Forwarded from The Narrative
This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
शिकारी देवी मंदिर, हिमाचल प्रदेश 🛕
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
*🟠●अद्भुत ●ঔৣ● अकल्पनीय●🟠*
~~~~
🌹गढ़ पहरा महल ( सागर , मध्यप्रदेश ) एक रहस्य मयी और भूतिया किला है इसका इतिहास २०० वर्ष पुराना है इस किले के अधिकांश भाग खंडहर और जीर्ण-शीर्ण हो चुके हैं , कुछ महल और इमारतें ठीक-ठाक हालत में है , उन्हीं में से ये इमारत है जिसे शीशमहल कहा जाता है, पास में सागर झांसी हाई-वे है जिस पर गुजरने वाले काफी लौगौ को यहां रहस्यमयी और अजीबोगरीब घटनाओं को देखा जाना बताया गया है , वैसे गांवों की प्राचीन दंत कथाओं में यहां नट और नटनी की कहानी प्रचलित है जिसमें उनकी मौत हो जाती है और शायद उसी आधार पर इसको रहस्यमयी माना गया हो...lll
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
🌹ग
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
*⊰╾─ঔৣ तत्त्वबोध शिवोहम🌹●❥*
~~~~~~~
🌹अद्भुत_शिव_भक्ति
नागराज कोबरा प्रतिदिन पेड़ से "बिल्व पत्र" तोड़ते हैं और अपने स्वामी थेपरुमानल्लूर मंदिर के "शिवलिंग" पर अर्पित करते हैं।
मंदिर तमिलनाडु में "थिरुनागेश्वरम" रेलवे स्टेशन के पास स्थित है।
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
🌹अद्भुत_
नागराज कोबरा प्रतिदिन पेड़ से "बिल्व पत्र" तोड़ते हैं और अपने स्वामी थेपरुमानल्लूर मंदिर के "शिवलिंग" पर अर्पित करते हैं।
मंदिर तमिलनाडु में "थिरुनागेश्वरम" रेलवे स्टेशन के पास स्थित है।
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
Forwarded from 🌹श्रीमद भगवद गीता🌹
विश्व के सबसे छोटे आकार की "श्रीमद्भगवद्गीता"
ये धार्मिक ग्रंथ गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित है जो सिर्फ माचिस की डिब्बी जितने आकर की है और कीमत मात्र 10 ₹ की है!
जय जय श्रीराम🚩🚩🙏
ये धार्मिक ग्रंथ गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित है जो सिर्फ माचिस की डिब्बी जितने आकर की है और कीमत मात्र 10 ₹ की है!
जय जय श्रीराम🚩🚩🙏
देखो इन पोलिश पिलर को, 1000 साल बाद भी चमकते हैं।
भ्रम में मत रहना दोस्तों... ये धातु से नहीं बने हैं। लेकिन चट्टान से बने हैं।
अब, मेरा सवाल यह है कि उन्होंने मोड़ना, काटने, पॉलिशिंग और किन उपकरणों के साथ कैसे किया? 🤔
वीरा नारायण मंदिर बेलावाड़ी, कर्नाटक में इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना।🚩🚩
भ्रम में मत रहना दोस्तों... ये धातु से नहीं बने हैं। लेकिन चट्टान से बने हैं।
अब, मेरा सवाल यह है कि उन्होंने मोड़ना, काटने, पॉलिशिंग और किन उपकरणों के साथ कैसे किया? 🤔
वीरा नारायण मंदिर बेलावाड़ी, कर्नाटक में इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना।🚩🚩
*🟠●अद्भुत ●ঔৣ● अकल्पनीय●🟠*
~~~~
🌹जय अखण्ड भारत
कोशिश तो बहुत की मिटाने हमारे अस्तिवत को, लेकिन नही मिटा सकें, गर्व से कहो हम सनातनी है
रहस्यमय भगवान गणेश तीर्थस्थल, दंतेवाड़ा-छत्तीसगढ़ 🚩👇
👉1000 साल पुराना रहस्यमय भगवान गणेश तीर्थस्थल, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में एक ढोलकल पहाड़ पर, 3000 फीट की ऊँचाई पर एक घने जंगल के बीच में एक पहाड़ी के ऊपर स्थित है
🚩पौराणिक कथाओं में परशुराम और भगवान गणेश के बीच जिस युद्ध का वर्णन है वह छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के ढोलकल पहाडिय़ों पर हुआ था।
👉यहां आज भी इस बात के प्रमाण मिलते हैं।
♦️यहां समुद्र तल से 2994 फीट ऊंची चोटी पर भगवान गणेश विराजे हुए हैं।
♦️यह कोई नहीं जानता, इतनी ऊंचाई पर गणेश की प्रतिमा कैसे पहुंची।
♦️पुरातत्ववेत्ताओं के मुताबिक यह प्रतिमा 11 वीं सदी की है।
तब यहां नागवंशी राजाओं का शासन था।
♦️गणेश प्रतिमा के पेट पर नाग का चित्र अंकित है।
♦️इस आधार पर माना जाता है, इसकी स्थापना नागवंशी राजाओं ने की होगी।
♦️यह प्रतिमा पूरी तरह सुरक्षित और ललितासन में है।
♦️हालांकि इतनी ऊंचाई पर ले जाने या इसे बनाने के लिए कौन सी तकनीक अपनाई गई यह रहस्य है।
🧿आर्कियोलॉजिस्ट के मुताबिक पूरे बस्तर में ऐसे प्रतिमा और कहीं नहीं है।
🔍इसलिए यह रहस्य और भी गहरा हो जाता है कि ऐसी एक ही प्रतिमा यहां कहां से आई।
👉इस घटना को चिरस्थाई बनाने के लिए छिंदक नागवंशी राजाओं ने शिखर पर गणेश की प्रतिमा स्थापति की।
👉चूंकि परशूराम के फरसे से गणेश का दांत टूटा था, इसलिए पहाड़ी की शिखर के नीचे के गांव का नाम फरसपाल रखा गया।
👉बगल में कोतवाल पारा गांव है। कोतवाल मतलब रक्षक या पहरेदार।
👉लोग यहां गणेश को अपने क्षेत्र का रक्षक मानते हैं।
🙏🙏🙏
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
🌹ज
कोशिश
रहस्यमय भगवान गणेश तीर्थस्थल, दंतेवाड़ा-छत्तीसगढ़ 🚩👇
👉1000 साल पुराना रहस्यमय भगवान गणेश तीर्थस्थल, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में एक ढोलकल पहाड़ पर, 3000 फीट की ऊँचाई पर एक घने जंगल के बीच में एक पहाड़ी के ऊपर स्थित है
🚩पौराणिक कथाओं में परशुराम और भगवान गणेश के बीच जिस युद्ध का वर्णन है वह छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के ढोलकल पहाडिय़ों पर हुआ था।
👉यहां आज भी इस बात के प्रमाण मिलते हैं।
♦️यहां समुद्र तल से 2994 फीट ऊंची चोटी पर भगवान गणेश विराजे हुए हैं।
♦️यह कोई नहीं जानता, इतनी ऊंचाई पर गणेश की प्रतिमा कैसे पहुंची।
♦️पुरातत्ववेत्ताओं के मुताबिक यह प्रतिमा 11 वीं सदी की है।
तब यहां नागवंशी राजाओं का शासन था।
♦️गणेश प्रतिमा के पेट पर नाग का चित्र अंकित है।
♦️इस आधार पर माना जाता है, इसकी स्थापना नागवंशी राजाओं ने की होगी।
♦️यह प्रतिमा पूरी तरह सुरक्षित और ललितासन में है।
♦️हालांकि इतनी ऊंचाई पर ले जाने या इसे बनाने के लिए कौन सी तकनीक अपनाई गई यह रहस्य है।
🧿आर्कियोलॉजिस्ट के मुताबिक पूरे बस्तर में ऐसे प्रतिमा और कहीं नहीं है।
🔍इसलिए यह रहस्य और भी गहरा हो जाता है कि ऐसी एक ही प्रतिमा यहां कहां से आई।
👉इस घटना को चिरस्थाई बनाने के लिए छिंदक नागवंशी राजाओं ने शिखर पर गणेश की प्रतिमा स्थापति की।
👉चूंकि परशूराम के फरसे से गणेश का दांत टूटा था, इसलिए पहाड़ी की शिखर के नीचे के गांव का नाम फरसपाल रखा गया।
👉बगल में कोतवाल पारा गांव है। कोतवाल मतलब रक्षक या पहरेदार।
👉लोग यहां गणेश को अपने क्षेत्र का रक्षक मानते हैं।
🙏🙏🙏
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
होयसला राजवंश 🙏🙏
🔹कलिंग नार्थना (कलिंग नृत्य) युवा भगवान कृष्ण को नाग कलिंग (कालिया) पर नृत्य और नृत्य को संदर्भित करता है ताकि उन्हें यमुना नदी को और विष देने से रोका जा सके। कई हुड्स के साथ कलिंग (कालिया) हमारी कई इच्छाओं का प्रतीक है..... जब एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी बढ़ जाती है।
🔹भगवान कृष्ण ऊपर मूर्तिकला में अपने बाएं पैरों के नीचे पूरे ब्रह्मांड के भार के साथ कलिंग के हुडों पर दृढ़ता से रखे और दाएं पैर उठाए हुए कलिंग पर नृत्य करते दिखाई दे रहे हैं। जबकि उसका दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है और बाएं हाथ नाग की पूंछ पकड़े हुए है।🙏🏻💐🚩
🔹कलिंग नार्थना (कलिंग नृत्य) युवा भगवान कृष्ण को नाग कलिंग (कालिया) पर नृत्य और नृत्य को संदर्भित करता है ताकि उन्हें यमुना नदी को और विष देने से रोका जा सके। कई हुड्स के साथ कलिंग (कालिया) हमारी कई इच्छाओं का प्रतीक है..... जब एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी बढ़ जाती है।
🔹भगवान कृष्ण ऊपर मूर्तिकला में अपने बाएं पैरों के नीचे पूरे ब्रह्मांड के भार के साथ कलिंग के हुडों पर दृढ़ता से रखे और दाएं पैर उठाए हुए कलिंग पर नृत्य करते दिखाई दे रहे हैं। जबकि उसका दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है और बाएं हाथ नाग की पूंछ पकड़े हुए है।🙏🏻💐🚩
🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢
*🌹🌹बृज दर्शन 🌹🌹*
*मदन मोहन जी मंदिर*
*वृन्दावन कौ सबते पुरानों मंदिर*
मदन मोहन जी का मंदिर वृंदावन में स्थित एक वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है। इसका निर्माण संभवतः १५९० से १६२७ के बीच में मुल्तान निवासी श्री रामदास खत्री एवं कपूरी द्वारा करवाया गया था। निमार्ण के समय और शिल्पियों के संबन्ध में कुछ जानकारी नहीं है। प्रचलित कथाओं में आता है कि राम दास खत्री (कपूरी नाम से प्रचलित) व्यापारी की व्यापारिक सामान से लदी नाव यहाँ यमुना में फंस गयी थी। जो मदन मोहन जी के दर्शन और प्रार्थना के बाद निकल गयी।
वापसी में राम दास ने मंदिर बनवाया श्रीकृष्ण भगवान के अनेक नामों में से एक प्रिय नाम मदनमोहन भी है। इसी नाम से एक मंदिर कालीदह घाट के समीप शहर के दूसरी ओर ऊँचे टीले पर विद्यमान है। यहां विशालकायिक नाग के फन पर भगवान चरणाघात कर रहे हैं। लक्ष्मणदास के भक्त-सिन्धु में इसकी कथा दी गयी है। यह भक्त-माल का आधुनिक संस्करण है। गोस्वामीपाद रूप और सनातन को गोविन्द जी की मूर्ति नन्दगाँव से प्राप्त हुई थी। यहाँ एक गोखिरख में से खोदकर इसे निकाला गया था, इससे इसका नाम गोविन्द हुआ। वहाँ से लाकर गोविन्द जी को ब्रहृकुण्ड के वर्तमान मंदिर की जगह पर पधराया गया। वृन्दावन उन दिनों बसा हुआ नहीं था। वे समीपर्वती गाँवों में तथा मथुरा भी भिक्षाटन हेतु जाते थे। एक दिन मथुरा के एक व्यक्ति ने उन्हें मदनमोहन की मूर्ति प्रदान की जिसे उन्होंने लाकर दु:शासन पहाड़ी पर कालीदह के पास पधार दिया। वहीं उन्होंने अपने रहने के लिये एक झोंपड़ी भी बना ली और उस जगह का नाम पशुकन्दन घाट रख दिया। क्योंकि मार्ग इतना ऊँचा-नीचा और खराब था कि कोई पशु भी नहीं जा सकता था।
'निचाऊ-ऊँचाऊ देखी विशेषन पशुकन्दन वह घाट कहाई, तहाँ बैठी मनसुख लहाई।'
एक दिन पंजाब में मुल्तान का रामदास खत्री - जो कपूरी नाम से अधिक जाना जाता था, आगरा जाता हुआ व्यापार के माल से भरी नाव लेकर जमुना में आया किन्तु कालीदह घाट के पास रेतीले तट पर नाव अटक गयी। तीन दिनों तक निकालने के असफल प्रयासों के बाद वह स्थानीय देवता को खोजने और सहायता माँगने लगा। वह किनारे पर आकर पहाड़ी पर चढ़ा। वहाँ उसे सनातन मिले। सनातन ने व्यापारी से मदनमोहन से प्रार्थना करने का आदेश दिया। उसने ऐसा ही किया और तत्काल नाव तैरने लग गई। जब वह आगरे से माल बेचकर लौटा तो उसने सारा पैसा सनातन को अर्पण कर दिया और उससे वहाँ मंदिर बनाने की विनती की। मंदिर बन गया और लाल पत्थर का घाट भी बना।
🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢
*🌹🌹बृजभाषी समाज ( रजि.)*🌹🌹*
*(बृजभाषी समाज, बृज की अवाज )*
Video👆🏻👇🏻
*🌹🌹बृज दर्शन 🌹🌹*
*मदन मोहन जी मंदिर*
*वृन्दावन कौ सबते पुरानों मंदिर*
मदन मोहन जी का मंदिर वृंदावन में स्थित एक वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है। इसका निर्माण संभवतः १५९० से १६२७ के बीच में मुल्तान निवासी श्री रामदास खत्री एवं कपूरी द्वारा करवाया गया था। निमार्ण के समय और शिल्पियों के संबन्ध में कुछ जानकारी नहीं है। प्रचलित कथाओं में आता है कि राम दास खत्री (कपूरी नाम से प्रचलित) व्यापारी की व्यापारिक सामान से लदी नाव यहाँ यमुना में फंस गयी थी। जो मदन मोहन जी के दर्शन और प्रार्थना के बाद निकल गयी।
वापसी में राम दास ने मंदिर बनवाया श्रीकृष्ण भगवान के अनेक नामों में से एक प्रिय नाम मदनमोहन भी है। इसी नाम से एक मंदिर कालीदह घाट के समीप शहर के दूसरी ओर ऊँचे टीले पर विद्यमान है। यहां विशालकायिक नाग के फन पर भगवान चरणाघात कर रहे हैं। लक्ष्मणदास के भक्त-सिन्धु में इसकी कथा दी गयी है। यह भक्त-माल का आधुनिक संस्करण है। गोस्वामीपाद रूप और सनातन को गोविन्द जी की मूर्ति नन्दगाँव से प्राप्त हुई थी। यहाँ एक गोखिरख में से खोदकर इसे निकाला गया था, इससे इसका नाम गोविन्द हुआ। वहाँ से लाकर गोविन्द जी को ब्रहृकुण्ड के वर्तमान मंदिर की जगह पर पधराया गया। वृन्दावन उन दिनों बसा हुआ नहीं था। वे समीपर्वती गाँवों में तथा मथुरा भी भिक्षाटन हेतु जाते थे। एक दिन मथुरा के एक व्यक्ति ने उन्हें मदनमोहन की मूर्ति प्रदान की जिसे उन्होंने लाकर दु:शासन पहाड़ी पर कालीदह के पास पधार दिया। वहीं उन्होंने अपने रहने के लिये एक झोंपड़ी भी बना ली और उस जगह का नाम पशुकन्दन घाट रख दिया। क्योंकि मार्ग इतना ऊँचा-नीचा और खराब था कि कोई पशु भी नहीं जा सकता था।
'निचाऊ-ऊँचाऊ देखी विशेषन पशुकन्दन वह घाट कहाई, तहाँ बैठी मनसुख लहाई।'
एक दिन पंजाब में मुल्तान का रामदास खत्री - जो कपूरी नाम से अधिक जाना जाता था, आगरा जाता हुआ व्यापार के माल से भरी नाव लेकर जमुना में आया किन्तु कालीदह घाट के पास रेतीले तट पर नाव अटक गयी। तीन दिनों तक निकालने के असफल प्रयासों के बाद वह स्थानीय देवता को खोजने और सहायता माँगने लगा। वह किनारे पर आकर पहाड़ी पर चढ़ा। वहाँ उसे सनातन मिले। सनातन ने व्यापारी से मदनमोहन से प्रार्थना करने का आदेश दिया। उसने ऐसा ही किया और तत्काल नाव तैरने लग गई। जब वह आगरे से माल बेचकर लौटा तो उसने सारा पैसा सनातन को अर्पण कर दिया और उससे वहाँ मंदिर बनाने की विनती की। मंदिर बन गया और लाल पत्थर का घाट भी बना।
🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢🟢
*🌹🌹बृजभाषी समाज ( रजि.)*🌹🌹*
*(बृजभाषी समाज, बृज की अवाज )*
Video👆🏻👇🏻
Media is too big
VIEW IN TELEGRAM
Video from जैकी मनवानी
एक ही पत्थर से बने विशाल शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है। भारत की सबसे असाधारण इमारतों में से एक है।
मध्य प्रदेश के भोजपुर गांव में स्थित भोजेश्वर मंदिर विस्मय और रहस्य से भरा है।
निर्माण कार्य 11वीं शताब्दी से पहले शुरू हुआ था। अगर इसे पूरी तरह से बनाया गया होता, तो मंदिर भारत की सबसे बड़ी स्थापत्य उपलब्धियों में से एक बन सकता था।
पास की चट्टानों पर की गई नक्काशी से पता चलता है कि मूल योजना बहुत बड़े मंदिर की थी।
मध्य प्रदेश के भोजपुर गांव में स्थित भोजेश्वर मंदिर विस्मय और रहस्य से भरा है।
निर्माण कार्य 11वीं शताब्दी से पहले शुरू हुआ था। अगर इसे पूरी तरह से बनाया गया होता, तो मंदिर भारत की सबसे बड़ी स्थापत्य उपलब्धियों में से एक बन सकता था।
पास की चट्टानों पर की गई नक्काशी से पता चलता है कि मूल योजना बहुत बड़े मंदिर की थी।
*🟠●अद्भुत ●ঔৣ● अकल्पनीय●🟠*
~~~~
🌹#चतुर्भुज_मंदिर_ओरछा_मध्य_प्रदेश
चतुर्भुज मंदिर का निर्माण राजा मधुकर ने 1558 और 1573 की अवधि के दौरान करवाया था
चतुर्भुज मंदिर, भगवान विष्णु को समर्पित, भारत के मध्य प्रदेश में ओरछा में स्थित है। चतुर्भुज नाम 'चतुर' का अर्थ है "चार" और 'भुज' का अर्थ है "हथियार" जिसका शाब्दिक अर्थ है "वह जिसके पास चार भुजाएं हैं" और भगवान राम को भगवान विष्णु का अवतार बताता है। मंदिर में एक जटिल बहु-मंजिला संरचनात्मक दृश्य है जो मंदिर, किले और महल की स्थापत्य सुविधाओं का मिश्रण है।
मंदिर को मूल रूप से भगवान राम की एक छवि बनाने के लिए बनाया गया था, मुख्य देवता के रूप में, जो ओरछा किला परिसर के अंदर राम राजा मंदिर में स्थापित किया गया था। वर्तमान में राधा कृष्ण की एक छवि मंदिर में पूजी जाती है। यह मंदिर 344 फीट की ऊंचाई पर स्थित हिंदू मंदिरों में से एक सबसे बड़ा विमना है।
ओरछा मध्य प्रदेश राज्य, निवारी जिले का एक शहर है। रुद्र प्रताप सिंह द्वारा 1501 के बाद बुंदेलखंड क्षेत्र में मध्य और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों को कवर करने वाली एक पूर्व रियासत की सीट के रूप में इस शहर की स्थापना की गई थी। ओरछा बेतवा नदी पर स्थित है, जो टीकमगढ़ से 80 किमी और उत्तर प्रदेश में झांसी से 15 किमी दूर है।
ओरछा की स्थापना 1531 (16 वीं शताब्दी ईस्वी) में बुंदेला राजपूत प्रमुख, रुद्र प्रताप सिंह द्वारा की गई थी, जो ओरछा के पहले राजा बने (आर। 1501-1531) और उन्होंने ओरछा का किला भी बनवाया। चतुर्भुज मंदिर का निर्माण सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान, ओरछा के रानी गणेश कुंवर (गणेश कुँवर) द्वारा किया गया था, जबकि राज मंदिर 'राजा मधुकर शाह' द्वारा 1554 से 1591 के दौरान बनाया गया था।
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
🌹#
चतुर्भुज मंदिर का निर्माण राजा मधुकर ने 1558 और 1573 की अवधि के दौरान करवाया था
चतुर्भुज मंदिर, भगवान विष्णु को समर्पित, भारत के मध्य प्रदेश में ओरछा में स्थित है। चतुर्भुज नाम 'चतुर' का अर्थ है "चार" और 'भुज' का अर्थ है "हथियार" जिसका शाब्दिक अर्थ है "वह जिसके पास चार भुजाएं हैं" और भगवान राम को भगवान विष्णु का अवतार बताता है। मंदिर में एक जटिल बहु-मंजिला संरचनात्मक दृश्य है जो मंदिर, किले और महल की स्थापत्य सुविधाओं का मिश्रण है।
मंदिर को मूल रूप से भगवान राम की एक छवि बनाने के लिए बनाया गया था, मुख्य देवता के रूप में, जो ओरछा किला परिसर के अंदर राम राजा मंदिर में स्थापित किया गया था। वर्तमान में राधा कृष्ण की एक छवि मंदिर में पूजी जाती है। यह मंदिर 344 फीट की ऊंचाई पर स्थित हिंदू मंदिरों में से एक सबसे बड़ा विमना है।
ओरछा मध्य प्रदेश राज्य, निवारी जिले का एक शहर है। रुद्र प्रताप सिंह द्वारा 1501 के बाद बुंदेलखंड क्षेत्र में मध्य और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों को कवर करने वाली एक पूर्व रियासत की सीट के रूप में इस शहर की स्थापना की गई थी। ओरछा बेतवा नदी पर स्थित है, जो टीकमगढ़ से 80 किमी और उत्तर प्रदेश में झांसी से 15 किमी दूर है।
ओरछा की स्थापना 1531 (16 वीं शताब्दी ईस्वी) में बुंदेला राजपूत प्रमुख, रुद्र प्रताप सिंह द्वारा की गई थी, जो ओरछा के पहले राजा बने (आर। 1501-1531) और उन्होंने ओरछा का किला भी बनवाया। चतुर्भुज मंदिर का निर्माण सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान, ओरछा के रानी गणेश कुंवर (गणेश कुँवर) द्वारा किया गया था, जबकि राज मंदिर 'राजा मधुकर शाह' द्वारा 1554 से 1591 के दौरान बनाया गया था।
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
100 करोड़ में तैयार हुई आचार्य रामनुजाचार्य की सबसे बड़ी प्रतिमा, पूरे प्रोजेक्ट की लागत 1400 करोड़।
हैदराबाद में स्थापित की गई आचार्य रामानुजाचार्य की यह प्रतिमा दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी बैठी हुई प्रतिमा है, जिसे बनाने में 9 महीने का वक़्त लग गया।
स्वामी रामनुजाचार्य की विशालकाय प्रतिमा का लोकार्पण देश के पीएम नरेंद्र मोदी इसी साल फरवरी में करेंगे, इस स्टैचू के साथ 108 मंदिर का निर्माण किया गया है, इसी के साथ आचार्य रामनुजाचार्य की एक छोटी प्रतिमा भी बनाई गई है जिसमे 120 किलो सोने का इस्तेमाल किया गया है। इस जगह को स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी (Statue Of Equality) नाम दिया गया है. इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में 1400 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।
स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी को शास्त्रों के तहत बनाया गया है
स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी को बनाने में 18 महीने का समय लगा है, इसके लिए मूर्तिकारों ने कई डिज़ाइन तैयार किए और उनकी स्कैनिंग करने के बाद सबसे बेस्ट मूर्ति को विशाल रूप दिया गया। इस प्रतिमा की ऊंचाई 108 फ़ीट है, जबकि प्रतिमा में लगे त्रिदण्डम की उंचाई 138 फ़ीट है। टोटल प्रतिमा की हाइट 216 फ़ीट है। आचार्य रामानुजाचार्य की प्रतिमा में 5 कमल पंखुडिया, 27 पद्म पीठम, 36 हाथी, और प्रतिमा तक पहुंचने के लिए 108 सीढिया बनाई गई हैं।
🚩🚩🚩🚩
हैदराबाद में स्थापित की गई आचार्य रामानुजाचार्य की यह प्रतिमा दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी बैठी हुई प्रतिमा है, जिसे बनाने में 9 महीने का वक़्त लग गया।
स्वामी रामनुजाचार्य की विशालकाय प्रतिमा का लोकार्पण देश के पीएम नरेंद्र मोदी इसी साल फरवरी में करेंगे, इस स्टैचू के साथ 108 मंदिर का निर्माण किया गया है, इसी के साथ आचार्य रामनुजाचार्य की एक छोटी प्रतिमा भी बनाई गई है जिसमे 120 किलो सोने का इस्तेमाल किया गया है। इस जगह को स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी (Statue Of Equality) नाम दिया गया है. इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में 1400 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।
स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी को शास्त्रों के तहत बनाया गया है
स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी को बनाने में 18 महीने का समय लगा है, इसके लिए मूर्तिकारों ने कई डिज़ाइन तैयार किए और उनकी स्कैनिंग करने के बाद सबसे बेस्ट मूर्ति को विशाल रूप दिया गया। इस प्रतिमा की ऊंचाई 108 फ़ीट है, जबकि प्रतिमा में लगे त्रिदण्डम की उंचाई 138 फ़ीट है। टोटल प्रतिमा की हाइट 216 फ़ीट है। आचार्य रामानुजाचार्य की प्रतिमा में 5 कमल पंखुडिया, 27 पद्म पीठम, 36 हाथी, और प्रतिमा तक पहुंचने के लिए 108 सीढिया बनाई गई हैं।
🚩🚩🚩🚩