रुकना मत एक ख़ूबसूरत मोड़ आएगा
और सब बदल जाएगा..❤️✅
और सब बदल जाएगा..❤️✅
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खुद से बातें ......!❤
तुम्हारी कोई बात मुझे पसंद नहीं है। सिवाय जब तक तुम यह बोलने के लायक नहीं हो कि 'मेरा सिलेक्शन 'हो गया है।📚🎊🏆
📚✍ @iasipsmotivation
आईएएस बनने वाले कोई अलग समाचार पत्र पत्रिकाएं और किताबें नहीं पढ़ते। वह हर एक किताब को पाठ्यक्रम के अनुसार और एक अलग ही ढंग से पढ़ते हैं।
तुम्हारी कोई बात मुझे पसंद नहीं है। सिवाय जब तक तुम यह बोलने के लायक नहीं हो कि 'मेरा सिलेक्शन 'हो गया है।📚🎊🏆
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आईएएस बनने वाले कोई अलग समाचार पत्र पत्रिकाएं और किताबें नहीं पढ़ते। वह हर एक किताब को पाठ्यक्रम के अनुसार और एक अलग ही ढंग से पढ़ते हैं।
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"अगर कोई हमसे हमारे मम्मी-पापा के बारे में पूछे, तो हम यही कहेंगे कि वो बहुत प्यारे और खुशमिजाज हैं। पर अगर कोई गहराई में जाकर पूछेगा, तो हमारी आँखें भर आएंगी।
सच तो ये है कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी में बहुत कुछ सहा है, हमारी नज़र में वो दुनिया के सबसे मज़बूत इंसान हैं। हमने उन्हें संघर्ष करते देखा है, चुपचाप रोते देखा है और अपनी हर लड़ाई अकेले लड़ते देखा है। इतना सब झेलने के बाद भी, उन्होंने खुद को सिर्फ इसलिए संभाला ताकि वो हम सबको खुश रख सकें। ❤️
सच तो ये है कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी में बहुत कुछ सहा है, हमारी नज़र में वो दुनिया के सबसे मज़बूत इंसान हैं। हमने उन्हें संघर्ष करते देखा है, चुपचाप रोते देखा है और अपनी हर लड़ाई अकेले लड़ते देखा है। इतना सब झेलने के बाद भी, उन्होंने खुद को सिर्फ इसलिए संभाला ताकि वो हम सबको खुश रख सकें। ❤️
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आखिर क्यों ❓
● आखिर क्यों हम एक किताब 10 बार पढ़ने की बजाय 10 तरह की किताबें पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं !
Ex . - सिविल सेवा की तैयारी करने वाला छात्र अपने घर को लाइब्रेरी बनाकर बैठ जाता है ... सफलता बहुत सी किताबें पढ़ने से नहीं बल्कि एक किताब को बहुत बार पढ़ने से मिलती है
● आखिर क्यों हम सीखने के समय में सीखने की बजाय सिखाना ज्यादा पसंद करते हैं !
Ex . - हर रोज प्रतियोगी छात्र फरमान जारी करते हैं ...मैं आईएएस की तैयारी के लिए ग्रुप बना रहा हूँ ... अपना no .कमेंट बॉक्स में लिखिए ......" मेरे प्यारे भाई इस समय आपका एक एक सेकंड अमूल्य है ...कृपया पहले आप बन जाइये फिर और ज्यादा ऊर्जा और संसाधनों के साथ आप सबकी मदद कर पाएंगे "
● आखिर क्यों हम एक ही मार्गदर्शक पर यकीन नहीं रख पाते हर रोज नए मार्गदर्शक की खोज में लगे रहते हैं ...सभी का अपना एक अलग तरीका होता है ...और उस चक्कर में आपकी अपनी तैयारी कभी पटरी में आ ही नहीं पाती ...हमेशा नयी शुरुआत करते रह जाते हैं !
● आखिर क्यों हम सब सपने तो हमेशा बड़े देखते हैं लेकिन मात्र 10 प्रतिशत लोग ही उसकी कीमत चुकाने को तैयार होते हैं !
Ex . - बनना तो कलेक्टर ही है पर 8 घंटे सोना नहीं छोड़ सकते ....और न ही 8 घंटे पढ़ने में मन लग सकता ...तो भाई इंतजार करो शायद कोई बाबा किसी घुंटी का अविष्कार कर दे ...जो आपको सीधे मसूरी भेज दे
● आखिर क्यों हम हर काम या नयी शुरुआत को कल पर टाल देते हैं ....और वो भी इतने यकीन के साथ जैसे हम कल का दिन देखने ही वाले हों !
● आखिर क्यों अपने ही मष्तिष्क पर हमारा नियंत्रण नहीं रह पाता....हम जानते हैं कि इस समय ये चीजें हमारे लिए बुरी हैं पर फिर भी हम कर डालते हैं ...और बाद में खुद को समझा देते हैं कि आगे से ऐसा नहीं होगा और फिर अगली बार होता है ...और फिर से आप यही लाइन दोहरा लेते हैं !
● आखिर क्यों हम अपने समय की कीमत नहीं समझ पाते और उसे यूँ बर्बाद करते हैं जैसे ऊपर वाले के साथ 500 साल का एग्रीमेंट करके आये हो .....जरा सोच लो अगर अगले ही पल आपके सामने मौत खड़ी हो ..तो क्या छोड़ कर जा रहे हो यहाँ जिससे लोग आपको याद रखें .."" कुछ नहीं किया अब तक मेरे भाई ..मत सोच इतना "" ?
● आखिर क्यों हम हर दिन कुछ नया पढ़ते हैं ..." .जैसे फेसबुक में में ही कोई नया मोटिवेशनल थॉट ही लेलो " .......और उसके नीचे " wavvv " का कमेंट भी कर देते हैं .... जरा सोचो कि कितनी बार अपने ऐसा किया ? ...शायद सैकड़ों बार .....पर उसमें से कितनी लाइन्स को खुद की जिंदगी पर लागू किया ..? ..अगर एक लाइन भी लागू कर देते मेरे भाई तो आपकी जिंदगी उसी वक़्त बदल जाती ....!!
● आखिर क्यों हम एक किताब 10 बार पढ़ने की बजाय 10 तरह की किताबें पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं !
Ex . - सिविल सेवा की तैयारी करने वाला छात्र अपने घर को लाइब्रेरी बनाकर बैठ जाता है ... सफलता बहुत सी किताबें पढ़ने से नहीं बल्कि एक किताब को बहुत बार पढ़ने से मिलती है
● आखिर क्यों हम सीखने के समय में सीखने की बजाय सिखाना ज्यादा पसंद करते हैं !
Ex . - हर रोज प्रतियोगी छात्र फरमान जारी करते हैं ...मैं आईएएस की तैयारी के लिए ग्रुप बना रहा हूँ ... अपना no .कमेंट बॉक्स में लिखिए ......" मेरे प्यारे भाई इस समय आपका एक एक सेकंड अमूल्य है ...कृपया पहले आप बन जाइये फिर और ज्यादा ऊर्जा और संसाधनों के साथ आप सबकी मदद कर पाएंगे "
● आखिर क्यों हम एक ही मार्गदर्शक पर यकीन नहीं रख पाते हर रोज नए मार्गदर्शक की खोज में लगे रहते हैं ...सभी का अपना एक अलग तरीका होता है ...और उस चक्कर में आपकी अपनी तैयारी कभी पटरी में आ ही नहीं पाती ...हमेशा नयी शुरुआत करते रह जाते हैं !
● आखिर क्यों हम सब सपने तो हमेशा बड़े देखते हैं लेकिन मात्र 10 प्रतिशत लोग ही उसकी कीमत चुकाने को तैयार होते हैं !
Ex . - बनना तो कलेक्टर ही है पर 8 घंटे सोना नहीं छोड़ सकते ....और न ही 8 घंटे पढ़ने में मन लग सकता ...तो भाई इंतजार करो शायद कोई बाबा किसी घुंटी का अविष्कार कर दे ...जो आपको सीधे मसूरी भेज दे
● आखिर क्यों हम हर काम या नयी शुरुआत को कल पर टाल देते हैं ....और वो भी इतने यकीन के साथ जैसे हम कल का दिन देखने ही वाले हों !
● आखिर क्यों अपने ही मष्तिष्क पर हमारा नियंत्रण नहीं रह पाता....हम जानते हैं कि इस समय ये चीजें हमारे लिए बुरी हैं पर फिर भी हम कर डालते हैं ...और बाद में खुद को समझा देते हैं कि आगे से ऐसा नहीं होगा और फिर अगली बार होता है ...और फिर से आप यही लाइन दोहरा लेते हैं !
● आखिर क्यों हम अपने समय की कीमत नहीं समझ पाते और उसे यूँ बर्बाद करते हैं जैसे ऊपर वाले के साथ 500 साल का एग्रीमेंट करके आये हो .....जरा सोच लो अगर अगले ही पल आपके सामने मौत खड़ी हो ..तो क्या छोड़ कर जा रहे हो यहाँ जिससे लोग आपको याद रखें .."" कुछ नहीं किया अब तक मेरे भाई ..मत सोच इतना "" ?
● आखिर क्यों हम हर दिन कुछ नया पढ़ते हैं ..." .जैसे फेसबुक में में ही कोई नया मोटिवेशनल थॉट ही लेलो " .......और उसके नीचे " wavvv " का कमेंट भी कर देते हैं .... जरा सोचो कि कितनी बार अपने ऐसा किया ? ...शायद सैकड़ों बार .....पर उसमें से कितनी लाइन्स को खुद की जिंदगी पर लागू किया ..? ..अगर एक लाइन भी लागू कर देते मेरे भाई तो आपकी जिंदगी उसी वक़्त बदल जाती ....!!
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कलियुग का दृष्टिकोण देखिए
यहाँ दूसरों की पीड़ा को लोग
“कर्मों का दंड” कहते हैं
और स्वयं की पीड़ा को “जीवन की परीक्षा।"
कलियुग का दृष्टिकोण देखिए
यहाँ दूसरों की पीड़ा को लोग
“कर्मों का दंड” कहते हैं
और स्वयं की पीड़ा को “जीवन की परीक्षा।"
❤67👍17🐳3
कुछ चीज़ें जितनी संभालने की कोशिश करो,
उतनी ही हाथों से फिसल जाती हैं
हम सोचते हैं कि बचा लेंगे थाम लेंगे,
पर अक्सर वही चीज़ें खो जाती हैं
जिन्हें हम सबसे ज़्यादा बचाना चाहते हैं।
कभी रिश्ते...
कभी लोग
कभी कोई ख़ास लम्हा
जिन्हें हम दिल से सहेजते हैं,
वक़्त ही उन्हें हमसे चुपचाप छीन लेता है
शायद इसलिए,
कभी कभी थामना नहीं,
बस जाने देना ही सही रहता है..
उतनी ही हाथों से फिसल जाती हैं
हम सोचते हैं कि बचा लेंगे थाम लेंगे,
पर अक्सर वही चीज़ें खो जाती हैं
जिन्हें हम सबसे ज़्यादा बचाना चाहते हैं।
कभी रिश्ते...
कभी लोग
कभी कोई ख़ास लम्हा
जिन्हें हम दिल से सहेजते हैं,
वक़्त ही उन्हें हमसे चुपचाप छीन लेता है
शायद इसलिए,
कभी कभी थामना नहीं,
बस जाने देना ही सही रहता है..
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दुर्योधन ने श्री कृष्ण की
पूरी नारायणी सेना मांग ली थी,
और अर्जुन ने केवल श्री कृष्ण को मांगा था।
उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन की
चुटकी (मजाक) लेते हुए कहा:
“हार निश्चित हैं तेरी, हर दम रहेगा उदास।
माखन दुर्योधन ले गया, केवल छाछ बची तेरे पास।”
अर्जुन ने कहा :”हे प्रभु,
जीत निश्चित हैं मेरी, दास हो नहीं सकता उदास।
माखन लेकर क्या करूँ, जब माखन चोर हैं मेरे पास...!!"
नारायण 🙏
पूरी नारायणी सेना मांग ली थी,
और अर्जुन ने केवल श्री कृष्ण को मांगा था।
उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन की
चुटकी (मजाक) लेते हुए कहा:
“हार निश्चित हैं तेरी, हर दम रहेगा उदास।
माखन दुर्योधन ले गया, केवल छाछ बची तेरे पास।”
अर्जुन ने कहा :”हे प्रभु,
जीत निश्चित हैं मेरी, दास हो नहीं सकता उदास।
माखन लेकर क्या करूँ, जब माखन चोर हैं मेरे पास...!!"
नारायण 🙏
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ऑनर किलिंग ("सम्मान के नाम पर हत्या"): समाज का एक काला और हिंसक सच
ऑनर किलिंग हमारे समाज की एक अत्यंत गंभीर और दमनकारी कुप्रथा है, जिसमें परिवार की मर्जी के खिलाफ प्रेम विवाह करने या अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने पर लड़के या लड़की की निर्मम हत्या कर दी जाती है। विशेष रूप से हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में यह समस्या गहरी पितृसत्तात्मक सोच और जातिगत कट्टरता के कारण अधिक दिखाई देती है। अक्सर 'परिवार की इज्जत' बचाने के नाम पर इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया जाता है, जहाँ बेटियों को व्यक्तिगत पसंद के बजाय वंश के सम्मान का प्रतीक मान लिया जाता है। दुखद बात यह है कि आज के डिजिटल युग में भी जब ऐसी खबरें सामने आती हैं, तो सोशल मीडिया पर एक बड़ा वर्ग "सही किया" या "जो बाप की नहीं हुई, वो किसी और की क्या होगी" जैसे असंवेदनशील कमेंट्स करके इस हिंसा का समर्थन करता है। इस तरह की सोच यह दर्शाती है कि समाज का एक हिस्सा
आज भी बेटियों को इंसान न समझकर पिता या परिवार की 'संपत्ति' समझता है, जिनका अपना कोई अस्तित्व या इच्छा नहीं होनी चाहिए।
खाप पंचायतों के कड़े नियम और अंतरजातीय विवाह का कट्टर विरोध इस मानसिक और शारीरिक हिंसा को और बढ़ावा देते हैं। वास्तव में, किसी की जान लेना कभी भी सम्मान की बात नहीं हो सकती, बल्कि यह सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन और भारतीय संविधान द्वारा दिए गए 'जीने के अधिकार' का हनन है। कानून की दृष्टि में यह एक 'दुर्लभतम' (Rare of rarest) अपराध है जिसकी सजा मृत्युदंड तक हो सकती है। इस सामाजिक बुराई और हिंसक मानसिकता को जड़ से खत्म करने के लिए केवल कड़े कानून ही काफी नहीं हैं, बल्कि समाज की सोच में बुनियादी बदलाव और युवाओं के अधिकारों के प्रति वास्तविक सम्मान की नितांत आवश्यकता है।
इसपर आपकी राय जरूर bataye।
ऑनर किलिंग हमारे समाज की एक अत्यंत गंभीर और दमनकारी कुप्रथा है, जिसमें परिवार की मर्जी के खिलाफ प्रेम विवाह करने या अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने पर लड़के या लड़की की निर्मम हत्या कर दी जाती है। विशेष रूप से हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में यह समस्या गहरी पितृसत्तात्मक सोच और जातिगत कट्टरता के कारण अधिक दिखाई देती है। अक्सर 'परिवार की इज्जत' बचाने के नाम पर इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया जाता है, जहाँ बेटियों को व्यक्तिगत पसंद के बजाय वंश के सम्मान का प्रतीक मान लिया जाता है। दुखद बात यह है कि आज के डिजिटल युग में भी जब ऐसी खबरें सामने आती हैं, तो सोशल मीडिया पर एक बड़ा वर्ग "सही किया" या "जो बाप की नहीं हुई, वो किसी और की क्या होगी" जैसे असंवेदनशील कमेंट्स करके इस हिंसा का समर्थन करता है। इस तरह की सोच यह दर्शाती है कि समाज का एक हिस्सा
आज भी बेटियों को इंसान न समझकर पिता या परिवार की 'संपत्ति' समझता है, जिनका अपना कोई अस्तित्व या इच्छा नहीं होनी चाहिए।
खाप पंचायतों के कड़े नियम और अंतरजातीय विवाह का कट्टर विरोध इस मानसिक और शारीरिक हिंसा को और बढ़ावा देते हैं। वास्तव में, किसी की जान लेना कभी भी सम्मान की बात नहीं हो सकती, बल्कि यह सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन और भारतीय संविधान द्वारा दिए गए 'जीने के अधिकार' का हनन है। कानून की दृष्टि में यह एक 'दुर्लभतम' (Rare of rarest) अपराध है जिसकी सजा मृत्युदंड तक हो सकती है। इस सामाजिक बुराई और हिंसक मानसिकता को जड़ से खत्म करने के लिए केवल कड़े कानून ही काफी नहीं हैं, बल्कि समाज की सोच में बुनियादी बदलाव और युवाओं के अधिकारों के प्रति वास्तविक सम्मान की नितांत आवश्यकता है।
इसपर आपकी राय जरूर bataye।
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