भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण....
मुरुदेश्वर शिवमंदिर,
भटकल.....कर्नाटक
ऐसे एक नहीं अपितु और भी बहुत कुछ है भारतवर्ष में...❤️❤️
अतुल्य भारत
मुरुदेश्वर शिवमंदिर,
भटकल.....कर्नाटक
ऐसे एक नहीं अपितु और भी बहुत कुछ है भारतवर्ष में...❤️❤️
अतुल्य भारत
#मित्रों_आप_में_से_कितने_लोग_जानते_हैं 👇
#विजय_स्तम्भ ( चितौडग़ढ़ - राजस्थान ) ( #विष्णु_स्तम्भ )
इसे सन 1448 में राणा कुम्भा जी ने महमूद खिलजी को हराने के बाद भगवान विष्णु जी को समर्पित करते हुए बनाया था
#विजय_स्तम्भ भारत के राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित एक स्तम्भ या टॉवर है। इसे मेवाड़ नरेश #राणा_कुम्भा_जी ने #महमूद_खिलजी के नेतृत्व वाली मालवा और गुजरात की सेनाओं पर #विजय के #स्मारक के रूप में सन् 1440-1448 के मध्य बनवाया था।
यह राजस्थान पुलिस ओर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का प्रतीक चिन्ह है।
इसे भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश और हिन्दू देवी देवताओं का अजायबघर कहते हैं।
इस इमारत को कीर्तिस्तम्भ से भी जाना जाता है |
वास्तुकार :- मंडन, जैता व उसके पुत्र नापा, पुंजा। उपेन्द्रनाथ डे ने इसको (प्रथम मंजिल पर विष्णु मंदिर होने के कारण) विष्णु ध्वज कहा है। ऊंचाई 122 फिट चौड़ाई 30 फिट । 9 मंजिला इमारत । इसे विष्णु स्तम्भ भी कहा जाता हैं।
#हमारी_धरोहर_ताजमहल_चारमीनार_नही_ये_है 👇
#विजय_स्तम्भ ( चितौडग़ढ़ - राजस्थान ) ( #विष्णु_स्तम्भ )
इसे सन 1448 में राणा कुम्भा जी ने महमूद खिलजी को हराने के बाद भगवान विष्णु जी को समर्पित करते हुए बनाया था
#विजय_स्तम्भ भारत के राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित एक स्तम्भ या टॉवर है। इसे मेवाड़ नरेश #राणा_कुम्भा_जी ने #महमूद_खिलजी के नेतृत्व वाली मालवा और गुजरात की सेनाओं पर #विजय के #स्मारक के रूप में सन् 1440-1448 के मध्य बनवाया था।
यह राजस्थान पुलिस ओर माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का प्रतीक चिन्ह है।
इसे भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश और हिन्दू देवी देवताओं का अजायबघर कहते हैं।
इस इमारत को कीर्तिस्तम्भ से भी जाना जाता है |
वास्तुकार :- मंडन, जैता व उसके पुत्र नापा, पुंजा। उपेन्द्रनाथ डे ने इसको (प्रथम मंजिल पर विष्णु मंदिर होने के कारण) विष्णु ध्वज कहा है। ऊंचाई 122 फिट चौड़ाई 30 फिट । 9 मंजिला इमारत । इसे विष्णु स्तम्भ भी कहा जाता हैं।
#हमारी_धरोहर_ताजमहल_चारमीनार_नही_ये_है 👇
#महामानवों_की_संस्कृति
भारत को संसार ने "विश्व गुरु" की उपाधि उसके महान विज्ञान, गणित, भूगोल, चिकित्सा, अध्यात्म और अद्भुत वास्तुकला आदि के कारण दिया था यद्यपि हमने और आक्रांताओं ने मिलकर पूर्वजों की रचित महान धरोहरों को नष्ट किया है पर आज भी उस महान सभ्यता की कल्पना और गौरव करने के लिए कुछ अवशेष शेष हैं .....
ऐसी ही वास्तुकला की महान रचना
गुजरात का मोढेरा सूर्य मंदिर है
इसमें
ना केवल उनके द्वारा बनाये गये स्तंभो की नक्काशियाँ आज सबको चकित करती हैं बल्कि स्तंभों के प्रत्येक पट्टिकाओं द्वारा दिये गये संदेश भी आज के लोगों के लिए समझ से परे है ।
1) घटा पट्ट - श्री गणेश या श्री लक्ष्मी निवास करते हैं
2) सिंहमुख पट्ट- वीरता और साहस का प्रतिनिधित्व करता है
3) द्वारपाल पट्ट - मंदिर में पीठासीन देवता के संरक्षक मौजूद हैं
४) वादका / वादकी पट्ट - संगीतकार देवता की श्रद्धा में गीत गाते हैं।
5) अवतार पाट्टा - पीठासीन देवता के विभिन्न अवतारों को दर्शाता है
6) कलिका पट्ट - मोक्ष प्राप्त करने की हर किसी की क्षमता को इंगित करता है।
7) खंडिका पट्ट - ध्वनि के माध्यम से इस ब्रह्मांड की अपूर्णता, क्षणिक निर्माण को दर्शाता है।
8 ) देव गण पट्ट - देवत्व के सभी अच्छे पात्रों का मिलन
9) गंधर्व पट्ट - वज्र की अविनाशीता को इंगित करता है।
10) कीर्तिमुख पट्ट - कीर्तिमुख अपने गुरु महादेव के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
११) कुम्भिका / पूर्णकुंभ - सबसे ऊपर पानी का बर्तन।
१२) सिरसा - यह दर्शाता है कि वजन उठाने में इसका उतना ही महत्व है जितना मनुष्य के सिर का उसके शरीर के लिए कार्य करना ।
(मोढेरा सूर्य मंदिर, गुजरात)
।। जय श्रीराम ।।
भारत को संसार ने "विश्व गुरु" की उपाधि उसके महान विज्ञान, गणित, भूगोल, चिकित्सा, अध्यात्म और अद्भुत वास्तुकला आदि के कारण दिया था यद्यपि हमने और आक्रांताओं ने मिलकर पूर्वजों की रचित महान धरोहरों को नष्ट किया है पर आज भी उस महान सभ्यता की कल्पना और गौरव करने के लिए कुछ अवशेष शेष हैं .....
ऐसी ही वास्तुकला की महान रचना
गुजरात का मोढेरा सूर्य मंदिर है
इसमें
ना केवल उनके द्वारा बनाये गये स्तंभो की नक्काशियाँ आज सबको चकित करती हैं बल्कि स्तंभों के प्रत्येक पट्टिकाओं द्वारा दिये गये संदेश भी आज के लोगों के लिए समझ से परे है ।
1) घटा पट्ट - श्री गणेश या श्री लक्ष्मी निवास करते हैं
2) सिंहमुख पट्ट- वीरता और साहस का प्रतिनिधित्व करता है
3) द्वारपाल पट्ट - मंदिर में पीठासीन देवता के संरक्षक मौजूद हैं
४) वादका / वादकी पट्ट - संगीतकार देवता की श्रद्धा में गीत गाते हैं।
5) अवतार पाट्टा - पीठासीन देवता के विभिन्न अवतारों को दर्शाता है
6) कलिका पट्ट - मोक्ष प्राप्त करने की हर किसी की क्षमता को इंगित करता है।
7) खंडिका पट्ट - ध्वनि के माध्यम से इस ब्रह्मांड की अपूर्णता, क्षणिक निर्माण को दर्शाता है।
8 ) देव गण पट्ट - देवत्व के सभी अच्छे पात्रों का मिलन
9) गंधर्व पट्ट - वज्र की अविनाशीता को इंगित करता है।
10) कीर्तिमुख पट्ट - कीर्तिमुख अपने गुरु महादेव के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
११) कुम्भिका / पूर्णकुंभ - सबसे ऊपर पानी का बर्तन।
१२) सिरसा - यह दर्शाता है कि वजन उठाने में इसका उतना ही महत्व है जितना मनुष्य के सिर का उसके शरीर के लिए कार्य करना ।
(मोढेरा सूर्य मंदिर, गुजरात)
।। जय श्रीराम ।।
कैलाश_मंदिर
इस मंदिर के बारे मे पश्चिम के वैज्ञानिक कहते हैं कि इसे किसी एलियन सभ्यता ने बनाया होगा ,आजका मनुष्य भी ऐसे मंदिर आज भी नहीं बना सकता
सन 1682 में उस मुग़ल शासक ने 1000 मजदूरों को इकट्ठा किया और इस मंदिर को तोड़ने का काम दिया,
मजदूरों ने 1 साल तक इसे तोड़ा,
1 साल लगातार तोड़ने के बाद वो सब इसकी कुछ मूर्तियाँ ही तोड़ सके, हार कर उस मुग़ल शासक ने उन्हें वापस बुला लिया,
वो शासक था औरंगजेब, जिसकी मूर्ख सेना ये समझ बैठी थी कि ये कोई ईंट और मिट्टी से बना साधारण मंदिर है।।
लेकिन उन्हें कहाँ पता था कि ये मंदिर हमारे पूर्वजों ने धरती की सबसे कठोर चट्टान को चीरकर बनाया है।
ये वही पत्थर है जो करोड़ों साल पहले धरती के गर्भ से लावे के रूप में निकला था और बाद में ठंडा होकर जमने से, इसने पत्थर का रूप लिया
कैलास मंदिर को U आकार में उपर से नीचे काटा गया है जिसे पीछे की तरफ से 50 मीटर गहरा खोदा गया है। पर आप सोचिये इतनी कठोर और मजबूत चट्टान को किस चीज़ से काटा गया होगा?।।
हथौड़े और छेनी से??
आपको मंदिर की दीवारों पर छेनी के निशान दिख जायेंगे पर वहाँ के आध्यात्मिक गुरुओं का कहना है कि ये छेनी के निशान बाद के हैं,।।
जब पूरा मंदिर बना दिया गया ये बस किनारों को Smooth करने के लिए उपयोग की गयीं थी। इतनी कठोर बेसाल्ट चट्टान को खोद कर उसमे से इस मंदिर को बना देना कहाँ तक संभव है???
कुछ खोजकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार की जटिल संरचना का आधुनिक तकनीक की मदद से निर्माण करना आज भी असंभव है।
क्या वो लोग जिन्होंने इस मंदिर को बनाया आज से भी ज्यादा आधुनिक थे?।।
ये एक जायज सवाल है
यहाँ कुछ वैज्ञानिक आँकड़ों पर बात कर लेते हैं,।।
पुरातात्विदों का कहना है कि इस मंदिर को बनाने के लिए 400,000 टन पत्थर को काट कर हटाया गया होगा और ऐसा करने में उन्हें 18 साल का समय लगा होगा ।
तो आइये एक सरल गणित की कैलकुलेशन करते हैं
माना की इस काम को करने के लिए वहाँ काम कर रहे लोग 12 घंटे प्रतिदिन एक मशीन की तरह कार्य कर रहे होंगे जिसमें उन्हें कोई ब्रेक या रेस्ट नहीं मिलता होगा वो पूर्ण रूप से मशीन बन गये होंगे ।
तो अगर 400,000 टन पत्थर को 18 साल में हटाना है तो उन्हें हर साल 22,222 टन पत्थर हटाना होगा , जिसका मतलब हुआ 60 टन हर दिन और 5 टन हर घंटे ।
ये समय तो हुआ मात्र पत्थर को काट कर अलग करने का।।।
उस समय का क्या जो इस मंदिर की डिजाईन, नक्काशी और इसमें बनाई गयीं सैंकड़ों मूर्तियों में लगा होगा।
एक प्रश्न जो और है वो ये है कि जो पत्थर काट कर बाहर निकाला गया वो कहाँ गया?? उसका इस मंदिर के आसपास कोई ढेर नहीं मिलता।।
ना ही उस पत्थर का इस्तेमाल किसी दूसरे मंदिर को बनाने या अन्य किसी संरचना में किया गया,।।
आखिर वो गया तो गया कहाँ??
क्या आप को अभी भी लगता है कि ये कारनामा आज से हजारों वर्ष पहले मात्र छेनी और हथौड़े की मदद से अंजाम दिया गया होगा।
राष्ट्रकूट राजाओं ने वास्तुकला को चरम पर लाकर रख दिया, जैसा कि बताया जाता है इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम(756 - 773) ने करवाया था।
यह मंदिर उस भारतीय वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है जिसका मुकाबला पूरी दुनिया में आज भी कोई नहीं कर सकता।
ये उस मुग़ल शासक की बर्बरता और इस मंदिर के विरले कारीगरों की कुशलता दोनों को साथ में लिए आज भी खड़ा है और हमारे पूर्वजों के कौशल और पुरुषार्थ के सबूत देते हुए आधुनिक मानव को उसकी औकात दिखाते हुए कह रहा है कि दम है तो मुझे फिर से बनाकर दिखाओ।
●●●●●●●●●●●●●●●
ये औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में भगवान शिव का मंदिर है।।।
जो एक पहाड़ को काटकर बनाया गया है और इसको बनाने में 200 साल लगे हैं।
अच्छे से अच्छा धरोहर हमारे देश मे हैं कभी इनपर ध्यान दीजिए।
औरंगाबाद का कैलाश शिव मंदिर:
हम बात कर रहे हैं औरंगाबाद में स्थित भगवान शिव के इस मंदिर की।
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भगवान शिव के इस मंदिर के रहस्य के बारें में आज भी मात्र 10 से 15 प्रतिशत हिन्दू ही जानते हैं।
लेकिन औरंगाबाद स्थित कैलाश मंदिर के बारें में बोला जाता है कि इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि इसमें ईंट और पत्थरों का इस्तेमाल नहीं हुआ है।
एक पहाड़ी को इस तरह से काटा गया है कि आज एक पहाड़ी ही मंदिर है।
इस मंदिर को ऊपर से नीचे बनाया गया है।
जबकि आज इमारत हम नीचे से ऊपर बनाते हैं।
आज तक विज्ञान भी कैलाश मंदिर की इस सच्चाई का पता नहीं लगा पाया है कि किस तरह से और किस तरह की मशीनों से इस शिव मंदिर का निर्माण किया गया होगा।
भारत तो दूर की बात है अमेरिका, रूस के वैज्ञानिक भी ऐसा बोलते हैं कि इस मंदिर को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे मंदिर स्वर्ग से बना-बनाया ही उतारा गया हैं।
वेदों में बौमास्त्र नामक एक अस्त्र लिखा गया गया है जो शायद इस तरह के निर्माण को कर सकता था।
इस मंदिर के निर्माण में 40 हजार टन भारी पत्थर का निर्मा
इस मंदिर के बारे मे पश्चिम के वैज्ञानिक कहते हैं कि इसे किसी एलियन सभ्यता ने बनाया होगा ,आजका मनुष्य भी ऐसे मंदिर आज भी नहीं बना सकता
सन 1682 में उस मुग़ल शासक ने 1000 मजदूरों को इकट्ठा किया और इस मंदिर को तोड़ने का काम दिया,
मजदूरों ने 1 साल तक इसे तोड़ा,
1 साल लगातार तोड़ने के बाद वो सब इसकी कुछ मूर्तियाँ ही तोड़ सके, हार कर उस मुग़ल शासक ने उन्हें वापस बुला लिया,
वो शासक था औरंगजेब, जिसकी मूर्ख सेना ये समझ बैठी थी कि ये कोई ईंट और मिट्टी से बना साधारण मंदिर है।।
लेकिन उन्हें कहाँ पता था कि ये मंदिर हमारे पूर्वजों ने धरती की सबसे कठोर चट्टान को चीरकर बनाया है।
ये वही पत्थर है जो करोड़ों साल पहले धरती के गर्भ से लावे के रूप में निकला था और बाद में ठंडा होकर जमने से, इसने पत्थर का रूप लिया
कैलास मंदिर को U आकार में उपर से नीचे काटा गया है जिसे पीछे की तरफ से 50 मीटर गहरा खोदा गया है। पर आप सोचिये इतनी कठोर और मजबूत चट्टान को किस चीज़ से काटा गया होगा?।।
हथौड़े और छेनी से??
आपको मंदिर की दीवारों पर छेनी के निशान दिख जायेंगे पर वहाँ के आध्यात्मिक गुरुओं का कहना है कि ये छेनी के निशान बाद के हैं,।।
जब पूरा मंदिर बना दिया गया ये बस किनारों को Smooth करने के लिए उपयोग की गयीं थी। इतनी कठोर बेसाल्ट चट्टान को खोद कर उसमे से इस मंदिर को बना देना कहाँ तक संभव है???
कुछ खोजकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार की जटिल संरचना का आधुनिक तकनीक की मदद से निर्माण करना आज भी असंभव है।
क्या वो लोग जिन्होंने इस मंदिर को बनाया आज से भी ज्यादा आधुनिक थे?।।
ये एक जायज सवाल है
यहाँ कुछ वैज्ञानिक आँकड़ों पर बात कर लेते हैं,।।
पुरातात्विदों का कहना है कि इस मंदिर को बनाने के लिए 400,000 टन पत्थर को काट कर हटाया गया होगा और ऐसा करने में उन्हें 18 साल का समय लगा होगा ।
तो आइये एक सरल गणित की कैलकुलेशन करते हैं
माना की इस काम को करने के लिए वहाँ काम कर रहे लोग 12 घंटे प्रतिदिन एक मशीन की तरह कार्य कर रहे होंगे जिसमें उन्हें कोई ब्रेक या रेस्ट नहीं मिलता होगा वो पूर्ण रूप से मशीन बन गये होंगे ।
तो अगर 400,000 टन पत्थर को 18 साल में हटाना है तो उन्हें हर साल 22,222 टन पत्थर हटाना होगा , जिसका मतलब हुआ 60 टन हर दिन और 5 टन हर घंटे ।
ये समय तो हुआ मात्र पत्थर को काट कर अलग करने का।।।
उस समय का क्या जो इस मंदिर की डिजाईन, नक्काशी और इसमें बनाई गयीं सैंकड़ों मूर्तियों में लगा होगा।
एक प्रश्न जो और है वो ये है कि जो पत्थर काट कर बाहर निकाला गया वो कहाँ गया?? उसका इस मंदिर के आसपास कोई ढेर नहीं मिलता।।
ना ही उस पत्थर का इस्तेमाल किसी दूसरे मंदिर को बनाने या अन्य किसी संरचना में किया गया,।।
आखिर वो गया तो गया कहाँ??
क्या आप को अभी भी लगता है कि ये कारनामा आज से हजारों वर्ष पहले मात्र छेनी और हथौड़े की मदद से अंजाम दिया गया होगा।
राष्ट्रकूट राजाओं ने वास्तुकला को चरम पर लाकर रख दिया, जैसा कि बताया जाता है इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम(756 - 773) ने करवाया था।
यह मंदिर उस भारतीय वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है जिसका मुकाबला पूरी दुनिया में आज भी कोई नहीं कर सकता।
ये उस मुग़ल शासक की बर्बरता और इस मंदिर के विरले कारीगरों की कुशलता दोनों को साथ में लिए आज भी खड़ा है और हमारे पूर्वजों के कौशल और पुरुषार्थ के सबूत देते हुए आधुनिक मानव को उसकी औकात दिखाते हुए कह रहा है कि दम है तो मुझे फिर से बनाकर दिखाओ।
●●●●●●●●●●●●●●●
ये औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में भगवान शिव का मंदिर है।।।
जो एक पहाड़ को काटकर बनाया गया है और इसको बनाने में 200 साल लगे हैं।
अच्छे से अच्छा धरोहर हमारे देश मे हैं कभी इनपर ध्यान दीजिए।
औरंगाबाद का कैलाश शिव मंदिर:
हम बात कर रहे हैं औरंगाबाद में स्थित भगवान शिव के इस मंदिर की।
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भगवान शिव के इस मंदिर के रहस्य के बारें में आज भी मात्र 10 से 15 प्रतिशत हिन्दू ही जानते हैं।
लेकिन औरंगाबाद स्थित कैलाश मंदिर के बारें में बोला जाता है कि इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि इसमें ईंट और पत्थरों का इस्तेमाल नहीं हुआ है।
एक पहाड़ी को इस तरह से काटा गया है कि आज एक पहाड़ी ही मंदिर है।
इस मंदिर को ऊपर से नीचे बनाया गया है।
जबकि आज इमारत हम नीचे से ऊपर बनाते हैं।
आज तक विज्ञान भी कैलाश मंदिर की इस सच्चाई का पता नहीं लगा पाया है कि किस तरह से और किस तरह की मशीनों से इस शिव मंदिर का निर्माण किया गया होगा।
भारत तो दूर की बात है अमेरिका, रूस के वैज्ञानिक भी ऐसा बोलते हैं कि इस मंदिर को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे मंदिर स्वर्ग से बना-बनाया ही उतारा गया हैं।
वेदों में बौमास्त्र नामक एक अस्त्र लिखा गया गया है जो शायद इस तरह के निर्माण को कर सकता था।
इस मंदिर के निर्माण में 40 हजार टन भारी पत्थर का निर्मा
*क्या आप पंद्रह सौ वर्ष पुराने सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में खड़े बाणस्तम्भ की विलक्षणता के विषय मे जानते हैं?* 🙏🏻🕉
इतिहास’ बडा चमत्कारी विषय है!! इसको खोजते खोजते हमारा सामना ऐसे स्थिति से होता है!!की हम आश्चर्य में पड जाते हैं!!
पहले हम स्वयं से पूछते हैं, यह कैसे संभव है..?
डेढ़ हजार वर्ष पहले इतना उन्नत और अत्याधुनिक ज्ञान हम भारतीयों के पास था!!
इस पर विश्वास ही नहीं होता..!
गुजरात के सोमनाथ मंदिर में आकर कुछ ऐसी ही स्थिति होती है!!
वैसे भी सोमनाथ मंदिर का इतिहास बड़ा ही विलक्षण और गौरवशाली रहा है!!
१२ ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है सोमनाथ..!
एक वैभवशाली, सुंदर शिवलिंग..!! इतना समृध्द की उत्तर-पश्चिम से आने वाले प्रत्येक आक्रांता की पहली नजर सोमनाथ पर जाती थी!!
अनेकों बार सोमनाथ मंदिर पर हमले हुए!!
उसे लूटा गया। सोना, चांदी, हिरा, माणिक, मोती आदि गाड़ियाँ भर-भर कर आक्रांता ले गए!!
इतनी संपत्ति लुटने के बाद भी हर बार सोमनाथ का शिवालय उसी वैभव के साथ खड़ा रहता था!!
लेकिन केवल इस वैभव के कारण ही सोमनाथ का महत्व नहीं है!!
सोमनाथ का मंदिर भारत के पश्चिम समुद्र तट पर है!! विशाल अरब सागर रोज भगवान सोमनाथ के चरण पखारता है!!और गत हजारों वर्षों के ज्ञात इतिहास में इस अरब सागर ने कभी भी अपनी मर्यादा नहीं लांघी है!!
न जाने कितने आंधी, तूफ़ान आये, चक्रवात आये लेकिन किसी भी आंधी, तूफ़ान, चक्रवात से मंदिर की कोई हानि नहीं हुई है!!
इस मंदिर के प्रांगण में एक स्तंभ (खंबा) है!!
यह बाणस्तंभ" नाम से जाना जाता है!!
यह स्तंभ कब से वहां पर हैं बता पाना कठिन है!! लगभग छठी शताब्दी से इस बाणस्तंभ का इतिहास में नाम आता है!!लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की बाणस्तंभ का निर्माण छठवे शतक में हुआ है!!
उस के सैकड़ों वर्ष पहले इसका निर्माण हुआ होगा!!
यह एक दिशादर्शक स्तंभ_है!! जिस पर समुद्र की ओर इंगित करता एक बाण है!!
इस बाणस्तंभ पर लिखा है - आसमुद्रांत दक्षिण धृव पर्यंत अबाधित ज्योतिरमार्ग.’
इसका अर्थ यह हुआ, इस बिंदु से दक्षिण धृव तक सीधी रेखामें एक भी अवरोध या बाधा नहीं_है अर्थात,इस समूची दूरी में जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं है।
यह ज्ञान इतने वर्षों पहले हम भारतीयों को था..?
कैसे संभव है.? और यदि यह सच हैं, तो कितने समृध्दशाली ज्ञान की वैश्विक धरोहर हम संजोये हैं..!
संस्कृत में लिखे हुए इस पंक्ति के अर्थ में अनेक गूढ़ अर्थ समाहित हैं!!
इस पंक्ति का सरल अर्थ यह हैं!!की...
#सोमनाथ_मंदिर के उस बिंदु से लेकर दक्षिण धृव तक (अर्थात अंटार्टिका तक), एक सीधी रेखा खिंची जाए तो बीच में एक भी भूखंड नहीं आता है!!
क्या यह सच है..? आज के इस तंत्रविज्ञान के युग में यह ढूँढना संभव तो है, लेकिन उतना आसान नहीं।
गूगल मैप में ढूंढने के बाद भूखंड नहीं दिखता है!!
लेकिन वह बड़ा भूखंड. छोटे, छोटे भूखंडों को देखने के लिए मैप को ‘एनलार्ज’ या ‘ज़ूम’ करते हुए आगे जाना पड़ता है!!
वैसे तो यह बड़ा ही ‘बोरिंग’ सा काम हैं. लेकिन धीरज रख कर धीरे-धीरे देखते गए तो रास्ते में एक भी भूखंड
अर्थात 10 किलोमीटर X 10 किलोमीटर से बड़ा भूखंड. उससे छोटा पकड में नहीं आता हैं!!नहीं आता है। अर्थात हम मान कर चले की उस संस्कृत श्लोक में सत्यता है।
किन्तु फिर भी मूल प्रश्न वैसा ही रहता है। अगर मान कर भी चलते हैं की सन ६०० में इस बाण स्तंभ का निर्माण हुआ था, तो भी उस जमाने में पृथ्वी का दक्षिणी धृव है, यह ज्ञान हमारे पुरखों के पास कहांसे आया..? अच्छा, दक्षिण धृव ज्ञात था यह मान भी लिया तो भी सोमनाथ मंदिर से दक्षिण धृव तक सीधी रेषा में एक भी भूखंड नहीं आता है, यह ‘मैपिंग’ किसने किया..? कैसे किया..? सब कुछ अद्भुत..!!
इसका अर्थ यह हैं की ‘बाण स्तंभ’ के निर्माण काल में भारतीयों को पृथ्वी गोल है, इसका ज्ञान था। इतना ही नहीं, पृथ्वी का दक्षिण धृव है (अर्थात उत्तर धृव भी है) यह भी ज्ञान था। यह कैसे संभव हुआ..? इसके लिए पृथ्वी का ‘एरिअल व्यू’ लेने का कोई साधन उपलब्ध था..? अथवा पृथ्वी का विकसित नक्शा बना था..?
नक़्शे बनाने का एक शास्त्र होता है। अंग्रेजी में इसे ‘कार्टोग्राफी’ (यह मूलतः फ्रेंच शब्द हैं.) कहते है। यह प्राचीन शास्त्र है। इसा से पहले छह से आठ हजार वर्ष पूर्व की गुफाओं में आकाश के ग्रह तारों के नक़्शे मिले थे। परन्तु पृथ्वी का पहला नक्शा किसने बनाया इस पर एकमत नहीं है।
हमारे भारतीय ज्ञान का कोई सबूत न मिलने के कारण यह सम्मान ‘एनेक्झिमेंडर’ इस ग्रीक वैज्ञानिक को दिया जाता है। इनका कालखंड इसा पूर्व ६११ से ५४६ वर्ष था। किन्तु इन्होने बनाया हुआ नक्शा अत्यंत प्राथमिक अवस्था में था। उस कालखंड में जहां जहां मनुष्यों की बसाहट का ज्ञान था, बस वही हिस्सा नक़्शे में दिखाया गया है। इस लिए उस नक़्शे में उत्तर और दक्षिण धृव दिखने का कोई कारण ही नहीं था।
आज की दुनिया के वास्तविक रूप के कर
इतिहास’ बडा चमत्कारी विषय है!! इसको खोजते खोजते हमारा सामना ऐसे स्थिति से होता है!!की हम आश्चर्य में पड जाते हैं!!
पहले हम स्वयं से पूछते हैं, यह कैसे संभव है..?
डेढ़ हजार वर्ष पहले इतना उन्नत और अत्याधुनिक ज्ञान हम भारतीयों के पास था!!
इस पर विश्वास ही नहीं होता..!
गुजरात के सोमनाथ मंदिर में आकर कुछ ऐसी ही स्थिति होती है!!
वैसे भी सोमनाथ मंदिर का इतिहास बड़ा ही विलक्षण और गौरवशाली रहा है!!
१२ ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है सोमनाथ..!
एक वैभवशाली, सुंदर शिवलिंग..!! इतना समृध्द की उत्तर-पश्चिम से आने वाले प्रत्येक आक्रांता की पहली नजर सोमनाथ पर जाती थी!!
अनेकों बार सोमनाथ मंदिर पर हमले हुए!!
उसे लूटा गया। सोना, चांदी, हिरा, माणिक, मोती आदि गाड़ियाँ भर-भर कर आक्रांता ले गए!!
इतनी संपत्ति लुटने के बाद भी हर बार सोमनाथ का शिवालय उसी वैभव के साथ खड़ा रहता था!!
लेकिन केवल इस वैभव के कारण ही सोमनाथ का महत्व नहीं है!!
सोमनाथ का मंदिर भारत के पश्चिम समुद्र तट पर है!! विशाल अरब सागर रोज भगवान सोमनाथ के चरण पखारता है!!और गत हजारों वर्षों के ज्ञात इतिहास में इस अरब सागर ने कभी भी अपनी मर्यादा नहीं लांघी है!!
न जाने कितने आंधी, तूफ़ान आये, चक्रवात आये लेकिन किसी भी आंधी, तूफ़ान, चक्रवात से मंदिर की कोई हानि नहीं हुई है!!
इस मंदिर के प्रांगण में एक स्तंभ (खंबा) है!!
यह बाणस्तंभ" नाम से जाना जाता है!!
यह स्तंभ कब से वहां पर हैं बता पाना कठिन है!! लगभग छठी शताब्दी से इस बाणस्तंभ का इतिहास में नाम आता है!!लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की बाणस्तंभ का निर्माण छठवे शतक में हुआ है!!
उस के सैकड़ों वर्ष पहले इसका निर्माण हुआ होगा!!
यह एक दिशादर्शक स्तंभ_है!! जिस पर समुद्र की ओर इंगित करता एक बाण है!!
इस बाणस्तंभ पर लिखा है - आसमुद्रांत दक्षिण धृव पर्यंत अबाधित ज्योतिरमार्ग.’
इसका अर्थ यह हुआ, इस बिंदु से दक्षिण धृव तक सीधी रेखामें एक भी अवरोध या बाधा नहीं_है अर्थात,इस समूची दूरी में जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं है।
यह ज्ञान इतने वर्षों पहले हम भारतीयों को था..?
कैसे संभव है.? और यदि यह सच हैं, तो कितने समृध्दशाली ज्ञान की वैश्विक धरोहर हम संजोये हैं..!
संस्कृत में लिखे हुए इस पंक्ति के अर्थ में अनेक गूढ़ अर्थ समाहित हैं!!
इस पंक्ति का सरल अर्थ यह हैं!!की...
#सोमनाथ_मंदिर के उस बिंदु से लेकर दक्षिण धृव तक (अर्थात अंटार्टिका तक), एक सीधी रेखा खिंची जाए तो बीच में एक भी भूखंड नहीं आता है!!
क्या यह सच है..? आज के इस तंत्रविज्ञान के युग में यह ढूँढना संभव तो है, लेकिन उतना आसान नहीं।
गूगल मैप में ढूंढने के बाद भूखंड नहीं दिखता है!!
लेकिन वह बड़ा भूखंड. छोटे, छोटे भूखंडों को देखने के लिए मैप को ‘एनलार्ज’ या ‘ज़ूम’ करते हुए आगे जाना पड़ता है!!
वैसे तो यह बड़ा ही ‘बोरिंग’ सा काम हैं. लेकिन धीरज रख कर धीरे-धीरे देखते गए तो रास्ते में एक भी भूखंड
अर्थात 10 किलोमीटर X 10 किलोमीटर से बड़ा भूखंड. उससे छोटा पकड में नहीं आता हैं!!नहीं आता है। अर्थात हम मान कर चले की उस संस्कृत श्लोक में सत्यता है।
किन्तु फिर भी मूल प्रश्न वैसा ही रहता है। अगर मान कर भी चलते हैं की सन ६०० में इस बाण स्तंभ का निर्माण हुआ था, तो भी उस जमाने में पृथ्वी का दक्षिणी धृव है, यह ज्ञान हमारे पुरखों के पास कहांसे आया..? अच्छा, दक्षिण धृव ज्ञात था यह मान भी लिया तो भी सोमनाथ मंदिर से दक्षिण धृव तक सीधी रेषा में एक भी भूखंड नहीं आता है, यह ‘मैपिंग’ किसने किया..? कैसे किया..? सब कुछ अद्भुत..!!
इसका अर्थ यह हैं की ‘बाण स्तंभ’ के निर्माण काल में भारतीयों को पृथ्वी गोल है, इसका ज्ञान था। इतना ही नहीं, पृथ्वी का दक्षिण धृव है (अर्थात उत्तर धृव भी है) यह भी ज्ञान था। यह कैसे संभव हुआ..? इसके लिए पृथ्वी का ‘एरिअल व्यू’ लेने का कोई साधन उपलब्ध था..? अथवा पृथ्वी का विकसित नक्शा बना था..?
नक़्शे बनाने का एक शास्त्र होता है। अंग्रेजी में इसे ‘कार्टोग्राफी’ (यह मूलतः फ्रेंच शब्द हैं.) कहते है। यह प्राचीन शास्त्र है। इसा से पहले छह से आठ हजार वर्ष पूर्व की गुफाओं में आकाश के ग्रह तारों के नक़्शे मिले थे। परन्तु पृथ्वी का पहला नक्शा किसने बनाया इस पर एकमत नहीं है।
हमारे भारतीय ज्ञान का कोई सबूत न मिलने के कारण यह सम्मान ‘एनेक्झिमेंडर’ इस ग्रीक वैज्ञानिक को दिया जाता है। इनका कालखंड इसा पूर्व ६११ से ५४६ वर्ष था। किन्तु इन्होने बनाया हुआ नक्शा अत्यंत प्राथमिक अवस्था में था। उस कालखंड में जहां जहां मनुष्यों की बसाहट का ज्ञान था, बस वही हिस्सा नक़्शे में दिखाया गया है। इस लिए उस नक़्शे में उत्तर और दक्षिण धृव दिखने का कोई कारण ही नहीं था।
आज की दुनिया के वास्तविक रूप के कर
ीब जाने वाला नक्शा ‘हेनरिक्स मार्टेलस’ ने साधारणतः सन १४९० के आसपास तैयार किया था। ऐसा माना जाता हैं, की कोलंबस ने इसी नक़्शे के आधार पर अपना समुद्री सफर तय किया था।
‘पृथ्वी गोल है’ इस प्रकार का विचार यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया था। ‘एनेक्सिमेंडर’ इसा पूर्व ६०० वर्ष, पृथ्वी को सिलेंडर के रूप में माना था। ‘एरिस्टोटल’ (इसा पूर्व ३८४ – इसा पूर्व ३२२) ने भी पृथ्वी को गोल माना था।
लेकिन भारत में यह ज्ञान बहुत प्राचीन समय से था, जिसके प्रमाण भी मिलते है। इसी ज्ञान के आधार पर आगे चलकर आर्यभट्ट ने सन ५०० के आस पास इस गोल पृथ्वी का व्यास ४,९६७ योजन हैं (अर्थात नए मापदंडों के अनुसार ३९,९६८ किलोमीटर हैं) यह भी दृढतापूर्वक बताया। आज की अत्याधुनिक तकनीकी की सहायता से पृथ्वी का व्यास ४०,०७५ किलोमीटर माना गया है। इसका अर्थ यह हुआ की आर्यभट्ट के आकलन में मात्र ०.२६% का अंतर आ रहा है, जो नाममात्र है..! लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले आर्यभट्ट के पास यह ज्ञान कहां से आया..?
सन २००८ में जर्मनी के विख्यात इतिहासविद जोसेफ श्वार्ट्सबर्ग ने यह साबित कर दिया की इसा पूर्व दो-ढाई हजार वर्ष, भारत में नकाशा शास्त्र अत्यंत विकसित था। नगर रचना के नक्शे उस समय उपलब्ध तो थे ही, परन्तु नौकायन के लिए आवश्यक नक़्शे भी उपलब्ध थे।
भारत में नौकायन शास्त्र प्राचीन काल से विकसित था। संपूर्ण दक्षिण आशिया में जिस प्रकार से हिन्दू संस्कृति के चिन्ह पग पग पर दिखते हैं, उससे यह ज्ञात होता है की भारत के जहाज पूर्व दिशा में जावा, सुमात्रा, यवद्वीप को पार कर के जापान तक प्रवास कर के आते थे। सन १९५५ में गुजरात के ‘लोथल’ में ढाई हजार वर्ष पूर्व के अवशेष मिले हैं। इसमें भारत के प्रगत नौकायन के अनेक प्रमाण मिलते हैं।
सोमनाथ मंदिर के निर्माण काल में दक्षिण धृव तक दिशादर्शन, उस समय के भारतियों को था यह निश्चित है। लेकिन सबसे महत्वपूर्व प्रश्न सामने आता है की दक्षिण धृव तक सीधी रेखा में समुद्र में कोई अवरोध नहीं है, ऐसा बाद में खोज निकाला, या दक्षिण धृव से भारत के पश्चिम तट पर, बिना अवरोध के सीधी रेखा जहां मिलती हैं, वहां पहला ज्योतिर्लिंग स्थापित किया..?
उस बाण स्तंभ पर लिखी गयी उन पंक्तियों में,
(‘आसमुद्रांत दक्षिण धृव पर्यंत, अबाधित ज्योतिरमार्ग..’)
जिसका उल्लेख किया गया है, वह ‘ज्योतिरमार्ग’ क्या है..?
यह आज भी प्रश्न ही है..!क्योंकि सुदूर दक्षिण में जाने वाले मार्ग का उत्तर काल के थपेड़ों में कहीं लुप्त हो गया है!!
Har Har Mahadev 🙏🏻🕉
‘पृथ्वी गोल है’ इस प्रकार का विचार यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया था। ‘एनेक्सिमेंडर’ इसा पूर्व ६०० वर्ष, पृथ्वी को सिलेंडर के रूप में माना था। ‘एरिस्टोटल’ (इसा पूर्व ३८४ – इसा पूर्व ३२२) ने भी पृथ्वी को गोल माना था।
लेकिन भारत में यह ज्ञान बहुत प्राचीन समय से था, जिसके प्रमाण भी मिलते है। इसी ज्ञान के आधार पर आगे चलकर आर्यभट्ट ने सन ५०० के आस पास इस गोल पृथ्वी का व्यास ४,९६७ योजन हैं (अर्थात नए मापदंडों के अनुसार ३९,९६८ किलोमीटर हैं) यह भी दृढतापूर्वक बताया। आज की अत्याधुनिक तकनीकी की सहायता से पृथ्वी का व्यास ४०,०७५ किलोमीटर माना गया है। इसका अर्थ यह हुआ की आर्यभट्ट के आकलन में मात्र ०.२६% का अंतर आ रहा है, जो नाममात्र है..! लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले आर्यभट्ट के पास यह ज्ञान कहां से आया..?
सन २००८ में जर्मनी के विख्यात इतिहासविद जोसेफ श्वार्ट्सबर्ग ने यह साबित कर दिया की इसा पूर्व दो-ढाई हजार वर्ष, भारत में नकाशा शास्त्र अत्यंत विकसित था। नगर रचना के नक्शे उस समय उपलब्ध तो थे ही, परन्तु नौकायन के लिए आवश्यक नक़्शे भी उपलब्ध थे।
भारत में नौकायन शास्त्र प्राचीन काल से विकसित था। संपूर्ण दक्षिण आशिया में जिस प्रकार से हिन्दू संस्कृति के चिन्ह पग पग पर दिखते हैं, उससे यह ज्ञात होता है की भारत के जहाज पूर्व दिशा में जावा, सुमात्रा, यवद्वीप को पार कर के जापान तक प्रवास कर के आते थे। सन १९५५ में गुजरात के ‘लोथल’ में ढाई हजार वर्ष पूर्व के अवशेष मिले हैं। इसमें भारत के प्रगत नौकायन के अनेक प्रमाण मिलते हैं।
सोमनाथ मंदिर के निर्माण काल में दक्षिण धृव तक दिशादर्शन, उस समय के भारतियों को था यह निश्चित है। लेकिन सबसे महत्वपूर्व प्रश्न सामने आता है की दक्षिण धृव तक सीधी रेखा में समुद्र में कोई अवरोध नहीं है, ऐसा बाद में खोज निकाला, या दक्षिण धृव से भारत के पश्चिम तट पर, बिना अवरोध के सीधी रेखा जहां मिलती हैं, वहां पहला ज्योतिर्लिंग स्थापित किया..?
उस बाण स्तंभ पर लिखी गयी उन पंक्तियों में,
(‘आसमुद्रांत दक्षिण धृव पर्यंत, अबाधित ज्योतिरमार्ग..’)
जिसका उल्लेख किया गया है, वह ‘ज्योतिरमार्ग’ क्या है..?
यह आज भी प्रश्न ही है..!क्योंकि सुदूर दक्षिण में जाने वाले मार्ग का उत्तर काल के थपेड़ों में कहीं लुप्त हो गया है!!
Har Har Mahadev 🙏🏻🕉
किसी ने साजिश तो जरूर की होगी वरना हिंदुस्तान सिर्फ ताजमहल से शुरू होकर लाल किले तक खत्म नही होता ..
ग्वालियर का किला
ग्वालियर का किला
द्वारकाधीश मन्दिर गुजरात ।
जिसे जगत मंदिर भी कहते हैं मंदिर का सबसे लंबा शिखर निज शिखर के नाम से जाना जाता है और यह लगभग 78.3 मीटर की ऊंचाई तक फैला है।
ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण के पोते वज्रनाभ द्वारा इस मन्दिर का निर्माण करवाया गया।
जय श्री कृष्ण 🙏
#IncredibleIndia🚩
जिसे जगत मंदिर भी कहते हैं मंदिर का सबसे लंबा शिखर निज शिखर के नाम से जाना जाता है और यह लगभग 78.3 मीटर की ऊंचाई तक फैला है।
ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण के पोते वज्रनाभ द्वारा इस मन्दिर का निर्माण करवाया गया।
जय श्री कृष्ण 🙏
#IncredibleIndia🚩
#रानीजी_की_बावड़ी, पाटन. #गुजरात
ये थी भारत के सनातन हिन्दू की कलाकृतियां व कलाकारी ।
विदेशी आक्रमणकारियों ने प्रवेश किया और भारत भी उन्हीं की तरह तहस-नहस होता चला गया।
जल प्रबंधन प्रणाली में भूजल संसाधनों के उपयोग की तकनीक का बेहतरीन उदाहरण मान कर 'रानी की वाव' को विश्व विरासत की नई सूची में शामिल किए जाने का औपचारिक ऐलान कर दिया गया है।
पानी की #शुद्धता को उजागर करने वाले एक उल्टे #मंदिर के रूप में #डिजाइन किया गया कदम,
#मूर्तिकला पैनलों के साथ सीढ़ियों के 7 स्तरों में विभाजित है। यह 64 * 20 * 27 क्यूबिक मीटर मापता है।
#रानीजी की #बावड़ी गुजरात के पाटन में स्थित एक #कुआं है, जो #सरस्वती नदी के तट पर स्थित है।
इसके निर्माण का श्रेय सौराष्ट्र के खेंगारा की बेटी #उदयमाती को दिया जाता है, जो 11 वीं शताब्दी के चौलुक्य वंश की रानी और भीम प्रथम की पत्नी हैं।
(नोट: हर सनातन शिल्प की तरह ये भी विज्ञान की नवीनतम कसौटी पे खरा उतरता है।)
ये थी भारत के सनातन हिन्दू की कलाकृतियां व कलाकारी ।
विदेशी आक्रमणकारियों ने प्रवेश किया और भारत भी उन्हीं की तरह तहस-नहस होता चला गया।
जल प्रबंधन प्रणाली में भूजल संसाधनों के उपयोग की तकनीक का बेहतरीन उदाहरण मान कर 'रानी की वाव' को विश्व विरासत की नई सूची में शामिल किए जाने का औपचारिक ऐलान कर दिया गया है।
पानी की #शुद्धता को उजागर करने वाले एक उल्टे #मंदिर के रूप में #डिजाइन किया गया कदम,
#मूर्तिकला पैनलों के साथ सीढ़ियों के 7 स्तरों में विभाजित है। यह 64 * 20 * 27 क्यूबिक मीटर मापता है।
#रानीजी की #बावड़ी गुजरात के पाटन में स्थित एक #कुआं है, जो #सरस्वती नदी के तट पर स्थित है।
इसके निर्माण का श्रेय सौराष्ट्र के खेंगारा की बेटी #उदयमाती को दिया जाता है, जो 11 वीं शताब्दी के चौलुक्य वंश की रानी और भीम प्रथम की पत्नी हैं।
(नोट: हर सनातन शिल्प की तरह ये भी विज्ञान की नवीनतम कसौटी पे खरा उतरता है।)
आश्चर्य घोषित करने का क्राइटेरिया क्या है ? क्योंकि असली आश्चर्य तो यहाँ है ।
"रामप्पा मंदिर” यह शायद विश्व का एक मात्र मंदिर है जिसका नाम भगवान के नाम पर ना होकर उसके शिल्पी के नाम पर है। कई शक्तिशाली भूकंपो के बाद भी इस मंदिर को नुकसान नहीं पहुँचा तब विशेषज्ञों ने इसकी जाँच शुरू की और अंततः इस मंदिर के एक पत्थर को तोड़कर पानी में डाला तो वह पानी पर तैरने लगा । बाद में पता चला कि ऐसे हल्के पत्थरो से बने होने के कारण ही इस मंदिर को क्षति नहीं पहुँचती । अब सवाल है कि जब दुनियाँ में इस तरह के पत्थर कहीं नहीं मिलते तो क्या रामप्पा ने ही 800 साल पहले ये पत्थर खुद बनाये ?
है ना आश्चर्य ?
(रामप्पा मंदिर, तेलंगाना)
"रामप्पा मंदिर” यह शायद विश्व का एक मात्र मंदिर है जिसका नाम भगवान के नाम पर ना होकर उसके शिल्पी के नाम पर है। कई शक्तिशाली भूकंपो के बाद भी इस मंदिर को नुकसान नहीं पहुँचा तब विशेषज्ञों ने इसकी जाँच शुरू की और अंततः इस मंदिर के एक पत्थर को तोड़कर पानी में डाला तो वह पानी पर तैरने लगा । बाद में पता चला कि ऐसे हल्के पत्थरो से बने होने के कारण ही इस मंदिर को क्षति नहीं पहुँचती । अब सवाल है कि जब दुनियाँ में इस तरह के पत्थर कहीं नहीं मिलते तो क्या रामप्पा ने ही 800 साल पहले ये पत्थर खुद बनाये ?
है ना आश्चर्य ?
(रामप्पा मंदिर, तेलंगाना)
कोई कह रहा था कि आगरा से बाहर कोई आश्चर्य ही नहीं है ..
मंदिर की भीतरी छत को देखिए । इसको देखकर हैरान होते समय याद रखना कि इसे आज से सैकड़ो साल पहले 12वीं शताब्दी में बनाया गया है । ऐसी संरचनाएँ हमारे पाठ्यक्रम में क्यों नहीं है ?
इतिहास लिखना तो वामपंथियों के हाथ में था लेकिन सबको इतिहास बताना हमारे हाथों में है ।
आओ हम इसका प्रचार करें ।
(चेन्नकेशव मंदिर, कर्नाटक)
मंदिर की भीतरी छत को देखिए । इसको देखकर हैरान होते समय याद रखना कि इसे आज से सैकड़ो साल पहले 12वीं शताब्दी में बनाया गया है । ऐसी संरचनाएँ हमारे पाठ्यक्रम में क्यों नहीं है ?
इतिहास लिखना तो वामपंथियों के हाथ में था लेकिन सबको इतिहास बताना हमारे हाथों में है ।
आओ हम इसका प्रचार करें ।
(चेन्नकेशव मंदिर, कर्नाटक)
क्या सात आश्चर्यों की लिस्ट बनाने वाले जवाब देंगे कि इस मंदिर को लिस्ट में शामिल क्यों नहीं किया गया ?
ये विट्टल मंदिर के स्तंभ हैं, ये सारे स्तंभ एक ही तरह के ग्रेनाइट पत्थर से बने हैं लेकिन प्रत्येक स्तंभ एक अलग ध्वनि उत्पन्न करता है,
क्या इसके पीछे की टेक्नोलॉजी आज के वास्तुकारों को पता है ?
अगर नहीं पता तो यह सात आश्चर्यों में क्यों नहीं है
(विट्टल मंदिर, कर्नाटक)
ये विट्टल मंदिर के स्तंभ हैं, ये सारे स्तंभ एक ही तरह के ग्रेनाइट पत्थर से बने हैं लेकिन प्रत्येक स्तंभ एक अलग ध्वनि उत्पन्न करता है,
क्या इसके पीछे की टेक्नोलॉजी आज के वास्तुकारों को पता है ?
अगर नहीं पता तो यह सात आश्चर्यों में क्यों नहीं है
(विट्टल मंदिर, कर्नाटक)
यह गर्भ प्रतिमा कुंडादम वडक्कुनाथ स्वामी मंदिर (कोयंबटूर से लगभग 60 किमी) की एक दीवार पर खुदी हुई है।
कल्पना कीजिए कि एक्स-रे की खोज से एक हजार साल पहले उस समय के लोगों को यह जानकारी कैसे मिली होगी।
मंदिर की अन्य दीवारों पर, हर महीने अजन्मे बच्चे की स्थिति की एक मूर्ति उकेरी जाती है।
सनातन वैदिक धर्म दुनिया का सबसे पुराना, पहला और अंतिम वैज्ञानिक धर्म है। सनातन ने दुनिया को विज्ञान दिया, उसे दृष्टि दी, जीने की कला दी, साहित्य दिया, संस्कृति दी, विज्ञान दिया, विमान का विज्ञान दिया, चिकित्सा विज्ञान दिया, अर्थशास्त्र दिया।
इसलिए मैं कहता हूं,
सनातन धर्म जैसा कोई दूसरा धर्म नहीं है।
सनातन धर्म लाखों वर्षों से वैज्ञानिक अनुसंधान कर रहा है, हमारे ऋषियों ने विज्ञान की नींव रखी है,
सनातन ऋषियों ने अपनी हड्डियों को पिघलाने के बाद, विज्ञान और दर्शन को दुनिया के लिए दृश्यमान बना दिया है।
पूरी दुनिया कभी भी सनातन ऋषियों के ऋण से मुक्त नहीं होगी, हमारे ऋषियों ने दुनिया को बहुत कुछ दिया है।
शेयर कर अपने सनातनी इतिहास को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाए
कल्पना कीजिए कि एक्स-रे की खोज से एक हजार साल पहले उस समय के लोगों को यह जानकारी कैसे मिली होगी।
मंदिर की अन्य दीवारों पर, हर महीने अजन्मे बच्चे की स्थिति की एक मूर्ति उकेरी जाती है।
सनातन वैदिक धर्म दुनिया का सबसे पुराना, पहला और अंतिम वैज्ञानिक धर्म है। सनातन ने दुनिया को विज्ञान दिया, उसे दृष्टि दी, जीने की कला दी, साहित्य दिया, संस्कृति दी, विज्ञान दिया, विमान का विज्ञान दिया, चिकित्सा विज्ञान दिया, अर्थशास्त्र दिया।
इसलिए मैं कहता हूं,
सनातन धर्म जैसा कोई दूसरा धर्म नहीं है।
सनातन धर्म लाखों वर्षों से वैज्ञानिक अनुसंधान कर रहा है, हमारे ऋषियों ने विज्ञान की नींव रखी है,
सनातन ऋषियों ने अपनी हड्डियों को पिघलाने के बाद, विज्ञान और दर्शन को दुनिया के लिए दृश्यमान बना दिया है।
पूरी दुनिया कभी भी सनातन ऋषियों के ऋण से मुक्त नहीं होगी, हमारे ऋषियों ने दुनिया को बहुत कुछ दिया है।
शेयर कर अपने सनातनी इतिहास को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाए