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नेता ने गेट पर आधा दर्जन महिलाएं रख ली बाउंसर के तौर पर
जैसे ही पत्तलकार ने घुसने की कोशिश की तो महिला बाउंसर चिपट गयी
सोचिये यदि महिला की जगह पुरुष होते तो यह पत्तलकार विरोध करता, छीना झपटी होती और फिर इसे पत्रकारिता पर हमला कह के प्रचारित किया जाता जिससे नेता जी घेर लिए जाते
मगर महिला बाउंसर होने की वजह से पत्तलकार खुद भागता नजर आ रिया है
कहीं मोलेस्टेशन का केस न हो जाये छीना झपटी के चक्कर में
मास्टर स्ट्रोक बाय नेता जी
जैसे ही पत्तलकार ने घुसने की कोशिश की तो महिला बाउंसर चिपट गयी
सोचिये यदि महिला की जगह पुरुष होते तो यह पत्तलकार विरोध करता, छीना झपटी होती और फिर इसे पत्रकारिता पर हमला कह के प्रचारित किया जाता जिससे नेता जी घेर लिए जाते
मगर महिला बाउंसर होने की वजह से पत्तलकार खुद भागता नजर आ रिया है
कहीं मोलेस्टेशन का केस न हो जाये छीना झपटी के चक्कर में
मास्टर स्ट्रोक बाय नेता जी
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ब्लॉगिंग हो तो ऐसी
वाह मोहम्मद आजम जी, आपकी सच्ची पत्रकारिता को नमन चहुपे
वाह मोहम्मद आजम जी, आपकी सच्ची पत्रकारिता को नमन चहुपे
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शहर की डेमोग्राफि बदलते ही शरिया कानून लागू करने की शुरुआत हो चुकी है
भाईचारा गया तेल लेने, सेक्युलरिज्म की ऐसी तैसी
ये भाईचारा और सेक्युलरिज्म तब तक है जब तक उनकी आबादी कम है
भाईचारा गया तेल लेने, सेक्युलरिज्म की ऐसी तैसी
ये भाईचारा और सेक्युलरिज्म तब तक है जब तक उनकी आबादी कम है
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योगी जी आपने पैतृक गाँव पहुँचे तो कई भावुक कर देने वाली तस्वीरें आई
बच्चे, बूढे, जवान सभी उनका स्वागत करते दिखे
खुशियां हो भी क्यों ना
जिसको बचपन में पाला पोसा, वह आज करोडों लोगों के आँसू पोछ रहा है
बहुत सुंदर दृश्य
बच्चे, बूढे, जवान सभी उनका स्वागत करते दिखे
खुशियां हो भी क्यों ना
जिसको बचपन में पाला पोसा, वह आज करोडों लोगों के आँसू पोछ रहा है
बहुत सुंदर दृश्य
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कानपुर में कपड़ा व्यपारी रईस आलम के बेटे का 16 अगस्त को जन्मदिन था
भाऊ सीढ़ी वाले ने 15 अगस्त रात के 11:59 PM पर एक मैसेज लोगों को भेजना शुरू कर दिया कि "अगले 16 मिनट तक हर माल 16 रुपये में"
चूंकि ये आसपास मोहल्ला भाई जॉन लोगो का है तो ये मैसेज इनके मजहबी ग्रुप्स में तेजी से फैला और वायरल हो गया
देखिये कैसे भीड़ चल निकली रईस आलम के दुकान की ओर
भगदड़ मच गई, अफरातफरी का माहौल हो गया
रईस आलम की गांड फट गई, शटर बन्द करके भागा
पुलिस ने अब सुसंगत धाराओं में मामला दर्ज कर लिया है
भाऊ सीढ़ी वाले ने 15 अगस्त रात के 11:59 PM पर एक मैसेज लोगों को भेजना शुरू कर दिया कि "अगले 16 मिनट तक हर माल 16 रुपये में"
चूंकि ये आसपास मोहल्ला भाई जॉन लोगो का है तो ये मैसेज इनके मजहबी ग्रुप्स में तेजी से फैला और वायरल हो गया
देखिये कैसे भीड़ चल निकली रईस आलम के दुकान की ओर
भगदड़ मच गई, अफरातफरी का माहौल हो गया
रईस आलम की गांड फट गई, शटर बन्द करके भागा
पुलिस ने अब सुसंगत धाराओं में मामला दर्ज कर लिया है
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बागपत के बैटल के बाद पेश है फतेहपुर का छोटका युद्ध
फतेहपुर प्रशासन की पोल खोलता दृश्य
फतेहपुर प्रशासन की पोल खोलता दृश्य
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डॉक्टर विशाल चतुर्वेदी नीब करौरी बाबा की जीवनी सिल्वर स्क्रीन पर उतारना चाहते थे। इसलिए उन्होंने रिसर्च शुरू की।
2009 में रिसर्च शुरू हुई, 2017 तक आते आते व्यवस्थित कहानियाँ शेप लेने गई। फिर 2023 में रिसर्च का दायरा बढ़ाया गया। किताबें पढ़ी, वृंदावन, अकबरपुर, लखनऊ और नीम करौली की यात्राएँ की। लोगों से बातचीत से डेटा तैयार किया।
स्क्रिप्ट तैयार हुई। विशाल ने कहानी को वेब सीरीज में लाने के लिए ओटीटी से संपर्क साधा। किंतु उन्हें बिग नो मिला। क्योंकि ओटीटी संतों की कहानी में निवेश नहीं करना चाहता था।
ओटीटी के रिजेक्शन के बाद विशाल ने ठान लिया था कि हर हाल में फ़िल्म बनायेंगे। आर्थिक समस्या आई। कई साल तक निवेश के लिए भटके, चूँकि फ़िल्म में बड़े कलाकार नहीं थे इसलिए कोई पैसा लगाने को तैयार नहीं था। आख़िरकार कुछ लोग मिले, जिन्होंने विशाल पर भरोसा किया।
विशाल चाहते थे कि महाराज जी के किरदार के लिए ऐसा चेहरा चाहिए था जिसकी पहले से कोई स्थापित स्टार-इमेज न हो और जिसके व्यक्तिगत आचरण से किरदार की गरिमा प्रभावित न हो।
विशाल मानते है कि धार्मिक कंटेंट में सिर्फ़ रिसर्च पर्याप्त नहीं होती है। फिल्मकार को विषय के प्रति श्रद्धा और विश्वास भी होना चाहिए, क्योंकि दर्शकों की आस्था उससे जुड़ी होती है।
इसी वजह से उन्होंने कास्टिंग तक में अलग मानदंड अपनाया। कलाकार का अभिनय ही पर्याप्त नहीं था। उसका व्यवहार भी देखा गया। उसकी जीवन-शैली भी महत्वपूर्ण थी। किरदार की गरिमा को नुकसान न पहुंचे, इसका ध्यान रखा गया
पूरा सेट शाकाहारी रखा गया, रोज आरती होती थी और हनुमान चालीसा का पाठ किया जाता था।
और फिर प्रोडक्शन के दौरान एक वास्तविक संकट भी आया। जिस अभिनेता को मुख्य भूमिका के लिए चुना गया था, वह बीमार पड़ गया। तब फिल्म के सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर शोभिनव सत्य, जो प्रॉप्स आदि संभाल रहे थे, को मुख्य भूमिका दी गई।
हनुमान बाबा ने शोभिनव को चुना था।
विशाल के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी कि वे बाबा की चमत्कारिक छवि से इतर बाबा की “लीलाओं”, मानवीय भावनाओं, कम्पैशन, सर्विस और सामाजिक परिवर्तन पर था। इसलिए इस सेगमेंट में निर्देशक विशाल का क्रिएटिविटी शानदार रही है।
तभी तो फ़िल्म धीरे धीरे लोगों से जुड़ रही है और बॉक्स ऑफ़िस पर अच्छा होल्ड कर रखा है। फ़िल्म ने अभी तक 12 करोड़ की कमाई कर ली।
विशाल बाबा की जीवनी को ट्राइलॉजी में उतारने वाले है। अर्थात् अभी दो भाग आयेंगे। भारतीय सिनेमा में सनातनी संतों की कहानी पर बहुत कम फोकस रहा है या कहे इग्नोर किए जाते है। विशाल के प्रयास के बाद उन फ़िल्म मेकर्स को हौसला मिलेगा, जिनके पास ऐसी कहानियाँ कहने को है या रिसर्च करके बैठे है।
हनुमान अंश अच्छी क्रिएटिव बायोपिक है। नीब करौरी बाबा की लीलाओं से समाज के परिवर्तन को दिखलाया है।
2009 में रिसर्च शुरू हुई, 2017 तक आते आते व्यवस्थित कहानियाँ शेप लेने गई। फिर 2023 में रिसर्च का दायरा बढ़ाया गया। किताबें पढ़ी, वृंदावन, अकबरपुर, लखनऊ और नीम करौली की यात्राएँ की। लोगों से बातचीत से डेटा तैयार किया।
स्क्रिप्ट तैयार हुई। विशाल ने कहानी को वेब सीरीज में लाने के लिए ओटीटी से संपर्क साधा। किंतु उन्हें बिग नो मिला। क्योंकि ओटीटी संतों की कहानी में निवेश नहीं करना चाहता था।
ओटीटी के रिजेक्शन के बाद विशाल ने ठान लिया था कि हर हाल में फ़िल्म बनायेंगे। आर्थिक समस्या आई। कई साल तक निवेश के लिए भटके, चूँकि फ़िल्म में बड़े कलाकार नहीं थे इसलिए कोई पैसा लगाने को तैयार नहीं था। आख़िरकार कुछ लोग मिले, जिन्होंने विशाल पर भरोसा किया।
विशाल चाहते थे कि महाराज जी के किरदार के लिए ऐसा चेहरा चाहिए था जिसकी पहले से कोई स्थापित स्टार-इमेज न हो और जिसके व्यक्तिगत आचरण से किरदार की गरिमा प्रभावित न हो।
विशाल मानते है कि धार्मिक कंटेंट में सिर्फ़ रिसर्च पर्याप्त नहीं होती है। फिल्मकार को विषय के प्रति श्रद्धा और विश्वास भी होना चाहिए, क्योंकि दर्शकों की आस्था उससे जुड़ी होती है।
इसी वजह से उन्होंने कास्टिंग तक में अलग मानदंड अपनाया। कलाकार का अभिनय ही पर्याप्त नहीं था। उसका व्यवहार भी देखा गया। उसकी जीवन-शैली भी महत्वपूर्ण थी। किरदार की गरिमा को नुकसान न पहुंचे, इसका ध्यान रखा गया
पूरा सेट शाकाहारी रखा गया, रोज आरती होती थी और हनुमान चालीसा का पाठ किया जाता था।
और फिर प्रोडक्शन के दौरान एक वास्तविक संकट भी आया। जिस अभिनेता को मुख्य भूमिका के लिए चुना गया था, वह बीमार पड़ गया। तब फिल्म के सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर शोभिनव सत्य, जो प्रॉप्स आदि संभाल रहे थे, को मुख्य भूमिका दी गई।
हनुमान बाबा ने शोभिनव को चुना था।
विशाल के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी कि वे बाबा की चमत्कारिक छवि से इतर बाबा की “लीलाओं”, मानवीय भावनाओं, कम्पैशन, सर्विस और सामाजिक परिवर्तन पर था। इसलिए इस सेगमेंट में निर्देशक विशाल का क्रिएटिविटी शानदार रही है।
तभी तो फ़िल्म धीरे धीरे लोगों से जुड़ रही है और बॉक्स ऑफ़िस पर अच्छा होल्ड कर रखा है। फ़िल्म ने अभी तक 12 करोड़ की कमाई कर ली।
विशाल बाबा की जीवनी को ट्राइलॉजी में उतारने वाले है। अर्थात् अभी दो भाग आयेंगे। भारतीय सिनेमा में सनातनी संतों की कहानी पर बहुत कम फोकस रहा है या कहे इग्नोर किए जाते है। विशाल के प्रयास के बाद उन फ़िल्म मेकर्स को हौसला मिलेगा, जिनके पास ऐसी कहानियाँ कहने को है या रिसर्च करके बैठे है।
हनुमान अंश अच्छी क्रिएटिव बायोपिक है। नीब करौरी बाबा की लीलाओं से समाज के परिवर्तन को दिखलाया है।
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