गुरुकुल इतिहास सूरतगढ़ History for Rpsc 🇮🇳
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भारत परिषद अधिनियम, 1861
भारत परिषद् अधिनियम, 1909 (मिलें मिंटो सुधार)
भारत शासन अधिनियम, 1935 ई.
जब गांधीजी ने स्वयं हिंसा की निंदा करने से इंकार कर दिया








ध्यातव्य है कि 1942 में गांधीजी ने स्वयं हिंसा की निंदा करने से इंकार कर दिया था। इस संदर्भ में 5 अगस्त को गांधीजी ने अपने सम्बोधन में कहा था कि "मैं आपसे अपनी अहिंसा की मांग नहीं कर रहा। आप तय करें कि आपको इस संघर्ष में क्या करना है?" उनके अनुसार साम्राज्यवादी सत्ता की व्यापक हिंसा का जवाब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सत्याग्रहियों की हिंसा से दिया गया।
"हिंसा पर गांधीजी की ज्यादा आपत्ति इसलिये थी





गांधी के द्वारा हिंसा का विरोध न करने के संदर्भ में फ्रांसिस हचिंस का कहना था कि "हिंसा पर गांधीजी की ज्यादा आपत्ति इसलिये थी क्योंकि इससे जन भागीदारी में कमी आती थी, लेकिन 1942 में ऐसा नहीं हुआ था।"
हम्मीर से संबंधित साहित्य 👏
व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त करने की मांग




तत्कालीन वैश्विक घटनाक्रम, जैसे- अहस्तक्षेप के सिद्धांत (Laissez Faire) तथा नेपोलियन द्वारा लागू की गई महाद्वीपीय व्यवस्था (Continental System) से अंग्रेजों के लिये यूरोपीय व्यापार के मार्ग लगभग अवरुद्ध हो गए, फलतः अन्य सभी यह चाहते थे कि कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया जाये।
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यह बलुआ पत्थर से बनी एक मूर्ति है जिसमें उमा-महेश्वर, यानी शिव और उनकी पत्नी पार्वती को दर्शाया गया है। यह हिंदू कला का एक महत्वपूर्ण नमूना है, जो संभवतः 8वीं से 11वीं शताब्दी ईस्वी के बीच का है।
इस मूर्ति में शिव और पार्वती एक साथ बैठे हुए दिखाए गए हैं, जिसमें शिव अपनी पत्नी को स्नेहपूर्वक गले लगा रहे हैं।
इस मूर्ति में भगवान विष्णु को शेषाशयी विष्णु के कुंडलियों पर विश्राम करते हुए लेटी हुई मुद्रा में दर्शाया गया है।
उनकी पत्नी लक्ष्मी को अक्सर उनके चरणों में बैठे हुए दिखाया जाता है, जैसा कि इस चित्र में देखा जा सकता है।
यह मूर्ति 10वीं शताब्दी ईस्वी की एक पत्थर की नक्काशी है जो हिंदू पौराणिक कथा लिंगोद्भवको दर्शाती है , और वर्तमान में राजस्थान के अजमेर स्थित सरकारी संग्रहालय में रखी हुई है।
यह कलाकृति उस कहानी को दर्शाती है जिसमें देवता ब्रह्मा और विष्णु अग्नि के एक ब्रह्मांडीय स्तंभ (लिंगम) की शुरुआत या अंत का पता लगाने में असफल रहते हैं, जिससे भगवान शिव अपनी सर्वोच्च स्थिति को साबित करने के लिए प्रकट होते हैं।
वराह विष्णु के दस अवतारों में से तीसरा अवतार है, जिसे दशावतार के नाम से जाना जाता है।
यह मूर्ति उस कहानी को दर्शाती है जिसमें विष्णु, एक सूअर के रूप में, पृथ्वी देवी भूदेवी को ब्रह्मांडीय सागर से बचाते हैं, जब एक राक्षस ने उन्हें वहां छिपा दिया था।
यह विशिष्ट विशालकाय, अखंड बलुआ पत्थर की मूर्ति 10वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी की है और यह भारत के अजमेर में स्थित राजस्थान राज्य संग्रहालय में है।
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राजस्थान राज्य संग्रहालय अजमेर 👆👆
अंग्रेजों द्वारा सम्पादित प्रमुख समाचार पत्र
अबुल कलाम आज़ाद (1888-1958):
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