ऐतिहासिक मंदिर और उनकी कथा
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हमारी संस्कृति हमारा अभिमान

*इस चैनल मे हमारे मंदिरों की कथा के आडियो विडियो और हमारी सभ्यता से जुड़ी जगह का प्रसारण किया जाता है*

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#भारत को जानो -भारत को मानो🙏🚩🙏👉 #ओम_मंदिर,#पाली #राजस्थान
✊✊
#ऊँ की आकृति का पहला #शिवमंदिर राजस्थान के पाली से २२ किलोमीटर दूर जाडन गांव में स्थित है इस मंदिर का नींव वर्ष 1995 में रखी गई थी यह चार खंड में बना है इसमें से #एक पूरा खंड जमीन के #अंदर है और तीन जमीन के ऊपर इसमें अलग-अलग #1008शिवजी की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं यह 250 एकड़ क्षेत्र में बना है भवन में #108कक्ष हैं इसका शिखर #135फीट ऊंचा है🚩🙏🚩😊😊
बीच में #गुरु_माधवानंद_महाराज की समाधि है इसके ऊपर वाले भाग में #महादेव का #शिवलिंग है #सबसे ऊपर #ब्रह्मांड की आकृति बनी हुई है #नागर श्रेणी में बने इस भवन के #पत्थर बंशी पहाड़ #धौलपुर से लाए गए हैं इसके साथ ही 9मंजिला चंद्रबिंदु बना है जिसके सबसे ऊपर भगवान #सूर्य_का_मंदिर है इस मंदिर के नीचे ही 2 लाख लीटर की टंकी बनी है यह #भूमंडल पर #ओम के आकृति की #पहली इमारत है
#ओम_मंदिर,#पाली #राजस्थान
🚩🚩 हर हर महादेव🚩🚩
यह मूर्ति
*एक ही पत्थर को काटकर बनाई गई है ,*

कैसे बनाई, यह भगवान जाने, या बनाने वाला...

*नाग वासुकि मन्दिर, प्रयाग🙏🏻🚩🚩*
कुछ तो साजिश हुई है सनातन धर्म के खिलाफ
वरना इसके सामने ताज महल की क्या औकात!♥🚩
(भुज)
Shri Swaminarayan Mandir, Bhuj 🙏🙏🦁💪🦁🚩🚩
🚩🔱

*प्रतिमा_निर्माण_में_पत्थरों_के_चयन_का_तरीका*

सनातन धर्म में
ईश्वर की मूर्ति और मन्दिरों के लिये
*किस प्रकार के पत्थर चयन होता है*
आप जानेंगे तो अचरज करेंगे

मन्दिरों में प्रतिमा निर्माण से पहले
*पत्थरों की परीक्षा* की जाती है।

*मयमतम्, अग्नि पुराण और सूत्रधार-मण्डन जैसे ग्रंथों में*
पत्थरों की जाँच के लिए नियम लिखे गए हैं

और देवता मूर्ति प्रकरण के अनुसार पाषाण को तीन प्रकार में वर्गीकृत किया जाता है –

*पुंशिला, स्त्रीशिला और नपुंसक शिला!*

जिस पत्थर से
*'गजघंटारवाघोषा' मतलब हाथी के गले में बँधी घँटी जैसी मधुर आवाज उठती है उसे पुंशिला कहते हैं।*


पुंशिला सम-चौरस होती हैं और
*देवप्रतिमा तथा शिवलिंग निर्माण में इसका उपयोग किया जाता है।*

*'कांस्यतालसमध्वनिः' काँसे जैसी ध्वनि उत्पन्न करने वाले पत्थरों का वर्गीकरण स्त्रीशिला के रूप में किया गया है,*

इनका आकार गोल होता है और
*सूत्रधार-मण्डन के अनुसार देवी प्रतिमा का निर्माण इससे किया जाता है।*


यह शिला मूल में स्थूल तथा अग्रभाग में कृश होती है।


*अनियमित आकार और 'स्थूलाग्रं च कृशं मध्यं' अग्र भाग में स्थूल और मध्य में कृश शिला को नपुंसक शिला कहा गया है।*

नपुंसक शिला का उपयोग
*ब्रह्मशिला या कूर्मशिला के रूप में देवप्रतिमाओं के आधार/नींव में किया जाता है।*
इन्हें पादशिला भी कहते हैं।

विविध ग्रंथों में शिला-लक्षण जाँचने के लिए इतना विस्तृत वर्णन किया गया है

इन सभी जानकारियों को समाविष्ट करना मुश्किल है।

*पत्थरों की दिशा, आकार, ध्वनि और रंग जैसे अनेक परिमाणों से शिला परीक्षा की जाती है।*

*मयमतम्, काश्यप-शिल्प और अग्नि पुराण जैसे ग्रंथों के अनुसार ...*
*पत्थरों को बाल, यौवना और वृद्धा जैसी श्रेणियों में भी वर्गीकृत किया गया है।*

हिन्दू मन्दिरों का अभ्यास इतना रसप्रद है
कि आप हमारे प्राचीन मंदिरों के पत्थरों से एक प्रकार का आध्यात्मिक प्रेम करने लगेंगे.



🚩🚩🚩🚩🚩
#Distorted_History

श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग दर्शन हेतु लाइन में था, अचानक सामने लगे घंटे पर नज़र गई... देखने में कुछ अलग सा था. दर्शन के बाद उत्सुकतावश उधर भी गये. वह घंटा महादेव गर्भगृह से ठीक सामने एक छोटे से शनि मंदिर पर लगा था... जाकर देखा... तो उसपे चर्च का निशान और 1729 लिखा था,

मन में उत्सुकता और बढ़ गई... शनि मंदिर के पुजारी जी से पूछने पर पता चला कि यह घंटा पेशवा कोकण क़िले के चर्च से पुर्तगालियों को हराकर लाए थे, लेकिन यह जानकारी पर्याप्त नहीं थी... इसलिए हमने महान मराठा इतिहास के पुराने पीले पन्ने खोजे और पाया कि यह अद्भुत कुछ अलग सा दिखने वाला घंटा कोई मामूली घंटा नही.. अपितु महान हिंदू पराक्रम का प्रतीक है.

इसे पेशवा बाज़ीराव नही... बल्कि उनके छोटे भाई वीर चिमाजी अप्पा जीतकर लाए थे.... और यह एक नही बल्कि ऐसे पाँच घंटे पुर्तगालियों की भुजाओं को कुचलकर, मराठा साम्राज्य की विजय के प्रतीक के रूप में महाराष्ट्र के पाँच विभिन्न मंदिर प्रांगणों में स्थापित किए गए. उन घंटों को "स्मारक एवं वीर स्मृति" रखने के लिए उन पर स्थित चर्च और सन बनाए रखा गया.

पता नही हमारी आने वाली पीढियां ऐसे हज़ारों गौरवशाली इतिहासों को जान भी पाएँगी या नही?? या भंसाली जैसे फ़िल्मकारों द्वारा बनाई जा रही फटीचर इतिहास वाली घटिया फ़िल्मे हमारी आगामी पीढ़ी को भी विक्षिप्त कर देंगी.

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नोट : भंसाली ने अपनी फ़िल्म में पुर्तगालियों को कुचलकर पाँच बार घंटे जीतकर लाने वाले महान चिमाजी अप्पा को "प्रेम के शत्रु और षड्यंत्रकारी" दिखाया था...

(पोस्ट साभार :- हनुमंत लाल मिश्र)
#historical
भगवान #शिव की अर्ध परिक्रमा क्यों.. ?

शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।

''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।।
इति वाचनान्तरात।''

सोमसूत्र :

शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।

क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :

सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।

तब लांघ सकते हैं :

शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है,

लेकिन
‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’ का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

किस ओर से करनी चाहिये परिक्रमा

भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।

!! ॐ नमः शिवाय !!
चट्टानों का सीना चीरकर उसे नया जीवन देना, ये एक ऐसा हुनर है जिसे हमने दुनिया को सिखाया।

भारत में आज लगभग 1500 ऐसे स्मारक है जो चट्टानों को तराश कर खड़े किए गए है।
ये संख्या विश्व के अन्य सभी देशों के कुल स्मारकों की संख्या से भी अधिक है, आइए आज आपको ले के चलते है हमारी ऐसी ही एक धरोहर की ओर जो पिछले 1500 सालो से हमारी संस्कृति की महानता की परिचायक है।

कर्नाटक राज्य के बागलकोट जिले में स्थित बादामी के गुफा मन्दिर चालुक्य स्थापत्य कला का सहज ही गान करती है, चार गुफाओं का ये समूह एक ही बड़ी चट्टान को तराश कर बनाया गया है, आइए जानते है इनसे जुड़े कुछ रोचक तथ्य-

1 - इन मंदिरों का निर्माण उत्तर की नागर तथा दक्षिण की द्रविन शैली के मिश्रण से किया गया है।
2 - इन गुफाओं का निर्माण 6 वी शताब्दी में चालुक्य राजा कीर्ति वर्मन तथा उनके भाई मंगलेश प्रथम द्वारा कराया गया ।
3- इन सभी गुफाओं की संरचना लगभग एक सी है, सबसे अगले भाग में खम्बो पर आधारित एक बरामदा जो कि हमें एक बड़े कक्ष (महामण्डप) में ले जाता है, जो कि खूबसूरती से तराशे गए खम्बो से सजाया गया है, महामण्डप के आगे गर्भगृह है जहां देव की मूर्तियां स्थापित है।
4 - प्रत्येक गुफा का बरामदा और महामण्डप पौराणिक घटनाओं तथा देवी देवताओं की मूर्तियों से सजाया गया है।
5 गुफाओं का वर्णन

गुफा संख्या 1 - ये सबसे प्राचीन गुफा है जो भगवान शिव को समर्पित है, इस गुफा की दीवारों पर शिव के नटराज रूप के 18 हाथो वाली प्रतिमा उकेरी गई है, यही नहीं भगवान शिव की अलग अलग नृत्य मुद्रा की लगभग 81 प्रतिमाओं को इन दीवारों पर उकेरा गया है, गर्भगृह में प्राचीन शिवलिंग प्रतिष्ठित है।

गुफा संख्या 2 - ये गुफा भगवान विष्णु को समर्पित है तथा इसका मुख्य आकर्षण भगवान विष्णु के त्रिविक्रम रूप का चित्रण है जिसमें वह प्रथम पग से धरती, दूसरे पग से आकाश तथा उनका तीसरा पग राजा बलि के मस्तक पर है,
इसके अतिरिक्त भगवान विष्णु के वराह तथा कृष्ण अवतार से जुड़े प्रसंगों का भी सजीव चित्रण है, गुफा की छत पर गरुड़ तथा पौराणिक कथाओं का उल्लेख है।

गुफा संख्या 3 - ये सबसे बड़ी तथा सबसे आकर्षक गुफा है जिसकी गहराई लगभग 100 फीट है, आप अंदाजा लगा सकते है कि 100 फीट तक चट्टानों को तोड़ कर फिर उसे सजाना आज से 1500 वर्षों पहले कितना दुष्कर रहा होगा।
यह गुफा भी श्री विष्णु को समर
*मुरुदेश्वर शिव मंदिर, कर्नाटक*
*कुतुब मीनार "कुतुबउददीन ऐबक" ने बनवाया तो "बाल गणेश" और हिन्दू आकृतियां उसके अंदर कैसे आ आई ???* 🤔🤔
भगवान शिव का अद्भुत मंदिर...

सुंदरता की पराकाष्ठा....

(ओना कोना मंदिर, धमतरी, छत्तीसगढ़)