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*🌹🌹बृज दर्शन 🌹🌹*
*मदन मोहन जी मंदिर*
*वृन्दावन कौ सबते पुरानों मंदिर*
मदन मोहन जी का मंदिर वृंदावन में स्थित एक वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है। इसका निर्माण संभवतः १५९० से १६२७ के बीच में मुल्तान निवासी श्री रामदास खत्री एवं कपूरी द्वारा करवाया गया था। निमार्ण के समय और शिल्पियों के संबन्ध में कुछ जानकारी नहीं है। प्रचलित कथाओं में आता है कि राम दास खत्री (कपूरी नाम से प्रचलित) व्यापारी की व्यापारिक सामान से लदी नाव यहाँ यमुना में फंस गयी थी। जो मदन मोहन जी के दर्शन और प्रार्थना के बाद निकल गयी।
वापसी में राम दास ने मंदिर बनवाया श्रीकृष्ण भगवान के अनेक नामों में से एक प्रिय नाम मदनमोहन भी है। इसी नाम से एक मंदिर कालीदह घाट के समीप शहर के दूसरी ओर ऊँचे टीले पर विद्यमान है। यहां विशालकायिक नाग के फन पर भगवान चरणाघात कर रहे हैं। लक्ष्मणदास के भक्त-सिन्धु में इसकी कथा दी गयी है। यह भक्त-माल का आधुनिक संस्करण है। गोस्वामीपाद रूप और सनातन को गोविन्द जी की मूर्ति नन्दगाँव से प्राप्त हुई थी। यहाँ एक गोखिरख में से खोदकर इसे निकाला गया था, इससे इसका नाम गोविन्द हुआ। वहाँ से लाकर गोविन्द जी को ब्रहृकुण्ड के वर्तमान मंदिर की जगह पर पधराया गया। वृन्दावन उन दिनों बसा हुआ नहीं था। वे समीपर्वती गाँवों में तथा मथुरा भी भिक्षाटन हेतु जाते थे। एक दिन मथुरा के एक व्यक्ति ने उन्हें मदनमोहन की मूर्ति प्रदान की जिसे उन्होंने लाकर दु:शासन पहाड़ी पर कालीदह के पास पधार दिया। वहीं उन्होंने अपने रहने के लिये एक झोंपड़ी भी बना ली और उस जगह का नाम पशुकन्दन घाट रख दिया। क्योंकि मार्ग इतना ऊँचा-नीचा और खराब था कि कोई पशु भी नहीं जा सकता था।
'निचाऊ-ऊँचाऊ देखी विशेषन पशुकन्दन वह घाट कहाई, तहाँ बैठी मनसुख लहाई।'
एक दिन पंजाब में मुल्तान का रामदास खत्री - जो कपूरी नाम से अधिक जाना जाता था, आगरा जाता हुआ व्यापार के माल से भरी नाव लेकर जमुना में आया किन्तु कालीदह घाट के पास रेतीले तट पर नाव अटक गयी। तीन दिनों तक निकालने के असफल प्रयासों के बाद वह स्थानीय देवता को खोजने और सहायता माँगने लगा। वह किनारे पर आकर पहाड़ी पर चढ़ा। वहाँ उसे सनातन मिले। सनातन ने व्यापारी से मदनमोहन से प्रार्थना करने का आदेश दिया। उसने ऐसा ही किया और तत्काल नाव तैरने लग गई। जब वह आगरे से माल बेचकर लौटा तो उसने सारा पैसा सनातन को अर्पण कर दिया और उससे वहाँ मंदिर बनाने की विनती की। मंदिर बन गया और लाल पत्थर का घाट भी बना।
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*🌹🌹बृजभाषी समाज ( रजि.)*🌹🌹*
*(बृजभाषी समाज, बृज की अवाज )*
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*मदन मोहन जी मंदिर*
*वृन्दावन कौ सबते पुरानों मंदिर*
मदन मोहन जी का मंदिर वृंदावन में स्थित एक वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है। इसका निर्माण संभवतः १५९० से १६२७ के बीच में मुल्तान निवासी श्री रामदास खत्री एवं कपूरी द्वारा करवाया गया था। निमार्ण के समय और शिल्पियों के संबन्ध में कुछ जानकारी नहीं है। प्रचलित कथाओं में आता है कि राम दास खत्री (कपूरी नाम से प्रचलित) व्यापारी की व्यापारिक सामान से लदी नाव यहाँ यमुना में फंस गयी थी। जो मदन मोहन जी के दर्शन और प्रार्थना के बाद निकल गयी।
वापसी में राम दास ने मंदिर बनवाया श्रीकृष्ण भगवान के अनेक नामों में से एक प्रिय नाम मदनमोहन भी है। इसी नाम से एक मंदिर कालीदह घाट के समीप शहर के दूसरी ओर ऊँचे टीले पर विद्यमान है। यहां विशालकायिक नाग के फन पर भगवान चरणाघात कर रहे हैं। लक्ष्मणदास के भक्त-सिन्धु में इसकी कथा दी गयी है। यह भक्त-माल का आधुनिक संस्करण है। गोस्वामीपाद रूप और सनातन को गोविन्द जी की मूर्ति नन्दगाँव से प्राप्त हुई थी। यहाँ एक गोखिरख में से खोदकर इसे निकाला गया था, इससे इसका नाम गोविन्द हुआ। वहाँ से लाकर गोविन्द जी को ब्रहृकुण्ड के वर्तमान मंदिर की जगह पर पधराया गया। वृन्दावन उन दिनों बसा हुआ नहीं था। वे समीपर्वती गाँवों में तथा मथुरा भी भिक्षाटन हेतु जाते थे। एक दिन मथुरा के एक व्यक्ति ने उन्हें मदनमोहन की मूर्ति प्रदान की जिसे उन्होंने लाकर दु:शासन पहाड़ी पर कालीदह के पास पधार दिया। वहीं उन्होंने अपने रहने के लिये एक झोंपड़ी भी बना ली और उस जगह का नाम पशुकन्दन घाट रख दिया। क्योंकि मार्ग इतना ऊँचा-नीचा और खराब था कि कोई पशु भी नहीं जा सकता था।
'निचाऊ-ऊँचाऊ देखी विशेषन पशुकन्दन वह घाट कहाई, तहाँ बैठी मनसुख लहाई।'
एक दिन पंजाब में मुल्तान का रामदास खत्री - जो कपूरी नाम से अधिक जाना जाता था, आगरा जाता हुआ व्यापार के माल से भरी नाव लेकर जमुना में आया किन्तु कालीदह घाट के पास रेतीले तट पर नाव अटक गयी। तीन दिनों तक निकालने के असफल प्रयासों के बाद वह स्थानीय देवता को खोजने और सहायता माँगने लगा। वह किनारे पर आकर पहाड़ी पर चढ़ा। वहाँ उसे सनातन मिले। सनातन ने व्यापारी से मदनमोहन से प्रार्थना करने का आदेश दिया। उसने ऐसा ही किया और तत्काल नाव तैरने लग गई। जब वह आगरे से माल बेचकर लौटा तो उसने सारा पैसा सनातन को अर्पण कर दिया और उससे वहाँ मंदिर बनाने की विनती की। मंदिर बन गया और लाल पत्थर का घाट भी बना।
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Video from जैकी मनवानी
एक ही पत्थर से बने विशाल शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है। भारत की सबसे असाधारण इमारतों में से एक है।
मध्य प्रदेश के भोजपुर गांव में स्थित भोजेश्वर मंदिर विस्मय और रहस्य से भरा है।
निर्माण कार्य 11वीं शताब्दी से पहले शुरू हुआ था। अगर इसे पूरी तरह से बनाया गया होता, तो मंदिर भारत की सबसे बड़ी स्थापत्य उपलब्धियों में से एक बन सकता था।
पास की चट्टानों पर की गई नक्काशी से पता चलता है कि मूल योजना बहुत बड़े मंदिर की थी।
मध्य प्रदेश के भोजपुर गांव में स्थित भोजेश्वर मंदिर विस्मय और रहस्य से भरा है।
निर्माण कार्य 11वीं शताब्दी से पहले शुरू हुआ था। अगर इसे पूरी तरह से बनाया गया होता, तो मंदिर भारत की सबसे बड़ी स्थापत्य उपलब्धियों में से एक बन सकता था।
पास की चट्टानों पर की गई नक्काशी से पता चलता है कि मूल योजना बहुत बड़े मंदिर की थी।
*🟠●अद्भुत ●ঔৣ● अकल्पनीय●🟠*
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🌹#चतुर्भुज_मंदिर_ओरछा_मध्य_प्रदेश
चतुर्भुज मंदिर का निर्माण राजा मधुकर ने 1558 और 1573 की अवधि के दौरान करवाया था
चतुर्भुज मंदिर, भगवान विष्णु को समर्पित, भारत के मध्य प्रदेश में ओरछा में स्थित है। चतुर्भुज नाम 'चतुर' का अर्थ है "चार" और 'भुज' का अर्थ है "हथियार" जिसका शाब्दिक अर्थ है "वह जिसके पास चार भुजाएं हैं" और भगवान राम को भगवान विष्णु का अवतार बताता है। मंदिर में एक जटिल बहु-मंजिला संरचनात्मक दृश्य है जो मंदिर, किले और महल की स्थापत्य सुविधाओं का मिश्रण है।
मंदिर को मूल रूप से भगवान राम की एक छवि बनाने के लिए बनाया गया था, मुख्य देवता के रूप में, जो ओरछा किला परिसर के अंदर राम राजा मंदिर में स्थापित किया गया था। वर्तमान में राधा कृष्ण की एक छवि मंदिर में पूजी जाती है। यह मंदिर 344 फीट की ऊंचाई पर स्थित हिंदू मंदिरों में से एक सबसे बड़ा विमना है।
ओरछा मध्य प्रदेश राज्य, निवारी जिले का एक शहर है। रुद्र प्रताप सिंह द्वारा 1501 के बाद बुंदेलखंड क्षेत्र में मध्य और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों को कवर करने वाली एक पूर्व रियासत की सीट के रूप में इस शहर की स्थापना की गई थी। ओरछा बेतवा नदी पर स्थित है, जो टीकमगढ़ से 80 किमी और उत्तर प्रदेश में झांसी से 15 किमी दूर है।
ओरछा की स्थापना 1531 (16 वीं शताब्दी ईस्वी) में बुंदेला राजपूत प्रमुख, रुद्र प्रताप सिंह द्वारा की गई थी, जो ओरछा के पहले राजा बने (आर। 1501-1531) और उन्होंने ओरछा का किला भी बनवाया। चतुर्भुज मंदिर का निर्माण सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान, ओरछा के रानी गणेश कुंवर (गणेश कुँवर) द्वारा किया गया था, जबकि राज मंदिर 'राजा मधुकर शाह' द्वारा 1554 से 1591 के दौरान बनाया गया था।
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
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चतुर्भुज मंदिर का निर्माण राजा मधुकर ने 1558 और 1573 की अवधि के दौरान करवाया था
चतुर्भुज मंदिर, भगवान विष्णु को समर्पित, भारत के मध्य प्रदेश में ओरछा में स्थित है। चतुर्भुज नाम 'चतुर' का अर्थ है "चार" और 'भुज' का अर्थ है "हथियार" जिसका शाब्दिक अर्थ है "वह जिसके पास चार भुजाएं हैं" और भगवान राम को भगवान विष्णु का अवतार बताता है। मंदिर में एक जटिल बहु-मंजिला संरचनात्मक दृश्य है जो मंदिर, किले और महल की स्थापत्य सुविधाओं का मिश्रण है।
मंदिर को मूल रूप से भगवान राम की एक छवि बनाने के लिए बनाया गया था, मुख्य देवता के रूप में, जो ओरछा किला परिसर के अंदर राम राजा मंदिर में स्थापित किया गया था। वर्तमान में राधा कृष्ण की एक छवि मंदिर में पूजी जाती है। यह मंदिर 344 फीट की ऊंचाई पर स्थित हिंदू मंदिरों में से एक सबसे बड़ा विमना है।
ओरछा मध्य प्रदेश राज्य, निवारी जिले का एक शहर है। रुद्र प्रताप सिंह द्वारा 1501 के बाद बुंदेलखंड क्षेत्र में मध्य और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों को कवर करने वाली एक पूर्व रियासत की सीट के रूप में इस शहर की स्थापना की गई थी। ओरछा बेतवा नदी पर स्थित है, जो टीकमगढ़ से 80 किमी और उत्तर प्रदेश में झांसी से 15 किमी दूर है।
ओरछा की स्थापना 1531 (16 वीं शताब्दी ईस्वी) में बुंदेला राजपूत प्रमुख, रुद्र प्रताप सिंह द्वारा की गई थी, जो ओरछा के पहले राजा बने (आर। 1501-1531) और उन्होंने ओरछा का किला भी बनवाया। चतुर्भुज मंदिर का निर्माण सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान, ओरछा के रानी गणेश कुंवर (गणेश कुँवर) द्वारा किया गया था, जबकि राज मंदिर 'राजा मधुकर शाह' द्वारा 1554 से 1591 के दौरान बनाया गया था।
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100 करोड़ में तैयार हुई आचार्य रामनुजाचार्य की सबसे बड़ी प्रतिमा, पूरे प्रोजेक्ट की लागत 1400 करोड़।
हैदराबाद में स्थापित की गई आचार्य रामानुजाचार्य की यह प्रतिमा दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी बैठी हुई प्रतिमा है, जिसे बनाने में 9 महीने का वक़्त लग गया।
स्वामी रामनुजाचार्य की विशालकाय प्रतिमा का लोकार्पण देश के पीएम नरेंद्र मोदी इसी साल फरवरी में करेंगे, इस स्टैचू के साथ 108 मंदिर का निर्माण किया गया है, इसी के साथ आचार्य रामनुजाचार्य की एक छोटी प्रतिमा भी बनाई गई है जिसमे 120 किलो सोने का इस्तेमाल किया गया है। इस जगह को स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी (Statue Of Equality) नाम दिया गया है. इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में 1400 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।
स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी को शास्त्रों के तहत बनाया गया है
स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी को बनाने में 18 महीने का समय लगा है, इसके लिए मूर्तिकारों ने कई डिज़ाइन तैयार किए और उनकी स्कैनिंग करने के बाद सबसे बेस्ट मूर्ति को विशाल रूप दिया गया। इस प्रतिमा की ऊंचाई 108 फ़ीट है, जबकि प्रतिमा में लगे त्रिदण्डम की उंचाई 138 फ़ीट है। टोटल प्रतिमा की हाइट 216 फ़ीट है। आचार्य रामानुजाचार्य की प्रतिमा में 5 कमल पंखुडिया, 27 पद्म पीठम, 36 हाथी, और प्रतिमा तक पहुंचने के लिए 108 सीढिया बनाई गई हैं।
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हैदराबाद में स्थापित की गई आचार्य रामानुजाचार्य की यह प्रतिमा दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी बैठी हुई प्रतिमा है, जिसे बनाने में 9 महीने का वक़्त लग गया।
स्वामी रामनुजाचार्य की विशालकाय प्रतिमा का लोकार्पण देश के पीएम नरेंद्र मोदी इसी साल फरवरी में करेंगे, इस स्टैचू के साथ 108 मंदिर का निर्माण किया गया है, इसी के साथ आचार्य रामनुजाचार्य की एक छोटी प्रतिमा भी बनाई गई है जिसमे 120 किलो सोने का इस्तेमाल किया गया है। इस जगह को स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी (Statue Of Equality) नाम दिया गया है. इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में 1400 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।
स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी को शास्त्रों के तहत बनाया गया है
स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी को बनाने में 18 महीने का समय लगा है, इसके लिए मूर्तिकारों ने कई डिज़ाइन तैयार किए और उनकी स्कैनिंग करने के बाद सबसे बेस्ट मूर्ति को विशाल रूप दिया गया। इस प्रतिमा की ऊंचाई 108 फ़ीट है, जबकि प्रतिमा में लगे त्रिदण्डम की उंचाई 138 फ़ीट है। टोटल प्रतिमा की हाइट 216 फ़ीट है। आचार्य रामानुजाचार्य की प्रतिमा में 5 कमल पंखुडिया, 27 पद्म पीठम, 36 हाथी, और प्रतिमा तक पहुंचने के लिए 108 सीढिया बनाई गई हैं।
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बर्धमान शिव मंदिर, पश्चिम बंगाल 🛕
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
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जैसलमेर में श्री राम की दुर्लभ प्रतिमा....!
जैसलमेर दुर्ग संग्रहालय के मूर्ति कक्ष में भगवन श्री राम की बेहद ही दुर्लभ और विस्मयकारी प्रतिमा रखी हुई है। भगवान श्री राम की यह प्रतिमा पूरे विश्व में सबसे अलग है क्योंकि इस प्रतिमा में श्री राम को दाढ़ी मूंछ में प्रदर्शित किया गया है। श्री राम का ऐसा स्वरूप किसी भी अन्य प्रतिमा या चित्र मे देखने को नहीं मिलता है।
श्री राम की छवि जनमानस में किसी नवयुवक सुकुमार की रची बसी है। बड़ी सी दाढ़ी और मूंछो से सुशोभित श्री राम की यह छवि बेहद ही कौतूहल उत्पन्न करती है। मूर्तिकार के द्वारा प्रतिमा में श्री राम को इस छवि में प्रदर्शित करने का उद्देश्य मुझे यह जान पड़ता है कि श्री राम जब सीता की खोज में थे तब उस समय सीता को पाने के लिए उनकी स्थिति इस तरह सी हो गई थी और दूसरा कारण यह हो सकता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को तत्कालीन राजपूत राजाओ का स्वरूप दिया गया इसीलिए उन्हें दाढ़ी मूंछ में दिखाया गया।
जैसलमेर के जिला संग्रहालय में भी भगवान श्री राम की ऐसी ही एक और प्रतिमा रखी हुई है जिसमें भी राम को दाढ़ी मूछ में दिखाया गया, काले प्रस्तर की वह प्रतिमा खंडित है। इस प्रकार श्री राम की दोनो प्रतिमा बेहद ही आकर्षक और दुर्लभ है। इस प्रतिमा का निर्माण काल पंद्रहवीं सदी है।
श्री राम की यह प्रतिमा मंदिर के शिल्पियों ने जैसलमेर के महारावल को भेंट की थी क्योंकि जैसलमेर में जब भी किसी नये मंदिर का निर्माण किया जाता था तो महारावल को एक उत्कृष्ट प्रतिमा शिल्पियों द्वारा भेंट दी जाती थी।🙏🏻🌹🚩
जैसलमेर दुर्ग संग्रहालय के मूर्ति कक्ष में भगवन श्री राम की बेहद ही दुर्लभ और विस्मयकारी प्रतिमा रखी हुई है। भगवान श्री राम की यह प्रतिमा पूरे विश्व में सबसे अलग है क्योंकि इस प्रतिमा में श्री राम को दाढ़ी मूंछ में प्रदर्शित किया गया है। श्री राम का ऐसा स्वरूप किसी भी अन्य प्रतिमा या चित्र मे देखने को नहीं मिलता है।
श्री राम की छवि जनमानस में किसी नवयुवक सुकुमार की रची बसी है। बड़ी सी दाढ़ी और मूंछो से सुशोभित श्री राम की यह छवि बेहद ही कौतूहल उत्पन्न करती है। मूर्तिकार के द्वारा प्रतिमा में श्री राम को इस छवि में प्रदर्शित करने का उद्देश्य मुझे यह जान पड़ता है कि श्री राम जब सीता की खोज में थे तब उस समय सीता को पाने के लिए उनकी स्थिति इस तरह सी हो गई थी और दूसरा कारण यह हो सकता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को तत्कालीन राजपूत राजाओ का स्वरूप दिया गया इसीलिए उन्हें दाढ़ी मूंछ में दिखाया गया।
जैसलमेर के जिला संग्रहालय में भी भगवान श्री राम की ऐसी ही एक और प्रतिमा रखी हुई है जिसमें भी राम को दाढ़ी मूछ में दिखाया गया, काले प्रस्तर की वह प्रतिमा खंडित है। इस प्रकार श्री राम की दोनो प्रतिमा बेहद ही आकर्षक और दुर्लभ है। इस प्रतिमा का निर्माण काल पंद्रहवीं सदी है।
श्री राम की यह प्रतिमा मंदिर के शिल्पियों ने जैसलमेर के महारावल को भेंट की थी क्योंकि जैसलमेर में जब भी किसी नये मंदिर का निर्माण किया जाता था तो महारावल को एक उत्कृष्ट प्रतिमा शिल्पियों द्वारा भेंट दी जाती थी।🙏🏻🌹🚩
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हजारा राम मंदिर, हम्पी (कर्नाटक) 🛕
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
*#पवनेश्वर_महादेव #काशीखण्ड
#वायु_देव_द्वारा_स्थापित
पुरा कश्यपदायादः पुतात्मेति च विश्रुतः।
धुर्जटे राजधान्यां स चचार विपुलं तपः।।
वाराणस्यां माहाभागो वर्षाणांयुतं शतं ।
स्थापयित्वा महालिङ्गं पावनं पवनेश्वरम् ।।
यस्य दर्शनमात्रेन पूतात्मा जायते नरः ।
पापकञ्चुकमूत्सृज्य स वसेत् पावने पुरे ।।
(#काशीखण्ड)
पूर्वकाल में कश्यप ऋषि के पुत्र जो कि पूतात्मा नाम से प्रसिद्द थे , उन महाभाग ने शिव की राजधानी वाराणसी पूरी में अत्यंत पावन लिंग स्थापित कर के दस लाख वर्ष कर कठिन तपस्या किया जिससे उस पवन लिंग का नाम पवनेश्वर हुआ ।
इस शिव लिंग के केवल दर्शन से ही मनुष्य पूतात्मा हो जाता है और अंत मे पाप कुंचक को छोड़कर पवनपुर में निवास करता है ।
पूतात्मा (पवनदेव) के कठिन तप से प्रसन्न होकर शिव जी उन्ही के द्वारा स्थापित लिंग से ज्योति रूप में प्रकट होकर पवन को (वायु देव) को बिना कुछ मांगे ही अनेको वरदान दिए जिसमे उन्होंने
अपनी अष्ट मूर्ति के अंतर्गत वायव्यकोण का दिगपाल का पद दिया(पुराणानुसार दसों दिशाओं के पालन करने वाले देवताओं में से एक) । और साथ ही सर्वत्र गामी , सर्वत्र तत्वों के ज्ञाता एवं सब किसी के आयुष्यरूप होने का वरदान दिया।
और कहा कि
तव लिङ्गमिदं दिव्यं ये द्रक्ष्यन्तिह मानवाः।
सर्व भोगसमृधास्ते त्वल्लोक सुखभागिनः ।।
(#काशीखण्ड)
जो लोग तुम्हारे द्वारा स्थापित इस दिव्य लिंग का दर्शन करेंगे , वे सब यहां समस्त भोगों से परिपूर्ण होकर अंत मे तुम्हारे लोक के सुखभागी होंगे ।
और साथ ही
जो मनुष्य , जन्मभर में एक बार भी पवनेश्वर लिंग का सुगंधित जल से स्नान एवं सुगंधित चंदन पुष्पादि के द्वारा यथोक्त विधि से पूजन कर लेता है , वह मेरे लोक में ससम्मान सहित निवास करता है । ज्येष्ठेश्वर के पश्चिम भाग में और वायुकुण्ड के उत्तर दिशा में पवनेश्वर लिंग की आराधना करने से तत्काल ही पवित्र होजाता है । इतना कह कर शिव जी इसी पवनेश्वर लिंग में समाहित होगये ।
पहले यहां पवन देव (वायुदेव) द्वारा बनाया गया वायु कुंड भी था जो अब लुप्त हो चुका है । यह लिंग अत्यंत ही प्राचीन और जमीन के 20 " फ़ीट नीचे है ।
#वायव्य दिशा : उत्तर और पश्चिम दिशा के मध्य में वायव्य दिशा का स्थान है। इस दिशा के देव वायुदेव हैं और इस दिशा में वायु तत्व की प्रधानता रहती है।
पता - भूत भैरव गली , करनघन्टा , वाराणासी ।*
#वायु_देव_द्वारा_स्थापित
पुरा कश्यपदायादः पुतात्मेति च विश्रुतः।
धुर्जटे राजधान्यां स चचार विपुलं तपः।।
वाराणस्यां माहाभागो वर्षाणांयुतं शतं ।
स्थापयित्वा महालिङ्गं पावनं पवनेश्वरम् ।।
यस्य दर्शनमात्रेन पूतात्मा जायते नरः ।
पापकञ्चुकमूत्सृज्य स वसेत् पावने पुरे ।।
(#काशीखण्ड)
पूर्वकाल में कश्यप ऋषि के पुत्र जो कि पूतात्मा नाम से प्रसिद्द थे , उन महाभाग ने शिव की राजधानी वाराणसी पूरी में अत्यंत पावन लिंग स्थापित कर के दस लाख वर्ष कर कठिन तपस्या किया जिससे उस पवन लिंग का नाम पवनेश्वर हुआ ।
इस शिव लिंग के केवल दर्शन से ही मनुष्य पूतात्मा हो जाता है और अंत मे पाप कुंचक को छोड़कर पवनपुर में निवास करता है ।
पूतात्मा (पवनदेव) के कठिन तप से प्रसन्न होकर शिव जी उन्ही के द्वारा स्थापित लिंग से ज्योति रूप में प्रकट होकर पवन को (वायु देव) को बिना कुछ मांगे ही अनेको वरदान दिए जिसमे उन्होंने
अपनी अष्ट मूर्ति के अंतर्गत वायव्यकोण का दिगपाल का पद दिया(पुराणानुसार दसों दिशाओं के पालन करने वाले देवताओं में से एक) । और साथ ही सर्वत्र गामी , सर्वत्र तत्वों के ज्ञाता एवं सब किसी के आयुष्यरूप होने का वरदान दिया।
और कहा कि
तव लिङ्गमिदं दिव्यं ये द्रक्ष्यन्तिह मानवाः।
सर्व भोगसमृधास्ते त्वल्लोक सुखभागिनः ।।
(#काशीखण्ड)
जो लोग तुम्हारे द्वारा स्थापित इस दिव्य लिंग का दर्शन करेंगे , वे सब यहां समस्त भोगों से परिपूर्ण होकर अंत मे तुम्हारे लोक के सुखभागी होंगे ।
और साथ ही
जो मनुष्य , जन्मभर में एक बार भी पवनेश्वर लिंग का सुगंधित जल से स्नान एवं सुगंधित चंदन पुष्पादि के द्वारा यथोक्त विधि से पूजन कर लेता है , वह मेरे लोक में ससम्मान सहित निवास करता है । ज्येष्ठेश्वर के पश्चिम भाग में और वायुकुण्ड के उत्तर दिशा में पवनेश्वर लिंग की आराधना करने से तत्काल ही पवित्र होजाता है । इतना कह कर शिव जी इसी पवनेश्वर लिंग में समाहित होगये ।
पहले यहां पवन देव (वायुदेव) द्वारा बनाया गया वायु कुंड भी था जो अब लुप्त हो चुका है । यह लिंग अत्यंत ही प्राचीन और जमीन के 20 " फ़ीट नीचे है ।
#वायव्य दिशा : उत्तर और पश्चिम दिशा के मध्य में वायव्य दिशा का स्थान है। इस दिशा के देव वायुदेव हैं और इस दिशा में वायु तत्व की प्रधानता रहती है।
पता - भूत भैरव गली , करनघन्टा , वाराणासी ।*
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🌹🌸🌸🌸#कैलाश पर्वत 🌸🌸🌸
#कैलाश पर्वत पर आज तक कोई क्यों नहीं चढ़ पाया है?
हर हर महादेव .....
हिंदू धर्म में कैलाश पर्वत का बहुत महत्व है, क्योंकि यह भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। लेकिन इसमें सोचने वाली बात ये है कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को अभी तक 7000 से ज्यादा लोग फतह कर चुके हैं, जिसकी ऊंचाई 8848 मीटर है, लेकिन कैलाश पर्वत पर आज तक कोई नहीं चढ़ पाया, जबकि इसकी ऊंचाई एवरेस्ट से लगभग 2000 मीटर कम यानी 6638 मीटर है। यह अब तक रहस्य ही बना हुआ है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक पर्वतारोही ने अपनी किताब में लिखा था कि उसने कैलाश पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की थी, लेकिन इस पर्वत पर रहना असंभव था, क्योंकि वहां शरीर के बाल और नाखून तेजी से बढ़ने लगते हैं। इसके अलावा कैलाश पर्वत बहुत ही ज्यादा रेडियोएक्टिव भी है।
कैलाश पर्वत पर कभी किसी के नहीं चढ़ पाने के पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि कैलाश पर्वत पर शिव जी निवास करते हैं और इसीलिए कोई जीवित इंसान वहां ऊपर नहीं पहुंच सकता। मरने के बाद या वह जिसने कभी कोई पाप न किया हो, केवल वही कैलाश फतह कर सकता है।
ऐसा भी माना जाता है कि कैलाश पर्वत पर थोड़ा सा ऊपर चढ़ते ही व्यक्ति दिशाहीन हो जाता है। चूंकि बिना दिशा के चढ़ाई करना मतलब मौत को दावत देना है, इसीलिए कोई भी इंसान आज तक कैलाश पर्वत पर नहीं चढ़ पाया।
सन 1999 में रूस के वैज्ञानिकों की टीम एक महीने तक माउंट कैलाश के नीचे रही और इसके आकार के बारे में शोध करती रही। वैज्ञानिकों ने कहा कि इस पहाड़ की तिकोने आकार की चोटी प्राकृतिक नहीं, बल्कि एक पिरामिड है जो बर्फ से ढका रहता है। माउंट कैलाश को "शिव पिरामिड" के नाम से भी जाना जाता है।
जो भी इस पहाड़ को चढ़ने निकला, या तो मारा गया, या बिना चढ़े वापिस लौट आया।
सन 2007 में रूसी पर्वतारोही सर्गे सिस्टिकोव ने अपनी टीम के साथ माउंट कैलाश पर चढ़ने की कोशिश की। सर्गे ने अपना खुद का अनुभव बताते हुए कहा : 'कुछ दूर चढ़ने पर मेरी और पूरी टीम के सिर में भयंकर दर्द होने लगा। फिर हमारे पैरों ने जवाब दे दिया। मेरे जबड़े की मांसपेशियाँ खिंचने लगी, और जीभ जम गयी। मुँह से आवाज़ निकलना बंद हो गयी। चढ़ते हुए मुझे महसूस हुआ कि मैं इस पर्वत पर चढ़ने लायक नहीं हूँ। मैं फ़ौरन मुड़ कर उतरने लगा, तब जाकर मुझे आराम मिला।
"कर्नल विल्सन ने भी कैलाश चढ़ने की कोशिश की थी। बताते हैं : "जैसे ही मुझे शिखर तक पहुँचने का थोड़ा-बहुत रास्ता दिखता, कि बर्फ़बारी शुरू हो जाती। और हर बार मुझे बेस कैम्प लौटना पड़ता। "चीनी सरकार ने फिर कुछ पर्वतारोहियों को कैलाश पर चढ़ने को कहा। मगर इस बार पूरी दुनिया ने चीन की इन हरकतों का इतना विरोध किया कि हार कर चीनी सरकार को इस पहाड़ पर चढ़ने से रोक लगानी पड़ी।कहते हैं जो भी इस पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश करता है, वो आगे नहीं चढ़ पाता, उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है।यहाँ की हवा में कुछ अलग बात है। आपके बाल और नाखून 2 दिन में ही इतने बढ़ जाते हैं, जितने 2 हफ्ते में बढ़ने चाहिए। शरीर मुरझाने लगता है। चेहरे पर बुढ़ापा दिखने लगता है। कैलाश पर चढ़ना कोई खेल नहीं
29,000 फ़ीट ऊँचा होने के बाद भी एवरेस्ट पर चढ़ना तकनीकी रूप से आसान है। मगर कैलाश पर्वत पर चढ़ने का कोई रास्ता नहीं है। चारों ओर खड़ी चट्टानों और हिमखंडों से बने कैलाश पर्वत तक पहुँचने का कोई रास्ता ही नहीं है। ऐसी मुश्किल चट्टानें चढ़ने में बड़े-से-बड़ा पर्वतारोही भी घुटने टेक दे।हर साल लाखों लोग कैलाश पर्वत के चारों ओर परिक्रमा लगाने आते हैं। रास्ते में मानसरोवर झील के दर्शन भी करते हैं।लेकिन एक बात आज तक रहस्य बनी हुई है। अगर ये पहाड़ इतना जाना जाता है तो आज तक इस पर कोई चढ़ाई क्यों नहीं कर पाया।
🚩हर हर महादेव 🙏🏼
*꧁༒ॐ हर हर महादेव ॐ ༒꧂*
🌹🌸🌸🌸#कैल
#कैलाश पर्वत पर आज तक कोई क्यों नहीं चढ़ पाया है?
हर हर महादेव .....
हिंदू धर्म में कैलाश पर्वत का बहुत महत्व है, क्योंकि यह भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। लेकिन इसमें सोचने वाली बात ये है कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को अभी तक 7000 से ज्यादा लोग फतह कर चुके हैं, जिसकी ऊंचाई 8848 मीटर है, लेकिन कैलाश पर्वत पर आज तक कोई नहीं चढ़ पाया, जबकि इसकी ऊंचाई एवरेस्ट से लगभग 2000 मीटर कम यानी 6638 मीटर है। यह अब तक रहस्य ही बना हुआ है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक पर्वतारोही ने अपनी किताब में लिखा था कि उसने कैलाश पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की थी, लेकिन इस पर्वत पर रहना असंभव था, क्योंकि वहां शरीर के बाल और नाखून तेजी से बढ़ने लगते हैं। इसके अलावा कैलाश पर्वत बहुत ही ज्यादा रेडियोएक्टिव भी है।
कैलाश पर्वत पर कभी किसी के नहीं चढ़ पाने के पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि कैलाश पर्वत पर शिव जी निवास करते हैं और इसीलिए कोई जीवित इंसान वहां ऊपर नहीं पहुंच सकता। मरने के बाद या वह जिसने कभी कोई पाप न किया हो, केवल वही कैलाश फतह कर सकता है।
ऐसा भी माना जाता है कि कैलाश पर्वत पर थोड़ा सा ऊपर चढ़ते ही व्यक्ति दिशाहीन हो जाता है। चूंकि बिना दिशा के चढ़ाई करना मतलब मौत को दावत देना है, इसीलिए कोई भी इंसान आज तक कैलाश पर्वत पर नहीं चढ़ पाया।
सन 1999 में रूस के वैज्ञानिकों की टीम एक महीने तक माउंट कैलाश के नीचे रही और इसके आकार के बारे में शोध करती रही। वैज्ञानिकों ने कहा कि इस पहाड़ की तिकोने आकार की चोटी प्राकृतिक नहीं, बल्कि एक पिरामिड है जो बर्फ से ढका रहता है। माउंट कैलाश को "शिव पिरामिड" के नाम से भी जाना जाता है।
जो भी इस पहाड़ को चढ़ने निकला, या तो मारा गया, या बिना चढ़े वापिस लौट आया।
सन 2007 में रूसी पर्वतारोही सर्गे सिस्टिकोव ने अपनी टीम के साथ माउंट कैलाश पर चढ़ने की कोशिश की। सर्गे ने अपना खुद का अनुभव बताते हुए कहा : 'कुछ दूर चढ़ने पर मेरी और पूरी टीम के सिर में भयंकर दर्द होने लगा। फिर हमारे पैरों ने जवाब दे दिया। मेरे जबड़े की मांसपेशियाँ खिंचने लगी, और जीभ जम गयी। मुँह से आवाज़ निकलना बंद हो गयी। चढ़ते हुए मुझे महसूस हुआ कि मैं इस पर्वत पर चढ़ने लायक नहीं हूँ। मैं फ़ौरन मुड़ कर उतरने लगा, तब जाकर मुझे आराम मिला।
"कर्नल विल्सन ने भी कैलाश चढ़ने की कोशिश की थी। बताते हैं : "जैसे ही मुझे शिखर तक पहुँचने का थोड़ा-बहुत रास्ता दिखता, कि बर्फ़बारी शुरू हो जाती। और हर बार मुझे बेस कैम्प लौटना पड़ता। "चीनी सरकार ने फिर कुछ पर्वतारोहियों को कैलाश पर चढ़ने को कहा। मगर इस बार पूरी दुनिया ने चीन की इन हरकतों का इतना विरोध किया कि हार कर चीनी सरकार को इस पहाड़ पर चढ़ने से रोक लगानी पड़ी।कहते हैं जो भी इस पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश करता है, वो आगे नहीं चढ़ पाता, उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है।यहाँ की हवा में कुछ अलग बात है। आपके बाल और नाखून 2 दिन में ही इतने बढ़ जाते हैं, जितने 2 हफ्ते में बढ़ने चाहिए। शरीर मुरझाने लगता है। चेहरे पर बुढ़ापा दिखने लगता है। कैलाश पर चढ़ना कोई खेल नहीं
29,000 फ़ीट ऊँचा होने के बाद भी एवरेस्ट पर चढ़ना तकनीकी रूप से आसान है। मगर कैलाश पर्वत पर चढ़ने का कोई रास्ता नहीं है। चारों ओर खड़ी चट्टानों और हिमखंडों से बने कैलाश पर्वत तक पहुँचने का कोई रास्ता ही नहीं है। ऐसी मुश्किल चट्टानें चढ़ने में बड़े-से-बड़ा पर्वतारोही भी घुटने टेक दे।हर साल लाखों लोग कैलाश पर्वत के चारों ओर परिक्रमा लगाने आते हैं। रास्ते में मानसरोवर झील के दर्शन भी करते हैं।लेकिन एक बात आज तक रहस्य बनी हुई है। अगर ये पहाड़ इतना जाना जाता है तो आज तक इस पर कोई चढ़ाई क्यों नहीं कर पाया।
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