Forwarded from युद्धस्व (इतिहास)
☞ STZ :- खुड़ी (जैसलमेर)
Special Tourism Zone
☞ पर्यटन सुविधा केंद्र - कुलधरा (जैसलमेर)
☞ अत्याधुनिक ब्रज कन्वेंशन सेंटर - भरतपुर
Important Paper 1st Gk
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Important Paper 1st Gk
❤5
Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Narvada Dubey)
युगांतर समूह
इसकी स्थापना जतीन्द्रनाथ मुखर्जी (भगा जतिन) ने की थी।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान देशव्यापी सशस्त्र विद्रोह की योजना बनाई गई थी, जिसमें रासबिहारी बोस ने सहायता की।
हथियारों के लिए विदेशी समर्थन की कोशिश
"German Plot" या
"Zimmerman Plan"
के माध्यम से की गई।
यह योजना भेद दी गई, जिससे कई गिरफ्तारियाँ हुई। 1915 में भगा जतिन एक पुलिस मुठभेड़ में शहीद हो गए।
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Forwarded from युद्धस्व (इतिहास)
बलबन के द्वारा शुरू किया गया ईरानी त्यौहार "नौरोज" (सूर्य पूजा) कितने दिनों तक चलता था
Anonymous Quiz
36%
9 दिन
33%
19 दिन
26%
29 दिन
5%
39 दिन
Forwarded from युद्धस्व (इतिहास)
दिल्ली सल्तनत का एकमात्र सुल्तान जिसकी केवल एक पत्नी थी
Anonymous Quiz
11%
कुतुबुद्दीन ऐबक
23%
इल्तुतमिश
50%
नासिरुद्दीन महमूद
15%
मोहम्मद बिन तुगलक
Forwarded from युद्धस्व (इतिहास)
यद्यपि मैंने कुरान को नहीं पढ़ा है न हीं कभी मैं रोजे नहीं रखता हूं और न ही कभी शुक्रवार की नमाज में सम्मिलित होता हूं फिर भी मैं एक सच्चा मुसलमान हूं निम्न पंक्तियां किस सुल्तान की है यदि भी
Anonymous Quiz
7%
जलालुद्दीन खिलजी
72%
अलाऊद्दीन खिलजी
18%
मुबारक शाह खिलजी
3%
शहाबुदीन उमर
Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Narvada Dubey)
कृष्ण लोहित मृदभाण्डों की विशेषताएँ
ऐसे मृदभाण्डों का भीतरी तथा बाहर की बारी (Rim) के चारों ओर भाग काला तथा शेष बाहरी भाग ईंट के रंग का लाल मिलता है
आकार-प्रकार एवं अलंकरण चित्रण की दृष्टि से ये भाण्ड अन्य भाण्डों से भिन्नता रखते हैं
इस मृदभाण्ड के निर्माण विधि को
इजिप्शियन तकनीकी (Egyptian Technique)
का कहा जाता है
ये मृद्भाण्ड चूने तथा रेत युक्त मिट्टी से बने है तथा कभी-कभी काचली मिट्टी से भी ये तैयार किए जाते थे।
इल्तुतमिश के सबसे छोटे बेटे नासिरुद्दीन महमूद के दिल्ली की गद्दी संभालते ही दिल्ली सल्तनत में राजनीतिक स्थिरता बहाल होनी शुरू हो गई थी, लेकिन इसमें सुल्तान महमूद की कोई ख़ास भूमिका नहीं थी.
यह काम किया था उसके सबसे ख़ास मंत्री ग़्यासुद्दीन बलबन ने जिसको महमूद के शासनकाल में सबसे अधिक ताक़त मिली हुई थी.
बलबन ने 1246 से लेकर 1287 तक चालीस सालों तक इस ताक़त का भरपूर इस्तेमाल किया, पहले दो दशक सुल्तान के प्रतिनिधि के तौर पर और अगले दो दशक दिल्ली के सुल्तान के तौर पर.
इस बीच सत्ता हासिल करने के उसके सफ़र में दो साल का व्यवधान पड़ा, जब वह अपने राजनीतिक विरोधियों की चालों के कारण क़रीब दो वर्षों तक सत्ता से बाहर रहा.
बलबन के दौर के गवाह रहे इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बर्नी अपनी किताब 'तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही' में लिखते हैं, "नासिरुद्दीन महमूद ने जब गद्दी संभाली तो उसकी उम्र सिर्फ़ 17 साल की थी. उसमें न तो शासन करने का कोई गुण था और न ही दिलचस्पी. उसने शासन की पूरी ज़िम्मेदारी बलबन के ऊपर छोड़ दी थी."
"महमूद एक सौम्य, उदार और धार्मिक व्यक्ति था और उसका अधिकतर समय क़ुरान की प्रतियां बनाने में बीतता था. उस समय के उथल-पुथल वाले माहौल में ये गुण भले ही अच्छे समझे जाते हों, लेकिन सुल्तान के तौर पर इन गुणों को अनुपयुक्त माना जाता था. बलबन ने प्रतिद्वंद्वी दरबारियों की जलन और साज़िशों के बावजूद हालात पर नियंत्रण कर लिया."
बर्नी लिखते हैं, "इस दौरान बलबन ने महमूद को एक कठपुतली की तरह इस्तेमाल किया. पूरा राज-काज चलाया और सुल्तान न होते हुए भी सभी राजचिन्हों जैसे 'छत्र' का इस्तेमाल किया. महमूद का पूरा शासनकाल एक तरह से बलबन का शासनकाल था."
सन 1216 में जन्मा ग़्यासुद्दीन बलबन एक इल्बारी तुर्क था. उसका शुरुआती नाम बहाउद्दीन था. उसे मंगोलों ने बंदी बनाकर बग़दाद में एक ग़ुलाम के तौर पर बेच दिया था. उसका मालिक ख़्वाजा जमालउद्दीन उसे दिल्ली ले आया था जहां 1233 में इल्तुतमिश ने उसे ख़रीद कर उसे अपना ख़ासदार बना दिया था.
इल्तुतमिश के बाद उसकी बेटी रज़िया ने उसे अमीर-ए-शिकार के पद पर नियुक्त किया था. सन 1249 में उसने सुल्तान नासिरुद्दीन की बेटी से विवाह कर लिया. नासिरुद्दीन महमूद ने उसे नायब-ए-मुमलिकत का पद दे दिया. ये पद पाते ही बलबन ने महत्वपूर्ण स्थानों पर अपनी पसंद के लोग बैठाने शुरू कर दिए. उसने अपने छोटे भाई किश्ली ख़ाँ को राजमहल के प्रशासनिक कार्यों का प्रमुख बना दिया.
उस दौर में मोरक्को से भारत आए मशहूर यात्री इब्न बतूता के अनुसार, "बलबन एक नाटे क़द का शख़्स था जो देखने में आकर्षक नहीं था लेकिन उसका ऊँचा मानसिक स्तर और प्रतिभा उसकी इस कमी की भरपाई कर देती थी."
मिनहाज-ए-सिराज अपनी किताब 'तबाकत-ए-नासिरी' में लिखते हैं, "इल्तुतमिश बलबन को बहुत प्रतिभाशाली व्यक्ति मानता था इसलिए उसने उसे ऊँचा पद दिया और एक तरह से अपने हाथ पर भाग्य का बाज़ बैठा लिया. बलबन का ओहदा दिनों-दिन बढ़ता गया और कुछ दिनों में वह सुल्तान को सलाह देने वाले चालीस विशिष्ट लोगों के समूह 'तुर्कान-ए-चिहलगानी' का सदस्य बन गया."
बलबन के रसूख़ का इस तरह तेज़ी से बढ़ना उसके प्रतिद्वंद्वियों को पसंद नहीं आया और उन्होंने उसे उसके पद से हटाने के लिए साज़िश रचनी शुरू कर दी.
BBC LONDON
यह काम किया था उसके सबसे ख़ास मंत्री ग़्यासुद्दीन बलबन ने जिसको महमूद के शासनकाल में सबसे अधिक ताक़त मिली हुई थी.
बलबन ने 1246 से लेकर 1287 तक चालीस सालों तक इस ताक़त का भरपूर इस्तेमाल किया, पहले दो दशक सुल्तान के प्रतिनिधि के तौर पर और अगले दो दशक दिल्ली के सुल्तान के तौर पर.
इस बीच सत्ता हासिल करने के उसके सफ़र में दो साल का व्यवधान पड़ा, जब वह अपने राजनीतिक विरोधियों की चालों के कारण क़रीब दो वर्षों तक सत्ता से बाहर रहा.
बलबन के दौर के गवाह रहे इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बर्नी अपनी किताब 'तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही' में लिखते हैं, "नासिरुद्दीन महमूद ने जब गद्दी संभाली तो उसकी उम्र सिर्फ़ 17 साल की थी. उसमें न तो शासन करने का कोई गुण था और न ही दिलचस्पी. उसने शासन की पूरी ज़िम्मेदारी बलबन के ऊपर छोड़ दी थी."
"महमूद एक सौम्य, उदार और धार्मिक व्यक्ति था और उसका अधिकतर समय क़ुरान की प्रतियां बनाने में बीतता था. उस समय के उथल-पुथल वाले माहौल में ये गुण भले ही अच्छे समझे जाते हों, लेकिन सुल्तान के तौर पर इन गुणों को अनुपयुक्त माना जाता था. बलबन ने प्रतिद्वंद्वी दरबारियों की जलन और साज़िशों के बावजूद हालात पर नियंत्रण कर लिया."
बर्नी लिखते हैं, "इस दौरान बलबन ने महमूद को एक कठपुतली की तरह इस्तेमाल किया. पूरा राज-काज चलाया और सुल्तान न होते हुए भी सभी राजचिन्हों जैसे 'छत्र' का इस्तेमाल किया. महमूद का पूरा शासनकाल एक तरह से बलबन का शासनकाल था."
सन 1216 में जन्मा ग़्यासुद्दीन बलबन एक इल्बारी तुर्क था. उसका शुरुआती नाम बहाउद्दीन था. उसे मंगोलों ने बंदी बनाकर बग़दाद में एक ग़ुलाम के तौर पर बेच दिया था. उसका मालिक ख़्वाजा जमालउद्दीन उसे दिल्ली ले आया था जहां 1233 में इल्तुतमिश ने उसे ख़रीद कर उसे अपना ख़ासदार बना दिया था.
इल्तुतमिश के बाद उसकी बेटी रज़िया ने उसे अमीर-ए-शिकार के पद पर नियुक्त किया था. सन 1249 में उसने सुल्तान नासिरुद्दीन की बेटी से विवाह कर लिया. नासिरुद्दीन महमूद ने उसे नायब-ए-मुमलिकत का पद दे दिया. ये पद पाते ही बलबन ने महत्वपूर्ण स्थानों पर अपनी पसंद के लोग बैठाने शुरू कर दिए. उसने अपने छोटे भाई किश्ली ख़ाँ को राजमहल के प्रशासनिक कार्यों का प्रमुख बना दिया.
उस दौर में मोरक्को से भारत आए मशहूर यात्री इब्न बतूता के अनुसार, "बलबन एक नाटे क़द का शख़्स था जो देखने में आकर्षक नहीं था लेकिन उसका ऊँचा मानसिक स्तर और प्रतिभा उसकी इस कमी की भरपाई कर देती थी."
मिनहाज-ए-सिराज अपनी किताब 'तबाकत-ए-नासिरी' में लिखते हैं, "इल्तुतमिश बलबन को बहुत प्रतिभाशाली व्यक्ति मानता था इसलिए उसने उसे ऊँचा पद दिया और एक तरह से अपने हाथ पर भाग्य का बाज़ बैठा लिया. बलबन का ओहदा दिनों-दिन बढ़ता गया और कुछ दिनों में वह सुल्तान को सलाह देने वाले चालीस विशिष्ट लोगों के समूह 'तुर्कान-ए-चिहलगानी' का सदस्य बन गया."
बलबन के रसूख़ का इस तरह तेज़ी से बढ़ना उसके प्रतिद्वंद्वियों को पसंद नहीं आया और उन्होंने उसे उसके पद से हटाने के लिए साज़िश रचनी शुरू कर दी.
BBC LONDON
Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Narvada Dubey)
चित्रित धूसर मृदभाण्ड का महत्व
हड़प्पा सभ्यता के पतन से लेकर बुद्ध काल के प्रारम्भ तक की अवधि की संस्कृतियों के भौतिक परिवेश की जानकारी प्राप्त करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है
चित्रित धूसर मृद्भाण्डों ने ईसा पूर्व 1500 से 600 के बीच के सांस्कृतिक शून्यता को पाटने का कार्य किया है.
Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Narvada Dubey)
भारत सरकार अधिनियम 1935 की सबसे बड़ी आलोचना किससे संबंधित थी?
Anonymous Quiz
42%
(A) गवर्नर जनरल की निरंकुश शक्तियाँ
22%
(B) मौलिक अधिकारों की व्यवस्था
11%
(C) लोकतांत्रिक संरचना
25%
(D) प्रांतीय स्वायत्तता
👍3❤1
अप्पर :- सतपुत्र मार्ग का प्रतिपादन
तिरुज्ञानसम्बंद्र :- सतपुत्र मार्ग का प्रतिपादन
सुन्दरमूर्ति :-सतमार्ग का प्रतिपादन
मणिक्कवाचकर :- सखा मार्ग का प्रतिपादन
तिरुज्ञानसम्बंद्र :- सतपुत्र मार्ग का प्रतिपादन
सुन्दरमूर्ति :-सतमार्ग का प्रतिपादन
मणिक्कवाचकर :- सखा मार्ग का प्रतिपादन
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Forwarded from Dr.Ravi Fageria(VR Educators)
कुछ अभ्यर्थी केवल अनभिज्ञता में कूप मंडूक की तरह जीवन निर्वाह कर रहे हैं ,जिनका सही पढ़ने से कोई वास्ता नहीं है,वो बिचारे भक्ति लिए बैठे हैं जिसमें तर्क का अभाव है,
जहां तर्क नहीं होता है वहां आस्था होती है,आस्था इतनी प्रबल प्रतिगामी होती है कि वह अकारण किसी को मानने पर जोर देती है, आस्था को तर्क से मजबूत किए बिना वह मूर्खता में तब्दील होती है,और ऐसा करने वाले काल का ग्रास बनते हैं, आप मूर्ख हैं या भक्त हैं इसका पता तब चलता है जब आप अपने प्राप्त ज्ञान से ज़्यादा ज्ञान हासिल नहीं करते हैं या किसी की बात सुनने को तैयार नहीं है या अपनी मूर्खता पूर्ण कृत्य वशीभूत आनन फानन में किसी पर कॉमेंट बाजी करते हैं और पढ़ने वाले अभ्यर्थियों में भ्रम फैलाकर ख़ुद के अज्ञान को स्थापित करने का दुस्साहस करते हैं,
उनको नहीं पता कि दुनियां सापेक्ष है, इसमें कुछ भी निरपेक्ष नहीं होता है, आप थोड़ा सा अपने ग़लत ज्ञान को ठीक करने का साहस करें मिट्टी में मुंह छिपाने से आसन खतरे कम नहीं होते हैं, अपना मूल्यांकन खुद करो किसी को भगवान मानना मूर्खता है,और यह तब तक है जब तक तुम्हें कुछ नहीं आता है, इस दुनियां में सबसे बड़ी ग़लती अपने आपको दूसरों के लिए साधन बना देना है, तुम ख़ुद की कद्र करो अपना लेवल उठाओ और आसन संकटों का समाधान करो इधर उधर मुंह मत मारो, वरना मेरी बात याद रखना जिनका आज गुणगान कर रहे हो उनको गाली निकालने का मन करेगा पर निकाल नहीं पाओगे क्योंकि तुम तो भोले हो इसलिए तुम्हें तो पता भी नहीं चलेगा कि तुम्हारी असफलता का कारक भी वही लोग ही हैं जिनको तुमने खुद को समर्पित किया था,
कुछ सोशल मीडिया के फैन पेज अपनी पैड प्रमोशन करवाने में लगे हैं और भोले भाले बच्चे उन्हीं प्रतिमानों को सच मानकर आगे बढ़ते हैं और जब एग्जाम का पेपर सामने आता है तब उन्हें समझ आता है कि जिनको भगवान माना था वो असल में सामान्य भी नहीं था ...
आत्मदीपो भव
वैधानिक चेतावनी: जिसको भी इस msg से मिर्ची लगे समझना यह उसी के लिए है और उसकी भलाई के लिए है और वह चाहे तो अब भी अपने में सुधार कर सकता है,अगर फ़िर भी उसको समझ नहीं आए तो उसको मूर्खता के साथ जीना चाहिए क्योंकि इससे भक्ति परंपरा मजबूत होती है और वह नौकरी चाहे नहीं लगे पर एक अच्छा भक्त तो बन ही जाएगा
और अधिक ज्ञान चाहिए तो इसको फोलो कर सकते हैं
https://t.me/rfageria21st
जहां तर्क नहीं होता है वहां आस्था होती है,आस्था इतनी प्रबल प्रतिगामी होती है कि वह अकारण किसी को मानने पर जोर देती है, आस्था को तर्क से मजबूत किए बिना वह मूर्खता में तब्दील होती है,और ऐसा करने वाले काल का ग्रास बनते हैं, आप मूर्ख हैं या भक्त हैं इसका पता तब चलता है जब आप अपने प्राप्त ज्ञान से ज़्यादा ज्ञान हासिल नहीं करते हैं या किसी की बात सुनने को तैयार नहीं है या अपनी मूर्खता पूर्ण कृत्य वशीभूत आनन फानन में किसी पर कॉमेंट बाजी करते हैं और पढ़ने वाले अभ्यर्थियों में भ्रम फैलाकर ख़ुद के अज्ञान को स्थापित करने का दुस्साहस करते हैं,
उनको नहीं पता कि दुनियां सापेक्ष है, इसमें कुछ भी निरपेक्ष नहीं होता है, आप थोड़ा सा अपने ग़लत ज्ञान को ठीक करने का साहस करें मिट्टी में मुंह छिपाने से आसन खतरे कम नहीं होते हैं, अपना मूल्यांकन खुद करो किसी को भगवान मानना मूर्खता है,और यह तब तक है जब तक तुम्हें कुछ नहीं आता है, इस दुनियां में सबसे बड़ी ग़लती अपने आपको दूसरों के लिए साधन बना देना है, तुम ख़ुद की कद्र करो अपना लेवल उठाओ और आसन संकटों का समाधान करो इधर उधर मुंह मत मारो, वरना मेरी बात याद रखना जिनका आज गुणगान कर रहे हो उनको गाली निकालने का मन करेगा पर निकाल नहीं पाओगे क्योंकि तुम तो भोले हो इसलिए तुम्हें तो पता भी नहीं चलेगा कि तुम्हारी असफलता का कारक भी वही लोग ही हैं जिनको तुमने खुद को समर्पित किया था,
कुछ सोशल मीडिया के फैन पेज अपनी पैड प्रमोशन करवाने में लगे हैं और भोले भाले बच्चे उन्हीं प्रतिमानों को सच मानकर आगे बढ़ते हैं और जब एग्जाम का पेपर सामने आता है तब उन्हें समझ आता है कि जिनको भगवान माना था वो असल में सामान्य भी नहीं था ...
आत्मदीपो भव
वैधानिक चेतावनी: जिसको भी इस msg से मिर्ची लगे समझना यह उसी के लिए है और उसकी भलाई के लिए है और वह चाहे तो अब भी अपने में सुधार कर सकता है,अगर फ़िर भी उसको समझ नहीं आए तो उसको मूर्खता के साथ जीना चाहिए क्योंकि इससे भक्ति परंपरा मजबूत होती है और वह नौकरी चाहे नहीं लगे पर एक अच्छा भक्त तो बन ही जाएगा
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