ऐतिहासिक मंदिर और उनकी कथा
1.89K subscribers
1K photos
408 videos
200 files
325 links
हमारी संस्कृति हमारा अभिमान

*इस चैनल मे हमारे मंदिरों की कथा के आडियो विडियो और हमारी सभ्यता से जुड़ी जगह का प्रसारण किया जाता है*

किसी और को इस ग्रुप में जोड़ने के लिये उन्हें ये लिंक दे

https://t.me/joinchat/AAAAAFTKJrx50fB1EhTzeg
Download Telegram
Friends, look at this magnificent temple, now it is extremely ruined condition.

we need to preserve our magnificent heritage.

This is Agneeswarar Temple at Alwarkurichi, near Ambasamudram town, Tamil Nadu.
ये है #महाराष्ट्र स्थित #कोपेश्वर_मंदिर, क्या इसके आगे #ताज_महल की कोई औकात है...?
इसके सभी खंभे खराद से बने हैं जबकि हमारे इतिहासकारों के मुताबिक् उस युग में खराद मशीनों का अविष्कार नहीं किया गया था। सच तो यह है कि वामपंथियों ने जानबूझकर झूठ बोला ताकि हमें अपने पूर्वजों की उन्नत तकनीकों से दूर कर हमें सनातनी होने पर गर्व करने से वंचित किया जा सके।
जरा सोचिए कि उस युग में दूसरी सभ्यताओं की तुलना में #प्राचीन_भारत कितना आगे था।

🙏🙏🙏
जय श्री राम
👆🏻👇🏻
*आपको 7 अजूबो के बारे में पता होगा पर अजूबे इसे अधिक है, इतने सारे तो केवल भारत में ही है। पर न तो इन्हें अजूबो की संज्ञा दी गयी और इसमें से बहुत से अभी भी UNESCO की धरोहरों है क्योंकि तथाकथित सेक्युलर और कांग्रेसी वामपंथी इतिहासकारो और मीडिया ने कभी इन असल अजूबो की तरफ ध्यान नही दिया।*
Forwarded from Red Promotion Bot
🌹आप सभी के लिए ज्ञान मनोरंजन शिक्षा राजनीतिक बॉलीवुड म्यूजिक कविताएं भक्ति ज्ञान दर्पण धार्मिक टीवी शो भक्ति भजन कीर्तन विभिन्न कथाएं भक्ति लेकर आया हूं अभी नीचे दिए गए लिंक से ज्वाइन करें👇
दुर्लभ शिवलिंगम 🌿 पशुपतिनाथ मंदिर, काठमांडू, नेपाल...

हर हर महादेव ❤️❤️
मीनाक्षी अम्मन मंदिर तमिलनाडु
क्या किसी अजूबे से कम है
सन 1682 में उस मुस्लिम शासक ने 1000 मजदूरों को इकट्ठा किया और इस मंदिर को तोड़ने का काम दिया,

मजदूरों ने 1 साल तक इसे तोड़ा,
1 साल लगातार तोड़ने के बाद वो सब इसकी कुछ मूर्तियाँ ही तोड़ सके,
हार कर उस मुस्लिम शासक ने उन्हें वापस बुला लिया,

वो शासक था औरंगजेब, जिसकी मूर्ख सेना ये समझ बैठी थी कि ये कोई ईंट और मिट्टी से बना साधारण मंदिर है..
लेकिन उन्हें कहाँ पता था कि ये मंदिर हमारे पूर्वजों ने धरती की सबसे कठोर चट्टान को चीरकर बनाया है.

ये वही पत्थर है जो करोड़ों साल पहले धरती के गर्भ से लावे के रूप में निकला था और बाद में ठंडा होकर जमने से, इसने पत्थर का रूप लिया

कैलास मंदिर को U आकार में उपर से नीचे काटा गया है जिसे पीछे की तरफ से 50 मीटर गहरा खोदा गया है. पर आप सोचिये इतनी कठोर और मजबूत चट्टान को किस चीज़ से काटा गया होगा?..
हथौड़े और छेनी से??

आपको मंदिर की दीवारों पर छेनी के निशान दिख जायेंगे पर वहाँ के आध्यात्मिक गुरुओं का कहना है कि ये छेनी के निशान बाद के हैं,..
जब पूरा मंदिर बना दिया गया ये बस किनारों को Smooth करने के लिए उपयोग की गयीं थी. इतनी कठोर बेसाल्ट चट्टान को खोद कर उसमे से इस मंदिर को बना देना कहाँ तक संभव है???

कुछ खोजकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार की जटिल संरचना का आधुनिक तकनीक की मदद से निर्माण करना आज भी असंभव है.

क्या वो लोग जिन्होंने इस मंदिर को बनाया आज से भी ज्यादा आधुनिक थे?..
ये एक जायज सवाल है

यहाँ कुछ वैज्ञानिक आँकड़ों पर बात कर लेते हैं,..
पुरातात्विदों का कहना है कि इस मंदिर को बनाने के लिए 400,000 टन पत्थर को काट कर हटाया गया होगा और ऐसा करने में उन्हें 18 साल का समय लगा होगा .

तो आइये एक सरल गणित की कैलकुलेशन करते हैं

माना की इस काम को करने के लिए वहाँ काम कर रहे लोग 12 घंटे प्रतिदिन एक मशीन की तरह कार्य कर रहे होंगे जिसमें उन्हें कोई ब्रेक या रेस्ट नहीं मिलता होगा वो पूर्ण रूप से मशीन बन गये होंगे .

तो अगर 400,000 टन पत्थर को 18 साल में हटाना है तो उन्हें हर साल 22,222 टन पत्थर हटाना होगा , जिसका मतलब हुआ 60 टन हर दिन और 5 टन हर घंटे .

ये समय तो हुआ मात्र पत्थर को काट कर अलग करने का...
उस समय का क्या जो इस मंदिर की डिजाईन, नक्काशी और इसमें बनाई गयीं सैंकड़ों मूर्तियों में लगा होगा.

एक प्रश्न जो और है वो ये है कि जो पत्थर काट कर बाहर निकाला गया वो कहाँ गया?? उसका इस मंदिर के आसपास कोई ढेर नहीं मिलता..
ना ही उस पत्थर का इस्तेमाल किसी दूसरे मंदिर को बनाने या अन्य किसी संरचना में किया गया,..
आखिर वो गया तो गया कहाँ??

क्या आप को अभी भी लगता है कि ये कारनामा आज से हजारों वर्ष पहले मात्र छेनी और हथौड़े की मदद से अंजाम दिया गया होगा.

राष्ट्रकूट राजाओं ने वास्तुकला को चरम पर लाकर रख दिया, जैसा कि बताया जाता है इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम(756 - 773) ने करवाया था.

यह मंदिर उस भारतीय वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है जिसका मुकाबला पूरी दुनिया में आज भी कोई नहीं कर सकता.

ये उस मुस्लिम शासक की बर्बरता और इस मंदिर के विरले कारीगरों की कुशलता दोनों को साथ में लिए आज भी खड़ा है और हमारे पूर्वजों के कौशल और पुरुषार्थ के सबूत देते हुए आधुनिक मानव को उसकी औकात दिखाते हुए कह रहा है कि दम है तो मुझे फिर से बनाकर दिखाओ.
●●●●●●●●●●●●●●●

ये औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में भगवान शिव का मंदिर है...
जो एक पहाड़ को काटकर बनाया गया है और इसको बनाने में 200 साल लगे हैं।

अच्छे से अच्छा धरोहर हमारे देश मे हैं कभी इनपर ध्यान दीजिए।

औरंगाबाद का कैलाश शिव मंदिर:

हम बात कर रहे हैं औरंगाबाद में स्थित भगवान शिव के इस मंदिर की.
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भगवान शिव के इस मंदिर के रहस्य के बारें में आज भी मात्र 10 से 15 प्रतिशत हिन्दू ही जानते हैं.
लेकिन औरंगाबाद स्थित कैलाश मंदिर के बारें में बोला जाता है कि इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि इसमें ईंट और पत्थरों का इस्तेमाल नहीं हुआ है.
एक पहाड़ी को इस तरह से काटा गया है कि आज एक पहाड़ी ही मंदिर है.
इस मंदिर को ऊपर से नीचे बनाया गया है.
जबकि आज इमारत हम नीचे से ऊपर बनाते हैं.

आज तक विज्ञान भी कैलाश मंदिर की इस सच्चाई का पता नहीं लगा पाया है कि किस तरह से और किस तरह की मशीनों से इस शिव मंदिर का निर्माण किया गया होगा.

भारत तो दूर की बात है अमेरिका, रूस के वैज्ञानिक भी ऐसा बोलते हैं कि इस मंदिर को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे मंदिर स्वर्ग से बना-बनाया ही उतारा गया हैं.

वेदों में बौमास्त्र नामक एक अस्त्र लिखा गया गया है जो शायद इस तरह के निर्माण को कर सकता था.

इस मंदिर के निर्माण में 40 हजार टन भारी पत्थर का निर्माण किया गया है तब जाकर 90 फीट ऊँचा मंदिर बना है

।। जय सत्य सनातन धर्म की ।।
इस प्रतिमा के मुख में एक पत्थर की गेंद है जिसे आप छू सकते हैं, हिला सकते हैं, लेकिन किसी भी तरह से मुख से बाहर नहीं निकाल सकते।
मूर्ति एक ही पत्थर से बनी है, जरा सोचिए गेंद मुख में कैसे स्थापित की गई होगी ?

है ना अचंभित करने वाली बात ?

(कैलाशनाथ मंदिर, तमिलनाडु)

🙏🏻🔱🚩
टोडरमल जी की हवेली......

चित्र मे दिखाई देने वाली यह दिवान टोडरमल जी की हवेली है जिन्होंने 78,000 मोहरें बिछाकर गुरुगोविंद सिंह जी के साहबजादों और माता गुजरी देवी जी के संस्कार के लिए 4 गज जगह खरीदी थी..

मुगल के क्रूर राजा ने मां गुजरी और बच्चों के संस्कार के लिए जमीन देने से मना कर दिया था तब टोडरमल जी सामने आए उन्होंने मुगल क्रूर राजा को कहा राजा ने जमीन की कीमत मांगी थी सोने की मोहरों से जितनी जमीन नापी जा सके जब मोहरे बिछानी शुरू की तब उस धूर्तता ओर कपट मे संलीप्त मुगल बादशाह ने ज्यादा रकम ऐंठने के लिए आडी नही लेकीन खडी मुद्रायें बिछाने को कहा !

उस समय टोडरमल ने अंतिम संस्कार के लिए खडी सोने की मोहरे बिछाकर संस्कार हो सके इतनी जमीन खरीदकर संस्कार किया !

इतने क्रूर अत्याचार करके जो इस्लाम पनपा उसमें मानवता किस कोने में ढूंड रहे हो और आज स्थिति ये है कि खुद दिवान टोडरमल जी की हवेली को देखने वाला कोई नही........

इस हवेली को संगमरमर के पत्थर से दुबारा बनवाना चाहिए, ताकि उनकी चेतना उनकी स्मृतियों को सदैव याद रखा जाए।

सरहिंद पंजाब में यह हवेली है।