Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Narvada Dubey)
उत्तरवैदिक काल (Post Vedic Period), 1000-600 BC
पुरातात्त्विक स्रोत
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Forwarded from वृषभानुदुलारी राधा रानी ...........
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भावनाएं सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं हैं, और सुरक्षा व स्नेह (प्यार) हर जीवित प्राणी की जरूरत है। 🥰
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Forwarded from वृषभानुदुलारी राधा रानी ...........
गुरुकुल इतिहास सूरतगढ़ History for Rpsc 🇮🇳
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राजस्थान के इतिहास की बेहतरीन अधूरी प्रेम कहानी......
फिरोजा और वीरमदेव
जालौर के शासक कान्हडदेव देव के पुत्र वीरमदेव जो दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में गया था उस समय अलाउद्दीन खिलजी की पुत्री फिरोजा ने वीरमदेव के लिये शादी का प्रस्ताव रखा लेकिन वीरेमदेव यह कहकर मना कर दिया.......
मामो लाजे भाटिया,कुल लाजे च्वहान
जै परणीजू, उल्टा उगे भान!!
अथार्त अगर मैं तुरकानी से शादी करूं तो मामा (भाटी)कुल और स्वयं का चौहान कुल लज्जित हो जाएगा और ऐसा तभी हो सकता है जब सूरज पश्चिम में उगे.....
वीरमदेव अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध करते समय मर गया था तो अलाउद्दीन के सैनिकों ने उस का मृत शरीर (गर्दन) को फिरोजा को लाकरदे दीया .... तो ऐसा कहा जाता है कि जिस तरफ फिरोजा वीरमदेव की तरफ को देखती वीरमदेव की गर्दन मुंह फेर लेती थी जिस तरह फिरोजा उसको देखती गर्दन उल्टी हो जाती तब फिरोजा ने कहा था......
तज तुरकाने चाल, हिंदूवाणी हुई है में!
भो भो रा भरतार सीस नी धूण सोनगरा!!
अर्थात
सोनगरा के सरदार तू अपना सिर मत घुमा, तू मेरे जन्म जन्मातर का भरतार है आज मैं तुरकानी से हिंदू बन गई और अपना मिलन इस अग्नि की ज्वाला में ही होगा.......
अंत समय में फिरोजा वीरमदेव की इस गर्दन को लेकर यमुना नदी में कूद गई और अपने प्राण त्याग दिए.........
महान है यह शहजादी जो मुस्लिम होकर भी हिन्दू शासक के लिए अपने प्राण त्याग दिए 🙏🙏🙏🙏
कोटि कोटि नमन 💐💐💐
By K.K khator 🚩जय राजपूताना 🚩
फिरोजा और वीरमदेव
जालौर के शासक कान्हडदेव देव के पुत्र वीरमदेव जो दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में गया था उस समय अलाउद्दीन खिलजी की पुत्री फिरोजा ने वीरमदेव के लिये शादी का प्रस्ताव रखा लेकिन वीरेमदेव यह कहकर मना कर दिया.......
मामो लाजे भाटिया,कुल लाजे च्वहान
जै परणीजू, उल्टा उगे भान!!
अथार्त अगर मैं तुरकानी से शादी करूं तो मामा (भाटी)कुल और स्वयं का चौहान कुल लज्जित हो जाएगा और ऐसा तभी हो सकता है जब सूरज पश्चिम में उगे.....
वीरमदेव अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध करते समय मर गया था तो अलाउद्दीन के सैनिकों ने उस का मृत शरीर (गर्दन) को फिरोजा को लाकरदे दीया .... तो ऐसा कहा जाता है कि जिस तरफ फिरोजा वीरमदेव की तरफ को देखती वीरमदेव की गर्दन मुंह फेर लेती थी जिस तरह फिरोजा उसको देखती गर्दन उल्टी हो जाती तब फिरोजा ने कहा था......
तज तुरकाने चाल, हिंदूवाणी हुई है में!
भो भो रा भरतार सीस नी धूण सोनगरा!!
अर्थात
सोनगरा के सरदार तू अपना सिर मत घुमा, तू मेरे जन्म जन्मातर का भरतार है आज मैं तुरकानी से हिंदू बन गई और अपना मिलन इस अग्नि की ज्वाला में ही होगा.......
अंत समय में फिरोजा वीरमदेव की इस गर्दन को लेकर यमुना नदी में कूद गई और अपने प्राण त्याग दिए.........
महान है यह शहजादी जो मुस्लिम होकर भी हिन्दू शासक के लिए अपने प्राण त्याग दिए 🙏🙏🙏🙏
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Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Narvada Dubey)
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में गणराज्यों के दो वर्गों का उल्लेख मिलता है।
1. राजशब्दोपजीवी संघ ऐसे गणराज्य राजा की उपाधि धारण करते थे। जैसे लिच्छवी, वज्जि,मल्ल आदि।
2. वार्ताशस्त्रोपजीवी संघ ऐसे गणराज्य कृषि, पशुपालन, वाणिज्य तथा शस्त्र द्वारा जीविका चलाते थे। जैसे सौराष्ट्र, कंबोज आदि।
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महत्त्वपूर्ण जनपद, महाजनपद और नगर
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प्रथम एवं द्वितीय नगरीकरण में अंतर (Difference Between First and Second Urbanisation)
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बुद्ध का सामाजिक-राजनीतिक चिंतन (Buddha's Socio-Political Thought)
बुद्ध दण्डविहीन और शस्त्रविहीन राजशासन के पक्षधर थे।
वे संपूर्ण भूमि राजा के अधीन देखना चाहते थे। उनके अनुसार राजा केवल शांति का रक्षक नहीं वरन् आर्थिक विकास के लिये भी उत्तरदायी है।
बुद्ध जाति-पाति के विरोधी थे। उनके अनुसार बड़ा या छोटा कर्म से होता है न कि जन्म से। फिर भी बौद्ध धर्म ने जाति व्यवस्था के विरूद्ध कठोर संघर्ष नहीं छेड़ा, बल्कि धर्म भी चांडाल व निषाद को अछूत की श्रेणी में रखता है।
बुद्ध ने भी चारों वर्गों की बात कही और इनका क्रम निर्धारित किया क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र।
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बौद्ध धर्म के दार्शनिक सिद्धांत (Philosophical Principles of the Buddhism)
विशिष्टतासमुत्पाद
महात्मा बुद्ध के अनुसार, जैसे किसी एक वस्तु के विनाश के बाद दूसरी की उत्पत्ति होती है, वैसे ही प्रत्येक घटना का कार्य-कारण संबंध होता है। इसी कार्य कारण संबंध को बुद्ध ने 'प्रतीत्यसमुत्पाद' कहा है। 'प्रतीत्यसमुत्पाद' को बौद्ध दर्शन का मूल तत्त्व माना गया है। महात्मा बुद्ध ने मनुष्य के निर्वाण प्राप्ति के संदर्भ में कहा है कि सभी प्रकार की इच्छाओं एवं तृष्णाओं से छुटकारा पाया जा सकता है और जन्म-मरण के चक्र से भी मुक्त हुआ जा सकता है। इसके लिये सत्कर्म एवं सदाचार का मार्ग अपनाना होगा।
क्षणिकवाद
यह प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धांत का तार्किक परिणाम है। जगत की सभी चीजें परिवर्तनशील और क्षणिक होती हैं। अतः प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व क्षणमात्र ही रहता है।
अनात्मवाद
बुद्ध ने आत्मा के अस्तित्व को अस्वीकार करते हुए उसके नित्य, शाश्वत, अपरिणामी व अविनाशी होने की बात का खंडन किया है। इनके अनुसार "संसार में ना तो कोई आत्मा है और न ही इस तरह कोई अन्य वस्तु"। अतः आत्मा अनित्य है, यह अस्थाई शरीर और मन का एक संकलन मात्र है।
अनीश्वरवाद
बौद्ध धर्म ने ईश्वर तथा वेदों की सत्ता को अस्वीकार करते हुए जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था को मान्यता नहीं दी है। यह धर्म ईश्वर को संसार का कर्ता नहीं मानता है। बुद्ध का मत है कि यदि जगत का रचयिता ईश्वर है, तो दुःखों का जन्मदाता भी उसे ही माना जाना चाहिये। बुद्ध के अनुसार, जगत 'प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धांत' से संचालित होता है, ईश्वरीय प्रताप से नहीं। अतः बुद्ध ने ईश्वर की बजाय मानवीय प्रतिष्ठा को महत्त्व दिया है।
कर्मफल का सिद्धांत
बुद्ध ने कर्मफल के सिद्धांत को माना है तथा इसे पुनर्जन्म की अवधारण के साथ संबद्ध किया है। वस्तुतः 'कम' के आधार पर बुद्ध ने पुनर्जन्म के सिद्धांत की व्याख्य की है।
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बौद्ध धर्म का प्रसार (Spread of Buddhism)
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संगमकालीन प्रमुख शब्दावलियाँ (Important Terminologies of Sangam Period)
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