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भगवान केदारनाथ के रोचक रहस्य क्या हैं?
400 साल तक बर्फ में दबे रहे केदारेश्वर मंदिर के 6 रहस्य
भारतीय राज्य उत्तराखंड में गिरिराज हिमालय की केदार नामक चोटी पर स्थित देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक सर्वोच्च केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मंदिर बना हुआ है। रहस्यों से भरे इस केदारनाथ धाम और मंदिर के संबंध में कई कथाएं जुड़ी हुई हैं। आओ जानते हैं कि कब और क्यों केदारनाथ का मंदिर 400 साल तक बर्फ में दबा रहा और क्या है इस मंदिर के पांच रहस्य।
1. पहला रहस्य :
केदारनाथ धाम में एक तरफ करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदार, दूसरी तरफ 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड का पहाड़। न सिर्फ 3 पहाड़ बल्कि 5 नदियों का संगम भी है यहां- मंदाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी। इन नदियों में अलकनंदा की सहायक मंदाकिनी आज भी मौजूद है। इसी के किनारे है केदारेश्वर धाम। यहां सर्दियों में भारी बर्फ और बारिश में जबरदस्त पानी रहता है।
2. दूसरा रहस्य
यह मंदिर कटवां पत्थरों के भूरे रंग के विशाल और मजबूत शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर खड़े 85 फुट ऊंचे, 187 फुट लंबे और 80 फुट चौड़े मंदिर की दीवारें 12 फुट मोटी हैं। यह आश्चर्य ही है कि इतने भारी पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर व तराशकर कैसे मंदिर की शक्ल दी गई होगी? खासकर यह विशालकाय छत कैसे खंभों पर रखी गई? पत्थरों को एक-दूसरे में जोड़ने के लिए इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।
3. तीसरा रहस्य :
यह मंदिर मौजूदा मंदिर के पीछे सर्वप्रथम पांडवों ने बनवाया था, लेकिन वक्त के थपेड़ों की मार के चलते यह मंदिर लुप्त हो गया। तब इस मंदिर का निर्माण 508 ईसा पूर्व जन्मे और 476 ईसा पूर्व देहत्याग गए आदिशंकराचार्य ने करवाया था। इस मंदिर के पीछे ही उनकी समाधि है। इसका गर्भगृह अपेक्षाकृत प्राचीन है जिसे 80वीं शताब्दी के लगभग का माना जाता है। पहले 10वीं सदी में मालवा के राजा भोज द्वारा और फिर 13वीं सदी में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया।
4. चौथा रहस्य :
दीपावली महापर्व के दूसरे दिन के दिन शीत ऋतु में मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। 6 माह तक मंदिर के अंदर दीपक जलता रहता है। पुरोहित ससम्मान पट बंद कर भगवान के विग्रह एवं दंडी को 6 माह तक पहाड़ के नीचे ऊखीमठ में ले जाते हैं। 6 माह बाद मई माह में केदारनाथ के कपाट खुलते हैं, तब उत्तराखंड की यात्रा आरंभ होती है। 6 माह मंदिर और उसके आसपास कोई नहीं रहता है। लेकिन आश्चर्य की बात कि 6 माह तक दीपक भी जलता रहता और निरंतर पूजा भी होती रहती है। कपाट खुलने के बाद यह भी आश्चर्य का विषय है कि वैसी की वैसी ही साफ-सफाई मिलती है, जैसी कि छोड़कर गए थे।
5. पांचवां रहस्य
16 जून 2013 की रात प्रकृति ने कहर बरपाया था। जलप्रलय से कई बड़ी-बड़ी और मजबूत इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढहकर पानी में बह गईं, लेकिन केदारनाथ के मंदिर का कुछ नहीं बिगड़ा। आश्चर्य तो तब हुआ, जब पीछे पहाड़ी से पानी के बहाव में लुढ़कती हुई विशालकाय चट्टान आई और अचानक वह मंदिर के पीछे ही रुक गई! उस चट्टान के रुकने से बाढ़ का जल 2 भागों में विभक्त हो गया और मंदिर कहीं ज्यादा सुरक्षित हो गया। इस प्रलय में लगभग 10 हजार लोगों की मौत हो गई थी।
6. छठा रहस्य :
पुराणों की भविष्यवाणी के अनुसार इस समूचे क्षेत्र के तीर्थ लुप्त हो जाएंगे। माना जाता है कि जिस दिन नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे, बद्रीनाथ का मार्ग पूरी तरह बंद हो जाएगा और भक्त बद्रीनाथ के दर्शन नहीं कर पाएंगे। पुराणों के अनुसार वर्तमान बद्रीनाथ धाम और केदारेश्वर धाम लुप्त हो जाएंगे और वर्षों बाद भविष्य में 'भविष्यबद्री' नामक नए तीर्थ का उद्गम होगा।
मित्रो, अब जानिए 400 सालों तक कैसे बर्फ में दबा रहा केदारनाथ का मंदिर और जब बर्फ से बाहर निकला तो पूर्णत: सुरक्षित था। देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट के हिमालयन जियोलॉजिकल वैज्ञानिक विजय जोशी के अनुसार 13वीं से 17वीं शताब्दी तक यानी 400 साल तक एक छोटा हिमयुग आया था जिसमें हिमालय का एक बड़ा क्षेत्र बर्फ के अंदर दब गया था। उसमें यह मंदिर क्षेत्र भी था। वैज्ञानिकों के अनुसार मंदिर की दीवार और पत्थरों पर आज भी इसके निशान देखे जा सकते हैं।
दरअसल, केदारनाथ का यह इलाका चोराबरी ग्लैशियर का एक हिस्सा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लैशियरों के लगातार पिघलते रहने और चट्टानों के खिसकते रहने से आगे भी इस तरह का जलप्रलय या अन्य प्राकृतिक आपदाएं जारी रहेंगी।
400 साल तक बर्फ में दबे रहे केदारेश्वर मंदिर के 6 रहस्य
भारतीय राज्य उत्तराखंड में गिरिराज हिमालय की केदार नामक चोटी पर स्थित देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक सर्वोच्च केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मंदिर बना हुआ है। रहस्यों से भरे इस केदारनाथ धाम और मंदिर के संबंध में कई कथाएं जुड़ी हुई हैं। आओ जानते हैं कि कब और क्यों केदारनाथ का मंदिर 400 साल तक बर्फ में दबा रहा और क्या है इस मंदिर के पांच रहस्य।
1. पहला रहस्य :
केदारनाथ धाम में एक तरफ करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदार, दूसरी तरफ 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड का पहाड़। न सिर्फ 3 पहाड़ बल्कि 5 नदियों का संगम भी है यहां- मंदाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी। इन नदियों में अलकनंदा की सहायक मंदाकिनी आज भी मौजूद है। इसी के किनारे है केदारेश्वर धाम। यहां सर्दियों में भारी बर्फ और बारिश में जबरदस्त पानी रहता है।
2. दूसरा रहस्य
यह मंदिर कटवां पत्थरों के भूरे रंग के विशाल और मजबूत शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर खड़े 85 फुट ऊंचे, 187 फुट लंबे और 80 फुट चौड़े मंदिर की दीवारें 12 फुट मोटी हैं। यह आश्चर्य ही है कि इतने भारी पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर व तराशकर कैसे मंदिर की शक्ल दी गई होगी? खासकर यह विशालकाय छत कैसे खंभों पर रखी गई? पत्थरों को एक-दूसरे में जोड़ने के लिए इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।
3. तीसरा रहस्य :
यह मंदिर मौजूदा मंदिर के पीछे सर्वप्रथम पांडवों ने बनवाया था, लेकिन वक्त के थपेड़ों की मार के चलते यह मंदिर लुप्त हो गया। तब इस मंदिर का निर्माण 508 ईसा पूर्व जन्मे और 476 ईसा पूर्व देहत्याग गए आदिशंकराचार्य ने करवाया था। इस मंदिर के पीछे ही उनकी समाधि है। इसका गर्भगृह अपेक्षाकृत प्राचीन है जिसे 80वीं शताब्दी के लगभग का माना जाता है। पहले 10वीं सदी में मालवा के राजा भोज द्वारा और फिर 13वीं सदी में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया।
4. चौथा रहस्य :
दीपावली महापर्व के दूसरे दिन के दिन शीत ऋतु में मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। 6 माह तक मंदिर के अंदर दीपक जलता रहता है। पुरोहित ससम्मान पट बंद कर भगवान के विग्रह एवं दंडी को 6 माह तक पहाड़ के नीचे ऊखीमठ में ले जाते हैं। 6 माह बाद मई माह में केदारनाथ के कपाट खुलते हैं, तब उत्तराखंड की यात्रा आरंभ होती है। 6 माह मंदिर और उसके आसपास कोई नहीं रहता है। लेकिन आश्चर्य की बात कि 6 माह तक दीपक भी जलता रहता और निरंतर पूजा भी होती रहती है। कपाट खुलने के बाद यह भी आश्चर्य का विषय है कि वैसी की वैसी ही साफ-सफाई मिलती है, जैसी कि छोड़कर गए थे।
5. पांचवां रहस्य
16 जून 2013 की रात प्रकृति ने कहर बरपाया था। जलप्रलय से कई बड़ी-बड़ी और मजबूत इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढहकर पानी में बह गईं, लेकिन केदारनाथ के मंदिर का कुछ नहीं बिगड़ा। आश्चर्य तो तब हुआ, जब पीछे पहाड़ी से पानी के बहाव में लुढ़कती हुई विशालकाय चट्टान आई और अचानक वह मंदिर के पीछे ही रुक गई! उस चट्टान के रुकने से बाढ़ का जल 2 भागों में विभक्त हो गया और मंदिर कहीं ज्यादा सुरक्षित हो गया। इस प्रलय में लगभग 10 हजार लोगों की मौत हो गई थी।
6. छठा रहस्य :
पुराणों की भविष्यवाणी के अनुसार इस समूचे क्षेत्र के तीर्थ लुप्त हो जाएंगे। माना जाता है कि जिस दिन नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे, बद्रीनाथ का मार्ग पूरी तरह बंद हो जाएगा और भक्त बद्रीनाथ के दर्शन नहीं कर पाएंगे। पुराणों के अनुसार वर्तमान बद्रीनाथ धाम और केदारेश्वर धाम लुप्त हो जाएंगे और वर्षों बाद भविष्य में 'भविष्यबद्री' नामक नए तीर्थ का उद्गम होगा।
मित्रो, अब जानिए 400 सालों तक कैसे बर्फ में दबा रहा केदारनाथ का मंदिर और जब बर्फ से बाहर निकला तो पूर्णत: सुरक्षित था। देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट के हिमालयन जियोलॉजिकल वैज्ञानिक विजय जोशी के अनुसार 13वीं से 17वीं शताब्दी तक यानी 400 साल तक एक छोटा हिमयुग आया था जिसमें हिमालय का एक बड़ा क्षेत्र बर्फ के अंदर दब गया था। उसमें यह मंदिर क्षेत्र भी था। वैज्ञानिकों के अनुसार मंदिर की दीवार और पत्थरों पर आज भी इसके निशान देखे जा सकते हैं।
दरअसल, केदारनाथ का यह इलाका चोराबरी ग्लैशियर का एक हिस्सा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लैशियरों के लगातार पिघलते रहने और चट्टानों के खिसकते रहने से आगे भी इस तरह का जलप्रलय या अन्य प्राकृतिक आपदाएं जारी रहेंगी।
भौतिक विज्ञान के नियमो की धज्जियां उड़ाती हजारो वर्ष पुरानी श्रीकृष्ण मक्खन गेंद --
यह पत्थर #श्रीकृष्ण_बटरबॉल के नाम से प्रसिद्ध है ।। आपको यह साधारण पत्थर लगता होगा, लेकिन यह पत्थर विज्ञान के सारे नियमो की धज्जियां उड़ाते हुए अडिग है :--
यह पत्थर ढलान वाली पहाड़ी पर, 45 डिग्री के कोण पर मात्र 4 फुट की जगह घेरकर बिना लुढ़के टिका हुआ है ।। इस पत्थर का वजन 250 टन है, इसे साथ हाथियों की मदद से यहां से हटाने का प्रयास किया गया था, लेकिन यह हिला तक नही । ढलान के ऊपर इस पत्थर का अपने आप टिका रहना ही किसी आश्चर्य से कम नही, उल्टे यह महान प्रयासों के बाद भी हिलाने से भी नही हिलता, यह महाआश्चर्य की बात है ।
देखने से यह पत्थर ऐसे लगता है की किसी भी क्षण यह पत्थर लुढ़ककर इस पहाड़ी को चकनाचूर कर देगा, लेकिन हजारो वर्षो के बाद भी गिरना तो दूर, यह पत्थर हिला तक नही है ।
इस पत्थर को यहां से हटाने का प्रयास पल्लव राजाओ ने किया था, लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी वह इसे हिलाने में भी कामयाब नही हुए, उसके बाद 1908 में अंग्रेजो ने इसे हटाने का प्रयास किया, 7 हाथी इस पत्थर को हटाने में लगाये, लेकिन हिला तक नही -- पल्लव राजाओ के समय तो हाथियों की संख्या इससे कहीं अधिक थी, तब यह नही हिला, तो अंग्रेजो से तो हिलना ही क्या था ??
जियोलॉजिस्ट भी इस पत्थर की गुत्थी सुलझा नही पाए है, वह भी यह मानते है की प्राकृतिक रूप से भी इस प्रकार की आकृति नही बन सकती, अगर बन भी जाये, तो उसे कम से कम हटाया तो जा ही सकता है, इस पत्थर का इस तरह अडिग रहना, विज्ञान के समझ के परे है, इस चमत्कार को विज्ञान भी नमस्कार करता है :--
यहां के स्थानीय लोगो का मानना है की यह पत्थर स्वर्ग से आया था, मतलब बाहरी दुनिया के लोग साक्षात भगवान के कारण ही यह पत्थर इस तरह है । शायद स्थानीय लोग ही जियोलॉजिस्ट की तुलना में ज़्यादा सही है ।।
#कृष्णबटरबॉल_महाबलीपुरम ( तमिलनाडु - भारत )👌👌😱😱
यह पत्थर #श्रीकृष्ण_बटरबॉल के नाम से प्रसिद्ध है ।। आपको यह साधारण पत्थर लगता होगा, लेकिन यह पत्थर विज्ञान के सारे नियमो की धज्जियां उड़ाते हुए अडिग है :--
यह पत्थर ढलान वाली पहाड़ी पर, 45 डिग्री के कोण पर मात्र 4 फुट की जगह घेरकर बिना लुढ़के टिका हुआ है ।। इस पत्थर का वजन 250 टन है, इसे साथ हाथियों की मदद से यहां से हटाने का प्रयास किया गया था, लेकिन यह हिला तक नही । ढलान के ऊपर इस पत्थर का अपने आप टिका रहना ही किसी आश्चर्य से कम नही, उल्टे यह महान प्रयासों के बाद भी हिलाने से भी नही हिलता, यह महाआश्चर्य की बात है ।
देखने से यह पत्थर ऐसे लगता है की किसी भी क्षण यह पत्थर लुढ़ककर इस पहाड़ी को चकनाचूर कर देगा, लेकिन हजारो वर्षो के बाद भी गिरना तो दूर, यह पत्थर हिला तक नही है ।
इस पत्थर को यहां से हटाने का प्रयास पल्लव राजाओ ने किया था, लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी वह इसे हिलाने में भी कामयाब नही हुए, उसके बाद 1908 में अंग्रेजो ने इसे हटाने का प्रयास किया, 7 हाथी इस पत्थर को हटाने में लगाये, लेकिन हिला तक नही -- पल्लव राजाओ के समय तो हाथियों की संख्या इससे कहीं अधिक थी, तब यह नही हिला, तो अंग्रेजो से तो हिलना ही क्या था ??
जियोलॉजिस्ट भी इस पत्थर की गुत्थी सुलझा नही पाए है, वह भी यह मानते है की प्राकृतिक रूप से भी इस प्रकार की आकृति नही बन सकती, अगर बन भी जाये, तो उसे कम से कम हटाया तो जा ही सकता है, इस पत्थर का इस तरह अडिग रहना, विज्ञान के समझ के परे है, इस चमत्कार को विज्ञान भी नमस्कार करता है :--
यहां के स्थानीय लोगो का मानना है की यह पत्थर स्वर्ग से आया था, मतलब बाहरी दुनिया के लोग साक्षात भगवान के कारण ही यह पत्थर इस तरह है । शायद स्थानीय लोग ही जियोलॉजिस्ट की तुलना में ज़्यादा सही है ।।
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Forwarded from Sadhak Swami
क्या कोई बता सकता है इसे बनाने में किस तरह की टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हुआ है ?
यह किसी धातु के स्तम्भ नहीं हैं जिनके पार्ट्स को अलग-अलग आकार देकर वेल्डिंग या अन्य तकनीक से आपस में जोड़ा गया है, बल्कि यह पत्थर के स्तम्भ हैं, और सबसे ज्यादा रोचक बात यह है की प्रत्येक स्तम्भ केवल एक पत्थर से बना है । यह मंदिर इतना प्राचीन है कि इसके निर्माण का निश्चित समय काल ज्ञात नहीं है ।
क्या हमारे पूर्वजों के द्वारा निर्मित ऐसी विरासतें आपको सनातनी होने पर गर्व करने के लिए मजबूर नहीं करती ?
(किराडू मंदिर, राजस्थान, अनुमानतः 11वीं शताब्दी )
साभार
यह किसी धातु के स्तम्भ नहीं हैं जिनके पार्ट्स को अलग-अलग आकार देकर वेल्डिंग या अन्य तकनीक से आपस में जोड़ा गया है, बल्कि यह पत्थर के स्तम्भ हैं, और सबसे ज्यादा रोचक बात यह है की प्रत्येक स्तम्भ केवल एक पत्थर से बना है । यह मंदिर इतना प्राचीन है कि इसके निर्माण का निश्चित समय काल ज्ञात नहीं है ।
क्या हमारे पूर्वजों के द्वारा निर्मित ऐसी विरासतें आपको सनातनी होने पर गर्व करने के लिए मजबूर नहीं करती ?
(किराडू मंदिर, राजस्थान, अनुमानतः 11वीं शताब्दी )
साभार
Forwarded from Sadhak Swami
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Forwarded from Sadhak Swami
यह रामप्पा मंदिर, वारंगल की एक छत है
इसमें 100 से अधिक प्रतिमा हैं, 900 साल से अधिक समय के बाद भी सभी अभी भी पहचान योग्य हैं ।
यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह एक काले रंग की बेसाल्ट चट्टान है । पृथ्वी पर सबसे कठिन चट्टानों में से एक।
इन्हें तराशना कितना मुश्किल रहा होगा
इसमें 100 से अधिक प्रतिमा हैं, 900 साल से अधिक समय के बाद भी सभी अभी भी पहचान योग्य हैं ।
यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह एक काले रंग की बेसाल्ट चट्टान है । पृथ्वी पर सबसे कठिन चट्टानों में से एक।
इन्हें तराशना कितना मुश्किल रहा होगा
Forwarded from Sadhak Swami
तीनों तस्वीरों को अलग अलग और ध्यान से देखिए। पहली तसवीर में पूरा मंदिर, दूसरी तस्वीर में उस मंदिर का एक हिस्सा और तीसरी तस्वीर में उस हिस्से का का एक छोटा सा हिस्सा। कल्पना कीजिये हमारे महान पूर्वजों के पास वह कौन सी उन्नत टेक्नोलॉजी थी जिसे हमने भुला दिया।
क्या आज के मॉडर्न इंजीनियरिंग ये डिजाइन कर सकती है वानप्रस्थ के श्रीरंगापुरम, श्री रंगनायकास्वामी मंदिर के गोपुरम पर वाक पत्ती पे बालकृष्ण !!
भारत 🚩🇮🇳🚩
साभार
क्या आज के मॉडर्न इंजीनियरिंग ये डिजाइन कर सकती है वानप्रस्थ के श्रीरंगापुरम, श्री रंगनायकास्वामी मंदिर के गोपुरम पर वाक पत्ती पे बालकृष्ण !!
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Forwarded from सनातन संस्कृत के वीडियो
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तमिलनाडु के ऐरावतेश्वर मंदिर परिसर में स्थित यह सीढियां 900 वर्ष पुरानी हैं।
कुछ इतिहासकार बताते हैं कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसी तकनीक थी जिससे वो अलग-अलग पत्थरों को पिघलाकर उनके विलयन से नई प्रकृति के पत्थरों को बनाने में सक्षम थे।
इसी तकनीक से वो वांछित हल्कापन, मजबूती या फिर अलग-अलग स्वर उत्पन्न करने वाले पत्थरों का निर्माण करते थे।
कुछ इतिहासकार बताते हैं कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसी तकनीक थी जिससे वो अलग-अलग पत्थरों को पिघलाकर उनके विलयन से नई प्रकृति के पत्थरों को बनाने में सक्षम थे।
इसी तकनीक से वो वांछित हल्कापन, मजबूती या फिर अलग-अलग स्वर उत्पन्न करने वाले पत्थरों का निर्माण करते थे।