*🟠●अद्भुत ●ঔৣ● अकल्पनीय●🟠*
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शिव गुफा मंदिर मलेशिया
यह गुफा मंदिर कुआंतान के उत्तर में लगभग 25 किमी उत्तर में स्थित है. इस गुफा के अंदर 8 फीट ऊँचा शिवलिंग है जो जाला लिंगगेश्वर के नाम से जाना जाता है और यह शायद दक्षिण पूर्व एशिया में सबसे ऊँचा शिवलिंग है। इस गुफा की चट्टानों से पानी बूंद-बूंद कर शिवलिंग के ऊपर गिरता रहता है।
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
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शिव गुफा मंदिर मलेशिया
यह गुफा मंदिर कुआंतान के उत्तर में लगभग 25 किमी उत्तर में स्थित है. इस गुफा के अंदर 8 फीट ऊँचा शिवलिंग है जो जाला लिंगगेश्वर के नाम से जाना जाता है और यह शायद दक्षिण पूर्व एशिया में सबसे ऊँचा शिवलिंग है। इस गुफा की चट्टानों से पानी बूंद-बूंद कर शिवलिंग के ऊपर गिरता रहता है।
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कालिका माता मंदिर, पावागढ़
मेरी संस्कृति ..मेरा देश .. मेरा अभिमान 🚩
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_*अमृत कलश*_
इंडोनेशिया एक मुस्लिम बाहुल्य देश है। यहां एक ऐसा मंदिर है जहां अमृत कलश होने का दावा किया जा रहा है। ये मंदिर मुख्य जावा आइलैंड के बीचों-बीच है। इस मंदिर का नाम कंडी सुकुह है। इस प्राचीन मंदिर में एक कलश है जिस में एक तरल पदार्थ पाया गया है। ये तरल पदार्थ हजारों सालों के बाद भी नहीं सूखा है। यहां लोगों का ऐसा मानना है कि ये वही कलश है जिसे समुद्र मंथन के दौरान निकाला गया था।
साल 2016 की शुरूआत में पुरातत्व विभाग की एक टीम इस मंदिर में मरम्मत का कार्य कर रही थी। काम करने के दौरान यहां इस टीम को कई सारी कलाकृतियां मिली जिन्हें संग्रहालय में भेज दिया गया क्यों कि ये सारी काफी बेशकीमती थी। एक दीवार से टीम को एक कलश मिला। तांबे के बने इस कलश में एक खास तरह का लिक्विड था और इस के साथ ही इस में एक पारदर्शी स्फटिक का बना शिवलिंग भी जुड़ा हुआ था।
इस में सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात तो ये थी कि इस कलश को जिस दीवार से निकाला गया था उस पर 'अमृत मंथन' की नक्काशी की गई है। इस के साथ ही कंडी सुकुह में एक दीवार में महाभारत के आदिपर्व का वर्णन किया गया है।
पुरातत्व विभाग द्वारा उद्धार किए गए इस कलश की कार्बन डेटिंग लगभग बारहवीं सदी के आसपास बताई गई है। उस दौरान इंडोनेशिया हिंदू राष्ट्र्र था। पंद्रहवीं शताब्दी जब यहां इस्लाम का खतरा मंडराया तो यहां मंदिरों का बनना कम हो गया और शायद इसी डर की वजह से कलश को यहां इस मंदिर में छिपा दिया गया होगा। मरम्मत कार्य के दौरान टीम को कई सारे कीमती रत्न भी मिलें। इंडोनेशिया में अकसर हिंदू मंदिर के अवशेष मिलते हैं।
इंडोनेशिया एक मुस्लिम बाहुल्य देश है। यहां एक ऐसा मंदिर है जहां अमृत कलश होने का दावा किया जा रहा है। ये मंदिर मुख्य जावा आइलैंड के बीचों-बीच है। इस मंदिर का नाम कंडी सुकुह है। इस प्राचीन मंदिर में एक कलश है जिस में एक तरल पदार्थ पाया गया है। ये तरल पदार्थ हजारों सालों के बाद भी नहीं सूखा है। यहां लोगों का ऐसा मानना है कि ये वही कलश है जिसे समुद्र मंथन के दौरान निकाला गया था।
साल 2016 की शुरूआत में पुरातत्व विभाग की एक टीम इस मंदिर में मरम्मत का कार्य कर रही थी। काम करने के दौरान यहां इस टीम को कई सारी कलाकृतियां मिली जिन्हें संग्रहालय में भेज दिया गया क्यों कि ये सारी काफी बेशकीमती थी। एक दीवार से टीम को एक कलश मिला। तांबे के बने इस कलश में एक खास तरह का लिक्विड था और इस के साथ ही इस में एक पारदर्शी स्फटिक का बना शिवलिंग भी जुड़ा हुआ था।
इस में सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात तो ये थी कि इस कलश को जिस दीवार से निकाला गया था उस पर 'अमृत मंथन' की नक्काशी की गई है। इस के साथ ही कंडी सुकुह में एक दीवार में महाभारत के आदिपर्व का वर्णन किया गया है।
पुरातत्व विभाग द्वारा उद्धार किए गए इस कलश की कार्बन डेटिंग लगभग बारहवीं सदी के आसपास बताई गई है। उस दौरान इंडोनेशिया हिंदू राष्ट्र्र था। पंद्रहवीं शताब्दी जब यहां इस्लाम का खतरा मंडराया तो यहां मंदिरों का बनना कम हो गया और शायद इसी डर की वजह से कलश को यहां इस मंदिर में छिपा दिया गया होगा। मरम्मत कार्य के दौरान टीम को कई सारे कीमती रत्न भी मिलें। इंडोनेशिया में अकसर हिंदू मंदिर के अवशेष मिलते हैं।
*🟠●अद्भुत ●ঔৣ● अकल्पनीय●🟠*
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🌹#मानस शक्ति पीठ
मानसरोवर तिब्बत
*****'
मानस शक्तिपीठ हिन्दू धर्म में प्रसिद्ध ५१ शक्तिपीठों में से एक है। हिन्दू धर्म के पुराणों के अनुसार जहाँ-जहाँ माता सती के अंग के टुकड़े, धारण किये हुए वस्त्र और आभूषण गिरे, वहाँ-वहाँ पर शक्तिपीठ अस्तित्व में आये। इन शक्तिपीठों का धार्मिक दृष्टि से बड़ा ही महत्त्व है। ये अत्यंत पावन तीर्थस्थान कहलाते हैं। ये तीर्थ पूरे भारतीय उप-महाद्वीप में फैले हुए हैं। देवीपुराण में ५१ शक्तिपीठों का वर्णन है।
हिंदुओं के लिए कैलास पर्वत 'भगवान शिव का सिंहासन' है। बौद्धों के लिए विशाल प्राकृतिक मण्डप और जैनियों के लिए #ऋषभदेव का निर्वाण स्थल है। हिन्दू तथा बौद्ध दोनों ही इसे तांत्रिक शक्तियों का भण्डार मानते हैं। भले ही भौगोलिक दृष्टि से यह चीन के अधीन है तथापि यह हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और तिब्बतियों के लिए अति-पुरातन तीर्थस्थान है।
तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है मानस शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना हथेली का निपात हुआ था। यहां की शक्ति की दाक्षायणी तथा भैरव देव अमर हैं। मनसा देवी को भगवान शिव की मानस पुत्री के रूप में पूजा जाता है। इनका प्रादुर्भाव मस्तक से हुआ है इस कारण इनका नाम मनसा पड़ा। मनसा देवी मुख्यत: सर्पों से आच्छादित तथा कमल पर विराजित हैं ७ नाग उनके रक्षण में सदैव विद्यमान हैं।
आदि शक्तिपीठों की संख्या ४ मानी जाती है।कालिकापुराण में शक्तिपीठों की संख्या २६ बताई गई है। शिव चरित्र के अनुसार शक्ति पीठों की संख्या ५१ हैं। तंत्र चूड़ामणि, मार्कण्डेय पुराण के अनुसार शक्ति-पीठ ५२ हैं। भागवत में शक्तिपीठों की संख्या १०८ बताई गई है।
आदि शक्ति के एक रूप सती ने शिवजी से विवाह किया, लेकिन इस विवाह से सती के पिता दक्ष खुश नहीं थे। बाद में दक्ष ने एक यज्ञ किया तो उसमें सती को छोड़कर सभी देवताओं को आमंत्रित किया। सती बिना बुलाए यज्ञ में चली गईं। दक्ष ने शिवजी के बारे में अपमानजनक बातें कहीं। सती इसे सह न सकीं और सशरीर यज्ञाग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया। दुख में डूबे शिव ने सती के शरीर को उठाकर विनाश नृत्य आरंभ किया। इसे रोकने के लिए विष्णु ने सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल कर सती की देह के टुकड़े किए। जहां-जहां सती के शरीर के अंग गिरे, वो स्थान शक्तिपीठ बन गए।
देवी माँ का शक्तिपीठ चीन अधिकृत मानसरोवर के तट पर है, जहाँ सती की 'बायीं हथेली' का निपात हुआ था। यहाँ की शक्ति 'दाक्षायणी' तथा भैरव 'अमर' हैं। 'कैलास शक्तिपीठ' मानसरोवर का गौरवपूर्ण वर्णन हिन्दू, बौद्ध, जैन धर्मग्रंथों में मिलता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह ब्रह्मा के मन से निर्मित होने के कारण ही इसे 'मानसरोवर' कहा गया। यहाँ स्वयं शिव हंस रूप में विहार करते हैं। जैन धर्मग्रंथों में कैलास को 'अष्टपद' तथा मानसरोवर को 'पद्महद' कहा गया है। इसके सरोवर में अनेक तीर्थंकरों ने स्नान कर तपस्या की थी। बुद्ध के जन्म के साथ भी मानसरोवर का घनिष्ट संबंध है। तिब्बती धर्मग्रंथ 'कंगरी करछक' में मानसरोवर की देवी 'दोर्जे फांग्मो' यहाँ निवास कहा गया है। यहाँ भगवान देमचोर्ग, देवी फांग्मो के साथ नित्य विहार करते हैं। इस ग्रंथ में मानसरोवर को 'त्सोमफम' कहते हैं, जिसके पीछे मान्यता है कि भारत से एक बड़ी मछली आकर उस सरोवर में 'मफम' करते हुए प्रविष्ट हुई। इसी से इसका नाम 'त्सोमफम' पड़ गया। मानसरोवर के पास ही राक्षस ताल है, जिसे 'रावण हृद' भी कहते हैं। मानसरोवर का जल एक छोटी नदी द्वारा राक्षस ताल तक जाता है। तिब्बती इस नदी को 'लंगकत्सु' कहते हैं। जैन-ग्रंथों के अनुसार रावण एक बार 'अष्टपद' की यात्रा पर आया और उसने 'पद्महद' में स्नान करना चाहा, किंतु देवताओं ने उसे रोक दिया। तब उसने एक सरोवर, 'रावणहृद' का निर्माण किया और उसमें मानसरोवर की धारा ले आया तथा स्नान किया।
'मानसे कुमुदा प्रोक्ता' के अनुसार यहाँ की शक्ति 'कुमुदा' हैं, जबकि तंत्र चूड़ामणि के अनुसार शक्ति 'दाक्षायणी' हैं।
'मानसे दक्षहस्तो में देवी दाक्षायणी हर।
अमरो भैरवस्तत्र सर्वसिद्धि विधायकः॥
राम मनसा निर्मित परम्।
ब्रह्मणा नरशार्दूल तेनेदं मानसं सरः॥
(वाल्मीकि रामायण)
हमारे पुराणों और ग्रंथों में ‘कैलास पर्वत’ को भगवान शंकर और मां पार्वती का निवास स्थान बताया गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार शिवजी अपने सभी गणों के साथ इस अलौकिक स्थान पर रहते हैं। शिवपुराण के अनुसार, कैलास धन के देवता और देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर की तपस्थली है। उन्हीं की तपस्या से प्रसन्न होकर भोले भंडारी ने कैलास पर निवास करने का वचन दिया था। इस स्थान को ही कुबेर देवता की अलकापुरी की संज्ञा दी जाती है।
🌹#मानस शक्ति पीठ
मानसरोवर तिब्बत
*****'
मानस शक्तिपीठ हिन्दू धर्म में प्रसिद्ध ५१ शक्तिपीठों में से एक है। हिन्दू धर्म के पुराणों के अनुसार जहाँ-जहाँ माता सती के अंग के टुकड़े, धारण किये हुए वस्त्र और आभूषण गिरे, वहाँ-वहाँ पर शक्तिपीठ अस्तित्व में आये। इन शक्तिपीठों का धार्मिक दृष्टि से बड़ा ही महत्त्व है। ये अत्यंत पावन तीर्थस्थान कहलाते हैं। ये तीर्थ पूरे भारतीय उप-महाद्वीप में फैले हुए हैं। देवीपुराण में ५१ शक्तिपीठों का वर्णन है।
हिंदुओं के लिए कैलास पर्वत 'भगवान शिव का सिंहासन' है। बौद्धों के लिए विशाल प्राकृतिक मण्डप और जैनियों के लिए #ऋषभदेव का निर्वाण स्थल है। हिन्दू तथा बौद्ध दोनों ही इसे तांत्रिक शक्तियों का भण्डार मानते हैं। भले ही भौगोलिक दृष्टि से यह चीन के अधीन है तथापि यह हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और तिब्बतियों के लिए अति-पुरातन तीर्थस्थान है।
तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है मानस शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना हथेली का निपात हुआ था। यहां की शक्ति की दाक्षायणी तथा भैरव देव अमर हैं। मनसा देवी को भगवान शिव की मानस पुत्री के रूप में पूजा जाता है। इनका प्रादुर्भाव मस्तक से हुआ है इस कारण इनका नाम मनसा पड़ा। मनसा देवी मुख्यत: सर्पों से आच्छादित तथा कमल पर विराजित हैं ७ नाग उनके रक्षण में सदैव विद्यमान हैं।
आदि शक्तिपीठों की संख्या ४ मानी जाती है।कालिकापुराण में शक्तिपीठों की संख्या २६ बताई गई है। शिव चरित्र के अनुसार शक्ति पीठों की संख्या ५१ हैं। तंत्र चूड़ामणि, मार्कण्डेय पुराण के अनुसार शक्ति-पीठ ५२ हैं। भागवत में शक्तिपीठों की संख्या १०८ बताई गई है।
आदि शक्ति के एक रूप सती ने शिवजी से विवाह किया, लेकिन इस विवाह से सती के पिता दक्ष खुश नहीं थे। बाद में दक्ष ने एक यज्ञ किया तो उसमें सती को छोड़कर सभी देवताओं को आमंत्रित किया। सती बिना बुलाए यज्ञ में चली गईं। दक्ष ने शिवजी के बारे में अपमानजनक बातें कहीं। सती इसे सह न सकीं और सशरीर यज्ञाग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया। दुख में डूबे शिव ने सती के शरीर को उठाकर विनाश नृत्य आरंभ किया। इसे रोकने के लिए विष्णु ने सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल कर सती की देह के टुकड़े किए। जहां-जहां सती के शरीर के अंग गिरे, वो स्थान शक्तिपीठ बन गए।
देवी माँ का शक्तिपीठ चीन अधिकृत मानसरोवर के तट पर है, जहाँ सती की 'बायीं हथेली' का निपात हुआ था। यहाँ की शक्ति 'दाक्षायणी' तथा भैरव 'अमर' हैं। 'कैलास शक्तिपीठ' मानसरोवर का गौरवपूर्ण वर्णन हिन्दू, बौद्ध, जैन धर्मग्रंथों में मिलता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह ब्रह्मा के मन से निर्मित होने के कारण ही इसे 'मानसरोवर' कहा गया। यहाँ स्वयं शिव हंस रूप में विहार करते हैं। जैन धर्मग्रंथों में कैलास को 'अष्टपद' तथा मानसरोवर को 'पद्महद' कहा गया है। इसके सरोवर में अनेक तीर्थंकरों ने स्नान कर तपस्या की थी। बुद्ध के जन्म के साथ भी मानसरोवर का घनिष्ट संबंध है। तिब्बती धर्मग्रंथ 'कंगरी करछक' में मानसरोवर की देवी 'दोर्जे फांग्मो' यहाँ निवास कहा गया है। यहाँ भगवान देमचोर्ग, देवी फांग्मो के साथ नित्य विहार करते हैं। इस ग्रंथ में मानसरोवर को 'त्सोमफम' कहते हैं, जिसके पीछे मान्यता है कि भारत से एक बड़ी मछली आकर उस सरोवर में 'मफम' करते हुए प्रविष्ट हुई। इसी से इसका नाम 'त्सोमफम' पड़ गया। मानसरोवर के पास ही राक्षस ताल है, जिसे 'रावण हृद' भी कहते हैं। मानसरोवर का जल एक छोटी नदी द्वारा राक्षस ताल तक जाता है। तिब्बती इस नदी को 'लंगकत्सु' कहते हैं। जैन-ग्रंथों के अनुसार रावण एक बार 'अष्टपद' की यात्रा पर आया और उसने 'पद्महद' में स्नान करना चाहा, किंतु देवताओं ने उसे रोक दिया। तब उसने एक सरोवर, 'रावणहृद' का निर्माण किया और उसमें मानसरोवर की धारा ले आया तथा स्नान किया।
'मानसे कुमुदा प्रोक्ता' के अनुसार यहाँ की शक्ति 'कुमुदा' हैं, जबकि तंत्र चूड़ामणि के अनुसार शक्ति 'दाक्षायणी' हैं।
'मानसे दक्षहस्तो में देवी दाक्षायणी हर।
अमरो भैरवस्तत्र सर्वसिद्धि विधायकः॥
राम मनसा निर्मित परम्।
ब्रह्मणा नरशार्दूल तेनेदं मानसं सरः॥
(वाल्मीकि रामायण)
हमारे पुराणों और ग्रंथों में ‘कैलास पर्वत’ को भगवान शंकर और मां पार्वती का निवास स्थान बताया गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार शिवजी अपने सभी गणों के साथ इस अलौकिक स्थान पर रहते हैं। शिवपुराण के अनुसार, कैलास धन के देवता और देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर की तपस्थली है। उन्हीं की तपस्या से प्रसन्न होकर भोले भंडारी ने कैलास पर निवास करने का वचन दिया था। इस स्थान को ही कुबेर देवता की अलकापुरी की संज्ञा दी जाती है।
कैलास पर्वत २२,०२८ फीट ऊंचा पिरामिड है। यह पूरे साल बर्फ की सफेद चादर में लिपटा रहता है। मान्यता है कि यह पर्वत स्वयंभू है। साथ ही यह उतना ही पुराना है जितनी हमारी सृष्टि है। इस अलौकिक जगह पर प्रकाश और ध्वनि तरंगों का समागम होता है जो ‘ऊं’ की प्रतिध्वनि करता है। कैलाश पर्वत की तलछटी में कल्पवृक्ष लगा हुआ है। इस पर्वत का स्वरूप अद्भुत है। यही वजह है इसके हर भाग को अलग-अलग नामों से संबोधित किया जाता है। पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण के रूप में माना जाता है। पौराणिक कथाओं में यह जिक्र मिलता है कि यह स्थान कुबेर की नगरी है। यहीं से महाविष्णु के करकमलों से निकलकर गंगा कैलास पर्वत की चोटी पर गिरती है। यहां से भोलेनाथ उन्हें अपनी जटाओं में भरकर धरती पर प्रवाहित करते हैं।
कैलास में मानसरोवर दर्शन की विशेष महिमा है। मान्यता है कि महाराज मानधाता ने मानसरोवर झील की खोज की थी। इसके अलावा उन्होंने इसी झील के किनारे कई वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। इसके अलावा इस जगह के बारे में बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इसके केंद्र में एक वृक्ष है, जिसके फलों के चिकित्सकीय गुण सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोगों का उपचार करने में सक्षम हैं।
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
कैलास में मानसरोवर दर्शन की विशेष महिमा है। मान्यता है कि महाराज मानधाता ने मानसरोवर झील की खोज की थी। इसके अलावा उन्होंने इसी झील के किनारे कई वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। इसके अलावा इस जगह के बारे में बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इसके केंद्र में एक वृक्ष है, जिसके फलों के चिकित्सकीय गुण सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोगों का उपचार करने में सक्षम हैं।
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*🟠●अद्भुत ●ঔৣ● अकल्पनीय●🟠*
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🌹चित्र में आप तीन शिवलिंग देख रहे है ......
इसमे एक शिवलिंग अफगानिस्तान का है, दूसरा शिवलिंग वियतनाम का है.........और तीसरा शिवलिंग है मलेशिया का ....
यह सभी शिवलिंग लगभग 2000 वर्ष से भी अधिक पुराने है .....
यह सभी शिवलिंग इस बात प्रत्यक्ष प्रमाण है, की आज से 2500 वर्ष पहले सिर्फ एक धर्म था, जिसका नाम " सनातन ( वैदिक/हिन्दू) धर्म था ।। यह बात अलग है, की हमसे, हमारा धर्म संभाला नही गया ......
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
🌹चित्र में आप तीन शिवलिंग देख रहे है ......
इसमे एक शिवलिंग अफगानिस्तान का है, दूसरा शिवलिंग वियतनाम का है.........और तीसरा शिवलिंग है मलेशिया का ....
यह सभी शिवलिंग लगभग 2000 वर्ष से भी अधिक पुराने है .....
यह सभी शिवलिंग इस बात प्रत्यक्ष प्रमाण है, की आज से 2500 वर्ष पहले सिर्फ एक धर्म था, जिसका नाम " सनातन ( वैदिक/हिन्दू) धर्म था ।। यह बात अलग है, की हमसे, हमारा धर्म संभाला नही गया ......
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Forwarded from Malook Peethadhishwar Swami Shri Rajendra Das Ji Maharaj
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बहुत पुरानी फोटो ओरछा रामराजा मंदिर की
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कनक दुर्गा मंदिर, विजयवाड़ा 🛕
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
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नासा ने जारी किया अंडर वाटर बहुत ही सुंदर "द्वारिका" जो कि समुद्र में आज भी मौजूद हैl
Forwarded from The Narrative
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भद्रराज मंदिर, मसूरी 🛕
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
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🌹जानना_चाहते_हो_अजूबा_किसे_कहते_हैं ?
इस मंदिर की वास्तुकला इस प्रकार की है कि सुबह की पहली किरण वेधशाला, मंडप और गर्भगृह के छोटे से द्वार को चीरती हुई शिवलिंग पर गिरती है।
मानो सूर्य भोलेनाथ को प्रणाम कर दुनिया में प्रकाश फैलाने की अनुमति मांगता हो ।
क्या उन्नत वास्तुकला व तकनीक के धनी थे हमारे पूर्वज, हमें इस पर गर्व है, लेकिन आजकल की युवा पीढ़ी को ये सब जानने की इच्छा कहा है ।
🌹नीलकंठेश्वर_मंदिर, उदयपुर🙏🏻🚩
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
🌹जानना_चाहते_हो_अजूबा_किसे_कहते_हैं ?
इस मंदिर की वास्तुकला इस प्रकार की है कि सुबह की पहली किरण वेधशाला, मंडप और गर्भगृह के छोटे से द्वार को चीरती हुई शिवलिंग पर गिरती है।
मानो सूर्य भोलेनाथ को प्रणाम कर दुनिया में प्रकाश फैलाने की अनुमति मांगता हो ।
क्या उन्नत वास्तुकला व तकनीक के धनी थे हमारे पूर्वज, हमें इस पर गर्व है, लेकिन आजकल की युवा पीढ़ी को ये सब जानने की इच्छा कहा है ।
🌹नीलकंठेश्वर_मंदिर, उदयपुर🙏🏻🚩
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