स्वास्तिक और मूर्ति होने के बाद भी लोग इसे मस्जिद कहते है ।
अढ़ाई दिन का झोपड़ा - कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे मात्र ढाई दिन में बनाया था, ऐसा हमने राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध करवाई गई पुस्तक में पढ़ा । उसमे अब सुधार करने की जरूरत है । कांग्रेस ने हमे गलत पढ़ाया ...
क्यो की वर्तमान समय 2020 मे हम जान चुके है की इस्लाम धर्म के प्रतीक चिन्ह क्या है ? और वे मूर्ति से कितनी घृणा करते है ... इस अढ़ाई दिन के झोंपड़े पर आप खुद देख सकते है, खिड़की पर स्वस्त्विक का निशान भी है, और आगे फिर मूर्तिया भी ।
और एक साधरण सी बात है, इस मंदिर की विशालता एवं बारीक कारीगरी देखकर कहीं से भी लगता है कि ऐसा निर्माण आधुनिक मशीनों के साथ भी ढाई दिन में हो सकता है ?
दरअसल कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे ढाई दिन में बनाया नही था, बल्कि तौड़ा था । इस मंदिर में पुराना शिलालेख और श्लोक आदि आज भी है, जिससे इस मंदिर के विग्रहराज चौहान द्वारा बनाये जाने के पुख्ता प्रमाण है, वह शिलालेख आज भी इस मंदिर में है, लेकिन हिन्दू पता नही, कौनसा नशा करके सोए है ...
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अढ़ाई दिन का झोपड़ा - कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे मात्र ढाई दिन में बनाया था, ऐसा हमने राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध करवाई गई पुस्तक में पढ़ा । उसमे अब सुधार करने की जरूरत है । कांग्रेस ने हमे गलत पढ़ाया ...
क्यो की वर्तमान समय 2020 मे हम जान चुके है की इस्लाम धर्म के प्रतीक चिन्ह क्या है ? और वे मूर्ति से कितनी घृणा करते है ... इस अढ़ाई दिन के झोंपड़े पर आप खुद देख सकते है, खिड़की पर स्वस्त्विक का निशान भी है, और आगे फिर मूर्तिया भी ।
और एक साधरण सी बात है, इस मंदिर की विशालता एवं बारीक कारीगरी देखकर कहीं से भी लगता है कि ऐसा निर्माण आधुनिक मशीनों के साथ भी ढाई दिन में हो सकता है ?
दरअसल कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे ढाई दिन में बनाया नही था, बल्कि तौड़ा था । इस मंदिर में पुराना शिलालेख और श्लोक आदि आज भी है, जिससे इस मंदिर के विग्रहराज चौहान द्वारा बनाये जाने के पुख्ता प्रमाण है, वह शिलालेख आज भी इस मंदिर में है, लेकिन हिन्दू पता नही, कौनसा नशा करके सोए है ...
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दक्षिण भारत सैकड़ो शानदार प्राचीन मंदिरों से भरा है, लेकिन उत्तर भारत में ऐसे मंदिर गायब हैं। क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों है ? जवाब जानने के लिए उत्तर भारत के किसी भी प्राचीन इस्लामिक स्ट्रक्चर के अंदर बारीकी से देखें और आपको जवाब मिल जाएगा।
कुतुब मीनार प्राचीन दिल्ली (ढिल्लिका) के एक हिन्दू किला जिसका नाम लालकोट था, के अवशेष पर बना हैं । ढिल्लिका हिंदू राजाओं तोमर और चौहान की राजधानी थी। कुतुबमीनार का वास्तविक नाम विष्णु स्तंभ है जिसे कुतुबदीन ने नहीं बल्कि सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक और खगोलशास्त्री वराहमिहिर ने बनवाया था। कुतुब मीनार के पास जो बस्ती है उसे महरौली कहा जाता है यह एक संस्कृत शब्द है, इस कस्बे के बारे में कहा जा सकता है कि यहाँ पर विख्यात खगोलज्ञ मिहिर (जो कि विक्रमादित्य के दरबार में थे) रहा करते थे। उनके साथ उनके सहायक, गणितज्ञ और तकनीकविद भी रहते थे। वे लोग इस कथित कुतुब मीनार का खगोलीय गणना, अध्ययन के लिए प्रयोग करते थे।
इस टॉवर के चारों ओर हिंदू राशि चक्र को समर्पित 27 नक्षत्रों या तारामंडलों के लिए मंडप या गुंबजदार इमारतें थीं। कुछ इतिहास की किताबों में यह जिक्र है कि कुतुबुद्दीन ने इन सभी मंडपों या गुंबजदार इमारतों को नष्ट कर दिया था, लेकिन उसमें यह नहीं लिखा कि उसने कोई मीनार बनवाई। मुस्लिम हमलावर हिंदू इमारतों की स्टोन-ड्रेसिंग या पत्थरों के ऊपरी आवरण को निकाल लेते थे और अरबी में लिखे दूसरे पत्थरों को इसपर चिपका देते थे ।
कुतुबमीनार परिसर में स्तंभों और दीवारों पर उकेरे गए मंदिर की घंटियों और मूर्तियों की नक्काशी को अभी भी देखा जा सकता है, कुतुबमीनार परिसर में हिन्दू वास्तुकला से निर्मित मंदिर के सैकड़ो स्तम्भ आज भी देखे जा सकते है इन स्तंभों से मूर्तियों को हटाने के प्रयास में छतिग्रस्त हिस्से भी साफ देखे जा सकते है, परिसर में उकेरे गए गणेश प्रतिमा को सरकार ने लोहे की जाल से कवर कर रखा है ताकि यहाँ दुबारा पूजा की परंपरा शुरू ना की जा सके । इस मीनार का प्रवेश द्वार उत्तर दिशा में है, पश्चिम में नहीं, जबकि इस्लामी धर्मशास्त्र और परंपरा में पश्चिम का महत्व है। पास में ही जंग न लगने वाले लोहे के खंभे पर ब्राह्मी लिपि में संस्कृत में लिखा है कि विष्णु का यह स्तंभ विष्णुपाद गिरि नामक पहाड़ी पर बना था। इस विवरण से साफ होता है कि मीनार के मध्य स्थित मंदिर में लेटे हुए विष्णु की मूर्ति को मोहम्मद गोरी और उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ने नष्ट कर दिया था।
कुतुबमिनार के पास लगे जानकारी पट्ट पर आप स्पष्ट रूप से पढ़ सकते हैं जिसमें यहाँ 27 हिन्दू-जैन मंदिरों के विध्वंस का जिक्र है । ब्रिटिश म्युजियम में संरक्षित जानकारियों के अनुसार सन 1900 तक इसे "राजा पृथ्वीराज मंदिर" नाम से जाना जाता था लेकिन सेक्युलरिज्म ने महज 100 साल के अंदर हमारी विरासतों के मूल पहचान को छीन लिया ।
भले ही इतिहास लिखना आक्रमणकारियों के प्रशंसा में मतान्ध वामपंथी इतिहासकारों के हाथ में था लेकिन इतिहास का प्रचार करना हमारे हाथों में है ।
आओ हम सब इसका प्रचार करें.. 💖💖💖💖💖💖💖
कुतुब मीनार प्राचीन दिल्ली (ढिल्लिका) के एक हिन्दू किला जिसका नाम लालकोट था, के अवशेष पर बना हैं । ढिल्लिका हिंदू राजाओं तोमर और चौहान की राजधानी थी। कुतुबमीनार का वास्तविक नाम विष्णु स्तंभ है जिसे कुतुबदीन ने नहीं बल्कि सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक और खगोलशास्त्री वराहमिहिर ने बनवाया था। कुतुब मीनार के पास जो बस्ती है उसे महरौली कहा जाता है यह एक संस्कृत शब्द है, इस कस्बे के बारे में कहा जा सकता है कि यहाँ पर विख्यात खगोलज्ञ मिहिर (जो कि विक्रमादित्य के दरबार में थे) रहा करते थे। उनके साथ उनके सहायक, गणितज्ञ और तकनीकविद भी रहते थे। वे लोग इस कथित कुतुब मीनार का खगोलीय गणना, अध्ययन के लिए प्रयोग करते थे।
इस टॉवर के चारों ओर हिंदू राशि चक्र को समर्पित 27 नक्षत्रों या तारामंडलों के लिए मंडप या गुंबजदार इमारतें थीं। कुछ इतिहास की किताबों में यह जिक्र है कि कुतुबुद्दीन ने इन सभी मंडपों या गुंबजदार इमारतों को नष्ट कर दिया था, लेकिन उसमें यह नहीं लिखा कि उसने कोई मीनार बनवाई। मुस्लिम हमलावर हिंदू इमारतों की स्टोन-ड्रेसिंग या पत्थरों के ऊपरी आवरण को निकाल लेते थे और अरबी में लिखे दूसरे पत्थरों को इसपर चिपका देते थे ।
कुतुबमीनार परिसर में स्तंभों और दीवारों पर उकेरे गए मंदिर की घंटियों और मूर्तियों की नक्काशी को अभी भी देखा जा सकता है, कुतुबमीनार परिसर में हिन्दू वास्तुकला से निर्मित मंदिर के सैकड़ो स्तम्भ आज भी देखे जा सकते है इन स्तंभों से मूर्तियों को हटाने के प्रयास में छतिग्रस्त हिस्से भी साफ देखे जा सकते है, परिसर में उकेरे गए गणेश प्रतिमा को सरकार ने लोहे की जाल से कवर कर रखा है ताकि यहाँ दुबारा पूजा की परंपरा शुरू ना की जा सके । इस मीनार का प्रवेश द्वार उत्तर दिशा में है, पश्चिम में नहीं, जबकि इस्लामी धर्मशास्त्र और परंपरा में पश्चिम का महत्व है। पास में ही जंग न लगने वाले लोहे के खंभे पर ब्राह्मी लिपि में संस्कृत में लिखा है कि विष्णु का यह स्तंभ विष्णुपाद गिरि नामक पहाड़ी पर बना था। इस विवरण से साफ होता है कि मीनार के मध्य स्थित मंदिर में लेटे हुए विष्णु की मूर्ति को मोहम्मद गोरी और उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ने नष्ट कर दिया था।
कुतुबमिनार के पास लगे जानकारी पट्ट पर आप स्पष्ट रूप से पढ़ सकते हैं जिसमें यहाँ 27 हिन्दू-जैन मंदिरों के विध्वंस का जिक्र है । ब्रिटिश म्युजियम में संरक्षित जानकारियों के अनुसार सन 1900 तक इसे "राजा पृथ्वीराज मंदिर" नाम से जाना जाता था लेकिन सेक्युलरिज्म ने महज 100 साल के अंदर हमारी विरासतों के मूल पहचान को छीन लिया ।
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┋ *✎व्रजदर्शन*
╚═════▣▣▣
*आज से व्रजदर्शन के विडियो क्लिप Unique Samay you tube channel के माध्यम से कुल १२८ पार्ट मे से क्रमशः पार्ट १ से अन्त तक के विडियो आज से पोस्ट किये जारहै है।भाविक जन इस डोक्युमेन्ट्री विडियो का लाभ लेवे।*
*आज का दर्शन:-क्या शॉप मिला है गिरिराजजी को और कहाँ रहते है हनुमानजी गोवर्धन पर!*
*भाषा - हिन्दी*
*आज का विडियो पार्ट*
*पार्ट:-2*
*⏱️0:13:45*
*🎙️मयंक भैया*
*🙏हिन्दी अध्यात्मिक ग्रुप के जय श्रीकृष्ण🙏*
https://www.youtube.com/watch?v=uMMKl-hnk_8&feature=share
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क्या श्राप मिला है Giriraj ji को और कहाँ रहते है हनुमान जी गोवेर्धन पर | Goverdhan Parikrma Part 2
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*✅👆विश्व की सबसे बड़ी तोप जयपुर में जय गढ़ के क़िले में स्थित है ।*
*कभी युद्ध की नौबत तो नही आयी ना ही इस भयावह तोप को कभी दुश्मन पे इस्तेमाल किया गया क्यूँकी राजपूत राजा इन्सान के मूल्यो को सर्वोपरी रखते थे, पर एक बार इसे परखने के लिए चलाया गया तो गोला 35 किलॉमेटर दूर चाकसु नाम के गाँव में गिरा जहां एक बहुत बड़ा तालाब बन गया था ।*
*इसको बनाने का राजपूती कारख़ाना क़िले में आज भी मौजूद है ओर यहां जयवान तोप भी....*
*कभी युद्ध की नौबत तो नही आयी ना ही इस भयावह तोप को कभी दुश्मन पे इस्तेमाल किया गया क्यूँकी राजपूत राजा इन्सान के मूल्यो को सर्वोपरी रखते थे, पर एक बार इसे परखने के लिए चलाया गया तो गोला 35 किलॉमेटर दूर चाकसु नाम के गाँव में गिरा जहां एक बहुत बड़ा तालाब बन गया था ।*
*इसको बनाने का राजपूती कारख़ाना क़िले में आज भी मौजूद है ओर यहां जयवान तोप भी....*
*क्या देख रहे हो जमीन पर से इस मंदिर को देखने पर गर्दन में मोच आ जाएगी,, तुम्हारे आने वाली सात पीढियां भी मिट जाएंगी लेकिन यह ऐसे ही खड़ा रहेगा और अपने धर्म के प्रति तुम्हारी उदासीनता और गद्दारी का प्रमाण देता रहेगा ,,*
*तुमने अपने पूर्वजों के मेहनत,समर्पण और ज्ञान के साथ गद्दारी की है,, आखिर इन सब चीजों को दुनिया इसलिए नहीं देख पाई क्योंकि आजादी के बाद तुमने सिर्फ नेताओं की गुलामी की है,*
*अभी भी वक्त है एक स्वर्णिम भारत की रचना हो रही है तुम भी इस महान ,,,🚩सनातन🚩 निर्माण के साथ न्याय करो,,*
*237.5 feet.मुरुदेश्वर मंदिर कर्नाटक भारत🙏🏻🚩अद्भुत सत्य सनातन*🙏🏻🚩🙌🏻
*सनातन_हमारी_पहचान_हैं*
*सनातन_धर्म_संस्कृति*🙏🏻🚩
*तुमने अपने पूर्वजों के मेहनत,समर्पण और ज्ञान के साथ गद्दारी की है,, आखिर इन सब चीजों को दुनिया इसलिए नहीं देख पाई क्योंकि आजादी के बाद तुमने सिर्फ नेताओं की गुलामी की है,*
*अभी भी वक्त है एक स्वर्णिम भारत की रचना हो रही है तुम भी इस महान ,,,🚩सनातन🚩 निर्माण के साथ न्याय करो,,*
*237.5 feet.मुरुदेश्वर मंदिर कर्नाटक भारत🙏🏻🚩अद्भुत सत्य सनातन*🙏🏻🚩🙌🏻
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मुगल कभी भी चित्तौड पर कब्जा नही कर पाये वरना ताजमहल की तरह राणा कुम्भा का बनवाया यह किर्तिस्तंभ भी मुगलो की देन हो गया होता।। जय हिंद जय मेवाड़ 🇮🇳🕉️🚩🏹श्री राम🙏
*🛕 रघुनाथ मंदिर, श्रीनगर*
*🔶 कश्मीर की खोई विरासत और सनातन परंपरा को सहेजने का कार्य शुरू हो रहा है। करीब तीन दशक पहले इस्लामिक आतंकियों और मुसलमानो द्वारा जला दिए गए श्रीनगर के एतिहासिक रघुनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य आरंभ हो गया है। मज़हबी भीड़ ने भगवान रघुनाथ की प्रतिमा को खंडित कर झेलम में फेंक दिया था। मंदिर के साथ-साथ वहां झेलम के घाट का भी सौंदर्यीकरण किया जाएगा।*
*🔶 डोगरा शासक महाराजा रणबीर सिंह ने करीब 160 वर्ष पूर्व श्रीनगर में झेलम नदी के किनारे इसका निर्माण कराया था। मंदिर में कई अमूल्य पांडुलिपियां और धर्मग्रंथों पर आधारित पुस्तकालय भी थी।*
*🔶कश्मीर में इस्लामिक आतंकवाद का दौर शुरू होने से पहले भी यह मंदिर मुसलमानो के निशाने पर था। 1989 में मुसलमानो की भीड़ ने मंदिर पर पहला हमला बोला। इसके बाद 24 फरवरी 1990, 13 अप्रैल 1991 और फिर 8 मई 1992 को इस हमले हुए। मंदिर में प्रतिष्ठित भगवान श्रीराम और माता सीता की प्रतिमाओं को खंडित कर झेलम में फेंक दिया गया। यज्ञशाला बर्बाद कर दी गई और पुस्तकालय जला दी गई थी।*
*🔶 कश्मीर की खोई विरासत और सनातन परंपरा को सहेजने का कार्य शुरू हो रहा है। करीब तीन दशक पहले इस्लामिक आतंकियों और मुसलमानो द्वारा जला दिए गए श्रीनगर के एतिहासिक रघुनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य आरंभ हो गया है। मज़हबी भीड़ ने भगवान रघुनाथ की प्रतिमा को खंडित कर झेलम में फेंक दिया था। मंदिर के साथ-साथ वहां झेलम के घाट का भी सौंदर्यीकरण किया जाएगा।*
*🔶 डोगरा शासक महाराजा रणबीर सिंह ने करीब 160 वर्ष पूर्व श्रीनगर में झेलम नदी के किनारे इसका निर्माण कराया था। मंदिर में कई अमूल्य पांडुलिपियां और धर्मग्रंथों पर आधारित पुस्तकालय भी थी।*
*🔶कश्मीर में इस्लामिक आतंकवाद का दौर शुरू होने से पहले भी यह मंदिर मुसलमानो के निशाने पर था। 1989 में मुसलमानो की भीड़ ने मंदिर पर पहला हमला बोला। इसके बाद 24 फरवरी 1990, 13 अप्रैल 1991 और फिर 8 मई 1992 को इस हमले हुए। मंदिर में प्रतिष्ठित भगवान श्रीराम और माता सीता की प्रतिमाओं को खंडित कर झेलम में फेंक दिया गया। यज्ञशाला बर्बाद कर दी गई और पुस्तकालय जला दी गई थी।*
सूडान की इस प्राचीन गुफ़ा का नाम जानते है आप ?
कौरव गुफा -- और क्या प्रमाण चाहिए की पूरे विश्व का एक धर्म सनातन धर्म था ।
El Kurru Caves हिंदी में इल कुरु गुफा । आप स्वयं से गूगल भी कर सकते है ।
इल = चंद्रवंश की प्रथम देवी इला का नाम अर्थात कुरुवंश की कुलदेवी इला
कुरु = कुरुवंश , इस नाम को कौन नही जानता, भीष्म, अर्जुन, दुर्योधन आदि कुरु राज्य के राजकुमार ही थे। जैसे "श्री" भी लक्ष्मी का नाम है, अफ्रीका में श्री की जगह अल- इल इस्तमाल करते है ।
यह गुफाएं ईसा से 3000 साल पहले की पुरानी अर्थात 5000 वर्ष पुरानी, और उस समय हिन्दू मेथोलॉजी के अनुसार महाभारत का महायुद्ध हुआ था ।। यह गुफाएं ऐसी ही प्रतीत होती है, जैसे किसी भट्टी में इन गुफाओं को तपाया गया हो, यहां पानी का नामोनिशान तक नही, विज्ञान कहता है, ऐसी भौगोलिक स्तिथी का निर्माण तभी होता है, जब जापान से भी हजारो गुणा शक्तिशाली परमाणु या अन्य रासायनिक उस स्थान पर गिरे हथियार गिरे ....
यह स्थान ठीक उसी तरह की है । ओर यहां जो चित्रकारी हुई है, यह कौरव/पांडब सेना को गुप्त रूप से गाइडलाइन करने के लिए बनी है, क्यो की गुफाओं, सुरंगों, गुप्त रास्तों का निर्माण , प्रदर्शनी के लिए तो होता नही है, ओर न ही वह मार्ग हर किसी को बताया जाता है । केवल राजवंशों एवं प्रमुख सेनापतियों को ही इस सुरंग मार्ग का पता होता है, युद्धकाल में इन सुरंगों में राजपुत्रो के साथ कोई गाइड रहे या नही रहें, यह चित्र ही गाइड का काम कर दे, इसी लिए इन चित्रों का निर्माण हुआ था
यह गुफ़ा कौरवों की थी, जिसका महाभारत युद्ध मे नाश हो गया, आज भी यह गुफाएं ऐसी है, जैसे भयंकर तरीके से इन्हें जलाया गया हो ।
अब कोई दुर्योधय तो जमीन का पट्टा लेकर आने से रहा, की यह जमीन मेरी है । हमे तो नाम से ही मानना पड़ेगा ।
कौरव गुफा -- और क्या प्रमाण चाहिए की पूरे विश्व का एक धर्म सनातन धर्म था ।
El Kurru Caves हिंदी में इल कुरु गुफा । आप स्वयं से गूगल भी कर सकते है ।
इल = चंद्रवंश की प्रथम देवी इला का नाम अर्थात कुरुवंश की कुलदेवी इला
कुरु = कुरुवंश , इस नाम को कौन नही जानता, भीष्म, अर्जुन, दुर्योधन आदि कुरु राज्य के राजकुमार ही थे। जैसे "श्री" भी लक्ष्मी का नाम है, अफ्रीका में श्री की जगह अल- इल इस्तमाल करते है ।
यह गुफाएं ईसा से 3000 साल पहले की पुरानी अर्थात 5000 वर्ष पुरानी, और उस समय हिन्दू मेथोलॉजी के अनुसार महाभारत का महायुद्ध हुआ था ।। यह गुफाएं ऐसी ही प्रतीत होती है, जैसे किसी भट्टी में इन गुफाओं को तपाया गया हो, यहां पानी का नामोनिशान तक नही, विज्ञान कहता है, ऐसी भौगोलिक स्तिथी का निर्माण तभी होता है, जब जापान से भी हजारो गुणा शक्तिशाली परमाणु या अन्य रासायनिक उस स्थान पर गिरे हथियार गिरे ....
यह स्थान ठीक उसी तरह की है । ओर यहां जो चित्रकारी हुई है, यह कौरव/पांडब सेना को गुप्त रूप से गाइडलाइन करने के लिए बनी है, क्यो की गुफाओं, सुरंगों, गुप्त रास्तों का निर्माण , प्रदर्शनी के लिए तो होता नही है, ओर न ही वह मार्ग हर किसी को बताया जाता है । केवल राजवंशों एवं प्रमुख सेनापतियों को ही इस सुरंग मार्ग का पता होता है, युद्धकाल में इन सुरंगों में राजपुत्रो के साथ कोई गाइड रहे या नही रहें, यह चित्र ही गाइड का काम कर दे, इसी लिए इन चित्रों का निर्माण हुआ था
यह गुफ़ा कौरवों की थी, जिसका महाभारत युद्ध मे नाश हो गया, आज भी यह गुफाएं ऐसी है, जैसे भयंकर तरीके से इन्हें जलाया गया हो ।
अब कोई दुर्योधय तो जमीन का पट्टा लेकर आने से रहा, की यह जमीन मेरी है । हमे तो नाम से ही मानना पड़ेगा ।
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*अन्नामलाई (karthigai) दीपम*
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🛑 *केरल, कर्नाटक और मुख्य रूप से तमिलनाडु में अन्नामलाई दीपम बहुत ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है।*
🛑 *इस दिन भगवान शिव की आरती होती है और पूरा शहर रौशनी, अतिशबाजी और दीपो से जगमग हो जाता है।*
🛑 *इस Karthigai दीपम का वर्णन 200-300 ईसा पूर्व लिखी गयी तमिलनाडु की संगम साहित्य की कविताओं में भी है।*
🛑 *तमिलनाडु में ऐसी मान्यता है थिरुवनामालाई शहर के श्री अन्नामलैयार पहाड़ी पर शिव की का वास है और वर्ष में इस दिन शाम 5 बजे पूरे शहर वासी दीपमाला और आरती कर स्वयं को शिव जी के समीप पाते है और इस पवित्र पहाड़ी पर अग्नि प्रज्वलित की जाती है।*
*अन्नामलाई (karthigai) दीपम*
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🛑 *केरल, कर्नाटक और मुख्य रूप से तमिलनाडु में अन्नामलाई दीपम बहुत ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है।*
🛑 *इस दिन भगवान शिव की आरती होती है और पूरा शहर रौशनी, अतिशबाजी और दीपो से जगमग हो जाता है।*
🛑 *इस Karthigai दीपम का वर्णन 200-300 ईसा पूर्व लिखी गयी तमिलनाडु की संगम साहित्य की कविताओं में भी है।*
🛑 *तमिलनाडु में ऐसी मान्यता है थिरुवनामालाई शहर के श्री अन्नामलैयार पहाड़ी पर शिव की का वास है और वर्ष में इस दिन शाम 5 बजे पूरे शहर वासी दीपमाला और आरती कर स्वयं को शिव जी के समीप पाते है और इस पवित्र पहाड़ी पर अग्नि प्रज्वलित की जाती है।*