✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
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ॐ, धर्म ही जीवन है और स्वधर्म की खोज करने के लिए ही मानव के रूप में हम सब का जन्म हुआ है। जिस दिन आपको आपका धर्म मिल जाएगा उस दिन आपका मानव जन्म सफल हुआ तो आओ हम सब मिलकर समूह में स्वधर्म की खोज करें।
ॐ शान्तिः शान्तिंः शान्तिंः
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कहानी का समय

*इल्ली और घुन की कहानी*


एक इल्ली और घुन था। इल्ली बोली आओ घुन कार्तिक स्नान करे, घुन बोला तू ही कार्तिक स्नान कर ले। मैं तो नहीं करूँगा। घुन की बात सुनकर इल्ली तो राजा की लड़की के पल्ले से लगकर कार्तिक स्नान कर लेती लेकिन घुन ने इल्ली के कहने से कार्तिक स्नान नहीं किया।कुछ दिनों बाद दोनों मर गये। बाद में इल्ली ने कार्तिक स्नान के पुण्य के कारण राजा के घर जन्म लिया और घुन राजा के घर मेंढा बन गया।

राजा ने अपनी बेटी का विवाह कर दिया । बेटी ससुराल जाने लगी तो उसने अपनी पालकी रुकवा दी तो राजा ने पूछा क्या हुआ बेटी ?तो लड़की बोली पिताजी मुझे ये मेंढा चाहिए। तब राजा बोला बेटी तूने ये क्या माँगा ,माँगना था तो धन दौलत ले ले पर तू इसका क्या करेगी । लेकिन लड़की नही मानी और बोली नहीं मुझे तो यही चाहिए।मेढ़े को रथ से बांध दिया गया। महल में पहुँचने पर मेढ़े को महल के नीचे बांध दिया गया । जब लड़की नीचे उतरती तो मेढ़ा कहता मुझे पानी पिलादे तब लड़की ने कहा मैंने पहले ही कहा था कार्तिक स्नान कर ले पर तब तूने कहा था मैं तो बाजरा खाऊँगा और ठंडा-ठंडा पानी पीऊँगा।

लड़की और मेढ़े को बात करते हुए उसकी देवरानी-जेठानी सुन लेती हैं । वह दोनों अपने देवर के पास गई और बोली कि ये तुम किस जादूगरनी को ब्याह कर लाए हो! यह तो जानवरों से बात करती है।अपनी भाभियों की बात सुनकर लड़का बोला कि मैं जब अपने कानों से सुनूँगा और आँखों से देखूँगा तब ही मानूँगा।

अगले दिन वह सीढ़ी पर छिपकर बैठ गया. उसकी पत्नी आई और मेढ़े ने उससे फिर वही बात कही जिस पर रानी ने भी वही जवाब दिया। यह सब देख वह राजकुमार तलवार निकालकर सामने आया और बोला कि तुम जानवरों से कैसे बात कर सकती हो ? बताओ कि तुम कौन हो ? उसकी पत्नी ने उससे बहुत कहा कि औरत का भेद नहीं खोलना चाहिए लेकिन वह नही माना और बोला मुझे सब जानना हैं।

राजकुमार की जिद के आगे उसकी पत्नी हार गई और उसने पिछले जन्म की सारी बात उसे बता दी कि वह पिछले जन्म में इल्ली थी और यह मेढ़ा घुन था। इससे मैंने कार्तिक नहाने को कहा लेकिन इसने मना कर दिया. जिसके परिणामस्वरुप यह इस जन्म में मेंढा बन गया और मैं राजा की बेटी के पल्ले से लगकर लेती थी जिसकी वजह से मैं राजकुमारी के रुप में पैदा हुई. इसलिए मैं तो इससे पिछले जन्म की बात कर रही थी. सारी बात सुनकर राजकुमार बोला, क्या कार्तिक स्नान का इतना पुण्य मिलता है! रानी ने कहा कि हाँ बहुत पुण्य मिलता है।

अपनी पत्नी की सारी बातें सुनकर राजकुमार ने कहा कि यदि कार्तिक स्नान का इतना पुण्य मिलता है तब तो हम दोनों जोड़े से कार्तिक स्नान करेगें और दान पुण्य भी करेगें ताकि आने वाले समय में हम सुखपूर्वक रह सकें। दोनों ने जब जोड़े से स्नान किया तो उनके पास काफी धन हो गया।
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कौआ चींटी ओर कुत्ते का महत्व

प्राचीन समय के ऋषियों मुनियों ने अपने शोध में बताया था की प्रत्येक जानवर के विचित्र व्यवहार एवं हरकतों का कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य होता है. जानवरों के संबंध में अनेको बाते हमारे पुराणों एवं ग्रंथो में भी विस्तार से बतलाई गई है।

हमारे सनातन धर्म में माता के रूप में पूजनीय गाय के संबंध में तो बहुत सी बाते आप लोग जानते है होंगे परन्तु आज हम जानवरों के संबंध में पुराणों से ली गई कुछ ऐसी बातो के बारे में बतायेंगे जो आपने पहले कभी भी किसी से नहीं सुनी होगी. जानवरों से जुड़े रहस्यों के संबंध में पुराणों में बहुत ही विचित्र बाते बतलाई गई जो किसी को आश्चर्य में डाल देंगी।

कौए का रहस्य :-
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कौए के संबंध में पुराणों बहुत ही विचित्र बाते बतलाई गई है मान्यता है की कौआ अतिथि आगमन का सूचक एवं पितरो का आश्रम स्थल माना जाता है।

हमारे धर्म ग्रन्थ की एक कथा के अनुसार इस पक्षी ने देवताओ और राक्षसों के द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत का रस चख लिया था. यही कारण है की कौआ की कभी भी स्वाभाविक मृत्यु नहीं होती. यह पक्षी कभी किसी बिमारी अथवा अपने वृद्धा अवस्था के कारण मृत्यु को प्राप्त नहीं होता. इसकी मृत्यु आकस्मिक रूप से होती है।

यह बहुत ही रोचक है की जिस दिन कौए की मृत्यु होती है उस दिन उसका साथी भोजन ग्रहण नहीं करता. ये आपने कभी ख्याल किया हो तो यह बात गौर देने वाली है की कौआ कभी भी अकेले में भोजन ग्रहण नहीं करता यह पक्षी किसी साथी के साथ मिलकर ही भोजन करता है।

कौआ की लम्बाई करीब 20 इंच होता है, तथा यह गहरे काले रंग का पक्षी है. जिनमे नर और मादा दोनों एक समान ही दिखाई देते है. यह बगैर थके मिलो उड़ सकता है. कौए के बारे में पुराण में बतलाया गया है की किसी भविष्य में होने वाली घटनाओं का आभास पूर्व ही हो जाता है।

पितरो का आश्रय स्थल :- श्राद्ध पक्ष में कौए का महत्व बहुत ही अधिक माना गया है . इस पक्ष में यदि कोई भी व्यक्ति कौआ को भोजन कराता है तो यह भोजन कौआ के माध्यम से उसके पीतर ग्रहण करते है. शास्त्रों में यह बात स्पष्ट बतलाई गई है की कोई भी क्षमतावान आत्मा कौए के शरीर में विचरण कर सकती है।

भादौ महीने के 16 दिन कौआ हर घर की छत का मेहमान बनता है. ये 16 दिन श्राद्ध पक्ष के दिन माने जाते हैं. कौए एवं पीपल को पितृ प्रतीक माना जाता है. इन दिनों कौए को खाना खिलाकर एवं पीपल को पानी पिलाकर पितरों को तृप्त किया जाता है।

कौवे से जुड़े शकुन और अपशकुन :-
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1 . यदि आप शनिदेव को प्रसन्न करना चाहते हो कौआ को भोजन करना चाहिए

2 . यदि आपके मुंडेर पर कोई कौआ बोले तो मेहमान अवश्य आते है।

3 . यदि कौआ घर की उत्तर दिशा से बोले तो समझे जल्द ही आप पर लक्ष्मी की कृपा होने वाली है।

4 . पश्चिम दिशा से बोले तो घर में मेहमान आते है।

5 . पूर्व में बोले तो शुभ समाचार आता है।

6 . दक्षिण दिशा से बोले तो बुरा समाचार आता है।

7 . कौवे को भोजन कराने से अनिष्ट व शत्रु का नाश होता है।

चीटियों का रहस्य :-
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चीटियों को हम एक बहुत तुच्छ एवं छोटा जानवर समझते है, परन्तु चीटियां बहुत ही मेहनती और एकता से रहने वाला जीव है. सामूहिक प्राणी होने के कारण चींटी सभी कार्यों को बांटकर करती है.
विश्वभर में लगभग 14000 से अधिक प्रजाति की चीटियां है।

चींटी के बारे में वैज्ञानिकों ने कई रहस्य उजागर किए हैं. चींटियां आपस में बातचीत करती हैं, वे नगर बनाती हैं और भंडारण की समुचित व्यवस्था करना जानती हैं. हमारे इंजीनियरों से कहीं ज्यादा बेहतर होती हैं ‍चींटियां. चींटियों का नेटवर्क दुनिया के अन्य नेटवर्क्स से कहीं बेहतर होता है. ये मिलकर एक पहाड़ को काटने की क्षमता रखती है।

चींटियां शहर को स्वच्छ रखने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं. चींटियां खुद के वजन से 100 गुना ज्यादा वजन उठा सकती हैं. मानव को चींटियों से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।

चीटियों दो प्रकार की होती है लाल चीटियां एवं काली चीटियां. शास्त्रों के अनुसार लाल चीटियां को शुभ तथा काली चीटियों को अशुभ माना गाय है. दोनों ही तरह की चींटियों को आटा डालने की परंपरा प्राचीनकाल से ही विद्यमान है. चींटियों को शकर मिला आटा डालते रहने से व्यक्ति हर तरह के बंधन से मुक्त हो जाता है।

हजारों चींटियों को प्रतिदिन भोजन देने से वे चींटियां उक्त व्यक्ति को पहचानकर उसके प्रति अच्छे भाव रखने लगती हैं और उसको वे दुआ देने लगती हैं. चींटियों की दुआ का असर आपको हर संकट से बचा सकता है।

* यदि आप कर्ज से परेशान है तो चीटियों को शक़्कर और आता डाले. ऐसा करने पर कर्ज की समाप्ति जल्द हो जाती है।

* जो प्रत्येक दिन चीटियों को आता देता है वह वैकुंठ धाम को प्रस्थान करता है।

* यदि आप लाल चीटियों को मुंह में अंडे दबाए देखते हो यह भी शुभ माना जाता है तथा परिवार में सुख समृद्धि बढ़ती है।
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कुत्ते का रहस्य :-
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हमारे पुराणों में यह बतलाया गया है की कुत्ता यमराज दूत है . कुत्ते को भैरव देवता का सेवक भी कहा जाता है. भैरव देवता को प्रसन्न करने के लिए कुत्ते को भोजन करना चाहिए. यदि भैरव देवता अपने भक्त से प्रसन्न रहते है तो किसी भी प्रकार की समस्या एवं रोग उसे छू नहीं सकता।

मान्यता है की यदि आप कुत्ते को प्रसन्न रखते है तो वह आपके सामने किसी भी तरह की आत्माओं को फटकने नहीं देता. आत्माएं कुत्ते से दूर भागती है।

कुत्ते की क्षमता के बारे में पुराण में बतलाया गया है की दरअसल कुत्ता एक ऐसा प्राणी है जिसे भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्व आभास होता है तथा वह सूक्ष्म जगत को यानि की आत्माओं को देख सकता है।

हिन्दू धर्म में कुत्ते को एक रहस्मयी प्राणी माना गया है, परन्तु इसे भोजन कराने से हर प्रकार के संकट से बचा जा सकता है।

कुत्ते से जुड़े शकुन एवं अपशकुन :-
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1 . कुत्ते की रोने की आवाज को अपशकुन माना जाता है. जब भी कुत्ता कराहता है तो समझ लीजिए की नकरात्मक शक्तियां आस पास है।

2 . शस्त्रों में कुत्ते के संबंध में यह बात कहि गई की यदि किसी परिवार में रोगी हो तो कुत्ता पालने से वह रोगी की बिमारी को अपने उपार ले लेता है।

3 . यदि किसी शुभ कार्य के दौरान कुत्ता आपका मार्ग रोके तो इसे विषमता या अनिश्चय प्रकट होती है।

4 . यदि संतान की प्राप्ति न हो रही हो तो काले कुत्ते को पालना चाहिए।
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अंतर्यात्रा पर निकलो

*हमें कुछ दिखायी नहीं पड़ता। वसंत पतझड़ हो जाता है, पतझड़ वसंत हो जाता है; फूल खिलते हैं, कुम्हला जाते हैं, गिर जाते हैं; पक्षी गीत गाते हैं; सूरज उगता है; चांदत्तारों से आकाश भर जाता है; मगर हम बेहोश, हम अपनी आंखें बंद किए, हम अपने सपनों में खोए, हम अपने विचारों में लीन, हम अपने अतीत की स्मृतियों में डूबे या भविष्य की कल्पनाओं में बस चले जा रहे हैं, यंत्रवत्। इसलिए सुबह दिखायी नहीं पड़ती। सुबह तो है। भोर तो है। और सदा ही है।*
*फिर दोहरा दूं, बाहर तो कभी दिन होता है, कभी रात होती है, क्योंकि बाहर द्वंद्व है। हर चीज का द्वंद्व है; अंधेरे का, प्रकाश का; जीवन का, मृत्यु का; सर्दी का, गर्मी का; सौंदर्य का, कुरूपता का; जवानी का, बुढ़ापे का; बाहर तो हर चीज का द्वंद्व है। इसलिए सांझ होती है, सुबह होती है। मगर भीतर तो निर्द्वंद्व अवस्था है। वहां तो एक ही। वहां न सुबह है, न सांझ है; न दिन है न रात है; वहां न गर्मी है, न सर्दी है; वहां न मैं है न तू है। फिर वहां क्या है? अनिर्वचनीय शब्दों में न आए, कुछ ऐसा है। उसमें जागना ही जागना है। और उसको जानना ही भोर है। और वह सदा तुम्हारे भीतर मौजूद है।*
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नारायण को जो पहचानता है और उस नारायण के साथ मन को जो तदाकार करता है उसी का मन नारायण के साथ एक होता है।
केवल वह जीवात्मा ही श्रीनारायण -रूप बनता है और वही परिपूर्ण होता है; तभी जीव का जीवन सफल होता है,जीव तब तक अपूर्ण है तब तक उसे शांति नहीं मिलती है। जीव जब ईश्वर से मिलता है और उसका अपरोक्ष साक्षात्कार करता है तभी जीव परिपूर्ण होता है, परमात्मा श्रीकृष्ण के दर्शन पाने के लिए ही यह मनुष्य का अवतार है।
मानव ही श्रीभगवान का दर्शन कर सकता है, पशु को तो अपने स्वरुप का भान नहीं है,तो वह बेचारा परमात्मा का दर्शन तो करे ही कैसे, परमात्मा के दर्शन के बिना जीवन सफल नहीं होता है। जो परमात्मा के दर्शन करता है उसी का जीवन सफल है।
यह जीव अनेक वर्षो से (अनंत जन्मो से) भोग भोगता चला आ रहा है,फिर भी इसे शांति तो मिली नहीं, यह शांति तो तब मिले कि जब जीव को परमात्मा का दर्शन मिले, ्रीकृष्ण परमात्मा के दर्शन के बिना जीव को परिपूर्ण शांति नहीं मिलती है, दर्शन के तीन प्रकार शास्त्रो में बताय गए है --
१. स्वप्न में प्रभु की झांकी होती है, यह हुआ साधारण दर्शन।
२. मंदिर और मूर्ति में परमात्मा के दर्शन होे तो यह मध्यम दर्शन है।
३. ईश्वर का अपरोक्ष दर्शन,यह उत्तम दर्शन है।
परमात्मा का अपरोक्ष साक्षात्कार जब होता है तब जीवन सफल होता है, ेदांत में साक्षात्कार के दो प्रकार कहे गए है --
(१) परोक्ष ज्ञान‌।
(२) अपरोक्ष ज्ञान।
ईश्वर किसी एक स्थान पर ऐसा जो माने वह परोक्ष साक्षात्कार है. ईश्वर के बिना कुछ नहीं है, ईश्वर ही सब कुछ है, मैं भी ईश्वर से भिन्न नहीं हूँ,यह है ईश्वर का अपोरक्ष साक्षात्कार,जिसे “मै स्वयं ब्रह्म हूँ (अहम ब्रह्मास्मि ) ऐसा ज्ञान (अनुभव) होता है, उसे (अपरोक्ष) साक्षात्कार हुआ है ऐसा कहा जाता है (माना जाता है).
देखने वाला ईश्वर को देखते ईश्वरमय बनता है तभी उसे ईश्वर का अपरोक्ष साक्षात्कार होता है, ईश्वर का ही सब में अनुभव करते करते जो (उसी में) एकरूप हो जाता है (केवल) वही ईश्वर के परिपूर्ण स्वरुप को जान सकता है। (पहचान सकता है) और वेदांत में इसी को अपरोक्ष साक्षात्कार कहते हैं, श्वर जगत में किसी एक स्थान में है यह ज्ञान भी अपूर्ण है, ईश्वर सर्व व्यापक है, यह एक मूर्ति में या मंदिर में रह नहीं सकते है (समा नहीं सकते है )।
मंदिर में प्रभु के दर्शन कर लेने पर ज्ञानी पुरुष जहाँ जाते है वहीं भगवान स्वरूप का अनुभव करते है, मंदिर में प्रभु के दर्शन करके बाहर आने पर प्रत्येक में परमात्मा का दर्शन करें मन जहाँ जाय वहां ईश्वर का दर्शन करें ,यही है, ईश्वर का असाधारण दर्शन।
जो परमात्मा मुझमें हैं वही सबमें है इसी प्रकार अखिल जगत जिसे ब्रह्मस्वरुप दीखता है वही ज्ञानी है, सबमें परमात्मा का अनुभव करते करते उसे अपने स्वरुप में भी परमात्मा का अनुभव होता है।
परमात्मा के परोक्ष दर्शन से कोई विशेष लाभ नहीं होता है,परन्तु जीव जब परमात्मा का अपरोक्ष दर्शन करता है तभी कृतार्थ होता है, ज्ञानी पुरुषो को अपने स्वरुप में भी श्री भगवान दीखते है, यही अद्वैत है।
श्री कृष्ण की लीलाओं का चिंतन करती गोपियाँ , अपने स्वरुप में भी परमात्मा का अनुभव करती है----
“लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल। “
गोपियों को अपने स्वरुप का विस्मरण हुआ है और कहती है--- “मै ही श्रीकृष्ण हूँ" अपने प्यारे श्रीकृष्ण का सबमे अनुभव करतीं गोपियाँ श्रीकृष्णमय बानी हैं।
जिसे अपने अंदर परमात्मा का दर्शन होता है, वही जीव परमात्मा में मिल जाता है, अंदर परमात्मा का दर्शन होता है, अपने अंदर जिसे परमात्मा दिख जाते हैं उसके बाद वह जीव ईश्वर से जुदा नहीं रह सकता है, वह ईश्वर में मिल जाता है, यही भागवत का फल है।
ज्ञानी ज्ञान से परमात्मा का (ब्रह्म का अपरोक्ष साक्षात्कार करते है, जब कि वैष्णव (भक्त)परमात्मा का अपरोक्ष साक्षात्कार करते हैं।
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कहानी का समय

विश्वास

एक आदमी जब भी दफ्तर से वापस आता, तो *कुत्ते* के प्यारे से *बच्चें* रोज उसके पास आकर उसे घेर लेते थे क्योंकि वो रोज उन्हें *बिस्कुट* देता था।

कभी 4 कभी 5 कभी 6 बच्चे रोज आते और वो रोज उन्हें पारलें बिस्कुट या ब्रेड खिलता था।

एक रात जब वो दफ़्तर से वापस आया तो बच्चो ने उसे घेर लिया लेकिन उसने देखा कि घर मे बिस्कुट ओर ब्रेड दोनो *खत्म* हो गए है।

रात भी काफी हो गई थी, इस वक़्त दुकान का खुला होना भी मुश्किल था, सभी बच्चे *बिसकिट्स* का इंतज़ार करने लगे।

उसने सोचा कोई बात नही कल खिला दूंगा, ओर ये सोचकर उसने घर का दरवाजा बंद कर लिया, बच्चे अभी भी बाहर उसका इंतजार कर रहे थे। ये देखकर उसका मन विचलित हो गया, तभी उसे याद आया की घर मे मेहमान आये थे, जिनके लिए वो काजू बादाम वाले बिस्किट लाया था।

उसने फटाफट डब्बा खोला तो उसमें सिर्फ 7-8 बिसकिट्स थे,
उसके मन मे खयाल आया कि इतने से तो कुछ नही होगा, एक का भी पेट नही भरेगा, पर सोचा कि चलो सब को एक एक दे दूंगा, तो ये चले जायेंगे।


उन बिस्किट को लेकर जब वो बाहर आया तो देखा कि सारे *कुत्ते* जा चुके थे, सिर्फ *एक* कुत्ता उसके *इंतज़ार* में अभी भी इस *विश्वास* के साथ बैठा था कि कुछ तो जरूर मिलेगा।

*उसे बड़ा आस्चर्य हुआ।*

उसने वो सारे बिस्किट उस एक कुत्ते के सामने डाल दिये।

वो कुत्ता बड़ी खुशी के साथ वो सब बिस्किट खा गया और फिर चला गया।


बाद में उस आदमी ने सोचा कि हम मनुषयो के साथ भी तो यही होता है, जब ईश्वर हमे देता रहता है, तब हम खुश रहते है उसकी भक्ति करते है उसके फल का इंतज़ार करते है, लेकिन भगवान को जरा सी देर हुई नही की हम उसकी भक्ति पर संदेह करने लगते है, दूसरी तरफ जो उसपर *विश्वास* बनाये रखता है, उसे उसके विश्वास से *ज्यादा* मिलता है।

इसलिये अपने प्रभु पर विश्वास बनाये रखे, अपने विश्वास को किसी भी परिस्थिति में डिगने ना दे, अगर देर हो रही है इसका मतलब है कि *प्रभु* आपके लिए कुछ *अच्छा* करने में लगे हुए है।

*।।जय जय श्री राम।।*
*।।हर हर महादेव।।
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भगवान श्रीगणेश के 8 अवतारो की कथा

*1. वक्रतुंड*

वक्रतुंड का अवतार राक्षस मत्सरासुर के दमन के लिए हुआ था। मत्सरासुर शिव भक्त था और उसने शिव की उपासना करके वरदान पा लिया था कि उसे किसी से भय नहीं रहेगा। मत्सरासुर ने देवगुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र भी थे सुंदरप्रिय और विषयप्रिय, ये दोनों भी बहुत अत्याचारी थे। सारे देवता शिव की शरण में पहुंच गए। शिव ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे गणेश का आह्वान करें, गणपति वक्रतुंड अवतार लेकर आएंगे। देवताओं ने आराधना की और गणपति ने वक्रतुंड अवतार लिया। वक्रतुंड भगवान ने मत्सरासुर के दोनों पुत्रों का संहार किया और मत्सरासुर को भी पराजित कर दिया। वही मत्सरासुर कालांतर में गणपति का भक्त हो गया।

*2. एकदंत*

महर्षि च्यवन ने अपने तपोबल से मद की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य से दीक्षा ली। शुक्राचार्य ने उसे हर तरह की विद्या में निपुण बनाया। शिक्षा होने पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया। सारे देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे। मद इतना शक्तिशाली हो चुका था कि उसने भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। सारे देवताओं ने मिलकर गणपति की आराधना की। तब भगवान गणेश एकदंत रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं थीं, एक दांत था, पेट बड़ा था और उनका सिर हाथी के समान था। उनके हाथ में पाश, परशु और एक खिला हुआ कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।

*3. महोदर*

जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को संस्कार देकर देवताओं के खिलाफ खड़ा कर दिया। मोहासुर से मुक्ति के लिए देवताओं ने गणेश की उपासना की। तब गणेश ने महोदर अवतार लिया। महोदर का उदर यानी पेट बहुत बड़ा था। वे मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में पहुंचे तो मोहासुर ने बिना युद्ध किये ही गणपति को अपना इष्ट बना लिया।

*4. गजानन*

एक बार धनराज कुबेर भगवान शिव-पार्वती के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर पहुंचा। वहां पार्वती को देख कुबेर के मन में काम प्रधान लोभ जागा। उसी लोभ से लोभासुर का जन्म हुआ। वह शुक्राचार्य की शरण में गया और उसने शुक्राचार्य के आदेश पर शिव की उपासना शुरू की। शिव लोभासुर से प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसे सबसे निर्भय होने का वरदान दिया। इसके बाद लोभासुर ने सारे लोकों पर कब्जा कर लिया और खुद शिव को भी उसके लिए कैलाश को त्यागना पड़ा। तब देवगुरु ने सारे देवताओं को गणेश की उपासना करने की सलाह दी। गणेश ने गजानन रूप में दर्शन दिए और देवताओं को वरदान दिया कि मैं लोभासुर को पराजित करूंगा। गणेश ने लोभासुर को युद्ध के लिए संदेश भेजा। शुक्राचार्य की सलाह पर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली।

*5. लंबोदर*

समुद्रमंथन के समय भगवान विष्णु ने जब मोहिनी रूप धरा तो शिव उन पर काम मोहित हो गए। उनका शुक्र स्खलित हुआ, जिससे एक काले रंग के दैत्य की उत्पत्ति हुई। इस दैत्य का नाम क्रोधासुर था। क्रोधासुर ने सूर्य की उपासना करके उनसे ब्रह्मांड विजय का वरदान ले लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण सारे देवता भयभीत हो गए। वो युद्ध करने निकल पड़ा। तब गणपति ने लंबोदर रूप धरकर उसे रोक लिया। क्रोधासुर को समझाया और उसे ये आभास दिलाया कि वो संसार में कभी अजेय योद्धा नहीं हो सकता। क्रोधासुर ने अपना विजयी अभियान रोक दिया और सब छोड़कर पाताल लोक में चला गया।

*6. विकट*

भगवान विष्णु ने जलंधर के विनाश के लिए उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया। उससे एक दैत्य उत्पन्न हुआ, उसका नाम था कामासुर। कामासुर ने शिव की आराधना करके त्रिलोक विजय का वरदान पा लिया। इसके बाद उसने अन्य दैत्यों की तरह ही देवताओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिए। तब सारे देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया। तब भगवान गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। विकट रूप में भगवान मोर पर विराजित होकर अवतरित हुए। उन्होंने देवताओं को अभय वरदान देकर कामासुर को पराजित किया।

*7. विघ्नराज*

एक बार पार्वती अपनी सखियों के साथ बातचीत के दौरान जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम मम (ममता) रख दिया। वह माता पार्वती से मिलने के बाद वन में तप के लिए चला गया। वहीं उसकी मुलाकात शम्बरासुर से हुई। शम्बरासुर ने उसे कई आसुरी शक्तियां सीखा दीं। उसने मम को गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर ब्रह्मांड का राज मांग लिया।
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शम्बर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। ममासुर ने भी अत्याचार शुरू कर दिए और सारे देवताओं के बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। तब देवताओं ने गणेश की उपासना की। गणेश विघ्नराज के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर का मान मर्दन कर देवताओं को छुड़वाया।

*8. धूम्रवर्ण*

एक बार भगवान ब्रह्मा ने सूर्यदेव को कर्म राज्य का स्वामी नियुक्त कर दिया। राजा बनते ही सूर्य को अभिमान हो गया। उन्हें एक बार छींक आ गई और उस छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम था अहम। वो शुक्राचार्य के समीप गया और उन्हें गुरु बना लिया। वह अहम से अहंतासुर हो गया। उसने खुद का एक राज्य बसा लिया और भगवान गणेश को तप से प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिए।

उसने भी बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब गणेश ने धूम्रवर्ण के रूप में अवतार लिया। उनका वर्ण धुंए जैसा था। वे विकराल थे। उनके हाथ में भीषण पाश था जिससे बहुत ज्वालाएं निकलती थीं। धूम्रवर्ण ने अहंतासुर का पराभाव किया। उसे युद्ध में हराकर अपनी भक्ति प्रदान की।
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*"आकांक्षाओं" की पूर्ति में निस्संदेह सुख और संतोष है।* इस उपलब्धि को पाकर मनुष्य को आनंद एवं उल्लास की उपलब्धि होती है। हर कोई इस स्थिति को प्राप्त करना चाहता है; *पर न जाने क्यों वह तथ्य भुला दिया जाता है कि इस "वरदान" को प्राप्त करने के लिए अनवरत एवं कष्टसाध्य साधना करनी पड़ती है।* मन की प्रसन्नता का केंद्र इस पहली मंजिल पर ही नियोजित करना पड़ता है। अभीष्ट प्रयोजन के लिए, साधन जुटाने के लिए अपनी क्षमता, योग्यता का बढ़ाना एवं आवश्यक साधनों का जुटाना अनिवार्य है। *इन दोनों उपलब्धियों के लिए किए जाने वाले प्रयास को इतना सुखद मान लिया जाना चाहिए मानो वही सफलता का अंतिम बिंदु हो ।* सुखद सत्परिणाम के उपभोग जितना रस यदि प्रगति पथ पर चलने के साधन जुटाने एवं काँटे बीनने में जाने लगे तो ही समझना चाहिए कि सफलता का आधार सुनिश्चित बन गया।
👉 *अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति में देर लगाना और अनेकानेक अवरोध उत्पन्न होना नितांत संभव है।* मनस्वी व्यक्ति धैर्य, साहस, पुरुषार्थ और संतुलन का आश्रय लेकर इस कठिन मार्ग को पार करते हैं। *किंतु उथले और अधीर मनुष्य जरा-सा विलंब होते ही, जरा-सी अड़चन आते ही सकपका जाते हैं* और निराशा के गर्त में गिरकर असफलता की घोषणा कर देते हैं। *इन "बालबुद्धि" लोगों को यह समझना चाहिए और समझाया जाना चाहिए कि सफलता के प्रतिफल खजूर जैसे ऊँचे वृक्ष पर ही लगते हैं। उन्हें पाने के लिए जोखिम भरी ऊँचाई तक चढ़ने के लिए घोर साहसिकता का परिचय देना पड़ता है।* जो इतना मूल्य नहीं चुका सकते, उन्हें किन्हीं बड़ी उपलब्धियों की आशा नहीं करनी चाहिए। तुरत-फुरत इच्छापूर्ति के सपने तो केवल बालबुद्धि को ही शोभा देते हैं। *संसार के प्रगतिशील मनुष्यों को अविचल धैर्य के साथ अनवरत पुरुषार्थ करने की प्रक्रिया को अत्यंत सरस मानकर चलना पड़ा है।* वे अपनी पुरुषार्थ-परायणता को - संघर्षनिष्ठा को इतना मधुर मानते रहे हैं कि हजार वर्ष तक अंतिम सफलता के लिए प्रतीक्षा करना भी भारी न पड़े।
👉 *अनेकानेक अभिलाषाएँ करना और उनकी पूर्ति के समय मिलने वाले आनंद की कल्पना करना मनोविनोद की दृष्टि से अच्छा है, पर उसमें खीझ और निराशा की प्रतिक्रिया भी पूरी तरह जुड़ी हुई है।* जिन्हें मधुर कल्पना और दुःखद निराशा के ज्वार-भाटे में उछलना गिरना अच्छा लगता हो; वे प्रसन्नतापूर्वक उस बाल-विनोद में लगे रहें, पर जिन्हें कुछ पाना है, उन्हें आकांक्षाओं को नियंत्रित परिष्कृत करने का प्रथम चरण बढ़ाकर दूसरा कदम यह रखना चाहिए कि निर्धारित लक्ष्य के लिए आवश्यक क्षमता एवं साधन जुटाने में इतने धैर्य एवं उत्साह के साथ संलग्न होंगे कि वे प्रयास ही सफलता के जितने आनंददायक प्रतीत होने लगें।
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*हम यदि जीवन का आध्यात्मिक गणित समझ लें,तो समय हमको,आर्थिक प्रगति के साथ साथ,यश-कीर्ति और पुण्य भी स्वतः ही अर्जित करा देता है...इसके लिए हमको कुछ भी अतिरिक्त करने की आवश्यकता नहीं,बस अपनी किसी भी निश्छल,समर्पित-सेवा के तात्कालिक लाभ का भाव त्यागना होगा...जीवन में परोपकार,परमार्थ वो बीज होते हैं,जो उचित समय पर हमारे लिए कई गुना फल लेकर आते हैं...लेकिन दुर्भाग्य से अब हम जीवन का प्रत्येक कार्य,उसके मूल्य के निर्धारण के बाद ही करते हैं...इसे मजदूरी कहा जा सकती सेवा नहीं...और मजदूरी करने वाला,केवल धन कमा सकता है,यश-कीर्ति या सम्मान नहीं...आज अपने प्रभु से,जीवन को सदा,लोक-कल्याण रीति से जीने के अलौकिक प्रार्थना के साथ।
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सामवेदीय उपाकर्म

उपाकर्म का अर्थ है प्रारंभ करना। उपाकरण का अर्थ है आरंभ करने के लिए निमंत्रण या निकट लाना। वैदिक काल में यह वेदों के अध्ययन के लिए विद्यार्थियों का गुरु के पास एकत्रित होने का काल था। इसके आयोजन काल के बारे में धर्मगंथों में लिखा गया है कि - जब वनस्पतियां उत्पन्न होती हैं, श्रावण मास के श्रवण व चंद्र के मिलन (पूर्णिमा) या हस्त नक्षत्र में श्रावण पंचमी को उपाकर्म होता है। इस अध्ययन सत्र का समापन, उत्सर्जन या उत्सर्ग कहलाता था। यह सत्र माघ शुक्ल प्रतिपदा या पौष पूर्णिमा तक चलता था।

यह पुण्य दिन ब्राह्मण समुदाय के लिए बहुत महत्व रखता है। जीवन की वैज्ञानिक प्रक्रिया:- जीवन के विज्ञान की यह एक सहज, किन्तु अति महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। जन्मदात्री माँ चाहती है कि हर अण्डा विकसित हो । इसके लिए वह उसे अपने उदर की ऊर्जा से ऊर्जित करती है, अण्डे को सेती है। माँ की छाती की गर्मी पाकर उस संकीर्ण खोल में बंद जीव पुष्ट होने लगता है। उसके अंदर उस संकीर्णता को तोड़कर विराट् प्रकृति, विराट् विश्व के साक्षात्कार का संकल्प उभरता है। उसे फिर उस सुरक्षित संकीर्ण खोल को तोड़कर बाहर निकलने में भय नहीं लगता । वह दूसरा-नया जन्म ले लेता है । यह प्रक्रिया प्रकृति की सहज प्रक्रिया है, किन्तु पुरुषार्थसाध्य है। पोषक और पोषित; दोनों को इसके अंतर्गत प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। इसीलिए युगऋषि ने लिखा है- 'मनुष्य जन्म तो सहजता से हो जाता है, किन्तु मनुष्यता विकसित करने के लिए कठोर पुरुषार्थ करना पड़ता है।' जैसे अण्डा माता की छाती की ऊष्मा से पकता है, वैसे ही मनुष्यता गुरु-अनुशासन में वेदमाता की गर्मी (शुद्ध ज्ञान की ऊर्जा) से धीरे-धीरे परिपक्व होती है। परिपक्व होने पर साधक अपने संकल्प से उस संकीर्णता के घेरे को तोड़ डालता है। तब उसे अपने तथा जन्मदात्री माता के स्वरूप का बोध होता है। तब वह भी माँ की तरह विराट् आकाश में उड़ने की चेष्टा करता है । तब माँ ऊँची उड़ानें भरने के उसके प्रयासों को शुद्ध-सही बनाती है। यही मर्म है-

'पावमानी द्विजानाम्' का । जो संकीर्णता के खोल में बंद है, उसे माँ विकसित करने के लिए अपनी ऊर्जा तो देती रहती है, किन्तु नया जन्म लेने के पहले उसके लिए अपने अन्य कौशलों का प्रयोग नहीं कर सकती । जिसने दूसरा जन्म ले लिया, वह 'द्विज' । नये दुर्लभ जन्म की प्रक्रिया को पूरा करने की प्रवृत्ति-साधना है 'द्विजत्व' । जब द्विज के चिंतन, चरित्र, व्यवहार पवित्र हो जाते हैं, तो वह ब्रह्म के अनुशासन में सिद्ध ब्राह्मण हो जाता है । जब उसकी कामनाएँ ब्रह्म के अनुरूप ही हो जाती हैं, तो ब्राह्मी चेतना-आदिशक्ति उसके लिए कामधेनु बन जाती है। जिसकी कामनाएँ-प्रवृत्तियों अनगढ़हैं, उन्हें पूरा करने से तो संसार में अनगढ़ता ही बढ़ेगी। इसलिए माता सुगढ़-शुद्ध कामना वालों के लिए ही कामधेनु का रूप धारण करती है । भारतीय संस्कृति में द्विजत्व और ब्राह्मणत्व का संबंध किसी जाति या वर्ग विशेष में जन्म लेने से नहीं है, बल्कि वह साधना की उच्च कक्षा से जुड़े सम्बोधन हैं ।

इसीलिए संस्कारों से द्विजत्व की प्राप्ति की बात कही जाती रही है । संगीत के द्वार सभी के लिए खुले हैं, किन्तु संगीताचार्य अपनी बारीकियाँ उन्हीं के सामने खोलते हैं, जिनकी संगीत साधना उच्च स्तरीय हो गई है। खेल सभी खेल सकते हैं, किन्तु खेल प्रशिक्षक खेल तकनीक की बारीकियाँ उसी को समझाता है, जिनके कौशल और दमखम की साधना उच्च स्तरीय है । जिसकी साधना विकसित नहीं हुई है, उसे आगे की बात बताने से बतलाने वाले का प्रयास निरर्थक तो जाता ही है, कई बार उसका विपरीत प्रभाव भी भोगना पड़ जाता है ।

सामवेदीय उपाकर्म तथा रक्षाबनधन में सर्वाधिक उपयोगिता होती है हस्त नक्षत्र की👉

श्रावणी उपाकर्म के अतिरिक्त सामवेदीय द्विजों का उपाकर्म भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में हरितालिका
तीज के लगभग होती है ,इसमें मुख्य रुप से हस्त नक्षत्र का होना परम आवश्यक होता। सामवेदीय
असंकारित जन त्योहार की तरह रक्षाबंधन का पर्व मनाते हैं।

इस दिन वैदिक सामवेदीय जन यज्ञोपवीत( जनेऊ) के पूजन का विधानके साथ ऋषि पूजन के उपरान्त
पुराने जनेऊ को बदल करनया यज्ञोपवीत धारण करना पर्व का मुख्य कार्य माना जाता है, वैदिक काल में यह कर्म गुरु अपने शिष्यों के साथ किसी
पवित्र नदी अथवा जलाशय पर जाकर तीर्थ की प्रार्थना करने के बाद वर्ष भर के जाने अनजाने में हुये पापों के निराकरण के लिये प्रायश्चित रूप में हेमाद्रिस्नान का संकल्प करके दस प्रकार के स्नान करने बाद ऋषियों का पूजन सूर्योपस्थान व यज्ञोपवीत पूजन तथा नवीन यज्ञोपवीत को धारण करने का विधान होता है।
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उल्लेखनीय है कि सामवेदीय द्विजों के अलावा राज्यवर्गी सेनापति तथा रसोइया वर्ग भी किसी न किसी कारण से श्रावणी के स्थान पर भाद्रपदीय
हरितालिका वाले दिन पड़ने उपाकर्म को प्रधानता देते थे ,इसके अतिरिक्त जालोन जनपद से लेकर मथुरा जनपद के राज्य कुल पुरेहित भारद्वाज तथा
कोडल्य गौत्र के तिवारी तथा शाण्डिल्य गौत्र के दुवे तथा मथुरा के लगभग अधिकतर चतुर्वेदी सामवेदीय गुरुओं से शिक्षा गृहण के कारण पूर्ण रुप से सामवेद के अनुसार उपासना तथा कर्मकाण्ड से जुड़ गये थे ।

सामवेदीय उपाकर्म 👉 यह पर्व द्विजत्व की साधना को जीवन्त, प्रखर बनाने का पर्व है । जो इस पर्व के प्राण-प्रवाह के साथ जुड़ते हैं, उनका द्विजत्व-ब्राह्मणत्व जाग्रत् होता जाता है तथा वे आदिशक्ति, गुरुसत्ता के विशिष्ठ अनुदानों के प्रामाणिक पात्र बन जाते हैं। द्विजत्व की साधना को इस पर्व के साथ विशेष कारण से जोड़ा गया है । युगऋषि ने श्रावणी पर्व के सम्बन्ध में लिखा है कि यह वह पर्व है जब ब्रह्म का 'एकोहं बहुस्यामि' का संकल्प फलित हुआ। पौराणिक उपाख्यान सबको पता है। भगवान की नाभि से कमलनाल निकली, उसमें से कमल पुष्प विकसित हुआ। उस पर स्रष्टा ब्रह्मा प्रकट हुए, उन्होंने सृष्टि की रचना की । युगऋषि इस अंलकारिक आख्यान का मर्म स्पष्ट करते हुए लिखते हैं- "संकल्पशक्ति क्रिया में परिणित होती है और उसी का स्थूल रूप वैभव एवं घटनाक्रम बनकर सामने आता है । नाभि (संकल्प) में से अन्तरंग बहिरंग बनकर
विकसित होने वाली कर्म-वर्लरी को ही पौराणिक अलंकरण में कमलबेल कहा गया है । पुष्प इसी बेल का परिपक्व परिणाम है। सृष्टि का सृजन हुआ, इसमें दो तत्व प्रयुक्त हुए-१ ज्ञान, २ कर्म ।

इन दोनों के संयोग से सूक्ष्म चेतना, संकल्प शक्ति स्थूल वैभव में परिणत हो गई और संसार का विशाल कलेवर बनकर खड़ा हो गया। उसमें ऋद्धि-सिद्धियों का आनन्द-उल्लास भर गया । यही कमल-पुष्प की पखुड़ियाँ हैं । इसका मूल है ज्ञान और कर्म, जो ब्रह्म की इच्छा और प्रत्यावर्तन प्रक्रिया द्वारा सम्भव हुआ । ज्ञान और कर्म के आधार पर ही मनुष्य की गरिमा का विकास हुआ है ।" मनुष्य की महान गरिमा के
अनुरूप जीवन जीने के अभ्यास को द्विजत्व की साधना कहा गया है । द्विजत्व की साधना सहज नहीं है । मन की कमजोरियों और परिस्थितियों की विषमताओं के कारण प्रयास करने पर भी साधकों से चूकें हो जाती हैं । समय-समय पर आत्म समीक्षा द्वारा उन भूल-चूकों को चिन्हित करके उन्हें ठीक करना, अपने अन्दर सन्निहित महान सम्भावनाओं को जाग्रत्-साकार करने के प्रयास करना जरूरी होता है। इस सदाशयतापूर्ण संकल्प को पूरा करने के लिए सामवेदीय उपाकर्म पर्व-ब्राह्मी संकल्प के फलित होने वाले पर्व से श्रेष्ठ और कौन-सा समय हो सकता है? इसलिए ऋषियों ने द्विजत्व के परिमार्जन-विकास के लिए श्रावणी
पर्व को ही चुना है।

प्रायश्चित्त रूप में हेमाद्रि स्नान संकल्प। गुरु के सान्निध्य में ब्रह्मचारी गोदुग्ध, दही, घृत, गोबर और गोमूत्र तथा पवित्र कुशा से स्नानकर वर्ष भर में जाने- अनजाने में हुए पापकर्मों का प्रायश्चित्त कर जीवन को सकारात्मकता से भरते हैं। स्नान के बाद ऋषिपूजन, सूर्योपस्थान एवं यज्ञोपवीत
पूजन तथा नवीन यज्ञोपवीत धारण करते हैं। यज्ञोपवीत या जनेऊ आत्म संयम का संस्कार है। आज के दिन जिनका यज्ञोपवित संस्कार हो चुका होता है, वह पुराना यज्ञोपवित उतारकर नया धारण करते हैं। और पुराने यज्ञोपवित का पूजन भी करते हैं । इस संस्कार से व्यक्ति का दूसरा जन्म हुआ माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति आत्म संयमी है, वही संस्कार से दूसरा जन्म पाता है और द्विज कहलाता है।

उपाकर्म का तीसरा पक्ष स्वाध्याय का है। इसकी शुरुआत सावित्री, ब्रह्मा, श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, स्मृति, सदसस्पति, अनुमति, छंद और ऋषि को घृत की आहुति से होती है। जौ के आटे में दही मिलाकर ऋग्वेद के मंत्रों से आहुतियां दी जाती हैं। इस यज्ञ के बाद वेद-वेदांग का अध्ययन आरंभ होता है। इस सत्र का अवकाश समापन से होता है। इस प्रकार वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा साढ़े पांच या साढ़े छह मास तक चलती है। प्रतीक रूप में किया जाने वाला यह विधान हमें स्वाध्याय और सुसंस्कारों के विकास के लिए प्रेरित करता है। यह जीवन शोधन की एक अति महत्वपूर्ण
मनोवैज्ञानिक-आध्यात्मिक प्रक्रिया है । उसे पूरी गम्भीरता के साथ किया जाना चाहिए । श्रावणी पर्व वैदिक काल से शरीर, मन और इन्द्रियों की पवित्रता का पुण्य पर्व माना जाता है । इस पर्व पर की जाने वाली सभी क्रियाओं का यह मूल भाव है कि बीते समय में मनुष्य
से हुए ज्ञात-अज्ञात बुरे कर्म का प्रायश्चित करना और भविष्य में अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देना।
द्विज और द्विजत्व👉 द्विज सम्बोधन यहाँ किसी जाति-वर्ग विशेष के लिए नहीं है, यह एक गुणवाचक सम्बोधन है । जीवन साधना की उच्चतम कक्षा के सफल साधक का पर्याय है। द्विज का अर्थ होता है-दुबारा जन्म लेने वाला । संस्कृत साहित्य में पक्षियों को भी द्विज कहा जाता है । माँ जन्म देती है अण्डे को । माँ के गर्भ से जन्म ले लेने की प्रक्रिया पूरी हो जाने पर भी बच्चे का स्वरूप जन्मदात्री के स्वरूप के अनुरूप नहीं होता । परन्तु अण्डे के अंदर जो जीव है, उसमें जन्मदात्री के अनुरूप विकसित होने की सभी संभावनाएँ होती हैं । प्रकृति के अनुशासन का पालन किये जाने पर उसका समुचित विकास हो जाता है और वह अण्डे में बँधी अपनी संकीर्ण सीमा को तोड़कर अपने नये स्वरूप में प्रकट हो जाता है । इस प्रक्रिया को उसका दूसरा जन्म कहना हर तरह से उचित है । यह
प्रक्रिया पूरी होने पर ही उसे प्रकृति की विराटता का बोध होता है। तभी माँ उसे उड़ने का प्रशिक्षण देती है । ऋषियों ने अनुभव किया कि मनुष्य स्रष्टा की अद्भुत कृति है । उसमें दिव्य शक्तियों, क्षमताओं के विकास की अनंत सँभावनाएँ हैं । सामान्य रूप से तो माँ के गर्भ से जन्म लेने के बाद भी वह पशुओं जैसी आहार, निद्रा, भय, मैथुन की संकीर्ण प्रवृत्तियों के घेरे में ही कैद रहता है। मनुष्य की अंतःचेतना जब पुष्ट होकर संकीर्णता के उस अण्डे जैसे घेरे को तोड़कर बाहर आने का पुरुषार्थ करती है, तब उसका दूसरा जन्म होता है। तभी माता (आदिरशक्ति) उसे सदाशयता और सत्पुरुषार्थ (सद्ज्ञान एवं सत्कर्म) के पंख फैलाकर जीवन की ऊँचाइयों में उड़ने का प्रशिक्षण देती है ।

तैयारी करें:- जो साधक वास्तव में इसका यथेष्ट लाभ उठाना चाहते हैं, उन्हें इसके लिए कम से कम एक दिन पूर्व से विचार मंथन करना चाहिए । गुरुदीक्षा के समय अथवा अगले चरण के साधना प्रयोगों में जो नियम-अनुशासन स्वीकार किये गये थे, उन पर ध्यान दिया जाना चाहिए । भूलों को समझे और स्वीकार किए बिना उनका शोधन संभव नहीं । आत्मसाधना में समीक्षा के बाद ही शोधन, निर्माण एवं विकास के कदम बढ़ाये जा सकते हैं । जो भुल-चूकें हुई हों, उन्हें गुरुसत्ता के सामने सच्चे मन से स्वीकार किया जाना चाहिए । क्षति पूर्ति के लिए अपने कत्तव्य निश्चित करके गुरुसत्ता से उसमें समुचित सहायता की प्रार्थना करनी चाहिए । श्रावणी उपाकर्म के सामूहिक क्रम में जो शामिल हों, उन्हें सामूहिक कर्मकाण्ड का लाभ तभी मिलेगा, जब वे उसके लिए व्यक्तिगत मंथन कर चुके होंगे । उसके बाद शिखा सिंचन उच्च विचार-ज्ञान साधना को तेजस्वी बनने के लिए किया जाता है । यज्ञोपवीत परिवर्तन यज्ञीय कर्म अनुशासन को अधिक प्रखर-प्रामाणिक बनाने के लिए किया जाता है । ब्रह्मा का, वेद का और ऋषियों का आवाहन, पूजन उनकी साक्षी में संकल्प करने तथा उनके सहयोग से आगे बढ़ते रहने के भाव से किया जाता है। रक्षाबंधन प्रगति के श्रेष्ठ संकल्पों को पूरा करने के भाव से किया-कराया जाता है । प्रकृति के अनुदानों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के साथ उसके ऋण से यथाशक्ति उऋण होने के भाव से वृक्षारोपण करने का नियम है । श्रावणी पर हर दीक्षित साधक को साधना का परिमार्जन करने के साथ उसको श्रेष्ठतर स्तरों पर ले जाने के संकल्प करने चाहिए । ऐसा करने वाले साधक ही इष्ट, गुरु या मातृसत्ता के उच्च स्तरीय अनुदानों को प्राप्त करने की पात्रता अर्जित कर सकते हैं। यदि सामूहिक पर्व क्रम में शामिल होने का सुयोग न बने तथा विशेष कर्मकाण्डों का करना-कराना संभव न हो, तो भी अपने साधना स्थल पर भावनापूर्वक पर्व के आवश्यक उपचारों द्वारा श्रावणी के प्राण-
प्रवाह से जुड़कर उसका पर्याप्त लाभ प्राप्त किया जा सकता है । इसके लिए सभी को एक दिन पहले से ही जागरूकतापूर्वक प्रयास
करने-कराने चाहिए। भूलों के सुधार तथा विकास के लिए निर्धारित नियमों को लिखकर पूजा स्थल पर रख लेना चाहिए । उपासना के समय उन पर दृष्टि पड़ने से होने वाली भूलों, विसंगतियों से बचना
संभव होता है । हमारे सार्थक प्रयास हमें उच्च स्तरीय प्रगति का अधिकारी बना सकते हैं।

उपाकर्म के लिये सामग्री
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1 हल्दी
2 कलावा (मौली)
3 अगरबत्ती
4 कपूर
5 तिल
6 जो
7 यज्ञोपवीत
8 चावल
9 अबीर
10 गुलाल
11 माचिस
12 सिंदूर
13 रोली
14 सुपारी, (बड़ी)
15 नारियल
16 सरसो
17 हवन सामग्री
18 शहद (मधु)
19 शक्कर
20 घृत (शुद्ध घी)
21 अगरबत्ती
22धुप बत्ती
23 सप्तमृत्तिका
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हाथी के स्थान की मिट्टि, घोड़ा बांधने के स्थान की मिट्टी, बॉबी की मिट्टी, दीमक की मिट्टी, नदी संगम की मिट्टी, तालाब की मिट्टी, गौ शाला की मिट्टी, राज द्वार की मिटटी

24 पंचगव्य
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गाय का गोबर , गौ मूत्र, गौ घृत, गाय का दूध, गाय का दही

25 सप्त धान्य
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कुलबजन-100ग्राम, जौ, गेहूँ, चावल, तिल, काँगनी, उड़द, मूँग

26कुशा
27दूर्वा
28 पुष्प कई प्रकार के
29 गंगाजल
30 ऋतुफल
39 स्वेतवस्त्र
ब्राह्मण को अपने लिए उपयोगी सामग्री

धोती, दुपट्टा, आंगोछा, आसन, माला, गौमुखी, लोटा, पंचपात्र, चमची, तष्टा, अर्घा, डाभ अंगूठी, जनेऊ गांठ लगा हुआ।

उपाकर्म के अंतर्गत पाप कर्म की मुक्ति के लिए इन 10 चीजों से एक एक करके स्नान किया जाता हैं- मिट्टी, गाय का गोबर, गाय का दूध, गाय का घी, गाय का पंचगव्य, भस्म, अपामार्ग, कुशा+दूर्वा, शहद एवं गंगाजल, आदि 10 पदार्थो के द्वारा स्नान किया जाता है । इस स्नान से शारीरिक शुद्धि होती है और ऋषिपूजन, देवपूजन, द्वारा आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है। इस क्रम को करने के बाद नये यज्ञोपवित का पूजन कर पहनने के बाद पुराने को बदला जाता हैं, बाद में हवन करके सूर्य भगवान को अर्घ्य चढ़ाया जाता है । साथ इस दिन आत्मशुद्धि के बाद वेद शास्त्रों के अध्यन का भी नियम होता है।
👉 *हर व्यक्ति अपने गुण-कर्म-स्वभाव का अधिकाधिक विकास करे-यह उचित है।* अधिक विद्वान बनना, अधिक सेवाभावी होना, अधिक चरित्रवान रहना, अधिक सभ्य, सुसंस्कृत एवं आदर्शवादी होना किसी भी व्यक्ति के लिए कम गौरव की बात नहीं है। *ये ही महत्त्वाकांक्षाएँ उचित हैं और उपयोगी भी।* उन्हीं की छूट हर आदमी को रहनी चाहिए, पर अधिक धन जमा करने की, अधिक ऐश करने की, अधिक वाहवाही लूटने के लिए उद्धत काम करने की छूट किसी व्यक्ति को न रहे। इसके लिए कानूनी या नैतिक नियंत्रण रहे तो यह सर्वथा उचित ही होगा।
👉 *आध्यात्मिक दृष्टिकोण "संतोष" का दृष्टिकोण है।* उसमें हर व्यक्ति को धैर्य और औचित्य के साथ-साथ प्रगति करते चलने की छूट है, *पर जनसाधारण के मध्यम स्तर से बहुत अधिक ऊँचा बढ़ने का निषेध है।* जिनमें जो योग्यताएँ हों वे उन्हें अपने से छोटे या पिछड़े हुए साथियों को उन्नतिशील बनाने में खरच करें और जिस प्रकार फौजी सिपाही साथ-साथ कदम-से-कदम मिलाते हुए एक-सी पोशाक और वरदी धारण करते हुए मार्च करते चलते हैं *उसी प्रकार हमें भी अपने सारे समाज को एक समान विकसित करते हुए साथ-साथ आगे बढ़ने की बात सोचनी चाहिए।*
👉 *भगवान बुद्ध जब मरने लगे और उनसे पूछा गया कि क्या आपको इस मृत्यु के बाद "स्वर्ग" या "मुक्ति" की प्राप्ति होगी ?* तो उन्होंने हँसकर कहा- *"जब तक एक भी व्यक्ति इस संसार के बंधन में बँधा हुआ है, तब तक मैं अपनी व्यक्तिगत सुख-आकांक्षा की कामना नहीं कर सकता। मैं बार-बार जन्मूँगा और मनुष्य तथा हर प्राणी को अपने स्तर का बनाने के लिए सृष्टि के अंत तक प्रयत्न करता रहूँगा।"* *यही है आध्यात्मिक साम्यवाद ।* सभ्य व्यक्ति का, सभ्य समाज का यही आदर्श होना चाहिए। *व्यक्ति को क्षमता एवं प्रतिभा ईश्वर ने इसी उद्देश्य के लिए दिए हैं कि वह अपने से पिछड़े लोगों को कम-से-कम अपने स्तर तक ऊपर उठाने में उनका उपयोग करे।* गुजर-बसर के बारे में जो जितना संयमी रहता है और स्वेच्छा से गरीबी का जीवन स्वीकार करता है, वह उतना ही बड़ा माना जाता है। *भारतीय संस्कृति का यही सनातन आदर्श रहा है।* ऋषि, मुनि स्वेच्छा से गरीबी का जीवन व्यतीत करते रहे हैं। *जन समाज में भी वही प्रशंसनीय है, जो अपनी व्यक्तिगत भौतिक सुख-सुविधाएँ इकट्ठी करने में नहीं, अपनी सामर्थ्य से दूसरों को सुखी बनाने में एक श्रेष्ठ सत्पुरुष की तरह संलग्न है।* भारत की आत्मा एक ही स्वर में पुकारती रही है-
*नत्वहं कामये राज्यं न सौख्यं न पुनर्भवम् ।* *कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्त्तिनाशनम् ॥*
*मैं अपने लिए राज्य की, सुख की, स्वर्ग की कामना नहीं करता, मेरी एकमात्र आकांक्षा यही है कि दुखियों के दुःख दूर करने में अपने को घुला और गला सकूँ ।*
👉 यह आदर्श जिन्होंने जीवन में धारण किया हुआ है, वे ही विश्वशांति के स्तंभ बन सकते हैं। *उन्हीं की संख्या बढ़ने से यह वसुधा अपने को धन्य मान सकती है । ऐसे ही नर रत्नों से यह संसार गुलाब के महकते फूलों से भरे बगीचे की तरह सुरभित हो सकता है । *उन्हीं की परमार्थ बौद्धिक लाभ उठाकर छोटे छोटे अनेकों को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है ।*
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👉 *"व्यक्तित्व" का गठन मूलतः "विचारों" पर निर्भर है।* चिंतन मन को ही नहीं शरीर को भी प्रभावित करता है। *मनोकायिक गड़बड़ियाँ "चिंतन" की गिरावट का ही परिणाम हैं।* इस बात को प्रायः सभी मनोवैज्ञानिक एकमत से स्वीकार करते हैं। *"चिंतन" की उत्कृष्टता को अपनाने के लिए तथा उसे व्यावहारिक जगत में उतारने से ही भावात्मक तथा सामाजिक समंजन प्राप्त हो सकना संभव है।*
👉 इस प्रकार के समंजन की सरल किंतु सक्षम प्रक्रिया बता पाने में आधुनिक मनःशास्त्री असमर्थ पाए जाते हैं। इस विषय पर वे आपसी खींचतान के अतिरिक्त कुछ उपाय दे सकने में अक्षम ही दिखाई देते हैं। *मनोविज्ञान की जाह्नवी का गोमुख सदृश उद्गम स्थल उपनिषद हैं।* इनमें विशेषतया श्वेताश्वर उपनिषद में ऋषियों ने इस प्रकार के भावात्मक एवं सामाजिक समंजन स्थापित करने, राग-द्वेष आदि विरोधी भावों से उठने हेतु एक पूर्णतया सक्षम, सशक्त प्रक्रिया उद्भूत की है जिसे *"उपासना"* कहते हैं।
👉 *निःसंदेह "उपासना" श्रेष्ठ "चिंतन" एवं उत्कृष्ट "व्यक्तित्व" के निर्माण का सशक्त माध्यम है।* मन की बनावट कुछ ऐसी है, वह चिंतन के लिए आधार खोजता है। जैसा माध्यम होगा, उसी स्तर का चिंतन चल पड़ेगा, तदनुरूप क्रिया-कलाप होंगे। निम्नस्तरीय चिंतन वाले व्यक्ति के क्रिया-कलाप घटिया होना स्वाभाविक है। ऐसा व्यक्ति अपने जैसे दुराचारी-अनाचारी व्यक्ति विनिर्मित करने में ही सहायक होगा, जबकि *उच्चस्तरीय "चिंतन" करने वाले संत-मनीषी महात्माओं के अनुरूप उनके क्रिया-कलाप भी उत्कृष्ट कोटि के होते हैं।* तदनुरूप उनके सान्निध्य में रहने वाले व्यक्तियों का व्यक्तित्व भी उसी ढाँचे में ढलकर सुघड़ स्वरूप प्राप्त करता है। *वर्तमान समय में श्रेष्ठ व्यक्तित्व संपन्न व्यक्तियों का अभाव है।* बहुलता हेय, गये-गुजरों की है। *इनसे सामाजिक समंजन की अपेक्षा करना एक विडंबना है।* इन परिस्थितियों में समस्या एक खड़ी होती है कि *मानवी व्यक्तित्व को श्रेष्ठ कैसे बनाया जाए ? विचार करने पर एक ही रास्ता दिखाई देता है- "उपासना" का अवलम्बन ।*
👉 *"उपासना" से जुड़ी आदर्शवादी मान्यताएँ एवं प्रेरणा ही चिंतन को श्रेष्ठ एवं व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बना सकने में समर्थ हो सकती हैं।* उपासना की समग्रता एवं उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों को भली-भांति समझा जा सके तो व्यक्तित्व निर्माण का सबल आधार मिल सकता है। *"उपासना" का लक्ष्य है- व्यक्तित्व का परिष्कार।* इसके निर्धारण से उससे जुड़े आदर्शों एवं उच्चस्तरीय सिद्धांतों द्वारा उपासक को श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। *उपास्य में तन्मय होने का अभिप्राय है- "उच्चस्तरीय आदर्शों एवं सिद्धांतों में लीन हो जाना और उनके अनुरूप आचरण करना"।* उपासना द्वारा निर्माण की यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया चलती रहती है। इनमें तन्मयता की पराकाष्ठा उपास्य और उपासक के बीच विभेद को समाप्त कर देती है। द्वैत से उठकर अद्वैत की स्थिति हो जाती है। परमहंस रामकृष्ण का सर्वत्र काली का दर्शन करना, महाप्रभु चैतन्य का कृष्ण से एकाकार हो जाना, स्वामी रामतीर्थ का ब्रह्मभाव में प्रतिष्ठित हो अपने अस्तित्व को भूल जाना, उपासना की तन्मयता एवं उसकी प्रतिक्रियाओं का प्रभाव है। *यह असामान्य स्थिति न भी हो तो उपासक के विचारों का परिशोधन, परिष्कृतीकरण होता जाता है, भाव-संवेदनाओं में आदर्शवादिता जुड़ने लगती है।*
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कहानी का समय

वृन्दावन

*एक राजा ने भगवान कृष्ण का एक मंदिर बनवाया, और पूजा के लिए एक पुजारी को लगा दिया ।*

*पुजारी बड़े भाव से बिहारीजी की सेवा करने लगे। भगवान की पूजा-अर्चना और सेवा-टहल करते पुजारी की उम्र बीत गई ।*

*राजा रोज एक फूलों की माला सेवक के हाथ से भेजा करता था । पुजारी वह माला बिहारीजी को पहना देते थे । जब राजा दर्शन करने आता, तो पुजारी वह माला बिहारीजी के गले से उतारकर राजा को पहना देते थे । यह रोज का नियम था ।*

*एक दिन राजा किसी वजह से मंदिर नहीं जा सका । उसने एक सेवक से कहा- माला लेकर मंदिर जाओ। पुजारी से कहना, आज मैं नहीं आ पाउंगा।*

*सेवकने जाकर माला पुजारी को दे दी, और बता दिया कि, आज महाराज का इंतजार न करें । सेवक वापस आ गया ।*

*पुजारीने माला बिहारीजी को पहना दी । फिर उन्हें विचार आया कि, आज तक मैं अपने बिहारीजी की चढ़ी माला राजा को ही पहनाता रहा। कभी ये सौभाग्य मुझे नहीं मिला। जीवन का कोई भरोसा नहीं कब रूठ जाए। आज मेरे प्रभु ने मुझ पर बड़ी कृपा की है। राजा आज आएंगे नहीं, तो क्यों न माला मैं पहन लूं ।*

*यह सोचकर पुजारी ने बिहारी जी के गले से माला उतारकर स्वयं पहन ली। इतने में सेवक आया, और उसने बताया कि, राजा की सवारी बस मंदिर में पहुंचने ही वाली है। यह सुनकर पुजारी कांप गए। उन्होंने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गले में देख ली, तो मुझ पर क्रोधित होंगे। इस भय से उन्होंने अपने गले से माला उतारकर बिहारीजी को फिर से पहना दी ।*

*जैसे ही राजा दर्शन को आया, तो पुजारीने नियम अुसार फिर से वह माला उतार कर राजा के गले में पहना दी। माला पहना रहे थे, तभी राजा को माला में एक सफ़ेद बाल दिखा। राजा को सारा माजरा समझ गया कि, पुजारीने माला स्वयं पहन ली थी, और फिर निकालकर वापस डाल दी होगी। पुजारी ऐसा छल करता है, यह सोचकर राजा को बहुत गुस्सा आया।*

*उसने पुजारी जी से पूछा- पुजारीजी यह सफ़ेद बाल किसका है ?*

*पुजारी को लगा कि, अगर सच बोलता हूं तो राजा दंड दे देंगे। इसलिए जान छुड़ाने के लिए पुजारी ने कहा- महाराज यह सफ़ेद बाल तो बिहारी जी का है ।*

*अब तो राजा गुस्से से आग- बबूला हो गया कि, ये पुजारी झूठ पर झूठ बोले जा रहा है। भला बिहारी जी के बाल भी कहीं सफ़ेद होते हैं।*

*राजा ने कहा- पुजारी अगर यह सफेद बाल बिहारी जी का है, तो सुबह शृंगार के समय मैं आउंगा और देखूंगा कि, बिहारीजी के बाल सफ़ेद है या काले । अगर बिहारीजी के बाल काले निकले, तो आपको फांसी हो जाएगी ।*

*राजा हुक्म सुनाकर चला गया। अब पुजारी रोकर बिहारीजी से विनती करने लगे- प्रभु मैं जानता हूं आपके सम्मुख मैंने झूठ बोलने का अपराध किया। अपने गले में डाली माला पुनः आपको पहना दी । आपकी सेवा करते-करते वृद्ध हो गया । यह लालसा ही रही कि, कभी आपको चढ़ी माला पहनने का सौभाग्य मिले। इसी लोभ में यह सब अपराध हुआ। मेरे ठाकुरजी... पहली बार यह लोभ हुआ और ऐसी विपत्ति आ पड़ी है। मेरे नाथ... अब नहीं होगा ऐसा अपराध। अब आप ही बचाइए... नहीं तो कल सुबह मुझे फाँसी पर चढा दिया जाएगा। पुजारी सारी रात रोते रहे।*

*सुबह होते ही राजा मंदिर में आ गया। उसने कहा कि, आज प्रभु का श्रृंगार वह स्वयं करेगा। इतना कहकर राजा ने जैसे ही मुकुट हटाया, तो हैरान रह गया। बिहारी जी के सारे बाल सफ़ेद थे। राजा को लगा, पुजारी ने जान बचाने के लिए बिहारीजी के बाल रंग दिए होंगे। गुस्से से तमतमाते हुए उसने बाल की जांच करनी चाही। बाल असली हैं, या नकली... यह समझने के लिए उसने जैसे ही बिहारी जी के बाल तोडे, बिहारीजी के सिर से खून की धार बहने लगी ।*

*राजा ने प्रभु के चरण पकड़ लिए और क्षमा मांगने लगा। बिहारीजी की मूर्ति से आवाज आई, राजा तुमने आज तक मुझे केवल मूर्ति ही समझा... इसलिए आज से मैं तुम्हारे लिए मूर्ति ही हूँ । पुजारी मुझे साक्षात भगवान् समझते हैं । उनकी श्रद्धा की लाज रखने के लिए आज मुझे अपने बाल सफेद करने पड़े व रक्त की धार भी बहानी पड़ी तुझे समझाने के लिए।*

*कहते हैं- समझो तो देव... नहीं तो पत्थर। श्रद्धा हो... तो उन्हीं पत्थरों में भगवान सप्राण होकर भक्त से मिलने आ जाएंगे ।*
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👉 *"चरित्र" मनुष्य की मौलिक विशेषता एवं उसका निजी उत्पादन है ।* इसमें उसके निजी दृष्टिकोण, निश्चय, संकल्प एवं साहस का पुट अधिक होता है। इसमें बाह्य परिस्थितियों का यत्किंचित योगदान ही रहता है। असंख्यों ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जिनमें *लंका जैसे विषाक्त वातावरण में "विभीषण" जैसे "संत" अपने बलबूते समूची प्रतिकूलताओं को चुनौती देते हुए अपने स्थान पर अटल बने रहे।* ऐसे भी कम नहीं जिनमें पुलस्त्य ऋषि के देव परिकर में रावण जैसे दुराचारी का प्रादुर्भाव हुआ और उसने वातावरण को ताक पर उठाकर रख दिया।
👉 *यह व्यक्तिगत "चरित्र" ही है जिसे व्यक्ति अपने बलबूते विनिर्मित करता है।* परिस्थितियाँ सामान्य स्तर के लोगों पर ही हावी होती हैं। जिनमें मौलिक विशेषता है वे नदी के प्रवाह से ठीक उलटी दिशा में मछली की तरह अपनी पूँछ के बल पर छर-छराते चल सकते हैं। *"निजी पुरुषार्थ" एवं अंतः शक्ति को प्रसुप्त से उभारते हुए साहसी व्यक्ति अपने को प्रभावशाली बनाते और व्यक्तित्व के बल पर जन सम्मान अर्जित करते देखे गए हैं।* यह उनके चिंतन की उत्कृष्टता, चरित्र की श्रेष्ठता एवं अंतराल की विशालता के रूप में विकसित व्यक्तित्व की ही परिणति है।
👉 *संतों की, सज्जनों की दोस्ती स्वभावतः अपने जैसे लोगों से ही हो जाती है।* आवश्यक नहीं कि वे एक ही इलाके या एक ही गाँव के हों। दूर-दूर के रहने वाले होने पर भी एक-दूसरे का परिचय कहीं न कहीं से प्राप्त कर लेते हैं और उनके बीच मेल-जोल का सिलसिला चल पड़ता है। अंततः वे घनिष्ठ बन जाते हैं। चोर-डाकुओं के भी गिरोह बनते रहते हैं। इसका कारण एक ही है कि हर मनुष्य की अपनी प्रकृति होती है। उसे साथियों की आवश्यकता पड़ती है। चुंबक लोहे के टुकड़ों को खींचकर अपने पास जमा कर लेती है। *मनुष्य भी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुरूप मंडलियाँ बना लेते हैं और उनके मिले-जुले प्रयास से चमत्कार दिखाने लगते हैं।* यदि मनुष्य अपनी प्रकृति बदल डाले और नई रीति-नीति अपना ले तो पुराने सभी मित्र छिन्न-भिन्न हो जाएँगे और नई परिवर्तित प्रकृति के अनुरूप जमघट बढ़ने लगेगा।
👉 एक बच्चा पिता के साथ नदी तट पर गया। हवा चल रही थी और लहरें उठ रही थीं। हर लहर पर एक अलग सूर्य चमक रहा था। बच्चे ने पिता से पूछा- *आकाश में सूरज एक ही बड़ा है, पर हर लहर पर तो सैकड़ों-हजारों की संख्या में दीख रहा है और आकार में भी छोटा है।* पिता ने समझाया कि आकाश वाला सूरज तो एक ही है। लहरों पर तो उसके प्रतिबिंब भर चमक रहे हैं। *इस संसार में जन समुदाय समुद्र की लहरों के समान है। उनके अपने-अपने गुण स्वभाव हैं, पर उनकी वही विशेषताएँ हमारे सामने उभरकर आती हैं, जिन्हें हम ढूँढ़ते हैं। "सज्जनों" के साथ आमतौर से अन्य लोग भी "सज्जनता" का ही व्यवहार करते हैं।* इसके विरुद्ध क्रोधी लोगों का हर किसी से झगड़ा-झंझट होता रहता है। बाजार में अनेकों दुकानें होती हैं, पर उनमें पहुँचते वही लोग हैं, जिन्हें जिस चीज की जरूरत होती है। जिसे मिठाई खरीदनी है वह लोहे की दुकान पर जाकर व्यर्थ हैरान होगा और निराश वापस लौटेगा।
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ध्यान की गहन अवस्था

जैसे ऑफिस में किसी के प्रति नकारात्मक सोच, हमारे पसंद और नापसंद , निरंतर भीतर ही भीतर बदलते रहने वाले भाव , जो या तो इस तरफ या उस तरफ झुके होते हैं।

ऐसे में कोई ध्यान करने बैठेगा तो कुछ भी नहीं होगा सिर्फ बंद आंखों के पीछे चलते रहने वाला द्वंद युद्ध और मुखर हो कर दिखेगा , यह दिखेगा कि मेरे भीतर कितना भीषण युद्ध चल रहा है।

और यह भी देखने के लिए शांत हो कर २० मिनट बैठना होगा ।

तो शुरुआत शरीर के तल पर करनी होगी, शरीर जैसा है इसे वैसा ही स्वीकारना , शरीर को निरंतर स्थिर बैठे रहने की आदत डालना यह सब आरंभिक कदम हैं।

जब महीने भर बैठने की आदत हो जाए तब व्यक्ति शरीर के तल पर सांसों को स्थिर हो कर देखने सीख जाता है !

फिर वह मन के तल पर विचारों का साक्षी होना शुरू कर देता है, और फिर प्रथम बार विचार अचानक गिरने शुरू होते हैं।

विचारों के प्रति स्वीकृति , नकारात्मक और सकारात्मक विचारों को बस देखना कोई प्रतिक्रिया न देना और एक बड़ी ऊर्जा का स्रोत स्वतंत्र होने लगता है ऐसा ही तीन महीने होने पर व्यक्ति विचारों से लगभग मुक्त होने लगता है।

तब भावों का साक्षी होना शुरू कर देता है, तब जब सारे विचार गिर गए , सारे भावों से पृथक होते ही सारे प्रयास स्वतः गिरने लगते हैं !

और ऐसा ध्यानी बैठते ही तुरंत ध्यान में उतर जाता है मानो संसार के धूप से पसीने से लथपथ होने के उपरांत आत्म सरोवर में स्नान करने सीख गया हो ।

और फिर भीतर की दुनिया ही अलग है, एक बार उस गहन शांति में डूबने के उपरांत , उस स्थिति का किसी भी प्रकार से वर्णन नहीं किया जा सकता …

इतना ही कहा जा सकता है कि प्रेम की प्रथम अनुभूति ध्यान में ही होती है, भीतर से सघन धन्यवाद का भाव उठता है, और जीवन एक अनूठी संगीतमय रचना जैसी लगती है..

उस विस्तार की अवस्था वर्णन सिर्फ उस में स्थित ध्यानी ही जनता है, सभी शब्द फेल हो जाते हैं ।
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कहानी का समय

Panauti


एक बार एक गांव में एक बुजुर्ग काका बहुत बीमार हो गए और उन्हें शहर के अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा ।
कुछ दिन बीत जाने के बाद गांव के लोगों ने आपस में ये तय किया कि सब मिलकर शहर चलते हैं औऱ काका का हाल चाल लेते हैं।
फ़िर सबके सामने समस्या ये उठ खड़ी हुई कि आखिर शहर चला कैसे जाए ???
बाद में सामुहिक रूप से ये तय किया गया कि सब मिलकर एक बड़ा टेंपू भाड़े पर लेते हैं और उसका किराया आपस में बांट लेंगें ।
भाड़े पर एक टेंपू ठीक किया गया जिसका चालक लालची किस्म का आदमी था और टेंम्पु पंद्रह लोगों के बैठने भर की जगह थी । साथ ही उसका किराया एक सौ रुपए प्रति व्यक्ति तय हुआ लेकिन अंत में कुल मिलाकर चौदह लोग ही शहर जाने के लिए तैयार हुए।
टेंपू चालक ने सब लोगों से से आग्रह किया औऱ कहा कि टेंपू में कुल पंद्रह सीट है , एक और व्यक्ति को जोड़ लो ताकि मेरी एक सीट खाली न हो , पर काफी प्रयास के बावजूद एक औऱ आदमी का इंतज़ाम न हो सका।
अब चौदह लोगों के साथ गाड़ी चलने ही वाली थी कि ऊपर पहाड़ी पर गांव का ऐक व्यक्ति गुड्डू पागलो कि तरह दौड़ता और आवाज़ देता और हाथ देता देखा गया।
गाड़ी के सभी यात्री चीख़ पड़े....चलो गाड़ी चलावो, इसे हरगिज़ साथ मत ले जाना, ये साला पनौती तुम्हारा भी कुछ नुक़सान करेगा। हमारा तो करेगा ही
लेकिन चालक ने जवाब दिया, पनौती वो क्या होता है , मेरे लिए तो सवारी ही भगवान है। हम लोग ऐसा सोचने लगे तो हमारा धंधा चल पड़ा ये सौ रुपये की सवारी है,मैं हर कीमत पर उसे लूँगा। और ये पनौती वनौती कुछ नहीं होता है। नाहक ही किसी को बदनाम कर रखा होगा। मुझे तो लगता है आप लोग ईसे न जाने क्यो जानबूझकर नहीं ले जाना चाहते।
लोग चालक को समझाने लगे। यह गांव का सबसे फालतू आदमी है कुछ काम धंधा भी नहीं करता तुम्हे कहा से सौ रूपये देगा। और उसे बताया कि ईसकी शुक्ल देखने से रोटी भी नसीब नही होती हे हम मजाक नहीं कर रहे हैं तुम गाडी़ आगे बढावो । उसके चक्कर में मत कुछ तो हाथ जोड़ कर विनती करने लगे कि अभी समय निकल लो । सभी के मन में सिर्फ़ यही भय था कि यदि गुड्डू उनके साथ गया तो जरुर कुछ न कुछ अनर्थ हो जाएगा।
लेकिन चालक अपनी ज़िद पर अड़ा रहा ।
लोग जानबूझ कर उसे डरा रहे हैं और सौ रुपए का नुक़सान वह फालतू में करने को तैयार न था।
मैं ऐसे ऐक नहीं सौ पनौतीयो को भी ले जाने को तैयार हूं वह चिढ़ कर बोला। आप लोग खामखां कहानीया गढ़ रहे हैं। वह बेचारा दोढ़ता हुवा आ रहा है और आप उसे छोढ़ कर जाना चाहते हैं ऐसा भी क्या किसी से जलना आप सब बडे़ अनोखे लोग हैं। चाहते हैं उसे छोढ़ दे ...हो सकता है वे बुजुर्गवार उसके बेहद करीबी हो उनके आखरी समय पास रहना चाहता हो।
यार तुम खामखां उसके हमदर्द मत बनो जब हम सब कह रहे हैं यहा से चलो तुम अपना ही राग अलाप रहे हो ...यह भंयकर किस्म का मनहूस आदमी है।
अब मैं ईसे ले कर ही जाऊगा और ये बात साबित कर दुगा कि आप सब लोग गल्त है। आपने फिजूल में ही किसी शरीफ आदमी को बदनाम कर रखा है। ईसके लिए आप सभी को शर्म आनी चाहिए क्या किसी आदमी के साथ ईस तरह का व्यवहार करना उचित है। आप सब मुझे पढे़ लिखे नजर आते हैं। फिर भी केसे जाहिलो जेसी बाते करते हो।
लो भयी ये तो हमें ही लेक्कचर ही देने लग गया। यह कह लोग खामोश हो गये ।
अब अन्य सवारों के पास कोई अन्य विकल्प नहीं था और सभी अपने गांव के गुड्डू जैसे किसी अनचाहे व्यक्ति के आने के पहुंचने का इंतज़ार करने लगे।
तभी गुड्डू हांपते कांपते हुए पहुंच गया, सभी लोग सांस रोक कर भयभीत बैठे थे , अब ईसकी काली जुबान सै न जाने केसे शब्द भेदी बाण निकलेगे, दूसरी तरफ चालक ने दरवाज़ा खोला.... आईये सर आपके गांव के लोग भी अजीब है पता नहीं कयो आप जेसे अच्छे इंसान से जलते हैं। आप केसे दोढ़ भाग कर पहुचे है ये लोग तो आपको ले जाना ही नहीं चाहते थे।
जी बहुत धन्यवाद आपका गुड्डू हाफते हुवे बोला
आईये जनाब बाहर क्यो खडे़ है आप सबसे आगे बेठीये
अरे नहीं नहीं उसकी जरूरत नहीं है।
गुड्डू ने बाहर खड़े खड़े ही टूटी सांसों के साथ फिर उन चौदह लोगों से कहा " अरे आप लोगो को ऐक बात कहनी है ...
गुडू चुप हो जा खबरदार जो ऐक शब्द भी निकाला मैं तेरी जुबान खिंच लु़गा गांव के प्रधान जी घबरा कर बोले हमें पता है तेरी ऐक बात क्या होती है।
अरे मेरी बात तो सुनीये गुड्डू बोला
खबरदार चुप हो जा और चुपचाप गाडी़ में बैठ जा जब आ ही गया है। ऐक शब्द न बोलियो शहर आने तक।
में तुझे चेतावनी देता हूं वरना वही पर निचे उतार देगे।
अरे कमाल के लोग हैं आप ईन्हे अपनी बात कहने तो दीजिए ... ड्राइवर बीच में बोला।
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