बहुत वर्षोंतक निवास करके फिर शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषोंके घरमें जन्म लेता है।।
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्।।
अथवा वैराग्यवान् पुरुष उन लोकोंको न जाकर ज्ञानवान् योगियोंके ही कुलमें जन्म लेता है। परन्तु इस प्रकारका जो यह जन्म है, सो संसारमें निःसन्देह अत्यन्त दुर्लभ है।।
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*आने वाले कुछ व्रत त्यौहार*

1 अगस्त दुर्गाष्टमी,मेला चिंतपूर्णी,चामुंडादेवी(हि प्र)
लोकमान्य तिलक पुण्यतिथि

2 अगस्त मेला नैनादेवी(हि प्र), अश्वतथ मारुती पूजन,
3 अगस्त आदित्य पूजन, मित्रता दिवस,
5 अगस्त पुत्रदा एकादशी व्रत,
6 अगस्त प्रदोष व्रत,
8 अगस्त वरलक्ष्मी व्रत,
9 अगस्त रक्षाबंधन,राखी,गायत्री जयंती,पूर्णिमा, अंवाधान,
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पांच भूतों का अर्थ है : पांच महातत्व—
पृथ्वी, अग्नि जल, वायु, आकाश।
तुम्हारा पहला शरीर अन्नमय कोष, भोजन-काया से पृथ्वी संबंधित है। अग्नि तुम्हारे दूसरे शरीर ऊर्जा-शरीर, बायो-प्लाज्मा, ची, प्राणमय कोष से संबंधित है, इसमें अग्नि का गुण होता है। तीसरा जल है, यह मनोमय कोष, मनस-शरीर से संबंधित है, इसमें जल का गुण होता है। मन का निरीक्षण करो, कैसे यह प्रवाह की भांति, सदा गतिशील, नदी की भांति, गतिमान रहता है। चौथा है वायु, लगभग अदृश्य, तुम उसे देख नहीं सकते, फिर भी यह वहां होती है, तुम इसे मात्र अनुभव कर सकते हो, यह ‘भाव-शरीर, विज्ञानमय कोष से संबंधित है।
और तब आता है आकाश, ईथर, तुम इसे अनुभव नहीं कर सकते, यह हवा से भी अधिक सूक्ष्म हो जाता है। तुम इसका विश्वास कर सकते हो, श्रद्धा कर सकते हो कि यह वहां है। यह शुद्ध आकाश है, यह आनंद है।
लेकिन तुम शुद्ध आकाश से शुद्धतर, ‘शुद्ध आकाश से भी सूक्ष्मतर हो। तुम्हारा यथार्थ ऐसा है कि करीब-करीब वह है ही नहीं। यही कारण है कि बुद्ध कहते हैं : अनन्ता, अनात्मा।
तुम्हारा आत्म अनात्म जैसा है, तुम्हारा अस्तित्व करीब-करीब अनअस्तित्व जैसा है। अनअस्तित्व क्यों? क्योंकि यह सारे स्थूल तत्वों से काफी परे है। यह मात्र होना है। इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है, कोई व्याख्या इसके लिए पर्याप्त नहीं है।
पंच तत्त्व वो ज्ञान है जो बाजार में नहीं मिलता अंदर बिजय केवल ध्यान से मिलता है ये हैं पांच भूत, पांच महातत्व, जो तुम्हारे भीतर के पांच कोषों, शरीरों से संबंधित हैं।
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अरावन देवता, जिनसे होती है किन्नरों यानि हिंजड़ो की शादी?
हमारे देश भारत के तमिलनाडु राज्य में एक देवता अरावन की पूजा की जाती है। कई जगह इन्हे इरावन के नाम से भी जाना जाता है। अरावन हिंजड़ो के देवता है इसलिए दक्षिण भारत में हिंजड़ो को अरावनी कहा जाता है।

हिंजड़ो और अरावन देवता के सम्बन्ध में सबसे अचरज वाली बात यह है की हिंजड़े अपने आराध्य देव अरावन से साल में एक बार विवाह करते है।

हालांकि यह विवाह मात्र एक दिन के लिए होता है। अगले दिन अरावन देवता की मौत के साथ ही उनका वैवाहिक जीवन खत्म हो जाता है।

अब सवाल यह उठता है की अरावन है कौन? हिंजड़े उनसे क्यों शादी रचाते है? और यह शादी मात्र एक दिन के लिए ही क्यों होती है ?

इन सभी प्रशनो का उत्तर जानने के लिए हमे महाभारत काल में जाना पड़ेगा।

अरावनअर्जुन और नाग कन्या उलुपी के पुत्र थे। अरावन महाभारत की कथा के अनुसार एक बार अर्जुन को द्रोपदी से शादी की एक शर्त के उल्लंघन के कारण इंद्रप्रस्थ से निष्कासित करके एक साल की तीर्थयात्रा पर भेजा जाता है।

वहाँ से निकलने के बाद अर्जुन उत्तर पूर्व भारत में जाते है जहाँ की उनकी मुलाक़ात एक विधवा नाग राजकुमारी उलूपी से होती है। दोनों को एक दूसरे से प्यार हो जाता है और दोनों विवाह कर लेते है।

विवाह के कुछ समय पश्चात उलूपी एक पुत्र को जन्म देती है जिसका नाम अरावन रखा जाता है। पुत्र जन्म के पश्चात अर्जुन उन दोनों को वही छोड़कर अपनी आगे की यात्रा पर निकल जाता है।

अरावन नागलोक में अपनी माँ के साथ ही रहता है। युवा होने पर वो नागलोक छोड़कर अपने पिता के पास आता है। तब कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध चल रहा होता है। इसलिए अर्जुन उसे युद्ध करने के लिए रणभूमि में भेज देता है।

महाभारत युद्ध में दी थी स्वयं की बलि महाभारत युद्ध में एक समय ऐसा आता है जब पांडवो को अपनी जीत के लिए माँ काली के चरणो में स्वेचिछ्क नर बलि हेतु एक राजकुमार की जरुरत पड़ती है।

जब कोई भी राजकुमार आगे नहीं आता है तो अरावन खुद को स्वेचिछ्क नर बलि हेतु प्रस्तुत करता है लेकिन वो शर्त रखता है की वो अविवाहित नहीं मरेगा।

इस शर्त के कारण बड़ा संकट उत्त्पन हो जाता है क्योकि कोई भी राजा यह जानते हुए की अगले दिन उसकी बेटी विधवा हो जायेगी अरावन से अपनी बेटी की शादी के लिए तैयार नहीं होता है।

जब कोई रास्ता नहीं बचता है तो भगवान श्री कृष्ण स्वंय को मोहिनी रूप में बदलकर अरावन से शादी करते है। अगले दिन अरावन स्वंय अपने हाथो से अपना शीश माँ काली के चरणो में अर्पित करता है।

अरावन की मृत्यु के पश्चात श्री कृष्ण उसी मोहिनी रूप में काफी देर तक उसकी मृत्यु का विलाप भी करते है। अब चुकी श्री कृष्ण पुरुष होते हुए स्त्री रूप में अरावन से शादी रचाते है।

इसलिए किन्नर जो की स्त्री रूप में पुरुष माने जाते है भी अरावन से एक रात की शादी रचाते है और उन्हें अपना आराध्य देव मानते है।कूवगम तमिलनाडु में है भगवान अरावन का मंदिर ।

वैसे तो अब तमिलनाडु के कई हिस्सों में भगवान अरावन के मंदिर बन चुके है पर इनका सबसे प्राचीन और मुख्य मंदिर विल्लुपुरम जिले के कूवगम गाँव में है जो की Koothandavar Temple के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में भगवान अरावन के केवल शीश की पूजा की जाती है ठीक वैसे ही जैसे की राजस्थान के खाटूश्यामजी में बर्बरीक के शीश की पूजा की जाती है।

हिंजड़ो का सबसे बड़ा उत्सव कूवगम गाँव में हर साल तमिल नव वर्ष की पहली पूर्णिमा फुल मून को 18 दिनों तक चलने वाले उत्सव की शुरुआत होती है।

इस उत्सव में पुरे भारत वर्ष और आस पास के देशों से किन्नर इकठ्ठा होते है। पहले 16 दिन मधुर गीतों पर खूब नाच गाना होता है। किन्नर गोल घेरे बनाकर नाचते गाते है।

बीच बीच में ताली बजाते है । और हंसी खुशी शादी की तैयारी करते हैं। चारों तरफ घंटियों की आवाज उत्साही लोगों की आवाजें गूंज रही होती हैं । चारों तरफ के वातावरण को कपूर और चमेली के फूलों की खूशबू महकाती है।

17 वे दिन पुरोहित दवारा विशेष पूजा होती है और अरावन देवता को नारियल चढाया जाता है । उसके बाद आरावन देवता के सामने मंदिर के पुराहित के दवारा किन्नरों के गले में मंगलसूत्र पहनाया जाता है ।

जिसे थाली कहा जाता है । फिर अरावन मंदिर में अरावन की मूर्ति से शादी रचाते है । अतिंम दिन यानि 18 वे दिन सारे कूवगम गांव में अरावन की प्रतिमा को घूमाया जाता है और फिर उसे तोड़ दिया जाता है।

उसके बाद दुल्हन बने किन्नर अपना मंगलसूत्र तोड़ देते है साथ ही चेहरे पर किए सारे श्रृंगार को भी मिटा देते हैं । और सफेद कपड़े पहन लेते है और जोर जोर से छाती पीटते है और खूब रोते है।
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जिसे देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखे भी नम हो जाती है और उसके बाद आरावन उत्सव खत्म हो जाता है । और अगले साल की पहली पूर्णिमा पर फिर से मिलने का वादा करके लोगों का अपने अपने घर को जाने कार्यक्रम शुरू हो जाता है ।।
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*अर्थोपार्जन और आध्यात्मिकता*
👉 *कुछ लोगों की ऐसी मान्यता है कि "धार्मिक व्यक्ति" को धन से "विरक्ति" होनी चाहिए।* जहाँ तक आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति का प्रश्न है, धन के प्रति अत्यधिक लगाव न रखना उचित भी है, *किंत गृहस्थी की सुख-सुविधाओं के लिए, "धार्मिक प्रयोजनों" की पूर्ति के लिए "धन" अत्यधिक आवश्यक है।* धन के बिना न धर्म संभव है न कर्तव्य पालन। *इस दृष्टि से "निर्धनता" अभिशाप है।* हमारे आध्यात्मिक जीवन में धन का उतना ही महत्त्व है, जितना ईश्वर उपासना का। *लक्ष्मी को परमात्मा का वामांग मानते हैं। इसलिए उपासना को तब पूर्ण समझना चाहिए जब लक्ष्मी-नारायण दोनों की प्रतिष्ठा हो।* जहाँ लक्ष्मी नहीं वहाँ का परमात्मा भी बेचैन रहता है। लक्ष्मी रहती है तो परमात्मा की प्राप्ति में सुविधा मिलती है, हमारी मान्यता इस प्रकार की होनी चाहिए।
👉 *आर्थिक दृष्टि से मनुष्य दूसरों का गुलाम बने, यह न तो उपयुक्त ही है और न परमात्मा की ही ऐसी इच्छा है।* उन्होंने अपने प्रत्येक पुत्र को समान साधन दिए हैं, समान क्षमताएँ दी हैं तो उसका एक ही उद्देश्य रहा है कि आत्म-कल्याण और जीवनयापन में प्रत्येक व्यक्ति आत्मनिर्भर रहे। *ईश्वरनिष्ठ को निराश्रित होना उचित भी नहीं,* अपनी आजीविका का प्रबंध उसे स्वयं करना चाहिए।
👉 *"निर्धनता" एक प्रकार की "आध्यात्मिक विकृति" है।* धन न कमाना त्याग का लक्षण नहीं। यह मनुष्य में दैवी गुणों की कमी का परिचायकहै। *हर व्यक्ति को विशुद्ध धार्मिक भावना से अर्थोपार्जन करना चाहिए।* यह क्रिया आत्म-विकास के अंतर्गत ही आती है। *'पीस, पावर एंड प्लेन्टी*' (शांति, शक्ति और समृद्धि) नामक पुस्तक के रचयिता *श्री ओरिसन मार्डन* ने लिखा है- *"जो दरिद्री होते हैं उनमें न आत्म-विश्वास होता है और न श्रद्धा। लोग अपनी स्थिति बदल सकते हैं पर उन्हें अपनी शक्तियों पर भरोसा करना आना चाहिए। आशा, साहस, उत्साह और कर्मशीलता के द्वारा कोई भी व्यक्ति श्री संपन्न बन सकता है।"*
👉 *धन को सुख का साधन मानकर उसे "ईमानदारी" और "परिश्रम" के द्वारा कमाया जाए तो वह आत्म-विकास में भी सहायक होता है।* *धन प्राप्ति का एक दोष भी है- होता अनावश्यक "लोभ" ।* वित्तेषणा के कारण लोग अनुचित तरीकों से धन कमाना चाहते हैं। *बेईमानी के द्वारा कमाया हुआ धन मनुष्य को व्यसनों की ओर आकर्षित करता है।* जुआ, सट्टा, लाटरी, नशा, वेश्यावृत्ति में धन का अपव्यय करने वाले प्रायः सभी अनुचित तरीकों से धनार्जन करते हैं। ,*इस प्रकार की कमाई मनुष्य की दुर्गति करती है।* इस प्रकार का धन हेय कहा गया है और *उस "धन" से "निर्धन" होना अच्छा बताया गया है।*

👉 *अर्थोपार्जन में जिन आध्यात्मिक गुणों का समावेश होना चाहिए, शास्त्रकार ने उन्हें बड़े आलंकारिक ढंग से प्रस्तुत किया है।* लक्ष्मी को वे देवी मानते हैं। उन्हें कमल पुष्प पर आसीन, ऊपर से फूलों की वर्षा होती हुई दिखाया गया है। *"कमल" "पवित्रता" और "सौंदर्य" का प्रतीक है। लक्ष्मी पवित्रता और सौंदर्य अर्थात "ईमानदारी" और "सचाई" पर विराजमान हैं।* उनका वाहन उल्लू है। उल्लू मूर्खता का प्रतीक है। *मूर्खतापूर्ण स्वभाव वाले या अवगुणी व्यक्तियों के लिए यह लक्ष्मी भार स्वरूप, दुःख रूप होती है।*यह दिग्दर्शन उनके चित्र में कराया गया है।
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शिव ने पार्वती को बताए थे मृत्यु के ये 11 संकेत, कब होगी किसकी मौत :


धर्म ग्रंथों में भगवान शिव को कालों का काल कहा यानी महाकाल कहा गया है। महाकाल यानी मृत्यु जिसके अधीन हो। भगवान शिव जन्म-मृत्यु, काल आदि सभी से मुक्त हैं। शिवमहापुराण में भगवान शिव ने माता पार्वती को मृत्यु के संबंध में कुछ ऐसे संकेत बताए हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। इन संकेतों को समझकर यह जाना जा सकता है कि किस व्यक्ति की मौत कितने समय में होगी।

1- यदि अचानक शरीर सफेद या पीला पड़ जाए और लाल निशान दिखाई दे तो समझना चाहिए कि उस मनुष्य की मृत्यु 6 महीने के भीतर हो जाएगी। जब मुंह, कान, आंख और जीभ ठीक से काम न करें तो भी 6 महीने के भीतर ही मृत्यु जाननी चाहिए।

2- जो मनुष्य हिरण के पीछे होने वाली शिकारियों की भयानक आवाज को भी जल्दी नहीं सुनता उसकी मृत्यु भी 6 महीने के भीतर हो जाती है। जिसे सूर्य, चंद्रमा या अग्नि का प्रकाश ठीक से दिखाई न दे और चारों ओर काला अंधकार दिखाई दे तो उसका जीवन भी 6 महीने के भीतर समाप्त हो जाता है।

3- जब किसी मनुष्य का बायां हाथ लगातार एक सप्ताह तक फड़कता ही रहे, तब उसका जीवन एक मास ही शेष है-ऐसा जानना चाहिए। जब सारे अंगों में अंगड़ाई आने लगे और तालू सूख जाए, तब वह मनुष्य एक मास तक ही जीवित रहता है।

4- त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) में जिसकी नाक बहने लगे, उसका जीवन पंद्रह दिन से अधिक नहीं चलता। यदि किसी व्यक्ति के मुंह और कंठ बार-बार सूखने लगे तो यह जानना चाहिए कि 6 महीने बीतते -बीतते उसकी आयु समाप्त हो जाएगी।

5- जब किसी व्यक्ति को जल, तेल, घी तथा दर्पण में अपनी परछाई न दिखाई दे तो समझना चाहिए कि उसकी आयु 6 माह से अधिक नहीं है। जब कोई अपनी छाया को सिर से रहित देखे अथवा अपने को छाया से रहित पाए तो ऐसा मनुष्य एक महीने भी जीवित नहीं रहता।

6- जब चंद्रमा व सूर्य के आस-पास का चमकीला घेरा काला या लाल दिखाई दे, तब 15 दिन के अंदर ही उस मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। अरूंधती तारा व चंद्रमा जिसे न दिखाई दे अथवा जिसे अन्य तारे भी ठीक से न दिखाई दें, ऐसे मनुष्य की मृत्यु भी एक महीने के भीतर हो जाती है।

7- यदि ग्रहों का दर्शन होने पर भी दिशाओं का ज्ञान न हो, मन में बेचैनी छाई रहे तो उस मनुष्य की मृत्यु 6 महीने में हो जाती है। जिसे आकाश में सप्तर्षि तारे न दिखाई दे, उस मनुष्य की आयु 6 महीने ही शेष समझनी चाहिए।

8- जिस मनुष्य को उतथ्य व ध्रुव तारा अथवा सूर्यमंडल का भी दर्शन न हो, रात में इंद्रधनुष और दोपहर में उल्कापात होता दिखाई दे तथा गीध और कौवे घेरे रहें तो उसकी आयु 6 महीने से अधिक नहीं होती।

9- जो मनुष्य अचानक सूर्य और चंद्रमा को राहू से ग्रस्त देखता है (चंद्रमा और सूर्य काले दिखाई देने लगते हैं) और संपूर्ण दिशाएं जिसे घूमती दिखाई देती हैं वह अवश्य ही 6 महीने में मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

10- जिस व्यक्ति को अचानक नीली मक्खियां आकर घेर लें तो वास्तव में उसकी आयु एक महीना ही शेष जाननी चाहिए।

11- यदि गीध, कौवा अथवा कबूतर सिर पर आकर बैठ जाए तो वह मनुष्य एक महीने के भीतर ही मर जाता है-इसमें कोई संशय नहीं है।

इस प्रकार से शिव जी ने माता पार्वती को ज्ञान दिया परन्तु जिसके जीवन में सद्गुरु रुपी अमृत घुल चुका हो, उसे न जीने की ख़ुशी, न मृत्यु का भय सताता है | वो तो निश्चिंत हो अपने सोऽहं स्वरुप में अविचल और सतत मस्त रहता है | ऐसा है गुरु का ज्ञान जो हर भव से ही नहीं बल्कि जीवन की हर कठिनाई से साधक को पार लगा देता है।
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*क्या आप अपने गोत्र की असली शक्ति को जानते हैं?*

*यह कोई परंपरा नहीं है। कोई अंधविश्वास नहीं है। यह आपका प्राचीन कोड है।*

*यह पूरा लेख पढ़िए — मानो आपका अतीत इसी पर टिका हो।*

1. गोत्र आपका उपनाम नहीं है। यह आपकी आध्यात्मिक डीएनए है।
पता है सबसे अजीब क्या है?
अधिकतर लोग जानते ही नहीं कि वे किस गोत्र से हैं।
हमें लगता है कि यह बस एक लाइन है जो पंडितजी पूजा में कहते हैं। लेकिन यह सिर्फ इतना नहीं है।

आपका गोत्र दर्शाता है — आप किस ऋषि की मानसिक ऊर्जा से जुड़े हुए हैं।
खून से नहीं, बल्कि विचार, ऊर्जा, तरंग और ज्ञान से।

हर हिंदू आध्यात्मिक रूप से एक ऋषि से जुड़ा होता है।
वो ऋषि आपके बौद्धिक पूर्वज हैं।
उनकी सोच, ऊर्जा, और चेतना आज भी आपमें बह रही है।

2. गोत्र का अर्थ जाति नहीं होता।
आज लोग इसे गड़बड़ा देते हैं।
गोत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं दर्शाता।
यह जातियों से पहले, उपनामों से पहले, राजाओं से भी पहले अस्तित्व में था।

यह सबसे प्राचीन पहचान का तरीका था — ज्ञान पर आधारित, शक्ति पर नहीं।
हर किसी का गोत्र होता था।
ऋषि अपने शिष्यों को गोत्र देते थे जब वे उनकी शिक्षाओं को ईमानदारी से अपनाते थे।

इसलिए, गोत्र कोई लेबल नहीं — यह आध्यात्मिक विरासत की मुहर है।

3. हर गोत्र एक ऋषि से जुड़ा होता है — एक “सुपरमाइंड” से
मान लीजिए आप वशिष्ठ गोत्र से हैं — तो आप वशिष्ठ ऋषि से जुड़े हैं, वही जिन्होंने श्रीराम और दशरथ को मार्गदर्शन दिया था।

भृगु गोत्र?
आप उस ऋषि से जुड़े हैं जिन्होंने वेदों का हिस्सा लिखा और योद्धाओं को प्रशिक्षण दिया।

कुल 49 मुख्य गोत्र हैं — हर एक ऋषियों से जुड़ा जो ज्योतिषी, वैद्य, योद्धा, मंत्रद्रष्टा या प्रकृति वैज्ञानिक थे।

4. क्यों बुज़ुर्ग एक ही गोत्र में विवाह मना करते थे?
यह बात स्कूल में नहीं सिखाई जाती।

प्राचीन भारत में गोत्र एक जेनेटिक ट्रैकर था।
यह पितृवंश से चलता है — यानी पुत्र ऋषि की लाइन आगे बढ़ाते हैं।

इसलिए अगर एक ही गोत्र के दो लोग विवाह करें, तो वे आनुवंशिक रूप से भाई-बहन जैसे होंगे।
इससे संतान में मानसिक और शारीरिक विकार आ सकते हैं।

गोत्र व्यवस्था = प्राचीन भारतीय डीएनए विज्ञान
और यह हम हजारों साल पहले जानते थे — जब पश्चिमी विज्ञान को जेनेटिक्स का भी अंदाजा नहीं था।

5. गोत्र = आपका मानसिक प्रोग्रामिंग
चलो इसे व्यक्तिगत बनाते हैं।

कुछ लोग गहरे विचारक होते हैं।
कुछ में गहरी आध्यात्मिक भूख होती है।
कुछ को प्रकृति में शांति मिलती है।
कुछ नेता या सत्य के खोजी होते हैं।

क्यों?
क्योंकि आपके गोत्र के ऋषि का मन आज भी आपके अंदर गूंजता है।

अगर आपका गोत्र किसी योद्धा ऋषि का है — आपको साहस महसूस होगा।
अगर वह किसी वैद्य ऋषि से है — तो आयुर्वेद या चिकित्सा में रुचि हो सकती है।

यह संयोग नहीं — यह गहराई से जुड़ा प्रोग्राम है।

6. पहले गोत्र के आधार पर शिक्षा दी जाती थी
प्राचीन गुरुकुलों में सबको एक जैसा नहीं सिखाया जाता था।
गुरु का पहला प्रश्न होता था:
“बेटा, तुम्हारा गोत्र क्या है?”

क्यों?
क्योंकि इससे गुरु समझ जाते थे कि छात्र कैसे सीखता है, कौन सी विद्या उसके लिए उपयुक्त है।

अत्रि गोत्र वाला छात्र — ध्यान और मंत्रों में प्रशिक्षित होता।

कश्यप गोत्र वाला — आयुर्वेद में गहराई से जाता।

गोत्र सिर्फ पहचान नहीं, जीवनपथ था।

7. ब्रिटिशों ने इसका मज़ाक उड़ाया, बॉलीवुड ने हंसी बनाई, और हमने इसे भुला दिया
जब ब्रिटिश भारत आए, उन्होंने इसे अंधविश्वास कहा।

फिर फिल्मों में मज़ाक बना —
“पंडितजी फिर से गोत्र पूछ रहे हैं!” — जैसे यह कोई बेमतलब रस्म हो।

धीरे-धीरे हमने अपने बुज़ुर्गों से पूछना छोड़ दिया।
अपने बच्चों को बताना छोड़ दिया।

100 साल में 10,000 साल पुरानी व्यवस्था लुप्त हो रही है।

उसे किसी ने खत्म नहीं किया। हमने ही उसे मरने दिया।

8. अगर आप अपना गोत्र नहीं जानते — तो आपने एक नक्शा खो दिया है
कल्पना कीजिए कि आप किसी प्राचीन राजघराने से हों — पर अपना उपनाम तक नहीं जानते।

आपका गोत्र = आपकी आत्मा का GPS है।

सही मंत्र

सही साधना

सही विवाह

सही मार्गदर्शन

इसके बिना हम अपने ही धर्म में अंधे होकर चल रहे हैं।

9. गोत्र की पुकार सिर्फ रस्म नहीं होती
जब पंडित पूजा में आपका गोत्र बोलते हैं, तो वे सिर्फ औपचारिकता नहीं निभा रहे।

वे आपको आपकी ऋषि ऊर्जा से दोबारा जोड़ रहे होते हैं।

यह एक पवित्र संवाद होता है:
“मैं, भारद्वाज ऋषि की संतान, अपने आत्मिक वंशजों की उपस्थिति में यह संकल्प करता हूँ।”

यह सुंदर है। पवित्र है। सच्चा है।

10. इसे फिर से जीवित करो — इसके लुप्त होने से पहले
अपने माता-पिता से पूछो।
दादी-दादा से पूछो।
शोध करो, पर इसे जाने मत दो।

इसे लिखो, अपनी संतानों को बताओ। गर्व से कहो:
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